
Pratidin Ek Kavita
1,141 episodes — Page 5 of 23

Ep 943Purani Baatein | Shraddha Upadhyay
पुरानी बातें | श्रद्धा उपाध्याय पहले सिर्फ़ पुरानी बातें पुरानी लगती थीं अब नई बातें भी पुरानी हो गई हैं मैंने सिरके में डाल दिए हैं कॉलेज के कई दिन बचपन की यादें लगता था सड़ जाएँगी फिर किताबों के बीच रखी रखी सूख गईं कितनी तरह की प्रेम कहानियाँ उन पर नमक घिस कर धूप दिखा दी है ज़रुरत होगी तो तल कर परोस दी जाएँगीऔर इतना कुछ फ़िसल हुआ हाथों से क्योंकि नहीं आता था उन्हें कोई हुनर

Ep 942Khali Makaan | Mohammad Alvi
ख़ाली मकान।मोहम्मद अल्वीजाले तने हुए हैं घर में कोई नहीं''कोई नहीं'' इक इक कोना चिल्लाता हैदीवारें उठ कर कहती हैं ''कोई नहीं''''कोई नहीं'' दरवाज़ा शोर मचाता हैकोई नहीं इस घर में कोई नहीं लेकिनकोई मुझे इस घर में रोज़ बुलाता हैरोज़ यहाँ मैं आता हूँ हर रोज़ कोईमेरे कान में चुपके से कह जाता है''कोई नहीं इस घर में कोई नहीं पगलेकिस से मिलने रोज़ यहाँ तू आता है''

Ep 941Kahan Tak Waqt Ke Dariya Ko | Shahryar
कहाँ तक वक़्त के दरिया को । शहरयारकहाँ तक वक़्त के दरिया को हम ठहरा हुआ देखेंये हसरत है कि इन आँखों से कुछ होता हुआ देखेंबहुत मुद्दत हुई ये आरज़ू करते हुए हम कोकभी मंज़र कहीं हम कोई अन-देखा हुआ देखेंसुकूत-ए-शाम से पहले की मंज़िल सख़्त होती हैकहो लोगों से सूरज को न यूँ ढलता हुआ देखेंहवाएँ बादबाँ खोलीं लहू-आसार बारिश होज़मीन-ए-सख़्त तुझ को फूलता-फलता हुआ देखेंधुएँ के बादलों में छुप गए उजले मकाँ सारेये चाहा था कि मंज़र शहर का बदला हुआ देखेंहमारी बे-हिसी पे रोने वाला भी नहीं कोईचलो जल्दी चलो फिर शहर को जलता हुआ देखें

Ep 940Kharab Television Par Pasandeeda Programme | Satyam Tiwari
ख़राब टेलीविज़न पर पसंदीदा प्रोग्राम देखते हुए | सत्यम तिवारी दीवारों पर उनके लिए कोई जगह न थी और नए का प्रदर्शन भी आवश्यक था इस तरह वे बिल्लियों के रास्ते में आए और वहाँ से हटने को तैयार न हुए यहीं से उनकी दुर्गति शुरू हुई उनका सुसज्जित थोबड़ा बिना ईमान के डर से बिगड़ गया अपने आधे चेहरे से आदेशवत हँसते हुए वे बिल्कुल उस शोकाकुल परिवार की तरह लगते जिनके घर कोई नेता खेद व्यक्त करने पहुँच जाता है बाक़ी बचे आधे में वे कुछ कुछ रुकते फिर दरक जाते जब हम उन्हें देख रहे होते हैं वे किसे देख रहे होते हैं ये सचमुच देखे जाने का विषय है क्या सात बजकर तीस मिनट पर एक अधपकी कच्ची नींद लेते हुए उन्हें अचानक याद आता होगा कि यह उनके पसंदीदा प्रोग्राम का वक़्त है या हर रविवार दोपहर बारह के आस-पास प्रसारित होती हुई कोई फ़ीचर फ़िल्म या कार्यक्रम चित्रहार देख कर उनकी ज़िन्दगी रिवाइंड होती होगी मसलन कॉलेज के दिनों में सुने हुए गीतों की याद या गीत गाते हुए खाई गई क़समों की कसक टीन के डब्बे नहीं हैं टेलीविजन फिर भी उन्होंने वही चाहा जो घड़ियाँ चाहती रही हैं इतने दिनों तक घड़ी दो घड़ी दिखना भर यानी कोई उन्हें देखे सिर्फ़ देखने के मक़सद से जिसे हम मज़ाक़ मज़ाक़ में टीवी देखना कह देते हैं जब बिजली गुल हो उस वक़्त उन्हें देखने से शायद कुछ ऐसा दिख जाए जो तब नहीं दिखता जब टीवी देखना छोड़ कर लोग तमाशा देखने लग जाते हैं जो टीवी पर आता है

Ep 939Free Will | Darpan Sah
फ़्री विल । दर्पण साह अगस्त का महिना हमेशा जुलाई के बाद आता है,ये साइबेरियन पक्षियों को नहीं मालूममैं कोई निश्चित समय-अंतराल नहीं रखता दो सिगरेटों के बीचखाना ठीक समय पर खाता हूँऔर सोता भी अपने निश्चित समय पर हूँअपने निश्चित समय परक्रमशः जब नींद आती है और जब भूख लगती हैइससे ज़्यादा ठीक समय का ज्ञान नहीं मुझेजब चीटियों की मौत आती है, तब उनके पंख उगते हैंऔर जब मेरी इच्छा होती है तब दिल्ली में बारिश होती हैकई बार मैंने अपनी घड़ी में तीस भी बजाए हैंमेरे कैलेंडर के कई महीने चालीस दिन के भी गये हैंमैं यहाँ पर लीप ईयर की बात नहीं करूँगामुक्ति और आज़ादी में अंतस और वाह्य का अंतर होता है

Ep 938Prarthna | Antonio Rinaldi | Translation - Dharamvir Bharti
प्रार्थना। अन्तोन्यो रिनाल्दीअनुवाद : धर्मवीर भारतीसई साँझआँखें पलकों में सो जाती हैंअबाबीलें घोसलों मेंऔर ढलते दिन में से आती हुईएक आवाज़ बतलाती है मुझेअँधेरे में भी एक संपूर्ण दृष्टि हैमैं भी थक कर पड़ रहा हूँजैसे उदास घास की गोद मेंफूलधूप के साथ सोने के लिएहवा हमारी रखवाली करे—हमें जीत ले यह आस्मान कीनिचाट ज़िंदगी जो हर दर्द को धारण करती है

Ep 937Lagta Nahi Hai Dil Mera | Bahadur Shah Zafar
लगता नहीं है दिल मिरा उजड़े दयार में । बहादुर शाह ज़फ़रलगता नहीं है दिल मिरा उजड़े दयार मेंकिस की बनी है आलम-ए-ना-पाएदार मेंइन हसरतों से कह दो कहीं और जा बसेंइतनी जगह कहाँ है दिल-ए-दाग़-दार मेंकाँटों को मत निकाल चमन से ओ बाग़बाँये भी गुलों के साथ पले हैं बहार मेंबुलबुल को बाग़बाँ से न सय्याद से गिलाक़िस्मत में क़ैद लिक्खी थी फ़स्ल-ए-बहार मेंकितना है बद-नसीब 'ज़फ़र' दफ़्न के लिएदो गज़ ज़मीन भी न मिली कू-ए-यार में

Ep 936Ghaas | Carl Sandburg | Translation - Dharamvir Bharti
घास । कार्ल सैंडबर्गअनुवाद : धर्मवीर भारतीआस्टरलिज़ हो या वाटरलूलाशों का ऊँचे से ऊँचा ढेर हो—दफ़ना दो; और मुझे अपना काम करने दो!मैं घास हूँ, मैं सबको ढँक लूँगीऔर युद्ध का छोटा मैदान हो या बड़ाऔर युद्ध नया हो या पुरानाढेर ऊँचे से ऊँचा हो, बस मुझे मौक़ा भर मिलेदो बरस, दस बरस—और फिर उधर सेगुज़रने वाली बस के मुसाफ़िरपूछेंगे : यह कौन सी जगह है?हम कहाँ से होकर गुज़र रहे हैं?यह घास का मैदान कैसा है?मैं घास हूँसबको ढँक लूँगी!

