
Pratidin Ek Kavita
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Ep 1090Bas Ek Kaam Yehi Baar Baar Karta Tha | Madhav Kaushik
बस एक काम यही बार बार करता था । माधव कौशिकबस एक काम यही बार बार करता थाभँवर के बीच से दरिया को पार करता थाउसी की पीठ पर उभरे निशान ज़ख़्मों केजो हर लड़ाई में पीछे से वार करता थाअजीब शख़्स था ख़ुद अलविदा कहा लेकिनहर एक शाम मेरा इंतिज़ार करता थासुना है वक़्त ने उस को बना दिया पत्थरजो रोज़ वक़्त को भी संगसार करता थाहवा ने छीन लिया अब तो धूप का जादूनहीं तो पेड़ भी पत्तों से प्यार करता था

Ep 1089Harmonium Ki Dukaan Se | Kumar Ambuj
हारमोनियम की दुकान से । कुमार अम्बुजउस पुरानी-सी दुकान पर ग्राहक कोई नहीं थाबस एक बूढ़ा आदमी चुपचाप झुका हुआ एक हारमोनियम परइतना तन्मय और बाकी चीज़ों से इतना बेखबरकि जैसे वह उस हारमोनियम का ही कोई हिस्सावह बार-बार दबा रहा था एक रीड कोशायद उसकी स्प्रंग ठीक नहीं थीधम्मन चलाते हुए उसने कई बार उस रीड को दबायाएक हलका-सा सुर गूँजता था उस भीड़ भरे बाज़ार मेंजो दस क़दम की दूरी तय करते-करते तोड़ देता था दमगज़ब कोलाहल के बीच एक मद्धिम सुर को साध रहा था वह बूढ़ावह चिंतित था कि ठीक तरह से निकले वह सुरवह इस तरह से सुनता था उस मद्धिम सुर कोजैसे इस समय की एक सबसे ज़रूरी आवाज़मुझे याद अ रहे थे वे सारे गीत जिनमें बजता रहा हारमोनियमऔर बचपन की भजन संध्याएँजिनमें हारमोनियम बजाते थे ताऊ तो रुक जाता था पूर्णमासी का चाँदअचानक खुश हुआ वह बूढ़ाऔर तनिक सीधे होते हए धम्मन चलाकरउसने दबाई वही रीड जिसे सुधार रहा था वह बहुत देर से

Ep 1088Saarangi | Krishna Mohan Jha
सारंगी | कृष्णमोहन झाउस आदमी ने किया होगा इसका आविष्कारजो शायद जन्म से ही बधिर होऔर जो अपनी आवाज़ खोजनेबरसों जंगल-जंगल भटकता रहा होया उस आदमी नेजिसने राजाज्ञा का उल्लंघन करने के बदलेकटा दी हो अपनी जीभऔर जिसकी देह मरोड़ती हुई पीड़ा की ऐंठनमुँह तक आकर निराकार ही निकल जाती होअथवा उसने रचा होगा इसेजो समुद्र के ज्वार से तिरस्कृत घोंघे की तरहअकिंचनता के द्वीप पर फेंक दिया गया होऔर जिसकी हर साँस पर काँपकर टूट जाती होउसके उफनते हृदय की पुकारया संभव हैजिसने खो दिया हो अपना घर-परिवारसाथ-साथ रोने के लिए किया हो इसका आविष्कारइस असाध्य जीवन मेंटूटने और छूटने के इतने प्रसंग हैं भरे हुएकि इसके जन्म का कारण कुछ भी हो सकता है…एक पक्षी के मरने से लेकर एक बस्ती के उजड़ने तकइसलिएजीवन के नाम पर जिन लोगों ने सिर्फ दुःख झेला हैउनकी मनुष्यता के सम्मान मेंअपनी कमर सीधी करके सुनिए इसेयह सुख के आरोह से अभिसिंचित कोई वाद्य यंत्र नहींसदियों से जमता हुआ दुःख का एक ग्लेशियर हैजो अपने ही उत्ताप से अब धीरे-धीरे पिघल रहा है…

Ep 1087Reedh | Vishwanath Prasad Tiwari
रीढ़। विश्वनाथ प्रसाद तिवारीकौन-सा अंग हैआदमी के शरीर में सबसे कीमतीप्रेममार्गियों ने कहा दिलज्ञानमार्गियों ने कहा दिमागकर्ममार्गियों ने कहा हाथपर रीढ़ न हो सीधीतो कैसे बनेगा आदमीकैसे खड़ा होगा वहगुरुत्वाकर्षण के विरुद्धखड़े होते हैं बंदर और भालू भीअपनी रीढ़ पर कभी-कभीपर गीदड़ और गधे कभी नहींरीढ़ झुकी है तो हाथ बँधे हैंहाथ बँधे हैं तो बँधी हैं आँखेंआँखें बँधी हैं तो बँधा है मस्तिष्कमस्तिष्क बँधा है तो बँधी है आत्मा।

Ep 1086Bhasha | Vivek Nirala
भाषा । विवेक निराला मेरी पीठ पर टिकीएक नन्ही-सी लड़कीमेरी गर्दन मेंअपने हाथ डाले हुएजितना सीख कर आती हैउतना मुझे सिखाती हैउतने में ही अपनासब कुछ दे जाती है।

Ep 1085Antariksh Ki Sair | Trilok Singh Thakurela
अंतरिक्ष की सैर | त्रिलोक सिंह ठकुरेलानभ के तारे कई देखकरएक दिन बबलू बोला।अंतरिक्ष की सैर करें माँले आ उड़न खटोला॥कितने प्यारे लगते हैंये आसमान के तारे।कौतूहल पैदा करते हैंमन में रोज हमारे॥झिलमिल झिलमिल करते रहतेहर दिन हमें इशारे।रोज भेज देते हैं हम तककिरणों के हरकारे॥कोई ग्रह तो होगा ऐसाजिस पर होगी बस्ती।माँ,बच्चों के साथ वहाँमैं खूब करुँगा मस्ती॥वहाँ नये बच्चों से मिलकरकितना सुख पाऊँगा।नये खेल सिखूँगा मैं,कुछ उनको सिखलाऊँगा॥

