
Pratidin Ek Kavita
1,183 episodes — Page 9 of 24

Ep 785Der Ho Jayegi | Ashok Vajpeyi
देर हो जाएगी | अशोक वाजपेयीदेर हो जाएगी-बंद हो जाएगी समय से कुछ मिनिट पहले हीउम्मीद की खिड़कीयह कहकर कि गाड़ी में अब कोई सीट ख़ाली नहीं।देर हो जाएगीकड़ी धूप और लू के थपेड़ों से राहत पाने के लिएकिसी अनजानी परछी में जगह पाने में,एक प्राचीन कवि के पद्य में नहींस्वप्न में उमगे रूपक को पकड़ने में,हरे वृक्ष की छाँह में प्यास से दम तोड़ती चिड़िया तकपानी ले जाने मेंदेर हो जाएगी-घूरे पर पड़ेसपनों स्मृतियों इतिहास के चिथड़ों को नवेरनेपड़ोसी के आँगन में अकस्मात् गिर पड़ीबालगेंद को वापस लाने,यातना की सार्वजनिक छवियों में दबे निजी सच को जानने,आत्मा के घुप्प दुर्ग में एक मोमबत्ती जलाकर खोजनेसबमें देर हो जाएगी -देर हो जाएगी पहचान मेंदेर हो जाएगी स्वीकार मेंदेर हो जाएगी अवसान में

Ep 784Sau Baaton Ki Ek Baat | Ramanath Awasthi
सौ बातों की एक बात - रमानाथ अवस्थी सौ बातों की एक बात है.रोज़ सवेरे रवि आता हैदुनिया को दिन दे जाता हैलेकिन जब तम इसे निगलताहोती जग में किसे विकलतासुख के साथी तो अनगिन हैंलेकिन दुःख के बहुत कठिन हैंसौ बातो की एक बात है.अनगिन फूल नित्य खिलते हैंहम इनसे हँस-हँस मिलते हैंलेकिन जब ये मुरझाते हैंतब हम इन तक कब जाते हैंजब तक हममे साँस रहेगीतब तक दुनिया पास रहेगीसौ बातों की एक बात है.सुन्दरता पर सब मरते हैंकिन्तु असुंदर से डरते हैंजग इन दोनों का उत्तर हैजीवन इस सबके ऊपर हैसबके जीवन में क्रंदन हैलेकिन अपना-अपना मन हैसौ बातो की एक बात है.

Ep 783Aanch | Vandana Mishra
आँच | वंदना मिश्रागर्मियों में तेज़ आँच देखकर माँ कहती थी :'आग अपने मायके आई है'और फिर चूल्हे की लकड़ियाँकम कर दी जाती थींमैं कहती थी :'मायके में तोउसे अच्छे से रहने दो माँकम क्यों कर रही हो?'माँ कहती थी :'ये लड़कीप्रश्न बहुत पूछती है।'बाद में समझ आयाप्रश्न पूछने से मना करनाआग कम करने की तरफ़बढ़ा पहला क़दम होता है।

Ep 782Zooming | Ashfaq Hussain
ज़ूमिंग |अशफ़ाक़ हुसैनदेखूँ जो आसमाँ से तो इतनी बड़ी ज़मींइतनी बड़ी ज़मीन पे छोटा सा एक शहरछोटे से एक शहर में सड़कों का एक जालसड़कों के जाल में छुपी वीरान सी गलीवीराँ गली के मोड़ पे तन्हा सा इक शजरतन्हा शजर के साए में छोटा सा इक मकानछोटे से इक मकान में कच्ची ज़मीं का सहनकच्ची ज़मीं के सहन में खिलता हुआ गुलाबखिलते हुए गुलाब में महका हुआ बदनमहके हुए बदन में समुंदर सा एक दिलउस दिल की वुसअ'तों में कहीं खो गया हूँ मैंयूँ है कि इस ज़मीं से बड़ा हो गया हूँ मैंसहन: आँगन,शजर: पेड़, वृक्षवुसअ'तों: विस्तार

Ep 781Pagli Arzoo | Nasira Sharma
पगली आरज़ू | नासिरा शर्माकहा था मैंने तुमसेउस गुलाबी जाड़े की शुरुआत मेंउड़ना चाहती हूँ मैं तुम्हारे साथखुले आसमान मेंचिड़ियाँ उड़ती हैं जैसे अपने जोड़ों के संगनापतीं हैं आसमान की लम्बाई और चौड़ाईनज़ारा करती हैं धरती का, झांकती हैं घरों मेंपार करती हैं पहाड़, जंगल और नदियाँफिर उतरती हैं ज़मीन पर, चुगती हैं दानासुस्ताती किसी पेड़ की शाख़ परअलापतीं हैं कोई गीत प्रेम काजब उमड़ता है प्यार तो गुदगुदाती हैंअपनी चोंच से एक दूसरे कोउसी तरह मैं प्यार करना चाहती हूँ तुम्हेंलब से लब मिला कर, हथेली पर हथेली रखकरजैसे वह सटकर बैठते हैं अपने घोंसले मेंवैसे ही रात को सोना चाहती हूँ तुम से लिपट करआँखों में नीले आसमान के सपने भरइस खुरदुरी दुनिया को सलामत बनाने के लिए।मैं उड़ना चाहती हूँ तुम्हारे संग ऊँचाइयों परजहाँ मुलाक़ात कर सकूँ सूरज सेउस डूबते सूरज को पंखों में छुपा लाऊँलौटते हुए उगे चाँद के चेहरे को चूम करचुग लाऊँ कुछ तारे चोरी-चोरीफिर उन्हें सजा दूँ धरती के अंधेरे कोनों में।

Ep 780Hanso Ek Bachhe Ki Tarah | Amita Prajapati
हँसो एक बच्चे की तरह | अमिता प्रजापतितुम प्यार को पृथ्वीमान करमत घूमो हर्क्यूलिस की तरहमत झुकाओ इसके वज़न सेअपनी गर्दनधीरे से सरका के इसेगिरा लो अपने पैरों मेंउछालो गेंद की तरहहँसो एक बच्चे की तरह...

