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Pratidin Ek Kavita

Pratidin Ek Kavita

1,183 episodes — Page 8 of 24

Ep 835Kahan Rahegi Wah Santap Ke Saath? | Gagan Gill

कहाँ रहेगी वह संताप के साथ?/ गगन गिल अगर वह उसके सीने पररख दे अपना सिरया उसके कंधे परअगर वह छुए उसका हाथअक्तूबर की झुरझुरी में थाम ले उसकी बाँह घबराकर स्टेशन की हड़बड़ी में लौटते हुए रख दे चुपचाप उसकी गर्म गर्दन पर अलविदा का एक अधूरा, रुआँसा चुम्बन तो उस लम्बी-चौड़ी देह मेंक्या इतनी जगह होगीजहाँ वह रह सके अपने सारे संताप के साथ?

Jul 14, 20251 min

Ep 834Jab Hum Mare Jayenge | Arvind Srivastava

जब हम मारे जाएंगे | अरविन्द श्रीवास्तवजब हम बुन रहे होंगेकोई हसीन ख्वाबतुम्हारे बिल्कुल करीब आकरबाँट रहे होंगे आत्मीयताप्रेम व नग्न भाषारच रहे होंगे कविताएँतभी एक साथ उठ खड़े होंगेदुनिया के तमाम तानाशाहजिनके फरमान परहत्यारे असलहों मेंभर लेंगे बारुदऔर खोजी कुत्तेसूंघ-सूंघ कर इस धरा कोखोज निकालेंगे हमेंहम किसी कोमल औरमुलायम स्वप्न देखने के जुर्म मेंमारे जाएंगेजब हम मारे जाएंगेतब शायद हमारे लिएसबसे अधिक रोएगावह बच्चाजो हमारे खतों कोपहुँचाने के एवज मेंटॉफी पाता था।

Jul 13, 20251 min

Ep 833Marghat | Raghivir Sahay

मरघट | रघुवीर सहायशानदार मौत थीइसलिए कि कोई न भीड़ थीन था रोना-धोनाहम लोग एक बड़े ख़ाली खेत में गएगाँव के सिमटने से बचा रह गया था जोऔर एक हल्की-सी देह को फेंक आए“कहाँ है मरघट?” जो पता दिया गया थापूछता उसे चला रामजस स्कूल के पीछेएक जगह दो लड़के बोले, “हाँ, रामजस?वहीं हम पढ़ते हैं—मरघट वहीं पर है?”—मुँह बाकर रह गया वह युवक—यह तो पता ही न था!फिर हम भटक गएअंत में एक किसी से मिलेदोनों ने सुखमय आश्चर्य से पूछा—''मरघट? मरघट? मैं वहीं जा रहा हूँ, चलिए''यों रस्ता मिल गया।दाह-संस्कार में बड़ी कार्रवाई थीयह लाओ, वह लाओ, यहाँ धरो, वहाँ धरो,सात मन लकड़ी, पुरानी, सूखी भारीडब्बा-भर एक वही दारा सिंह वाला घीतीन हवन सामग्री के पाकिट, बस ख़त्म।जब चिता चुन गई नियम के अनुसारसंपुजन सुंदर था, शिल्प में रीतिमतशव उससे ढक गयातब मुखाग्नि दी गई तालियाँ बजी नहीं, कैमरे नहीं खड़के।नीरव विनम्रता : सब जानते थे कि क्या कर्मकांड हैपर किसी पर कोई बंधन नहीं था सिवाय मौन रहने केवह थी तिहत्तर कीऐसे ही हम भी थेउस उम्र के जहाँ हर पुरुष समवयस्क लगता है—“यह यहाँ वालों का 'लोकप्रिय' मरघट है''कोई हिंदी बोलाश्री तनखा ने कहा, “हम जहाँ रहते हैं ज़्यादातर लोग मियाँ-बीवी हैं,''उम्र हो चली है, पूरी अवकाशप्राप्त लोगों की बस्ती है—आज यह, कल वह, छह बरस में मैं इस मरघट में बीस बार आया हूँ।इस तरह हमने उस बस्ती के इस निर्जन द्वीप का भूगोल पहचाना।लौटकर नहाया, हल्का हुआ,मानो बड़ा काम कर आया हूँ :देह में फुर्ती, दिमाग़ में रोशनी—यह क्या एक मौत का करिश्मा है।मेरे स्वास्थ्य में सुधार?कमला ने कहा, नहीं तुम पैदल चले थे,भीतर से विह्वल हुए थे, उदास भी,ठंड हो चली थी तब लाल-लाल लपटों को तापा था,कुछ भारी लकड़ियाँ उठाई थींदस लोगों के साथ अनायास नम्र हो अपने जीवन कीनिस्सारता जानी थीतभी लग रहा है कि रक्तचाप ठीक है।”

Jul 12, 20254 min

Ep 832Ya Devi | Viren Dangwal

या देवि! | वीरेन डंगवालमाथे पर एक आँख लम्बवतउसके भी ऊपर मुकुटबहुत सारे हाथमगर दीखते दो ही :एक में टपकता मुंड।दुसरे में टपटपाता खड्ग।शेर नीचे खड़ा है।दांत दिखाता, मगर सीधा - सादा।बगल में नदी बह रही लहरदार।पहाड़ क्या हैं, रामलीला का पर्दा हैं।माता, मैं उस चित्रकार को प्रणाम करता हूँजिस ने तेरी यह धजा बनाई।

Jul 11, 20251 min

Ep 831Behnein | Abha Bodhisattva

बहनें | आभा बोधिसत्त्वबहनें होती हैं,अनबुझ पहेली-सीजिन्हें समझना या सुलझानाइतना आसान नही होता जितनालटों की तरह उलझी हुई दुनिया को ,इन्हें समझते और सुलझाते ...मेंविदा करने का दिन आ जाता है न जाने कबइन्हें समझ लिया जाता अगर वो होती ...कोई बन्द तिजोरी...जिन्हे छुपा कर रखते भाई या कोई...देखते सिर्फ़...या ...कि होती ...सांझ का दिया ...जिनके बिना ...न होती कहीं रोशनी...पर नही़बहनें तो पानी होती हैंबहती हैं... इस घर से उस घरप्यास बुझातींजी जुड़ातीं...किस-किस काकिस-किस के साथ विदाहो जातीं चुपचाप...दूर तक सुनाई देती उनकीरुलाई...कुछ दूर तक आती है...माँकुछ दूर तक भाईसखियाँ थोड़ी और दूर तकचलती हैं रोती-धोती... ...फिर वे भी लौट जाती हैं घरविदा के दिन काइंतज़ार करने...इन्हें सुलझाने में लग जाते हैं...भाई या कोई...।

