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Pratidin Ek Kavita

Pratidin Ek Kavita

1,183 episodes — Page 7 of 24

Ep 885Wahi Nahi Tha Premi | Anupam Singh

वही नहीं था प्रेमी | अनुपम सिंहकिसी दिन तुम पूछोगे मेरे प्रेमियों के नाममैं अपना निजी कहकर टाल जाऊँगीलेकिन प्रेमी वही नहीं थाजिसने कोई वादा किया और निभाया भीजिसके साथ मैं पाई गईसिविल लाइंस के कॉफी हाउस मेंजिसके साथ बहुत सारी कहानियाँ बनींऔर शहर की दीवार पर गाली की तरह चस्पां की गईवह भी था जिसके आगोश मेंजाड़े की आग मुझे पहली बार प्रिय लगीजिसने कोई वादा नहीं कियाऔर स्वप्न टूटने से पहले ही चला गयामैं वह आग हर जाड़े में जलाती हूँवह भी जिसके सम्मुख मैंनेसबसे झीना वस्त्र पहनाफिर धीरे-धीरे उतार दियाजो मुझे नहीं किसी और को प्रेम करता थाऔर अपनी आँखें फेर लींमेरी स्थूल देह से आँख फेरने वाले पुरुष की याद मेंमैं अक्सर अपना वस्त्र उतार देती हूँप्रेमी वही नहीं थाजो देह के सभी संस्तरों से गुज़र फूल-सा खिलाऔर मैं भी आवें-सी दहकीवह भी था जिसे पाने की वेदना में मेरी बाँहैंवल्लरी-सी फैलती चली गईंजो अभी नहीं लौटा हैउसके औचक ही मिलने की आस है।

Sep 2, 20252 min

Ep 884Raat ka Ped | Rahi Masoom Raza

रात का पेड़ | राही मासूम रज़ारास्तेचाँदनी ओढ़ कर सो गएझील पर नींद की सिलवटें पड़ गईंआहटेंपहले पीली पड़ींऔर फिरएक-एक करके सब झड़ गईंरात का पेड़दस्ते-दुआ बन गयाअपनी ही ज़ात सेअपने ही आपके बीच का फ़ासिला बन गयादर्द का रास्ता बन गयाएक बूढ़ापुर-असरार दरवेशजो सैकड़ों हाथ अपने उठाए हुएआसमाँ की तरफ़देखते-देखते थक गयाआसमाँ चुप रहारात के पेड़ के हाथ दुखने लगेफिर वही पेड़वहशत का इक सिलसिला बन गयाक़िस्सा-ए-अहले-दिलक़िस्सा-ए-साहिबाने-वफ़ा बन गयाज़ख़्मों की कोंपलें आ गईंऔर उस पेड़ ने झुक के मुझसे कहा :“सुबह के शौक़ में जागने से बड़ी कोई नेमत नहींअपनी आँखों को तुमसुबह के शौक़ मेंजागने और जगाने की तालीम दो”

Sep 1, 20252 min

Ep 883Saanp | Farhat Ehsaas

साँप | फ़रहत एहसाससाँप लपेटे घूम रहा हूँदुनिया मुझ से ख़ौफ़-ज़दा हैसब मुझ को अच्छे लगते हैंलेकिन यूँ हैजिस लड़की को चाहा मैं नेजिस लड़के को दोस्त बनायाजिस घर में माँ बाप बनाएजिस मस्जिद में घुटने टेकेसब ने मेरा साँप ही देखामुझ को कोई देख न पायामैं सब को कैसे समझाऊँये दुनिया का साँप नहीं हैमेरे साथ पला पोसा हैये मेरा माँ जायाबस मुझ को डसता है

Aug 31, 20251 min

Ep 882Dil Dukhta Hai | Mohsin Naqvi

दिल दुखता है | मोहसिन नक़वीदिल दुखता हैआबाद घरों से दूर कहींजब बंजर बन में आग जलेदिल दुखता हैपरदेस की बोझल राहों मेंजब शाम ढलेदिल दुखता हैजब रात का क़ातिल सन्नाटापुर-हौल फ़ज़ा के वहम लिएक़दमों की चाप के साथ चलेदिल दुखता है

