
Pratidin Ek Kavita
1,141 episodes — Page 9 of 23

Ep 743Naavein | Naresh Saxena
नावें | नरेश सक्सेना नावों ने खिलाए हैं फूल मटमैलेक्या उन्हें याद है कि वे कभी पेड़ बनकर उगी थीं नावें पार उतारती हैंख़ुद नहीं उतरतीं पारनावें धार के बीचों-बीच रहना चाहती हैंतैरने न दे उस उथलेपन को समझती हैं ठीक-ठीकलेकिन तैरने लायक गहराई से ज़्यादा के बारे मेंकुछ भी नहीं जानतीं नावेंबाढ़ उतरने के बाद वे अकसर मिलती हैंछतों या पेड़ों पर चढ़ी हुईं नावें डूबने से डरती हैंभर-भर कर खाली होती रहती हैं नावेंसुनसान तटों पर चुपचापखूँटों से बँधी रहती हैं नावें।

Ep 742Sundariyon | Nilesh Raghuvanshi
सुंदरियों | नीलेश रघुवंशी मत आया करो तुम सम्मान समारोहों मेंतश्तरी, शाल और श्रीफल लेकरदीप प्रज्वलन के समयमत खड़ी रहा करो माचिस और दीया -बाती के संगमंच पर खड़े होकर मत बाँचा करो अभिनंदन पत्रउपस्थिति को अपनी सिर्फ मोहक और दर्शनीय मत बनने दिया करोसुंदरियो,तुम ऐसा करके तो देखोबदल जाएगी ये दुनिया सारी।

Ep 741Nahi Dunga Naam | Nandkishore Acharya
नहीं दूँगा नाम | नंदकिशोर आचार्य नहीं दूँगा तुम्हें कोई नाम।जूही की कली,कलगी बाजरे की छरहरी,या और कुछ।नाम देना पहचान को जड़ करना हैमैं तो तुम्हेंहर बार आविष्कृत करता हूँ।नाम देकर तुम्हे तीसरा नहीं करूँगाक्यों कि तुम सम्पूर्ण मेरी होतुम्हें तुम ही कहूँगाकोई नाम नहीं दूँगा।

Ep 740Rishtedari | Laxmishankar Vajpeyi
रिश्तेदारी | लक्ष्मीशंकर वाजपेयीनहीं, यह भी संभव नहीं होताकि उनके शहर जाकर भीजाया ही न जाय रिश्तेदारों के घरअकसर कुछ एहसान लदे होते हैंउनके बुज़ुर्गों के अपने बुज़ुर्गों परऐसा कुछ न भी हो, तोज़रूरी होता है लोकाचार निभानाकिंतु अकसर खड़ी हो जाती है समस्याकि पत्नी की कुशलक्षेम, बच्चों कीसुचारू पढ़ाई का विवरण दे देनेतथा ’और क्या हाल-चाल हैं‘ का कई-कई बारउत्तर दे देने के बाद,कैसे जारी रखा जाय संवादअकसर बोझिल हो जाते हैंचाय आने के बीच के क्षण,और अकसर देर लगती है चाय आने मेंक्योंकि उधर से भी रिश्तेदारी निभाने के प्रयासप्रकट होते हैं चाय के साथ की सामग्री बनकरचाय के बाद बनती है कुछ राहत की स्थितिकि अब कुछ देर बादमाँगी जा सकती है आज्ञाऔर खाना खाकर जाने की मनुहार परकुछ बहाने बनाकरउठा जा सकता है कुछ औपचारिक संबोधनोंतथा फिर मिलने-जुलनेया चिट्ठी लिखने के वादों के साथ!

Ep 739Abbas Miyan | Neerav
अब्बास मियाँ | नीरव पंद्रह बीघे की खेती अकेले संभालने वाले अब्बास मियाँ हमारे हरवाहे थेहम काका कहते थे उन्हेंहम सुनते बड़े हुए थे काका खानदानीशहनाई वादक थेअपने ज़माने में बहुत मशहूरदूर-दूर तक उनके सुरों की गूंज थीहमारे बाबा भी एक क़िस्सा बताते थेकाशी में काका को एक दफे उस्ताद बिस्मिल्लाह खां के सामनेशहनाई बजाने का मौका मिला थाऔर उस्ताद ने पीठ थपथपाकर कहा था -उसकी बड़ी नेमत है हुनरसंभालनाउसकी नेमत जितनी बड़ी थीउससे बड़ी थी उनकी घर-गृहस्थीऔर घर गृहस्थी से भी बड़ी थी उनकी पुश्तैनी दरिद्रतासो उन्हें रखनी पड़ी अपनी जान से भी प्रियशहनाईऔर करनी पड़ी हरवाहीबाद उसके कछ पुराने शौकिया लोग बुलाते रहे शादी-ब्याह मेंकाका कोशहनाई बजवानेपर एक वक्त के बाद सहालग भी छट गयाहम छोटे थे तब इतना नहीं समझते थेलेकिन काका जब कहतेहमारे साथ ही हमारा ये खानदानी हुनर बिला जाएगातब हम भी उनकी तरह मलाल के किसी अंधेरे में खो जाते थेअच्छे से याद है बाबा का जब देहांत हुआ था काका ने उठाई थी शहनाईऔर माटी जब उठी तब छेड़ा था रागफिर क्या परिचित क्या अपरिचितसबके रूदन को समेट लिया था उन्होंने अपनी शहनाई मेंबादल भी बरसे थे बाबा की शवयात्रा मेंसबसे बड़ी थी उसकी नेमतलेकिन उससे भी बड़ा था कुछऐसी विदाई जिसमें सबकी आँख से पानी बरस रहा थाकाका बजा रहे थेन जाने कौनसा दुख

Ep 738Kya Kaam | Manglesh Dabral
क्या काम | मंगलेश डबरालआप दिखते हैं बहुत उदासआपको इस शहर में क्या कामआपके भीतर भरा है ग़ुस्साआपको इस शहर में क्या कामआप सफलता नहीं चाहतेनहीं चाहते ताक़तजो मिल जाए उसे छोड़ कुछ नहीं माँगतेआपको इस शहर में क्या कामआप तुरंत लपकते नहींऔर न खिलखिल करतेहाथ जेब में डाले चलतेरोज़ रात में पाते ख़ुद को लहूलुहानआपको इस शहर में क्या काम।

Ep 737Mera Aangan Mera Ped | Javed Akhtar
मेरा आँगन, मेरा पेड़ | जावेद अख़्तरमेरा आँगनकितना कुशादा फैला हुआ कितना बड़ा थाजिसमेंमेरे सारे खेलसमा जाते थेऔर आँगन के आगे था वह पेड़कि जो मुझसे काफ़ी ऊँचा थालेकिनमुझको इसका यकीं थाजब मैं बड़ा हो जाऊँगाइस पेड़ की फुनगी भी छू लूँगाबरसों बादमैं घर लौटा हूँदेख रहा हूँये आँगनकितना छोटा हैपेड़ मगर पहले से भी थोड़ा ऊँचा है