Ep 935Jo Ulajh Kar Rah Gayi Filon Ke Jaal Mein | Adam Gondvi
जो उलझकर रह गई है फ़ाइलों के जाल में । अदम गोंडवीजो उलझकर रह गई है फ़ाइलों के जाल मेंगाँव तक वह रौशनी आएगी कितने साल मेंबूढ़ा बरगद साक्षी है किस तरह से खो गईरमसुधी की झोंपड़ी सरपंच की चौपाल मेंखेत जो सीलिंग के थे सब चक में शामिल हो गएहमको पट्टे की सनद मिलती भी है तो ताल मेंजिसकी क़ीमत कुछ न हो इस भीड़ के माहौल मेंऐसा सिक्का ढालिए मत जिस्म की टकसाल में

Ep 934Aastha | Priyankshi Mohan
आस्था | प्रियाँक्षी मोहनइस दुनिया को युद्धों ने उतना तबाह नहीं किया जितना तबाह कर दियाप्यार करने की झूठी तमीज़ नेप्यार जो पूरी दुनिया मेंवैसे तो एक सा ही थापर उसे करने की सभी नेअपनी अपनी शर्त रखी और प्यार को कई नाम, कविताओं, कहानियों, फूलों, चांद तारों औरजाने किन किनउपमाओं में बांट दियाजबकि प्यार को उतना ही नग्नऔर निहत्था होना थाजितना किसी पर अटूट आस्था रखना होता हैवह सच्ची आस्था जिसको आज तक कोई तमीज़,तावीज़ या तागा नहीं तोड़ सके।

Ep 933Anubhav | Nilesh Raghuvanshi
अनुभव | नीलेश रघुवंशी तो चलूँ मैं अनुभवों की पोटली पीठ पर लादकर बनने लेखकलेकिन मैंने कभी कोई युद्ध नहीं देखाखदेड़ा नहीं गया कभी मुझे अपनी जगह सेनहीं थर्राया घर कभी झटकों से भूकंप केपानी आया जीवन में घड़ा और बारिश बनकरविपदा बनकर कभी नहीं आई बारिशदंगों में नहीं खोया कुछ भी न खुद को न अपनों कोकिसी के काम न आया कैसा हलका जीवन है मेरातिस पर मुझे कागज़ की पुड़िया बाँधना नहीं आता लाख कोशिश करूँ सावधानी बरतूँ खुल ही जाती है पुड़ियापुड़िया चाहे सुपारी की हो या हो जलेबी कीनहीं बँधती तो नहीं बँधती मुझसे कागज़ की पुड़िया नहीं सधतीअगर मैं लकड़हारा होती तो कितने करीब होती जंगल केहोती मछुआरा तो समुद्र मेरे आलिंगन में होताअगर अभिनय आता होता मुझे तो एक जीवन में जीती कितने जीवनजीवन में मलाल न होता राजकुमारी होती तो कैसी होतीऔर तो और अगले ही दिन लकड़हारिन बनकर घर-घर लकड़ी पहुँचातीअगर मैं जादूगर होती तोपल-भर में गायब कर देती सिंहासन पर विराजे महाराजा दुःख कोसचमुच कंचों की तरह चमका देती हर एक का जीवनसोचती बहुत हूँ लेकिन कर कुछ नहीं पाती हूँ मेरा जीवन न इस पार का है न उस पार कातो कैसे निकलूं मैं अनुभवों की पोटली पीठ पर लादकर बनने लेखक ?

Ep 932Stree Ka Chehra | Anita Verma
स्त्री का चेहरा। अनीता वर्माइस चेहरे पर जीवन भर की कमाई दिखती हैपहले दुख की एक परतफिर एक परत प्रसन्नता कीसहनशीलता की एक और परतएक परत सुंदरताकितनी किताबें यहाँ इकट्ठा हैंदुनिया को बेहतर बनाने का इरादाऔर ख़ुशी को बचा लेने की ज़िदएक हँसी है जो पछतावे जैसी हैऔर मायूसी उम्मीद की तरहएक सरलता है जो सिर्फ़ झुकना जानती हैएक घृणा जो कभी प्रेम का विरोध नहीं करतीआईने की तरह है स्त्री का चेहराजिसमें पुरुष अपना चेहरा देखता हैबाल सँवारता है मुँह बिचकाता हैअपने ताक़तवर होने की शर्म छिपाता हैइस चेहरे पर जड़ें उगी हुई हैंपत्तियाँ और लतरें फैली हुई हैंदो-चार फूल हैं अचानक आई हुई ख़ुशी केयहाँ कभी-कभी सूरज जैसी एक लपट दिखती हैऔर फिर एक बड़ी-सी ख़ाली जगह

Ep 931Jeb Mein Sirf Do Rupaye | Kumar Ambuj
जेब में सिर्फ़ दो रुपये - कुमार अम्बुज घर से दूर निकल आने के बाद अचानक आया याद कि जेब में हैं सिर्फ दो रुपये सिर्फ़ दो रुपये होने की असहायता ने घेर लिया मुझे डर गया मैं इतना कि हो गया सड़क से एक किनारे एक व्यापारिक शहर के बीचोबीच खड़े होकर यह जानना कितना भयावह है कि जेब में है कुल दो रुपयेआस पास से जा रहे थे सैकड़ों लोग उनमें से एक-दो ने तो किया मुझे नमस्कार भी जिससे और ज़्यादा डरा मैं उन्हें शायद नहीं था मालूम कि जिससे किया उन्होंने नमस्कार उसके पास हैं सिर्फ़ दो रुपये महज़ दो रुपए होने की निरीहता बना देती है निर्बल जब चारों तरफ़ दिख रहा हो ऐश्वर्य जब चारों तरफ़ से पड़ रही हो मार, तब निहत्था हो जाना है ज़िन्दगी के उस वक़्त में जब जेब में हों केवल दो रुपये फिर उनका तो क्या कहें इस संसार में जिनकी जेब में नहीं हैं दो रुपये भी ।

Ep 93018 Number Bench Par | Doodhnath Singh
18 नम्बर बेंच पर। दूधनाथ सिंह18 नम्बर बेंच पर कोई निशान नहींचारों ओर घासफूस –- जंगली हरियालीकीड़े-मकोड़े मच्छर अँधेरा वर्षा से धुली हरी-चिकनी काई की लसलसचींटियों के भुरेभुरे बिल –- सन्नाटाबैठा सन्नाटा । क्षण वह धुल-पुँछ बराबरकौन यहाँ आया बदलती प्रकृति के अलावाप्रशासनिक भवन से दूर कुलसचिव के सुरक्षा-गॉर्डकी नज़रों से बाहर ऋत्विक घटक की डोलतीदुबली छाया से उतर कौन यहाँ आयाएकान्त की मृत्यु बस रोज़ रात -– व्यर्थवृक्षों की छिदरी छाँह, झूमती हवा की चीत्कार संगमैं फिरता वहाँसब कुछ गुज़रता है चुपचापआज रात नहीं कोई वहाँबात नहीं कोईझँपती आँख नहीं कोई ।