Ep 1084Benaras | Kedarnath Singh
बनारस | केदारनाथ सिंहइस शहर मे वसंतअचानक आता हैऔर जब आता है तो मैंने देखा हैलहरतारा या मडुवाडीह की तरफ़ सेउठता है धूल का एक बवंडरऔर इस महान पुराने शहर की जीभकिरकिराने लगती हैजो है वह सुगबुगाता हैजो नहीं है वह फेंकने लगता है पचखियाँआदमी दशाश्वमेध पर जाता हैऔर पाता है घाट का आख़िरी पत्थरकुछ और मुलायम हो गया हैसीढ़ियों पर बैठे बंदरों की आँखों मेंएक अजीब-सी नमी हैऔर एक अजीब-सी चमक से भर उठा हैभिखारियों के कटोरों का निचाट ख़ालीपनतुमने कभी देखा हैख़ाली कटोरों में वसंत का उतरना!यह शहर इसी तरह खुलता हैइसी तरह भरताऔर ख़ाली होता है यह शहरइसी तरह रोज़-रोज़ एक अनंत शवले जाते हैं कंधेअँधेरी गली सेचमकती हुई गंगा की तरफ़इस शहर में धूलधीरे-धीरे उड़ती हैधीरे-धीरे चलते हैं लोगधीरे-धीरे बजाते हैं घंटेशाम धीरे-धीरे होती हैयह धीरे-धीरे होनाधीरे-धीरे होने की एक सामूहिक लयदृढ़ता से बाँधे है समूचे शहर कोइस तरह कि कुछ भी गिरता नहीं हैकि हिलता नहीं है कुछ भीकि जो चीज़ जहाँ थीवहीं पर रखी हैकि गंगा वहीं हैकि वहीं पर बँधी है नावकि वहीं पर रखी है तुलसीदास की खड़ाऊँसैकड़ों बरस सेकभी सई-साँझबिना किसी सूचना केघुस जाओ इस शहर मेंकभी आरती के आलोक मेंइसे अचानक देखोअद्भुत है इसकी बनावटयह आधा जल में हैआधा मंत्र मेंआधा फूल में हैआधा शव मेंआधा नींद में हैआधा शंख मेंअगर ध्यान से देखोतो यह आधा हैऔर आधा नहीं हैजो है वह खड़ा हैबिना किसी स्तंभ केजो नहीं है उसे थामे हैंराख और रोशनी के ऊँचे-ऊँचे स्तंभआग के स्तंभऔर पानी के स्तंभधुएँ केख़ुशबू केआदमी के उठे हुए हाथों के स्तंभकिसी अलक्षित सूर्य कोदेता हुआ अर्घ्यशताब्दियों से इसी तरहगंगा के जल मेंअपनी एक टाँग पर खड़ा है यह शहरअपनी दूसरी टाँग सेबिल्कुल बेख़बर!

Ep 1083Nav Varsh | Harivansh Rai Bachchan
नव वर्ष | हरिवंशराय बच्चनवर्ष नव हर्ष नवजीवन उत्कर्ष नव।नव उमंग,नव तरंग,जीवन का नव प्रसंग।नवल चाह,नवल राह,जीवन का नव प्रवाह।गीत नवल,प्रीति नवल,जीवन की रीति नवल,जीवन की नीति नवल,जीवन की जीत नवल!

Ep 1082Akhbaar | Balswaroop Rahi
अखबार | बालस्वरूप राहीजिस दिन होता है इतवार, घर में आते ही अखबार, ऐसी छीन-झपट मचतीहो जाते हैं हिस्से चार!पापा को खबरों का चाव, माँ पढ़ती दालों के भाव,भैया खेलों में रमते, भाता मुझे बनाना नाव

Ep 1081Ghar | Mohan Rana
घर | मोहन राणाधन्य धरती है जिसकी करुणा अक्षतधन्य समुंदर जिसका नमक फीका नहीं होताधन्य आकाश जो रहता हमेशा मेरे साथ हर जगह दिन रातधन्य वे बीज जो पतझर को नहीं भूलतेधन्य वे शब्द भूलते नहीं जो चौखट पर कभी बाट लगाते दुखउसकी स्मृति कोधन्य उस विचार पहिए पर टँकी छवियाँजो बन जाती टॉकीज़,आकाशगंगा के छोर चुपचाप परिक्रमा मेंधन्य यह साँस,मैं कैसे भूल सकता हूँ घरऔर कोने पर धारे का पानी

Ep 1080Hum Kya Jaane Qissa Kya Hai | Rahi Masoom Raza
हम क्या जानें क़िस्सा क्या है | राही मासूम रज़ाहम क्या जानें क़िस्सा क्या है हम ठहरे दीवाने लोगउस बस्ती के बाज़ारों में रोज़ कहें अफ़्साने लोगयादों से बचना मुश्किल है उन को कैसे समझाएँहिज्र के इस सहरा तक हम को आते हैं समझाने लोगकौन ये जाने दीवाने पर कैसी सख़्त गुज़रती हैआपस में कुछ कह कर हँसते हैं जाने पहचाने लोगफिर सहरा से डर लगता है फिर शहरों की याद आईफिर शायद आने वाले हैं ज़ंजीरें पहनाने लोगहम तो दिल की वीरानी भी दिखलाते शरमाते हैंहम को दिखलाने आते हैं ज़ेहनों के वीराने लोगउस महफ़िल में प्यास की इज़्ज़त करने वाला होगा कौनजिस महफ़िल में तोड़ रहे हों आँखों से पैमाने लोग

Ep 1079Dekho Ahista Chalo | Gulzar
देखो आहिस्ता चलो | गुलज़ारदेखो आहिस्ता चलो और भी आहिस्ता ज़रादेखना सोच सँभल कर ज़रा पाँव रखनाज़ोर से बज न उठे पैरों की आवाज़ कहींकाँच के ख़्वाब हैं बिखरे हुए तन्हाई मेंख़्वाब टूटे न कोई जाग न जाए देखोजाग जाएगा कोई ख़्वाब तो मर जाएगा

Ep 1078Yaad Rakhna | Shailja Pathak
याद रखना | शैलजा पाठक याद रखनावह कहेंगे :कम बोलोकम खाओकम सजोकम घूमोकम हँसोकम खिलखिलाओकम बनाओ दोस्तकम करो सपनेकम होरहो कममेरी दोस्त!तुम कम सुनना...

Ep 1077Tere Sapne Mein Thode Hun | Teji Grover
तेरे सपने में थोड़े हूँ | तेजी ग्रोवरतेरे सपने में थोड़े हूँ पगलीमैं तो बैठा हूँटाट परसजूगरअचार भरी उँगलियाँ चाटता हुआमैं टाट पर थोड़े हूँ पगलीझूलती खाट मेंसो रहा हूँ तेरे पासइतना पासकि तेरा पेट गुड़गुड़ायातो मैंने सोचा मेरा हैभोर तक यहीं हूँ पगलीतू साँस छोड़ेगीतो भींज उठेंगी मेरी कोंपलेंमेरी खुरदरी उँगलियाँनींद की रोई तेरी आँखों परकाँप-काँप जाएँगीऔर तूझपकी भर नहीं जगेगी रात मेंमैं जा रहा हूँ पगलीतेरे खुलने से पहलेउजास में घुल रही है मेरी आँखछूना मटका तो मान लेनामैं आया थाघोर अँधेरे तपते तीर की तरह आया थारात भर प्यासा रहा।

