
Pratidin Ek Kavita
1,141 episodes — Page 6 of 23

Ep 893Safar Mein Dhoop To Hogi | Nida Fazli
सफ़र में धूप तो होगी जो चल सको तो चलो | निदा फ़ाज़लीसफ़र में धूप तो होगी जो चल सको तो चलोसभी हैं भीड़ में तुम भी निकल सको तो चलोकिसी के वास्ते राहें कहाँ बदलती हैंतुम अपने आप को ख़ुद ही बदल सको तो चलोयहाँ किसी को कोई रास्ता नहीं देतामुझे गिरा के अगर तुम सँभल सको तो चलोकहीं नहीं कोई सूरज धुआँ धुआँ है फ़ज़ाख़ुद अपने आप से बाहर निकल सको तो चलोयही है ज़िंदगी कुछ ख़्वाब चंद उम्मीदेंइन्हीं खिलौनों से तुम भी बहल सको तो चलो

Ep 892Preeti-Bhaint | Shrikant Verma
प्रीति-भेंट | श्रीकांत वर्माइतने दिनों के बाद अकस्मात मिले तो आँसुओं ने उसके उसे, मेरे मुझेभरमा दिया,आँसू जब थमे तो मैं कुछ और था, वह कुछ और-वह मेरी आँखों में, मैं उसकी आँखों मेंढूँढ़ रहा था शंका, अविश्वास और याचना सेठौर!

Ep 891Havan | Shrikant Verma
हवन | श्रीकांत वर्माचाहता तो बच सकता थामगर कैसे बच सकता थाजो बचेगाकैसे रचेगापहले मैं झुलसाफिर धधकाचिटखने लगाकराह सकता थामगर कैसे कराह सकता थाजो कराहेगाकैसे निबाहेगान यह शहादत थीन यह उत्सर्ग थान यह आत्मपीड़न थान यह सज़ा थीतबक्या था यहकिसी के मत्थे मढ़ सकता थामगर कैसे मढ़ सकता थाजो मढ़ेगा कैसे गढ़ेगा।

Ep 890Tumse Milne Par | Sunil Gangopadhyay
तुमसे मिलने पर | सुनील गंगोपाध्यायअनुवाद : रोहित प्रसाद पथिकतुमसे मिलने परमैं पूछता हूँ :तुम मनुष्य से प्रेम नहीं करते हो,पर देश से क्यों प्रेम करते हो?देश तुम्हें क्या देगा?देश क्या ईश्वर के जैसा है कुछ?तुमसे मिलने परमैं पूछता हूँ :बंदूक़ की गोली ख़रीदने के बादप्राण देने पर देश कहाँ पर होगा?देश क्या जन्म-स्थान की मिट्टी हैया कि काँटेदार तार की सीमा?बस से उतरकरजिसकी तुमने हत्या कीक्या उसका देश नहीं?तुमसे मिलने परमैं पूछता हूँ :तुम किस तरह समझे कि मैं तुम्हारा शत्रु हूँ?किसी प्रश्न का उत्तर न देने परक्या तुम मेरी तरफ़ रायफ़ल घुमाओगे?इस तरह के भीप्रेमहीन देशप्रेमी होते हैं!

Ep 889Amramanjariyon Ki Gandh | Gyanendrapati
आम्र-मंजरियों की गंध | ज्ञानेन्द्रपति आम्र-मंजरियों की गंधबसी रही मेरे घर में तुम्हारे जाने के बादपिछली बारअबके तोतुम्हारे जाने के बादआम्र-मंजरियों की गंध उठने लगी है मुझ से भीनी-भीनी

Ep 888Nahi Dikhegi Ma | Vishwanath Prasad Tiwari
नहीं दिखेगी माँ | विश्वनाथ प्रसाद तिवारी नहीं दिखेगी माँफिर कभी इस रूप मेंभोर होगा भिनुसारचिरैया एक बोलेगीतिलक चढ़ेगा यज्ञोपवीतहोगा कन्यादानबस माँ नहीं होगीपराती गाने के लिएघिरेगी संझाचौखट पर जलेगा दीयाआकाश में उगेंगे चंदामामाबस माँ नहीं होगीउन्हें दूध-भात खिलाने के लिएबरसेंगी रातें आँगन में झमाझमधूप में धू- धू जलेगा गाँवचलेंगी पुरवा और पछुआ हवाएँमृग की आँखों-सी चमकेगी बिजलीउत्तर के आकाश मेंदरवाज़े पर ताज़िया लाएँगे गाँव के लोग फुलझड़ियाँ छोड़ेंगे बच्चेआएगी दीवालीबनेगी अल्पना तुलसी के चौरे परबस माँ नहीं होगीजम का एक दीयाघर के बाहर निकालने के लिएफूल खिलेंगे माँ के लगाए हुए कोले मेंबच्चे स्कूल जाएँगेपीठ पर बस्तेऔर बस्ते में अमावट छिपाए हुएडाकुओं का हल्ला होगा आधी राततनेंगी लाठियाँसियार रोएँगे खेतों मेंआएँगे भरथरी गाने वाले रमता जोगीगाएँगे रानी पिंगला के गीतबस माँ नहीं होगीउन्हें भिक्षा देने के लिएतोता फड़फड़ाएगा पिंजड़े मेंथाली में लड़ेंगी बिल्लियाँदिखेंगे नागपंचमी के साँपदशहरे के नीलकंठक्वार के खंजनबस माँ नहीं दिखेगीफिर कभी इस रूप में ।

Ep 887Ek Fantasy | Dharamvir Bharti
एक फ़ैंटसी | धर्मवीर भारतीसाँझ के झुटपुटे में,जब कि दूर आस्माँ पर एक धुआँ-सा छा रहा था,तारे अकुला रहे थे, चाँद थर्रा रहा थाचोट इतनी गहरी थी,कि बादलों के सीने से ख़ून उबला आ रहा था,पास की पगडंडी सेएक राही कंधों परअपनी ही लाश लादे धीमे-धीमे जा रहा थागीतों के कंकाल झूठे प्यार के मसान में,धधकती चिताओं के पास बैठे गा रहे थे,अपने सूखे हाथों से,अपनी पसलियों को तोड़-तोड़चूर-चूर कर चिताओं पर बिखरा रहे थे!एक जलते मुर्दे नेअपनी जलती उँगलियों सेऊँची-नीची बालू पर इक खींच दी लकीर!और हँस कर बोला :“यह है प्यार की तस्वीर!