Ep 779Dhaar | Arun Kamal
धार | अरुण कमलकौन बचा है जिसके आगेइन हाथों को नहीं पसारायह अनाज जो बदल रक्त मेंटहल रहा है तन के कोने-कोनेयह क़मीज़ जो ढाल बनी हैबारिश सर्दी लू मेंसब उधार का, माँगा-चाहानमक-तेल, हींग-हल्दी तकसब क़र्ज़े कायह शरीर भी उनका बंधकअपना क्या है इस जीवन मेंसब तो लिया उधारसारा लोहा उन लोगों काअपनी केवल धार

Ep 778Us Plumber Ka Naam Kya Hai | Rajesh Joshi
उस प्लम्बर का नाम क्या है | राजेश जोशी मैं दुनिया के कई तानाशाहों की जीवनियाँ पढ़ चुका हूँकई खूँखार हत्यारों के बारे में भी जानता हूँ बहुत कुछघोटालों और यौन प्रकरणों में चर्चित हुएकई उच्च अधिकारियों के बारे में तो बता सकता हूँढेर सारी अंतरंग बातें और निहायत ही नाकारा क़िस्म के राजनीतिज्ञों के बारे मेंघंटे भर तक बोल सकता हूँ धारा प्रवाहलेकिन घंटे भर से कोशिश कर रहा हूँपर याद नहीं आ रहा है इस वक़्त उस प्लम्बर का नामजो कई बार आ चुका है हमारी पाइप लाइन मेंअक्सर हो जाने वाली गड़बड़ी को ठीक करनेवो कहाँ रहता है, कहाँ है उसके मिलने का ठीहाकुछ भी याद नहींउसके परिवार के बारे में तो ख़ैेर..हैरत है ! मैं बुरे लोगों के बारे में कितना कुछ जानता हूँऔर उनसे भी ज़्यादा बुरों के बारे में, तो कुछ और ज़्यादा जबकि पाइप लाइन में आई किसी गड़बड़ी कोकिसी तानाशाह ने कभी ठीक किया होइसका ज़िक्र उसकी जीवनी में नहीं मिलताऐसे वक्त में हमेशा स्त्रियाँ ही मदद कर सकती हैंयह थोड़ा अजीब ज़रूर लगेगा लेकिन यही सच हैकि स्त्रियाँ ही उन लोगों के बारे में सबसे ज़्यादा जानती हैंजो आड़े वक़्त में काम आते हैंजो जीवन की छोटी छोटी गड़बड़ियों कोदुरुस्त करने का हुनर जानते हैंपत्नी जानती थी कि चार दिन पहलेजमादारिन के यहाँ बच्चा हुआ हैवो उसके बच्चे के लिए हमारी बेटी के छुटपन के कपड़ेनिकाल रही थी उस वक़्तजब थक हार कर मैंने उसे आवाज़ लगाईसुनो...उस प्लम्बर का नाम क्या है ?

Ep 777Rang Is Mausam Mein Bharna Chahiye | Anjum Rehbar
रंग इस मौसम में भरना चाहिए | अंजुम रहबररंग इस मौसम में भरना चाहिएसोचती हूँ प्यार करना चाहिएज़िंदगी को ज़िंदगी के वास्तेरोज़ जीना रोज़ मरना चाहिएदोस्ती से तज्रबा ये हो गयादुश्मनों से प्यार करना चाहिएप्यार का इक़रार दिल में हो मगरकोई पूछे तो मुकरना चाहिए

Ep 776Kavi Ka Ghar | Ramdarash Mishra
कवि का घर | रामदरश मिश्रगेन्दे के बड़े-बड़े जीवन्त फूलबेरहमी से होड़ लिए गएऔर बाज़ार में आकर बिकने लगेबाज़ार से ख़रीदे जाकर वेपत्थर के चरणों पर चढ़ा दिए गएफिर फेंक दिए गए कूड़े की तरहमैं दर्द से भर आयाऔर उनकी पंखुड़ियाँ रोप दींअपनी आँगन-वाटिका की मिट्टी मेंअब वे लाल-लाल, पीले-पीले, बड़े-बड़े फूल बनकरदहक रहे हैंमैं उनके बीच बैठकर उनसे सम्वाद करता हूँवे अपनी सुगन्ध और रंगों की भाषा मेंमुझे वसन्त का गीत सुनाते हैंऔर मैं उनसे कहता हूँ -जियो मित्रो !पूरा जीवन जियो उल्लास के साथअब न यहाँ बाज़ार आएगाऔर न पत्थर के देवता पर तुम्हें चढ़ाने के लिए धर्मयह कवि का घर है !

Ep 775Tumne Mujhe | Shamsher Bahadur Singh
तुमने मुझे | शमशेर बहादुर सिंहतुमने मुझे और गूँगा बना दिया एक ही सुनहरी आभा-सी सब चीज़ों पर छा गई मै और भी अकेला हो गया तुम्हारे साथ गहरे उतरने के बाद मैं एक ग़ार से निकला अकेला, खोया हुआ और गूँगा अपनी भाषा तो भूल ही गया जैसे चारों तरफ़ की भाषा ऐसी हो गई जैसे पेड़-पौधों की होती है नदियों में लहरों की होती है हज़रत आदम के यौवन का बचपना हज़रत हौवा की युवा मासूमियत कैसी भी! कैसी भी! ऐसा लगता है जैसे तुम चारों तरफ़ से मुझसे लिपटी हुई हो मैं तुम्हारे व्यक्तित्व के मुख में आनंद का स्थायी ग्रास... हूँ मूक।

Ep 774Aadat | Gulzar
आदत | गुलज़ारसाँस लेना भी कैसी आदत हैजिए जाना भी क्या रिवायत हैकोई आहट नहीं बदन में कहींकोई साया नहीं है आँखों मेंपाँव बेहिस हैं चलते जाते हैंइक सफ़र है जो बहता रहता हैकितने बरसों से कितनी सदियों सेजिए जाते हैं जिए जाते हैंआदतें भी अजीब होती हैं

Ep 773Auratein | Shubha
औरतें | शुभाऔरतें मिट्टी के खिलौने बनाती हैंमिट्टी के चूल्हेऔर झाँपी बनाती हैंऔरतें मिट्टी से घर लीपती हैंमिट्टी के रंग के कपड़े पहनती हैंऔर मिट्टी की तरह गहन होती हैंऔरतें इच्छाएँ पैदा करती हैं औरज़मीन में गाड़ देती हैंऔरतों की इच्छाएँबहुत दिनों में फलती हैं

Ep 772Swapn Mein Pita | Ghulam Mohammad Sheikh
स्वप्न में पिता | ग़ुलाम मोहम्मद शेख़बापू, कल तुम फिर से दिखेघर से हज़ारों योजन दूर यहाँ बाल्टिक के किनारेमैं लेटा हूँ यहीं,खाट के पास आकर खड़े आप इस अंजान भूमि परभाइयों में जब सुलह करवाईतब पहना था वही थिगलीदार, मुसा हुआ कोट,दादा गए तब भी शायद आप इसी तरह खड़े होंगेअकेले दादा का झुर्रीदार हाथ पकड़।आप काठियावाड़ छोड़कर कब से यहाँ क्रीमिया केशरणार्थियों के बीच आ बसे?भोगावो छोड़, भादर लाँघरोमन क़िले की कगार चढ़डाकिए का थैला कंधे पर लटकाए आप यहाँ तक चले आए—पीछे तो देखो दौड़ आया है क़ब्रिस्तान!(हर क़ब्रिस्तान में मुझे आपकी ही क़ब्र क्यो दिखाई पड़ती है?)और ये पीछे-पीछे दौड़े आ रहे हैं भाई(क्या झगड़ा अभी निपटा नहीं?)पीछे लकड़ी के सहारेखड़े क्षितिज के चरागाह मेंमोतियाबिंद के बीच मेरी खाट ढूँढ़ती माँ।माँ, मुझे भी नहीं दिखताअब तक हाथ में थावह बचपन यहीं कहींखाट के नीचे टूटकर बिखर गया है।

