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Pratidin Ek Kavita

Pratidin Ek Kavita

1,141 episodes — Page 12 of 23

Ep 593Vo Ped | Shashiprabha Tiwari

वो पेड़ | शशिप्रभा तिवारीतुमने घर के आंगन में आम के गाछ को रोपा थातुम उसी के नीचे बैठ कर समय गुज़ारते थे उसकी छांव में लोगों के सुख दुख सुनते थे उस पेड़ के डाल के पत्ते उसके मंजरउसके टिकोरे उसके कच्चे पक्के फलसभी तुमसे बतियाते थेजब तुम्हारा मन होता अपने हाथ से उठाकर किसी के हाथ में आम रखते कहते इसका स्वाद अनूठा है वह पेड़ किसी को भाता थाकिसी को नहीं भीजैसे तुम कहते थे हर कोई मुझे पसंद करे ज़रूरी तो नहीं पेड़ वहीं खड़ा आज भी तुम्हारी राह देखता है वह भूल गया है कि टूटे पत्ते, डाल, फलदोबारा उसके तने से नहीं जुड़ सकते केशव! तुम भरी दोपहरी में उस पेड़ को याद दिला दोकि तुम द्वारका से मथुरा की गलियों कोनहीं लौट सकते इस सफर में कदम-कदम आगे ही बढ़ते हैं लौटना और वापस लौटना ज़िन्दगी में नहीं होता उम्र की तरहउसकी गिनती रोज़ बढ़ती जाती है तुम्हारे आंगन का वो पेड़ मुझे मेरी ज़िन्दगी के किस्से याद दिलाता है माधव! क्या करूं?

Nov 14, 20242 min

Ep 592Dua Sab Karte Aaye Hain | Firaaq Gorakhpuri

दुआ सब करते आए हैं | फ़िराक़ गोरखपुरीदुआ सब करते आए हैं दुआ से कुछ हुआ भी होदुखी दुनिया में बन्दे अनगिनत कोई ख़ुदा भी होकहाँ वो ख़ल्वतें दिन रात की और अब ये आलम है।कि जब मिलते हैं दिल कहता है कोई तीसरा भी होये कहते हैं कि रहते हो तुम्हीं हर दिल में दुख बन करये सुनते हैं तुम्हीं दुनिया में हर दुख की दवा भी होतो फिर क्या इश्क़ दुनिया में कहीं का भी न रह जाएज़माने से लड़ाई मोल ले तुझसे बुरा भी हो'फ़िराक़' इन्सान से क्या फ़ैसला हो कुफ़्र-ओ-ईमाँ काये हैरत-ख़ेज़ दुनिया जब ख़ुदा भी मानसिवा भी होख़ल्वतें - एकांतहैरत-ख़ेज - आश्चर्यचकित करने वाली मानसिवा - अलावाकुफ्ऱ- अल्लाह को न मानना, अविश्वासईमान- आस्था, विश्वास

Nov 13, 20242 min

Ep 591Pyar Mein Chidiya | Kuldeep Kumar

प्यार में चिड़िया | कुलदीप कुमारएक चिड़ियाअपने नन्हे पंखों मेंभरना चाहती हैआसमानवह प्यार करती हैआसमान से नहींअपने पंखों सेएक दिन उसके पंख झड़ जायेंगेऔरवह प्यार करना भूल जायेगीभूल जायेगी वहअन्धड़ में घोंसले को बचाने के जतनबच्चों को उड़ना सिखाने की कोशिशेंयाद रहेगा सिर्फ़पंखों के साथ झड़ा आसमान

Nov 12, 20241 min

Ep 590Koi Hans Raha Hai Koi Ro Raha Hai | Akbar Allahabadi

कोई हँस रहा है कोई रो रहा है | अकबर इलाहाबादीकोई हँस रहा है कोई रो रहा हैकोई पा रहा है कोई खो रहा हैकोई ताक में है किसी को है गफ़लतकोई जागता है कोई सो रहा हैकहीँ नाउम्मीदी ने बिजली गिराईकोई बीज उम्मीद के बो रहा हैइसी सोच में मैं तो रहता हूँ 'अकबर'यह क्या हो रहा है यह क्यों हो रहा है

Nov 11, 20241 min

Ep 589Ladki Ne Darna Chhor Diya | Sheoraj Singh 'Bechain'

लड़की ने डरना छोड़ दिया | डॉ श्यौराज सिंह बेचैन लड़की ने डरना छोड़ दियाअक्षर के जादू नेउस पर असर बड़ा बेजोड़ किया,चुप्पा रहना छोड़दिया, लड़की ने डरना छोड़ दिया।हंसकर पाना सीख लिया, रोना-पछताना छोड़ दिया।बाप को बोझ नहींहोगी वह, नहीं पराया धन होगीलड़के से क्यों-कम होगी, वो उपयोगीजीवन होगी।निर्भरता कोछोड़ेगी, जेहनी जड़ता को तोड़ेगीसमता मूल्य जियेगी अब वोएकतरफा क्यों ओढ़ेगी।जल्दी नहीं करेगी शादीदेर से 'मां' पद पायेगी।नाजुक क्यों,फौलाद बनेगी,दम-खम काम में लायेगी।ना दहेज को-सहमत होगी, कौम की कारा तोडेगीघुट-युटकरअब नहीं मरेगी,मंच पै चढ़कर बोलेगी।समय और शिक्षा -ने उसके चिंतन का रुखमोड़ दिया।चुप्पा रहना छोड़दिया, लड़की ने डरना छोड़ दिया।दूर-दूर से चुग्णा-लाकर नीड़ में चिड़िया खाती है।लेकिन लड़की पल-कर बढ़कर, शादी करउड़ जाती है।लड़की सेवा करेबुढ़ापे में तो क्यों लड़का चाहें ?इसी प्रश्न केसमाधान ने भीतर तक झकझोर दियाचुप्पा रहना छोड़-दिया, लड़की ने डरना छोड़ दिया।