Ep 736Balshram | Pawan Sain Masoom
बालश्रम| पवन सैन मासूम छणकु साफ़ कर रहा है चाय के झूठे गिलासइसलिए नहीं कि उसके नन्हें हाथसरलता से पहुँच पा रहे हैं गिलास की तह तकबल्कि इसलिए किउसके घर में भी हों झूठे बर्तनजो चमचमा रहे हैं एक अरसे सेअन्न के अभाव में।दुकिया पहुँचा रहा है चायठेले से दुकानों, चौकों तकइसलिए नहीं कि वह नन्हें पाँवों से तेज़ दौड़ता हैबल्कि इसलिए किउसके शराबी पिता के दौड़ते पाँवों की गतिहो सके कुछ धीमीजो दौड़ते हैं अपनी पत्नी की तरफ़उससे पैसे न मिलने पर पीटने की ख़ातिर।बुझकू धूप अँधेरे कमरे मेंबना रहा है रंग-बिरंगी चूड़ियांइसलिए नहीं कि उसकी छोटी आँखों की तेज़ है रोशनीबल्कि इसलिए किवह माँ-बाप के साये के बिना भीपढ़ा सके मुनिया कोजिससे छँट सके कुटिया का अँधेराऔर उनके काले जीवन मेंघुल सके कुछ खुशियों के रंग।शामली सेठ के यहाँ बना रही है रसोईऔर चमका रही है हवेली,इसलिए नहीं कि वह नौ वर्ष की आयु में हीहो चुकी है घरेलू कार्यों में निपुणबल्कि इसलिए किहवेली में काम करकेवह बचा सके माँ को कोठे के साये सेख़ुद के सपनों को चोटिल करते हुएबचा सके माँ के शरीर को नुचने से।छणकु, दुकिया, बुझकू और शामली ही के जैसेन जाने और कितने बच्चे खप रहे हैंघरों, खेतों, दुकानों और कारखानों में,जो बचा रहे हैं अपने सपनों की कीमत परअपनी छोटी सी दुनिया को।कितने गर्व की बात है येआओ मिलकर बजाते हैं तालियाँइन सबके सम्मान में।हम नपुंसक बन चुके लोगइसके अतिरिक्त कर भी क्या सकते है?

Ep 735Makaan Ke Upari Manzil Par | Gulzar
मकान की ऊपरी मंज़िल पर | गुलज़ारवो कमरे बंद हैं कब सेजो चौबीस सीढ़ियां जो उन तक पहुँचती थी, अब ऊपर नहीं जातीमकान की ऊपरी मंज़िल पर अब कोई नहीं रहतावहाँ कमरों में, इतना याद है मुझकोखिलौने एक पुरानी टोकरी में भर के रखे थेबहुत से तो उठाने, फेंकने, रखने में चूरा हो गएवहाँ एक बालकनी भी थी, जहां एक बेंत का झूला लटकता थामेरा एक दोस्त था, तोता, वो रोज़ आता थाउसको एक हरी मिर्ची खिलाता थाउसी के सामने एक छत थी, जहाँ परएक मोर बैठा आसमां पर रात भरमीठे सितारे चुगता रहता थामेरे बच्चों ने वो देखा नहीं,वो नीचे की मंजिल पे रहते हैंजहाँ पर पियानो रखा है, पुराने पारसी स्टाइल काफ्रेज़र से ख़रीदा था, मगर कुछ बेसुरी आवाज़ें करता हैकि उसकी रीड्स सारी हिल गयी हैं, सुरों के ऊपर दूसरे सुर चढ़ गए हैंउसी मंज़िल पे एक पुश्तैनी बैठक थीजहाँ पुरखों की तसवीरें लटकती थीमैं सीधा करता रहता था, हवा फिर टेढ़ा कर जातीबहु को मूछों वाले सारे पुरखे क्लीशे [Cliche] लगते थेमेरे बच्चों ने आख़िर उनको कीलों से उतारा, पुराने न्यूज़ पेपर मेंउन्हें महफूज़ कर के रख दिया थामेरा भांजा ले जाता है फिल्मो मेंकभी सेट पर लगाता है, किराया मिलता है उनसेमेरी मंज़िल पे मेरे सामनेमेहमानखाना है, मेरे पोते कभीअमरीका से आये तो रुकते हैंअलग साइज़ में आते हैं वो जितनी बार आतेहैं, ख़ुदा जाने वही आते हैं याहर बार कोई दूसरा आता हैवो एक कमरा जो पीछे की तरफ़ बंद है,जहाँ बत्ती नहीं जलती, वहाँ एकरोज़री रखी है, वो उससे महकता है,वहां वो दाई रहती थी कि जिसनेतीनों बच्चों को बड़ा करने मेंअपनी उम्र दे दी थी, मरी तो मैंनेदफनाया नहीं, महफूज़ करके रख दिया उसको.और उसके बाद एक दो सीढ़ियाँ हैं,नीचे तहखाने में जाती हैं,जहाँ ख़ामोशी रौशन है, सुकूनसोया हुआ है, बस इतनी सी पहलू मेंजगह रख कर, कि जब मैं सीढ़ियोंसे नीचे आऊँ तो उसी के पहलूमें बाज़ू पे सर रख कर सो जाऊँमकान की ऊपरी मंज़िल पर कोई नहीं रहता...

Ep 734Rachta Vriksh | Raghuvir Sahay
रचता वृक्ष | रघुवीर सहाय देखो वक्ष को देखो वह कुछ कर रहा है।किताबी होगा कवि जो कहेगा कि हाय पत्ता झर रहा हैरूखे मुँह से रचता है वृक्ष जब वह सूखे पत्ते गिराता हैऐसे कि ठीक जगह जाकर गिरें धूप में छाँह मेंठीक-ठीक जानता है वह उस अल्पना का रूपचलती सड़क के किनारे जिसे आँकेगाऔर जो परिवर्तन उसमें हवा करेउससे उदासीन है।

Ep 733Varsh Ke Sabse Kathin Dinon Mein | Kedarnath Singh
वर्ष के सबसे कठिन दिनों में | केदारनाथ सिंहअगर धीरे चलोवह तुम्हें छू लेगीदौड़ो तो छूट जाएगी नदीअगर ले लो साथवह चलती चली जाएगी कहीं भीयहाँ तक - कि कबाड़ी की दुकान तक भीछोड़ दोतो वही अंधेरे मेंकरोड़ों तारों की आँख बचाकरवह चुपके से रच लेगीएक समूची दुनियाएक छोटे से घोंघे मेंसच्चाई यह हैकि तुम कहीं भी रहोतुम्हें वर्ष के सबसे कठिन दिनों में भीप्यार करती है एक नदीनदी जो इस समय नहीं है इस घर मेंपर होगी ज़रूर कहीं न कहींकिसी चटाईया फूलदान के नीचेचुपचाप बहती हुईकभी सुननाजब सारा शहर सो जाएतो किवाड़ों पर कान लगाधीरे-धीरे सुननाकहीं आसपासएक मादा घड़ियाल की कराह की तरहसुनाई देगी नदी!