Ep 771Us Din | Rupam Mishra
उस दिन | रूपम मिश्र उस दिन कितने लोगों से मिली कितनी बातें , कितनी बहसें कींकितना कहा ,कितना सुनासब ज़रूरी भी लगा था पर याद आते रहे थे बस वो पल जितनी देर के लिए तुमसे मिली विदा की बेला में हथेली पे धरे गये ओठ देह में लहर की तरह उठते रहे कदम बस तुम्हारी तरफ उठना चाहते थे और मैं उन्हें धकेलती उस दिन जाने कहाँ -कहाँ भटकती रही वे सारी जगहें मेरी नहीं थीं मेरी जगह मुझसे छूट गयी थीतो बचे हुए रेह से जीवन में क्या रंग भरतीहवा में जैसे राख ही राख उड़ रही थी जिसकी गर्द से मेरी साँसे भरती जा रही थींवहाँ वे भी थे जिनसे मैं अपना दुःख कह सकती थीलेकिन संकोच हुआ साथी वहाँ अपना दुख कहतेजहाँ जीवन का चयन ही दुःख था और वे हँसते-गाते उन्हें गले लगाते चले जा रहे थेजहाँ सुख के कितने दरवाज़े अपने ही हाथों से बंद किये गए थेजहाँ इस साल जानदारी में कितने उत्सव, ब्याह पड़ेंगे का हिसाब नहींकितने अन्याय हुएकितने बेघर हुएऔर कितने निर्दोष जेल गये के दंश को आत्मा में सहेजा जा रहा था फिर भी वियोग की मारी मेरी आत्मा कुछ न कुछ उनसे कह ही लेती पर वे मेरे अपने बंजर नहीं थे किमैं दुःख के बीज फेंकती वहाँ और कोई डाभ न उपजती पर कहाँ उगाते वो मेरे इस गुलाबी दुःख कोजहाँ की धरती पर शहतूती सपने बोये जाते हैंऔर फ़सल काटने का इंतज़ार वहाँ नहीं होता बस पीढ़ियों के हवाले दुःखों की सूची करके अपनी राह चलते जाना होता है ।

Ep 770Manushya | Vimal Chandra Pandey
मनुष्य - विमल चंद्र पाण्डेय मुझे किसी की मृत्यु की कामना से बचना हैचाहे वो कोई भी होचाहे मैं कितने भी क्रोध में होऊँऔर समय कितना भी बुरा होसामने वालामेरा कॉलर पकड़ कर गालियाँ देता हुआक्यों न कर रहा हो मेरी मृत्यु का एलानमुझे उसकी मृत्यु की कामना सेबचना हैयह समय मौतों के लिए मुफ़ीद हैमनुष्यों की अकाल मौत का कोलाज़ रचता हुआफिर भीमैं मरते हुए भी अपनी मनुष्यताबचाए रखना चाहूँगाये मेरा जवाब होगा कि मैं बचाए जाने लायक़ थाकि हम बचाए जाने लायक़ थे!

Ep 769Apne Prem Ke Udveg Mein | Agyeya
अपने प्रेम के उद्वेग में | अज्ञेय अपने प्रेम के उद्वेग में मैं जो कुछ भी तुमसे कहता हूँ, वह सब पहले कहा जा चुका है।तुम्हारे प्रति मैं जो कुछ भी प्रणय-व्यवहार करता हूँ, वह सब भी पहले हो चुका है।तुम्हारे और मेरे बीच में जो कुछ भी घटित होता है उससे एक तीक्ष्ण वेदना-भरी अनुभूति मात्र होती है—कि यह सब पुराना है, बीत चुका है, कि यह अभिनय तुम्हारे ही जीवन में मुझसे अन्य किसी पात्र के साथ हो चुका है!यह प्रेम एकाएक कैसा खोखला और निरर्थक हो जाता है!

Ep 768Tum | Adnan Kafeel Darwesh
तुम | अदनान कफ़ील दरवेशजब जुगनुओं से भर जाती थीदुआरे रखी खाटऔर अम्मा की सबसे लंबी कहानी भीख़त्म हो जाती थीउस वक़्त मैं आकाश की तरफ़ देखताऔर मुझे वहठीक जुगनुओं से भरी खाट लगताकितना सुंदर था बचपनजो झाड़ियों में चू करखो गयामैं धीरे-धीरे बड़ा हुआऔर जवान भीऔर तुम मुझे ऐसे मिलेजैसे बचपन की खोई गेंदमैंने तुम्हें ध्यान से देखामुझे अम्मा की याद आईऔर लंबी कहानियों कीऔर जुगनुओं से भरी खाट कीऔर मेरे पिछले सात जन्मों कीमैंने तुम्हें ध्यान से देखाऔर संसार आईने-सा झिलमिलाया कियाउस दिन मुझे महसूस हुआतुमसे सुंदरदरअसल इस धरती परकुछ भी नहीं था।

Ep 767Prem Ke Prasthan | Anupam Singh
प्रेम के प्रस्थान | अनुपम सिंह सुनो,एक दिन बन्द कमरे से निकलकर हम दोनोंपहाड़ों की ओर चलेंगेया फिर नदियों की ओरनदी के किनारे,जहाँ सरपतों के सफ़ेद फूल खिले हैं।या पहाड़ परजहाँ सफ़ेद बर्फ़ उज्ज्वल हँसी-सी जमी हैदरारों में और शिखरों परकाढेंगे एक दुसरे की पीठ पर रात का गाढ़ा फूलइस बार मैं नहींतुम मेरे बाजुओं पर रखना अपना सिरमैं तुम्हें दूँगी उत्तेजित करने वाला चुम्बनधीरे-धीरे पहाड़ की बर्फ़ पिघलाकर जब लौट रहे होंगे हमतब रेगिस्तानों तक पहुँच चुका होगा पानीसुनो,इस बार की अमावस्या में हमएक दूसरे की आँखों में देर तक देखेंगे अपना चेहराऔर इस कमरे से निकलकर खेतों की ओर चलेंगेहमें कोई नहीं देखेगा अंधेरी रात मेंहाथ पकड़कर दूर तक चलते हुएमैं धान के फूलों के बीच तुम्हें चूमँगीझिर-झिर बरसते पानी के साथफैल जाएगा हमारा तत्त्व खेतों मेंमुझे मेरे भीतरएक आदिम स्त्री की गंध आती है।और मैं तुम्हेंएक आदिम पुरुष की तरह पाना चाहती हूँफिर अगली के अगली बारहम पठारों की तरफ चलेंगेछोटी-छोटी गठीली वनस्पतियों के बीच गाएँगे कोई पुराना गीतजिसे मेरी और तुम्हारी दादी गाती थींखोजेंगे नष्ट होते बीजों को चींटों के बिलों मेंमैं भी गोड़ना चाहती हूँवहाँ की सख्त मिट्टीमैं भी चाहती हूँ लगानापठारी धरती पर एक पेड़सुनो,तुम इस बर लौटोतो हम अपने प्रेम के तरीक़े बदल देंगे।