Aug 30, 20251 min

Ep 881Depression | Mohammad Alvi

डिप्रेशन | मोहम्मद अल्वीकोई हादसाकोई सानेहा* कोई बहुत ही बुरी ख़बरअभी कहीं से आएगी!ऐसी जाँ-लेवा फ़िक्रों मेंसारा दिन डूबा रहता हूँरात को सोने से पहलेअपने-आप से कहता हूँभाई मिरेदिन ख़ैर से गुज़राघर में सब आराम से हैंकल की फ़िक्रेंकल के लिए उठा रक्खोमुमकिन हो तोअपने-आप कोमौत की नींद सुला रक्खो!!*अप्रिय घटना

Aug 29, 20251 min

Ep 880Deewar | Zbigniew Herbert | Translation-Agnieszka Kuczkiewicz-Fraś and Kunwar Narayan

दीवार/ ज़्बीग्न्येव हेर्बेर्तअनुवादक आग्नयेष्का कूच्क्येविच-फ़्राश और कुँवर नारायणहम सब दीवार से लगकर खड़े हैं। हमारी जवानी क़ैदियों कीक़मीज़ की तरह उतरवा ली गई हैं। हम प्रतीक्षा कर रहे हैं। एक चिपचिपी गोली गुद्दी पर लगने से पहले दस-बीस वर्ष गुज़र रहे। दीवार ऊँची और मज़बूत है। दीवार के पीछे एक पेड़ है और एक सितारा। पेड़ की जड़ें दीवार के नीचे धँस कर उसे फोड़ रहीं। सितारा पत्थर को एक चूहे की तरह कुतर रहा। सौ-दो सौ साल में एक छोटा-सा झरोखा बन जाएगा।

Aug 28, 20251 min

Ep 879Agni Desh Se Aata Hun Main | Harivansh Rai Bachchan

अग्नि देश से आता हूँ मैं | हरिवंशराय बच्चनअग्नि देश से आता हूँ मैं!झुलस गया तन, झुलस गया मन,झुलस गया कवि-कोमल जीवन,किंतु अग्नि वीणा पर अपने, दग्ध कंठ से गाता हूँ मैं!अग्नि देश से आता हूँ मैं!कंचन ही था जो बच पाया उसे लुटाता मग में आया,दीनों का मैं वेश किए हूँ , दीन नहीं हूँ, दाता हूँ मैं!अग्नि देश से आता हूँ मैं!तुमने अपने कर फैलाए,लेकिन देर बड़ी कर आए,कंचन तो लुटा चुका, पथिक, अब लूटो राख लुटाता हूँ मैं!अग्नि देश से आता हूँ मैं!

Aug 27, 20251 min

Ep 878Pret Lok Mein | Maksim Tank | Translation - Ramesh Kaushik

प्रेत लोक में/ मक्सिम तान्कअनुवाद: रमेश कौशिकएक बार मैंप्रेत-लोक में गयादांते के संगउसके अँधियारे घेरों मेंघूम रहे थे हमतभी कवि रुक गयाअचम्भे में आविश्वास नहीं थाजो कुछ उसने देखापहली बारअँधेरे की वह दुनियादुःख से बोझिलप्रेतों की दुनियाजब देखी थी उसनेतब से अब तकजाने कितनेऔर नए घेरे बन आएजो प्राचीन काल में अनजाने थे।

Aug 26, 20251 min

Ep 877Bura Kshan | Rafael Alberti | Jeetendra Kumar

बुरा क्षण/ रफ़ाइल अलबर्तीअनुवाद : जितेंद्र कुमारउन दिनों जब मैं सोचा करता थाकि गेहूँ के खेतों में देवताओं और सितारों का निवास हैऔर कुहरा हिरनी की आँख का आँसूकिसी ने मेरे सीने और छाया को पोत दियाऐसे में चला गयायह वह क्षण थाजब बंदूक़ की गोलियाँ पगला उठी थींसमुद्र उन लोगों को बहाकर ले गयाजो चिड़िया बनना चाहते थेबेतार संदेश बुरी ख़बरें ही लाते थेख़ून कीऔर उस जल की मृत्यु कीजो सदा से आकांश ताका करता थाअथाह!