Ep 929Nanhi Pujaran | Asrar-Ul-Haq-Majaz
नन्ही पुजारन।असरार-उल-हक़ मजाज़इक नन्ही मुन्नी सी पुजारनपतली बाँहें पतली गर्दनभोर भए मंदिर आई हैआई नहीं है माँ लाई हैवक़्त से पहले जाग उठी हैनींद अभी आँखों में भरी हैठोड़ी तक लट आई हुई हैयूँही सी लहराई हुई हैआँखों में तारों की चमक हैमुखड़े पे चाँदी की झलक हैकैसी सुंदर है क्या कहिएनन्ही सी इक सीता कहिएधूप चढ़े तारा चमका हैपत्थर पर इक फूल खिला हैचाँद का टुकड़ा फूल की डालीकम-सिन सीधी भोली भालीहाथ में पीतल की थाली हैकान में चाँदी की बाली हैदिल में लेकिन ध्यान नहीं हैपूजा का कुछ ज्ञान नहीं हैकैसी भोली छत देख रही हैमाँ बढ़ कर चुटकी लेती हैचुपके चुपके हँस देती हैहँसना रोना उस का मज़हबउस को पूजा से क्या मतलबख़ुद तो आई है मंदिर मेंमन उस का है गुड़िया-घर में

Ep 928Mujhe Sneh Kya Mil Na Sakega? | Suryakant Tripathi Nirala
मुझे स्नेह क्या मिल न सकेगा?। सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला'मुझे स्नेह क्या मिल न सकेगा?स्तब्ध, दग्ध मेरे मरु का तरुक्या करुणाकर खिल न सकेगा?जग के दूषित बीज नष्ट कर,पुलक-स्पंद भर, खिला स्पष्टतर,कृपा-समीरण बहने पर, क्याकठिन हृदय यह हिल न सकेगा?मेरे दु:ख का भार, झुक रहा,इसीलिए प्रति चरण रुक रहा,स्पर्श तुम्हारा मिलने पर, क्यामहाभार यह झिल न सकेगा?

Ep 927Shuddhikaran | Hemant Deolekar
शुद्धिकरण | हेमंत देवलेकर इतनी बेरहमी से निकाले जा रहेछिलके पानी केकि ख़ून निकल आया पानी काउसकी आत्मा तक को छील डाला रंदे सेयह पानी को छानने का नहींउसे मारने का दृश्य हैएक सेल्समैन घुसता है हमारे घरों मेंभयानक चेतावनी की भाषा मेंकि संकट में हैं आप के प्राणऔर हम अपने ही पानी पर कर बैठते हैं संदेहजब वह कांच के गिलास मेंपानी को बांट देता है दो रंगों मेंहम देख नहीं पाते"फूट डालो और राज करों" नीति का नया चेहरावह आपकी आंखों के सामनेपानी के बेशकीमती खनिज लूटकर किसी तांत्रिक की तरह हो जाता है फ़रार'पानी बचाओ, पानी बचाओ' गाने वाली दुनिया देख नहीं पाती यह संहार ।

Ep 926Prem Aur Ghruna | Natasha
प्रेम और घृणा | नताशातुम भेजना प्रेमबार-बार भेजनाभले ही मैं वापस कर दूँलौटेगा प्रेम ही तुम्हारे पासपर मत भेजना कभी घृणाघृणा बंद कर देती है दरवाज़ेअँधेरे में क़ैद कर लेती हैहम प्रेम सँजो नहीं पातेऔर घृणा पाल बैठते हैंप्रेम के बदलेन भी लौटा प्रेमतो लौटेगीचुप्पीबेबसीप्रेम अपरिभाषित ही सहीघृणापरिभाषा से भी ज़्यादा कट्टर होती है!

Ep 925Antardwand | Alain Bosquet | Translation - Dharamvir Bharti
अंतर्द्वंद | आलेन बास्केटअनुवाद : धर्मवीर भारतीमेरा बायाँ हाथ मुझे प्राणदंड देता हैमेरा दायाँ हाथ मेरी रक्षा करता हैमेरी आँखें मुझे निर्वासन देती हैंमेरी वाणी मुझे प्रताड़ित करती है :अब समय आ गया है कि तुमअपने साथ संधिपत्र पर हस्ताक्षर कर दो!और इस पुराने हृदय मेंहज़ारों लड़ाइयाँ लड़ी जा रही हैंमेरे शत्रु और मेरे हताश मित्रों के बीचजो अंत में समझौता कर लेंगे।और ऐसी शांति का नया संसार बसाएँगेजिसमें मेरे लिए कोई स्थान नहीं होगा!

Ep 924Jahaz Ka Panchhi | Krishna Mohan Jha
जहाज़ का पंछी | कृष्णमोहन झाजैसे जहाज़ का पंछीअनंत से हारकरफिर लौट आता है जहाज़ परइस जीवन के विषन्न पठार पर भटकता हुआ मैंफिर तुम्हारे पास लौट आया हूँस्मृतियाँ भाग रही हैं पीछे की तरफ़समय दौड़ रहा आगे धप्-धप्और बीच में प्रकंपित मैंअपने छ्लछ्ल हृदय और अश्रुसिक्त चेहरे के साथतुम्हारी गोद में ऐसे झुका हूँजैसे बहते हुए पानी में पेड़ों के प्रतिबिम्ब थरथराते हैं…नहींदुःख कतई नहीं है यहऔर कहना मुश्किल है कि यही सुख हैइन दोनों से परेपारे की तरह गाढ़ा और चमकदारयह कोई और ही क्षण हैजिससे गुज़रते हुए मैं अनजाने ही अमर हो रहा हूँ…

Ep 923Pyar Ke Bahut Chehre Hain | Navin Sagar
प्यार के बहुत चेहरे हैं / नवीन सागरमैं उसे प्यार करतायदि वहख़ुद वह होतीमैं अपना हृदय खोल देतायदि वहअपने भीतर खुल जातीमैं उसे छूतायदि वह देह होतीऔर मेरे हाथ होते मेरे भाव!मैं उसे प्यार करतायदि मैं पत्ता या हवा होताया मैं ख़ुद को नहीं जानतामैं जब डूब रहा थावह उभर रही थीजिस पल उसकी झलक दिखीमैं कभी-कभी डूब रहा हूँवह अभी-अभी अपने भीतर उभर रही हैमैं उसे प्यार करतायदि वह जानतीमैं ख़ामोशी की लय में अकेला उसे प्यार करता हूँप्यार के बहुत चेहरे हैं।

Ep 922Kai Aankhon Ki Hairat They Nahi Hain | Aks Samastipuri
कई आँखों की हैरत थे नहीं हैं | अक्स समस्तीपुरी कई आँखों की हैरत थे नहीं हैंनये मंज़र की सूरत थे नहीं हैंबिछड़ने पर तमाशा क्यों बनाएँतुम्हारी हम ज़रूरत थे नहीं हैं