Ep 766Dhoop Bhi To Barish Hai | Shahanshah Alam
धूप भी तो बारिश है | शहंशाह आलम धूप भी तो बारिश हैबारिश बहती है देह परधूप उतरती है नेह परमेरे संगीतज्ञ ने मुझे बतायाधूप है तो बारिश हैबारिश है तो धूप हैमैंने जिससे प्रेम कियाउसको बतायातुम हो तो ताप और जलदोनों है मेरे अंदर।

Ep 765Jo Ulajhkar Reh Gayi Hai Filon Ke Jaal Mein | Adam Gondvi
जो उलझकर रह गई है फ़ाइलों के जाल में | अदम गोंडवीजो उलझकर रह गई है फ़ाइलों के जाल मेंगाँव तक वह रौशनी आएगी कितने साल मेंबूढ़ा बरगद साक्षी है किस तरह से खो गईरमसुधी की झोंपड़ी सरपंच की चौपाल मेंखेत जो सीलिंग के थे सब चक में शामिल हो गएहमको पट्टे की सनद मिलती भी है तो ताल मेंजिसकी क़ीमत कुछ न हो इस भीड़ के माहौल मेंऐसा सिक्का ढालिए मत जिस्म की टकसाल में

Ep 764Ladai Ke Samachar | Naveen Sagar
लड़ाई के समाचार | नवीन सागरलड़ाई के समाचारदूसरे सारे समाचारों को दबा देते हैंछा जाते हैंशांति के प्रयासों की प्रशंसा करते हुएहम अपनी उत्तेजना मेंमानो चाहते हैंयुद्ध जारी रहे।फिर अटकलों और सरगर्मियों का दौरजिसमेंफिर युद्ध छिड़ने की गुंजाइश दिखती है।युद्ध रोमांचित करता है!ध्वस्त आबादियों के चित्रदेखने का ढंगबाद में शर्मिंदा करता है अकेले में।कैसे हम बचे रहते हैंऔर हमारा विश्वास बचा रहता हैकि हम बचे रहेंगे।

Ep 763Khana Banati Streeyan | Kumar Ambuj
खाना बनाती स्त्रियाँ | कुमार अम्बुजजब वे बुलबुल थीं उन्होंने खाना बनायाफिर हिरणी होकरफिर फूलों की डाली होकरजब नन्ही दूब भी झूम रही थी हवाओं के साथजब सब तरफ़ फैली हुई थी कुनकुनी धूपउन्होंने अपने सपनों को गूँधाहृदयाकाश के तारे तोड़कर डालेभीतर की कलियों का रस मिलायालेकिन आख़िर में उन्हें सुनाई दी थाली फेंकने की आवाज़आपने उन्हें सुंदर कहा तो उन्होंने खाना बनायाऔर डायन कहा तब भीउन्होंने बच्चे को गर्भ में रखकर खाना बनायाफिर बच्चे को गोद में लेकरउन्होंने अपने सपनों के ठीक बीच में खाना बनायातुम्हारे सपनों में भी वे बनाती रहीं खानापहले तन्वंगी थीं तो खाना बनायाफिर बेडौल होकरवे समुद्रों से नहाकर लौटीं तो खाना बनायासितारों को छूकर आईं तब भीउन्होंने कई बार सिर्फ़ एक आलू एक प्याज़ से खाना बनायाऔर कितनी ही बार सिर्फ़ अपने सब्र सेदुखती कमर में चढ़ते बुख़ार मेंबाहर के तूफ़ान मेंभीतर की बाढ़ में उन्होंने खाना बनायाफिर वात्सल्य में भरकरउन्होंने उमगकर खाना बनायाआपने उनसे आधी रात में खाना बनवायाबीस आदमियों का खाना बनवायाज्ञात-अज्ञात स्त्रियों का उदाहरणपेश करते हुए खाना बनवायाकई बार आँखें दिखाकरकई बार लात लगाकरऔर फिर स्त्रियोचित ठहराकरआप चीख़े—उफ़, इतना नमकऔर भूल गए उन आँसुओं कोजो ज़मीन पर गिरने से पहलेगिरते रहे तश्तरियों में, कटोरियों मेंकभी उनका पूरा सप्ताह इस ख़ुशी में गुज़र गयाकि पिछले बुधवार बिना चीख़े-चिल्लाएखा लिया गया था खानाकि परसों दो बार वाह-वाह मिलीउस अतिथि का शुक्रियाजिसने भरपेट खाया और धन्यवाद दियाऔर उसका भी जिसने अभिनय के साथ ही सहीहाथ में कौर लेते ही तारीफ़ कीवे क्लर्क हुईं, अफ़सर हुईंउन्होंने फर्राटेदार दौड़ लगाई और सितार बजायालेकिन हर बार उनके सामने रख दी गई एक ही कसौटीअब वे थकान की चट्टान पर पीस रही हैं चटनीरात की चढ़ाई पर बेल रही हैं रोटियाँउनके गले से, पीठ सेउनके अँधेरों से रिस रहा है पसीनारेले बह निकले हैं पिंडलियों तकऔर वे कह रही हैं यह रोटी लोयह गरम हैउन्हें सुबह की नींद में खाना बनाना पड़ाफिर दुपहर की नींद मेंफिर रात की नींद मेंऔर फिर नींद की नींद में उन्होंने खाना बनायाउनके तलुओं में जमा हो गया है ख़ूनझुकने लगी है रीढ़घुटनों पर दस्तक दे रहा है गठियाआपने शायद ध्यान नहीं दिया हैपिछले कई दिनों से उन्होंनेबैठकर खाना बनाना शुरू कर दिया हैहालाँकि उनसे ठीक तरह से बैठा भी नहीं जाता है।

Ep 762Ek Bahut Hi Tanmay Chuppi | Bhavani Prasad Mishra
एक बहुत ही तन्मय चुप्पी | भवानीप्रसाद मिश्रएक बहुत ही तन्मय चुप्पी ऐसीजो माँ की छाती में लगाकर मुँहचूसती रहती है दूधमुझसे चिपककर पड़ी हैऔर लगता है मुझेयह मेरे जीवन कीलगभग सबसे निविड़ ऐसी घड़ी हैजब मैं दे पा रहा हूँस्वाभाविक और सुख के साथ अपने कोकिसी अनोखे ऐसे सपने कोजो अभी-अभी पैदा हुआ हैऔर जो पी रहा है मुझेअपने साथ-साथजो जी रहा है मुझे!