Ep 732Manikarnika Ka Bashinda | Gyanendrapati
मणिकर्णिका का बाशिंदा | ज्ञानेन्द्रपति साढ़े तीन टाँगों वाला एक कुत्तामणिकर्णिका का स्थायी बाशिंदा हैलकड़ी की टालों और चायथानों वालों से हिलगायह नहीं कि दुत्कारा नहीं जाता वहलेकिन हमेशा दूर-दूर रखने वाली दुर-दुरनहीं भुगतता वह यहाँ विकलांगता के बावजूद विकल नहीं रहता यहाँसाढ़े तीन टाँगों वाला वह भूरा कुत्तातनिक उदास ऑँखों से मानुष मन को थाहता-साइधर से उधर आता-जाता हैबीच-बीच में यहाँ-वहाँ मिल जाता हैअपनी दयनीयता मेंअपने इलाके में होने की अकड़ छुपायेकाठ का भरम देती, कंक्रीट की बनीदो बेंचों परहम बैठे हैं।शवसंगी आज, मणिकर्णिका परउधर चिताग्नि ने लहक पा ली है।हाल की बनी हैंये बेंचें, नगर निगम ने लगवाईं'सुविधाओं में इज़ाफ़ा' जिसे कहा जा रहा हैदिनोदिन कठिन होते जा रहे जिस नगर में देवों को भी तंगी में काम चलाना पड़ रहा हैजहाँमहादेव के नगर मेंएक टूटी छूटी साँसों वाले के संगअपनी साँसें जोड़ते यहाँ तक आने वालों के लिएथकी देह ढीलने लायक ज़रा-सा इत्मीनान जहाँहालांकि पूरे ध्यान से कान लगाने पर भीसुनायी नहीं पड़ता तारक मन्त्र का एक भी अक्षरमुक्तिकामी शव के कानों में जिसेशिव फुसफुसाते हैंकि तभी, ध्यान बँटाताएक बार फिरगुज़रता है साढ़े तीन टाँगों वालामणिकर्णिका का स्थायी बाशिंदा वह कुत्ता अपनी फुदक में हवा में झूलती अधकटी टाँग से निरक्षर फुसफुसातासा : मुझसे पूछो, ज़िंदगी की बेअन्त जंगमता में मृत्यु अल्पविराम है सिर्फ़उसकी लपलपाती जीभ हाँफती होती है दरअसलमहाजीवन के गति-चक्र में सब बँधे हैं -शिव हों कि श्वान

Ep 731Ek Aur Akaal | Kedarnath Singh
एक और अकाल | केदारनाथ सिंहसभाकक्ष मेंजगह नहीं थीतो मैंने कहा कोई बात नहींसड़क तो हैचल तो सकता हूँसो, मैंने चलना शुरू कियाचलते-चलते एक दिनअचानक मैंने पायामेरे पैरों के नीचेअब नहीं है सड़कतो मैंने कहा चलो ठीक हैन सही सड़कमेरे शहर में एक गाती-गुनगुनाती हुईनदी तो हैफिर एक दिनबहुत दिनों बादमैंने सुबह-सुबह जब खिड़की खोलीतो देखा-तट उसी तरह पड़े हैंऔर नदी ग़ायब!यह मेरे लिएअनभ्र बज्रपात थापर मैंने ख़ुद को समझायायार, दुखी क्यों होते होइतने कट गएबाक़ी भी कट ही जाएँगे दिनक्योंकि शहर में लोग तो हैं।फिर एक दिनजब किसी तरह नहीं कटा दिनतो मैं निकल पड़ालोगों की तलाश मेंमैं एक-एक से मिलामैंने एक-एक से बात कीमुझे आश्चर्य हुआलोगों को तो लोगजानते तक नहीं थे!

Ep 730Lakkadhare Ki Peeth | Anuj Lugun
लकड़हारे की पीठ | अनुज लुगुनजलती हुई लकड़ियों कागट्ठर है मेरी पीठ परऔर तुममुझे बाँहों में भरना चाहती होमैं कहता हूँ—तुम भी झुलस जाओगीमेरी देह के साथ।

Ep 729Mitr | Ashwini
मित्र | अश्विनी लक्ष्य को सदा चेताए, तेरी त्रुटि कभी न छुपाए,तेरा क्रोध भी सह जाए, जो भटकने न दे मार्ग से, वह मित्र है ।मित्र का हृदय निर्मल, विशाल, मित्र ही बने मित्र की ढाल, आँच न दे आने मित्र पर, जो दे काल को टाल, वह मित्र है ।क्षुब्ध मन को बहलाता मित्र है, असफलता को करता सहज, ढांढस बंधाता मित्र है ।मन की तपती हुई रेत पर, ठंडा जल छिड़काता मित्र है। कंधे पर ख़ुशी से उठाता मित्र है, दुख में उस पर सहलाता मित्र है, अंत में उठाता उसी पर, अश्रु बहाता मित्र है ।निरपेक्ष, निष्काम संबंध है मित्रता, संबंधों का शीर्ष है मित्रता, जीवन का अप्रतिम संबंध है मित्रता, सबसे पवित्र संबंध है मित्रता ।

Ep 728Suno Sitaron! | Nasira Sharma
सुनो सितारों! | नासिरा शर्मा कहाँ गुम हो जाते हो तुम रात आते हीजाते हो शराबख़ाने या फिरथके हारे मज़दूर की तरहपड़ जाते हो बेसुध चादर ओढ़ तुम!मच्छर लाख काटें और गुनगुनाएँउठते नहीं हो तुम नींद सेकुछ तो बताओ आख़िर कहाँ चले जाते हो तुमहमारी आँखों की पहुँच से दूरअंधेरी रातों में आ जाते थे रौशनी भरनेआँखों में आँखें डाल टिमटिमाते थेसारे दिन की थकी आँखों को सेकते थे औरबिना बोले ही बहुत कुछ बतियाते थेमौसम कोई भी हो, तुम चमकना नहीं भूलतेचाँद निकले या न निकले,सूरज के डूबते हीतुम मिलने चले आते थेनींद में डूबती आँखों में तुम ऐसा भ्रम भरतेजैसे ओढ़ रखी हो सितारों टँकी चादर हमनेतुम्हारी यादों को आज भी सजा रखा हैअपने छोटे से फ़्लैट के कमरे की छत परयह सोच कर कि कैसे बन जाते थे रिश्ते तबजब हमें क़ुदरत लिए फिरती थीं अपनी बाँहों मेंछूट गया तारों की छाँव का वह आँगन हमसेजो न उभरेगा कभी मेरे बच्चों की निगाहों मेंसमझ न पायेंगे ज़मीन से आसमान के रिश्तों कोवह जायेंगे देखने तुम्हें तारा-मंडल में।

Ep 727Beej Pakhi | Hemant Deolekar
बीज पाखी | हेमंत देवलेकर यह कितना रोमांचक दृश्य है:किसी एकवचन को बहुवचन में देखनापेड़ पैराशुट पहनकर उत्तर रहा है।वह सिर्फ़ उतर नहीं रहाबिखर भी रहा है।कितनी गहरी व्यंजना : पेड़ को हवा बनते देखने मेंसफ़ेद रोओं के ये गुच्छेमिट्टी के बुलबुले हैपत्थर हों या पेड़ मन सबके उड़ते हैंहर पेड़ कहीं दूरफिर अपना पेड़ बसाना चाहता हैऔर यह सिर्फ़ पेड़ की आकांक्षा नहींआब-ओ-दाने की तलाश में भटकता हर कोईउड़ता हुआ बीज है।

Ep 726Sapne Nahin Hain To | Nandkishore Acharya
सपने नहीं हैं तो | नंदकिशोर आचार्य नहीं देखेकिसी और के सपने मेरे सिवाफिर भी वह नहीं था मैंजिस के सपने देखती थीं तुमक्यों कि मेरे भी तो थे सपने कुछ नहीं थे जो सपनों में तुम्हारेजैसे तुम थीं सपनों में मेरेपर नहीं थे सपने तुम्हारेएक-एक कर निकालती गयींवे सपने मेरी नींद में से तुमऔर बनाती गयीं जागते में मुझ कोअपने सपने-सा.....और अब हुआ यह है :मैं हर वक्त जगा-सा हूँ ।फिर भी झल्लाती हो तुमतुम्हारा सपना तकक्यों नहीं देखता मैंभूलती हुईसपने नहीं आते हैंनींद के बिना।झल्लाता हूँ मैं भीजानता हुआमैंने भी किया है वहीतुम्हारे भी सपनों के साथ।पर सुनो!सपने नहीं हैं तोझल्लाहट क्यों है?

