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Pratidin Ek Kavita

Pratidin Ek Kavita

1,140 episodes — Page 4 of 23

Ep 991Dil Mein Hardam Chubhne Wala | Madhav Kaushik

दिल में हर दम चुभने वाला । माधव कौशिक दिल में हर दम चुभने वाला काँटा सही सलामत देआँखें दे या मत दे लेकिन सपना सही सलामत देहमें तो युद्ध आतंक भूख से मारी धरती बख़्शी हैआने वाली पीढ़ी को तो दुनिया सही सलामत देदावा है मैं इक दिन उस को दरिया कर के छोड़ूँगाखुली हथेली पर आँसू का क़तरा सही सलामत देबच्चे भी अब खेल रहे हैं ख़तरनाक हथियारों सेबचपन की बग़िया को कोई गुड़िया सही सलामत देआधी और अधूरी हसरत कब तक ज़िंदा रक्खेंगेकाग़ज़ पर ही दे लेकिन घर का नक़्शा सही सलामत देभीड़ भरी महफ़िल में सबकी अलग अलग पहचान तो हो इसीलिए हर एक इंसान को चेहरा सही सलामत दे दिल में हर दम चुभने वाला काँटा सही सलामत देआँखें दे या मत दे लेकिन सपना सही सलामत दे

Dec 18, 20254 min

Ep 992Itni Si Azadi | Rupam Mishra

इतनी सी आज़ादी । रूपम मिश्रचाहती हूँ जब घर-दुवार के सब कामों से छूटूँ तो हर साँझ तुम्हें फोन करूँतुमसे बातें करूँ देश - दुनिया की सेवार- जवार बदलने और न बदलने की पेड़ पौधों के नाम से जानी जाती जगहों की तुमसे ही शोक कर लेती उस दुःख का कि पाट दिए गये गाँव के सभी कुवें ,गड़हे साथी और ढेरवातर पर अब कोई ढेरा का पेड़ नहीं है अब तो चीन्ह में भी नहीं बची बसऊ के बाग और मालदहवा की अमराई की राह में चाहकर भी अब कोई नहीं छहाँता मौजे, पुरवे विरान लगते हैं उनका हेल-मेल अब बस सुधियों में बचा हैनाली और रास्ते को लेकर मचे गंवई रेन्हे कीअबकी खूब सऊखे अनार के फूलों की तितलियाँ कभी -कभी आँगन में भी आ जाती हैं इस अचरज कीगिलहरी , फुदगुईया और एक जोड़ा बुलबुल आँगन में रोज़ आते हैं कपड़े डालने का तार उनका प्रिय अड्डा हैकुछ नहीं तो जैसे ये कि आज बड़ा चटक घाम हुआ थाऔर कल अंजोरिया बताशे जैसी छिटकी थी तुममें ही नहीं समाती तुम्हारी हँसी की या अपने मिठाई-प्रेम की तुम्हारे बढ़ते ही जा रहे वजन की जिसकी झूठी चिंता तुम मुझसे गाहे-बगाहे करते रहते होऔर बताती कि नहीं होते हमारे घरों में ऐसे बुजुर्ग कि दिल टूटने पर जिनकी गोद में सिर डाल कर रोया जा सके और जीवन में घटे प्रेम से इंस्टाग्राम पर हुए प्रेम का ताप ज़रा भी कम नहीं होता साथी , इस सच की याद दिलाती तुम्हें कार्तिक में जुते खेतों के सौंदर्य की अभिसरित माटी में उतरे पियरहूँ रंग कीऔर बार - बार तुमसे पूछती तुम्हें याद है धरती पर फूल खिलने के दिन आ गये हैं इतना ही मिलना हमारे लिए बड़ा सुख होता इतनी सी आज़ादी के लिए हम तरसते हैं और सब कहते हैं अब और कितनी आज़ादी चाहिए ।

Dec 17, 20253 min

Ep 990Apna Abhinay Itna Accha Karta Hun | Naveen Sagar

अपना अभिनय इतना अच्छा करता हूँ । नवीन सागरघर से बाहर निकलाफिर अपने बाहर निकल करअपने पीछे-पीछे चलने लगापीछे मैं इतने फ़ासले पर छूटता रहाकि ओझल होने से पहले दिख जाता थाएक दिनघर लौटने के रास्ते में ओझल हो गयाओझल के पीछे कहाँ जाताघर लौट आयादीवारें धुँधली पड़ कर झुक-सी गईंसीढ़ियाँ नीचे से ऊपरऊपर से नीचे होने लगींपर वह घर नहीं लौटाघर से बाहर निकलाफिर मुझसे बाहर निकल कर चला गयामैं आईने में देखता हूँवह आईने में से मुझे नहीं देखतामैं बार-बार लौटता हूँपर वह नहीं लौटताघर में किसी को शक नहीं हैमूक चीज़ें जानती हैं पर मुझसे पूछती नहीं हैंकि वहकहाँ गया और तुम कौन हो!अपना अभिनय इतना अच्छा करता हूँकि हूबहू लगता हूँदरवाज़े खुल जाते हैं -नींद के नीम अँधेरे चलचित्र में जागा हुआसूने बिस्तर पर सोता हूँ।

Dec 16, 20252 min

Ep 989Kona | Priya Johri 'Muktipriya'

कोना । प्रिया जोहरी 'मुक्तिप्रिया’वोकोना थामेरे जीवन का,एक गहरा,सकरा,फिर भी विस्तृत-इतना कि उसमेंपूरा जीवन समा जाए।समा जाएँमेरी हर तकलीफ,हर रंज,हर तंज।उस कोने में बैठकरलिख सकती हूँअनगिनत प्रेम-पत्र,पढ़ सकती हूँमन की दो किताबें,तोड़ सकती हूँकई गुलाब,और गूँथ सकती हूँएक फूलों की माला।महसूस कर सकती हूँनदी का तेज,ताज़ी हवा का हर झोंका।देख सकती हूँ.हथेली पर रखाएक सफेद मोती,जो किसी चमत्कार साचमकता है।सजा सकती हूँबालों मेंगुलमोहर की लट,महक सकती हूँएक अनछुईखुशबू सी।खिल सकती हूँयूँ जैसेअभी-अभीकोई ताज़ा कमलखिला हो।