Ep 886Bhoolna | Rachit
भूलना | रचितकितना भयावह हैभूलने के बाद सिर्फ़ यह याद रहनाकि कुछ भूल गए हैंउससे भी ज़्यादा पीड़ादायक है यह अनुभूतिकि वह भूला हुआ जब भी याद आएगाहम जान नहीं पाएँगे कियही तो भूले थे किसी उदास दिन।

Ep 885Wahi Nahi Tha Premi | Anupam Singh
वही नहीं था प्रेमी | अनुपम सिंहकिसी दिन तुम पूछोगे मेरे प्रेमियों के नाममैं अपना निजी कहकर टाल जाऊँगीलेकिन प्रेमी वही नहीं थाजिसने कोई वादा किया और निभाया भीजिसके साथ मैं पाई गईसिविल लाइंस के कॉफी हाउस मेंजिसके साथ बहुत सारी कहानियाँ बनींऔर शहर की दीवार पर गाली की तरह चस्पां की गईवह भी था जिसके आगोश मेंजाड़े की आग मुझे पहली बार प्रिय लगीजिसने कोई वादा नहीं कियाऔर स्वप्न टूटने से पहले ही चला गयामैं वह आग हर जाड़े में जलाती हूँवह भी जिसके सम्मुख मैंनेसबसे झीना वस्त्र पहनाफिर धीरे-धीरे उतार दियाजो मुझे नहीं किसी और को प्रेम करता थाऔर अपनी आँखें फेर लींमेरी स्थूल देह से आँख फेरने वाले पुरुष की याद मेंमैं अक्सर अपना वस्त्र उतार देती हूँप्रेमी वही नहीं थाजो देह के सभी संस्तरों से गुज़र फूल-सा खिलाऔर मैं भी आवें-सी दहकीवह भी था जिसे पाने की वेदना में मेरी बाँहैंवल्लरी-सी फैलती चली गईंजो अभी नहीं लौटा हैउसके औचक ही मिलने की आस है।

Ep 884Raat ka Ped | Rahi Masoom Raza
रात का पेड़ | राही मासूम रज़ारास्तेचाँदनी ओढ़ कर सो गएझील पर नींद की सिलवटें पड़ गईंआहटेंपहले पीली पड़ींऔर फिरएक-एक करके सब झड़ गईंरात का पेड़दस्ते-दुआ बन गयाअपनी ही ज़ात सेअपने ही आपके बीच का फ़ासिला बन गयादर्द का रास्ता बन गयाएक बूढ़ापुर-असरार दरवेशजो सैकड़ों हाथ अपने उठाए हुएआसमाँ की तरफ़देखते-देखते थक गयाआसमाँ चुप रहारात के पेड़ के हाथ दुखने लगेफिर वही पेड़वहशत का इक सिलसिला बन गयाक़िस्सा-ए-अहले-दिलक़िस्सा-ए-साहिबाने-वफ़ा बन गयाज़ख़्मों की कोंपलें आ गईंऔर उस पेड़ ने झुक के मुझसे कहा :“सुबह के शौक़ में जागने से बड़ी कोई नेमत नहींअपनी आँखों को तुमसुबह के शौक़ मेंजागने और जगाने की तालीम दो”

Ep 883Saanp | Farhat Ehsaas
साँप | फ़रहत एहसाससाँप लपेटे घूम रहा हूँदुनिया मुझ से ख़ौफ़-ज़दा हैसब मुझ को अच्छे लगते हैंलेकिन यूँ हैजिस लड़की को चाहा मैं नेजिस लड़के को दोस्त बनायाजिस घर में माँ बाप बनाएजिस मस्जिद में घुटने टेकेसब ने मेरा साँप ही देखामुझ को कोई देख न पायामैं सब को कैसे समझाऊँये दुनिया का साँप नहीं हैमेरे साथ पला पोसा हैये मेरा माँ जायाबस मुझ को डसता है

Ep 882Dil Dukhta Hai | Mohsin Naqvi
दिल दुखता है | मोहसिन नक़वीदिल दुखता हैआबाद घरों से दूर कहींजब बंजर बन में आग जलेदिल दुखता हैपरदेस की बोझल राहों मेंजब शाम ढलेदिल दुखता हैजब रात का क़ातिल सन्नाटापुर-हौल फ़ज़ा के वहम लिएक़दमों की चाप के साथ चलेदिल दुखता है

Ep 881Depression | Mohammad Alvi
डिप्रेशन | मोहम्मद अल्वीकोई हादसाकोई सानेहा* कोई बहुत ही बुरी ख़बरअभी कहीं से आएगी!ऐसी जाँ-लेवा फ़िक्रों मेंसारा दिन डूबा रहता हूँरात को सोने से पहलेअपने-आप से कहता हूँभाई मिरेदिन ख़ैर से गुज़राघर में सब आराम से हैंकल की फ़िक्रेंकल के लिए उठा रक्खोमुमकिन हो तोअपने-आप कोमौत की नींद सुला रक्खो!!*अप्रिय घटना

Ep 880Deewar | Zbigniew Herbert | Translation-Agnieszka Kuczkiewicz-Fraś and Kunwar Narayan
दीवार/ ज़्बीग्न्येव हेर्बेर्तअनुवादक आग्नयेष्का कूच्क्येविच-फ़्राश और कुँवर नारायणहम सब दीवार से लगकर खड़े हैं। हमारी जवानी क़ैदियों कीक़मीज़ की तरह उतरवा ली गई हैं। हम प्रतीक्षा कर रहे हैं। एक चिपचिपी गोली गुद्दी पर लगने से पहले दस-बीस वर्ष गुज़र रहे। दीवार ऊँची और मज़बूत है। दीवार के पीछे एक पेड़ है और एक सितारा। पेड़ की जड़ें दीवार के नीचे धँस कर उसे फोड़ रहीं। सितारा पत्थर को एक चूहे की तरह कुतर रहा। सौ-दो सौ साल में एक छोटा-सा झरोखा बन जाएगा।

Ep 879Agni Desh Se Aata Hun Main | Harivansh Rai Bachchan
अग्नि देश से आता हूँ मैं | हरिवंशराय बच्चनअग्नि देश से आता हूँ मैं!झुलस गया तन, झुलस गया मन,झुलस गया कवि-कोमल जीवन,किंतु अग्नि वीणा पर अपने, दग्ध कंठ से गाता हूँ मैं!अग्नि देश से आता हूँ मैं!कंचन ही था जो बच पाया उसे लुटाता मग में आया,दीनों का मैं वेश किए हूँ , दीन नहीं हूँ, दाता हूँ मैं!अग्नि देश से आता हूँ मैं!तुमने अपने कर फैलाए,लेकिन देर बड़ी कर आए,कंचन तो लुटा चुका, पथिक, अब लूटो राख लुटाता हूँ मैं!अग्नि देश से आता हूँ मैं!