Nov 10, 20242 min

Ep 588Doosre Log | Manglesh Dabral

दूसरे लोग | मंगलेश डबराल दूसरे लोग भी पेड़ों और बादलों से प्यार करते हैंवे भी चाहते हैं कि रात में फूल न तोड़े जाएँउन्हें भी नहाना पसन्द है एक नदी उन्हें सुन्दर लगती हैदूसरे लोग भी मानवीय साँचों में ढले हैंथके-मांदे वे शाम को घर लौटना चाहते हैं।जो तुम्हारी तरह नहीं रहते वे भी रहते हैं यहाँ अपनी तरह सेयह प्राचीन नगर जिसकी महिमा का तुम बखान करते हो सिर्फ़ धूल और पत्थरों का पर्दा हैऔर भूरी पपड़ी की तरह दिखता यह सिंहासनजिस पर बैठकर न्याय किए गएइसी के नीचे यहाँ हुए अन्याय भी दबे हैंसभ्यता का गुणगान करनेवालोतुम अगर सध्य नहीं होतो तुम्हारी सभ्यता का क़द तुमसे बड़ा नहीं है।एक लम्बी शर्म से ज़्यादा कुछ नहीं है इतिहासआग लगानेवालोइससे दूसरों के घर मत जलाओआग मनुष्य की सबसे पुरानी अच्छाई हैयह आत्मा में निवास करती है और हमारा भोजन पकाती हैअत्याचारियोतुम्हें अत्याचार करते हुए बहुत दिन हो गएजगह-जगह पोस्टरों अख़बारों में छपे तुम्हारे चेहरे कितने विकृत हैंतुम्हारे मुख से निकल रहा है झागआर तुम जो कुछ कहते हो उससे लगता हैअभी नष्ट होनेवाला है बचाखुचा हमारा संसार।

Nov 9, 20243 min

Ep 587Vah Chehra | Kuldeep Kumar

वह चेहरा | कुलदीप कुमारआज फिर दिखीं वे आँखेंकिसी और माथे के नीचेवैसी ही गहरी काली उदासफिर कहीं दिखे वे सांवले होंठअपनी ख़ामोशी में अकेलेकिन्हीं और आँखों के तलेझलकी पार्श्व से वही ठोड़ीदौड़कर बस पकड़ते हुएदेखे वे केशलाल बत्ती पर रुके-रुकेअब कभी नहीं दिखेगावह पूरा चेहरा?

Nov 8, 20241 min

Ep 586Tumhari Kavita | Prashant Purohit

तुम्हारी कविता | प्रशांत पुरोहित तुम्हारी कविता में उसकी काली आँखें थीं-कालिमा किसकी-पुतली की,भँवों की,कोर की,या काजल-घुले आँसुओं की झिलमिलाती झील की?तुम्हारी ग़ज़ल में उसकी घनी ज़ुल्फ़ें थीं—ज़ुल्फ़ें कैसीं-ललाट लहरातीं,कांधे किल्लोलतीं,कमर डोलतीं,या पसीने-पगी पेशानी पे पसरतीं, बट खोलतीं?तुम्हारी नज़्म में उसकी आवाज़ थी -आवाज़ कैसी-गाती हुई,बुलाती हुई, अलसाती हुई,या हाँफती काली आँखों से चुपचाप आती हुई?तुम्हारे छंदों में उसकी पतली कमर थी-कमर कैसी-लहराती आँच-सी,दूज के दो चाँद-सी,नूरो-जमाल-सी, या पसलियों व पेट को जोड़े रखने के असफल प्रयास-सी?तुम्हारी कविता में उसके पाँव थे -पाँव कैसे -महावर-रचे,मख़मल-पगे,बिछुआ-सजे,या जो फटी बिवाई के साथ धरती पकड़कर चले?तुम्हारे गीतों में उसकी गोरी बाँहें थीं-बाँहें कैसीं-हरसिंगार-डाल,वैजयंती-माल,कोई अनंग-जाल, या जो उठीं ऐंठन-भरी कसी मुट्ठियों को संभाल?

Nov 7, 20243 min

Ep 585Nadiyan | Alok Dhanwa

नदियाँ | आलोक धन्वाइछामती और मेघनामहानंदारावी और झेलमगंगा गोदावरीनर्मदा और घाघरानाम लेते हुए भी तकलीफ़ होती हैउनसे उतनी ही मुलाक़ात होती हैजितनी वे रास्ते में आ जाती हैंऔर उस समय भी दिमाग कितना कमपास जा पाता हैदिमाग तो भरा रहता हैलुटेरों के बाज़ार के शोर से।

Nov 6, 20241 min

Ep 584Pani Ek Roshni Hai | Kedarnath Singh

पानी एक रोशनी है। केदारनाथ सिंहइन्तज़ार मत करोजो कहना हो कह डालोक्योंकि हो सकता है फिर कहने काकोई अर्थ न रह जाएसोचोजहाँ खड़े हो, वहीं से सोचोचाहे राख से ही शुरू करोमगर सोचोउस जगह की तलाश व्यर्थ है।जहाँ पहुँचकर यह दुनियाएक पोस्ते के फूल में बदल जाती हैनदी सो रही हैउसे सोने दोउसके सोने सेदुनिया के होने का अन्दाज़ मिलता है।पूछोचाहे जितनी बार पूछना पड़ेचाहे पूछने में जितनी तकलीफ़ होमगर पूछोपूछो कि गाड़ी अभी कितनी लेट हैअँधेरा बज रहा है।अपनी कविता की किताब रख दो एक तरफ़और सुनो-सुनोअँधेरे में चल रहे हैंलाखों-करोड़ों पैरपानी एक रोशनी हैअँधेरे में यही एक बात है।जो तुम पूरे विश्वास के साथदूसरे से कह सकते हो

Nov 5, 20242 min

Ep 583Ma | Uttima Keshari

माँ | उत्तिमा केशरीमाँ आसनी पर बैठकर जबएकाकी होकरबाँचती है रामायणतब उनके स्निग्धज्योतिर्मय नयनभीग उठते हैं बार-बार ।माँ जब ज्योत्सना भरी रात्रि मेंसुनाती है अपने पुरखों के बारे मेंतो उनकी विकंपित दृष्टिठहर जाती है कुछ पल के लिएमानो सुनाई पड़ रही होएक आर्तनाद !माँ जब सोती है धरती परसुजनी बिछाकर तबवह ढूँढ़ रही होती हैअपनी ही परछाईजिसे उसने छुपाकररखा है वर्षों से ।