Ep 761Dena | Naveen Sagar
देना | नवीन सागरजिसने मेरा घर जलायाउसे इतना बड़ा घरदेना कि बाहर निकलने को चलेपर निकल न पाएजिसने मुझे माराउसे सब देनामृत्यु न देनाजिसने मेरी रोटी छीनीउसे रोटियों के समुद्र में फेंकनाऔर तूफ़ान उठानाजिनसे मैं नहीं मिलाउनसे मिलवानामुझे इतनी दूर छोड़ आनाकि बराबर संसार में आता रहूँअगली बारइतना प्रेम देनाकि कह सकूँ प्रेम करता हूँऔर वह मेरे सामने हो।

Ep 760Ek Baar Kaho Tum Meri Ho | Ibn e Insha
इक बार कहो तुम मेरी हो | इब्न-ए-इंशाहम घूम चुके बस्ती बन मेंइक आस की फाँस लिए मन मेंकोई साजन हो कोई प्यारा होकोई दीपक हो, कोई तारा होजब जीवन रात अँधेरी होइक बार कहो तुम मेरी होजब सावन बादल छाए होंजब फागुन फूल खिलाए होंजब चंदा रूप लुटाता होजब सूरज धूप नहाता होया शाम ने बस्ती घेरी होइक बार कहो तुम मेरी होहाँ दिल का दामन फैला हैक्यूँ गोरी का दिल मैला हैहम कब तक पीत के धोके मेंतुम कब तक दूर झरोके मेंकब दीद से दिल को सेरी होइक बार कहो तुम मेरी होक्या झगड़ा सूद ख़सारे काये काज नहीं बंजारे कासब सोना रूपा ले जाएसब दुनिया, दुनिया ले जाएतुम एक मुझे बहुतेरी होइक बार कहो तुम मेरी हो

Ep 759Mere Ekant Ka Pravesh Dwar | Nirmala Putul
मेरे एकांत का प्रवेश-द्वार | निर्मला पुतुलयह कविता नहींमेरे एकांत का प्रवेश-द्वार हैयहीं आकर सुस्ताती हूँ मैंटिकाती हूँ यहीं अपना सिरज़िंदगी की भाग-दौड़ से थक-हारकरजब लौटती हूँ यहाँआहिस्ता से खुलता हैइसके भीतर एक द्वारजिसमें धीरे से प्रवेश करती मैंतलाशती हूँ अपना निजी एकांतयहीं मैं वह होती हूँजिसे होने के लिए मुझेकोई प्रयास नहीं करना पड़तापूरी दुनिया से छिटककरअपनी नाभि से जुड़ती हूँ यहीं!मेरे एकांत में देवता नहीं होतेन ही उनके लिएकोई प्रार्थना होती है मेरे पासदूर तक पसरी रेतजीवन की बाधाएँकुछ स्वप्न औरप्राचीन कथाएँ होती हैंहोती है—एक धुँधली-सी धुनहर देश-काल में जिसेअपनी-अपनी तरह से पकड़तीस्त्रियाँ बाहर आती हैं अपने आपसेमैं कविता नहींशब्दों में ख़ुद को रचते देखती हूँअपनी काया से बाहर खड़ी होकरअपना होना!

Ep 758Lafzon Ka Pul | Nida Fazli
लफ़्ज़ों का पुल | निदा फ़ाज़लीमस्जिद का गुम्बद सूना हैमंदिर की घंटी ख़ामोशजुज़दानों में लिपटे आदर्शों कोदीमक कब की चाट चुकी हैरंगगुलाबीनीलेपीलेकहीं नहीं हैंतुम उस जानिबमैं इस जानिबबीच में मीलों गहरा ग़ारलफ़्ज़ों का पुल टूट चुका हैतुम भी तन्हामैं भी तन्हा

Ep 757Ramayana Mein Mahabharat | Avtar Engill
रामायण में महाभारत | अवतार एनगिलरविवार की सुबहउस औरत नेबड़ी मुश्किल सेपति और बच्चों को जगायाकिसी को ब्रशकिसी को बनियानकिसी को तौलिया थमायाचूल्हे के सामने खड़ीजैसे चौखटे में जड़ीबड़े के लिए लिए परांठेछोटों को ऑमलेट’उनके’ लिए कम नमक वालासासु के लिए नरमससुर के लिए गरमअलग अलग अलगनाश्ते बना रही हैऔर उसकी सासु माँचौपाईयाँ गा रही हैटी-वी. पररामायण आ रही हैउसके कॉमरेड पतिअहिल्या के मुक्ति प्रसंग परभाव विह्वल होते हुएबलिहारी जा रहे हैंऔर छोटे को आवाज़ लगाकरअपना नाश्ताटी. वी. वाले कमरे में मंगवा रहे हैंएकाएकवह औरतरसोई की खिड़की सेलल्लन को देखती हैचिल्लाकर कोसती हैऔर पलक झपकतेकरघी लहराहते हुएउसे जा दबोचती है।हड़बड़ा कर उठते हुएपिताजी को लगता हैकि वे सभीरामायण देखते हुएसो रहे थेसंभवतःमहाभारत के बीज बो रहे थे

Ep 756Tumhare Bagair Ladna | Vihaag Vaibhav
तुम्हारे बग़ैर लड़ना | विभाग वैभव तुम्हारे जाने के बादमैं राह के पत्थर जितना अकेला रहाफिर एक दिन सिसकियों को एक खाली कैसेट में डालकरकिताबों के बीच छिपा दियाबहुत से लोग थे जिन्हें फूलों की ज़रुरत थीमैंने माली का काम कियाकिसी कमज़ोर के खेत का पानीकिसी ने लाठी के दम पर काट लियादोस्तों को जुटाया हड्डियों को चूम लेने वाली सर्दियों की रातों मेंघुटने तक पानी मे खड़ा रहान्याय के लिए विवेक भर अड़ा रहा(एक गेहूँ उगाने के लिए खोलने पड़ते हैं कितने मोर्चे कितना आसान हैख़ारिज कर देना एक वाक्य में पूरा का पूरा जीवन)किसी की ख़ुशी में शामिल हुआतो भूल गया किसमय का पत्थर बरसाती बिजलियों की तरहसीने में चिटकता है इन दिनोंतुम्हारे जाने के बाद भी हिम्मत भर लड़ाऔर थका तो सपने में जाकर रोयापर मेरी तुम!काश आज तुम मुझे सुन लेतीहत्यारों में किया गया हूँ शामिलआतताइयों का दोस्त बताकर किया गया है अट्टहास पीठ पर बढ़ते जाते हैं अभिव्यक्तियों के घावमैं वहाँ हूँ जहाँ से इंसान का दायाँ हाथअपने ही बाएँ हाथ को पहचानने से इनकार करता है।काश आज तुम मुझे सुन लेतींकाश मैं तुम्हें छू सकताजैसे इस दुनिया से बचाती हुईअपने सीने में मुझे छिपाती हईतुम कह देतीं-नहीं, तुम्हारी गर्दन तुम्हारी आवाज़ की क़ीमत नहीं चुकायेगीतुम्हारा 'जन्म एक भयंकर हादसा' नहीं था।