Ep 878Pret Lok Mein | Maksim Tank | Translation - Ramesh Kaushik
प्रेत लोक में/ मक्सिम तान्कअनुवाद: रमेश कौशिकएक बार मैंप्रेत-लोक में गयादांते के संगउसके अँधियारे घेरों मेंघूम रहे थे हमतभी कवि रुक गयाअचम्भे में आविश्वास नहीं थाजो कुछ उसने देखापहली बारअँधेरे की वह दुनियादुःख से बोझिलप्रेतों की दुनियाजब देखी थी उसनेतब से अब तकजाने कितनेऔर नए घेरे बन आएजो प्राचीन काल में अनजाने थे।

Ep 877Bura Kshan | Rafael Alberti | Jeetendra Kumar
बुरा क्षण/ रफ़ाइल अलबर्तीअनुवाद : जितेंद्र कुमारउन दिनों जब मैं सोचा करता थाकि गेहूँ के खेतों में देवताओं और सितारों का निवास हैऔर कुहरा हिरनी की आँख का आँसूकिसी ने मेरे सीने और छाया को पोत दियाऐसे में चला गयायह वह क्षण थाजब बंदूक़ की गोलियाँ पगला उठी थींसमुद्र उन लोगों को बहाकर ले गयाजो चिड़िया बनना चाहते थेबेतार संदेश बुरी ख़बरें ही लाते थेख़ून कीऔर उस जल की मृत्यु कीजो सदा से आकांश ताका करता थाअथाह!

Ep 876Bairang Benaam Chithiyaan | Ramdarash Mishra
बैरंग बेनाम चिट्ठियाँ | रामदरश मिश्रकब सेयह बैरंग बेनाम चिट्ठी लिये हुएयह डाकिया दर-दर घूम रहा है कोई नहीं है वारिस इस चिट्ठी काकौन जानेकिसका अनकहा दर्दकिसके नामइस बन्द लिफाफे मेंपत्ते की तरह काँप रहा है?मैंने भी तोएक बैरंग चिट्ठी छोड़ी हैपता नहीं किसके नाम?शायद वह भी इसी तरहसतरों के होंठों में अपने दर्द कसेयहाँ-वहाँ घूम रही होगीमित्रों!हमारी तुम्हारी ये बैरंग लावारिस चिट्टठियाँपरकटे पंछी की तरहकिसी दिन लावारिस जगहों पर और कभी किसी दिनपड़ी-पड़ी फड़फड़ाएँगीकोई अजनबीइन्हें कौतूहलवश उठाकर पढ़ेगातो तड़प उठेगाओह!बहुत दिन पहले किसी नेये चिट्ठियाँशायद मेरे ही नाम लिखी थीं।

Ep 875Jeevan | Malay
जीवन/ मलयअथाह गहराइयों कीआँख सेदेखता हूँ ब्रह्मांडसतह परतैरता यह जीवनछोटे से छोटा है

Ep 874Ichha | Shubha
इच्छा | शुभामैं चाहती हूँ कुछ अव्यवहारिक लोगएक गोष्ठी करेंकि समस्याओं को कैसे बचाया जाएउन्हें जन्म लेने दिया जाएवे अपना पूरा क़द पाएँवे खड़ी होंऔर दिखाई देंउनकी एक भाषा होऔर कोई उन्हें सुने

Ep 873Ishq Mein Referee Nahi Hota | Gulzar
इश्क़ में ‘रेफ़री’ नहीं होता! | गुलज़ारइश्क़ में ‘रेफ़री’ नहीं होता‘फ़ाउल’ होते हैं बेशुमार मगर‘पेनल्टी कॉर्नर’ नहीं मिलता!दोनों टीमें जुनूँ में दौड़ती, दौड़ाए रहती हैंछीना-झपटी भी, धौल-धप्पा भीबात बात पे ‘फ़्री किक’ भी मार लेते हैंऔर दोनों ही ‘गोल’ करते हैं!इश्क़ में जो भी हो वो जाईज़ हैइश्क़ में ‘रेफ़री’ नहीं होता!

Ep 872Unka Ghar | Hemant Deolekar
उनका घर | हेमंत देवलेकर आग बरसाती दोपहर मेंतगारियाँ भर- भर करमाल चढ़ा रहे हैं जो ऊपर घर मेरा बना रहे हैं।जिस छत को भरते हैंअपने हाड़ और पसीने सेवे इसकी छाँव में सुस्ताने कभी नहीं आएंगे इतनी तल्लीनता से एक- एक ईंट कीरेत- मसाले की कर रहे तरीवे इस घर में एक घूँट भर पानी के लियेकभी नहीं आएंगे |दूर छाँव में खड़ेखड़े हो देखता हूँ वे सब पक्षियों की तरह दिन रातजैसे अपना ही घोंसला बनाने में जुटे हुए उनको शुक्रिया कहने का ख़्याल भीमुझे नहीं आएगा ।एक दिनसीमेंट, चूने, गारे से लथपथयूं चले जायेंगे वे जैसे थे ही नहीं ।मुझे तस्सली होगी कि उन्हेंमेहनताना देकर विदा कियालेकिन उनका बहुत-सा उधार इस घर में छूटा रह जाएगा !

Ep 871Prateeksha Mein Prem | Chitra Pawar
प्रतीक्षा में प्रेम | चित्रा पंवारनीलगिरि की पहाड़ीबारह बरस बादनीलकुरिंजी के खिलने पर हीकरती हैअपनी देह का शृंगारवह नहीं जाती चंपा, चमेली, गुलाब के पासअपने यौवन का सौंदर्य माँगनेअयोध्या व उर्मिला के सत को विचलित नहीं करताचौदह साल का चिर वियोगजानती हैं वोएक दिन लौटेंगे रामअनुज लखन के साथपार्वती कई जन्मों तककरती है तपबनाती है ख़ुद को राजकुमारी से अपर्णाअर्धनारीश्वर शिव की प्राण प्रियावैशाख, जेठ की अग्नि में भीजलकर नष्ट नहीं होती धरा की हरितिमाक्योंकि सुन रही है वोपास आते सावन की पदचापजहाँ प्रतीक्षा हैधैर्य हैलौट आने का भरोसा हैविरह की सुखद पीड़ा हैवहीं है प्रेम...

Ep 870Chipche Doodh Se Nahlate Hain | Gulzar
चिपचे दूध से नहलाते हैं आँगन में खड़ा कर के तुम्हें | गुलज़ारचिपचे दूध से नहलाते हैं आँगन में खड़ा कर के तुम्हेंशहद भी, तेल भी, हल्दी भी, न जाने क्या क्याघोल के सर पे लँढाते हैं गिलसियाँ भर के...औरतें गाती हैं जब तीवर सुरों में मिल करपाँव पर पाँव लगाए खड़े रहते हो इक पथराई-सी मुस्कान लिएबुत नहीं हो तो, परेशानी तो होती होगी!जब धुआँ देता, लगाता पुजारीघी जलाता है कई तरह के छोंके देकरइक ज़रा छींक ही दो तुम,तो यक़ीं आए कि सब देख रहे हो!