Nov 4, 20241 min

Ep 582Andhere Ki Bhi Hoti Hai Ek Vyavastha | Anupam Singh

अँधेरे की भी होती है एक व्यवस्था | अनुपम सिंह अँधेरे की भी होती है एक व्यवस्थाचीज़ें गतिमान रहती हैं अपनी जगहों परबादल गरजते हैं कहीं टूट पड़ती हैं बिजलियाँबारिश अँधेरे में भी भिगो देती है पेड़पत्तियों से टपकता पानी सुनाई देता हैअँधेरे के आईने में देखती हूँ अपना चेहरातुम आते तो दिखाई देते होबस! ख़त्म नहीं होतीं दूरियाँआँसू ढुलक जाते हैं गालों परअँधेरे में भी दुख की होती है एक चमकदूर दी जा रही है बलिअँधेरे में भी सुना जा सकता है फ़र्श पर गिरा चाकूकोई होता तो रख देता हाथमेरी काँपती-थरथराती देह परअँधेरे में भी उठ रही है चिताओं से गंधराख उड़कर पड़ रही है फूलों परहाथ से छुई जा सकती है ताज़ा खुदी कब्रों की मिटटी वहाँ अभी भी जाग रही हैं मुर्दे की इच्छाएँखेल रहे हैं दो बालक उसकेअँधेरे में भी सुनी जा सकती है उनके हृदय की धकधकबिल्ली अँधेरे में भी खेलती है अपने बच्चों संगऔर कवि गढ़ लेता उजाले का बिम्बअँधेरे में भी लादे-फाँदे रेलगाड़ियाँपहुँच जाती हैं कहाँ से कहाँएक अँधेरे से दूसरे अँधेरे में पैदल ही पहुँच जाते हैं।बच्चे बूढ़े औरतें और अपाहिज सुनाई देती है उनकी कातर पुकारअँधेरे में भी उपस्थित रहता है ब्रम्हांडअँधेरे-उजाले से परे घूमती रहती है पृथ्वीअँधेरे के आर-पार घूमते हैं नक्षत्र सारेअँधेरे की भी होती है व्यवस्थाअँधेरे में अंकुरित होते हैं बीजसादे काग़ज अँधेरे में भी करते हैं इंतज़ार किसी क़लम कालिखे जाने को समय की कविता।

Nov 3, 20243 min

Ep 581Achha Tha Agar Zakhm Na Bharte Koi Din Aur | Faraz

अच्छा था अगर ज़ख्म न भरते कोई दिन और | फ़राज़अच्छा था अगर ज़ख्म न भरते कोई दिन औरउस कू-ए-मलामत में गुज़रते कोई दिन औररातों के तेरी यादों के खुर्शीद उभरतेआँखों में सितारे से उभरते कोई दिन औरहमने तुझे देखा तो किसी और को ना देखाए काश तेरे बाद गुज़रते कोई दिन औरराहत थी बहुत रंज में हम गमतलबों कोतुम और बिगड़ते तो संवरते कोई दिन औरगो तर्के-तअल्लुक था मगर जाँ पे बनी थीमरते जो तुझे याद ना करते कोई दिन औरउस शहरे-तमन्ना से फ़राज़ आये ही क्यों थेये हाल अगर था तो ठहरते कोई दिन औरकू-ए-मलामत - ऐसी गली जहाँ व्यंग्य किया जाता होखुर्शीद - सूर्यरंज - तकलीफ़, ग़मतलब- दुख पसन्द करने वालेतर्के-तअल्लुक - रिश्ता टूटना( यहाँ संवाद हीनता से मतलब है)

Nov 2, 20242 min

Ep 580Vah Jan Mare Nahi Marega | Kedarnath Agarwal

वह जन मारे नहीं मरेगा | केदारनाथ अग्रवाल जो जीवन की धूल चाटकर बड़ा हुआ है,तूफानों से लड़ा और फिर खड़ा हुआ है,जिसने सोने को खोदा, लोहा मोड़ा है,जो रवि के रथ का घोड़ा है,वह जन मारे नहीं मरेगा,नहीं मरेगा!!जो जीवन की आग जलाकर आग बना है,फौलादी पंजे फैलाये नाग बना है,जिसने शोषण को तोड़ा, शासन मोड़ा है,जो युग के रथ का घोड़ा है,वह जन मारे नहीं मरेगा,नहीं मरेगा!!

Nov 1, 20241 min

Ep 579Ma Ki Zindagi | Suman Keshari

माँ की ज़िन्दगी | सुमन केशरीचाँद को निहारतीकहा करती थी माँवे भी क्या दिन थेजब चाँदनी के उजास मेंजाने तो कितनी बार सीए थे मैंनेतुम्हारे पिताजी का कुर्तेकाढ़े थे रूमालअपनी सास-जिठानी की नज़रें बचा केअपने गालों की लाली छिपातीवे झट हाज़िर कर देतीसूई-धागाऔर धागा पिरोने कीबाज़ी लगातीहरदम हमारी जीत की कामना करती माँऐसे पलों में खुद बच्ची बन जातीबिटिया यह नानी की कहानी नहींइसी शहर कीयह तेरी माँ की ज़िंदगानी है...

Oct 31, 20241 min

Ep 578Mujhe Prem Chahiye | Nilesh Raghuvanshi

मुझे प्रेम चाहिए | नीलेश रघुवंशी मुझे प्रेम चाहिएघनघोर बारिश-सा ।कड़कती धूप में घनी छाँव-साठिठुरती ठंड में अलाव-सा प्रेम चाहिए मुझे।उग आये पौधों और लबालब नदियों-सादूर तक पैली दूबउस पर छाई ओस की बुँदों सा ।काले बादलों में छिपा चाँदसूरज की पहली किरण-साप्रेम चाहिए ।खिला-खिला लाल गुलाब-साकुनमुनाती हँसी-साअँधेरे में टिमटिमाती रोशनी-सा प्रेम चाहिए।अनजाना अनचीन्हा अनबोला सापहली नज़र-सा प्रेम चाहिए मुझे ।ऊबड़-खाबड़ रास्तों से मंज़िल तक पहुँचाताप्रेम चाहिए मुझे।मुझे प्रेम चाहिएसारी दुनिया रहती हो जिसमेंप्रेम चाहिए मुझे ।

Oct 30, 20241 min

Ep 577Stree | Sushila Takbhore

स्त्री | सुशीला टाकभौरेएक स्त्रीजब भी कोई कोशिश करती हैलिखने की बोलने की समझने कीसदा भयभीत-सी रहती हैमानो पहरेदारी करता हुआकोई सिर पर सवार होपहरेदारजैसे एक मज़दूर औरत के लिएठेेकेदारया खरीदी संपत्ति के लिएचौकीदारवह सोचती है लिखते समय कलम को झुकाकरबोलते समय बात को संभाल लेऔर समझने के लिएसबके दृष्टिकोण से देखेक्योंकि वह एक स्त्री है!

Oct 29, 20241 min

Ep 576Marne Ki Fursat | Anamika

मरने की फ़ुरसत | अनामिकाईसा मसीहऔरत नहीं थेवरना मासिक धर्म ग्यारह बरस की उमर से उनको ठिठकाए ही रखता देवालय के बाहर!बेथलेहम और यरूशलम के बीच कठिन सफ़र में उनके हो जाते कई तो बलात्कार और उनके दुधमुँहे बच्चे चालीस दिन और चालीस रातें जब काटते सड़क पर, भूख से बिलबिलाकर मरते एक-एक कर—ईसा को फ़ुरसत नहीं मिलती सूली पर चढ़ जाने की भी!