Ep 755Sitaron Se Ulajhta Ja Raha Hun | Firaq Gorakhpuri
सितारों से उलझता जा रहा हूँ | फ़िराक़ गोरखपुरीसितारों से उलझता जा रहा हूँशब-ए-फ़ुरक़त बहुत घबरा रहा हूँयक़ीं ये है हक़ीक़त खुल रही हैगुमाँ ये है कि धोखे खा रहा हूँइन्ही में राज़ हैं गुल-बारियों केमै जो चिंगारियाँ बरसा रहा हूँ तेरे पहलू में क्यों होता है महसूसकि तुझसे दूर होता जा रहा हूँजो उलझी थी कभी आदम के हाथोंवो गुत्थी आज तक सुलझा रहा हूँमोहब्बत अब मोहब्बत हो चली हैतुझे कुछ भूलता-सा जा रहा हूँअजल भी जिनको सुनकर झूमती है वो नग़्मे ज़िन्दगी के गा रहा हूँ ये सन्नाटा है मेरे पाँव की चाप"फ़िराक़" अपनी कुछ आहट पा रहा हूँ

Ep 754Aapke Liye | Ajay Durgyey
आपके लिए | अजय दुर्ज्ञेय आप यहां से जाइये!आप जब मेरी कविताएँ सुनेंगेतो ऐसा लगेगा कि जैसेकोई दशरथ-मांझी पहाड़ परबजा रहा हो हथौडेमैं जब बोलूंगातो आपको लगेगा किमैं आपके कपड़े उतार रहा हूँ औरन केवल उतार रहा हूँ बल्किउन्हीं कपड़ों से अपनी विजय पताका बना रहा हूँमैं जब अपने हक़ की कविता पढ़ंगातो आपको लगेगा किछीन रहा हूँ आपकी गद्दी,छीन रहा हूँ आपका सिंहासन और इसी भय सेगलने लगेगीं आपकी हथेलियाँ, हड्डियाँ...आप शर्म का बुत भी नहीं बन पायेंगेमैं जब कविता पढूँगा तोउसे सुनने के लिए आपको कोसेंगे आपके पुरखेसंभव है कि आपके बच्चे भी आपको गालियाँ दें औरआप रह जाओ बिल्कुल अकेले - एक आत्मस्वीकृति औरएक चुल्लू भर पानी के साथ। मैं जब कविता पढ़ँगातो आपको लगेगा कि आपके चुल्लू में आया वह पानी भी,किसी और के श्रम का फल है। हॉँ! वह है-बस आप समझने में विफल हैं।और इसी बीच- कविताओं को सींच,मैं जब रहूँगा मूक- तब भी आपको लगेगा कि जैसेभरे दरबार, उतर गया है कोई शम्बूक-जो चुप तो है मगर जिसकी आँखों मेंतप है, प्रतिरोध है, अवज्ञा है। और जो बस यही पूछता हैकि वह कौन है? उसका अपराध क्या है? और मैं जब अपना अपराध पूछुँगातो आपको लगेगा कि आपके हाथों में पहना रहा हूँ हथकाड़ियाँऔर श्रीमान! सच तो यह है किआप यहाँ से जाइये या यहीं उपवास करिये यानंगे बदन लेट जाइये या कुछ भी करिये - मगर अब,जब तक यह जाति का पहाड़ रहेगा, किसी रूप में, एक इंच भी-मेरा हथौड़ा नहीं रुकेगा।

Ep 753Jab Teri Samundar Aankhon Mein | Faiz Ahmed Faiz
जब तेरी समुंदर आँखों में | फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ये धूप किनारा शाम ढलेमिलते हैं दोनों वक़्त जहाँजो रात न दिन जो आज न कलपल-भर को अमर पल भर में धुआँइस धूप किनारे पल-दो-पलहोंटों की लपकबाँहों की छनकये मेल हमारा झूठ न सचक्यूँ रार करो क्यूँ दोश धरोकिस कारण झूठी बात करोजब तेरी समुंदर आँखों मेंइस शाम का सूरज डूबेगासुख सोएँगे घर दर वालेऔर राही अपनी रह लेगा

Ep 752Kabhi Kabhi Jeevan Mein | Laxmishankar Vajpeyi
कभी कभी जीवन में ऐसे भी क्षण आये | लक्ष्मीशंकर वाजपेयीकभी कभी जीवन में ऐसे भी कुछ क्षण आयेकहना चाहा पर होठों से बोल नहीं फूटे।महज़ औपचारिकता अक्सर होठों तक आयीरहा अनकहा जो उसको, बस नज़र समझ पायीकभी कभी तो मौन ढल गया जैसे शब्दों मेंऔर शब्द कोशों वाले सब शब्द लगे झूठेकहना चाहा पर होठों से शब्द नही फूटे।जिनसे न था खून का नाता, रिश्तों का बंधनकितना सारा प्यार दे गए कितना अपनापनकभी कभी उन रिश्तों को कुछ नाम न दे पाएजीवन भर जिनकी यादों के अक्स नहीं छूटेकहना चाहा पर होठों से बोल नहीं फूटे।

Ep 751Jagah | Vishwanath Prasad Tiwari
जगह | विश्वनाथ प्रसाद तिवारी खड़े-खड़े मेरे पाँव दुखने लगे थेथोड़ी-सी जगह चाहता था बैठने के लिएकलि को मिल गया थाराजा परीक्षेत का मुकुटमैं बिलबिलाता रहा कोने-अँतरेजगह, हाय जगहसभी बेदखल थे अपनी अपनी जगह सेरेल में मुसाफिरों के लिएगुरुकुलों में वटुकों के लिएशहर में पशुओंआकाश में पक्षियोंसागर में जलचरोंपृथ्वी पर वनस्पतियों के लिएनहीं थी जगहसुई की नोक भर जगह के लिएहुआ था महासमरहासिल हुआ महाप्रस्थाननहीं थी कोई भी चीज़ अपनी जगहजूतों पर जड़े थे हीरेगले में माला नोटों कीपुष्पहार में तक्षक,न धर्म में करुणान मज़हब में ईमानन जंगल में आदिवासीन आदमी में इन्सानराजनीति में नीतिऔर नीति में प्रेमऔर प्रेम में स्वाधीनता के लिएनहीं थी जगहनारद के पीछे दौड़ाविपुल ब्रह्मांड मेंजहाँ जहाँ सुवर्ण थावहाँ-वहाँ कलिऔर जहाँ -जहाँ कलिवहाँ-वहाँनहीं थी जगह।

Ep 750Gar Humne Dil Sanam Ko Diya | Nazeer Akbarabadi
गर हम ने दिल सनम को दिया | नज़ीर अकबराबादीगर हम ने दिल सनम को दिया फिर किसी को क्याइस्लाम छोड़ कुफ़्र लिया फिर किसी को क्याक्या जाने किस के ग़म में हैं आँखें हमारी लालऐ हम ने गो नशा भी पिया फिर किसी को क्याआफी किया है अपने गिरेबाँ को हम ने चाकआफी सिया सिया न सिया फिर किसी को क्याउस बेवफ़ा ने हम को अगर अपने इश्क़ मेंरुस्वा किया ख़राब किया फिर किसी को क्यादुनिया में आ के हम से बुरा या भला 'नज़ीर'जो कुछ कि हो सका सो किया फिर किसी को क्या