Ep 921Awara Ke Daag Chahiye | Devi Prasad Mishra
आवारा के दाग़ चाहिए | देवी प्रसाद मिश्रदो वक़्तों का कम से कम तो भात चाहिएगात चाहिए जो न काँपेसत्ता के सम्मुख जो कह दूँबात चाहिए कि छिप जाने को रात चाहिएपूरी उम्र लगें कितने ही दाग़ चाहिएमात चाहिए बहुत इश्क़ में फ़ाग चाहिएराग चाहिए साथ चाहिएउठा हुआ वह हाथ चाहिए नाथ चाहिए नहींकि अपना माथ चाहिए झुके नहीं जोराख चाहिए इच्छाओं की भूख लगी हैसाग चाहिए बाग़ चाहिए सोना है अबलाग चाहिए बहुत विफल का भाग चाहिएआवारा के दाग़ चाहिए बहुत दिनों तक गूँजेगी जोआह चाहिए जाकर कहीं लौटकर आती राह चाहिएइश्क़ होय तो आग चाहिए।

Ep 920Lagaav | Ramdarash Mishra
लगाव | रामदरश मिश्र उसने कविता में लिखा 'फूल'तुमने उसे काटकर 'कीचड़' लिख दियाउसने कविता में लिखा 'चिड़िया'तुमने उसे काटकर 'गुरिल्ला' लिख दियाऔर आपस में जूझने लगेदरअसल तुम दोनों कान फूल से कोई लगाव-अलगाव थान चिड़िया सेतुम दोनों कोअपने-अपने अस्तित्व की चिन्ता सताती रहीऔरतुम्हारी बहसों से बेख़बरमस्ती से फूल खिलता रहाचिड़िया गाती रही।

Ep 919Main Ud Jaunga | Rajesh Joshi
मैं उड़ जाऊँगा | राजेश जोशी सबको चकमा देकर एक रातमैं किसी स्वप्न की पीठ पर बैठकर उड़ जाऊँगाहैरत में डाल दूँगा सारी दुनिया कोसब पूछते बैठेंगेकैसे उड़ गया ?क्यों उड़ गया ?तंग आ गया हूँ मैं हर पल नष्ट हो जाने कीआशंका से भरी इस दुनिया सेऔर भी ढेर तमाम जगह हैं इस ब्रह्मांड मेंमैं किसी भी दुसरे ग्रह पर जाकर बस जाऊँगामैं तो कभी का उड़ गया होताचाय की गुमटियों और ढाबों में गरम होते तन्दूर परसिंकती रोटियों के लालच में मैं हिलगा रहा इतने दिनट्रक ड्राइवरों से बतियाते हुएमैदान में पड़ी खटियों परगुज़ार दीं मैंने इतनी रातेंक्या यह सुनने को बैठा रहूँ धरती परकि पालक मत खाओ ! मेथी मत खाओ !मत खाओ हरी सब्ज़ियाँ !मैं सारे स्वप्नों को गूँथ-गूँथकरएक खूब लम्बी नसैनी बनाऊँगाऔर सारे भले लोगों को ऊपर चढ़ाकरहटा लूँगा नसैनीऊपर किसी ग्रह पर बैठकरठेंगा दिखाऊँगा मैं सारे दुष्टों कोकर डालो कर डालो जैसे करना हो नष्टइस दुनिया कोमैं वहीं उगाऊँगा हरी सब्ज़ियाँ औरतन्दूर लगाऊँगादेखना एक रातमैं सचमुच उड़ जाऊँगा।

Ep 918Dekho Socho Samjho | Bhagwati Charan Verma
देखो-सोचो-समझो | भगवतीचरण वर्मादेखो, सोचो, समझो, सुनो, गुनो औ' जानोइसको, उसको, सम्भव हो निज को पहचानोलेकिन अपना चेहरा जैसा है रहने दो,जीवन की धारा में अपने को बहने दोतुम जो कुछ हो वही रहोगे, मेरी मानो ।वैसे तुम चेतन हो, तुम प्रबुद्ध ज्ञानी होतुम समर्थ, तुम कर्ता, अतिशय अभिमानी होलेकिन अचरज इतना, तुम कितने भोले होऊपर से ठोस दिखो, अन्दर से पोले होबन कर मिट जाने की एक तुम कहानी हो ।पल में रो देते हो, पल में हँस पड़ते हो,अपने में रमकर तुम अपने से लड़ते होपर यह सब तुम करते - इस पर मुझको शक है,दर्शन, मीमांसा - यह फुरसत की बकझक है,जमने की कोशिश में रोज़ तुम उखड़ते हो ।थोड़ी-सी घुटन और थोड़ी रंगीनी में,चुटकी भर मिरचे में, मुट्ठी भर चीनी में,ज़िन्दगी तुम्हारी सीमित है, इतना सच है,इससे जो कुछ ज़्यादा, वह सब तो लालच हैदोस्त उम्र कटने दो इस तमाशबीनी में ।धोखा है प्रेम-बैर, इसको तुम मत ठानोकडुआ या मीठा ,रस तो है छक कर छानो,चलने का अन्त नहीं, दिशा-ज्ञान कच्चा हैभ्रमने का मारग ही सीधा है, सच्चा हैजब-जब थक कर उलझो, तब-तब लम्बी तानो ।

Ep 917Isiliye | Gagan Gill
इसीलिए | गगन गिलवह नहीं होगा कभी भी फाँसी पर झूलता हुआ आदमीवारदात की ख़बरें पढ़ते हुए सोचता था वह गर्दन के पीछे हो रही सुरसुरी को वह मुल्तवी करता रहता था तमाम ख़बरों के बावजूद सोचता था अपने लिए एक बिलकुल अलग अंतइसीलिए जब अंत आया तो अलग तरह से नहीं आया

Ep 916Ve Sab Meri Hi Jaati Se Thin | Rupam Mishra
वे सब मेरी ही जाति से थीं | रूपम मिश्र मुझे तुम ने समझाओ अपनी जाति को चीन्हना श्रीमानबात हमारी है हमें भी कहने दोये जो कूद-कूद कर अपनी सहुलियत से मर्दवाद का बहकाऊ नारा लगाते होउसे अपने पास ही रखो तुमबात सत्ता की करोजिसने अपने गर्वीले और कटहे पैर से हमेशा मनुष्यता को कुचला हैजिसकी जरासन्धी भुजा कभी कटती भी है तो फिर से जुड़ जाती हैरामचरितमानस में शबरी-केवट-प्रसंग सुनती आजी सुबक उठतीं औरघुरहू चमार के डेहरी छूने पर तड़क कर सात पुश्तों को गाली देतींकोख और वीर्य की कोई जाति नहीं होती यह वे भी जानती थींजो पति की मोटरसाइकिल पर दौड़ती रहीं जौनपुर से बनारस तकगर्भ में आई बेटी को मारने के लिएजो घर के किसी मांगलिक कार्य में बैठने से इनकार कर देती हैंबिना सोने का बड़का हार पहने, सब मेरी ही जाति से हैंचकबन्दी के समय एक निरीह स्त्री का खित्ता हड़पने के लिएजिसने अपनी बेटियों को कानूनगो के साथ सुलायाजो रात भर बच्चे की दवाई की शीशी से बनेदीये के साथ साँकल चढ़ाए जलती रहीऔर थूकती रही इस लभजोर समाज परवह भी मेरी ही जाति से थीजानते तो अप भी बहुत कुछ नहीं हैं महाराज!हरवाह बुधई का लड़का जिसे हल का फार लगातो खौलता हुआ कडु का तेल डाल दिया गयाउसका चीख कर बेहोश होना ज़मींदार के बेटों का मनोरंजन बनाबुधई का लड़का अब बड़ा हो गया हैऔर उसी परिवार के प्रधान बेटे की राइफल लेकरभइया ज़िंदाबाद के नारे लगाता हैतो हाँफता समाजवाद वहीं सिर पकड़कर बैठ जाता हैमेरी लड़खड़ाती आवाज़ पर आप हँस सकते हैंक्योंकि मेरी आत्मा की तलछट में कुछ आवाज़ें बची रह गई हैंजो एक बच्ची से कहती थी कि तुम्हें किसी सखी-भौजाई ने बताया नहींकि रात में होंठों को दाँतों से दबाकरचीख कैसे रोकी जाती है जिससे कमरे से बाहर आवाज़ न जाएहम जब ठोस मुद्दे को दर्ज करना चाहते हैं तो उसे भ्रमित करने के लिए सिर सेपैर तक सुविधा और विलास में लिथड़े जन जब कुलीनता का ताना देकर व्यर्थ कीबहस शुरू करते हैं तो मैं भी चीन्ह जाती हूँ विमर्श हड़पने की नीतिमुझे आपकी पहचानने की कला पर सविनय खेद है श्रीमानक्योंकि एक आदमीपने को छोड़ आपने हर पन पहचान लियाजो घृणा के विलास से मन को अछल-विछल करता हैरोम जला भर जानना काफ़ी कैसे हो सकता हैजब रमईपुरा और कुँजड़ान कैसे जले आप नहीं जानतेजहाँ समूची आदमीयतसिर्फ़ घृणा-रसूख-नस्ल और जाति जैसे शब्दों पर खत्म हो जाती हैअपने कदमों की धमक पर इतराना तो ठीक है परबहुत मचक कर चलने पर धरती पर अतिरिक्त बोझ पड़ता हैतम अपनी बनाई प्लास्टिक की गुड़ियों से अपना दरबार सजाओ महानुभावमन की कारा में आत्मा बहुत छटपटा रही हैमुझे अपनी कंकरही ज़मीन को दर्ज करने दोजो मेरे पंजों में रह-रह कर चुभ जाती है।