Aug 25, 20251 min

Ep 876Bairang Benaam Chithiyaan | Ramdarash Mishra

बैरंग बेनाम चिट्ठियाँ | रामदरश मिश्रकब सेयह बैरंग बेनाम चिट्ठी लिये हुएयह डाकिया दर-दर घूम रहा है कोई नहीं है वारिस इस चिट्ठी काकौन जानेकिसका अनकहा दर्दकिसके नामइस बन्द लिफाफे मेंपत्ते की तरह काँप रहा है?मैंने भी तोएक बैरंग चिट्ठी छोड़ी हैपता नहीं किसके नाम?शायद वह भी इसी तरहसतरों के होंठों में अपने दर्द कसेयहाँ-वहाँ घूम रही होगीमित्रों!हमारी तुम्हारी ये बैरंग लावारिस चिट्टठियाँपरकटे पंछी की तरहकिसी दिन लावारिस जगहों पर और कभी किसी दिनपड़ी-पड़ी फड़फड़ाएँगीकोई अजनबीइन्हें कौतूहलवश उठाकर पढ़ेगातो तड़प उठेगाओह!बहुत दिन पहले किसी नेये चिट्ठियाँशायद मेरे ही नाम लिखी थीं।

Aug 24, 20252 min

Ep 875Jeevan | Malay

जीवन/ मलयअथाह गहराइयों कीआँख सेदेखता हूँ ब्रह्मांडसतह परतैरता यह जीवनछोटे से छोटा है

Aug 23, 20251 min

Ep 874Ichha | Shubha

इच्छा | शुभामैं चाहती हूँ कुछ अव्यवहारिक लोगएक गोष्ठी करेंकि समस्याओं को कैसे बचाया जाएउन्हें जन्म लेने दिया जाएवे अपना पूरा क़द पाएँवे खड़ी होंऔर दिखाई देंउनकी एक भाषा होऔर कोई उन्हें सुने

Aug 22, 20251 min

Ep 873Ishq Mein Referee Nahi Hota | Gulzar

इश्क़ में ‘रेफ़री’ नहीं होता! | गुलज़ारइश्क़ में ‘रेफ़री’ नहीं होता‘फ़ाउल’ होते हैं बेशुमार मगर‘पेनल्टी कॉर्नर’ नहीं मिलता!दोनों टीमें जुनूँ में दौड़ती, दौड़ाए रहती हैंछीना-झपटी भी, धौल-धप्पा भीबात बात पे ‘फ़्री किक’ भी मार लेते हैंऔर दोनों ही ‘गोल’ करते हैं!इश्क़ में जो भी हो वो जाईज़ हैइश्क़ में ‘रेफ़री’ नहीं होता!

Aug 21, 20251 min

Ep 872Unka Ghar | Hemant Deolekar

उनका घर | हेमंत देवलेकर आग बरसाती दोपहर मेंतगारियाँ भर- भर करमाल चढ़ा रहे हैं जो ऊपर घर मेरा बना रहे हैं।जिस छत को भरते हैंअपने हाड़ और पसीने सेवे इसकी छाँव में सुस्ताने कभी नहीं आएंगे इतनी तल्लीनता से एक- एक ईंट कीरेत- मसाले की कर रहे तरीवे इस घर में एक घूँट भर पानी के लियेकभी नहीं आएंगे |दूर छाँव में खड़ेखड़े हो देखता हूँ वे सब पक्षियों की तरह दिन रातजैसे अपना ही घोंसला बनाने में जुटे हुए उनको शुक्रिया कहने का ख़्याल भीमुझे नहीं आएगा ।एक दिनसीमेंट, चूने, गारे से लथपथयूं चले जायेंगे वे जैसे थे ही नहीं ।मुझे तस्सली होगी कि उन्हेंमेहनताना देकर विदा कियालेकिन उनका बहुत-सा उधार इस घर में छूटा रह जाएगा !