Dec 15, 20251 min

Ep 988Theek Hai Khud Ko Hum Badalte Hain | Jaun Elia

ठीक है ख़ुद को हम बदलते हैं। जौन एलियाठीक है ख़ुद को हम बदलते हैंशुक्रिया मश्वरत का चलते हैंहो रहा हूँ मैं किस तरह बरबाददेखने वाले हाथ मलते हैंहै वो जान अब हर एक महफ़िल कीहम भी अब घर से कम निकलते हैंक्या तकल्लुफ़ करें ये कहने मेंजो भी ख़ुश है हम उस से जलते हैंहै उसे दूर का सफ़र दर-पेशहम सँभाले नहीं सँभलते हैंतुम बनो रंग तुम बनो ख़ुश्बूहम तो अपने सुख़न में ढलते हैंमैं उसी तरह तो बहलता हूँऔर सब जिस तरह बहलते हैंहै अजब फ़ैसले का सहरा भीचल न पड़िए तो पाँव जलते हैं

Dec 14, 20252 min

Ep 987Log Pagdandiyan Banayenge | Lakshmishankar Vajpeyi

लोग पगडंडियाँ बनाएँगें। लक्ष्मीशंकर वाजपेयी रास्ते जब नज़र न आएँगेलोग पगडंडियाँ बनाएँगे।खुश न हो कर्ज़ के उजालों सेये अँधेरे भी साथ लाएँगे।ख़ौफ़ सारे ग्रहों पे है कि वहाँआदमी बस्तियाँ बसाएँगे।सुनते-सुनते गुज़र गई सदियाँमुल्क़ से अब अँधेरे जाएँगे।जीत डालेंगे सारी दुनिया कोवे जो अपने को जीत पाएँगे।दूध बेशक पिलाएँ साँपों कोउनसे लेकिन ज़हर ही पाएँगे।

Dec 13, 20252 min

Ep 986Jeevan Ki Jai | Maithlisharan Gupt

जीवन की जय। मैथिलीशरण गुप्तमृषा मृत्यु का भय है,जीवन की ही जय है।जीवन ही जड़ जमा रहा है,निज नव वैभव कमा रहा है,पिता-पुत्र में समा रहा है,यह आत्मा अक्षय है,जीवन की ही जय है!नया जन्म ही जग पाता है,मरण मूढ़-सा रह जाता है,एक बीज सौ उपजाता है,स्रष्टा बड़ा सदय है,जीवन की ही जय है।जीवन पर सौ बार मरूँ मैं,क्या इस धन को गाड़ धरूँ मैं,यदि न उचित उपयोग करूँ मैं,तो फिर महा प्रलय है,जीवन की ही जय है।

Dec 12, 20252 min

Ep 985Prayashchit | Hemant Deolekar

प्रायश्चित । हेमंत देवलेकरइस दुनिया मेंआने-जाने के लिएअगर एक ही रास्ता होताऔर नज़र चुराकरबच निकलने के हज़ार रास्तेहम निकाल नहीं पातेतो वही एकमात्र रास्ताहमारा प्रायश्चित होताऔर ज़िन्दगी में लौटने कानैतिक साहस भी

Dec 11, 20251 min

Ep 984Vardaan Mangunga Nahi | Shivmangal Singh Suman

वरदान माँगूँगा नहीं। शिवमंगल सिंह ‘सुमन’यह हार एक विराम हैजीवन महासंग्राम हैतिल-तिल मिटूँगा पर दया की भीख मैं लूँगा नहीं ।वरदान माँगूँगा नहीं ।।स्‍मृति सुखद प्रहरों के लिएअपने खण्डहरों के लिएयह जान लो मैं विश्‍व की सम्पत्ति चाहूँगा नहीं ।वरदान माँगूँगा नहीं ।।क्‍या हार में क्‍या जीत मेंकिंचित नहीं भयभीत मैंसंघर्ष पथ पर जो मिले यह भी सही वह भी सही ।वरदान माँगूँगा नहीं ।।लघुता न अब मेरी छुओतुम हो महान बने रहोअपने हृदय की वेदना मैं व्‍यर्थ त्‍यागूँगा नहीं ।वरदान माँगूँगा नहीं ।।चाहे हृदय को ताप दोचाहे मुझे अभिशाप दोकुछ भी करो कर्त्तव्य पथ से किन्तु भागूँगा नहीं ।वरदान माँगूँगा नहीं ।।

Dec 10, 20252 min

Ep 983Aao Jal Bhare Bartan Mein | Raghuvir Sahay

आओ, जल-भरे बरतन में । रघुवीर सहायआओ, जल-भरे बरतन में झाँकेंसाँस से पानी में डोल उठेंगी दोनों छायाएँचौंककर हम अलग-अलग हो जाएँगेजैसे अब, तब भी न मिलाएँगे आँखें, आओपैठी हुई शीतल जल में छाया साथ-साथ भीगेझुके हुए ऊपर दिल की धड़कन-सी काँपेकरती हुई इंगित कभी हाँ के, कभी ना केआओ जल-भरे बरतन में झाँके

Dec 9, 20251 min

Ep 982Aurat Ko Chahiye Thi | Adiba Khanum

औरत को चाहिए थी महज़ एक जेब। अदीबा ख़ानमऔरत को चाहिए थी महज़ एक जेबउसमें चन्द खनकते सिक्केजिनके के बल पर आज़ाद करने थेकुछ ऐसे पंछीजो पीढ़ी दर पीढ़ीकिसी महान षडयंत्र के तहतहोते आए थे क़ैद चाभियाँ पल्लू में बाँधनहीं भाता उन्हें रानियों का स्वाँगउन चाभियों ने बन्द कर रखे हैंकई क़ीमती संदूकजिनमें बन्द हैंख़ुद रानियाँ हीधूल फाँक रहीं गहनों कीकिसी हीरे किसी मोती की चमकनहीं कर रही उनके जीवन में उजालाउजाले के लिए उन्हेंनिकलना होगा इन क़ीमती संदूकों से बाहररगड़ने होंगे तलवे जलती मिट्टी परक्योंकिइस रगड़ से ही बनते हैंरोशन सिक्केजिनकी चमक से बदल जाता हैंउस आदमी का लहज़ा जो कहता हैकि घर में पड़ी औरत मुफ़्त तोड़ती है रोटियाँदरअसल तुमने थमा दी औरत को चाभियाँबना दिया उन्हें रानीयांकेवल इसलिएकि तुम्हेंऔरत के पैर की रगड़ से निकलेसिक्कों से डर लगता हैकि तुम्हें औरत की जेब से डर लगता है।