Ep 1076Main Badha Hi Ja Raha Hun | Shivmangal Singh Suman
मैं बढ़ा ही जा रहा हूँ - शिवमंगल सिंह सुमन आज जो मैं इस तरह आवेश में हूँ, अनमना हूँयह न समझो मैं किसी के रक्त का प्यासा बना हूँसत्य कहता हूँ पराये पैर का काँटा कसकताभूल से चींटी कहीं दब जाए भी तो 'हाय!' करतापर जिन्होंने स्वार्थवश जीवन विषाक्त बना दिया हैकोटि-कोटि बुभुक्षितों का कौर तक, छिना लिया हैलाभ-शुभ लिखकर ज़माने का ह्रदय चूसा जिन्होंने और कल ही, बगल वाली लाश पर थूका जिन्होंनेबिलखते शिशु की व्यथा पर दृष्टि तक जिनने न फेरीयदि क्षमा कर दूँ उन्हें, धिक्कार माँ की कोख मेरीचाहता हूँ ध्वंस कर देना विषमता की कहानीहो सुलभ सबको जगत में वस्त्र, भोजन, अन्न, पानी।

Ep 1075Main Neer Bhari | Mahadevi Verma
मैं नीर भरी | महादेवी वर्मामैं नीर भरी दु:ख की बदली!स्पंदन में चिर निस्पंद बसा;क्रंदन में आहत विश्व हँसा,नयनों में दीपक-से जलतेपलकों में निर्झरिणी मचली!मेरा पग-पग संगीत-भरा,श्वासों से स्वप्न-पराग झरा,नभ के नव रँग बुनते दुकूल,छाया में मलय-बयार पली!मैं क्षितिज-भृकुटि पर घिर धूमिल,चिंता का भार, बनी अविरल,रज-कण पर जल-कण हो बरसीनवजीवन-अंकुर बन निकली!पथ को न मलिन करता आना,पद-चिह्न न दे जाता जाना,सुधि मेरे आगम की जग मेंसुख की सिहरन हो अंत खिली!विस्तृत नभ का कोई कोना;मेरा न कभी अपना होना,परिचय इतना इतिहास यहीउमड़ी कल थी मिट आज चली!मैं नीर भरी दु:ख की बदली!

Ep 1074Adrak | Ekta Verma
अदरक। एकता वर्मा इनकी देह दुखों की अंतर्मुखी गाँठों से बनी थी जिन्होंने अपनी कब्रों की मिट्टी ठेलकर अपनी देह के लिए जगह बनाई थी।ये आतताइयों का चरित्र पहचानते थे और उनके द्वारा कच्चा चबाए जाने के खिलाफ सुख की जिह्वा पर कसैलेपन की तरह उतरते थे। वे आघातों को अपनी छाती पर सहते थे इनका आखिरी कतरा प्रतिबद्धताओं की तीखी गंध से महकता था। वे रक्तबीज जैसे थे, उनके टुकड़े जहाँ गिरते हुजूम की शक्ल में वहीं से उग आते। उनका शरीर लोहे के तंतुओं से बँधा था उनको तोड़कर बंदरबाँट करना आसान नहीं था। एक दिन, इनमें से किसी नेजिसके पिता का नाम शंबूक था,ने किताब का आखिरी पृष्ठ पलटकर कहा- यह हमारी कहानी नहीं है।इस इतिहास को जला देना चाहिए ! द्रोणाचार्य की संतानों वाली सभा चीख उठी- खीं-खीं, खीं-खीं !!! एक औरत ने जो अहिल्या की परपौत्री थी, और मेड्यूसा की नातिन, ने कहा-मेरी योनि एक मज़दूर की तरह खटते हुए असंतोष का नारा उछालना चाहती है,बलत्कृत कामनाओं के नीचे दबा सुख का स्पन्दन खोज लाना चाहती है।देवराजों की सभा चिल्लाने लगी, नुकेले दांतों से नोचने-फाड़ने लगी छी: छी: दुर्दांत! पतिता! जंगल से खदेड़ी गई जातियों का एक वारिसराजधानी के शिक्षण संस्थान में,शोध-प्रबंध में उद्धृत करने लगा अपने पुरखों के हत्यारों की सूची साक्षात्कार समिति चीखी- खीं-खीं, खीं-खीं खारिज करो, फेंको, बाहर करो!ये तिरस्कृत, बहिष्कृत, अपमानित होती जातियाँ चाहतीं तो एक तटस्थ, समझौतावादी जीवन चुन सकती थीं।लेकिन सहमति में झुके सारों के बीच जहाँ असहमति की उंगली उठाना अपराध हो, वे ओखली में सिर डालकर मूसलों को चुनौती देना धर्म की तरह चुनते हैं। वे अदरक की तरह जीते थे।इनके होने भर से आतताइयों की नंगई ऐसे उघड़ती थी कि वे चीखते-उछलते दाँत -नाखून दिखाते, बंदरों के हुजूम सा दिखते। वही बंदर जो अदरक का स्वाद नहीं जानते।दरअसल सभ्यता के विकास-क्रम में पिछड़े इन अमानुषों के लिए स्वाद भोग का विषय है जबकि मेहनतकशों के लिए वह संघर्ष का पर्याय थाजिन्होंने अपनी जिह्वा पर रोटी से कहीं ज़्यादा, आंसुओं के स्वाद को चखा था,पसीने और पेशाब को चखा था।

Ep 1072Prathna Bani Rahi | Gopal Singh Nepali
प्रार्थना बनी रही | गोपाल सिंह नेपालीरोटियाँ ग़रीब की प्रार्थना बनी रहीएक ही तो प्रश्न है रोटियों की पीर कापर उसे भी आसरा आँसुओं के नीर काराज है ग़रीब का ताज दानवीर कातख़्त भी पलट गया कामना गई नहींरोटियाँ ग़रीब की प्रार्थना बनी रहीचूम कर जिन्हें सदा क्राँतियाँ गुज़र गईंगोद में लिये जिन्हें आँधियाँ बिखर गईंपूछता ग़रीब वह रोटियाँ किधर गईदेश भी तो बँट गया वेदना बँटी नहींरोटियाँ ग़रीब की प्रार्थना बनी रही

Ep 1071Khana Hai | Priyankshi Mohan
खाना है । प्रियाँक्षी मोहन खाना है"वो" खाना हैक्या खाना है?घर भर पूछेबिटिया सेबिटिया को बसरट लगीकि "वो" खाना हैकल सेवो क्या होताज़रा बताओ?सब पूछे बिटिया सेबिटिया को तोनाम न सूझे कुछ मीठामीठा सूझेटॉफी चॉकलेटमिश्री, कुल्फीक्या है वोइन सब में?बिटिया मुह फुलाएदौड़ेइस कोने उस कोनेपापा मम्मीदादा दादीसब सो गएजब थक केबिटिया कुतरेचीनी चाटेनन्ही चीटी के संग में

Ep 1070Basant | Kedarnath Singh
बसन्त | केदारनाथ सिंहऔर बसन्त फिर आ रहा हैशाकुन्तल का एक पन्नामेरी अलमारी से निकलकरहवा में फरफरा रहा हैफरफरा रहा है कि मैं उठूँऔर आस-पास फैली हुई चीज़ों के कानों मेंकह दूँ 'ना'एक दृढ़और छोटी-सी 'ना'जो सारी आवाज़ों के विरुद्धमेरी छाती में सुरक्षित हैमैं उठता हूँदरवाज़े तक जाता हूँशहर को देखता हूँहिलाता हूँ हाथऔर ज़ोर से चिल्लाता हूँ –ना...ना...नामैं हैरान हूँमैंने कितने बरस गँवा दियेपटरी से चलते हुएऔर दुनिया से कहते हुएहाँ हाँ हाँ...