Aug 20, 20252 min

Ep 871Prateeksha Mein Prem | Chitra Pawar

प्रतीक्षा में प्रेम | चित्रा पंवारनीलगिरि की पहाड़ीबारह बरस बादनीलकुरिंजी के खिलने पर हीकरती हैअपनी देह का शृंगारवह नहीं जाती चंपा, चमेली, गुलाब के पासअपने यौवन का सौंदर्य माँगनेअयोध्या व उर्मिला के सत को विचलित नहीं करताचौदह साल का चिर वियोगजानती हैं वोएक दिन लौटेंगे रामअनुज लखन के साथपार्वती कई जन्मों तककरती है तपबनाती है ख़ुद को राजकुमारी से अपर्णाअर्धनारीश्वर शिव की प्राण प्रियावैशाख, जेठ की अग्नि में भीजलकर नष्ट नहीं होती धरा की हरितिमाक्योंकि सुन रही है वोपास आते सावन की पदचापजहाँ प्रतीक्षा हैधैर्य हैलौट आने का भरोसा हैविरह की सुखद पीड़ा हैवहीं है प्रेम...

Aug 19, 20252 min

Ep 870Chipche Doodh Se Nahlate Hain | Gulzar

चिपचे दूध से नहलाते हैं आँगन में खड़ा कर के तुम्हें | गुलज़ारचिपचे दूध से नहलाते हैं आँगन में खड़ा कर के तुम्हेंशहद भी, तेल भी, हल्दी भी, न जाने क्या क्याघोल के सर पे लँढाते हैं गिलसियाँ भर के...औरतें गाती हैं जब तीवर सुरों में मिल करपाँव पर पाँव लगाए खड़े रहते हो इक पथराई-सी मुस्कान लिएबुत नहीं हो तो, परेशानी तो होती होगी!जब धुआँ देता, लगाता पुजारीघी जलाता है कई तरह के छोंके देकरइक ज़रा छींक ही दो तुम,तो यक़ीं आए कि सब देख रहे हो!

Aug 18, 20251 min

Ep 869Raat Kisi Ka Ghar Nahi | Rajesh Joshi

रात किसी का घर नहीं | राजेश जोशीरात गए सड़कों पर अक्सर एक न एक आदमी ऐसा ज़रूर मिल जाता हैजो अपने घर का रास्ता भूल गया होता हैकभी-कभी कोई ऐसा भी होता है जो घर का रास्ता तो जानता हैपर अपने घर जाना नहीं चाहताएक बूढ़ा मुझे अक्सर रास्ते में मिल जाता हैकहता है कि उसके लड़कों ने उसे घर से निकाल दिया है।कि उसने पिछले तीन दिन से कुछ नहीं खाया है।लड़कों के बारे में बताते हुए वह अक्सर रुआँसा हो जाता हैऔर अपनी फटी हुई क़मीज़ को उघाड़करमार के निशान दिखाने लगता हैकहता है उसने बचपन में भी अपने बच्चों परकभी हाथ नहीं उठायालेकिन उसके बच्चे उसे हर दिन पीटते हैंकहता है कि वह अब कभी लौटकरअपने घर नहीं जाएगालेकिन थोड़ी देर बाद ही उसे लगता है कि उसने यूँ हीग़ुस्से में बोल दिया था यह वाक़्यअपमान पर हावी होने लगती एक अनिश्चितताएक भय अचानक घिरने लगता है मन मेंथोड़ी देर बाद वह अपने आप से ही हार जाता हैदूसरे ही पल वह कहता हैकि अब इस उम्र में वह कहाँ जा सकता हैवह चाहता है, मैं उसके लड़कों को जाकर समझाऊँकि लड़के उसे वापस घर में आ जाने देंकि वह चुपचाप एक कोने में पड़ा रहेगाकि वह बाज़ार के छोटे-मोटे काम भी कर दिया करेगाबच्चों को स्कूल से लाने ले जाने का काम तोवह करता ही रहा है कई साल सेवह चुप हो जाता है थक कर बैठ जाता हैजैसे ही लगता है कि उसकी बात पूरी हो चुकी हैवह फिर बोल पड़ता है कहता है : मैं बूढ़ा हो गया हूँकभी-कभी चिड़चिड़ा जाता हूँसारी ग़लती लड़कों की ही नहीं हैवे मन के इतने बुरे भी नहीं हैंहालात ही इतने बुरे हैं, उनका भी हाथ तंग रहता हैउनके छोटे-छोटे बच्चे हैं और वो मुझे बहुत प्यार करते हैंमेरा तो पूरा समय उन्हीं के साथ बीत जाता हैफिर अचानक वह खड़ा हो जाता है कहता हैहो सकता है वे मुझे ढूँढ़ रहे होंउनमें से कोई न कोई थोड़ी देर में ही मुझे लिवाने आ जाएगाआप अगर मेरे लड़कों में से किसी को जानते होंतो उससे कुछ मत कहिएगासब ठीक हो जाएगा...सब ठीक हो जाएगा...बुदबुदाते हुए वह आगे चल देता हैरात किसी का घर नहीं होतीकिसी बेघर के लिएकिसी घर से निकाल दिए गए बूढ़े के लिएमेरे जैसे आवारा के लएरात किसी का घर नहीं होतीउसके अँधेरे में आँसू तो छिप सकते हैं कुछ देरलेकिन सिर छिपाने की जगह वह नहीं देतीमैं उस बूढ़े से पूछना चाहता हूँपर पूछ नहीं पाताकि जिस तरफ़ वह जा रहा हैक्या उस तरफ़ उसका घर है?