Ep 725Hum Adharon Adharon Bikhrenge | Seema Aggarwal
हम अधरों-अधरों बिखरेंगे | सीमा अग्रवाल तुम पन्नों पर सजे रहोहम अधरों-अधरोंबिखरेंगेतुम बन ठन करघर में बैठोहम सड़कों से बात करेंतुम मुट्ठी मेंकसे रहो हमपोर पोर खैरात करेंइतराओ गुलदानों में तुमहम मिट्टी मेंनिखरेंगेकलफ लगे कपडेसी अकड़ीगर्दन के तुम हो स्वामीदायें बाए आगे पीछेहर दिक् केहम सहगामीहठयोगी सेसधे रहो तुमहम हर दिल से गुज़रेंगे तुम अनुशासितझीलों जैसेहल्का हल्का मुस्कातेहम अल्हड़ नदियोंसा हँसतेहर पत्थर से बतियातेतुम चिंतन केशिखर चढ़ोहम चिंताओं में उतरेंगे

Ep 724Ramdas | Raghuvir Sahay
रामदास | रघुवीर सहायचौड़ी सड़क गली पतली थीदिन का समय घनी बदली थीरामदास उस दिन उदास थाअंत समय आ गया पास थाउसे बता यह दिया गया था उसकी हत्या होगीधीरे-धीरे चला अकेलेसोचा साथ किसी को ले लेफिर रह गया, सड़क पर सब थेसभी मौन थे सभी निहत्थेसभी जानते थे यह उस दिन उसकी हत्या होगीखड़ा हुआ वह बीच सड़क परदोनों हाथ पेट पर रखकरसधे कदम रख करके आयेलोग सिमटकर आँख गड़ायेलगे देखने उसको जिसकी तय था हत्या होगीनिकल गली से तब हत्याराआया उसने नाम पुकाराहाथ तौलकर चाकू माराछूटा लोहू का फ़व्वाराकहा नहीं था उसने आख़िर उसकी हत्या होगीभीड़ ठेलकर लौट गया वहमरा पड़ा है रामदास यहदेखो देखो बार-बार कहलोग निडर उस जगह खड़े रहलगे बुलाने उन्हें जिन्हें संशय था हत्या होगी

Ep 723Dopahar Ki Kahaniyon Ke Mama | Rajesh Joshi
दोपहर की कहानियों के मामा | राजेश जोशी हम उन नटखट बच्चियों के मामा थेजो अकसर दोपहर में अपनी नानियों से कहानी सुनने की ज़िद करती थीहम हमेशा ही घर लौटने के रास्ते भूल जाते थेघर के एकदम पास पहुँचकर मुड़ जाते थेकिसी अपरिचित गली मेंअकेले होने से हमें डर लगता थाऔर लोगों के बीच अचानक ही हम अकेले हो जाते थेअर्जियों के साथ हमारा जो जीवन चरित नत्थी थाउसमें हमारे अनुभवों के लिए कोई जगह नहीं थीउसमें चाय की दुकानों और सिगरेट की गुमटियों केहमारे उधार खातों का जिक्र नहीं थाउसमें हमारे रतजगों और आवारगी का कोई किस्सा नहीं थाकई पेड़ों, खंडहरों और चट्टानों पर लिख आए थे हम अपने नामप्रेमिकाओं को अकसर हम जीवन से जाते हुए देखते थेमोची हमारी चप्पलों को देखकर पहले मुस्कुराते थेफिर नए थेगले लगाने से इनकार कर देते थेहम अपनी खाली जेबों में डाले रहते थे अपने खाली हाथएक खालीपन को दूसरे खालीपन से भरते हुएहमें लेकिन एक हुनर में महारत हासिल थीहम बहुत सफाई से अपनी हँंसी में अपने आँसू छिपा लेते थे।

Ep 722Nadi Ka Smarak | Kedarnath Singh
नदी का स्मारक | केदारनाथ सिंहअब वह सूखी नदी काएक सूखा स्मारक है।काठ का एक जर्जर पुराना ढाँचाजिसे अब भी वहाँ लोगकहते हैं 'नाव'जानता हूँ लोगों पर उसकेढेरों उपकार हैंपर जानता यह भी हूँ कि उस ढाँचे नेबरसों से पड़े-पड़ेखो दी है अपनी ज़रूरतइसलिए सोचाअबकी जाऊँगा तो कहूँगा उनसे-भाई लोगों, काहे का मोहआख़िर काठ का पुराना ढाँचा ही तो हैसामने पड़ा एक ईंधन का ढेर-जिसका इतना टोटा है!वैसे भी दुनियानाव से बहुत आगे निकल गई हैइसलिए चीर-फाड़करउसे झोंक दो चूल्हे मेंयदि नहींतो फिर एक तखत या स्टूल ही बना डालो उसकाइस तरह मृत नाव कोमिल जाएगा फिर से एक नया जीवनपर पूरे जतन सेउन शब्दों को सहेजकरजब पहुँचा उनके पासउन आँखों के आगे भूल गया वह सबजो गया था सोचकर'दुनिया नाव से आगे निकल गई है'-यह कहने का साहसहो गया तार-तारवे आँखेंइस तरह खली थींमानो कहती हों-काठ का एक जर्जर ढाँचा ही सहीपर रहने दो 'नाव' कोअगर वह वहाँ है तो एक न एक दिनलौट आएगी नदीजानता हूँवह लौटकर नहीं आएगीआएगी तो वह एक और नदी होगीजो मुड़ जाएगी कहीं औरसो, चलने से पहलेमैंने उस जर्जर ढाँचे कोसिर झुकाया और जैसे कोई यात्री पार उतरकरजाता है घरचुपचाप लौट आया।

Ep 721Utra Jwaar | Doodhnath Singh
उतरा ज्वार | दूधनाथ सिंहउतरा ज्वार जलमैला लहरेंगयीं क्षितिज के पार काला सागरअन्धी आँखें फाड़ताक रहा हैगहन नीलिमा बुझे हुए तारेकचपच-कचपचढूँढ़ रहे हैंठौर मैं हूँ मैं हूँयह दृश् ।खोज रहा हूँबंकिम चाँदक्षितिज किनारेमन मेंजो अदृश्य है ।

Ep 720Abhaya | Ashwini
अभया | अश्विनी पुरवा सुहानी नहीं, डरावनी है इस बार,चपला सी दिल दहलाती आती चीत्कार।वर्षा नहीं, रक्त बरसा है इस बार,पक्षी उड़ गए पेड़ों से, रिक्त है हर डार। किसे सुनाती हो दुख अपना, सभी बहरे हैं, नहीं समझेगा कोई, घाव तुम्हारे कितने गहरे हैं। पहने मुखौटे घूमते, घिनौने वही सब चेहरे हैं, अपराधी सत्ता के गलियारों में ही तो ठहरे हैं। रक्षक बने भक्षक, छाई चारों ओर निराशा,धन के हाथों बिके हैं सब, किससे करतीं आशा। याचना नहीं अब रण के लिए तत्पर हो जाओ, महिषासुर मर्दिनी बन, अपना रौद्र रूप दिखलाओ।