Ep 1069Jab Jab Tum Chahoge Mujhse | Adiba Khanum
जब जब तुम चाहोगे मुझसे । अदीबा ख़ानमजब जब तुम चाहोगे मुझसे एक प्रेम पगी कवितामेरी जान मैं तम्हें टूट कर प्रेम दूँगीमेरे पसंदीदा मौसमों का आगाज़ हो तुमजानते हो मैं तुम्हें शिउली की तरह मिलूँगीहमेशा हर बरस बिखरती रहूँगीतुम्हारे ज़हन के कच्चे रास्तों पर उजली - उजलीसुबह के शफ़्फ़ाफ़ उजालों सीकुछ क्षणों का ये मिलनयूँही न भूल पाओगे तुम,साल दर सालमेरी गन्ध से तुम्हारी स्मृतियाँझंकृत हो उठेगी किसी नाद की तरहमैं वो हूँ जिसकी आँखेंअपने पसंदीदा फूलों के वियोग मेंखुद फूल हो झरती रहीं हैं।मैं दुआओं में अपनीमाँग लूँगी तुम्हारे लिएहर मौसम में तुम्हारे पसंद के फूलकि तुम कभी उन खुशबुओं से महरूम न रहोजिनसे तुम्हें प्रेम हैक्या तुमने देखी है मुझ जैसी कोई बावरीजिसने हमेशा ही चाहा खुशबू हो जाना,कोई ऐसी गन्धजो तुम्हारी श्वास की आवाजाही में बसेइस दुनिया में कुछ लोग ही यूँ जीते हैं किसमझ पाएँ प्रेम के जादू कोऔर उनसे भी कम होते हैं वो लोग जिन्हेंप्रेम समझने की धुनजीने नहीं देती,और देखा जाएतो मरने भी नहीं देतीदर असल कविता मेरे हदय से उठीएक तीखी हूँक हैऔर मैंने कहा भी किजब जब तुम चाहोगे मुझसे एक प्रेम पगी कवितामेरी जान मैं तम्हें दूट कर प्रेम दूँगी।

Ep 1068Mujhe Tum Mile | Phanishwar Nath Renu
मुझे तुम मिले! | फणीश्वरनाथ रेणुमुझे तुम मिले!मृतक-प्राण में शक्ति-संचार कर;निरंतर रहे पूज्य, चैतन्य भर!पराधीनता-पाप-पंकिल धुले!मुझे तुम मिले!रहा सूर्य स्वातंत्र्य का हो उदय!हुआ कर्मपथ पूर्ण आलोकमय!युगों के घुले आज बंधन खुले!मुझे तुम मिले!

Ep 1067Daudte Daudte Pyar | Nilesh Raghuvanshi
दौड़ते-दौड़ते प्यार। नीलेश रघुवंशी वह दौड़ रहा हैदिन ब दिन उसकी भागमभाग बढ़ती ही जा रही हैवह जितना दौड़ता जाता है सड़कें उतनी लंबी होती जाती हैंदिन ब दिन पसरती सड़कें खत्म होने का नाम ही नहीं लेतींमैं उसे प्यार करती हूँ और उसकी दौड़ से भयभीत होती हूँभय खाती हूँ उसकी दिनचर्या से जिसमें कुछ पल भी नहीं उसके पासकोसती हूँ बिना पेड़ और बिना छाँव वाले चौराहों औरसड़कों के किनारों कोउकसाते हैं जो उसे और-और दौड़ने के लिएथकान से उसकी थक जाते हैं कपड़ेपसर जाती है थकान उससे पहले बिस्तर मेंनींद में उसकी गोल घुमावदार सड़कें रास्ते जिनमें गुम होते हुएकसमसाती हैं हमारी दोपहरें उसकी थकी आँखों मेंमैं उससे प्यार करती हूँ और प्यार करते-करते शामिल हो गई दौड मेंअब हम दोनों दौड रहे हैंहम बैठे भी नहीं हैं और किसी के साथ खड़े भी नहीं हैंहम तो बस दौडते जा रहे हैंदौडते-दौडते हमने हमारी ही इच्छाओं को मार डालाहाय री दौड़ तूने दौड़ते-दौड़ते भी हमें प्यार न करने दियामैं दौड़ से चिढ़ती हूँ लेकिन उससे प्यार करती हूँथका हारा सांसारिक प्यार हमारा

Ep 1066Rahe Na Koi Bhookha-Nanga | Koduram Dalit
रहे न कोई भूखा–नंगा | कोदूराम दलितपराधीन रहकर सरकस का शेर नित्य खाता है कोड़े,पराधीन रहकर बेचारे बोझा ढोते हाथी-घोड़े ।माता–पिता छुड़ा, पिंजरे में रखा गया नन्हा–सा तोता,वह स्वतंत्र उड़ते तोतों को देख सदा मन ही मन रोता ।चाहे पशु हो, चाहे पंछी परवशता कब, किसको भायी,कहने का मतलब यह कि ‘परवशता’ होती दुखदायी।ऐसी दुखदायी परवशता मानव को कैसे भायेगी?औरों की दासता किसी को राहत कैसे पहुँचायेगी?जो गुलाम हैं, उन लोगों से उनके दुख: की बातें पूछो,औ’ हैं जो आज़ाद मुल्क़ के उनके सुख की बातें पूछो।कहा सयानों ने सच ही है आज़ादी से जीना अच्छा,किंतु ग़ुलामी में जिंदा रहने से मर जाना है अच्छा।रह करके गोरों की परवशता में हम क्या-क्या न खो चुके,पर पंद्रह अगस्त सन सैंतालीस को हम आज़ाद हो चुके।यह सब अपने अमर शहीदों के भारी जप-तप का फल है,मिलकर रहें, देश पनपावें तब तो फिर भविष्य उज्जवल है ।आज़ादी पर आँच न आवे लहर-लहर लहराए तिरंगा,हम संकल्प आज लेवें कि रहे न कोई भूखा–नंगा।