Oct 28, 20241 min

Ep 575Kab Laut Ke Aaoge | Salman Akhtar

कब लौट के आओगे बता क्यों नहीं देते | सलमान अख़्तरकब लौट के आओगे बता क्यों नहीं देतेदीवार बहानों की गिरा क्यों नहीं देतेतुम पास हो मेरे तो पता क्यों नहीं चलतातुम दूर हो मुझसे तो सदा क्यों नहीं देतेबाहर की हवाओं का अगर ख़ौफ़ है इतनाजो रौशनी अंदर है, बुझा क्यों नहीं देते

Oct 27, 20241 min

Ep 574Anupasthit Upasthit | Rajesh Joshi

अनुपस्थित-उपस्थित | राजेश जोशी मैं अक्सर अपनी चाबियाँ खो देता हूँछाता मैं कहीं छोड़ आता हूँऔर तर-ब-तर होकर घर लौटता हूँअपना चश्मा तो मैं कई बार खो चुका हूँपता नहीं किसके हाथ लगी होंगी वे चीजेंकिसी न किसी को कभी न कभी तो मिलती ही होंगीवे तमाम चीज़ें जिन्हें हम कहीं न कहीं भूल आएछूटी हुई हर एक चीज़ तो किसी के काम नहीं आती कभी भीलेकिन कोई न कोई चीज़ तो किसी न किसी केकभी न कभी काम आती ही होगीजो उसका उपयोग करता होगाजिसके हाथ लगी होंगी मेरी छूटी हुई चीजेंवह मुझे नहीं जानता होगाहर बार मेरा छाता लगाते हुएवह उस आदमी के बारे में सोचते हुएमन-ही-मन शुक्रिया अदा करता होगा जिसे वह नहीं जानताइस तरह एक अनाम अपरिचित की तरह उसकी स्मृति मेंकहीं न कहीं मैं रह रहा हूँ जाने कितने दिनों सेजो मुझे नहीं जानताजिसे मैं नहीं जानतापता नहीं मैं कहाँ -कहाँ रह रहा हूँ मैं एक अनुपस्थित-उपस्थित !एक दिन रास्ते में मुझे एक सिक्का पड़ा मिलामैंने उसे उठाया और आस-पास देखकर चुपचाप जेब में रख लियामन नहीं माना, लगा अगर किसी ज़रूरतमन्द का रहा होगातो मन-ही-मन वह कुढ़ता होगाकुछ देर जेब में पड़े सिक्के को उँगलियों के बीच घुमाता रहाफिर जेब से निकालकर एक भिखारी के कासे में डाल दियाभिखारी ने मुझे दुआएँ दींउससे तो नहीं कह सका मैंकि सिक्का मेरा नहीं हैलेकिन मन-ही-मन मैंने कहाकि ओ भिखारी की दुआओजाओं उस शख्स के पास चली जाओ

Oct 26, 20243 min

Ep 573Dada Ki Tasveer | Manglesh Dabral

दादा की तस्वीर | मंगलेश डबराल दादा को तस्वीरें खिंचवाने का शौक़ नहीं थाया उन्हें समय नहीं मिलाउनकी सिर्फ़ एक तस्वीर गन्दी पुरानी दीवार पर टँगी हैवे शान्त और गम्भीर बैठे हैं।पानी से भरे हुए बादल की तरहदादा के बारे में इतना ही मालूम हैकि वे माँगनेवालों को भीख देते थेनींद में बेचैनी से करवट बदलते थेऔर सुबह उठकरबिस्तर की सिलवटें ठीक करते थेमैं तब बहुत छोटा थामैंने कभी उनका गुस्सा नहीं देखाउनका मामूलीपन नहीं देखातस्वीरें किसी मनुष्य की लाचारी नहीं बतलातींमाँ कहती है जब हमरात के विचित्र पशुओं से घिरे सो रहे होते हैंदादा इस तस्वीर में जागते रहते हैं।मैं अपने दादा जितना लम्बा नहीं हुआशान्त और गम्भीर नहीं हुआपर मुझमें कुछ है उनसे मिलता-जुलतावैसा ही क्रोध वैसा ही मामूलीपनमैं भी सर झुकाकर चलता हूँजीता हूँ अपने को एक तस्वीर के खाली फ्रेम मेंबैठे देखता हुआ।

Oct 25, 20242 min

Ep 572Andhere Ka Safar | Ramanath Awasthi

अँधेरे का सफ़र मेरे लिए है | रमानाथ अवस्थीतुम्हारी चाँंदनी का क्या करूँ मैंअँधेरे का सफ़र मेरे लिए है।किसी गुमनाम के दुख-सा अनजाना है सफ़र मेरापहाड़ी शाम-सा तुमने मुझे वीरान में घेरातुम्हारी सेज को ही क्यों सजाऊँसमूचा ही शहर मेरे लिए हैथका बादल किसी सौदामिनी के साथ सोता है।मगर इनसान थकने पर बड़ा लाचार होता है।गगन की दामिनी का क्या करूँ मैंधरा की हर डगर मेरे लिए है।किसी चौरास्ते की रात-सा मैं सो नहीं पाताकिसी के चाहने पर भी किसी का हो नहीं पातामधुर है प्यार, लेकिन क्या करूँ मैंज़माने का ज़हर मेरे लिए हैनदी के साथ मैं पहुँचा किसी सागर किनारेगई ख़ुद डूब, मुझको छोड़ लहरों के सहारेनिमंत्रण दे रहीं लहरें करूँ क्याकहाँ कोई भँवर मेरे लिए है

Oct 24, 20242 min

Ep 571Naya Sach Rachne | Nandkishore Acharya

नया सच रचने | नंदकिशोर आचार्यपत्तों का झर जानाशिशिर नहींजड़ों मेंयह सपनों कीकसमसाहट है-अपने लिएनया सच रचने कीख़ातिर-झूठ हो जाता है जोखुद झर जाता है।

Oct 23, 20241 min

Ep 570Aatma | Anju Sharma

आत्मा | अंजू शर्मामैं सिर्फएक देह नहीं हूँ,देह के पिंजरे में कैदएक मुक्ति की कामना में लीनआत्मा हूँ,नृत्यरत हूँ निरंतर,बांधे हुए सलीके के घुँघरू,लौटा सकती हूँ मैं अब देवदूत को भीमेरे स्वर्ग की रचनामैं खुद करुँगी,मैं बेअसर हूँकिसी भी परिवर्तन से,उम्र के साथ कलपिंजरा तब्दील हो जायेगाझुर्रियों से भरेएक जर्जर खंडहर में,पर मैं उतार कर,समय की केंचुली,बन जाऊँगीचिर-यौवना,मैं बेअसर हूँउन बाजुओं में उभरी नसोंकी आकर्षण से,जो पिंजरे के मोह में बंधीघेरती हैं उसे,मैं अछूती हूँ,श्वांसों के उस स्पंदन सेजो सम्मोहित कर मुझेकैद करना चाहता हैअपने मोहपाश में,मैंने बांध लिया हैचाँद और सूरज कोअपने बैंगनी स्कार्फ में,जो अब नियत नहीं करेंगेमेरी दिनचर्या,और आसमान के सिरे खोलदिए हैं मैंने,अब मेरी उड़ान में कोईसीमा की बाधा नहीं है,विचरती हूँ मैंनिरंतर ब्रह्माण्ड मेंओढ़े हुए मुक्ति का लबादा,क्योंकि नियमों और अपेक्षाओंके आवरण टांग दिए हैं मैंनेकल्पवृक्ष पर.......