Jul 10, 20252 min

Ep 830Antim Aalap | Prachi

अंतिम आलाप | प्राचीकितना और समेटूँ ख़ुद को!ख़ुद की सूनी-वंचित बाँहों मेंधूप का छुआ मेरा रंगकपड़ों के इस पार तक ही हैतुम्हारे छूने की लालसाअंतस को कचोटतीअँधेरे में सकुचातीऔर सर्वस्व त्याग देने को खड़ी—ध्यान-मुद्रा मेंपेड़ो-पहाड़ो-जानवरो-बच्चो,कोई तो मेरी देह अपने तक खींच लो,ख़ुद के भार से मैं धँसती जा रही हूँअंतिम आलाप का आख़िरी सुरजहाँ न पहुँचेवहीं कहीं छुपी बैठी हूँ।

Jul 9, 20251 min

Ep 829Puri ka Samudra | Gyanendrapati

पुरी का समुद्र | ज्ञानेन्द्रपतिआँखों में पुरी का समुद्र लिये जब लौटोगीविस्मय -विस्फारित अपनी बड़री आँखों मेंतरंग-विकल वह संयम-असमर्थ समुद्रपछाड़ खाता, पुकारता, लीलने को आताउद्द्वेलित, उद्दाम, हहातादष्टि-छोर तक फेला, फूला, फेनिलटूट-टूट बिखर, तुम्हारे पैरों तले बिछ जातातुम्हें छोड़ जाता हुआ कुछ-कुछ गीला, कुछ-कुछ भीततुम्हारे कन्धों पर रख हाथ, तुम्हारी आँखों में झाँकतामैं जानूँगा, अरे! यह तो मेरे मन का प्रतिबिम्ब है।

Jul 8, 20252 min

Ep 828Aunga | Leeladhar Jagudi

आऊँगा | लीलाधर जगूड़ीनए अनाज की ख़ुशबू का पुल पार करकेमैं तुम्हारे पास आऊँगाज्यों ही तुम मेरे शब्दों के पास आओगेमैं तुम्हारे पास आऊँगाजैसे बादल पहाड़ की चोटी के पास आता है। और लिपट जाता हैजिसे वे ही देख पाते हैं जिनकी गर्दनें उठी हुई हों।मैं वहाँ तुम्हारे दिमाग़ मेंजहाँ एक मरुस्थल है। आना चाहता हूँमैं आऊँगा। मगर उस तरह नहींबर्बर लोग जैसे कि पास आते हैंउस तरह भी नहींगोली जैसे कि निशाने पर लगती हैमैं आऊँगा। आऊँगा तो उस तरहजैसे कि हारे हुए, थके हुए में दम आता है।

Jul 7, 20252 min

Ep 827Mann Ke Panne | Nasira Sharma

मन के पन्ने | नासिरा शर्मा जब तुम थककर सोते होतो तुम्हारे उजले तलवों को देख कर जाने क्यों ख़याल आता है उसपर लिख दूँ मन के इंद्रधनुष से एक प्रेम-पत्रजिसमें लिखा हो अवाम का वह प्यारजो हम उनसे करते हैंजिस में हो उनके आहत मन की भूखी-प्यासी इच्छाओं के दस्तावेज़ और हमारी नाकाम कोशिशों के न थकने वाले हौसलेतुम जहाँ-जहाँ जाओ छप जाए धरती के सीने परयह शब्दसपने, सपने और सपने हमारी उम्मीदों केजिसपर चल सकें वह सब जो करते हैं प्रेमजो लिख सकते हैं प्रेम पत्र दूसरों की व्यथाओं केमेरे अक्षर और तुम्हारे क़दम रच सकते हैं आँसुओं की बारिश के बादएक नया इंद्रधनुष।

Jul 6, 20252 min

Ep 826Bhavsagar | Vishwanath Prasad Tiwari

भवसागर | विश्वनाथ प्रसाद तिवारीइसी में बोना है अमर बीजइसी में पाना है खोना है प्यारभवसागर है यह संतों काइसी में ढूंढ़ना हैनिकलने का द्वार

Jul 5, 20251 min

Ep 825Nasht Kuch Bhi Nahi Hota | Priyadarshan

नष्ट कुछ भी नहीं होता | प्रियदर्शननष्ट कुछ भी नहीं होता,धूल का एक कण भी नहीं,जल की एक बूंद भी नहींबस सब बदल लेते हैं रूपउम्र की भारी चट्टान के नीचेप्रेम बचा रहता है थोड़ा सा पानी बनकरऔर अनुभव के खारे समंदर मेंघृणा बची रहती है राख की तरहगुस्सा तरह-तरह के चेहरे ओढ़ता है,बात-बात पर चला आता है,दुख अतल में छुपा रहता है,बहुत छेड़ने से नहीं,हल्के से छू लेने से बाहर आता है,याद बादल बनकर आती हैजिसमें तैरता है बीते हुए समय का इंद्रधनुषडर अंधेरा बनकर आता हैजिसमें टहलती हैं हमारी गोपन इच्छाओं की छायाएंकभी-कभी सुख भी चला आता हैअचरज के कपड़े पहन करकि सबकुछ के बावजूद अजब-अनूठी है ज़िंदगीक्योंकि नष्ट कुछ भी नहीं होताधूल भी नहीं, जल भी नहीं,जीवन भी नहींमृत्यु के बावजूद

Jul 4, 20252 min

Ep 824Prarthna | Rachit

प्रार्थना | रचितईश्वर,ध्यान देना…जब खड़ा होना पड़े मुझेतो अपने अस्तित्व से ज़्यादा जगह न घेरूँ।मैं ऋग्वेद के चरवाहों की करुणा के साथ कहता हूँ—मुझे इस अनंत ब्रह्मांड मेंमेरे पेट से बड़ा खेत मत देना,हल के भार से अधिक शक्ति,बैल के आनंद से अधिक श्रम मत देना।मैं तोलस्तोय के किसान से सीख लेकर कहता हूँ :मुझे मत देना उतनी ज़मीनजो मेरे रोज़ाना के इस्तेमाल से ज़्यादा हो,हद से हद एक चारपाई जितनी जगहजिसके पास में एक मेज़-कुर्सी आ जाए।मुझे मेरे ज्ञान से ज़्यादा शब्द,सत्य से ज़्यादा तर्क मत देना।सबसे बड़ी बातमुझे सत्य के सत्य से भी अवगत करवाना।मुझे मत देना वहजिसके लिए कोई और कर रहा हो प्रार्थना।