Ep 869Raat Kisi Ka Ghar Nahi | Rajesh Joshi
रात किसी का घर नहीं | राजेश जोशीरात गए सड़कों पर अक्सर एक न एक आदमी ऐसा ज़रूर मिल जाता हैजो अपने घर का रास्ता भूल गया होता हैकभी-कभी कोई ऐसा भी होता है जो घर का रास्ता तो जानता हैपर अपने घर जाना नहीं चाहताएक बूढ़ा मुझे अक्सर रास्ते में मिल जाता हैकहता है कि उसके लड़कों ने उसे घर से निकाल दिया है।कि उसने पिछले तीन दिन से कुछ नहीं खाया है।लड़कों के बारे में बताते हुए वह अक्सर रुआँसा हो जाता हैऔर अपनी फटी हुई क़मीज़ को उघाड़करमार के निशान दिखाने लगता हैकहता है उसने बचपन में भी अपने बच्चों परकभी हाथ नहीं उठायालेकिन उसके बच्चे उसे हर दिन पीटते हैंकहता है कि वह अब कभी लौटकरअपने घर नहीं जाएगालेकिन थोड़ी देर बाद ही उसे लगता है कि उसने यूँ हीग़ुस्से में बोल दिया था यह वाक़्यअपमान पर हावी होने लगती एक अनिश्चितताएक भय अचानक घिरने लगता है मन मेंथोड़ी देर बाद वह अपने आप से ही हार जाता हैदूसरे ही पल वह कहता हैकि अब इस उम्र में वह कहाँ जा सकता हैवह चाहता है, मैं उसके लड़कों को जाकर समझाऊँकि लड़के उसे वापस घर में आ जाने देंकि वह चुपचाप एक कोने में पड़ा रहेगाकि वह बाज़ार के छोटे-मोटे काम भी कर दिया करेगाबच्चों को स्कूल से लाने ले जाने का काम तोवह करता ही रहा है कई साल सेवह चुप हो जाता है थक कर बैठ जाता हैजैसे ही लगता है कि उसकी बात पूरी हो चुकी हैवह फिर बोल पड़ता है कहता है : मैं बूढ़ा हो गया हूँकभी-कभी चिड़चिड़ा जाता हूँसारी ग़लती लड़कों की ही नहीं हैवे मन के इतने बुरे भी नहीं हैंहालात ही इतने बुरे हैं, उनका भी हाथ तंग रहता हैउनके छोटे-छोटे बच्चे हैं और वो मुझे बहुत प्यार करते हैंमेरा तो पूरा समय उन्हीं के साथ बीत जाता हैफिर अचानक वह खड़ा हो जाता है कहता हैहो सकता है वे मुझे ढूँढ़ रहे होंउनमें से कोई न कोई थोड़ी देर में ही मुझे लिवाने आ जाएगाआप अगर मेरे लड़कों में से किसी को जानते होंतो उससे कुछ मत कहिएगासब ठीक हो जाएगा...सब ठीक हो जाएगा...बुदबुदाते हुए वह आगे चल देता हैरात किसी का घर नहीं होतीकिसी बेघर के लिएकिसी घर से निकाल दिए गए बूढ़े के लिएमेरे जैसे आवारा के लएरात किसी का घर नहीं होतीउसके अँधेरे में आँसू तो छिप सकते हैं कुछ देरलेकिन सिर छिपाने की जगह वह नहीं देतीमैं उस बूढ़े से पूछना चाहता हूँपर पूछ नहीं पाताकि जिस तरफ़ वह जा रहा हैक्या उस तरफ़ उसका घर है?

Ep 868Chipe Raho Bheetar Hi | Nilesh Raghuvanshi
छिपे रहो भीतर ही | नीलेश रघुवंशी फर्स्ट अप्रैल, शनिवार, 2000, आधी रातकुछ-कुछ हो रहा है मुझे, शायद तुम अब आने वाले होसारी दुनिया के बच्चे, सबके सो जाने के बाद ही, क्यों सोचते हैं आने के बारे मेंमेरे एकदम पास, तुम्हारे पापा सोए हुए हैंक्या उन्हें जगाकर बता देना चाहिए कि तुम आने वाले होबहुत गहरी नींद में हैं वो-अभी उनमें एक नन्हा-मुन्ना दिख रहा हैपरी नन्ही-सी या नन्हा-सा राजकुमार, फिर वही बातपूरे नौ महीने एक ही बात, तुम हो कौन सुंदर रहस्यदर्द बढ़ता जा रहा है, समझ नहीं आ रहा कुछतुम्हारे जन्म से पहले का दर्द है या यूँ ही-बस महीने जैसा दर्द हो रहा हैतुम क्यों उत्पात मचा रहे हो, दर्द के साथ-साथ जान निकली जा रही है मेरीओह श्रीराज...दबी-घुटी चीख निकल ही गईअरे रे, श्रीराज तो पसीने-पसीने हो रहे हैं, लगता है बहुत तेज़ बारिश होने वाली हैबिजली कड़के इससे पहले ही छुप जाते हैं हम दोनोंछिपे रहो तुम भी भीतर ही...दीये की लौ की तरह जलते-बुझते-टिमटिमाते दर्द हो रहे हैंये दर्द हैं, या जान लेने का सुंदर सजीव तरीक़ाअस्पताल पहुँच ही गई मैं, आसपास मेरे डॉक्टर्स और नर्सरात साढ़े बारह से शुरू हुई यह यात्रा, शाम के पाँच बजे तकरुकने का नाम ही नहीं ले रहीयह तो नरक है, नरक! जन्म देना, एक यातना से गुज़रना हैयह क्या दे रहे हो तुम अपनी माँ को?आँखें मुँदी जा रही हैं अब एक-एक कर, मेरे आसपास, जो मेरे अपने थे, कमरे में रह गएडॉक्टर्स और नर्सों के साथ लेबर-रूम में जा रही हूँ मैंप्रसवपीड़ा को कोई और नाम देना चाहिएये ये ये...तुम्हारे रोने की आवाज़ सुनाई दीरोने की आवाज़ से मुझे लग रहा है, तुम नन्हे-से बदमाश राजकुमार होइतनी ज़ोर से क्यों रो रहे हो बेटे?अप्रैल फूल बनाया तुमने-दिन शनिवार, शाम छह बजकर उनचास मिनटठीक इसी समय तो शाम आती है अपने घर की छत परमुस्करा रही होगी शाम और सूरज सुस्ता रहा होगा मेरी तरह !