Ep 915Smriti Pita | Viren Dangwal
स्मृति पिता | वीरेन डंगवालएक शून्य की परछाईं के भीतर घूमता है एक और शून्य पहिये की तरहमगर कहीं न जाता हुआ फिरकी के भीतर घूमतीएक और फिरकीशैशव के किसी मेले की

Ep 914Ve Din Aur Ye Din | Ramdarash Mishra
वे दिन और ये दिन | रामदरश मिश्रतब वे दिन आते थेउड़ते हुएइत्र-भीगे अज्ञात प्रेम-पत्र की तरहऔर महमहाते हुए निकल जाते थेउनकी महमहाहट भीमेरे लिए एक उपलब्धि थी।अब ये दिन आते हैं सरकते हुएसामने जमकर बैठ जाते हैं।परीक्षा के प्रश्न-पत्र की तरहआँखों को अपने में उलझाकर आह!हटते ही नहींये दिनजिनका परिणाम पता नहीं कब निकलेगा।

Ep 913Walid Ki Wafaat Par | Nida Fazli
वालिद की वफ़ात पर | निदा फ़ाज़लीतुम्हारी क़ब्र परमैं फ़ातिहा पढ़ने नहीं आयामुझे मालूम थातुम मर नहीं सकतेतुम्हारी मौत की सच्ची ख़बर जिस ने उड़ाई थीवो झूटा थावो तुम कब थेकोई सूखा हुआ पत्ता हवा से मिल के टूटा थामिरी आँखेंतुम्हारे मंज़रों में क़ैद हैं अब तकमैं जो भी देखता हूँसोचता हूँवो वही हैजो तुम्हारी नेक-नामी और बद-नामी की दुनिया थीकहीं कुछ भी नहीं बदलातुम्हारे हाथ मेरी उँगलियों में साँस लेते हैंमैं लिखने के लिएजब भी क़लम काग़ज़ उठाता हूँतुम्हें बैठा हुआ मैं अपनी ही कुर्सी में पाता हूँबदन में मेरे जितना भी लहू हैवो तुम्हारीलग़्ज़िशों नाकामियों के साथ बहता हैमिरी आवाज़ में छुप करतुम्हारा ज़ेहन रहता हैमिरी बीमारियों में तुममिरी लाचारियों में तुमतुम्हारी क़ब्र पर जिस ने तुम्हारा नाम लिखा हैवो झूटा हैतुम्हारी क़ब्र में मैं दफ़्न हूँतुम मुझ में ज़िंदा होकभी फ़ुर्सत मिले तो फ़ातिहा पढ़ने चले आना

Ep 912Devi Banne Ki Raah Mein | Priya Johri 'Muktipriya'
देवी बनने की राह में | प्रिया जोहरी 'मुक्ति प्रिया'देवी बनने की राह मेंलंबा सफ़र तय किया हमनेकई भूमिकाऐँ बदलीआंसू की बूंदो का स्वाद चखाखून बहायाकटा चीरा ख़ुद कोअपमान के साथझेली कई यातनाएँहमने छोड़ा अपना घरपुराने खिलौंनेअपनी प्रिय सखीअपना शहरहमने छोड़ दिया अपने सपनों कोऔर छोटी-छोटी आशाओं कोनहीं देखा कभी खुल करशहर कोनहीं जान पाए हमखुद की मर्ज़ी से जीनाकैसा होता हैरात में सड़कों पर चलता हुआशहर कैसा दिखता है।वह जगह कैसी होती है।जहाँ पर केवल देव जा सकते हैकैसे होते हैं वहस्थान जहाँ पर अजनबी चलते है।नहीं पता हमें कैसे दिखती हैंउसकी ज़मीन और आसमानहमने नहीं तोड़ी घर की दीवारेंजो हमें रोकती थीबल्कि बनाए घरसजाया घर घरौंदामिट्टी से लिपाचूल्हा चौकापकाएँ खूब पकवानकर के अपनीखुशियों कोदरकिनार,निभाया अपना देवी धर्महमने जानना छोड़ दियाहमें क्या पसंद है।हम बस चलते गएऔर सीखते गएअच्छी देवी बनने का सबक हमने मंदिरों में दिए जलायेतीज, व्रत और त्यौहार कियेहमने पीपल के पेड़ पर बांधेमनोकामनाओं की धागे नदी से,पर्वत से,चांद से,पेड़ से ,भगवान सेदेव लोक के अमरत्व कीप्राथनाएँ कीहमने वह गीत गएजो देव लोक कोप्रिय थेहमने सजाया ख़ुद कोलगाया महावरअपने पैरों मेंपहनी हाथों में चूड़ियाँसजाई बिंदीऔर कमरबंदजब तक हम देवों के साथ थेउसके बाद छोड़ दिएसारे साजो श्रृंगारहमने टाल दी लड़ाइयां किए बहुत से समझौतेताकि हमारा देवत्वहमसे न रूठेहमने देखा कियह सब भी कम पड़ाखुद को देवीसाबित करने को

Ep 911Main Sabse Choti Hun | Sumitranandan Pant
मैं सबसे छोटी हूँ | सुमित्रानंदन पन्तमैं सबसे छोटी होऊँ,तेरा अंचल पकड़-पकड़करफिरूँ सदा माँ! तेरे साथ,कभी न छोड़ूँ तेरा हाथ!बड़ा बनाकर पहले हमकोतू पीछे छलती है मात!हाथ पकड़ फिर सदा हमारेसाथ नहीं फिरती दिन-रात!अपने कर से खिला, धुला मुख,धूल पोंछ, सज्जित कर गात,थमा खिलौने, नहीं सुनातीहमें सुखद परियों की बात!ऐसी बड़ी न होऊँ मैंतेरा स्नेह न खोऊँ मैं,तेरे अंचल की छाया मेंछिपी रहूँ निस्पृह, निर्भय,कहूँ—दिखा दे चंद्रोदय!