Oct 22, 20242 min

Ep 569Ladki | Anju Sharma

लड़की | अंजू शर्माएक दिन समटते हुए अपने खालीपन कोमैंने ढूँढा था उस लड़की को,जो भागती थी तितलियों के पीछेसँभालते हुए अपने दुपट्टे कोफिर खो जाया करती थीकिताबों के पीछे,गुनगुनाते हुए ग़ालिब की कोई ग़ज़लअक्सर मिल जाती थी वो लाईब्रेरी में,कभी पाई जाती थी घर के बरामदे मेंबतियाते हुए प्रेमचंद और शेक्सपियर से,कभी बारिश में तलते पकौड़ोंको छोड़करखुले हाथों से छूती थी आसमान,और ज़ोर से सांस खींचते हुएसमो लेना चाहती थी पहली बारिशमें महकती सोंधी मिट्टी की खुशबू,उसकी किताबों में रखेसूखे फूल महका करते थेउसके अल्फाज़ की महक से,और शब्द उसके इर्द-गिर्द नाचतेऔर भर दिया करते थेउसकी डायरी के पन्ने,दोस्तों की महफ़िल छोड़छत पर निहारती थी वोबादल और बनाया करती थीउनमें अनगिनित शक्लें,तब उसकी उंगलियाँ अक्सरमुंडेर पर लिखा करती थी कोई नाम,उसकी चुप्पी को लोग क्योंनहीं पढ़ पाते थे उसे परवाह नहीं थी,हाँ, क्योंकि उसे जानते थेध्रुव तारा, चाँद और सितारे,फिर एक दिन वो लड़की कहींखो गयीसोचती हूँ क्या अब भी उसे प्यारहै किताबों सेक्या अब भी लुभाते हैं उसे नाचते अक्षर,क्या अब भी गुनगुनाती है वो ग़ज़लें,कभी मिले तो पूछियेगा उससेऔर कहियेगा कि उसके झोले मेंरखे रंग और ब्रुश अब सूख गए हैंऔर पीले पड़ गए हैं गोर्की कीकिताब के पन्ने,देवदास और पारो अक्सर उसेयाद करते हैंकहते हैं वो मेरी हमशक्ल थी

Oct 21, 20243 min

Ep 568Tumne Is Talaab Mein | Dushyant Kumar

तुमने इस तालाब में | दुष्यंत कुमार तुमने इस तालाब में रोहू पकड़ने के लिएछोटी-छोटी मछलियाँ चारा बनाकर फेंक दीं।तुम ही खा लेते सुबह को भूख लगती है बहुत,तुमने बासी रोटियाँ नाहक उठाकर फेंक दीं।जाने कैसी उँगलियाँ हैं जाने क्या अंदाज़ हैं,तुमने पत्तों को छुआ था जड़ हिलाकर फेंक दीं।इस अहाते के अँधेरे में धुआँ-सा भर गया,तुमने जलती लकड़ियाँ शायद बुझाकर फेंक दीं।

Oct 20, 20241 min

Ep 567Jantar Mantar | Arunabh Saurabh

जंतर-मंतर | अरुणाभ सौरभ लाल - दीवारोंऔर झरोखे परसरसराते दिन मेंसीढ़ी-सीढ़ी नाप रहे होजंतर-मतर परबोल कबूतरमैंना बोली फुदक-फुदककरबड़ी जालिम है।जंतर-मंतरमॉँगन से कछू मिले ना हियाँबताओ किधर चले मियाँपूछ उठाकर भगी गिलहरीकौवा बोला काँव - काँवलोट चलो अब अपने गाँवटिट्ही बोलीं टीं.टीं.राजा मंत्री छी...छीघर - घर माँग रहे वोटऔर नए- पुराने नोटझरोखे से झाँकेइतिहास का कोनाजीना चढ़ि ऊँचे हुएचाँदी और सोनासूरज डूबन को तैयारताड पेड़ के दक्खिन पारपंछी नाचे अपनी तालजनता बनी विक्रम बैताल झाँक लेनालाल झरोरवाबोल देना गज़ब अनोखाबच्चे फांदे बने अनजानधरने पर बैठे पहलवान..

Oct 19, 20242 min

Ep 566Padhiye Gita | Raghuvir Sahay

पढ़िए गीता | रघुवीर सहायपढ़िए गीताबनिए सीताफिर इन सब में लगा पलीताकिसी मूर्ख की हो परिणीतानिज घर-बार बसाइएहोंय कैँटीलीआँखें गीलीलकड़ी सीली, तबियत ढीलीघर की सबसे बड़ी पतीलीभर कर भात पसाइए

Oct 18, 20241 min

Ep 565Saathi | Kedarnath Agarwal

साथी | केदारनाथ अग्रवालझूठ नहीं सच होगा साथी।गढ़ने को जो चाहे गढ़ लेमढ़ने को जो चाहे मढ़ लेशासन के सी रूप बदल लेराम बना रावण सा चल लेझूठ नहीं सच होगा साथी!करने को जो चाहे कर लेचलनी पर चढ़ सागर तर लेचिउँटी पर चढ़ चाँद पकड़ लेलड़ ले ऐटम बम से लड़ लेझूठ नहीं सच होगा साथी!