Aug 17, 20254 min

Ep 868Chipe Raho Bheetar Hi | Nilesh Raghuvanshi

छिपे रहो भीतर ही | नीलेश रघुवंशी फर्स्ट अप्रैल, शनिवार, 2000, आधी रातकुछ-कुछ हो रहा है मुझे, शायद तुम अब आने वाले होसारी दुनिया के बच्चे, सबके सो जाने के बाद ही, क्यों सोचते हैं आने के बारे मेंमेरे एकदम पास, तुम्हारे पापा सोए हुए हैंक्या उन्हें जगाकर बता देना चाहिए कि तुम आने वाले होबहुत गहरी नींद में हैं वो-अभी उनमें एक नन्हा-मुन्ना दिख रहा हैपरी नन्ही-सी या नन्हा-सा राजकुमार, फिर वही बातपूरे नौ महीने एक ही बात, तुम हो कौन सुंदर रहस्यदर्द बढ़ता जा रहा है, समझ नहीं आ रहा कुछतुम्हारे जन्म से पहले का दर्द है या यूँ ही-बस महीने जैसा दर्द हो रहा हैतुम क्यों उत्पात मचा रहे हो, दर्द के साथ-साथ जान निकली जा रही है मेरीओह श्रीराज...दबी-घुटी चीख निकल ही गईअरे रे, श्रीराज तो पसीने-पसीने हो रहे हैं, लगता है बहुत तेज़ बारिश होने वाली हैबिजली कड़के इससे पहले ही छुप जाते हैं हम दोनोंछिपे रहो तुम भी भीतर ही...दीये की लौ की तरह जलते-बुझते-टिमटिमाते दर्द हो रहे हैंये दर्द हैं, या जान लेने का सुंदर सजीव तरीक़ाअस्पताल पहुँच ही गई मैं, आसपास मेरे डॉक्टर्स और नर्सरात साढ़े बारह से शुरू हुई यह यात्रा, शाम के पाँच बजे तकरुकने का नाम ही नहीं ले रहीयह तो नरक है, नरक! जन्म देना, एक यातना से गुज़रना हैयह क्या दे रहे हो तुम अपनी माँ को?आँखें मुँदी जा रही हैं अब एक-एक कर, मेरे आसपास, जो मेरे अपने थे, कमरे में रह गएडॉक्टर्स और नर्सों के साथ लेबर-रूम में जा रही हूँ मैंप्रसवपीड़ा को कोई और नाम देना चाहिएये ये ये...तुम्हारे रोने की आवाज़ सुनाई दीरोने की आवाज़ से मुझे लग रहा है, तुम नन्हे-से बदमाश राजकुमार होइतनी ज़ोर से क्यों रो रहे हो बेटे?अप्रैल फूल बनाया तुमने-दिन शनिवार, शाम छह बजकर उनचास मिनटठीक इसी समय तो शाम आती है अपने घर की छत परमुस्करा रही होगी शाम और सूरज सुस्ता रहा होगा मेरी तरह !