Ep 867Dincharya | Shrikant Verma
दिनचर्या | श्रीकांत वर्माएक अदृश्य टाइपराइटर पर साफ़, सुथरेकाग़ज़-साचढ़ता हुआ दिन,तेज़ी से छपते मकान,घर, मनुष्यऔर पूँछ हिला गली से बाहर आताकोई कुत्ता।एक टाइपराइटर पृथ्वी पररोज़-रोज़छापता हैदिल्ली, बंबई, कलकत्ता।कहीं पर एक पेड़अकस्मात छपकरता है सारा दिनस्याही मेंन घुलने का तप।कहीं पर एक स्त्रीअकस्मात उभरकरती है प्रार्थनाहे ईश्वर! हे ईश्वर!ढले मत उमर।बस के अड्डे परएक चाय की दुकानदिन-भर बुदबुदाती है‘टूटी हुई बेंच परबैठा है उल्लू का पट्ठापहलवान।’जलाशय पर अचानक छप जाता हैमछुए का जालचरकट के कोठे सेउतरती है धूपऔर चढ़ता हैदलाल।एक चिड़चिड़ा बूढ़ा थका क्लर्क ऊबकर छपे हुए शहर कोछोड़ चला जाता है।

Ep 866Badka Bhaiyya | Rupam Mishra
बड़का भइया | रूपम मिश्र बड़का भइया मेरी मझिगवां वाली दीदी के चचेरे भाई हैंउनकी पीढ़ी में सबसे बड़े और पट्टीदारी में सबसे मातिवर दीदी की हर सुंदर बात में बड़का भइया होते हैंजैसे कोई व्यक्ति सुंदर है तो वो ज़रूर बड़का भइया की तरह भभकता है संसार की सारी सौंदर्य उपमायें बड़का भइया के निहोरे पर बनी थी जैसे बड़का भइया का रंग कैसा है एकदम गोर-अंगारऔर आँखें आम की फांकदुनिया की जितनी आदर्श और श्रेठता की कहानियां थी बड़का भइया से जुड़ती थींकोई प्राइमरी पढ़कर कलेक्टर हुआ तो वो ज़रूर बड़का भइया की प्रजाति का होगा ऐसा मेरी दीदी सोचती हैं दीदी के घर तो बड़का भइया सिर्फ वरीक्षा में आये थे पर दीदी की बातों में अक्सर आ जाते हैंदीदी के जीवन की सबसे सुंदर यात्रा है जो छुटपन में बड़का भइया के कांधे पे गोपीगंज का मेला देखा एकबार बीमार थे बड़का भइया जाने क्या हुआ था बरिस बीते ठीक नहीं हो रहे थे दीदी मेरे पास आकर भइया की चर्चा करके रोतींइतनी पवित्र व निःस्वार्थ रूलाई की मैं साथ में रो पड़ती उस अनदेखे आदमी के लिए उसी रूलाई में मैंने सोचा कि पूछूँ कि दीदी आपको बड़का भइया का इतना मोह क्यों लगता है!पर कभी न पूछ सकी ( इतने सजल स्नेह के लिए जैसे उलार लगता ये सवाल) दीदी खूब प्रार्थना करतीं बड़का भइया के लिए और वे लम्बी बीमारी से ठीक हो गये हैंऔर फिर से दीदी की बातों में नायक बने रहते हैं मैंने बड़का भइया को नहीं देखा हैजैसा कि दीदी कहती हैं हमारे बड़का भइया अंधेरे में खड़े हो जायें तो अजोर हो जायेमैं सोचती हूँ अजोर का बखार तो दीदी की आत्मा में है अपनी दुनिया में खोए बड़का भइया को क्या याद है अपनी इस सखी बहन कीक्या उन्हें पता है इसी संसार में कोई स्त्री रहती है कहीं धरती के एक कोने में हरियर माटी की तरह पड़ीजो उनको इतना पवित्र प्रेम करती है।

Ep 865Pyaas | Ramdarash Mishra
प्यास | रामदरश मिश्र खड़ा हूँ नदी के किनारे प्यासा-प्यासाजल के पास होकर भी जल नहीं पी पा रहा हूँमैने पूछा-"तुमने अपने पानी का यह क्या रूप बना दिया है नदी?”नदी दर्द से मुस्कराई, बोली"मैंने क्या किया है आदमीयह तो तुम्हारी ही गंदगी है।जो मुझमें झर-झर कर मुझे विषाक्त कर रही हैअब तो मैं भी अपना जल नहीं पी पातीप्यासी-प्यासी बह रही हूँ ।"

Ep 864Daro | Ghanshyam Kumar Devansh
डरो | घनश्याम कुमार देवांशडरोलेकिन ईश्वर से नहींएक हारे हुए मनुष्य सेसूर्य से नहींआकाश की नदी में पड़े मृत चंद्रमा सेभारी व वज्र कठोर शब्दों से नहींउनसे जो कोमल हैं और रात के तीसरे पहरधीमी आवाज़ में गाए जाते हैंडरोधार और नोक से नहींएक नरम घास के मैदान की विशालताऔर हरियाली सेसाम्राज्य के विराट ललाट से नहींएक वृद्ध की नम निष्कंप आँखों से

Ep 863Jab Dost Ke Pita Marey | Kumar Ambuj
जब दोस्त के पिता मरे | कुमार अम्बुजबारिश हो रही थी जब दोस्त के पिता मरेभीगते हुए निकली शवयात्राबारिश की वजह से नहीं आए ज़्यादा लोगजो कंधा दे रहे थे वे एक तरफ़ से भीग रहे थे कमसबसे पहले बारिश होती थी दोस्त के पिता के शव परदोस्त चल रहा था आगे-आगेनिरीह बेहोशी से भरी डगमगाती हुई थी उसकी चालशमशान में पहुँचकर लगा बारिश में बुझ जाएगी आगकई पुराने लोग थे वहाँ जो कह रहे थेनहीं बुझेगी चिताहम सबने देखा बारिश में दहक रही थी चितालौटने में तितर-बितरहुए लोगदोस्त के कंधे पर हाथ रखे हुए लौटा मैंमुझे नहीं समझ आया क्या कहूँ मैं उससेमुझे तो यह नहीं पता कि कैसा लगता है जब मरते हैं पिताअब जब मर गए दोस्त के पिता तो क्या कहूँ उससेकि बारिश में हिचकी लेता हुआ उसका गीला शरीर न काँपेकौन-सा एक शब्द कहूँ उससे सांत्वना का आखिरयही सोचता रहा देर तकरात को जब घर लौटकर आयाबारिश उसी तरह हो रही थी लगातार।