Ep 719Maun Hi Mukhar Hai | Vishnu Prabhakar
मौन ही मुखर है | विष्णु प्रभाकरकितनी सुन्दर थीवह नन्हीं-सी चिड़ियाकितनी मादकता थीकण्ठ में उसकेजो लाँघ कर सीमाएँ सारीकर देती थी आप्लावितविस्तार को विराट केकहते हैंवह मौन हो गई है-पर उसका संगीत तोऔर भी कर रहा है गुंजरित-तन-मन कोदिगदिगन्त कोइसीलिए कहा हैमहाजनों ने किमौन ही मुखर है,कि वामन ही विराट है ।

Ep 718Ve Log | Lakshmi Shankar Vajpeyi
वे लोग | लक्ष्मी शंकर वाजपेयीवे लोगडिबिया में भरकर पिसी हुई चीनीतलाशते थे चींटियों के ठिकानेछतों पर बिखेरते थे बाजरा के दानेकि आकर चुगें चिड़ियाँवे घर के बाहर बनवाते थेपानी की हौदीकि आते जाते प्यासे जानवरपी सकें पानीभोजन प्रारंभ करने से पूर्ववे निकालते थे गाय तथा अन्य प्राणियों का हिस्सासूर्यास्त के बाद, वे नहीं तोड़ने देते थेपेड़ से एक पत्तीकि ख़लल न पड़ जाएसोये हुए पेड़ों की नींद मेंवे अपनी तरफ़ से शुरु कर देते थे बातअजनबी से पूछ लेते थे उसका परिचयज़रूरतमंदों की करते थेदिल खोल कर मददकोई पूछे किसी का मकानतो ख़ुद छोड़ कर आते थे उस मकान तककोई भूला भटका अनजान मुसाफ़िरआ जाए रात बिराततो करते थे भोजन और विश्राम की व्यवस्थासंभव है, अभी भी दूरदराज़ किसी गाँव या क़स्बे मेंबचे हों उनकी प्रजाति के कुछ लोगकाश ऐसे लोगों काबनवाया जा सकता एक म्युज़ियमताकि आने वाली पीढ़ियों के लोगजान सकतेकि जीने का एक अंदाज़ ये भी था।

Ep 717Jhoot Ki Nadi | Vijay Bahadur Singh
झूठ की नदी | विजय बहादुर सिंहझूठ की नदी मेंडगमग हैं सच के पाँवचेहरे पीले पड़ते जा रहे हैंमुसाफ़िरों केमुस्कुरा रहे हैं खेवैयेमार रहे हैं डींगभरोसा है उन्हें फिर भीसम्हल जाएगी नावमुसाफ़िर बच जाएँगेंभँवर थम जाएगी

Ep 716Hone Lagi Hai Jism Mein Jumbish To Dekhiye | Dushyant Kumar
होने लगी है जिस्म में जुम्बिश तो देखिए | दुष्यंत कुमार होने लगी है जिस्म में जुम्बिश तो देखिएइस परकटे परिन्दे की कोशिश तो देखिए।गूंगे निकल पड़े हैं, ज़ुबाँ की तलाश में,सरकार के खिलाफ़ ये साज़िश तो देखिए।बरसात आ गई तो दरकने लगी ज़मीन,सूखा मचा रही ये बारिश तो देखिए।उनकी अपील है कि उन्हें हम मदद करें,चाकू की पसलियों से गुज़ारिश तो देखिए ।जिसने नज़र उठाई वही शख्स गुम हुआ,इस जिस्म के तिलिस्म की बंदिश तो देखिए।

Ep 715Nazar Jhuk Gayi Aur Kya Chahiye | Firaaq Gorakhpuri
नज़र झुक गई और क्या चाहिए | फ़िराक़ गोरखपुरीनज़र झुक गई और क्या चाहिएअब ऐ ज़िंदगी और क्या चाहिएनिगाह -ए -करम की तवज्जो तो हैवो कम कम सही और क्या चाहिएदिलों को कई बार छू तो गईमेरी शायरी और क्या चाहिएजो मिल जाए दुनिया -ए -बेगाना मेंतेरी दोस्ती और क्या चाहिएमिली मौत से ज़िंदगी फिर भी तोन की ख़ुदकुशी और क्या चाहिएजहाँ सौ मसाइब थे ऐ ज़िंदगी मोहब्बत भी की और क्या चाहिएगुमाँ जिसपे है ज़िंदगी का 'फ़िराक़'वही मौत भी और क्या चाहिए

Ep 714Capitalism | Gaurav Tiwari
कैपिटलिज़्म | गौरव तिवारी बाग में अक्सर नहीं तोड़े जाते गुलाबलोग या तो पसंद करते हैं उसकी ख़ुशबूया फिर डरते हैं उसमें लगे काँटों सेजो तोड़ने पर कर सकते हैंउन्हें ज़ख्मीवहीं दूसरी तरफ़ घासकुचली जाती है, रगड़ी जाती है,कर दी जाती है अपनी जड़ों से अलगसहती हैं अनेक प्रकार की प्रताड़नाएंफिर भी रहती हैं बाग में,क्योंकि बाग भी नहीं होता बागघास के बगैर माली भी रखता हैथोड़ा-बहुत ध्यानघास का,ताकि बढ़ सके गुलाब की सुंदरता कुछ औरयदि घास भीपैदा नहीं करेंगी ख़ुशबूया नहीं बनेंगी कँटीलीवे होती रहेंगी शोषितऔर गुलाब बना रहेगा कैपिटलिस्ट।

Ep 713Hajamat | Anup Sethi
हजामत | अनूप सेठी सैलून की कुर्सी पर बैठे हुएकान के पीछे उस्तरा चला तो सिहरन हुईआइने में देखा बाबा नेसाठ-पैंसठ साल पहले भीकान के पीछे गुदगुदी हुई थीपिता ने कंधे से थाम लिया थाआइने में देखा बाबा नेपीछे बैंच पर अधेड़ बेटा पत्रिकाएँ पलटता हुआ बैठा हैचालीस साल पहले यह भी उस्तरे की सरसराहट से बिदका थाबाबा ने देखा आइने मेंइकतालीस साल पहले जब पत्नी को पहली बारब्याह के बाद गाँव में घास की गड्डी उठाकर लाते देखा थाहरी कोमल झालर मुँह को छूकर गुज़री थीजैसे नाई ने पानी का फुहारा छोड़ा हो अचानकतीस साल पहले जब बेटी विदा हुई थीउसने कूक मारी थी ज़ोर से आँखें भर आईं थींऔर नाई ने पौंछ दीं रौंएदार तौलिए सेपाँच साल पहले पत्नी की देह को आग दीआँखें सूखी रहीं, गर्दन भीग गई थीजैसे बालों के टुकड़े चिपके हुए चुभने लगते हैंबाबा के हाथ नहीं पँहुचे गर्दन तक आँखों पर या कान के पीछेबेटा पत्रिका में खोया हुआ हैआइने में दुगनी दूर दिखता हैनाई कम्बख़्त देर बहुत लगाता हैहड़बड़ा कर आख़िरी बार आइने को देखा बाबा नेउठते हुए सीढ़ी से उतरते वक़्त बेटे ने कंधे को हौले से थामाबाबा ने खुली हवा में साँस लीआसमान ज़रा धुंधला थाआइने बड़ा भरमाते हैंउस्तरा भी कहाँ से कहाँ चला जाता हैसाठ पैंसठ साल से हर बार बाबा सोचते हैंइस बार दिल जकड़ के जाऊंगा नाई के पासपाँच के हों या पिचहत्तर बरस के बाबाबड़ा दुष्कर है हजामत बनवाना