Ep 910Aapki Yaad Aati Rahi Raat Bhar | Makdoom Mohiuddin
आप की याद आती रही रात भर | मख़दूम मुहिउद्दीनआप की याद आती रही रात भरचश्म-ए-नम मुस्कुराती रही रात भररात भर दर्द की शम्अ जलती रहीग़म की लौ थरथराती रही रात भरबाँसुरी की सुरीली सुहानी सदायाद बन बन के आती रही रात भरयाद के चाँद दिल में उतरते रहेचाँदनी जगमगाती रही रात भरकोई दीवाना गलियों में फिरता रहाकोई आवाज़ आती रही रात भर

Ep 909Khidki Par Subah | TS Eliot | Translation - Dharmvir Bharti
खिड़की पर सुबह | टी. एस. एलियटअनुवाद : धर्मवीर भारतीनीचे के बावर्चीख़ाने में खड़क रही हैं नाश्ते की तश्तरियाँऔर सड़क के कुचले किनारों के बग़ल-बग़ल—मुझे जान पड़ता है—कि गृहदासियों की आर्द्र आत्माएँअहातों के फाटकों पर अंकुरित हो रही हैं, विषाद भरीकुहरे की भूरी लहरें ऊपर मुझ तक उछाल रही हैं।सड़क के तल्ले से तुड़े मुड़े हुए चेहरेऔर मैले कपड़ों में एक गुज़रने वाली का आँसूऔर एक निरुद्देश्य मुस्कान जो हवा में चक्कर काटती हैऔर छतों की सतह पर फैलती-फैलती विलीन हो जाती है।

Ep 908Yahan Sab Theek Hai | Dheeraj
यहाँ सब ठीक है | धीरजशहर जाने वालों के पासहमेशा नहीं होते होंगेवापस लौटने के पैसेऐसे में वो ढूंढते होंगे कुछ, और उसी कुछ का सब कुछकि जैसे सब कुछ का चाय-पानीसब कुछ का नून- तेलसब कुछ का दाल-चावलऔर ऐसे में,और जब कोई नया आता होगा शहरतो उससे पूछते होंगे बरसातमेला, कजरी चैतकरते होंगे ढेरों फ़ोन पर बातऔर दोहराते होंगे बस यह बात कि यहाँ सब ठीक हैआशा करता हूँ, वहाँ भी।

Ep 907Yah Main Samajh Nahi Pati | Adiba Khanum
यह मैं समझ नहीं पाती| अदीबा ख़ानमयह मैं समझ नहीं पातीहम आख़िर किस संकोच से घिर-घिर केपछ्छाड़े खाते हैं।बार-बार भागते हैं अंदर की ओरअंदर जहां सुरक्षा है अपनी ही बनाई दीवारों कीअंदर जहां अंधेरा है.एक सुखद शान्त अंधेरा।वह कौन सी हड़डी हैजो गले में अटकी हैऔरजिसे जब चाहे निकालकर फेंका जा सकता है।लेकिनक्यों इस हड़डी का चुभते रहना हमें आनंद देता है?और आख़िर यही संकोचजिससे मैं जूझती हूं लगातारबार-बारअक्सर अपनों से दूर होकरदुसरे अपनों को अपना न पानाक्या इस शब्द का निचोड़ भर है?या है नाउम्मीदीअपनों के प्रतियह अपना होता क्या है?और पराए की धुनमुझे फिर भी कभी-कभीदूर से सुनाई पड़ती हैये धुन बजती रहती हैपार्श्व में एक गहरी शांति से लबरेज़ये सहारा देती है तबजब उठता है मोहउन लोगों से जिन्हें हम कहते हैंअपनादुनिया कहती है किमोह बहुत अच्छी चीज नहीं हैमैं पूछती हूँ कि मोह बुरी चीज़ क्यों हैजब चाँद के मोह सेखिंच सकते हैं समुद्र मनुष्य और भेड़िएतब अपनों के मोह का निष्कर्ष बुरा क्यों है?मोह सिखाती है धरतीअमोह कौन सिखाता है भला?

Ep 906Bhagwan Ke Dakiye | Ramdhari Singh Dinkar
भगवान के डाकिए | रामधारी सिंह दिनकरपक्षी और बादल,ये भगवान के डाकिए हैं,जो एक महादेश सेदूसरे महादेश को जाते हैं।हम तो समझ नहीं पाते हैंमगर उनकी लाई चिट्ठियाँपेड़, पौधे, पानी और पहाड़बाँचते हैं।हम तो केवल यह आँकते हैंकि एक देश की धरतीदूसरे देश को सुगंध भेजती है।और वह सौरभ हवा में तैरते हुएपक्षियों की पाँखों पर तिरता है।और एक देश का भापदूसरे देश में पानीबनकर गिरता है।

Ep 905Maika | Anwesha Rai 'Mandakini'
मायका | अन्वेषा राय 'मंदाकिनी'हिंदी के शब्दकोश मेंप्रत्येक शब्द का एक अर्थ लिखा है,मगर एक शब्द है जिसका अर्थना मुंशी जी को पता है,ना महादेवी कोऔर ना ही मुझे..“मायका"पढ़ने - पढाने के लिएहमेंमायके का मतलब“मा का घर" रटवा दिया गया है ।!पर हर स्त्री,जब भी लांघती हैससुराल की दहलीज़,मायके जाने के लिए,तो आगे बढने से पूर्वउसके मन मेंएक सवालखूब उधम करता है !!"माँ का घर कहाँ है!"हिंदी ने लोगों कोमायका शब्द तो दे दिया,मगर स्त्रियों कोउनकी माँ का घर नहीं दे पाईया उनका ख़ुद का घरजिसे उनकी आने वाले पीढ़ी की बेटीमाँ का घर कह सके !!शायद इसीलिए कुछ पुरुष आज भी कहते हैं“हिन्दी पढ़ के क्या होगा ?"हर स्त्री ढूंढ रही हैअपना ठिकाना शब्दों में ही कहीं..इसीलिए काम पर जाने कोघर से निकलती हर स्त्रीऔरउसकी माँया शायदउनकी भी माँ...अपना घर तलाशती फ़िर रही है...ताकि उसकी बेटी जान सकेये मायका है !!