Ep 862Itvaar | Anup Sethi
इतवार | अनूप सेठीआओ इतवार मनाएँदेर से उठेंचाय पिएँऔर चाय पिएँअख़बार को सिर्फ़ उलट पलट लेंहाथ न लगाएंसिर्फ़ चाय का गिलास घुमाएँकिसी को न बुलाएँनहाना भी छोड़ देंखाना अकेले खाएँबाजार खरीदारी स्थगित कर दें अगले हफ्ते तककेरोसिन ले लें दस रुपए ज़्यादा देकरएक पुरसुकून दोपहर होढीलमढाल पसरे रहेंपुरानी एलबम निकालेंपहली सालगिरह याद करेंबातें करेंबचपन की, कालेज की, नाटक की कविताई कीसारे सपनों की धूल झाड़ेंबिस्तर के इर्द गिर्द बिछा लेंइतवार की शामआँखों में आँखें डाल सो जाएँएक इतवार तो होअपने से बाहर निकलअपने में खो जाएँ।

Ep 861Jitne Sabhya Hotey Hain | Vinod Kumar Shukla
जितने सभ्य होते हैं | विनोद कुमार शुक्लजितने सभ्य होते हैंउतने अस्वाभाविक।आदिवासी जो स्वाभाविक हैंउन्हें हमारी तरह सभ्य होना हैहमारी तरह अस्वाभाविक ।जंगल का चंद्रमाअसभ्य चंद्रमा हैइस बार पूर्णिमा के उजाले मेंआदिवासी खुले में इकट्ठे होने सेडरे हुए हैंऔर पेड़ों के अंधेरे में दुबकेविलाप कर रहे हैंक्योंकि एक हत्यारा शहरबिजली की रोशनी सेजगमगाता हुआसभ्यता के मंच पर बसा हुआ है ।

Ep 860Gumshuda Guldaste | Adnan Kafeel Darwesh
गुमशुदा गुलदस्ते | अदनान कफ़ील दरवेश कुछ पेड़ हैं वहाँपानी की तरह ठोसऔर हवा की तरह नर्मऔर आसमान-से हल्के-गुलाबीफूल उनमें खिलतेकाँटों-से बेशुमारदहकते शोलों-सेदूर से चमकते...कच्चे रास्तेइशारों-से नाज़ुकझुके चले आते मेरी तरफ़जहाँ तुम्हारी यादों केगुमशुदा गुलदस्तेढूँढ़ते हैं मेरे पाँव...इन तुर्श अँधेरों मेंअपनी खोई उम्र को सोचताभटकता हूँजहाँ बर्फ़ से भी तेज़ गल जाती हैं यादें..

Ep 859Pratham Milan | Adnan Kafeel Darwesh
प्रथम मिलन | अदनान कफ़ील दरवेश एक दिन भाषा की चमकीली चप्पल उतार कर आऊँगा तुम से मिलने अपने प्रथम मिलन में मैं अधिक बोलने से परहेज़ करूँगा और अपनी आत्मा का हर बोझ उतार कर तुमसे मिलना चाहूँगा तुम्हारे मन के साँकल को हल्के-हल्के खटखटाउँगा तुम्हारी देह भाषा को पढ़ने के बजाए सुनना ज़्यादा पसंद करूँगा तुम भी वक़्त लेकर आना मुझसे मिलने एक सदी की गूँज हूँ मैं अपने एकांत में मुझे बूझने का भरपूर अवसर देना तुम मैं तुम से धीरे-धीरे मिलूँगा तुम्हारी हथेली से तुम्हारी आँखों तक का सफ़र तय करने में मैं एक सदी लगा देना चाहूँगा

Ep 858Tumhare Baare Mein | Bhawani Prasad Mishra
तुम्हारे बारे में | भवानी प्रसाद मिश्रतुम्हारे बारे में,तुमसे ही कहूँतुम्हें देखकर बढ़ जाती हैमशालों की ज्योतिमोती हो जाता हैज़्यादा पानी दारआभार-सा मानता हैंहर प्रकाश का पुंज कुंज ज़्यादा हरे हो जाते हैं नदी-नद ज़्यादा भरे हो जाते हैंवन हो पाते हैं उन्मनपवन उतना चंचल नहीं रहतासृष्टि का श्रम जिस दिनमेरे हाथ में आयेगामैं हर जगह तुम्हें पेश कर दूँगासारे अविशेषों कोस्पर्श से तुम्हारेसरासर सविशेष कर दूँगा !

Ep 857Swapn Me Bhi Swapn Ke Bahar | Adnan Kafeel Darwesh
स्वप्न में भी स्वप्न के बाहर | अदनान कफ़ील दरवेश सोचो तोघर भी एक गुल्लक है।जिसमें बजते हैंतरल-ठोस दिनखड़-खड़ उदास...कागज़ हैं दीवारेंजिन्हें सोख लिया हैढेर सारे समय का बजता पानीअहाते में हैंइमली और अमरूद के चमकदार दरख़्तदो बुज़ुर्गों की तरह खड़ेशायद बच्चे होंबुत बनेकिसी बरहम हुए खेल के बीचरेहल पर धरा है कलाम-पाकहरे ग़िलाफ़ में बन्दरोककर समय की धारदीवार घड़ीमुँह फेरे टँगी हैअलमारी के थोड़ा-सा ऊपर एक रहस्यमयी ख़ुशबू का झोंकाहवा के साथ उड़ता हुआपास से गुज़र जाता हैरौशनदान से झरती है चाँदनीअचरज की तरहमैं भटकता हूँ मुँह-अँधेरेकिसी और समय मेंचुपचाप...घर एक द्वीप हैसमंदर मेंदूर से चमकताअजगर की गुंजलकों में कसामैं स्वप्न में भीस्वप्न के बाहरबुरी तरह हाँफता...