Aug 16, 20253 min

Ep 867Dincharya | Shrikant Verma

दिनचर्या | श्रीकांत वर्माएक अदृश्य टाइपराइटर पर साफ़, सुथरेकाग़ज़-साचढ़ता हुआ दिन,तेज़ी से छपते मकान,घर, मनुष्यऔर पूँछ हिला गली से बाहर आताकोई कुत्ता।एक टाइपराइटर पृथ्वी पररोज़-रोज़छापता हैदिल्ली, बंबई, कलकत्ता।कहीं पर एक पेड़अकस्मात छपकरता है सारा दिनस्याही मेंन घुलने का तप।कहीं पर एक स्त्रीअकस्मात उभरकरती है प्रार्थनाहे ईश्वर! हे ईश्वर!ढले मत उमर।बस के अड्डे परएक चाय की दुकानदिन-भर बुदबुदाती है‘टूटी हुई बेंच परबैठा है उल्लू का पट्ठापहलवान।’जलाशय पर अचानक छप जाता हैमछुए का जालचरकट के कोठे सेउतरती है धूपऔर चढ़ता हैदलाल।एक चिड़चिड़ा बूढ़ा थका क्लर्क ऊबकर छपे हुए शहर कोछोड़ चला जाता है।

Aug 15, 20252 min

Ep 866Badka Bhaiyya | Rupam Mishra

बड़का भइया | रूपम मिश्र बड़का भइया मेरी मझिगवां वाली दीदी के चचेरे भाई हैंउनकी पीढ़ी में सबसे बड़े और पट्टीदारी में सबसे मातिवर दीदी की हर सुंदर बात में बड़का भइया होते हैंजैसे कोई व्यक्ति सुंदर है तो वो ज़रूर बड़का भइया की तरह भभकता है संसार की सारी सौंदर्य उपमायें बड़का भइया के निहोरे पर बनी थी जैसे बड़का भइया का रंग कैसा है एकदम गोर-अंगारऔर आँखें आम की फांकदुनिया की जितनी आदर्श और श्रेठता की कहानियां थी बड़का भइया से जुड़ती थींकोई प्राइमरी पढ़कर कलेक्टर हुआ तो वो ज़रूर बड़का भइया की प्रजाति का होगा ऐसा मेरी दीदी सोचती हैं दीदी के घर तो बड़का भइया सिर्फ वरीक्षा में आये थे पर दीदी की बातों में अक्सर आ जाते हैंदीदी के जीवन की सबसे सुंदर यात्रा है जो छुटपन में बड़का भइया के कांधे पे गोपीगंज का मेला देखा एकबार बीमार थे बड़का भइया जाने क्या हुआ था बरिस बीते ठीक नहीं हो रहे थे दीदी मेरे पास आकर भइया की चर्चा करके रोतींइतनी पवित्र व निःस्वार्थ रूलाई की मैं साथ में रो पड़ती उस अनदेखे आदमी के लिए उसी रूलाई में मैंने सोचा कि पूछूँ कि दीदी आपको बड़का भइया का इतना मोह क्यों लगता है!पर कभी न पूछ सकी ( इतने सजल स्नेह के लिए जैसे उलार लगता ये सवाल) दीदी खूब प्रार्थना करतीं बड़का भइया के लिए और वे लम्बी बीमारी से ठीक हो गये हैंऔर फिर से दीदी की बातों में नायक बने रहते हैं मैंने बड़का भइया को नहीं देखा हैजैसा कि दीदी कहती हैं हमारे बड़का भइया अंधेरे में खड़े हो जायें तो अजोर हो जायेमैं सोचती हूँ अजोर का बखार तो दीदी की आत्मा में है अपनी दुनिया में खोए बड़का भइया को क्या याद है अपनी इस सखी बहन कीक्या उन्हें पता है इसी संसार में कोई स्त्री रहती है कहीं धरती के एक कोने में हरियर माटी की तरह पड़ीजो उनको इतना पवित्र प्रेम करती है।