Jul 3, 20252 min

Ep 823Angoothe | Arvind Srivastava

अंगूठे | अरविन्द श्रीवास्तवबताओ, कहाँ मारना है ठप्पाकहाँ लगाने हैं निशानतुम्हारे सफ़ेद—धवल काग़ज़ परहम उगेंगे बिल्कुल अंडाकारया कोई अद्भुत कलाकृति बनकरबगैर किसी कालिख़, स्याहीऔर पैड केअंगूठे गंदे हैंमिट्ती में सने हैंआग में पके हैंपसीने की स्याही में ।

Jul 2, 20251 min

Ep 822Koi Sagar Nahi | Bhawani Prasad Mishra

कोई सागर नहीं | भवानीप्रसाद मिश्रकोई सागर नहीं है अकेलापनन वन हैएक मन है अकेलापनजिसे समझा जा सकता हैआर-पार जाया जा सकता है जिसकेदिन में सौ बारकोई सागर नहीं हैन वन हैबल्कि एक मन हैहमारा तुम्हारा सबका अकेलापन!

Jul 1, 20251 min

Ep 821Waapsi | Ahmed Faraz

वापसी | अहमद फ़राज़उस ने कहासुनअहद निभाने की ख़ातिर मत आनाअहद निभाने वाले अक्सरमजबूरी या महजूरी की थकन से लौटा करते हैंतुम जाओऔर दरिया दरिया प्यास बुझाओजिन आँखों में डूबोजिस दिल में उतरोमेरी तलब आवाज़ न देगीलेकिन जब मेरी चाहतऔर मेरी ख़्वाहिश की लौइतनी तेज़ और इतनीऊँची हो जाएजब दिल रो देतब लौट आनाअहद: प्रतिज्ञा/ वादामहजूरी: विरह

Jun 30, 20251 min

Ep 820Prem Ka Arthshastra | Vihaag Vaibhav

प्रेम का अर्थशास्त्र | विहाग वैभव जितना हो तुम्हारे पासउससे कम ही बताना सबसेख़र्च करते हुए हमेशाथोड़ा-सा बचा लेनामाँ की गुप्त पूँजी की तरहजब छाती पर समय का साँप लोटने लगेगाहर साँस में चलने लगेगी जून की लूऔर तुम्हें लगेगा किमन का आईनारेगिस्तान की गर्म हवाओं से चिटक रहा हैतब कठिन वक़्तों में काम आएगावही थोड़ा-सा बचा हुआ प्रेम।

Jun 29, 20251 min

Ep 819Machli Boli Kavi Se | K Sachidanandan | Girdhar Rathi

मछली बोली कवि से | के. सच्चिदानंदनअनुवाद : गिरधर राठी उपमा मुझे मत दो स्त्री की आँख कीस्त्री हूँ मैं स्वयं, पूरी, संपूर्णमुझे नहीं धरना है भेष जलपरियों कामैं नहीं ढोऊँगी नारी का भारी सिरमुझसे अँगूठी निगलवा करकरा नहीं पाओगे मछुए का इंतज़ारमैं नहीं कोई अवतारजो लाए वेद को उबार।वापस पहुँचा दो मुझे जल में तुमकच्चा ही,तड़पना पड़े न मुझे रेत मेंबनकर प्रतीक याफिर कोई रूपक।

Jun 28, 20251 min

Ep 818Aana | Kailash Manhar

आना | कैलाश मनहरआऊँगाबारिश से भीगे खेतों परक्वार की धूप बनकरचमकता-सा....आऊँगाथके हुए बदन की रगों मेंधारोष्ण दूध की तरहउफनता-सा....आऊँगारूठी हुई प्रेमिका की आँखों मेंमानभरी लालिमा लिएदमकता-सा....आऊँगाअकेले बच्चे के पासनाचती हुई चिड़िया के परों मेंलचकता-सा....आऊँगामकई के दानों में बनकरमिठास,शरद के आसपाससूर्योदय के साथचूमने को तुम्हारे खुरदरे हाथज़रूर ज़रूर आऊँगा,करना तुम -- इन्तज़ार....

Jun 27, 20251 min

Ep 817Raag Bhatiyali | Kunwar Narayan

राग भटियाली | कुँवर नारायण एक राग है भटियालीबाउल संगीत से जुड़ा हुआअंतिम स्वर को खुला छोड़ दिया जाता हैवायुमंडल में लहराता हुआजैसे संपूर्ण जीवन राग से युक्त हुई एक ध्वनिअनंत में विलीन हो गई...वह शेष स्वरों को बाँधता नहींइसलिए अंत में भीउनसे बँधता नहीं,अंतिम आह जैसा कुछएक अजीब तरह की मुक्ति काएहसास देता है वह...

Jun 26, 20251 min

Ep 816Ek Nanha Sa Keeda | Gyanendrapati

एक नन्हा-सा कीड़ा | ज्ञानेन्द्रपति यह एक नन्हा-सा कीड़ाअभी जिसको मसल जाता पैरजीवन की क्षणभंगुरता पर विचारने का एक लमहाएक ठिठका हुआ क्षणजिसको जल्दी से लाँघने मेंनहीं दिखताधरती की सिकुड़न में खोये हुए-से इस कीड़े मेंकितने भूकम्पों की स्मृति साँस लेती है।इतिहास के कितने युगों की स्मृतिकि इसके लिए यह कल की ही बातजव वनमान्ष ने दोनों अगले पैर उठाए थेहाथों के आकार में मानव-सभ्यता ने लिये थे पाँवअकारण गंभीर और करुण होने के क्षण मेंनहीं दिखताकि यह कीड़ा हमें भी देख रहा हैकि यह जो बचने की भी कोशिश नहीं करता हुआ निरीह-सा कीड़ा हैन जाने कितने प्रलयों में छनकर निकली है इसकी जिजीविषाऔर इसकी फुदक मेंइतिहास के न जाने कितने अगले युगों तकजाने की उमंग है