Ep 1065Hanso | Shraddha Upadhyay
हँसो। श्रद्धा उपाध्याय कोई गिरे तो तुम उसे उठाते हुए गिरो फिर हँसो तुम्हारी खिलखिलाहट से किसी खंडहर में उड़ जाएंगे चमगादड़ इतिहास में कई अवकाश हैं जिनमें सज जाएगी तुम्हारी हँसी जिस सत्ता ने तुम्हें रोने नहीं दियाउनको जीभ चढ़ा कर हँसो दो जहाँ दस दिशाओं में हँसो हँसो इतना कि बैठकों में रखे बुद्ध की तोंद पिरा जाए उस चुप्पी के सामने हँसो जिसके द्वार तोरण पर लिखा था कि हँसी कड़ जाली हँसो हे री जल्दी जल्दी बहुत सारा

Ep 1064Mil Hi Jayega Kabhi | Ahmed Mushtaq
मिल ही जाएगा कभी | अहमद मुश्ताक़मिल ही जाएगा कभी दिल को यक़ीं रहता हैवो इसी शहर की गलियों में कहीं रहता हैजिस की साँसों से महकते थे दर-ओ-बाम तिरे ऐ मकाँ बोल कहाँ अब वो मकीं रहता है इक ज़माना था कि सब एक जगह रहते थेऔर अब कोई कहीं कोई कहीं रहता हैरोज़ मिलने पे भी लगता था कि जुग बीत गएइश्क़ में वक़्त का एहसास नहीं रहता हैदिल फ़सुर्दा तो हुआ देख के उस को लेकिन उम्र भर कौन जवाँ कौन हसीं रहता है फ़सुर्दा: मुरझाया हुआ दर-ओ-बाम: (लाक्षणिक) मकान मकीं: मकान में रहने वाला

Ep 1063Awara Din | Poornima Varman
आवारा दिन। पूर्णिमा वर्मनदिन कितने आवारा थेगली गली औरबस्ती बस्तीअपने मनइकतारा थेमाटी कीखुशबू में पलतेएक खुशी सेहर दुख छलतेबाड़ी, चौक, गली अमराईहर पत्थर गुरुद्वारा थेहम सूरजभिनसारा थेकिसने बड़ेख़्वाब देखे थेकिसने ताजमहल रेखे थेमाँ की गोद, पिता का सायाघर घाटी चौबारा थेहम घर काउजियारा थे

Ep 1062Ek Khwaish | Sewak Nayyar
एक ख़्वाहिश । सेवक नैयरऔर मैं सोचता हूँयूँहीउम्र भरएक कमरे मेंशतरंज की मेज़ परतुम मुसलसल मुझेमात देती रहोमैं मुसलसल यूँहीमात खाता रहूँअपनीतक़दीर परमुस्कुराता रहूँ

Ep 1061Iska Kya Matlab Hai | Krishna Mohan Jha
इसका क्या मतलब है। कृष्णमोहन झाड्योढ़ी के टाट परखीरे के पात की हरी छाँह के नीचेमेरी बाट जोह रही होगी मेरी लालसा...रात की शाखों से उतरकर रोज़गिलहरी की तरह फुदकती हुईमुझे खोज रही होगी मेरी नींद…मेरे स्वप्नमेरी अनुपस्थिति पर सिर टिकाकर सो रहे होंगेऔर मेरे हिस्से का आसमानबिना छुए ही धूसर हो रहा होगा…इसका क्या मतलब हैकि जहाँ लौट पाना अब लगभग असंभव हैवहीं सबसे सुरक्षित है मेरा वजूद?

Ep 1060Kalam Tere Haath Mei Hai | Bhawani Prasad Mishra
क़लम तेरे हाथ में है । भवानीप्रसाद मिश्रक़लम तेरे हाथ में है, जो चाहे सो लिखकुछ न सूझे तो अपना नाम लिखक्या ज़रूरी है कि जो कुछ लिखा, वह छपे भीन छपे सही अँगीठी के काम आएगा कभीदम होगा तो धधक जाएगाबोदा होगा तो बुझ जाएगालिखने की बेला बड़ी पावन होती हैसूखे मन के लिए सावन होती हैरोशनाई और क़लम का संयोग होता हैमन को सँजोने का प्राणान्तक योग होता हैक़लम तेरे हाथ में है, ललकार कर लिखकाग़ज़ हज़ार काले हों, मग़र कालिख़ न लिख।

Ep 1059Neend Uchat Jati Hai | Narendra Sharma
नींद उचट जाती है । नरेंद्र शर्माजब-तब नींद उचट जाती हैपर क्या नींद उचट जाने सेरात किसी की कट जाती है?देख-देख दु:स्वप्न भयंकर,चौंक-चौंक उठता हूँ डरकर;पर भीतर के दु:स्वप्नों सेअधिक भयावह है तम बाहर!आती नहीं उषा, बस केवलआने की आहट आती है!देख अँधेरा नयन दूखते,दुश्चिंता में प्राण सूखते!सन्नाटा गहरा हो जाता,जब-जब श्वान श्रृगाल भूँकते!भीत भावना,भोर सुनहलीनयनों के न लाती है!मन होता है फिर सो जाऊँ,गहरी निद्रा में खो जाऊँ;जब तक रात रहे धरती पर,चेतन से फिर जड़ हो जाऊँउस करवट अकुलाहट थी, परनींद न इस करवट आती है!करवट नहीं बदलता है तम,मन उतावलेपन में अक्षम!जगते अपलक नयन बावले,थिर न पुतलियाँ, निमिष गए थम!साँस आस में अटकी, मन कोआस रात भर भटकाती है!जागृति नहीं अनिद्रा मेरी,नहीं गई भव-निशा अँधेरी!अंधकार केंद्रित धरती पर,देती रही ज्योति चकफेरी!अंतर्नयनों के आगे सेशिला न तम की हट पाती है!

Ep 1058Mujhe Tez Dhar Wali Kavitayein Chahiye | Pratibha Katiyar
मुझे तेज़ धार वाली कविताएँ चाहिए । प्रतिभा कटियारमुझे तेज़ धार वाली कविताएँ चाहिएजिनके किनारे से गुज़रते हुए लहूलुहान हो जाए जिस्मजिन्हें हाथ लगाते ही रिसकर बहने लगेसब कुछ सह लेने वाला सब्रमुझे ढर्रे पर चलती ज़िंदगी के गाल परथप्पड़ की तरह लगने वाली कविताएँ चाहिएकि देर तक सनसनाता रहे ढर्रे पर चलने वाला जीवनऔर आख़िर बदलनी ही पड़े उसे अपनी चालमुझे बारूद सरीखी कविताएँ चाहिएजो संसद में किसी बम की तरह फूटेंऔर चीरकर रख दें बहरी सरकारों केकानों के परदेमुझे बहुत तेज़ कविताएँ चाहिएसाँसों की रफ़्तार से भी तेज़समय की गति से आगे की कविताएँजो हत्यारों के मंसूबों को बेधती कविताएँऔर हो चुकी हत्याओं के ख़िलाफ़गवाह बनती कविताएँमुझे चाहिए कविताएँ जिनसेऑक्सीजन का काम लिया जा सकेजिन्हें घर से निकलते वक़्तकिसी सुरक्षा कवच की तरह पहना जा सकेजिनसे लोकतंत्र कोभीड़तंत्र होने से बचाया जा सकेमुझे चाहिए इतनी पवित्र कविताएँ कि उनके आगे सजदा किया जा सकेरोया जा सके जी भर केऔर सजदे से उठते हुए हल्का महसूस किया जा सकेमुझे चूल्हे की आग सी धधकती कविताएँ चाहिएखेतों में बालियों सी लहलहाती कविताएँ चाहिएमुझे मोहब्बत के नशे में डूबी कविताएँ चाहिएऔर भोली गिलहरी सी फुदकती कविताएँ चाहिएमुझे इस धरती परमनुष्यता की फ़सल उगाने वाली कविताएँ चाहिए।