Dec 8, 20253 min

Ep 981Andhere Ke Din | Laxmishankar Vajpeyi

अँधेरे के दिन । लक्ष्मीशंकर वाजपेयीबदल गए हैं अँधेरों के दिनअब वे नहीं निकलतेसहमे, ठिठके, चुपके-चुपके रात के वक्तवे दिन-दहाड़े घूमते हैं बस्ती मेंसीना ताने,कहकहे लगातेनहीं डरते उजालों सेबल्कि उजाले ही सहम जाते हैं इनसेअकसर वे धमकाते भी हैं उजालों कोबदल गए हैं अँधेरों के दिन।

Dec 7, 20251 min

Ep 980Koi Ummeed Bar Nahi Aati | Mirza Ghalib

कोई उम्मीद बर नहीं आती। मिर्ज़ा ग़ालिबकोई उम्मीद बर नहीं आतीकोई सूरत नज़र नहीं आतीमौत का एक दिन मुअ'य्यन हैनींद क्यूँ रात भर नहीं आतीआगे आती थी हाल-ए-दिल पे हँसीअब किसी बात पर नहीं आतीजानता हूँ सवाब-ए-ताअत-ओ-ज़ोहदपर तबीअत इधर नहीं आतीहै कुछ ऐसी ही बात जो चुप हूँवर्ना क्या बात कर नहीं आतीक्यूँ न चीख़ूँ कि याद करते हैंमेरी आवाज़ गर नहीं आतीदाग़-ए-दिल गर नज़र नहीं आताबू भी ऐ चारा-गर नहीं आतीहम वहाँ हैं जहाँ से हम को भीकुछ हमारी ख़बर नहीं आतीमरते हैं आरज़ू में मरने कीमौत आती है पर नहीं आतीका'बा किस मुँह से जाओगे 'ग़ालिब'शर्म तुम को मगर नहीं आती

Dec 6, 20252 min

Ep 979Ityaadi | Rajesh Joshi

इत्यादि - राजेश जोशीकुछ लोगों के नामो का उल्लेख किया गया था जिनके ओहदे थेबाकी सब इत्यादि थेइत्यादि तादात में हमेशा ही ज़्यादा होते थेइत्यादि भाव ताव कर के सब्जी खरीदते थे और खाना वाना खा करख़ास लोगों के भाषण सुनने जाते थेइत्यादि हर गोष्ठी में उपस्थिति बढ़ाते थेइत्यादि जुलूस में जाते थे तख्तियां उठाते थे नारे लगाते थेइत्यादि लम्बी लाइनों में लग कर मतदान करते थेउन्हें लगातार ऐसा भ्रम दिया गया था कि वो हीइस लोकतंत्र में सरकार बनाते थेइत्यादि हमेशा ही आन्दोलनों में शामिल होते थेइसलिए कभी कभी पुलिस की गोली से मार दिए जाते थे।जब वे पुलिस की गोली से मार दिए जाते थेतब उनके वो नाम भी हमें बतलाये जाते थेजो स्कूल में भरती करवाते समय रखे गए थेया जिससे उनमे से कुछ पगार पाते थेकुछ तो ऐसी दुर्घटना में भी इत्यादि रह जाते थे।इत्यादि यूँ तो हर जोखिम से डरते थेलेकिन कभी - कभी जब वो डरना छोड़ देते थेतो बाकी सब उनसे डरने लगते थे।इत्यादि ही करने को वो सारे काम करते थेजिनसे देश और दुनिया चलती थीहालाँकि उन्हें ऐसा लगता था कि वो ये सारे कामसिर्फ़ अपना परिवार चलाने को करते हैंइत्यादि हर जगह शामिल थे पर उनके नाम कहीं भीशामिल नहीं हो पाते थे।इत्यादि बस कुछ सिरफिरे कवियों की कविता मेंअक्सर दिख जाते थे।

Dec 5, 20252 min

Ep 978Baat Ki Baat | Shivmangal Singh Suman

बात की बात । शिवमंगल सिंह ‘सुमन’इस जीवन में बैठे ठाले ऐसे भी क्षण आ जाते हैंजब हम अपने से ही अपनी बीती कहने लग जाते हैं।तन खोया-खोया-सा लगता मन उर्वर-सा हो जाता हैकुछ खोया-सा मिल जाता है कुछ मिला हुआ खो जाता है।लगता; सुख-दुख की स्मृतियों के कुछ बिखरे तार बुना डालूँयों ही सूने में अंतर के कुछ भाव-अभाव सुना डालूँकवि की अपनी सीमाऍं है कहता जितना कह पाता हैकितना भी कह डाले, लेकिन-अनकहा अधिक रह जाता हैयों ही चलते-फिरते मन में बेचैनी सी क्यों उठती है?बसती बस्ती के बीच सदा सपनों की दुनिया लुटती हैजो भी आया था जीवन में यदि चला गया तो रोना क्या?ढलती दुनिया के दानों में सुधियों के तार पिरोना क्या?जीवन में काम हज़ारों हैं मन रम जाए तो क्या कहना!दौड़-धूप के बीच एक-क्षण, थम जाए तो क्या कहना!कुछ खाली खाली होगा ही जिसमें निश्वास समाया थाउससे ही सारा झगड़ा है जिसने विश्वास चुराया थाफिर भी सूनापन साथ रहा तो गति दूनी करनी होगीसाँचे के तीव्र-विवर्तन से मन की पूनी भरनी होगीजो भी अभाव भरना होगा चलते-चलते भर जाएगापथ में गुनने बैठूँगा तो जीना दूभर हो जाएगा।