Jun 25, 20252 min

Ep 815Bhookh | Naresh Saxena

भूख | नरेश सक्सेनाभूख सबसे पहले दिमाग़ खाती हैउसके बाद आँखेंफिर जिस्म में बाक़ी बची चीज़ों कोछोड़ती कुछ भी नहीं है भूखवह रिश्तों को खाती हैमाँ का हो बहन या बच्चों काबच्चे तो उसे बेहद पसंद हैंजिन्हें वह सबसे पहलेऔर बड़ी तेज़ी से खाती हैबच्चों के बाद फिर बचता ही क्या है।

Jun 24, 20251 min

Ep 814Tumhe Darr Hai | Gorakh Pandey

तुम्हें डर है | गोरख पांडेयहज़ार साल पुराना है उनका ग़ुस्साहज़ार साल पुरानी है उनकी नफ़रतमैं तो सिर्फ़उनके बिखरे हुए शब्दों कोलय और तुक के साथलौटा रहा हूँमगर तुम्हें डर है किआग भड़का रहा हूँ।

Jun 23, 20251 min

Ep 813Raahein | Narendra Sharma

राहें | नरेंद्र शर्माकुहरा छाया है गिरि-वन पर,गिरि-शिखरों पर;नहीं रहा आकाश आज आकाश,घिरे हैं बादल धौरे;मैं नीचे समतल पठार परचला जा रहा—लेकिन ऊँचे तल की राहेंधुँधग्रस्त हैं!

Jun 22, 20251 min

Ep 812Din Baune Ho Gaye | Umakant Malviya

दिन बौने हो गए | उमाकांत मालवीयरातें लम्बी हुईंदिन बौने हो गए ।ठिगने कद वाले दिनलम्बी परछाइयाँधूप की इकाई परतिमिर की दहाइयाँरातें पत्तल हुईंदिन दौने हो गए ।कुहरों पर लिखी गईविष भरी कहानियाँनीली पड़ने लगीसुबह की जवानियाँरातें आँगन हुईंदिन कौने हो गए ।बर्फ़ीले ओठों परशब्द ठिठुरने लगेनाकाफ़ी ओढ़नेबिछौने जुड़ने लगेरातें अजगर हुईंदिन छौने हो गए ।

Jun 21, 20251 min

Ep 811Kuch Ishq Kia Kuch Kaam Kia | Faiz Ahmed Faiz

कुछ इश्क़ किया कुछ काम किया/ फ़ैज़ अहमद फ़ैज़कुछ इश्क़ किया कुछ काम कियावो लोग बहुत ख़ुश-क़िस्मत थेजो इश्क़ को काम समझते थेया काम से आशिक़ी करते थेहम जीते-जी मसरूफ़ रहेकुछ इश्क़ किया कुछ काम कियाकाम इश्क़ के आड़े आता रहाऔर इश्क़ से काम उलझता रहाफिर आख़िर तंग आ कर हम नेदोनों को अधूरा छोड़ दिया

Jun 20, 20251 min

Ep 810Purani Haveli | Khagendra Thakur

पुरानी हवेली | खगेंद्र ठाकुरइस हवेली सेगाँव में आदी-गुड़ बंटेसोहर की धुन सुनेबहुत दिन हो गए इस हवेली सेसत्यनारायण का प्रसाद बंटेघड़ी-घंट की आवाज सुनेबहुत दिन हो गए इस हवेली सेकिसी को कन्धा लगाएराम नाम सत है- सुनेबहुत दिन हो गए इस हवेली की छत परउग आई है बड़ी-बड़ी घासआम, पीपल आदि उग आये हैंपीढ़ियों की स्मृति झेलतीजर्जर हवेली का सूनापन देखये सब एकदम छत पर चढ़ गए हैं. इस हरियाली के बीचगिरगिटों, तिलचिट्टों के सिवाकोई नहीं है, कोई नहीं है।

Jun 19, 20251 min

Ep 809Deewana Dil | Nasira Sharma

दीवाना दिल - नासिरा शर्मा अक्सर सोचती हूँ मैंजब भी मैंने चलना चाहा तुम्हें लेकर अपने संगनहीं समझ पाए तुम वह राहेंतुम्हारे खेतों से उगी गेंहूँ की बालियों सेफूटे दानों को बोना चाहती थी अपने आँगन मेंताकि बना सकूँ रिश्ता ज़मीन से ज़मीन काउसकी उगी कोंपलों के रस को पी सकूँ औरमहसूस कर सकूँ तुमसे गहरे जुड़ाव कोभेजने को कहा था तुमसे मैनेंभेज दो कुछ ख़ुशबूदार पौधे मुझेजिसे बोती मैं अपनी क्यारियों मेंऔर सूँघती तुम्हारे सीने की गंध कोमाना तुम भेजते हो फूल किसी फ्लावर शाप से जो सूख जाते हैं दो-चार दिन मेंबिना गंध फैलाए चले जाते हैं कूड़ेदान मेंजिनसे नहीं बन पाता वह मेरा रिश्ता जोमैं चाहती हूँ तुम से रूह की गहराइयों सेजानती हूँ मैं यह सब मिल जाता है मेरे शहर मेंगल्ले की दुकान से गेहूँ के दानेऑनलाइन नर्सरी से फूलों के बीज और पौधे!लेकिन तुम्हारा यह बताना कर देता हैमेरे अहसास की मंज़िल से मुझे कोसों दूरजहाँ बसेरा लेना चाहता है मेरा यह दीवाना दिल!

Jun 18, 20252 min

Ep 808Sambandhon Ke Thande Ghar Mein | Amarnath Srivastava

सम्बन्धों के ठंडे घर में | अमरनाथ श्रीवास्तवसम्बन्धों के ठंडे घर मेंवैसे तो सबकुछ है लेकिनइतने नीचे तापमान पररक्तचाप बेहद खलता है|दिनचर्या कोरी दिनचर्याघटनायें कोरी घटनायेंपढ़ा हुआ अखबार उठाकरहम कब तक बेबस दुहरायेंनाम मात्र को सुबह हुई हैकहने भर को दिन ढलता है|सहित ताप अनुकूलित घर मेंमौसम के प्रतिमान ढूंढतेआधी उमर गुजर जाती हैप्याले में तूफान ढूंढतेगर्म खून वाला तेवर भीअब तो सिर्फ हाथ मलता है|सजे हुए दस्तरख्वानों परमरी भूख के ताने -बानेठहरे हुए समय सी टेबुलटिकी हुई बासी मुस्कानेंशिष्टाचार डरे नौकर साअक्सर दबे पांव चलता है|