Ep 1057Maun | Suryakant Tripathi 'Nirala'
मौन । सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला'बैठ लें कुछ देर,आओ, एक पथ के पथिक-सेप्रिय, अंत और अनंत के,तम-गहन-जीवन घेर।मौन मधु हो जाएभाषा मूकता की आड़ में,मन सरलता की बाढ़ में,जल-बिंदु-सा बह जाए।सरल अति स्वच्छंदजीवन, प्रात के लघुपात से,उत्थान-पतनाघात सेरह जाए चुप, निर्द्वंद।

Ep 1056Bas Ek Vachan | Mridula Shukla
बस एक वचन। मृदुला शुक्लाजब तुम मुझसे कर रहे थे प्रणय निवेदनतुम्हारी गर्म हथेलियों के बीचकंपकंपा रहा था मेरा दायाँ हाथउसी वक़्त, तुम्हारे कमरे की दीवार परमेरे सामने टंगी थी एक तस्वीरजिसमे एक जवान औरत पीस रही थी चक्कीऔर बूढ़ी औरत दे रही थी चक्की के बीच दानेपास ही आधा पड़ा खाली मटकाउन्हें उनकी अगली लड़ाई की याद दिला रहा थाउसी तस्वीर में एक जवान आदमी दीवार से सर टिकागुडगुडा रहा था हुक्काएक बूढा वही बैठा बजा रहा था सारंगीमुझे स्वीकार है तुम्हारा प्रणय निवेदनबिना सात फेरों के बिना सातों वचन के!बस एक वचन किजब मेरा बेटा कर रहा हो प्रणय निवेदन अपनी सहचरी सेतो उसके पीछे दीवार पर टंगी तस्वीर मेंबूढ़ी औरत बजा रही हो सारंगीबूढ़ा गुडगुडा रहा हो हुक्काऔर जवान औरत और आदमीमिल कर चला रहा हो चक्कीसुनो ! क्या तुम मेरे लिए,बदल सकते हो दीवार पर टंगी इस तस्वीर के पात्रों की जगह भी?

Ep 1055Ghar Pe Thande Choolhe Par | Adam Gondvi
घर पे ठंडे चूल्हे पर अगर ख़ाली पतीली है।अदम गोंडवीघर पे ठंडे चूल्हे पर अगर ख़ाली पतीली हैबताओं कैसे लिख दूँ धूप फागुन की नशीली हैभटकती है हमारे गाँव में गूँगी भिखारन-सीये सुब्हे-फ़रवरी बीमार पत्नी से भी पीली हैबग़ावत के कँवल खिलते हैं दिल के सूखे दरिया मेंमैं जब भी देखता हूँ आँख बच्चों की पनीली हैसुलगते जिस्म की गर्मी का फिर एहसास हो कैसेमुहब्बत की कहानी अब जली माचिस की तीली है

Ep 1054Pani Aur Dhoop | Subhadra Kumari Chauhan
पानी और धूप । सुभद्राकुमारी चौहानअभी अभी थी धूप, बरसनेलगा कहाँ से यह पानीकिसने फोड़ घड़े बादल केकी है इतनी शैतानी।सूरज ने क्यों बंद कर लियाअपने घर का दरवाजा़उसकी माँ ने भी क्या उसकोबुला लिया कहकर आजा।ज़ोर-ज़ोर से गरज रहे हैंबादल हैं किसके काकाकिसको डाँट रहे हैं, किसनेकहना नहीं सुना माँ का।बिजली के आँगन में अम्माँचलती है कितनी तलवारकैसी चमक रही है फिर भीक्यों खाली जाते हैं वार।क्या अब तक तलवार चलानामाँ वे सीख नहीं पाएइसीलिए क्या आज सीखनेआसमान पर हैं आए।एक बार भी माँ यदि मुझकोबिजली के घर जाने दोउसके बच्चों को तलवारचलाना सिखला आने दो।खुश होकर तब बिजली देगीमुझे चमकती सी तलवारतब माँ कर न कोई सकेगाअपने ऊपर अत्याचार।पुलिसमैन अपने काका कोफिर न पकड़ने आएँगेदेखेंगे तलवार दूर से हीवे सब डर जाएँगे।अगर चाहती हो माँ काकाजाएँ अब न जेलखानातो फिर बिजली के घर मुझकोतुम जल्दी से पहुँचाना।काका जेल न जाएँगे अबतूझे मँगा दूँगी तलवारपर बिजली के घर जाने काअब मत करना कभी विचार।

Ep 1053Is Janam Mein | Rajula Shah
इस जनम में । राजुला शाहअचरज हो तुमएक दु:स्वप्न से जगकमरे मेंअलस्सुबहपरदे उड़ाते आतीहवा-सा अचरज।इसके आगे मगरमुझे कुछ याद नहींजगता हूँ तो स्वप्न भुला जाता हैसोता हूँ तो यह संसारजाने कहाँ बिला जाता हैकभी यही भूल जाता हूँकि जागा हूँ या सो रहाफिर भीइस जनम मेंतुमसे हीबाकी सबअपनी जगह पर हैइसलिएमैं कहीं भी रहूँतुम यहीं रहनामैं कुछ भी कहूँतुम यही कहनामैं हूँमैं रहूँगी।

Ep 1052Jisko Bachpan Me Dekha | Madhav Kaushik
जिसको बचपन में देखा । माधव कौशिकजिसको बचपन में देखा वो पनघट पोखर ढूंढूंगा।अगली बार गाँव में जाकर फिर अपना घर ढूंढूंगा।ऐसा लगता है टाँगे ही टाँगे हैं अब लोगों की,मुझको मौका मिला तो सबके कटे हुए सर ढूंढूंगा।शहरों की शैतानी आँतें लीले गईं हर चीज़ मगर,दिल की बच्चों जैसी ज़िद के तितली के पर ढूंढूंगा।बुरे दिनों ने सिख लायी है जीने की तरकीब नई,जो कुछ चौराहे पर खोया घर के अन्दर ढूंढूंगा।तुम मेरे चेहरे पर लिखना इन्द्रधनुष उम्मीदों के,मैं तेरी सूनी आँखों में नीला अम्बर ढूंढूंगा।हो सकता है मुझे देखकर फिर छिप जाए जँगल में,मैं अपनी खोई फितरत को भेस बदलकर ढूंढूंगा।अगली बार गाँव में जाकर फिर अपना घर ढूंढूंगा।