Ep 856Samaj Unhe Mardana Kehta Hai | Ekta Verma
समाज उन्हें मर्दाना कहता है | एकता वर्मा जो राजाओं के युद्ध से लौटने का इन्तिज़ार नहीं करती उनके पीछे जौहर नहीं करती बल्कि निकलती हैं संतान को पीठ पर बाँध कर तलवार खींच कर रणभूमि में समाज उन्हें मर्दाना कहता है जो थाली में छोड़ी गई जूठन से संतोष नहीं धरती जो अपनी हथेलियों से दरेर कर तोड़ देती हैं भूख के जबड़े जो खाती हैं घर के मर्दों से देवढी ख़ुराक और पीती हैं लोटा भर पानी समाज उन्हें मर्दाना कहता है जिनके व्यक्तित्व में स्त्रीयोचित व्यवहार की बड़ी कमी होती है जिनकी चाल में सिखाई गई सौम्यता नहीं है स्त्रीत्व नहीं बल्कि गुरुत्व के अनुकूल जो धमक कर चलती हैं टाँगें खोल कर पसर कर बैठती हैं जिनके ख़ून की गरमी सारे षड्यंत्रों के बावजूद शेष है समाज उन्हें मर्दाना कहता है जो गरज सकती हैं क्रोध में बरस सकती हैं आशंकाओं से निश्चित जो अपने जंघाओं पर ताब देकर खुलेआम चुनौती दे सकती हैं भरी सभा मूँछें ऐंठ सकती हैं मूँछ दार बेटियाँ जन सकती हैं समाज उन्हें मर्दाना ही कहता है वे मर्दानगी के खूँटे में बंधी सत्ता को उसके नुकीले सींघों के पकड़ कर धोती हैं घर की इकलौती कमाऊ लड़कियों से लेकर प्रदेश की मुख्यमंत्री अथवा देश की प्रधानमन्त्री तक वे सभी औरतें जो नायिकाओं की तरह सापेक्षताओं में नहीं अपितु एक नायक की भाँति जीती हैं केन्द्रीय भूमिकाओं में यह समाज यह देश मर्दाना ही कहता है

Ep 855Churchgate Ka Platform | Anup Sethi
चर्चगेट का प्लेट्फॉर्म | अनूप सेठीशाम के समय जब प्लेटफॉर्म बहुत व्यस्त होता हैढलती धूप के चौकोर टुकड़ेपैरों से खचाखच भरते जाते हैंरीत जाते हैं फिर भर जाते हैंदीवारों पर लगे बड़े पँखों की हवा मेंसाँस लेने पसीना सुखानेकिसी का इंतज़ार करने कोरुक जाते हैं कई लोगदो-दो मिनट में लोगों का रेला आता हैदनदनाता धकियाताछूता आसपासगुजर जाता हैजैसे टयूब वैल का बंबाछूटता है रुक रुक करकलकल करता सिहराता जज़्ब हो जाता हैखेतों की मिट्टी के रग रेशे मेंबहुत सारे पैरों कोप्लेटफॉर्म की रोशनी के हवाले करधूप चली जाएगी मैरीन ड्राइव की तरफ़समुद्र में उतर जाएगा सूरजनई दुनिया की टोह लेतादो-दो मिनट में लोगों का रेलादिन भर के काम से थकाट्रेनों में ठुँस कर निकल जाएगाघरों की दूसरी दुनिया कोट्यूब वेल के बंबे का छलछलाता पानीमिट्टी के रग रेशे में जान डालता हैठंडी ताज़ी महक सी उठती हैपसीने में रची हुईबड़े पँखों की हवा के नीचेबेहद व्यस्त प्लेटफॉर्मबहुत सारे शोर मेंउम्मीद की आहट देता हैचर्चगेट बहुत सुन्दर दिखता है।

Ep 854Deh | Devi Prasad Mishra
देह | देवी प्रसाद मिश्रदेह प्रेम के काम आती है।वह यातना देने और सहने के काम आती है।पीटने में जला देने मेंआत्मा को तबाह करने के लिये कई बार राज्य और धर्मदेह को अधीन बनाते हैंबाज़ार भी करता है यह कामवह देह को इतना सजावटी बना देता है किउसे सामान बना देता हैबहुत दुःख की तुलना मेंबहुत सुख से ख़त्म होती है आत्मा

Ep 853Ilahabad | Satyam Tiwari | Satyam Tiwari
इलाहबाद | सत्यम तिवारी तय तो यही हुआ था घोर असहमति के साथ जब भी वर्षा होगी हम यात्रा पर निकलेंगे असबाब उतना ही रहेगा जितना एक नाव पर सिमट आए भटकाव की सहूलत मिलेगी और निरपराध की भावना फिर भी कैसे तुमने मेरे रेतीले अस्तित्व को पग पग पर भास्काया जैसे रेत से घर नहीं बन सकता जैसे हम चाहते भी तो उसमें रह नहीं पाते तब से लेकर अब तक न जाने कितनी बरसातें बीतीं इलाहबाद डूबता रहा आकंठ और सिर्फ़ नूह का जहाज़ बचता रहा दुबारा तुम्हें मैंने कोसने के क्रम में ढूँढा तुम्हें नहीं पाता तो किसके आगे पटकता थाली हाथ नहीं फैलाता तो कैसे दिखलाता कि पीने के लिए पानी नहीं है खाने के लिए सत्तू करने के लिए याद

Ep 852Todna Aur Banana | Priyadarshan
तोड़ना और बनाना | प्रियदर्शनबनाने में कुछ जाता हैनष्ट करने में नहींबनाने में मेहनत लगती है. बुद्धि लगती है, वक्त लगता हैतोड़ने में बस थोड़ी सी ताकतऔर थोड़े से मंसूबे लगते हैं।इसके बावजूद बनाने वाले तोड़ने वालों पर भारी पड़ते हैंवे बनाते हुए जितना हांफते नहीं,उससे कहीं ज़्यादा तोड़ने वाले हांफते हैं।कभी किसी बनाने वाले के चेहरे पर थकान नहीं दिखतीपसीना दिखता है, लेकिन मुस्कुराता हुआ,खरोंच दिखती है, लेकिन बदन को सुंदर बनाती है। लेकिन कभी किसी तोड़ने वाले का चेहराआपने ध्यान से देखा है?वह एक हांफता, पसीने से तर-बतर बदहवास चेहरा होता हैजिसमें सारी दुनिया से जितनी नफरत भरी होती है,उससे कहीं ज़्यादा अपने आप से।असल में तोड़ने वालों को पता नहीं चलताकि वे सबसे पहले अपने-आप को तोड़ते हैंजबकि बनाने वाले कुछ बनाने से पहले अपने-आप को बनाते हैं।दरअसल यही वजह है कि बनाने का मुश्किल काम चलता रहता हैतोड़ने का आसान काम दम तोड़ देता है।तोड़ने वालों ने बहुत सारी मूर्तियां तोड़ीं, जलाने वालों ने बहुत सारी किताबें जलाईंलेकिन बुद्ध फिर भी बचे रहे, ईसा का सलीब बचा रहा, कालिदार और होमर बचे रहे।अगर तोड़ दी गई चीज़ों की सूची बनाएं तो बहुत लंबी निकलती हैदिल से आह निकलती है कि कितनी सारी चीज़ें खत्म होती चली गईं-कितने सारे पुस्तकालय जल गए, कितनी सारी इमारतें ध्वस्त हो गईं,कितनी सारी सभ्यताएं नष्ट कर दी गईं, कितने सारे मूल्य विस्मृत हो गएलेकिन इस हताशा से बड़ी है यह सच्चाईकि फिर भी चीज़ें बची रहींबनाने वालों के हाथ लगातार रचते रहे कुछ न कुछनई इमारतें, नई सभ्यताएं, नए बुत, नए सलीब, नई कविताएंऔर दुनिया में टूटी हुई चीज़ों को फिर से बनाने का सिलसिला।ये दुनिया जैसी भी हो, इसमें जितने भी तोड़ने वाले हों,इसे बनाने वाले बार-बार बनाते रहेंगेऔर बार-बार बताते रहेंगेकि तोड़ना चाहे जितना भी आसान हो, फिर भी बनाने की कोशिश के आगे हार जाता है।