Jun 17, 20252 min

Ep 807Mrityu Geet | Langston Hughes | Dharmvir Bharti

मृत्यु-गीत | लैंग्स्टन ह्यूज़अनुवाद : धर्मवीर भारतीमातम के नक़्क़ारे बजाओ मेरे लिए,मातम और मौत के नक़्क़ारे बजाओ मेरे लिएऔर भीड़ से कह दो कि मिल कर के मरसिया गाएताकि उसकी आवाज़ में मेरी हिचकियाँ डूब जाएँ।मौत के नक़्क़ारों के साथसिसकते हुए बेले की महीन और दुखी आवाज़—लेकिन सूरज के संगीत से परिपूर्णशंख की एक हुँकार भरी आवाज़ भी हो,जो मेरे साथ जाए,उस अँधियारे मृत्युलोक मेंजहाँ मैं जा रहा हूँ।

Jun 16, 20251 min

Ep 806Mrit Ghoshit | Ankita Anand

मृत घोषित | अंकिता आनंदउसके आख़िरी दिनों मेंकभी टूथपेस्ट के ट्यूब कोदो टुकड़ों में काटा हो,तो तुमने देखा होगाकितना कुछ बचा रह जाता हैतब भी जब लगता हैसब ख़त्म हो गया।ज़िंदगी का कितना बड़ा टुकड़ाअक्सर फ़ेंक दिया जाता हैउसे मरा समझ।

Jun 15, 20251 min

Ep 805Unhone Ghar Banaye | Agyeya

उन्होंने घर बनाये - अज्ञेय उन्होंने घर बनायेऔर आगे बढ़ गयेजहाँ वे और घर बनाएँगे।हम ने वे घर बसायेऔर उन्हीं में जम गये :वहीं नस्ल बढ़ाएँगेऔर मर जाएँगे।इस से आगेकहानी किधर चलेगी?खँडहरों पर क्या वे झंडे फहराएँगेया कुदाल चलाएँगे,या मिट्टी पर हमीं प्रेत बन मँडराएँगेजब कि वे उस का गारा सानसाँचों में नयी ईंटें जमाएँगे?एक बिन्दु तककहानी हम बनाते हैं।जिस से आगेकहानी हमें बनाती है :उस बिन्दु की सही पहचानक्या हमें आती है?

Jun 14, 20251 min

Ep 804Dharti Par Hazaar Cheezain Thin | Anupam Singh

धरती पर हज़ार चीजें थीं काली और खूबसूरत | अनुपम सिंह धरती पर हज़ार चीजें थींकाली और खूबसूरतउनके मुँह का स्वादमेरा ही रंग देख बिगड़ता थावे मुझे अपने दरवाज़े से ऐसे पुकारतेजैसे किसी अनहोनी को पुकार रहे होंउनके हज़ार मुहावरे मुँह चिढ़ाते थेकाली करतूतें काली दाल काला दिलकाले कारनामेबिल्लियों के बहाने दी गई गालियाँ सुनमैं ख़ुद को बिसूरती जाती थीऔर अकेले में छिपकर रोती थीपहली बार जब मेरे प्रेम की ख़बरें उड़ींतो माँ ओरहन लेकर गईउन्होंने झिड़क दिया उसेकि मेरे बेटे को यही मिली है प्रेम करने कोमुझे प्रेम में बदनाम होने से अधिकयह बात खल गई थीउन्होंने कच्ची पेंसिलों-सातोड़ दिया था मेरे प्रेम करने का पहला विश्वासमैंने मन्नतें उस चौखट पर माँगीजहाँ पहले ही नहीं था इंसाफ़कई-कई फ़िल्मों के दृश्यजिनमें फ़िल्माई गई थीं काली लड़कियाँसिर्फ़ मज़ाक बनाने के लिएअभी भी भर आँख देख नहीं पाती हूँतस्वीर खिंचाती हूँतो बचपन की कोई बात अनमना कर जाती है।सोचती हूँकितनी जल्दी बाहर निकल जाऊँ दृश्य सेकाला कपड़ा तो ज़िद में पहना था हाथ जोड़ लेते पिताबिटिया! मत पहना करो काली कमीज़वैसे तो काजल और बिंदी यही दो श्रृंगार प्रिय थेअब लगता है कि काजल भी ज़िद का ही भरा हैउनको कई बार यह कहते सुना थाकि काजल फबता नहीं तुम परदेवी-देवताओं और सज्जनों ने मिलकरकई बार तोड़ा मुझेमैं थी उस टूटे पत्ते-सीजिससे जड़ें फूटती हैं।

Jun 13, 20253 min

Ep 803Chuka Bhi Hun Main Nahin | Shamsher Bahadur Singh

चुका भी हूँ मैं नहीं - शमशेर बहादुर सिंहचुका भी हूँ मैं नहींकहाँ किया मैनें प्रेमअभी ।जब करूँगा प्रेमपिघल उठेंगेयुगों के भूधरउफन उठेंगेसात सागर ।किंतु मैं हूँ मौन आजकहाँ सजे मैनें साजअभी ।सरल से भी गूढ़, गूढ़तरतत्त्व निकलेंगेअमित विषमयजब मथेगा प्रेम सागरहृदय ।निकटतम सबकीअपर शौर्यों कीतुमतब बनोगी एकगहन मायामयप्राप्त सुखतुम बनोगी तबप्राप्य जय !