Ep 1051Na Tha Kuch To Khuda Tha | Mirza Ghalib
न था कुछ तो ख़ुदा था। मिर्ज़ा ग़ालिबन था कुछ तो ख़ुदा था कुछ न होता तो ख़ुदा होताडुबोया मुझ को होने ने न होता मैं तो क्या होताहुआ जब ग़म से यूँ बे-हिस तो ग़म क्या सर के कटने कान होता गर जुदा तन से तो ज़ानू पर धरा होताहुई मुद्दत कि 'ग़ालिब' मर गया पर याद आता हैवो हर इक बात पर कहना कि यूँ होता तो क्या होता

Ep 1050Bees Baras Baad | Satyam Tiwari
बीस बरस बाद । सत्यम तिवारी जो जहाँ है वहाँ नहीं मिलेगामरीचिकाएं अब एक पुरानी सदा हैं और उठे हुए हाथ हवा में गिर जाते हैंतय करना मुश्किल है ऐसे में मनुष्य की गतिशुरू ही होता है जिसका कालखंडबीस बरस पूर्वबर्फ़ के टुकड़े-सा चला है मेरा प्यारऔर दूर है तुम्हारा हाथ इतना दूर वास्तुनिष्ठ सत्य जितना वास्तु सेचश्मा आँख से पानी काकि हाथों हाथ लिया जाएगा फौरी सुझाव और साक्ष्यों के अभाव में मिलेगी माफ़ीनिर्देशक छूटे हुए दृश्य से पल्ला झाड़ेगा निर्माता अनाकर्षक किरदार पर डालेगा पर्दातीन बार दिन में लोटे से जल देगाऔर रुकने के आग्रह पर चल देगादेवता ऐसे आएगा कविता मेंजैसे दुर्घटना का साक्ष्य छुपाने को बिल्लीउलट दिशा में दौड़ेने लगेगा तुम्हारा अंतःकरण।

Ep 1049Kab Yaad Me Tera Saath Nahi | Faiz Ahmed Faiz
कब याद में तेरा साथ नहीं । फ़ैज़ अहमद फ़ैज़कब याद में तेरा साथ नहीं कब हाथ में तेरा हाथ नहींसद-शुक्र कि अपनी रातों में अब हिज्र की कोई रात नहींमुश्किल हैं अगर हालात वहाँ दिल बेच आएँ जाँ दे आएँदिल वालो कूचा-ए-जानाँ में क्या ऐसे भी हालात नहींजिस धज से कोई मक़्तल में गया वो शान सलामत रहती हैये जान तो आनी जानी है इस जाँ की तो कोई बात नहींमैदान-ए-वफ़ा दरबार नहीं याँ नाम-ओ-नसब की पूछ कहाँआशिक़ तो किसी का नाम नहीं कुछ इश्क़ किसी की ज़ात नहींगर बाज़ी इश्क़ की बाज़ी है जो चाहो लगा दो डर कैसागर जीत गए तो क्या कहना हारे भी तो बाज़ी मात नहीं

Ep 1048Political And Physical Maps Of India | Priyankshi Mohan
पॉलिटिकल एंड फिज़ीकल मैप्स ऑफ इंडिया। प्रियंक्षी मोहन अखबार के पीछे सेभेदती हैं पिता की आँखेंएक समय के बादमाँ के हाथ की बनीगर्म, फूली हुई रोटियां भीफफोले सी नज़र आती हैनकारेपन में इतनाघूम लिया है शहर किप्रेम करने के लिए तोमिल जाता है एक कोनामिल ही जाता है पर, "क्या करते हो बेटा?"जैसे सवालों से छुपने केलिए दूर दूर तक कोईजगह नज़र नहीं आती है"दरवाज़े बाई तरफ खुलेंगे"हर रोज़ सुन सुनकर भीपता नहीं चलता किआखिर जाना किस तरफ हैराशन की दुकान मेंजैसे ताखों से झांकते हैं चूहेउसी तरह बाप के दिलाएहुए महंगे कपड़ों की खालीजेबों से बटुए झांकते हैभाइयों पर ज़िम्मा हैबहनों को ब्याहने काऔर बहनों कोहोने वाले पतियों कीबहनों का दहेज़ बनवाने का हम उलझे थे सदाऔर उलझे ही रहेंगेऊन के गोलों की तरहहम देश बदलने काजज़्बा रखने वाले युवाएक दिन दिखते ही देखतेपॉलिटिकल और फिज़ीकलमैप्स ऑफ इंडिया में बदल ही जाते हैं

Ep 1047Sapne | Paash
सपने । पाशअनुवाद : चमनलालसपनेहर किसी को नहीं आतेबेजान बारूद के कणों मेंसोई आग को सपने नहीं आतेबदी के लिए उठी हुईहथेली के पसीने को सपने नहीं आतेशेल्फ़ों में पड़ेइतिहास-ग्रंथों को सपने नहीं आतेसपनों के लिए लाज़िमी हैझेलने वाले दिलों का होनासपनों के लिएनींद की नज़र होना लाज़िमी हैसपने इसलिएहर किसी को नहीं आते

Ep 1046Garibi | Dhoomil
ग़रीबी । धूमिलग़रीबीएक ख़ुली हुई क़िताबजो हर समझदारऔर मूर्ख के हाथ में दे दी गई है।कुछ उसे पढ़ते हैंकुछ उसके चित्र देखउलट-पुलट रख देतेनीचे ’शो-केस’ के।

Ep 1045Sadak | Dheeraj
सड़क । धीरज तुम्हारा जाना,मेरा ऐसे छूट जानाजैसे हर साल छूट जाती हैगाँव की एक ख़राब सड़कजिस पर लड़ा जा सके अगले साल का चुनाव।

Ep 1044Pahadi Aurat | Nirmala Putul
पहाड़ी औरत। निर्मला पुतुल वह जो सर पे सूखी लकड़ियों का गट्ठर लादे पहाड़ से उतर रही है पहाड़ी स्त्री अभी-अभी जाएगी बाज़ार और बेचकर सारी लकड़ियाँ बुझाएगी घर-भर के पेट की आग चादर में बच्चे कोपीठ पर लटकायेधान रोपती पहाड़ी स्त्रीरोप रही है अपना पहाड़ सा दुख सुख की एक लहलहाती फसल के लिए पहाड़ तोड़ती, तोड़ रही है पहाड़ी बन्दिश और वर्जनाएं चटाईयाँ बुनते पहाड़ पर काट रही है पहाड़ सा दिन झाड़ू बनाती, बना रही है गंदगी से लड़ने के हथियार खोपा में खोसती फूल खोंस रही है किसी का दिल गाय-बकरियों के पीछे भागते उसके पाँव रच रहे हैं धरती पर सैकड़ों कुँवारे गीत।