Aug 14, 20253 min

Ep 865Pyaas | Ramdarash Mishra

प्यास | रामदरश मिश्र खड़ा हूँ नदी के किनारे प्यासा-प्यासाजल के पास होकर भी जल नहीं पी पा रहा हूँमैने पूछा-"तुमने अपने पानी का यह क्या रूप बना दिया है नदी?”नदी दर्द से मुस्कराई, बोली"मैंने क्या किया है आदमीयह तो तुम्हारी ही गंदगी है।जो मुझमें झर-झर कर मुझे विषाक्त कर रही हैअब तो मैं भी अपना जल नहीं पी पातीप्यासी-प्यासी बह रही हूँ ।"

Aug 13, 20251 min

Ep 864Daro | Ghanshyam Kumar Devansh

डरो | घनश्याम कुमार देवांशडरोलेकिन ईश्वर से नहींएक हारे हुए मनुष्य सेसूर्य से नहींआकाश की नदी में पड़े मृत चंद्रमा सेभारी व वज्र कठोर शब्दों से नहींउनसे जो कोमल हैं और रात के तीसरे पहरधीमी आवाज़ में गाए जाते हैंडरोधार और नोक से नहींएक नरम घास के मैदान की विशालताऔर हरियाली सेसाम्राज्य के विराट ललाट से नहींएक वृद्ध की नम निष्कंप आँखों से

Aug 12, 20252 min

Ep 863Jab Dost Ke Pita Marey | Kumar Ambuj

जब दोस्त के पिता मरे | कुमार अम्बुजबारिश हो रही थी जब दोस्त के पिता मरेभीगते हुए निकली शवयात्राबारिश की वजह से नहीं आए ज़्यादा लोगजो कंधा दे रहे थे वे एक तरफ़ से भीग रहे थे कमसबसे पहले बारिश होती थी दोस्त के पिता के शव परदोस्त चल रहा था आगे-आगेनिरीह बेहोशी से भरी डगमगाती हुई थी उसकी चालशमशान में पहुँचकर लगा बारिश में बुझ जाएगी आगकई पुराने लोग थे वहाँ जो कह रहे थेनहीं बुझेगी चिताहम सबने देखा बारिश में दहक रही थी चितालौटने में तितर-बितरहुए लोगदोस्त के कंधे पर हाथ रखे हुए लौटा मैंमुझे नहीं समझ आया क्या कहूँ मैं उससेमुझे तो यह नहीं पता कि कैसा लगता है जब मरते हैं पिताअब जब मर गए दोस्त के पिता तो क्या कहूँ उससेकि बारिश में हिचकी लेता हुआ उसका गीला शरीर न काँपेकौन-सा एक शब्द कहूँ उससे सांत्वना का आखिरयही सोचता रहा देर तकरात को जब घर लौटकर आयाबारिश उसी तरह हो रही थी लगातार।

Aug 11, 20252 min

Ep 862Itvaar | Anup Sethi

इतवार | अनूप सेठीआओ इतवार मनाएँदेर से उठेंचाय पिएँऔर चाय पिएँअख़बार को सिर्फ़ उलट पलट लेंहाथ न लगाएंसिर्फ़ चाय का गिलास घुमाएँकिसी को न बुलाएँनहाना भी छोड़ देंखाना अकेले खाएँबाजार खरीदारी स्थगित कर दें अगले हफ्ते तककेरोसिन ले लें दस रुपए ज़्यादा देकरएक पुरसुकून दोपहर होढीलमढाल पसरे रहेंपुरानी एलबम निकालेंपहली सालगिरह याद करेंबातें करेंबचपन की, कालेज की, नाटक की कविताई कीसारे सपनों की धूल झाड़ेंबिस्तर के इर्द गिर्द बिछा लेंइतवार की शामआँखों में आँखें डाल सो जाएँएक इतवार तो होअपने से बाहर निकलअपने में खो जाएँ।