Jun 12, 20251 min

Ep 802Ladki | Anjana Verma

लड़की | अंजना वर्मागर्मी की धूप मेंसुर्ख़ बौगेनवीलिया कीएक उठी हुई टहनी की तरहवह पतली लड़कीगर्म हवा झेलतीसाइकिल के पैडल मारतीचली जा रही हैवह जब भी निकलती है बाहरकालेज के लिएकई काम हो जाते हैंरास्ते में दवा की दुकान हैऔर डाकघर भीकाम निबटाते और वापस आतेदेर हो जाती है अक्सरसवेरे का गुलाबी सूरजहो जाता हे सफेद तब तक तपकररोज़ ही करती है सामना लू काउसे अपना रास्ता मालूम हैअब रास्ते में जो मिलेछाँह की उम्मीद उसे नहीं रहती हैधूप के लिए लड़कीहमेशा तैयार रहती है

Jun 11, 20251 min

Ep 801Nayi Bhookh | Hemant Deolekar

नई भूख | हेमंत देवलेकर भूख से तड़पते हुए भी आदमी रोटी नहीं मांगतावह चिल्लाता है 'गति...गति!!तेज़...और तेज़...इससे तेज़ क्यों नहीं'कभी न स्थगित होने वाली वासना है गतिहमारे पास डाकिये की कोई स्मृति नहीं बची।दुनिया के किसी भी कोने मेंपलक झपकते पहुँच रहा है सब कुछसारी आधुनिकता इस वक़्त लगी हैसमय बचाने में - जो स्वयं ब्लैक होल है।हो सकता है किसी रोज़हम बना लें समय भीमगर क्या तब भीहोगा हमारे पास इतना समय भी किकिसी उल्टे पड़े छटपटाते कीड़े को सीधा कर सकें ।

Jun 10, 20252 min

Ep 800Tum Nahi Samjhogey | Bhavani Prasad Mishra

तुम नहीं समझोगे | भवानीप्रसाद मिश्रतुम नहीं समझोगे केवल किया हुआइसलिए अपने किए परवाणी फेरता हूँऔर लगता है मुझेउस पर लगभग पानी फेरता हूँतब भी नहीं समझते तुमतो मैं उलझ जाता हूँलगता है जैसेनाहक़ अरण्य में गाता हूँऔर चुप हो जाता हूँ फिरलजाकरअपनी वाणी कोइस तरह स्वर से सजा कर!

Jun 9, 20251 min

Ep 799Daud | Kumar Ambuj

दौड़ -कुमार अम्बुज मुझे नहीं पता मैं कब से एक दौड़ में शामिल हूँविशाल अंतहीन भीड़ है जिसके साथ दौड़ रहा हूँ मैंगलियों में, सड़कों पर, घरों की छतों पर, तहखानों मेंतनी हुई रस्सी पर सब जगह दौड़ रहा हूँ मैंमेरे साथ दौड़ रही है एक भीड़जहाँ कोई भी कम नहीं करना चाहता अपनी रफ्तारमुझे ठीक-ठीक नहीं मालुम मैं भीड़ के साथ दौड़ रहा हूँया भीड़ मेरे साथअकेला पीछे छूट जाने के भय से दौड़ रहा हूँया आगे निकल जाने के उन्माद मेंमुझे नहीं पता मैं अपने पड़ौसी को परास्त करना चाहता हूँया बचपन के किसी मित्र कोया आगे निकल जाना चाहता हूँ किसी अनजान आदमी सेमैं दौड़ रहा हूँ बिना यह जाने कि कौन है मेरा प्रतिद्वंद्वीजब शामिल हुआ था दौड़ मेंमुझे दिखाई देती थीं बहुत सी चीज़ें खेत, पहाड़, जंगलदिखाई देते थे पुल, नदियाँ, खिलौने और बचपन के खेलदिखते थे मित्रों, रिश्तेदारों और परिचितों के चेहरेसुनाई देती थीं पक्षियों की आवाज़ें समुद्र का शोर और हवा का संगीतअब नहीं दिखाई देता कुछ भीन बारिश न धुंधन खुशी न बेचैनीन उम्मीद न संतापन किताबें न सितारदिखाई देते हैं सब तरफ एक जैसे लहुलुहान पाँवऔर सुनाई देती हैं सिर्फ उनकी थकी और भारीऔर लगभग गिरने से अपने को सँभालती हुईंधप धप्प धप्प् सी आवाजेंतलुए सूज चुके हैं सूख रहा है मेरा गलाजवाब दे चुकी हैं पिंडलियाँभूल चुका हूँ मैं रास्तेमुझे नहीं मालूम कहाँ के लिए दौड़ रहा हूँ और कहाँ पहुँचूँगाभीड़ में गुम चुके हैं मेरे बच्चे और तमाम प्यारे जनकोई नहीं दिखता दूर-दूर तक जो मुझे पुकार सकेया जिसे पुकार सकूँ मैं कह सकूँ कि बस, बहुत हुआ अबहद यह है कि मैं बिलकुल नहीं दौड़ना चाहताकिसी धावक की तरह पार नहीं करना चाहता यह छोटा सा जीवननहीं लेना चाहता हाँफती हुईं साँसेंहद यही है कि फिर भी मैं खुद को दौड़ता हुआ पाता हूँथकान से लथपथ और बदहवास

Jun 8, 20253 min

Ep 798Phoota Prabhat | Bharat Bhushan Aggarwal

फूटा प्रभात | भारतभूषण अग्रवालफूटा प्रभात, फूटा विहानवह चल रश्मि के प्राण, विहग के गान, मधुर निर्भर के स्वरझर-झर, झर-झर।प्राची का अरुणाभ क्षितिज,मानो अंबर की सरसी मेंफूला कोई रक्तिम गुलाब, रक्तिम सरसिज।धीरे-धीरे,लो, फैल चली आलोक रेखघुल गया तिमिर, बह गई निशा;चहुँ ओर देख,धुल रही विभा, विमलाभ कांति।अब दिशा-दिशासस्मित,विस्मित,खुल गए द्वार, हँस रही उषा।खुल गए द्वार, दृग खुले कंठ,खुल गए मुकुलशतदल के शीतल कोषों से निकला मधुकर गुँजार लिएखुल गए बंध, छवि के बंधन।जागो जगती के सुप्त बाल!पलकों की पंखुरियाँ खोलो, खोलो मधुकर के अलस बंधदृग् भरसमेट तो लो यह श्री, यह कांतिबही आती दिगंत से यह छवि की सरिता अमंदझर-झर, झर-झर।फूटा प्रभात, फूटा विहान,छूटे दिनकर के शर ज्यों छवि के वहि-बाण(केशर-फूलों के प्रखर बाण)आलोकित जिन से धरा।प्रस्फुटित पुष्पों के प्रज्वलित दीप,लो-भरे सीप।फूटी किरणें ज्यों वहि-बाण, ज्यों ज्योति-शल्य,तरु-वन में जिनसे लगी आग।लहरों के गीले गाल, चमकते ज्यों प्रवाल,अनुराग-लाल।