Ep 712Ek Chota Sa Anurodh | Kedarnath Singh
एक छोटा सा अनुरोध | केदारनाथ सिंहआज की शामजो बाज़ार जा रहे हैंउनसे मेरा अनुरोध हैएक छोटा-सा अनुरोधक्यों न ऐसा हो कि आज शामहम अपने थैले और डोलचियाँरख दें एक तरफ़और सीधे धान की मंजरियों तक चलेंचावल ज़रूरी हैज़रूरी है आटा दाल नमक पुदीनापर क्यों न ऐसा हो कि आज शामहम सीधे वहीं पहुँचेंएकदम वहींजहाँ चावलदाना बनने से पहलेसुगन्ध की पीड़ा से छटपटा रहा होउचित यही होगाकि हम शुरू में हीआमने-सामनेबिना दुभाषिये केसीधे उस सुगन्ध सेबातचीत करेंयह रक्त के लिए अच्छा हैअच्छा है भूख के लिएनींद के लिएकैसा रहेबाज़ार न आए बीच मेंऔर हम एक बारचुपके से मिल आएँ चावल सेमिल आएँ नमक सेपुदीने सेकैसा रहेएक बार... सिर्फ़ एक बार...

Ep 711Jal | Ashok Vajpeyi
जल | अशोक वाजपेयीजलखोजता हैजल मेंहरियाली का उद्गमकुछ नीली स्मृतियाँ और मटमैले चिद्मजलभागता हैजल की गली मेंगाते हुएलय काविलय का उच्छल गानजल देता हैजल को आवाज़,जल सुनता हैजल की कथा,जल उठाता हैअंजलि मेंजल को,जल करता हैजल में डूबकरउबरने की प्रार्थनाजल में हीथरथराती हैजल की कामना।

Ep 710Aman Ka Naya Silsila Chahta Hun | Lakshmi Shankar Vajpeyi
अमन का नया सिलसिला चाहता हूँ | लक्ष्मीशंकर वाजपेयीअमन का नया सिलसिला चाहता हूँजो सबका हो ऐसा ख़ुदा चाहता हूँ।जो बीमार माहौल को ताज़गी देवतन के लिए वो हवा चाहता हूँ।कहा उसने धत इस निराली अदा सेमैं दोहराना फिर वो ख़ता चाहता हूँ।तू सचमुच ख़ुदा है तो फिर क्या बतानातुझे सब पता है मैं क्या चाहता हूँ।मुझे ग़म ही बांटे मुक़द्दर ने लेकिनमैं सबको ख़ुशी बांटना चाहता हूँ।बहुत हो चुका छुप के डर डर के जीनासितमगर से अब सामना चाहता हूँ।किसी को भंवर में न ले जाने पाएमैं दरिया का रुख़ मोड़ना चाहता हूँ।

Ep 709Sapne | Shivam Chaubey
सपने | शिवम चौबे रिक्शे वाले सवारियों के सपने देखते हैंसवारियाँ गंतव्य केदुकानदार के सपने में ग्राहक ही आएं ये ज़रूरी नहींमॉल भी आ सकते हैंछोटे व्यापारी पूंजीपतियों के सपने देखते हैं।पूंजीपति प्रधानमंत्री के सपने देखता हैप्रधानमंत्री के सपने में सम्भव है जनता न आयेआम आदमी अच्छे दिन के स्वप्न देखता है।पिता देखते हैं अपना घर होने का सपनामाँ के सपने में आती है अच्छी नींदहर व्यक्ति अपनी जगह से आगे बढ़कर देखता है।मल्लाह नदियों के सपने देखते हैं।नदियों के स्वप्न में मछलियां नहीं समुद्र आता हैपौधों के सपने में पेड़पेड़ों को शायद ही आते हों पलंग और कुर्सी के स्वप्नकैदी देखते हैं आज़ादी के सपनेचिड़ियों के सपने में होता है आसमानसपने आने और सपने देखने में फ़र्क होता हैआये हुए सपने डर के सपने होते हैं।देखे गए सपने सुंदर इच्छाओं केमैंने देखा था तुम्हारे साथ जीवन का सपनामेरे सपने में आते हैं तुम्हारे छूटे हुए हाथ बच्चों को आते हैं सबसे सुंदर सपनेबूढ़ों के सपनों में घटता है जीवनक्रांतिकारी देखते हैं संघर्ष और प्रेम के स्वप्नकवि के सपने में सम्पादक और पुरस्कार ही आएं ऐसा कहाँ लिखाउनको दुनिया भर के सपने आते होंगेबीते हुए कल और आने वाले कल के सपनेजैसे नदी की सीमा में पानी होता हैनींद की सीमा में होते हैं सपनेसूख जाती है जिनकी नदीउनको कहाँ ही आते हैं सपने।

Ep 708Main Unka Hi Hota | Muktibodh
मैं उनका ही होता| गजानन माधव मुक्तिबोधमैं उनका ही होता, जिनसेमैंने रूप-भाव पाए हैं।वे मेरे ही लिए बँधे हैंजो मर्यादाएँ लाए हैं।मेरे शब्द, भाव उनके हैं,मेरे पैर और पथ मेरा,मेरा अंत और अथ मेरा,ऐसे किंतु चाव उनके हैं।मैं ऊँचा होता चलता हूँउनके ओछेपन से गिर-गिर,उनके छिछलेपन से खुद-खुद,मैं गहरा होता चलता हूँ।

Ep 707Prem Gatha | Ajay Kumar
प्रेम गाथा | अजय कुमारप्रेमएक कमरे कोकैनवास में तब्दील कर केउसमें आँक सकता हैएक बादलजंगल में नाचता हुआ मोरएक गिरती हुई बारिशदेवदार का एक पेड़एक सितारों भरी रेशमी रातएक अलसाई गुनगुनाती सुबहसमुंदर की लहरों कोमदमदाता शोरप्रेम एक गलती कोदे सकता है पद्म विभूषणएक झूठ कोसहेज कर रख सकता है आजीवनएक पराजय कासहला सकता है माथाऔर हर प्रतीक्षा काकर सकता है आलिंगनपर प्रेम की नदी मेंअपमानों से बन सकतें है भंवरउपेक्षाओं से पड़ सकती हैंअदृश्य गांठेंतिरस्कारों से बेसुरा हो सकता हैउसके भीतर बजताराग यमन कल्याणकोई भी प्रेमबस अपनी अवेहलना नहीं भूलतासिर्फ़ भूलने काएक अभिनय कर सकता हैजिसका कभी भी हो सकता हैआकस्मिक पटाक्षेपआप यह याद रखिए