Oct 17, 20241 min

Ep 564Milna Tha Itefaaq Bichadna Naseeb Tha | Anjum Rehbar

मिलना था इत्तिफ़ाक़ बिछड़ना नसीब था | अंजुम रहबरमिलना था इत्तिफ़ाक़ बिछड़ना नसीब थावो उतनी दूर हो गया जितना क़रीब थामैं उस को देखने को तरसती ही रह गईजिस शख़्स की हथेली पे मेरा नसीब थाबस्ती के सारे लोग ही आतिश-परस्त थेघर जल रहा था और समुंदर क़रीब थामरियम कहाँ तलाश करे अपने ख़ून कोहर शख़्स के गले में निशान-ए-सलीब थादफ़ना दिया गया मुझे चाँदी की क़ब्र मेंमैं जिस को चाहती थी वो लड़का ग़रीब था

Oct 16, 20242 min

Ep 563Pooch Rahe Ho Kya Abhaav Hai | Shailendra

पूछ रहे हो क्या अभाव है | शैलेन्द्रपूछ रहे हो क्या अभाव हैतन है केवल, प्राण कहाँ है ?डूबा-डूबा सा अन्तर हैयह बिखरी-सी भाव लहर है,अस्फुट मेरे स्वर हैं लेकिनमेरे जीवन के गान कहाँ हैं?मेरी अभिलाषाएँ अनगिनपूरी होंगी ? यही है कठिन,जो ख़ुद ही पूरी हो जाएँ -ऐसे ये अरमान कहाँ हैं ?लाख परायों से परिचित है,मेल-मोहब्बत का अभिनय है,जिनके बिन जग सूना-सूनामन के वे मेहमान कहाँ हैं ?

Oct 15, 20241 min

Ep 562Raakh | Arun Kamal

राख | अरुण कमलशायद यह रुक जातासही साइत पर बोला गया शब्दसही वक्त पर कन्धे पर रखा हाथसही समय किसी मोड़ पर इंतज़ारशायद रुक जाती मौतओफ! बार बार लगता है मैंने जैसे उसे ठीक से पकड़ा नहींगिरा वह छूट कर मेरी गोद सेकिधर था मेरा ध्यान मैं कहाँ थाअचानक आता है अँधेराअचानक घास में फतिंगों की हलचलअचानक कोई फूल झड़ता हैऔर पकने लगता है फलमैंने वे सारे क्षण खो दियेवे अन्तिम साँस के क्षणअपनी साँस उसके होठों में भरने के क्षणभरी थीं सारी टंकियाँ जब वह एक घूँट पानी कोतड़पा इतनी हवा थी चारों ओरउस समय क्या कर रहा था मैंयाद करो तुम क्या कर रहे थे उस वक्तमुझे सोना नहीं था नहींमुझे अपनी पलकें अंकुशों से खींचे रखनी थींमैं चीख तो सकता था मैं रो तो सकता था ज़ोर सेमेरे तलवे काँपते तो भूकम्प सेजिसमें इतनी आग थीउसकी इतनी कम राख!

Oct 14, 20242 min

Ep 561Tumko Bhula Rahi Thi Ki Tum Yaad Aa Gaye | Anjum Rehbar

तुम को भुला रही थी कि तुम याद आ गए | अंजुम रहबरतुम को भुला रही थी कि तुम याद आ गएमैं ज़हर खा रही थी कि तुम याद आ गएकल मेरी एक प्यारी सहेली किताब मेंइक ख़त छुपा रही थी कि तुम याद आ गएउस वक़्त रात-रानी मिरे सूने सहन मेंख़ुशबू लुटा रही थी कि तुम याद आ गएईमान जानिए कि इसे कुफ़्र जानिएमैं सर झुका रही थी कि तुम याद आ गएकल शाम छत पे मीर-तक़ी-'मीर' की ग़ज़लमैं गुनगुना रही थी कि तुम याद आ गए'अंजुम' तुम्हारा शहर जिधर है उसी तरफ़इक रेल जा रही थी कि तुम याद आ गए

Oct 13, 20242 min

Ep 560Tumhari Jaati Kya Hai? | Kumar Ambuj

तुम्हारी जाति क्या है? | कुमार अंबुजतुम्हारी जाति क्या है कुमार अंबुज?तुम किस-किस के हाथ का खाना खा सकते होऔर पी सकते हो किसके हाथ का पानीचुनाव में देते हो किस समुदाय को वोटऑफ़िस में किस जाति से पुकारते हैं लोग तुम्हेंजन्मपत्री में लिखा है कौन सा गोत्र और कहां ब्याही जाती हैंतुम्हारे घर की बहन-बेटियांबताओ अपना धर्म और वंशावली के बारे मेंकिस मस्जिद किस मंदिर किस गुरुद्वारे में किस चर्च में करते हो तुम प्रार्थनाएंतुम्हारी नहीं तो अपने पिताअपने बच्चों की जाति बताओबताओ कुमार अंबुजइस बार दंगे में रहोगे किस तरफ़और मारे जाओगेकिसके हाथों?

Oct 12, 20242 min

Ep 559Ankur | Ibbar Rabbi

अँकुर | इब्बार रब्बीअँकुर जब सिर उठाता हैज़मीन की छत फोड़ गिराता हैवह जब अन्धेरे में अंगड़ाता हैमिट्टी का कलेजा फट जाता हैहरी छतरियों की तन जाती है कतारछापामारों के दस्ते सज जाते हैंपाँत के पाँतनई हो या पुरानीवह हर ज़मीन काटता हैहरा सिर हिलाता हैनन्हा धड़ तानता हैअँकुर आशा का रँग जमाता है।

Oct 11, 20241 min

Ep 558Bachcha | Ramdarash Mishra

बच्चा | रामदरश मिश्रा हम बच्चे से खेलते हैं।हम बच्चे की आँखों में झाँकते हैं।वह हमारी आँखों में झाँकता हैहमारी आँखों मेंउसकी आँखों की मासूम परछाइयाँ गिरती हैंऔर उसकी आँखों मेंहमारी आँखों के काँटेदार जंगल।उसकी आँखेंधीरे-धीरे काँटों का जंगल बनती चली जाती हैंऔर हम गर्व से कहते हैं-बच्चा बड़ा हो रहा है।

Oct 10, 20241 min

Ep 557Pita | Vinay Kumar Singh

पिता | विनय कुमार सिंह ख़ामोशी से सो रहे पिता कीफैली खुरदुरी हथेली को छूकर देखाउन हथेलियों की रेखाएं लगभग अदृश्य हो चली थीं फिर उन हथेलियों को देखते समय नज़र अपनी हथेली पर पड़ीऔर एहसास हुआ न जाने कब उन्होंने अपनी क़िस्मत की लकीरों को चुपचाप मेरी हथेली में रोप दिया था अपनी ओर से कुछ और जोड़कर