Dec 4, 20254 min

Ep 977Bhookhmari Ki Zad Mein Hai... | Adam Gondvi

भुखमरी की ज़द में है या दार के साये में है। अदम गोंडवीभुखमरी की ज़द में है या दार के साये में हैअहले हिंदुस्तान अब तलवार के साये में हैछा गई है ज़ेहन की पर्तों पे मायूसी की धूपआदमी गिरती हुई दीवार के साये में हैबेबसी का इक समंदर दूर तक फैला हुआऔर कश्ती काग़ज़ी पतवार के साये में हैहम फ़क़ीरों की न पूछो मुतमइन वो भी नहींजो तुम्हारी गेसुए-ख़मदार के साये में है

Dec 3, 20251 min

Ep 976Sabse Acchi Kavita | Vishnu Nagar

विष्णु नागर । सबसे अच्छी कविता सबसे अच्छी कविताइतनी विनम्र होगी कि अविश्वसनीय लगेगीइतनी प्राकृतिक होगी कि हिन्दी लगेगी इतने दुखों में काम आएगी कि लिखी हुई नहीं लगेगी सबसे अच्छी कवितासबसे बुरे दिनों में याद आएगी उसे जो कंठ गाएगा मीठा लगेगासबसे अच्छी कविता विकल कर देगी मुक्ति के लिएसबसे अच्छी कविता सबसे अच्छी बंदूक़ का सबसे बुरा झगड़ा साबित होगीसबसे अच्छी कविता सबसे बुरे दिनों में पहचानी जाएगी देखते -देखते आग में बदल जाएगी

Dec 2, 20251 min

Ep 975Main Phool | Gopaldas Neeraj

मैं फूल । गोपालदास "नीरज"निर्जन की नीरव डाली का मैं फूल !कल अधरों मेंमुस्कान लिए आया था,मन में अगणितअरमान लिए आया था,पर आज झर गयाखिलने से पहले ही,साथी हैं बसतन से लिपटे दो शूल !निर्जन की नीरव डाली का मैं फूल !

Dec 1, 20251 min

Ep 974Tanhai | Shahryar

तन्हाई । शहरयारअँधेरी रात की इस रहगुज़र परहमारे साथ कोई और भी थाउफ़ुक़* (क्षितिज) की सम्त* (दिशा) वो भी तक रहा थाउसे भी कुछ दिखाई दे रहा थाउसे भी कुछ सुनाई दे रहा थामगर ये रात ढलने पर हुआ क्याहमारे साथ अब कोई नहीं है

Nov 30, 20251 min

Ep 973Shabd Aur Arth Ek Beech | Gayatribala Panda

शब्द और अर्थ के बीच। गायत्रीबाला पंडाशब्द और अर्थ के बीचएक नारी ही बदल जाती हैलंबे इंतज़ार में।ख़ुद को कोड़ती हैबीज बोती हैअनाज उपजाती हैधरती को सदाबहार बनाती हैऔर जीवनभरकिसी न किसी की छाया में बैठकरएक इंसान बनने कीअथक प्रतीक्षा करती है।

Nov 29, 20251 min

Ep 972Ankhein Dekhkar | Gorakh Pandey

आँखें देखकर । गोरख पांडेयये आँखें हैं तुम्हारीतकलीफ़ का उमड़ता हुआ समुंदरइस दुनिया कोजितनी जल्दी होबदल देना चाहिए।

Nov 28, 20251 min

Ep 971Vidroh Karo Vidroh Karo | Shivmangal Singh Suman

विद्रोह करो, विद्रोह करो। शिवमंगल सिंह 'सुमन'आओ वीरोचित कर्म करोमानव हो कुछ तो शर्म करोयों कब तक सहते जाओगे, इस परवशता के जीवन सेविद्रोह करो, विद्रोह करो।जिसने निज स्वार्थ सदा साधाजिसने सीमाओं में बाँधाआओ उससे, उसकी निर्मित जगती के अणु-अणु कण-कण सेविद्रोह करो, विद्रोह करो।मनमानी सहना हमें नहींपशु बनकर रहना हमें नहींविधि के मत्थे पर भाग्य पटक, इस नियति नटी की उलझन सेविद्रोह करो, विद्रोह करो।विप्लव गायन गाना होगासुख स्वर्ग यहाँ लाना होगाअपने ही पौरुष के बल पर, जर्जर जीवन के क्रंदन सेविद्रोह करो, विद्रोह करो।क्या जीवन व्यर्थ गँवाना हैकायरता पशु का बाना हैइस निरुत्साह मुर्दा दिल से, अपने तन से, अपने तन से

Nov 27, 20252 min

Ep 970Mujhe Ab Darr Nahi Lagta | Mohsin Naqvi

मुझे अब डर नहीं लगता | मोहसिन नक़वीकिसी के दूर जाने सेतअ'ल्लुक़ टूट जाने सेकिसी के मान जाने सेकिसी के रूठ जाने सेमुझे अब डर नहीं लगताकिसी को आज़माने सेकिसी के आज़माने सेकिसी को याद रखने सेकिसी को भूल जाने सेमुझे अब डर नहीं लगताकिसी को छोड़ देने सेकिसी के छोड़ जाने सेना शम्अ' को जलाने सेना शम्अ' को बुझाने सेमुझे अब डर नहीं लगताअकेले मुस्कुराने सेकभी आँसू बहाने सेना इस सारे ज़माने सेहक़ीक़त से फ़साने सेमुझे अब डर नहीं लगताकिसी की ना-रसाई* से (*पहुंच न होना)किसी की पारसाई* से (*साधुता)किसी की बेवफ़ाई सेकिसी दुख इंतिहाई सेमुझे अब डर नहीं लगताना तो इस पार रहने सेना तो उस पार रहने सेना अपनी ज़िंदगानी सेना इक दिन मौत आने सेमुझे अब डर नहीं लगता

Nov 26, 20252 min

Ep 969Purana Ghar | Gobind Prasad

पुराना घर। गोबिंद प्रसादपुराना घरइतना पुरानाकि कभी पुराना नहीं होताकविता की उस किताब की तरहपंक्तियों के बीचठहरे हुए किसी अनबीते की तरहमन में बसा रहता है यह पुराना घरपुराना घरआज भी कितना नया हैइन आँखों मेंऔर आँखें ख़ुद कितनी नई हैंघर के इस पुरानेपन को देखने के लिएइसे कौन जानता हैसिवा पुराने घर के...।