Ep 706Chanderi | Kumar Ambuj
चँदेरी | कुमार अम्बुजचंदेरी मेरे शहर से बहुत दूर नहीं है मुझे दूर जाकर पता चलता है बहुत माँग है चंदेरी की साड़ियों की चँदेरी मेरे शहर से इतनी क़रीब है कि रात में कई बार मुझे सुनाई देती है करघों की आवाज़ जब कोहरा नहीं होता सुबह-सुबह दिखाई देते हैं चँदेरी के किले के कंगूरे चँदेरी की दूरी बस इतनी है जितनी धागों से कारीगरों की दूरीमेरे शहर और चँदेरी के बीच बिछी हुई है साड़ियों की कारीगरी इस तरफ़ से साड़ी का छोर खींचो तो दूसरी तरफ़ हिलती हैं चँदेरी की गलियाँगलियों की धूल से साड़ी को बचाता हुआ कारीगर सेठ के आगे रखता है अपना हुनर मैं कई रातों से परेशान हूँ चँदेरी के सपने में दिखाई देते हैं मुझे धागों पर लटके हुए कारीगरों के सिरचँदेरी की साड़ियों की दूर-दूर तक माँग है मुझे दूर जाकर पता चलता है।

Ep 705Wo To Khusbu Hai Hawaon Mein Bikhar Jayega | Parveen Shakir
वो तो ख़ुश-बू है हवाओं में बिखर जाएगा | परवीन शाकिरवो तो ख़ुश-बू है हवाओं में बिखर जाएगामसअला फूल का है फूल किधर जाएगाहम तो समझे थे कि इक ज़ख़्म है भर जाएगाक्या ख़बर थी कि रग-ए-जाँ में उतर जाएगावो हवाओं की तरह ख़ाना-ब-जाँ फिरता हैएक झोंका है जो आएगा गुज़र जाएगावो जब आएगा तो फिर उस की रिफ़ाक़त के लिएमौसम-ए-गुल मिरे आँगन में ठहर जाएगाआख़िरश वो भी कहीं रेत पे बैठी होगीतेरा ये प्यार भी दरिया है उतर जाएगामुझ को तहज़ीब के बर्ज़ख़ का बनाया वारिसजुर्म ये भी मिरे अज्दाद के सर जाएगा

Ep 704Silbatta | Prashant Bebaar
सिलबट्टा | प्रशांत बेबार वो पीसती है दिन रात लगातारमसाले सिलबट्टे परतेज़ तीखे मसालेअक्सर जलने वालेपीसकर दाँतीतानकर भौहेंवो पीसती है हरी-हरी नरम पत्तियाँऔर गहरे काले लम्हेसिलेटी से चुभने वाले किस्सेवो पीसती हैं मीठे काजू, भीगे बादामऔर पीस देना चाहती हैसभी कड़वी भददी बेस्वाद बातेंलगाकर आलती-पालतीलिटाकर सिल, उठाकर सिरहाना उसकादोनों हथेलियों में फँसाकर बट्टासीने में सास भरकरनथुने फुलाकरपसीने से लथपथपीस देना चाहती हैबार-बार सरकता घूँघटचिल्लाहट, छटपटाहट अपनी और उनकी, जिनके निशान हैं बट्टे परऔर उनकी भी,जिनके निशान नहीं चाहती बट्टे परवो पीसती है दिन रातखुद को लगातारमिलाकर देह का चूरापोटुओं से नमक में यूँबनाती है लज़ीज़ सब कुछवो पीसते-पीसते सिलबट्टे पे उम्र अपनीगढ़ती है तमाम मीठे ठंडे सपनेऔर रख देती हैबेटी के नन्हे होठों के पोरों पर चुपचापसिलबट्टे से दूर, सिलबट्टे से बहुत दूर।

Ep 703Adiyal Saans | Kedarnath Singh
अड़ियल साँस | केदारनाथ सिंहपृथ्वी बुख़ार में जल रही थीऔर इस महान पृथ्वी केएक छोटे-से सिरे परएक छोटी-सी कोठरी मेंलेटी थी वहऔर उसकी साँसअब भी चल रही थीऔर साँस जब तक चलती हैझूठसचपृथ्वीतारे - सब चलते रहते हैंडॉक्टर वापस जा चुका थाऔर हालाँकि वह वापस जा चुका थापर अब भी सब को उम्मीद थीकि कहीं कुछ है।जो बचा रह गया है नष्ट होने सेजो बचा रह जाता हैलोग उसी को कहते हैं जीवनकई बार उसी कोकाईघासया पत्थर भी कह देते हैं लोगलोग जो भी कहते हैंउसमें कुछ न कुछ जीवनहमेशा होता है।तो यह वही चीज़ थीयानी कि जीवनजिसे तड़पता हुआ छोड़करचला गया था डॉक्टरऔर वह अब भी थीऔर साँस ले रही थी उसी तरहउसकी हर साँसहथौड़े की तरह गिर रही थीसारे सन्नाटे परठक-ठक बज रहा था सन्नाटाजिससे हिल उठता था दियाजो रखा था उसके सिरहानेकिसी ने उसकी देह छुई कहा - 'अभी गर्म है'।लेकिन असल में देह या कि दियाकहाँ से आ रही थी जीने की आँचयह जाँचने का कोई उपाय नहीं थाक्योंकि डॉक्टर जा चुका थाऔर अब खाली चारपाई परसिर्फ़ एक लंबीऔर अकेली साँस थीजो उठ रही थीगिर रही थीगिर रही थीउठ रही थी..इस तरह अड़ियल साँस कोमैंने पहली बार देखामृत्यु से खेलतेऔर पंजा लड़ाते हुएतुच्छअसह्यगरिमामय साँस कोमैंने पहली बार देखाइतने पास से

Ep 702Ae Aurat | Nasira Sharma
ऐ औरत! | नासिरा शर्मा जाड़े की इस बदली भरी शाम कोकहाँ जा रही हो पीठ दिखाते हुएठहरो तो ज़रा!मुखड़ा तो देखूँ कि उस पर कितनी सिलवटें हैंथकन और भूख-प्यास कीसर पर उठाए यह सूखी लकड़ियों का गट्ठर कहाँ लेकर जा रही हो इसे?तुम्हें नहीं पता है कि लकड़ी जलाना, धुआँ फैलाना, वायु को दूषित करनाअपराध है अपराध! गैस है, तेल है ,क्यों नहीं करतीं इस्तेमाल उसेतुम्हारी ग़रीबी, बेचारगी और बेकारी के दुखड़ों सेकुछ नहीं लेना देना है क़ानून कोबस इतना कहना है किजाड़े की ठिठुरी रात में,गरमाई लेते हुएरोटी सेंकने की ग़लती मत कर बैठनापेड़ कुछ कहें या न कहें तुम्हें मगरइस अपराध पर, क़ानून पकड़ लेगा तुम्हेंयह दो हज़ार चौबीस हैबदलते समय के साथ चलो ,और पुराने रिश्तों से नाता तोड़ोसवाल मत करो कि बमों से निकलते बारूदधूल, धुएँ से पर्यावरण का नाश नहीं होतापेड़ों के कटने से गर्मी का क़हर नहीं टूटतायह छोटे मुँह और बड़ी बात होगी।

Ep 701Haar | Prabhat
हार | प्रभातजब-जब भी मैं हारता हूँमुझे स्त्रियों की याद आती हैऔर ताक़त मिलती हैवे सदा हारी हुई परिस्थिति में हीकाम करती हैंउनमें एक धुन एक लयएक मुक्ति मुझे नज़र आती हैवे काम के बदले नाम सेगहराई तक मुक्त दिखलाई पड़ती हैंअसल में वे निचुड़ने की हद तकथक जाने के बाद भीइसी कारण से हँस पाती हैंकि वे हारी हुई हैंविजय सरीखी तुच्छ लालसाओं पर उन्हेंऐतिहासिक विजय हासिल है

Ep 700Gussa | Gulzar
ग़ुस्सा | गुलज़ारबूँद बराबर बौना-सा भन्नाकर लपकापैर के अँगूठे से उछलाटख़नों से घुटनों पर आयापेट पे कूदानाक पकड़ करफन फैला कर सर पे चढ़ गया ग़ुस्सा!