Oct 9, 20241 min

Ep 556Mann Ke Jheel Mein | Shashiprabha Tiwari

मन के झील में | शशिप्रभा तिवारीआज फिर तुम्हारे मन के झील की परिक्रमा कर रही हूं धीरे-धीरे यादों की पगडंडी पर गुज़रते हुए वह पीपल का पुराना पेड़ याद आया उसके छांव में बैठ कर मुझसे बहुत सी बातें तुम करते थे मेरे कानों में बहुत कुछ कह जाते जो नज़रें मिला कर नहीं कह पाते थे क्या करूं गोविन्द!बहुत रोकती हूंमन कहा नहीं मानता तुम द्वारका वासीमैं बरसाने में बैठीतुम्हें घड़ी-घड़ी सुमरती हूं।अनायास, बंशी की धुन गूंजने लगती है मेरे आस-पास मेरा रोम-रोम फिर, नाचने लगता है और मैं भी गुनगुनाने लगती हूं तुम प्रेम होतुम प्रीत होतुम मनमीत होमनमोहन, इसी प्रीत की रीत कोनिभाया है, मैंने और धीरे धीरे मन के झील में तुम्हें निहार कर अपने मिलन केनए सपने फिर संजोकर नयनों को मूंदकर खुद में तुम कोसमा लेती हूं और तुम्हारे भीतर मैं विलीन हो गईफिर, मैं मैं नहीं रही राधेश्याम बन गई।राधे राधे, श्याम।

Oct 8, 20242 min

Ep 555Laut ti Sabhyatayein | Anjana Tandon

लौटती सभ्यताएँ | अंजना टंडनविश्वास की गर्दन प्रायःलटकती है संदेह की कीलों पर,“कहीं कुछ तो है” का भाव दरअसलदिमाग की दबी आवाज़ हैजो अक्सर छोड़ देती हैप्रशंसा में भी कितनी खाली ध्वनियाँ,संदेह के कानआत्ममुग्धता की रूई से बंद हैआँखें ऊगी हैं पूरी देह पर औरखून में है दुनियावी अट्टाहास ,कंठ भर तंजदिल के मर्म को कभी जान नहीं पाएगा,मृत्यु बाद ही धुले थेबुल्लेशाह ,मीरा और अमृता के दाग, वैसे तो हर सभ्यता प्रेम से जन्मती हैविश्वास पर पनपती हैऔर संदेह की हवा में सांस तोड़ती है,पर भुक्तभोगी जानते हैं कि इतिहास झुठला कर इन दिनों उसके रक्तरंजित पदचिन्ह, उल्टे पाँव लौटने के सिम्त दर्ज हो रहे है।

Oct 7, 20242 min

Ep 554Tum Aurat Ho | Parul Chandra

तुम औरत हो | पारुल चंद्राक्योंकि किसी ने कहा है, कि बहुत बोलती हो,तो चुप हो जाना तुम उन सबके लिए...ख़ामोशियों से खेलना और अंधेरों में खो जाना, समेट लेना अपनी ख़्वाहिशें,और कैद हो जाना अपने ही जिस्म में…क्योंकि तुम तो तुम हो ही नहीं…क्योंकि तुम्हारा तो कोई वजूद नहीं...क्योंकि किसी के आने की उम्मीद पर आयी एक नाउम्मीदी हो तुम..बोझ समझी जाती हो, माथे के बल बढ़ाती हो..जो मानती हो ये सब सच, तो ख़ामोश हो जाओ,और जो जानती हो ख़ुद को, तो नज़र आओ,तो दिखाई दो, तो सुनाई दो, तो खिलखिलाओ, गुनगुनाओ,क्योंकि तुम कोई गलती नहीं,एक सच्चाई हो...तुम एक औरत हो…तुम तुम हो!

Oct 6, 20242 min

Ep 553Ishwar Tumhari Madad Chahta Hai | Vishwanath Prasad Tiwari

ईश्वर तुम्हारी मदद चाहता है | विश्वनाथ प्रसाद तिवारी बदल सकता है धरती का रंगबदल सकता है चट्टानों का रूपबदल सकती है नदियों की दिशाबदल सकती है मौसम की गतिईश्वर तुम्हारी मदद चाहता है।अकेले नहीं उठा सकता वहइतना सारा बोझ।

Oct 5, 20241 min

Ep 552Meri Beti | Ibbar Rabbi

मेरी बेटी | इब्बार रब्बीमेरी बेटी बनती हैमैडमबच्चों को डाँटती जो दीवार हैफूटे बरसाती मेज़ कुर्सी पलंग परनाक पर रख चश्मा सरकाती(जो वहाँ नहीं है)मोहनकुमारशैलेशसुप्रियाकनकको डाँटतीख़ामोश रहोचीख़तीडपटतीकमरे में चक्कर लगाती हैहाथ पीछे बांधेअकड़ करफ़्रॉक के कोने कोसाड़ी की तरह सम्हालतीकॉपियाँ जाँचतीवेरी पुअरगुडकभी वर्क हार्डके फूल बरसातीटेढ़े-मेढ़े साइन बनातीवह तरसती हैमाँ पिता और मास्टरनी बनने कोऔर मैं बच्चा बनना चाहता हूँबेटी की गोद में गुड्डे-साजहाँ कोई मास्टर न हो!

Oct 4, 20241 min

Ep 551Mukti | Kedarnath Singh

मुक्ति | केदारनाथ सिंहमुक्ति का जब कोई रास्ता नहीं मिलामैं लिखने बैठ गया हूँमैं लिखना चाहता हूँ 'पेड़'यह जानते हुए कि लिखना पेड़ हो जाना हैमैं लिखना चाहती हूँ ‘पानी’'आदमी' 'आदमी' मैं लिखना चाहता हूँएक बच्चे का हाथएक स्त्री का चेहरामैं पूरी ताक़त के साथशब्दों को फेंकना चाहता हूँ आदमी की तरफ़यह जानते हुए कि आदमी का कुछ नहीं होगामें भरी सड़क पर सुनना चाहता हूँ वह धमाकाजो शब्द और आदमी की टक्कर से पैदा होता हैयह जानते हुए कि लिखने से कुछ नहीं होगामैं लिखना चाहता हूँ

Oct 3, 20242 min

Ep 550Hum Laut Jayenge | Shashiprabha Tiwari

हम लौट जाएंगे | शशिप्रभा तिवारीकितने रात जागकर हमने तुमने मिलकर सपना बुना था कभी इस नीम की डाल पर बैठ कभी उस मंदिर कंगूरे पर बैठ कभी तालाब के किनारे बैठ कभी कुएं के जगत पर बैठ बहुत सी कहानियां मैं सुनाती थी तुम्हें ताकि उन कहानियों में से कुछ अलग कहानी तुम लिख सकोऔर अपनी तकदीर बदल डालोकितने रात जागकर हमने तुमने मिलकर सपना बुना था साथ तुम्हारे हम भी दुनिया के रंग देख पाते! लेकिन, परंतु, और बहुत से सवालव्यवस्था-व्यवसाय!यूं छूट गईं, उन दिवारों परनाहक, भाग्य बदलने कीकोशिश में तुम रोज पिसती रहीं होंगी,अपना दुख छिपातीं होंगी कितने रात जागकर हमने तुमने मिलकर सपना बुना था बंद दरवाज़े केपीछे का सचकौन जान सकता है?हम तो संसार में खाली हाथ आए थे और खाली हाथ ही लौट जाएंगे।उस नीम की डाल को न देखेंगे!न उस बसेरे कोन उस बस्ती कोउजड़े हुए, लोग बसाए घर के उजड़ने का दर्द भला क्या महसूस करेंगे?कितने रात जागकर हमने तुमने मिलकर सपना बुना था।