Ep 904Pita Ka Hatyara | Madan Kashyap
पिता का हत्यारा | मदन कश्यप उसके हाथ में एक फूल होता हैजो मुझे चाकू की तरह दिखता हैसच तो यह है कि वह चाकू ही होता हैजो कैमरों में फूल जैसा दिखता हैऔर उन तमाम लोगों को भी फूल ही दिखता हैजो अपनी आँखों से नहीं देखतेवह मेरे पिता का हत्यारा हैरोज़ ही मिलता हैटेलेविज़न चैनलों और अख़बारों में ही नहींकभी-कभारसड़कों परआमने-सामने भीमैं इतना डर जाता हूँकि डरा हुआ नहीं होने का नाटक भी नहीं कर पाताचौदह वर्ष का था जब पिता की हत्या हुई थीपिछले तीन वर्षों से बस यही सीख रहा हूँकि जीने के लिए कितना ज़रूरी है मरनापिता का शव अस्पताल से घर आया थातब मुझे ठीक से पता भी नहीं था कि उनकी हत्या हुई है।हमें बताया गया था वे एक पार्टी में गये थेऔर अचानक उनके ह्रदय की गति रुक गयीतीसरे दिन हत्यारे के आ धमकने के बाद ही पता चलाकि उनकी हत्या हुई थीउसके आने से पहले चेतावनियाँ आने लगी थींधमकियाँ पहुँचने लगी थींयह प्रलोभन भी कि मैं जी सकता हूँजैसे पिता भी चाहते तो जी सकते थेबिल्कुल मेरे घर वह अकेले ही आयासफेद कपड़ों में निहत्था एक तन्दुरुस्त आदमीउसने अंगरक्षकों को कुछ पीछे औरअपने समर्थकों को कुछ और अधिक पीछे रोक दिया थामेरे माथे पर हाथ फेरालगा जैसे चमड़े सहित मेरे बाल नुच जायेंगेसिसकते हुए मैं अपने गालों पर लुढ़क रहेआँसुओं को छूकर आश्वस्त हुआवह ख़ून की धार नहीं थीवह बिना किसी आग्रह के बैठ गयाऔर हमारे ही घर में हमें बैठने का इशारा कियाफिर धीरे-धीरे बोलने लगामानो मुझसे या मेरी माँ से नहींकिसी अदृश्य से बातें कर रहा होकरनी पड़ती हैहत्या भी करनी पड़ती है।तुम बच्चे हो और तुम्हारी माँ एक विधवाधीरे-धीरे सब समझ जाओगेमैं समझता हूँ तुम अभी जीना चाहते होऔर मैं भी इस मामले को यहीं ख़त्म कर देना चाहता हूँयह इकलौती नहीं हैऔर भी हत्याएँ हैं और भी हत्याएँ होनी हैंतुम्हें साफ-साफ बता दूँकि हत्या मेरी मजबूरी या ज़रूरत भर नहीं है।वे और हैं जो राजनीति के लिए हत्याएँ करते हैंमैं हत्या के लिए राजनीति करता हूँहत्या को संस्कृति का अनिवार्य हिस्सा बनाकरतमाम विवादों - बहसों को ख़त्म कर दूँगा एक साथऔर जाते-जाते तुम्हें साफ-साफ बता दूँतुम्हारे पिता की हत्या ही हुई थीक्योंकि वह मुझे हत्यारा सिद्ध करने की ज़िद नहीं छोड़ रहे थेअब तुम ऐसी कोई ज़िद मत पालनावह चला गया तब कैमरेवाले आयेमैंने साफ-साफ कहा मेरे पिता की हत्या नहीं हुई थीवह स्वाभाविक मौत थी ज़्यादा से ज़्यादा दुर्घटना कह सकते हैंफिर मैंने स्कूल में अपने साथियों को ही नहींसड़क के राहगीरों और पड़ोसियों को ही नहींघर में अपने दादाजी को भी बतायामेरे पिता की हत्या नहीं हुई थीबस एक वही थे जो मान नहीं रहे थेऔर एक दिन तो मैं सपने में चिल्ला उठानहीं-नहीं मेरे पिता की हत्या नहीं हुई थी!

Ep 903Janhit Ka Kaam | Kedarnath Singh
जनहित का काम | केदारनाथ सिंहमेह बरसकर खुल चुका थाखेत जुतने को तैयार थेएक टूटा हुआ हल मेड़ पर पड़ा थाऔर एक चिड़िया बार-बार बार-बारउसे अपनी चोंच सेउठाने की कोशिश कर रही थीमैंने देखा और मैं लौट आयाक्योंकि मुझे लगा मेरा वहाँ होनाजनहित के उस काम मेंदखल देना होगा।

Ep 902Ek Ajeeb Si Mushkil | Kunwar Narayan
एक अजीब-सी मुश्किल | कुँवर नारायणएक अजीब-सी मुश्किल में हूँ इन दिनों—मेरी भरपूर नफ़रत कर सकने की ताक़तदिनोंदिन क्षीण पड़ती जा रहीअंग्रेज़ों से नफ़रत करना चाहताजिन्होंने दो सदी हम पर राज कियातो शेक्सपीयर आड़े आ जातेजिनके मुझ पर न जाने कितने एहसान हैंमुसलमानों से नफ़रत करने चलतातो सामने ग़ालिब आकर खड़े हो जातेअब आप ही बताइए किसी की कुछ चलती हैउनके सामने?सिखों से नफ़रत करना चाहतातो गुरु नानक आँखों में छा जातेऔर सिर अपने आप झुक जाताऔर ये कंबन, त्यागराज, मुत्तुस्वामी...लाख समझाता अपने कोकि वे मेरे नहींदूर कहीं दक्षिण के हैंपर मन है कि मानता ही नहींबिना उन्हें अपनाएऔर वह प्रेमिकाजिससे मुझे पहला धोखा हुआ थामिल जाए तो उसका ख़ून कर दूँ!मिलती भी है, मगरकभी मित्रकभी माँकभी बहन की तरहतो प्यार का घूँट पीकर रह जाताहर समयपागलों की तरह भटकता रहताकि कहीं कोई ऐसा मिल जाएजिससे भरपूर नफ़रत करकेअपना जी हल्का कर लूँपर होता है इसका ठीक उलटाकोई-न-कोई, कहीं-न-कहीं, कभी-न-कभीऐसा मिल जाताजिससे प्यार किए बिना रह ही नहीं पातादिनोंदिन मेरा यह प्रेम-रोग बढ़ता ही जा रहाऔर इस वहम ने पक्की जड़ पकड़ ली हैकि वह किसी दिन मुझेस्वर्ग दिखाकर ही रहेगा।

Ep 901Prem | Krishna Mohan Jha
प्रेम | कृष्णमोहन झाएक माहिर चीते की तरहअपने पंजों को दबा कर आता है प्रेमऔर जबड़े में उठाकर तुम्हें ले जाता हैअगले दिनया अगले के अगले दिनपंजों के निशान देखती है दुनियालेकिन उसेतुम्हारे टपकते रक्त का पता नहीं चलतातुम्हें भी कहाँ पता चलता हैकि जिस जबड़े में तुम फँस गए हो अचानकउसका नाम मृत्यु हैया है प्रेम

Ep 900Koshish Karne Walon Ki Haar Nahi Hoti | Sohanlal Dwivedi
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती | सोहनलाल द्विवेदीलहरों से डर कर नौका पार नहीं होतीकोशिश करने वालों की हार नहीं होतीनन्हीं चींटी जब दाना लेकर चलती हैचढ़ती दीवारों पर, सौ बार फिसलती हैमन का विश्वास रगों में साहस भरता हैचढ़कर गिरना, गिरकर चढ़ना न अखरता हैआख़िर उसकी मेहनत बेकार नहीं होतीकोशिश करने वालों की हार नहीं होतीडुबकियां सिंधु में गोताखोर लगाता हैजा जाकर खाली हाथ लौटकर आता हैमिलते नहीं सहज ही मोती गहरे पानी मेंबढ़ता दुगना उत्साह इसी हैरानी मेंमुट्ठी उसकी खाली हर बार नहीं होतीकोशिश करने वालों की हार नहीं होतीअसफलता एक चुनौती है, स्वीकार करोक्या कमी रह गई, देखो और सुधार करोजब तक न सफल हो, नींद चैन को त्यागो तुमसंघर्ष का मैदान छोड़ मत भागो तुमकुछ किये बिना ही जय जयकार नहीं होतीकोशिश करने वालों की हार नहीं होती