Ep 749Jis Ka Koi Intezaar Na Kar Raha Ho | Afzal Ahmed Sayyid
जिस का कोई इंतिज़ार न कर रहा हो/ अफ़ज़ाल अहमद सय्यदजिस का कोई इंतिज़ार न कर रहा होउसे नहीं जाना चाहिएवापसआख़िरी दरवाज़ा बंद होने से पहलेजिस का कोई इंतिज़ार न कर रहा होउसे नहीं फिरना चाहिएबे-क़रारएक ख़ूबसूरत राहदारी मेंजब तक वो वीरान न हो जाएजिस का कोई इंतिज़ार न कर रहा होउसे नहीं जुदा करना चाहिएख़ून-आलूद पाँव सेएक पूरा सफ़रजिस का कोई इंतिज़ार न कर रहा होउसे नहीं मालूम करनी चाहिएफूलों के एक दस्ते की क़ीमतया दिन तारीख़ और वक़्त

Ep 748Ek Lamhe Se Doosre Lamhe Tak | Shaharyar
एक लम्हे से दूसरे लम्हे तक | शहरयारएक आहट अभी दरवाज़े पे लहराई थीएक सरगोशी अभी कानों से टकराई थीएक ख़ुश्बू ने अभी जिस्म को सहलाया थाएक साया अभी कमरे में मिरे आया थाऔर फिर नींद की दीवार के गिरने की सदाऔर फिर चारों तरफ़ तेज़ हवा!!

Ep 747Chidimaar Ne Chidiya Maari | Kedarnath Aggarwal
चिड़ीमार ने चिड़िया मारी | केदारनाथ अग्रवालहे मेरी तुम!चिड़ीमार ने चिड़िया मारी;नन्नी-मुन्नी तड़प गईप्यारी बेचारी।हे मेरी तुम!सहम गई पौधों की सेना,पाहन-पाथर हुए उदास;हवा हाय करठिठकी ठहरी;पीली पड़ी धूप की देही।हे मेरी तुम!अब भी वह चिड़िया ज़िंदा हैमेरे भीतर,नीड़ बनाये मेरे दिल में,सुबुक-सुबुक करचूँ-चूँ करतीचिड़ीमार से डरी-डरी-सी।

Ep 746Gharaunde | Avtar Engel
घरौंदे | अवतार एनगिलसागर किनारेखेलते दो बच्चों नेमिलकर घरौंदे बनाएदेखते-देखतेलहरों के थपेड़े आएउनके घर गिराएऔरभागकर सागर में जा छिपेमाना, कि सदैव ऎसा हुआतो भीकिसी भी सागर केकिसी भी तट परकहीं भीकभी भीबच्चों ने घरौंदे बनाने बन्द नहीं किए

Ep 745Gaveshna | Aakash
गवेषणा | आकाश इस नुमाइश मे ईश्वर खोज रहा हूँ,बच्चों की मानिंद बौराया हुआ,इस दुकान से उस दुकान,उथली रौशनी की परिधि के भीतर,चमकीली भीड़ में घिरे,जहाँ केवल नीरसता और बीरानगी विद्यमान है।इस नुमाइश में,मैं अस्पष्ट अज्ञात लय में चलता हूँ, और घूमकर पाता हूँस्वयं को निहत्था, निराश और पराजित।छान आया हूँ आस्था की चार दीवारी,लाँघ लिए हैं प्रकाश के पर्वत,घूम लिया है ज्ञान की गुफ़ाओं में,कर ली है परिक्रमा बोध के वृक्षों की,और ढूँढ लिया है किताबों-कलाकृतियों में यहाँ तक अनका की पीठ पर बैठ,सातवें आसमान से किया है दृष्टिपात धरा का।किन्तु इस नुमाइश में,ब्रहम किसी ओट में लुका हुआ है,गोचर-अगोचर, जीवन-मृत्यू की सीमा से अत्यंत दूर।यदा-कदा मैं सोचता हूँ, कि इस नुमाइश में क्या होगा मृत्यूपरांत मेरा?तब विचार करने पर मैं पाता हूँ,मैं यहीं इन शब्दों में जीवित रहूँगाअपनी रचनाओं के भीतर साँस लेता रहूँगाठीक उसी तरह जैसे,साँस लेता है ईश्वर मेरे भीतर।

Ep 744Char Aur Panktiyan | Prabhakar Machve
चार और पंक्तियाँ | प्रभाकर माचवेजब दिल ने दिल को जान लियाजब अपना-सा सब मान लियातब ग़ैर-बिराना कौन बचायदि बचा सिर्फ़ तो मौन बचा

Ep 743Naavein | Naresh Saxena
नावें | नरेश सक्सेना नावों ने खिलाए हैं फूल मटमैलेक्या उन्हें याद है कि वे कभी पेड़ बनकर उगी थीं नावें पार उतारती हैंख़ुद नहीं उतरतीं पारनावें धार के बीचों-बीच रहना चाहती हैंतैरने न दे उस उथलेपन को समझती हैं ठीक-ठीकलेकिन तैरने लायक गहराई से ज़्यादा के बारे मेंकुछ भी नहीं जानतीं नावेंबाढ़ उतरने के बाद वे अकसर मिलती हैंछतों या पेड़ों पर चढ़ी हुईं नावें डूबने से डरती हैंभर-भर कर खाली होती रहती हैं नावेंसुनसान तटों पर चुपचापखूँटों से बँधी रहती हैं नावें।

Ep 742Sundariyon | Nilesh Raghuvanshi
सुंदरियों | नीलेश रघुवंशी मत आया करो तुम सम्मान समारोहों मेंतश्तरी, शाल और श्रीफल लेकरदीप प्रज्वलन के समयमत खड़ी रहा करो माचिस और दीया -बाती के संगमंच पर खड़े होकर मत बाँचा करो अभिनंदन पत्रउपस्थिति को अपनी सिर्फ मोहक और दर्शनीय मत बनने दिया करोसुंदरियो,तुम ऐसा करके तो देखोबदल जाएगी ये दुनिया सारी।

Ep 741Nahi Dunga Naam | Nandkishore Acharya
नहीं दूँगा नाम | नंदकिशोर आचार्य नहीं दूँगा तुम्हें कोई नाम।जूही की कली,कलगी बाजरे की छरहरी,या और कुछ।नाम देना पहचान को जड़ करना हैमैं तो तुम्हेंहर बार आविष्कृत करता हूँ।नाम देकर तुम्हे तीसरा नहीं करूँगाक्यों कि तुम सम्पूर्ण मेरी होतुम्हें तुम ही कहूँगाकोई नाम नहीं दूँगा।