Oct 2, 20242 min

Ep 549Pehra | Archana Verma

पहरा | अर्चना वर्मा जहां आज बर्फ़ हैबहुत पहलेवहां एक नदी थीएक चेहरा है निर्विकारजमी हुई नदी.आंख, बर्फ़ में सुराख़द्वार के भीतरहै तो एक संसार मगरकैदहलचलों पर मुस्तैदमहज़ अंधेरा हैसख़्त और ख़ूँख़ार और गहरा है.पहरा है उस पर जोबर्फं की नसों में बहानदी ने जिसे जम कर सहा

Oct 1, 20241 min

Ep 548Bahut Pehle Se | Firaq Gorakhpuri

बहुत पहले से | फ़िराक़ गोरखपुरीबहुत पहले से उन क़दमों की आहट जान लेते हैंतुझे ऐ ज़िंदगी हम दूर से पहचान लेते हैंमिरी नज़रें भी ऐसे क़ातिलों का जान ओ ईमाँ हैंनिगाहें मिलते ही जो जान और ईमान लेते हैंजिसे कहती है दुनिया कामयाबी वाए नादानीउसे किन क़ीमतों पर कामयाब इंसान लेते हैं तबीअ'त अपनी घबराती है जब सुनसान रातों मेंहम ऐसे में तिरी यादों की चादर तान लेते हैंख़ुद अपना फ़ैसला भी इश्क़ में काफ़ी नहीं होताउसे भी कैसे कर गुज़रें जो दिल में ठान लेते हैं

Sep 30, 20242 min

Ep 547Samay Nahin Lagta Hain | Ajay Jugran

समय नहीं लगता है | अजेय जुगरानआज के कल हो जाने मेंकल के कभी नहीं होने मेंसमय नहीं लगता है।अक्सर इस छोटे से जीवन मेंअवसर को पाकर खोने मेंसमय नहीं लगता है।अनुकूल की प्रतीक्षा मेंप्रतिकूल के आ जाने मेंसमय नहीं लगता है।शुभ मुहूर्त का मंतव्य बनातेदृश्य गंतव्य अमूर्त होने मेंसमय नहीं लगता है।इस पल में ही सब बीज हैंइस पल में ही सब हल हैंआज में ही सब तीज हैंशुभमय यही समय हैसोकर इसे गवाँ देने मेंसमय नहीं लगता है।किंकर्तव्यमूढ़ से मूढ़ हो जाने मेंमुखर के गौण हो जाने मेंअगूढ़ के मौन हो जाने मेंप्रतिक्षित पल से छले जाने मेंसमय के असमय हो जाने मेंआज के कल हो जाने मेंकल के कभी नहीं होने मेंसमय नहीं लगता है।

Sep 29, 20242 min

Ep 546Hum Hain Tana Huma Hain Bana | Uday Prakash

हम हैं ताना, हम हैं बाना | उदय प्रकाश हम हैं ताना, हम हैं बाना।हमीं चदरिया, हमीं जुलाहा, हमीं गजी, हम थाना॥ हम हैं ताना''॥नाद हमीं, अनुनाद हमीं, निःशब्द हमीं गंभीरा,अंधकार हम, चाँद-सूरज हम, हम कान्हा, हम मीरा।हमीं अकेले, हमीं दु्केले, हम चुग्गा, हम दाना॥ हम हैं ताना'''॥मंदिर-महजिद, हम. गुरुद्वारा, हम मठ, हम बैरागीहमीं पुजारी, हमीं देवता, हम कीर्तन, हम रागी।आखत-रोली, अलख-भभूती, रूप धरें हम नाना॥ हम हैं ताना''॥मूल-फूल हम, रुत बादल हम, हम माटी, हम पानीहमीं जहूदी-शेख-बरहमन, हरिजन हम खिस्तानी।पीर-अघोरी, सिद्ध-औलिया, हमीं पेट, हम खाना॥ हम हैं ताना॥नाम-पता, ना ठौर-ठिकाना, जात-धरम ना कोईमुलक-खलक, राजा-परजा हम, हम बेलन, हम लोई।हमही दुलहा, हमीं बराती, हम फूँका, हम छाना॥ हम हैं ताना''॥

Sep 28, 20242 min

Ep 545Charitra | Tasleema Nasrin

चरित्र | तस्लीमा नसरीन तुम लड़की हो, यह अच्छी तरह याद रखना तुम जब घर की चौखट लाँघोगी लोग तुम्हें टेढ़ी नज़रों से देखेंगे तुम जब गली से होकर चलती रहोगी लोग तुम्हारा पीछा करेंगे, सीटी बजाएँगे तुम जब गली पार कर मुख्य सड़क पर पहुँचोगी लोग तुम्हें बदचलन कहकर गालियाँ देंगे तुम हो जाओगी बेमानी अगर पीछे लौटोगी वरना जैसे जा रही हो जाओ।

Sep 27, 20241 min

Ep 544Padhna Mere Pair | Jyoti Pandey

पढ़ना मेरे पैर | ज्योति पांडेयमैं गई जबकि मुझे नहीं जाना था। बार-बार, कई बार गई। कई एक मुहानों तक न चाहते हुए भी… मेरे पैर मुझसे असहमत हैं, नाराज़ भी। कल्पनाओं की इतनी यात्राएँ की हैं कि अगर कभी तुम देखो तो पाओगे कि कितने थके हैं ये पाँव! जंगल की मिट्टी, पहाड़ों की घास और समंदर की रेत से भरी हैं बिवाइयाँ। नाख़ूनों पर पुत गया है-हरा-नीला मटमैला सब रंग; कोई भी नेलकलर लगाऊँ दो दिन से ज़्यादा टिकता नहीं। तुमने कभी देखे हैं क्या सोच के ठिकाने? मेरे पाँव पूछते हैं मुझसे कब थमेगी तुम्हारी दौड़? मैं बता नहीं पाती, क्योंकि, जानती नहीं! तुम कभी मिलना इनसे एकांत में-जब मैं भी न होऊँ। ये सुनाएँगे तुम्हें कई वे क़िस्से और बातें जो शायद अब हम तुम कभी बैठकर न कर पाएँ! जब मैं न रहूँ तुम पढ़ना मेरे पैर, वहाँ मैं लिख जाऊँगी सारी वर्जनाओं की स्वीकृति; ठीक उसी क्षण मेरे पैर भी मेरे भार से मुक्त होंगे!

Sep 26, 20242 min