Ep 1043Raat Mein Boat Club | Hemant Deolekar
रात में बोट क्लब । हेमंत देवलेकररुकी हुई नावें :जैसे लहरों नेबेतरतीबी से उतार फैंकीअपनी जूतियाँऔर समा गई तलघर मेंउनकी नींद परमछलियों का पहरा हैबंद है पानी का दरवाज़ा चाँद उस पर लटका हैताले की तरह

Ep 1042Phool Khilkar Rahenge | Vishnu Nagar
फूल खिल कर रहेंगे । विष्णु नागर तुमने पत्थर बोए तो पत्थर ही उगे लेकिन पत्थरों ने अपने ऊपर मिट्टी जमने नहीं दिया हवा से नमी खींच ली पौधे उगने बढ़ने लगे पौधों ने फूल उगाए फूलों ने ख़ुशबू बिखेरे रंगों की बहार ला दी पत्थर भी महकने लगे पत्थरों ने पत्थर लगने से इन्कार कर दिया तुमने पत्थरों पर बेवफ़ाई का आरोप लगाया जवाब में पत्थरों ने और ख़ुशबू और रंग बिखेर दिए तुम कुछ भी बोओ फूल खिल कर रहेंगे तुम उन्हें कितना ही तोड़ो उजाड़ो वे उग कर रहेंगे वे महक कर रहेंगे रंग बिखेर कर रहेंगे तुम मिट्टी से लड़ नहीं सकते जो पत्थरों को भी अपना घर बना लेती है

Ep 1041Kasbon Mein Chal Pustakalay | Anamika
क़स्बों में चल पुस्तकालय । अनामिका भाषाविद तो मैं नहीं हूँ,पर बचपन में अक्सर ही सोचती थी मैं-हमारी तरफ़ रूठ जाने को क्यों कहते हैं रूस जाना ।औरतें हमारी तरफ़ की रह- रह कर क्यों रूस जाती हैं ।ऐसा क्या आकर्षण है सोवियत रूस में क्या उसका आकर्षण है वे किताबें जो सुन्दर हिंदी अनुवादों में लाती है, चल पुस्तकालय की बड़ी बड़ी वैनेंजब देखो तब रूस जाने को तैयारकस्बे की ये उदास औरतें जाओ वहाँ न जाने कहाँ लाओ उसे न जाने किसेज़ार निकोलाई कहता था दाँत पीसकर जब किसानों से रूठी हुई औरतें सुनतीं मन ही मन कुछ ठानकर कहतीं हम भी अनंत यात्रा पर निकल जाएँगी हमको अनंत यात्रा पर लिए जाएँगी ये किताबें जो आयीं हैं हमसे मिलने चल पुस्तकालय की बड़ी गाड़ियों मेंएक - दूसरे से कंधे भिड़ाती,आपस में हँसती- बतियाती किताबें जैसे कि वृद्धाएँ-किसी तीर्थयात्रा की बस में सवार एकदम मगन मन में,सोचती हुई ये कि एक पिकनिक तो हुई जीवन में ।चल पुस्तकालय की इन गाड़ियों में सट- सटकर बैठे हुए दीखते थे वेद और क़ुरान, टॉल्सटॉय, चेखव, रवीन्द्र और प्रेमचंद,यशपाल, स्वेताएवा और जैनेन्द्र ।छरियाकर घर से निकल आयी औरतों के जीवन का पहला और अंतिम रोमांस थीं किताबें ।हाथों में पुस्तक आते ही धीरे - धीरे उनकी साँसों में उगने लगती थी नरम दूब पहली बारिश से नहायी हुई ।लंबी- लंबी साँसें खींचने लगती थीं वे जैसे कि पूरी धरती की सुगन्ध खींच लेनी हो इसी वक़्त कल किसने देखा है ।इन गुप्त किताबी सुरंगों का धन्यवाद इनसे ही होती हुई तो कहाँ से कहाँ निकल गईंदुनिया से रूठी,अन्यायों से टूटी सब औरतें ।कहाँ से कहाँ निकल गईं-इसका इतिहास है गवाह! कहीं तो पहुँचती है अक्सर बेकस की आह।

Ep 1040Loktantrikta Mein Choona | Rupam Mishra
लोकतांत्रिकता में छूना। रूपम मिश्र बुख़ार से देह इतनी निढाल है कि मौत से पहले ही माटी की लगने लगी हूँघर से दूर हूँ तो घर की ज़्यादा लगने लगी हूँकदमों में चलने की ताकत नहींपर दोस्त से झूठ कहती हूँ कि आराम हैघर जाने के लिए बस की एक सुरक्षित सीट पर पसर जाती हूँखिड़की के पास की सीट अपनी लगती हैक्यों कि उसके बाद कोई कहाँ धकेलेगाबस चली नहीं है और एक सज्जन बगल की सीट पर आ गये हैंकुछ नये रंगरुट से हैं पूछते हैं कहाँ पढ़ाती होतकलीफ़ इतनी है कि होंठ खुलना ही नहीं चाहते लेकिन जवाब तो देना थाकहा कहीं नहीं! सिर को आगे की सीट पर टिका दिया है जिसपर टेरीकॉट कुर्ता पहने एक अधेड़ और उदास आदमी बैठा है जिसकी धुंवासी उंगलियों पर खड्डे ही खड्डे हैं वो मुझे चिर-परिचित सा लग रहा हैबाबतपुर हवाई अड्डे पर एक जहाज़ अभी उड़ान पर थीरास्ते में बाबतपुर हवाई अड्डे पर एक जहाज़ अभी उड़ान पर थीबगल में बैठे साहब मुझे खिड़की से जहाज़ दिखाने लगे देखो अब उड़ेगी !!पल भर को लगा जैसे कोई चीन्हार बच्ची को जादुई दुनिया दिखा रहा हो पितृ स्नेह को अहका मेरा मन सिर न उठाने की मंशा को त्याग कर उनका मन रखने को जहाज़ देखने लगादेह और मन दोनों इतने विक्लांत थे कि बार- बार देह का दाहिना हिस्सा किसी छुवन से खीजतापर भ्रम समझ फिर निढाल हो जातालेकिन अंततः देह ने कहा ये भ्रम नहीं है एक धृष्टता हैलेकिन विरोध का चेत न मन में है न देह मेंअंततः एक लोकतांत्रिक भाषा में धीमे से मैंने कहाभाई साहब आप मुझे न छुइये , देखिए मैंने अब तक एक बार भी आपको नहीं छुआ।