Jun 7, 20252 min

Ep 796Rajdhani | Vishwanath Prasad Tiwari

राजधानी | विश्वनाथ प्रसाद तिवारी इतना आतंक था मन परकि चौथाई तो मर चुका थाउतरने के पहले हीराजधानी के प्लेटफॉर्म परमेरा महानगर प्रवेशनववधू के गृह प्रवेश की तरह थामगर साथियों के साथदौड़ते, लड़खड़ाते और धक्के खातेसीख ही लिये मैंने भी सारे काटलँगड़ी और धोबिया- पाटएक से एक क़िस्से थे वहाँपरियों और विजेताओंआलिमों और शाइरों केप्याले टकराते हुएमैं भी बोलता थासिकंदर और ग़ालिब के अंदाज़ मेंहालाँकि प्याला ही भरताऔर दस्तरख़्वान ही बिछाता रहाशाही महफिलों मेंदिन बीतते रहेमेरी याददाश्त धुँधली होती रहीभूलता रहासाकिन मौजा तप्पा परगनाफिर सूखने लगा पानीजो था आँखों में और मन मेंऔर झरने लगे भावएक-एक कर पीले पत्तों की तरहशोर था इतनाकि करुणा भी पहिए-सी घरघरातीऔर शांति गुरगुराती इंजन-सीइतनी भागमभागकि हास दिखता थादूर से ही उदास निराश हताशवीरता के लिए क्या जगह हो सकती थीउस चक्रव्यूह में?यदि प्रेम करता लड़कियों सेतो धोखा देता किन्हें?इतनी रगड़ी गई चमड़ीभीड़ में और बेरहम मौसम मेंकि कोई अंतर नहीं रह गयामेरे लिए आग और पानी मेंइस तरह एक दिनलौटा जब राजधानी सेतो मृतकाया में उतारा गया मैंअपने गाँव के छोटे-से टीसन पर।

Jun 6, 20252 min

Ep 797Amaltaash | Anjana Varma

अमलताश / अंजना वर्मा (1)उठा लिया है भारइस भोले अमलताश नेदुनिया को रोशन करने काबिचारा दिन में भीजलाये बैठा है करोड़ों दीये! (2)न जाने किस स्त्री नेटाँग दिये अपने सोने के गहनेअमलताश की टहनियों परऔर उन्हें भूलकर चली गई (3)पीली तितलियों का घर है अमलताशया सोने का शहर है अमलताशदीवाली की रात है अमलताशया जादुई करामात है अमलताश!

Jun 5, 20251 min

Ep 795Peehar Ka Birwa | Amarnath Srivastava

पीहर का बिरवा / अमरनाथ श्रीवास्तवपीहर का बिरवाछतनार क्या हुआ,सोच रही लौटीससुराल से बुआ ।भाई-भाई फरीकपैरवी भतीजों की,मिलते हैं आस्तीनमोड़कर क़मीज़ों कीझगड़े में है महुआडाल का चुआ ।किसी की भरी आँखें जीभ ज्यों कतरनी है, किसी के सधे तेवरहाथ में सुमिरनी हैकैसा-कैसा अपनाख़ून है मुआ ।खट्टी-मीठी यादेंअधपके करौंदों की,हिस्से-बँटवारे में खो गए घरौंदों कीबिच्छू-सा आँगनदालान ने छुआ । पुस्तैनी रामायणबँधी हुई बेठन में अम्मा जो जली हुई रस्सी है ऐंठन मेंबाबू पसरे जैसेहारकर जुआ । लीप रही है उखड़ेतुलसी के चौरे कोआया है द्वार का पहरुआ भी कौरे को,साझे का है भूखासो गया सुआ ।

Jun 4, 20252 min

Ep 794Deewanon Ki Hasti | Bhagwati Charan Varma

दीवानों की हस्ती | भगवतीचरण वर्माहम दीवानों की क्या हस्ती,हैं आज यहाँ, कल वहाँ चले,मस्ती का आलम साथ चला,हम धूल उड़ाते जहाँ चले।आए बनकर उल्लास अभी,आँसू बनकर बह चले अभी,सब कहते ही रह गए, अरे,तुम कैसे आए, कहाँ चले?किस ओर चले? यह मत पूछो,चलना है, बस इसलिए चले,जग से उसका कुछ लिए चले,जग को अपना कुछ दिए चले,दो बात कही, दो बात सुनी;कुछ हँसे और फिर कुछ रोए।छककर सुख-दु:ख के घूँटों कोहम एक भाव से पिए चले।हम भिखमंगों की दुनिया में,स्वच्छंद लुटाकर प्यार चले,हम एक निसानी-सी उर पर,ले असफलता का भार चले।अब अपना और पराया क्या?आबाद रहें रुकने वाले!हम स्वयं बँधे थे और स्वयंहम अपने बंधन तोड़ चले।

Jun 3, 20252 min

Ep 793Saath Ka Hona | Madan Kashyap

साठ का होना | मदन कश्यपतीस साल अपने को सँभालने मेंऔर तीस साल दायित्वों को टालने में कटेइस तरह साठ का हुआ मैंआदमी के अलावा शायद ही कोई जिनावर इतना जीता होगाकद्दावर हाथी भी इतनी उम्र तक नहीं जी पातेकुत्ते तो बमुश्किल दस-बारह साल जीते होंगेबैल और घोड़े भी बहुत अधिक नहीं जीतेउन्हें तो काम करते ही देखा हैहल खींचते-खींचते जल्दी ही बूढ़े हो जाते हैं बैलऔर असवार के लगाम खींचने परदो टाँगों पर खड़े हो जाने वाले गठीले घोड़ेकुछ ही दिनों में खरगीदड़ होकरताँगों में जुते दिखते हैं।मनुष्यों के दरवाज़ों पर बहुत नहीं दिखते बूढ़े बैलजो हल में नहीं जुत सकतेऔर ऐसे घोड़े तो और भी नहींजो ताँगा नहीं खींच सकतेमैंने बैलों और घोड़ों को मरते हुए बहुत कम देखा है।कहाँ चले जाते हैं बैल और घोड़ेजो आदमी का भार उठाने के काबिल नहीं रह जातेकहाँ चली जाती हैं गायेंजो दूध देना बन्द कर देती हैं।हम उन जानवरों के बारे में काफ़ी कम जानते हैंजिनसे आदमी के स्वार्थ की पूर्ति नहीं होतीलेकिन उनके बारे में भी कितना कम जानते हैंजिन्हें जोतते दुहते और दुलराते हैं।आदमी ज़्यादा से ज़्यादा इसलिए जी पाता हैक्योंकि बाक़ी जानवर कम से कम जीते हैंऔर जो कोई लम्बा जीवन जी लेता हैउसे कछुआ होना होता है।कछुआ बनकर ही तो जियासिमटा रहा कल्पनाओं और विभ्रमों की खोल मेंबेहतर दुनिया के लिए रचने और लड़ने के नाम परबदतर दुनिया को टुकुर-टुकुर देखता रहा चुपचापतभी तो साठपूर्ति के दिन याद आये मुक्तबोधजो साठ तक नहीं जी सके थेपर सवाल पूछ दिया था :'अब तक क्या किया जीवन क्या जिया..'ख़ुद को बचाने के लिएदेखता रहा चुपचाप देश को मरते हुएऔर ख़ुद को भी कहाँ बचा पाया!