Nov 25, 20251 min

Ep 968Dukh | Priyankshi Mohan

दुख | प्रियाँक्षी मोहनपिताओं के दुखमाँओं के दुखों सेमुख़्तलिफ़ होते हैं।वे कभी भी प्रत्यक्षरूप से नहीं दिखतेवे चूहों से झाँकते हैंअधजली सिगरेटों सेखूटियों पर टंगी हुईथकी कमीज़ों से,पुरानी ऐनकों से,और बिजली व जलविभाग के निरंतरबह रहे बिलों से

Nov 24, 20251 min

Ep 967Phoole Kadamb | Nagarjun

फूले कदंब । नागार्जुनफूले कदंबटहनी-टहनी में कंदुक सम झूले कदंबफूले कदंब।सावन बीताबादल का कोप नहीं रीताजाने कब से तू बरस रहाललचाई आँखों से नाहकजाने कब से तू तरस रहामन कहता है,छू ले कदंबफूले कदंबफूले कदंब।

Nov 23, 20251 min

Ep 966Nafi | Kishwar Naheed

नफ़ी | किश्वर नाहीदमैं थी आईना फ़रोश* (विक्रेता)कोह-ए-उम्मीद* (आशा का पहाड़) के दामन मेंअकेली थी ज़ियाँ* (नुक़्सान) कोशिशसुरय्या की थी हम-दोशमुझे हर रोज़ हमा-वक़्त* (हर समय) थी बस अपनी ख़बरमैं थी ख़ुद अपने में मदहोशमैं वो तन्हा थीजिसे पैर मिलाने का सलीक़ा भी न थामैं वो ख़ुद-बीं* (आत्म-मुग्ध) थीजिसे अपने हर इक रुख़ से मोहब्बत थी बहुतमैं वो ख़ुद-सर* (अवज्ञाकारी) थीजिसे हाँ के उजालों से बहुत नफ़रत थीमैं ने फिर क़त्ल किया ख़ुद कोपिया अपना लहू हँसती रहीलोग कहते हैं हँसी ऐसी सुनी तक भी नहीं

Nov 22, 20251 min

Ep 965Ma | Srinaresh Mehta

माँ । श्रीनरेश मेहतामैं नहीं जानताक्योंकि नहीं देखा है कभी—पर, जो भीजहाँ भी लीपता होता हैगोबर के घर-आँगन,जो भीजहाँ भी प्रतिदिन दुआरे बनाता होता हैआटे-कुंकुम से अल्पना,जो भीजहाँ भी लोहे की कड़ाही में छौंकता होता हैमेथी की भाजी,जो भीजहाँ भी चिंता भरी आँखें लिए निहारता होता हैदूर तक का पथ -वही,हाँ, वही है माँ!!

Nov 21, 20251 min

Ep 964Raat Yun Dil Mein | Faiz Ahmed Faiz

रात यूँ दिल में तिरी खोई हुई याद आई | फ़ैज़ अहमद फ़ैज़रात यूँ दिल में तिरी खोई हुई याद आईजैसे वीराने में चुपके से बहार आ जाएजैसे सहराओं में हौले से चले बाद-ए-नसीमजैसे बीमार को बे-वज्ह क़रार आ जाए

Nov 20, 20251 min

Ep 963Nritya Aur Parikathayein | Anwesha Rai 'Mandakini'

नृत्य और परिकथाएँ | अन्वेषा राय 'मंदाकिनी'मेरे पाँव,बचपन से थिरकते रहे,किसी अनजान सवालिया धुन पर...मैं बढ़ती रही.. नाचती रही..मेरे जीवन का उद्देश्य यह खोज भर रहाकि मेरे इस जीवन संगीत का उद्गम कहाँ है ??मेरा यह कारवाँ जारी रहा...हर रोज़ मेरे पग उस संगीत की खोज मेंनृत्य करते चले गए !!मैं शायद नहीं जानती हूँकि जीवन के किस रोज़मेरा परी-कथाओं सेविश्वास का नाता जुड़ गया!परी-राजकुमार को लाँघकरमैं एक दिन इन कहानियों को हीअपना सर्वस्व दे बैठी,और मेरी कहानियों नेशंका का लेशमात्र भी ताप नहीं सहा !शायद कहानियों की किताबें भीये जानती थीकि हर विश्वास कि कीमतएक राजकुमार नहीं होता !!मेरा नृत्य सबने देखा,परिकथाएँ सुनाते वक्तमेरी आँखों की चमक भीसबको लुभाती रही...मगर हे प्रियतम,तुम्हारे सम्मुख मेरे यह पाँवमेरे काबू में नहीं रहे...एक दिन अचानक नाचते हुए यह रुक गएकि मेरी खोज पूरी हो चुकी थी,मेरे जीवन संगीत के स्त्रोतअब यह तुम्हारी धुन पर थिरकेंगेमृत्यु के पूर्व कभी ना रुकने के लिए..मेरे आँखों की यह चमकप्रेमाश्रु बन बह चुकी हैतुम्हारी हथेलियों मे...लोग कहते हैं कि मेरी आँखें बोलती हैं -"विश्वास की भाषा"कहती हैं किेतुम इनको खालीपन से कभी नहीं भरोगे !!

Nov 19, 20252 min

Ep 962Main Aur Main | Saqi Farooqi

मैं और मैं! | साक़ी फ़ारुक़ीमैं हूँ मैंवो जिस की आँखों में जीते जागते दर्द हैंदर्द कि जिन की हम-राही में दिल रौशन हैदिल जिस से मैं ने इक दिन इक अहद (प्रतिज्ञा) किया थाअहद कि दोनों एक ही आग में जलते रहेंगेआग कि जिस में जल कर जिस्म हुआ ख़ाकिस्तर (राख)जिस्म कि जिस के कच्चे ज़ख़्म बहुत दुखते थेज़ख़्म कि जिन का मरहम वक़्त के पास नहीं हैवक़्त कि जिस की ज़द में सारे सय्यारे हैंसय्यारे (ग्रह) जो क़ाएम हैं अपनी ही कशिश परऔर कशिश के ताने-बाने टूट चले हैंकौन तमाशाई है? मैं हूँ ... और तमाशामैं हूँ मैं!