Ep 851Prashn | Kunwar Narayan
प्रश्न | कुँवार नारायणतारों की अंध गलियों में गूँजता हुआ उद्दंड उपहास... वह मेरा प्रश्न हैविशाल आडंबर,अभी चुभती दृष्टि की गर्म खोज में मैंने प्रश्नाहत जिस विराट हिमपुरुष कोगलते हुए देखा...क्या वह तेरा उत्तर था?

Ep 850Mom Ka Ghoda | Dushyant Kumar
मोम का घोड़ा | दुष्यंत कुमारमैने यह मोम का घोड़ा,बड़े जतन से जोड़ा,रक्त की बूँदों से पालकरसपनों में ढालकरबड़ा किया,फिर इसमें प्यास और स्पंदनगायन और क्रंदनसब कुछ भर दिया,औ’ जब विश्वास हो गया पूराअपने सृजन पर,तब इसे लाकरआँगन में खड़ा किया!माँ ने देखा—बिगड़ीं;बाबूजी गरम हुए;किंतु समय गुज़रा...फिर नरम हुए।सोचा होगा—लड़का है,ऐसे ही स्वाँग रचा करता है।मुझे भरोसा था मेरा है,मेरे काम आएगा।बिगड़ी बनाएगा।किंतु यह घोड़ाकायर था थोड़ा,लोगों को देखकर बिदका, चौंका,मैंने बड़ी मुश्किल से रोका।और फिर हुआ यहसमय गुज़रा, वर्ष बीते,सोच कर मन में—हारे या जीते,मैने यह मोम का घोड़ा,तुम्हें बुलाने कोअग्नि की दिशाओं को छोड़ा।किंतु जैसे ये बढ़ाइसकी पीठ पर पड़ाआकरलपलपाती लपटों का कोड़ा,तब पिघल गया घोड़ाऔर मोम मेरे सब सपनों पर फैल गया!

Ep 849Ant Mein | Sarveshwar Dayal Saxena
अन्त में | सर्वेश्वरदयाल सक्सेनाअब मैं कुछ कहना नहीं चाहता,सुनना चाहता हूँएक समर्थ सच्ची आवाज़यदि कहीं हो।अन्यथाइसके पूर्व किमेरा हर कथनहर मंथनहर अभिव्यक्तिशून्य से टकराकर फिर वापस लौट आए,उस अनंत मौन में समा जाना चाहता हूँजो मृत्यु है।‘वह बिना कहे मर गया’यह अधिक गौरवशाली हैयह कहे जाने से—‘कि वह मरने के पहलेकुछ कह रहा थाजिसे किसी ने सुना नहीं।’

Ep 848Dhoomil Ki Antim Kavita | Dhoomil
धूमिल की अंतिम कविता | धूमिलशब्द किस तरहकविता बनते हैंइसे देखोअक्षरों के बीच गिरे हुएआदमी को पढ़ोक्या तुमने सुना कि यहलोहे की आवाज़ है यामिट्टी में गिरे हुए ख़ूनका रंगलोहे का स्वादलोहार से मत पूछोउस घोड़े से पूछोजिसके मुँह में लगाम है।

Ep 847Jaane Kis Kiska Khayal Aaya Hai | Dushyant Kumar
जाने किस-किसका ख़्याल आया है | दुष्यंत कुमारजाने किस—किसका ख़्याल आया हैइस समंदर में उबाल आया हैएक बच्चा था हवा का झोंकासाफ़ पानी को खंगाल आया हैएक ढेला तो वहीं अटका थाएक तू और उछाल आया हैकल तो निकला था बहुत सज-धज केआज लौटा तो निढाल आया हैये नज़र है कि कोई मौसम हैये सबा है कि बवाल आया हैइस अँधेरे में दिया रखना थातू उजाले में बाल आया हैहमने सोचा था जवाब आएगाएक बेहूदा सवाल आया है

Ep 846Shahadat | Sunil Jha
शहादत | सुनील झाफूल, रास्तेभीड़नज़ारे सारेतुम्हारे लिएऔर, तुम हो कि चुप हो...न सलामन दुआऐसे भी कोई घर आता है भला!

Ep 845Amarta | Devi Prasad Mishra
अमरता | देवी प्रसाद मिश्रबहुत हुआ तो मैं बीस साल बाद मर जाऊँगामेरी कविताएँ कितने साल बाद मरेंगी कहा नहीं जा सकता हो सकता है वे मेरे मरने के पहले ही मर जाएँ और तानाशाहों के नाम इसलिए अमर रहें किउन्होंने नियन्त्रण के कितने ही तरीके ईज़ाद किएमैंने भी कुछ उपाय खोजे मसलन यह किआदमी तक पहुँचने का टिकट किस खड़की से लिया जाएएक भुला दिया गया कवि बहुत याद किए जाते शासक से बेहतर होता हैऔर अमरता की अनन्तता एक जीवन से बड़ी नहीं होती

Ep 844Vasantsena | Shrikant Verma
वसंतसेना | श्रीकांत वर्मासीढ़ियाँ चढ़ रही हैवसंतसेनाअभी तुम न समझोगीवसंतसेनाअभी तुम युवा होसीढ़ियाँ समाप्त नहींहोतीउन्नति की होंअथवाअवनति कीआगमन की होंयाप्रस्थान कीअथवाअवसान कीअथवाअभिमान कीअभी तुम नसमझोगीवसंतसेनान सीढ़ियाँचढ़नाआसान हैनसीढ़ियाँउतरनाजिन सीढ़ियों परचढ़ते हैं, हम,उन्हीं सीढ़ियों सेउतरते हैं, हमनिर्लिप्त हैं सीढ़ियाँ,कौन चढ़ रहा हैकौन उतर रहा हैचढ़ता उतर रहायाउतरता चढ़ रहा हैकितनी चढ़ चुकेकितनी उतरना हैसीढ़ियाँ न गिनती हैंन सुनती हैंवसंतसेना।