Jun 2, 20253 min

Ep 792Atmalochan | Trilochan

आत्मालोचन | त्रिलोचनशब्द,मालूम है,व्यर्थ नहीं जाते हैंपहले मैं सोचता थाउत्तर यदि नहीं मिलेतो फिर क्या लिखा जाएकिंतु मेरे अंतरनिवासी ने मुझसे कहा—लिखा करतेरा आत्मविश्लेषण क्या जाने कभी तुझेएक साथ सत्य शिव सुंदर को दिखा जाएअब मैं लिखा करता हूँअपने अंतर की अनुभूति बिना रंगे चुनेकाग़ज़ पर बस उतार देता हूँ।

Jun 1, 20251 min

Ep 791Main Koi Kavita Likh Raha Hunga | Kailash Manhar

मैं कोई कविता लिख रहा हूँगा | कैलाश मनहरमैं कोई कविता लिख रहा हूँगाजबसंसद में चल रही होगी बहसकि क्यों और कितना ज़रूरी हैबचाना कानून को ?कविता से, होने वाले खतरे परचिन्तितसत्ता और प्रतिपक्ष के सांसदकानून की मज़बूती के बारे मेंसोच रहे होंगे,वातानुकूलित सदन मेंबाहर कीउमस और गर्मी से बेख़बर ।मन्दिरों में गूँज रहे होंगे शंख और घड़ियालमस्जिदों में अज़ानेंकि शैतानअब कविता की शक़्ल में आया हैचर्च मेंप्रार्थना कर रहे होंगेयीशु के हत्यारे....ऐसा ही होगा शायदकि मैं कोई कविता लिख रहा हूँगाजबतोप के मुँह पर बैठी होगीचहकती चिड़िया.....

May 31, 20251 min

Ep 790Kahin Baarish Ho Chuki Hai | Zeeshan Sahil

कहीं बारिश हो चुकी है | ज़ीशान साहिलमकान और लोगबहुत ख़ुश और नए नज़र आ रहे हैंरास्ते और दरख़्तख़ुद को धुला हुआ महसूस कर रहे हैंदरख़्त: पेड़फूल और परिंदेतेज़ धूप में फैले हुए हैंख़्वाब और आवाज़ेंशायद पानी में डूबे हुए हैंउदासी और ख़ुशीओस की तरह बिछी हैऐसा लगता हैमेरे दिल से बाहरया तुम्हारी आँखों के पासकहीं बारिश हो चुकी है

May 30, 20251 min

Ep 789Pao Bhar Kaddu Se Bana Leti Hai Raita | Mamta Kalia

पाव भर कद्दू से बना लेती है रायता | ममता कालियाएक नदी की तरहसीख गई है घरेलू औरतदोनों हाथों में बर्तन थामचौकें से बैठक तक लपकनाजरा भी लड़खड़ाए बिनाएक साँस में वह चढ़ जाती है सीढ़ियाँ‌और घुस जाती है लोकल मेंधक्का मुक्की की परवाह किए बिनाराशन की कतार उसे कभी लम्बी नहीं लगीरिक्शा न मिलेतो दोनों हाथों में झोले लटकावह पहुँच जाती है अपने घरएक भी बार पसीना पोंछे बिनाएक कटोरी दही से तीन कटोरी रायताबना लेती है खाँटी घरेलू औरतपाव भर कद्दू में घर भर को खिला लेती हैज़रा भी घबराए बिना!

May 29, 20251 min

Ep 788O Prithvi Tumhara Ghar Kahan Hai | Kedarnath Singh

ओ पृथ्वी तुम्हारा घर कहाँ है | केदारनाथ सिंह जीने के अथाह खनिजों से लदीऔर प्रजनन की अपार इच्छाओं से भरी हुईओ पृथ्वीओ किसी पहले आदमी कीपहली गोल लिट्टीकहीं अपने ही भीतर के कंडे परपकती हुईओ अग्निगर्भाओ भूखओ प्यासओ हल्दीओ घासओ एक रंगारंग भव्य नश्वरताजिसकी हर आवृत्ति मेंवही उदग्रतावही पहलापनओ पृथ्वीओ मेरी हमरक़्सतुम्हारा घर कहाँ है!

May 28, 20251 min

Ep 787Kavita Mein | Amita Prajapati

कविता में | अमिता प्रजापतिकितना कुछ कह लेते हैंकविता मेंसोच लेते हैं कितना कुछप्रतीकों के गुलदस्तों मेंसजा लेते हैं विचारों के फूलकविता को बाँध कर स्केटर्स की तरहबह लेते हैं हम अपने समय से आगेवे जो रह गए हैं समय से पीछेउनका हाथ थामसाथ हो लेती है कविताज़िन्दगी जब बिखरती है माला के दानों-सी फ़र्श परकविता हो जाती है काग़ज़ का टुकड़ासम्भाल लेती है बिखरे दानों कोदुख और उदासी को हटा देती हैनींद की तरहताज़े और ठंडे पानी की तरहहो जाती है कविता

May 27, 20251 min

Ep 786Ajnabi Sham | Jaun Elia

अजनबी शाम | जौन एलियाधुँद छाई हुई है झीलों परउड़ रहे हैं परिंद टीलों परसब का रुख़ है नशेमनों की तरफ़बस्तियों की तरफ़ बनों की तरफ़अपने गल्लों को ले के चरवाहेसरहदी बस्तियों में जा पहुँचेदिल-ए-नाकाम मैं कहाँ जाऊँअजनबी शाम मैं कहाँ जाऊँनशेमनों: आश्रय रुख़: दिशागल्लों: झुण्ड

May 26, 20251 min