Ep 699Mareez Ka Naam | Usman Khan
मरीज़ का नाम- उस्मान ख़ानचाहता हूँकिसी शाम तुम्हें गले लगाकर ख़ूब रोनालेकिन मेरे सपनों में भी वो दिन नहीं ढलताजिसके आख़री सिरे पर तुमसे गले मिलने की शाम रखी हैसुनता हूँकि एक नए कवि को भी तुमसे इश्क़ हैमैं उससे इश्क़ करने लगा हूँमेरे सारे दुःस्वप्नों के बयान तुम्हारे पास हैंऔर तुम्हारे सारे आत्मालाप मैंने टेप किए हैंमैं साइक्रेटिस्ट की तरफ़ देखता हूँवो तुम्हारी तरफ़और तुम मेरी तरफ़और हम तीनों भूल जाते हैं—मरीज़ का नाम!

Ep 698Banaya Hai Maine Ye Ghar | Ramdarash Mishra
बनाया है मैंने ये घर | रामदरश मिश्रबनाया है मैंने ये घर धीरे-धीरेखुले मेरे ख़्वाबों के पर धीरे-धीरेकिसी को गिराया न ख़ुद को उछालाकटा ज़िन्दगी का सफर धीरे-धीरेजहाँ आप पहुँचे छलॉंगें लगा करवहाँ मैं भी पहुँचा मगर धीरे-धीरेपहाड़ों की कोई चुनौती नहीं थीउठाता गया यों ही सर धीरे-धीरेगिरा मैं कहीं तो अकेले में रोयागया दर्द से घाव भर धीरे-धीरेन हँस कर, न रोकर किसी में उड़ेलापिया ख़ुद ही अपना ज़हर धीरे-धीरेज़मीं खेत की साथ लेकर चला थाउगा उसमें कोई शहर धीरे-धीरेमिला क्या न मुझको ऐ दुनिया तुम्हारीमुहब्बत मिली है अगर धीरे-धीरे

Ep 697Apne Aap Se | Zaahid Dar
अपने आप से | ज़ाहिद डारमैं ने लोगों से भला क्या सीखायही अल्फ़ाज़ में झूटी सच्चीबात से बात मिलाना दिल कीबे-यक़ीनी को छुपाना सर कोहर ग़बी कुंद-ज़ेहन शख़्स की ख़िदमत में झुकाना हँसनामुस्कुराते हुए कहना साहबज़िंदगी करने का फ़न आप से बेहतर तो यहाँ कोई नहीं जानता हैगुफ़्तुगू कितनी भी मजहूल हो माथा हमवारकान बेदार रहें आँखें निहायत गहरीसोच में डूबी हुईफ़लसफ़ी ऐसे किताबी या ज़बानी मानोउस से पहले कभी इंसान ने देखे ने सुनेउन को बतला दो यही बात वगर्ना इक दिनऔर वो दिन भी बहुत दूर नहींतुम नहीं आओगे ये लोग कहेंगे जाहिलबात करने का सलीक़ा ही नहीं जानता हैक्या तुम्हें ख़ौफ़ नहीं आता हैख़ौफ़ आता है कि लोगों की नज़र से गिर करहाज़रा दौर में इक शख़्स जिए तो कैसेशहर में लाखों की आबादी मेंएक भी ऐसा नहींजिस का ईमान किसी ऐसे वजूदऐसी हस्ती या हक़ीक़त या हिकायत पर होजिस तकहाज़रा दौर के जिब्रईल की (या'नी अख़बार)दस्तरस न हो रसाई न होमैं ने लोगों से भला क्या सीखाबुज़दिली और जहालत की फ़ज़ा में जीनादाइमी ख़ौफ़ में रहना कहनासब बराबर हैं हुजूमजिस तरफ़ जाए वही रस्ता हैमैं ने लोगों से भला क्या सीखाबे यक़ीनी- अविश्वास ग़बी- मंदबुद्धि कुंद ज़ह्न- मूर्खख़िदमत- सेवा गुफ़्तगू: बात चीत मजहूल- मूर्खता से भरी हुई हमवार: एक सा बेदार: जागता हुआ फ़ल्सफ़ी दार्शनिकहाज़रा: वर्तमान हस्ती: अस्तित्वहिकायत: कहानी जिब्रईल: मान्यता के अनुसार ख़ुदा का एक फ़रिश्ता दस्तरस: पहुँचरसाई: पहुँचदाइमी: शाश्वतहुजूम: भीड़

Ep 696Mera Ghar, Uska Ghar | Aagney
मेरा घर, उसका घर / आग्नेयएक चिड़ियाप्रतिदिन मेरे घर आती हैजानता नहीं हूँ उसका नामसिर्फ़ पहचानता हूँ उसकोवह चहचहाती है देर तकढूँढती है दाने :और फिर उड़ जाती हैअपने घर की ओरपर उसका घर कहाँ है?घर है भी उसकाया नहीं है उसका घर?यदि उसका घर हैतब भी उसका घरमेरे घर जैसा नहीं होगालहूलुहान और हाहाकार से भराफिर क्यों आती हैवह मेरे घरप्रतिदिन चहचहाने

Ep 695Rachna Ki Adhi Raat | Kedarnath Singh
रचना की आधी रात | केदारनाथ सिंहअन्धकार! अन्धकार! अन्धकारआती हैकानों मेंफिर भी कुछ आवाज़ेंदूर बहुत दूरकहींआहत सन्नाटे मेंरह- रहकरईटों परईटों के रखने कीफलों के पकने कीख़बरों के छपने कीसोए शहतूतों पररेशम के कीड़ों केजगने कीबुनने की.और मुझे लगता हैजुड़ा हुआ इन सारीनींदहीन ध्वनियों सेखोए इतिहासों केअनगिनत ध्रुवांतों परमैं भी रचना- रत हूँझुका हुआ घंटों सेइस कोरे काग़ज़ की भट्ठी परलगातारअन्धकार! अन्धकार ! अन्धकार !

Ep 694Dharti Ki Behnein | Anupam Singh
धरती की बहनें | अनुपम सिंहमैं बालों में फूल खोंसधरती की बहन बनी फिरती हूँमैंने एक गेंद अपने छोटे भाईआसमान की तरफ़ उछाल दी है।हम तीनों की माँ नदी हैबाप का पता नहींमेरा पड़ोसी ग्रह बदल गया है।कोई और आया है किरायेदार बनकरअब से मेरी सारी डाक उसी के पते पर आएगीमैंने स्वर्ग से बुला लिया है अप्सराओं कोवे इन्द्र से छुटकारा पा ख़ुश हैं।आज रात हम सब सखियाँ साथ सोएँगीविष्णु की मोहिनी चाहेतो अपनी मदिरा लेकर इधर रुक सकती है…