Nov 18, 20251 min

Ep 961Thakur Ka Kuan | Omprakash Valmiki

ठाकुर का कुआँ। ओमप्रकाश वाल्मीकिचूल्हा मिट्टी कामिट्टी तालाब कीतालाब ठाकुर का।भूख रोटी कीरोटी बाजरे कीबाजरा खेत काखेत ठाकुर का।बैल ठाकुर काहल ठाकुर काहल की मूठ पर हथेली अपनीफ़सल ठाकुर की।कुआँ ठाकुर कापानी ठाकुर काखेत-खलिहान ठाकुर केगली-मुहल्ले ठाकुर केफिर अपना क्या?गाँव?शहर?देश?

Nov 17, 20251 min

Ep 960Surya Aur Sapne | Champa Vaid

सूर्य और सपने।चंपा वैदसूर्य अस्त हो रहा हैपहली बारइस मंज़िल परखड़ी वह देखती हैबादलों कोजो टकटकी लगादेखते हैंसूर्य के गोले कोयह गोला आगलगा जाता है उसके अंदरकह जाता हैकल फिर आऊँगापूछूँगा क्या सपने देखे?

Nov 16, 20251 min

Ep 959Kya Hum Sab Kuch Jaante Hain? | Kunwar Narayan

क्या हम सब कुछ जानते हैं । कुँवर नारायणक्या हम सब कुछ जानते हैंएक-दूसरे के बारे मेंक्या कुछ भी छिपा नहीं होता हमारे बीचकुछ घृणित या मूल्यवानजिन्हें शब्द व्यक्त नहीं कर पातेजो एक अकथ वेदना में जीता और मरता हैजो शब्दित होता बहुत बादजब हम नहीं होतेएक-दूसरे के सामनेऔर एक की अनुपस्थिति विकल उठती हैदूसरे के लिए।जिसे जिया उसे सोचता हूँजिसे सोचा उसे दोहराता हूँइस तरह अस्तित्व में आता पुनःजो विस्मृति में चला गया थाजिसकी अवधि अधिक से अधिकसौ साल है।एक शिला-खंड परदो तिथियाँबीच की यशगाथाएँहमारी सामूहिक स्मृतियों मेंसंचित हैं।कभी-कभी मिल जाती हैंइस संचय मेंव्यक्ति की आकांक्षाएँऔर विवशताएँतब जी उठता हैदो तिथियों के बीच का वृत्तांत।

Nov 15, 20252 min

Ep 958Nishabd Bhasha Mein | Navin Sagar

निःशब्द भाषा में। नवीन सागरकुछ न कुछ चाहता है बच्चाबनानाएक शब्द बनाना चाहता है बच्चानयाशब्द वह बना रहा होता है किउसके शब्द को हिला देती है भाषाबच्चा निःशब्दभाषा में चला जाता हैक्या उसे याद आएगा शब्दस्मृति में हिलाजब वह रंगमंच पर जाएगाबरसों बादभाषा में ढूँढ़ता अपना सचकौंधेगा वह क्या एक बार!बनाएगा कुछ याचला जाएगा बना-बनायादीर्घ नेपथ्य मेंबच्चाकि जो चाहता हैबनानाअभी कुछ न कुछ।

Nov 14, 20251 min

Ep 957Bechain Cheel | Muktibodh

बेचैन चील। गजानन माधव मुक्तिबोधबेचैन चील!!उस-जैसा मैं पर्यटनशीलप्यासा-प्यासा,देखता रहूँगा एक दमकती हुई झीलया पानी का कोरा झाँसाजिसकी सफ़ेद चिलचिलाहटों में है अजीबइनकार एक सूना!!

Nov 13, 20251 min

Ep 956Matlab Hai | Parag Pawan

मतलब है | पराग पावनमतलब है सब कुछ पा लेने की लहुलुहान कोशिशों का थकी हुई प्रतिभाओं और उपलब्धियों के लिए तुम्हारी उदासीनता का गहरा मतलब है जिस पृथ्वी पर एक दूब के उगने के हज़ार कारण हों तुम्हें लगता है तुम्हारी इच्छाएँ यूँ ही मर गईं एक रोज़मर्रा की दुर्घटना में

Nov 12, 20251 min

Ep 955Lai Taal | Kailash Vajpeyi

लयताल।कैलाश वाजपेयीकुछ मत चाहोदर्द बढ़ेगाऊबो और उदास रहो।आगे पीछेएक अनिश्चयएक अनीहा, एक वहमटूट बिखरने वाले मन केलिए व्यर्थ है कोई क्रमचक्राकार अंगार उगलतेपथरीले आकाश तलेकुछ मत चाहो दर्द बढ़ेगाऊबो औरउदास रहोयह अनुर्वरा पितृभूमि हैधूपझलकती है पानीखोज रही खोखलीसीपियों मेंचाँदी हर नादानी।ये जन्मांध दिशाएँ देंआवाज़तुम्हें इससे पहलेरहने दोविदेह ये सपनेबुझी व्यथा को आग न दोतम के मरुस्थल में तुममणि से अपनीयों अलगाएजैसे आग लगे आँगन मेंबच्चा सोया रह जाएअब जब अनस्तित्व की दूरीनाप चुकीं असफलताएँयही विसर्जन कर दोयह क्षणगहरे डूबो साँस न लोकुछ मत चाहोदर्द बढ़ेगाऊबो औरउदास रहो

Nov 11, 20252 min

Ep 954Kalkatta Ke Ek Tram Mein Madhubani Painting | Gyanendrapati

कलकत्ता के एक ट्राम में मधुबनी पेंटिंग।ज्ञानेन्द्रपतिअपनी कटोरियों के रंग उँड़ेलतेशहर आए हैं ये गाँव के फूलधीर पदों से शहर आई हैसुदूर मिथिला की सिया सुकुमारीहाथ वाटिका में सखियों संग गूँथावरमालजानकी !पहचान गया तुम्हें मेंयहाँ इस दस बजे की भभक:भीड़ मेंअपनी बाँहें अपनी जेबें सँभालतापहचान गया तुम्हें मैं कि जैसे मेरे गाँव की बिटियाआँगन से निकलपार कर नदी-नगरआई इस महानगर मेंरोज़ी -रोटी के महासमर में