Ep 740Rishtedari | Laxmishankar Vajpeyi
रिश्तेदारी | लक्ष्मीशंकर वाजपेयीनहीं, यह भी संभव नहीं होताकि उनके शहर जाकर भीजाया ही न जाय रिश्तेदारों के घरअकसर कुछ एहसान लदे होते हैंउनके बुज़ुर्गों के अपने बुज़ुर्गों परऐसा कुछ न भी हो, तोज़रूरी होता है लोकाचार निभानाकिंतु अकसर खड़ी हो जाती है समस्याकि पत्नी की कुशलक्षेम, बच्चों कीसुचारू पढ़ाई का विवरण दे देनेतथा ’और क्या हाल-चाल हैं‘ का कई-कई बारउत्तर दे देने के बाद,कैसे जारी रखा जाय संवादअकसर बोझिल हो जाते हैंचाय आने के बीच के क्षण,और अकसर देर लगती है चाय आने मेंक्योंकि उधर से भी रिश्तेदारी निभाने के प्रयासप्रकट होते हैं चाय के साथ की सामग्री बनकरचाय के बाद बनती है कुछ राहत की स्थितिकि अब कुछ देर बादमाँगी जा सकती है आज्ञाऔर खाना खाकर जाने की मनुहार परकुछ बहाने बनाकरउठा जा सकता है कुछ औपचारिक संबोधनोंतथा फिर मिलने-जुलनेया चिट्ठी लिखने के वादों के साथ!

Ep 739Abbas Miyan | Neerav
अब्बास मियाँ | नीरव पंद्रह बीघे की खेती अकेले संभालने वाले अब्बास मियाँ हमारे हरवाहे थेहम काका कहते थे उन्हेंहम सुनते बड़े हुए थे काका खानदानीशहनाई वादक थेअपने ज़माने में बहुत मशहूरदूर-दूर तक उनके सुरों की गूंज थीहमारे बाबा भी एक क़िस्सा बताते थेकाशी में काका को एक दफे उस्ताद बिस्मिल्लाह खां के सामनेशहनाई बजाने का मौका मिला थाऔर उस्ताद ने पीठ थपथपाकर कहा था -उसकी बड़ी नेमत है हुनरसंभालनाउसकी नेमत जितनी बड़ी थीउससे बड़ी थी उनकी घर-गृहस्थीऔर घर गृहस्थी से भी बड़ी थी उनकी पुश्तैनी दरिद्रतासो उन्हें रखनी पड़ी अपनी जान से भी प्रियशहनाईऔर करनी पड़ी हरवाहीबाद उसके कछ पुराने शौकिया लोग बुलाते रहे शादी-ब्याह मेंकाका कोशहनाई बजवानेपर एक वक्त के बाद सहालग भी छट गयाहम छोटे थे तब इतना नहीं समझते थेलेकिन काका जब कहतेहमारे साथ ही हमारा ये खानदानी हुनर बिला जाएगातब हम भी उनकी तरह मलाल के किसी अंधेरे में खो जाते थेअच्छे से याद है बाबा का जब देहांत हुआ था काका ने उठाई थी शहनाईऔर माटी जब उठी तब छेड़ा था रागफिर क्या परिचित क्या अपरिचितसबके रूदन को समेट लिया था उन्होंने अपनी शहनाई मेंबादल भी बरसे थे बाबा की शवयात्रा मेंसबसे बड़ी थी उसकी नेमतलेकिन उससे भी बड़ा था कुछऐसी विदाई जिसमें सबकी आँख से पानी बरस रहा थाकाका बजा रहे थेन जाने कौनसा दुख

Ep 738Kya Kaam | Manglesh Dabral
क्या काम | मंगलेश डबरालआप दिखते हैं बहुत उदासआपको इस शहर में क्या कामआपके भीतर भरा है ग़ुस्साआपको इस शहर में क्या कामआप सफलता नहीं चाहतेनहीं चाहते ताक़तजो मिल जाए उसे छोड़ कुछ नहीं माँगतेआपको इस शहर में क्या कामआप तुरंत लपकते नहींऔर न खिलखिल करतेहाथ जेब में डाले चलतेरोज़ रात में पाते ख़ुद को लहूलुहानआपको इस शहर में क्या काम।

Ep 737Mera Aangan Mera Ped | Javed Akhtar
मेरा आँगन, मेरा पेड़ | जावेद अख़्तरमेरा आँगनकितना कुशादा फैला हुआ कितना बड़ा थाजिसमेंमेरे सारे खेलसमा जाते थेऔर आँगन के आगे था वह पेड़कि जो मुझसे काफ़ी ऊँचा थालेकिनमुझको इसका यकीं थाजब मैं बड़ा हो जाऊँगाइस पेड़ की फुनगी भी छू लूँगाबरसों बादमैं घर लौटा हूँदेख रहा हूँये आँगनकितना छोटा हैपेड़ मगर पहले से भी थोड़ा ऊँचा है

Ep 736Balshram | Pawan Sain Masoom
बालश्रम| पवन सैन मासूम छणकु साफ़ कर रहा है चाय के झूठे गिलासइसलिए नहीं कि उसके नन्हें हाथसरलता से पहुँच पा रहे हैं गिलास की तह तकबल्कि इसलिए किउसके घर में भी हों झूठे बर्तनजो चमचमा रहे हैं एक अरसे सेअन्न के अभाव में।दुकिया पहुँचा रहा है चायठेले से दुकानों, चौकों तकइसलिए नहीं कि वह नन्हें पाँवों से तेज़ दौड़ता हैबल्कि इसलिए किउसके शराबी पिता के दौड़ते पाँवों की गतिहो सके कुछ धीमीजो दौड़ते हैं अपनी पत्नी की तरफ़उससे पैसे न मिलने पर पीटने की ख़ातिर।बुझकू धूप अँधेरे कमरे मेंबना रहा है रंग-बिरंगी चूड़ियांइसलिए नहीं कि उसकी छोटी आँखों की तेज़ है रोशनीबल्कि इसलिए किवह माँ-बाप के साये के बिना भीपढ़ा सके मुनिया कोजिससे छँट सके कुटिया का अँधेराऔर उनके काले जीवन मेंघुल सके कुछ खुशियों के रंग।शामली सेठ के यहाँ बना रही है रसोईऔर चमका रही है हवेली,इसलिए नहीं कि वह नौ वर्ष की आयु में हीहो चुकी है घरेलू कार्यों में निपुणबल्कि इसलिए किहवेली में काम करकेवह बचा सके माँ को कोठे के साये सेख़ुद के सपनों को चोटिल करते हुएबचा सके माँ के शरीर को नुचने से।छणकु, दुकिया, बुझकू और शामली ही के जैसेन जाने और कितने बच्चे खप रहे हैंघरों, खेतों, दुकानों और कारखानों में,जो बचा रहे हैं अपने सपनों की कीमत परअपनी छोटी सी दुनिया को।कितने गर्व की बात है येआओ मिलकर बजाते हैं तालियाँइन सबके सम्मान में।हम नपुंसक बन चुके लोगइसके अतिरिक्त कर भी क्या सकते है?