Ep 899Vijayi Vishwa Tiranga Pyara | Shyamlal Gupt 'Paarshad'
विजयी विश्व तिरंगा प्यारा | श्यामलाल गुप्त 'पार्षद'विजयी विश्व तिरंगा प्यारा,झंडा ऊंचा रहे हमारा।सदा शक्ति बरसाने वाला,प्रेम सुधा सरसाने वाला,वीरों को हरषाने वाला,मातृभूमि का तन-मन सारा। झंडा...।स्वतंत्रता के भीषण रण में,लखकर बढ़े जोश क्षण-क्षण में,कांपे शत्रु देखकर मन में,मिट जाए भय संकट सारा। झंडा...।इस झंडे के नीचे निर्भय,लें स्वराज्य यह अविचल निश्चय,बोलें भारत माता की जय,स्वतंत्रता हो ध्येय हमारा। झंडा...।आओ! प्यारे वीरो, आओ।देश-धर्म पर बलि-बलि जाओ,एक साथ सब मिलकर गाओ,प्यारा भारत देश हमारा। झंडा...।इसकी शान न जाने पाए,चाहे जान भले ही जाए,विश्व-विजय करके दिखलाएं,तब होवे प्रण पूर्ण हमारा। झंडा...।विजयी विश्व तिरंगा प्यारा,झंडा ऊंचा रहे हमारा।

Ep 898Sab Kuch Keh Lene Ke Baad | Sarveshwar Dayal Saxena
सब कुछ कह लेने के बाद | सर्वेश्वरदयाल सक्सेनासब कुछ कह लेने के बादकुछ ऐसा है जो रह जाता है,तुम उसको मत वाणी देना।वह छाया है मेरे पावन विश्वासों की,वह पूँजी है मेरे गूँगे अभ्यासों की,वह सारी रचना का क्रम है,वह जीवन का संचित श्रम है,बस उतना ही मैं हूँ,बस उतना ही मेरा आश्रय है,तुम उसको मत वाणी देना।वह पीड़ा है जो हमको, तुमको, सबको अपनाती है,सच्चाई है—अनजानों का भी हाथ पकड़ चलना सिखलाती है,वह यति है—हर गति को नया जन्म देती है,आस्था है—रेती में भी नौका खेती है,वह टूटे मन का सामर्थ है,वह भटकी आत्मा का अर्थ है,तुम उसको मत वाणी देना।वह मुझसे या मेरे युग से भी ऊपर है,वह भावी मानव की थाती है, भू पर है,बर्बरता में भी देवत्व की कड़ी है वह,इसलिए ध्वंस और नाश से बड़ी है वह,अंतराल है वह—नया सूर्य उगा लेती है,नए लोक, नई सृष्टि, नए स्वप्न देती है,वह मेरी कृति हैपर मैं उसकी अनुकृति हूँ,तुम उसको मत वाणी देना।

Ep 897Bolne Mein Kam Se Kam Bolun | Vinod Kumar Shukla
बोलने में कम से कम बोलूँ | विनोद कुमार शुक्लबोलने में कम से कम बोलूँकभी बोलूँ, अधिकतम न बोलूँइतना कम कि किसी दिन एक बातबार-बार बोलूँजैसे कोयल की बार-बार की कूकफिर चुप।मेरे अधिकतम चुप को सब जान लेंजो कहा नहीं गया, सब कह दिया गया का चुप।पहाड़, आकाश, सूर्य, चंद्रमा के बरक्सएक छोटा सा टिम-टिमातामेरा भी शाश्वत छोटा-सा चुप।ग़लत पर घात लगाकर हमला करने के सन्नाटे मेंमेरा एक चुप-चलने के पहलेएक बंदूक का चुप।और बंदूक जो कभी नहीं चलीइतनी शांति काहमेशा-की मेरी उम्मीद का चुप।बरगद के विशाल एकांत के नीचेसम्हाल कर रखा हुआजलते दिये का चुप।भीड़ के हल्ले मेंकुचलने से बचा यह मेरा चुप,अपनों के जुलूस में बोलूँकि बोलने को सम्हालकर रखूँ का चुप।

Ep 896Ghar Ki Ore | Naresh Mehta
घर की ओर | नरेश मेहता वह-जिसकी पीठ हमारी ओर हैअपने घर की ओर मुँह किये जा रहा हैजाने दो उसेअपने घर।हमारी ओर उसकी पीठ-ठीक ही तो हैमुँह यदि होतातो भी, हमारे लिए वहसिवाय एक अनाम व्यक्ति केऔर हो ही क्या सकता था?पर अपने घर-परिवार के लिए तोवह केवल मुँह नहींएक सम्भावनाओं वालीऐसी संज्ञाजिसके साथ सम्बन्धों का इतिहास होगाऔर होगी प्रतीक्षा करतीराग कीएक सम्पूर्ण भागवत-कथा।तभी तोवह-हाथ में तेल की शीशी,कन्धे की चादर मेंबच्चों के लिए चुरमुरागुड़ या मिठाईया अपनी मुनिया के लिए होगाकोई खिलौनाऔर निश्चित ही होगीबच्चों की माँ के लिए भी...(जाने दोउसकी इस व्यक्तिगत गोपनीयता की गाँठहमें नही खोलनी चाहिए।)वह जिस उत्सुकता और तेज़ी सेचल रहा हैतुम्हें नहीं लगता किएक दिन मेंवह पूरी पृथ्वी नाप सकता हैसूर्य की तरह?बशर्ते उस सिरे परसूर्य की ही तरहउसका भी घर होबच्चे हों औरइसलिए घर जाते हुए व्यक्ति मेंऔर सूर्य मेंकाफी कुछ समानता है।पुकारो नहीं-उसे जाने दोहमारी ओर पीठ होगीतभी न घर की ओर उसका मुँह होगा!सूर्य को पुकारा नहीं जाताउसे जाने दिया जाता है।

Ep 895Gaza Mein Ramzaan | Shahanshah Alam
ग़ज़ा में रमज़ान | शहंशाह आलमग़ज़ा में रमज़ान का चाँद निकला हैयह चाँद कितने चक्कर के बादबला का ख़ूबसूरत दिखाई देता हैकिसी खगोल विज्ञानी को मालूम होगाउस लड़की को भी मालूम होगाजिसके जूड़े में पिछली ईद वाली रातटांक दिया था मैंने यही चाँदलेकिन ग़ज़ा में निकला यह चाँदग़ज़ा की प्रेम करने वाली लड़कियों कोउतना ही ख़ूबसूरत दिखाई देता होगाजितना मुझसे प्रेम करने वाली लड़की कोया उन्हें चाँद की जगह बम दिखाई देता होगाजिन बमों ने उनके ख़्वाब वाले लड़कों को मार डालाया यह चाँद उनमें उकताहट पैदा कर रहा होगाकि इस चाँद को इफ्तार में खाया नहीं जा सकताग़ज़ा में रमज़ान ऐसा ही तो गुज़रने वाला हैचाँद ख़ूबसूरत दिखता है तो दिखा करे

Ep 894Bahut Dinon Se | Muktibodh
बहुत दिनों से | गजानन माधव मुक्तिबोधमैं बहुत दिनों से बहुत दिनों सेबहुत-बहुत सी बातें तुमसे चाह रहा था कहनाऔर कि साथ यों साथ-साथफिर बहना बहना बहनामेघों की आवाज़ों सेकुहरे की भाषाओं सेरंगों के उद्भासों से ज्यों नभ का कोना-कोनाहै बोल रहा धरती सेजी खोल रहा धरती सेत्यों चाह रहा कहनाउपमा संकेतों सेरूपक से, मौन प्रतीकों सेमैं बहुत दिनों से बहुत-बहुत-सी बातेंतुमसे चाह रहा था कहना!जैसे मैदानों को आसमान,कुहरे की मेघों की भाषा त्यागबिचारा आसमान कुछरूप बदलकर रंग बदलकर कहे।