Nov 10, 20251 min

Ep 953Ghar Mein Waapsi | Dhoomil

घर में वापसी । धूमिलमेरे घर में पाँच जोड़ी आँखें हैंमाँ की आँखें पड़ाव से पहले हीतीर्थ-यात्रा की बस केदो पंचर पहिए हैं।पिता की आँखें—लोहसाँय की ठंडी सलाख़ें हैंबेटी की आँखें मंदिर में दीवट परजलते घी केदो दिए हैं।पत्नी की आँखें आँखें नहींहाथ हैं, जो मुझे थामे हुए हैंवैसे हम स्वजन हैं, क़रीब हैंबीच की दीवार के दोनों ओरक्योंकि हम पेशेवर ग़रीब हैं।रिश्ते हैं; लेकिन खुलते नहीं हैंऔर हम अपने ख़ून में इतना भी लोहानहीं पाते,कि हम उससे एक ताली बनवातेऔर भाषा के भुन्ना-सी ताले को खोलतेरिश्तों को सोचते हुएआपस में प्यार से बोलते,कहते कि ये पिता हैं,यह प्यारी माँ है, यह मेरी बेटी हैपत्नी को थोड़ा अलगकरते - तू मेरीहमसफ़र है,हम थोड़ा जोखिम उठातेदीवार पर हाथ रखते और कहतेयह मेरा घर है।

Nov 9, 20252 min

Ep 952Ramz | Jaun Elia

रम्ज़ । जौन एलियातुम जब आओगी तो खोया हुआ पाओगी मुझेमेरी तन्हाई में ख़्वाबों के सिवा कुछ भी नहींमेरे कमरे को सजाने की तमन्ना है तुम्हेंमेरे कमरे में किताबों के सिवा कुछ भी नहींइन किताबों ने बड़ा ज़ुल्म किया है मुझ परइन में इक रम्ज़ है जिस रम्ज़ का मारा हुआ ज़ेहनमुज़्दा-ए-इशरत-ए-अंजाम नहीं पा सकताज़िंदगी में कभी आराम नहीं पा सकता

Nov 8, 20251 min

Ep 951Baat Karni Mujhe Mushkil | Bahadur Shah Zafar

बात करनी मुझे मुश्किल । बहादुर शाह ज़फ़रबात करनी मुझे मुश्किल कभी ऐसी तो न थीजैसी अब है तिरी महफ़िल कभी ऐसी तो न थीले गया छीन के कौन आज तिरा सब्र ओ क़रारबे-क़रारी तुझे ऐ दिल कभी ऐसी तो न थीउस की आँखों ने ख़ुदा जाने किया क्या जादूकि तबीअ'त मिरी माइल कभी ऐसी तो न थीअब की जो राह-ए-मोहब्बत में उठाई तकलीफ़सख़्त होती हमें मंज़िल कभी ऐसी तो न थीचश्म-ए-क़ातिल मिरी दुश्मन थी हमेशा लेकिनजैसी अब हो गई क़ातिल कभी ऐसी तो न थीक्या सबब तू जो बिगड़ता है 'ज़फ़र' से हर बारख़ू तिरी हूर-शमाइल कभी ऐसी तो न थी

Nov 7, 20252 min

Ep 950Bahut Door Ka Ek Gaon | Dheeraj

बहुत दूर का एक गाँव | धीरज कोई भी बहुत दूर का एक गाँव एक भूरा पहाड़बच्चा भूरा और बूढ़ा पहाड़साँझ को लौटती भेड़और दूर से लौटती शामरात से पहले का नीला पहाड़था वही भूरा पहाड़।भूरा बच्चा,भूरा नहीं,नीला पहाड़, गोद में लिए, आँखों से।उतर आता है शहरएक बाज़ार में थैला बिछाए,बीच में रख देता है, नीला पहाड़।और बेचने के बाद का,बचा नीला पहाड़अगली सुबहजाकर मिला देता है,उसी भूरे पहाड़ में।

Nov 6, 20251 min

Ep 949Suwar Ke Chaune | Anupam Singh

सूअर के छौने । अनुपम सिंह बच्चे चुरा आए हैं अपना बस्तामन ही मन छुट्टी कर लिये हैंआज नहीं जाएँगे स्कूल झूठ-मूठ का बस्ता खोजते बच्चे मन ही मन नवजात बछड़े-साकुलाँच रहे हैंउनकी आँखों ने देख लिया हैआश्चर्य का नया लोकबच्चे टकटकी लगाएआँखों में भर रहे हैंअबूझ सौन्दर्यसूअरी ने जने हैंगेहुँअन रंग के सात छौनेये छौने उनकी कल्पना केनए पैमाने हैंसूर्य देवता का रथ खींचतेसात घोड़े हैंआज दिन-भर सवार रहेंगे बच्चेअपने इस रथ पर।

Nov 5, 20251 min

Ep 948Ma Nahin Thi Wah | Vishwanath Prasad Tiwari

माँ नहीं थी वह । विश्वनाथ प्रसाद तिवारीमाँ नहीं थी वहआँगन थीद्वार थी किवाड़ थी, चूल्हा थीआग थीनल की धार थी।

Nov 4, 20251 min

Ep 947Ulahna | Agyeya

उलाहना।अज्ञेयनहीं, नहीं, नहीं!मैंने तुम्हें आँखों की ओट कियापर क्या भुलाने को?मैंने अपने दर्द को सहलायापर क्या उसे सुलाने को?मेरा हर मर्माहत उलाहनासाक्षी हुआ कि मैंने अंत तक तुम्हें पुकारा!ओ मेरे प्यार! मैंने तुम्हें बार-बार, बार-बार असीसातो यों नहीं कि मैंने बिछोह को कभी भी स्वीकारा।नहीं, नहीं, नहीं!

Nov 3, 20251 min

Ep 946Pansokha Hai Indradhanush | Madan Kashyap

पनसोखा है इन्द्रधनुष - मदन कश्यप पनसोखा है इन्द्रधनुषआसमान के नीले टाट पर मखमली पैबन्द की तरह फैला है। कहीं यह तुम्हारा वही सतरंगा दुपट्टा तो नहीं जो कुछ ऐसे ही गिर पड़ा था मेरे अधलेटे बदन पर तेज़ साँसों से फूल-फूल जा रहे थे तुम्हारे नथने लाल मिर्च से दहकते होंठ धीरे-धीरे बढ़ रहे थे मेरी ओर एक मादा गेहूँअन फुंफकार रही थी क़रीब आता एक डरावना आकर्षण था मेरी आत्मा खिंचती चली जा रही थी जिसकी ओर मृत्यु की वेदना से ज़्यादा बड़ी होती है जीवन की वेदनादुपट्टे ने क्या मुझे वैसे ही लपेट लिया था जैसे आसमान को लपेट रखा है। पनसोखा है इन्द्रधनुष बारिश रुकने पर उगा है या बारिश रोकने के लिए उगा हैबारिश को थम जाने दो बारिश को थम जाना चाहिएप्यार को नहीं थमना चाहिएक्या तुम वही थीं जो कुछ देर पहले आयी थीं इस मिलेनियम पार्क मेंसीने से आईपैड चिपकाए हुएवैसे किस मिलेनियम से आयी थीं तुम प्यार के बाद कोई वही कहाँ रह जाता है जो वह होता हैधीरे-धीरे धीमी होती गयी थी तुम्हारी आवाज़ क्रियाओं ने ले ली थी मनुहारों की जगह ईश्वर मंदिर से निकलकर टहलने लगा था पार्क मेंधीरे-धीरे ही मुझे लगा थातुम्हारी साँसों से बड़ा कोई संगीत नहीं तुम्हारी चुप्पी से मुखर कोई संवाद नहीं तुम्हारी विस्मृति से बेहतर कोई स्मृति नहीं पनसोखा है इन्द्रधनुषजिस प्रक्रिया से किरणें बदलती हैं सात रंगों में उसी प्रक्रिया से रंगहीन किरणों से बदल जाते हैं सातों रंगहोंठ मेरे होंठों के बहुत क़रीब आयेमैंने दो पहाड़ों के बीच की सूखी नदी में छिपा लिया अपना सिरबादल हमें बचा रहे थे सूरज के ताप से पाँवों के नीचे नर्म घासों के कुचलने का एहसास हमें था दुनिया को समझ लेना चाहिए थाहम मांस के लोथड़े नहीं प्यार करने वाले दो ज़िंदा लोग थे महज़ चुम्बन और स्पर्श नहीं था हमारा प्यार वह कुछ उपक्रमों और क्रियाओं से हो सम्पन्न नहीं होता थाहम इन्द्रधनुष थे लेकिन पनसोखे नहीं अपनी-अपनी देह के भीतर ढूँढ़ रहे थे अपनी-अपनी देह बारिश की बूँदें जितनी हमारे बदन पर थीं उससे कहीं अधिक हमारी आत्मा मेंजिस नैपकिन से पोंछा था तुमने अपना चेहरा मैंने उसे कूड़ेदान में नहीं डाला था दहकते अंगारे से तुम्हारे निचले होंठ पर तब भी बची रह गयी थी एक मोटी-सी बूँद मैं उसे अपनी तर्जनी पर उठा लेना चाहता था पर निहारता ही रह गया अब कविता में उसे छूना चाह रहा हूँ तो अँगुली जल रही है।

Nov 2, 20256 min

Ep 945Buddhu | Shankh Ghosh

बुद्धू।शंख घोषमूल बंगला से अनुवाद : प्रयाग शुक्लकोई हो जाये यदि बुद्धू अकस्मात, यह तोवह जान नहीं पाएगा खुद से। जान यदि पाता यहफिर तो वह कहलाता बुद्धिमान ही।तो फिर तुम बुद्धू नहीं हो यह तुमनेकैसे है लिया जान?

Nov 1, 20251 min

Ep 944Meri Khata | Amrita Pritam

मेरी ख़ता । अमृता प्रीतमअनुवाद : अमिया कुँवरजाने किन रास्तों से होतीऔर कब की चलीमैं उन रास्तों पर पहुँचीजहाँ फूलों लदे पेड़ थेऔर इतनी महक थी—कि साँसों से भी महक आती थीअचानक दरख़्तों के दरमियानएक सरोवर देखाजिसका नीला और शफ़्फ़ाफ़ पानीदूर तक दिखता था—मैं किनारे पर खड़ी थी तो दिल कियासरोवर में नहा लूँमन भर कर नहाईऔर किनारे पर खड़ीजिस्म सुखा रही थीकि एक आसमानी आवाज़ आईयह शिव जी का सरोवर है...सिर से पाँव तक एक कँपकँपी आईहाय अल्लाह! यह तो मेरी ख़तामेरा गुनाह—कि मैं शिव के सरोवर में नहाईयह तो शिव का आरक्षित सरोवर हैसिर्फ़... उनके लिएऔर फिर वही आवाज़ थीकहने लगी—कि पाप-पुण्य तो बहुत पीछे रह गएतुम बहूत दूर पहुँचकर आई होएक ठौर बँधी और देखाकिरनों ने एक झुरमुट-सा डालाऔर सरोवर का पानी झिलमिलायालगा—जैसे मेरी ख़ता परशिव जी मुस्करा रहे...

Oct 31, 20252 min

Ep 943Purani Baatein | Shraddha Upadhyay

पुरानी बातें | श्रद्धा उपाध्याय पहले सिर्फ़ पुरानी बातें पुरानी लगती थीं अब नई बातें भी पुरानी हो गई हैं मैंने सिरके में डाल दिए हैं कॉलेज के कई दिन बचपन की यादें लगता था सड़ जाएँगी फिर किताबों के बीच रखी रखी सूख गईं कितनी तरह की प्रेम कहानियाँ उन पर नमक घिस कर धूप दिखा दी है ज़रुरत होगी तो तल कर परोस दी जाएँगीऔर इतना कुछ फ़िसल हुआ हाथों से क्योंकि नहीं आता था उन्हें कोई हुनर

Oct 30, 20251 min