Aug 10, 20251 min

Ep 861Jitne Sabhya Hotey Hain | Vinod Kumar Shukla

जितने सभ्य होते हैं | विनोद कुमार शुक्लजितने सभ्य होते हैंउतने अस्वाभाविक।आदिवासी जो स्वाभाविक हैंउन्हें हमारी तरह सभ्य होना हैहमारी तरह अस्वाभाविक ।जंगल का चंद्रमाअसभ्य चंद्रमा हैइस बार पूर्णिमा के उजाले मेंआदिवासी खुले में इकट्ठे होने सेडरे हुए हैंऔर पेड़ों के अंधेरे में दुबकेविलाप कर रहे हैंक्योंकि एक हत्यारा शहरबिजली की रोशनी सेजगमगाता हुआसभ्यता के मंच पर बसा हुआ है ।

Aug 9, 20251 min

Ep 860Gumshuda Guldaste | Adnan Kafeel Darwesh

गुमशुदा गुलदस्ते | अदनान कफ़ील दरवेश कुछ पेड़ हैं वहाँपानी की तरह ठोसऔर हवा की तरह नर्मऔर आसमान-से हल्के-गुलाबीफूल उनमें खिलतेकाँटों-से बेशुमारदहकते शोलों-सेदूर से चमकते...कच्चे रास्तेइशारों-से नाज़ुकझुके चले आते मेरी तरफ़जहाँ तुम्हारी यादों केगुमशुदा गुलदस्तेढूँढ़ते हैं मेरे पाँव...इन तुर्श अँधेरों मेंअपनी खोई उम्र को सोचताभटकता हूँजहाँ बर्फ़ से भी तेज़ गल जाती हैं यादें..

Aug 8, 20251 min

Ep 859Pratham Milan | Adnan Kafeel Darwesh

प्रथम मिलन | अदनान कफ़ील दरवेश एक दिन भाषा की चमकीली चप्पल उतार कर आऊँगा तुम से मिलने अपने प्रथम मिलन में मैं अधिक बोलने से परहेज़ करूँगा और अपनी आत्मा का हर बोझ उतार कर तुमसे मिलना चाहूँगा तुम्हारे मन के साँकल को हल्के-हल्के खटखटाउँगा तुम्हारी देह भाषा को पढ़ने के बजाए सुनना ज़्यादा पसंद करूँगा तुम भी वक़्त लेकर आना मुझसे मिलने एक सदी की गूँज हूँ मैं अपने एकांत में मुझे बूझने का भरपूर अवसर देना तुम मैं तुम से धीरे-धीरे मिलूँगा तुम्हारी हथेली से तुम्हारी आँखों तक का सफ़र तय करने में मैं एक सदी लगा देना चाहूँगा

Aug 7, 20251 min

Ep 858Tumhare Baare Mein | Bhawani Prasad Mishra

तुम्हारे बारे में | भवानी प्रसाद मिश्रतुम्हारे बारे में,तुमसे ही कहूँतुम्हें देखकर बढ़ जाती हैमशालों की ज्योतिमोती हो जाता हैज़्यादा पानी दारआभार-सा मानता हैंहर प्रकाश का पुंज कुंज ज़्यादा हरे हो जाते हैं नदी-नद ज़्यादा भरे हो जाते हैंवन हो पाते हैं उन्मनपवन उतना चंचल नहीं रहतासृष्टि का श्रम जिस दिनमेरे हाथ में आयेगामैं हर जगह तुम्हें पेश कर दूँगासारे अविशेषों कोस्पर्श से तुम्हारेसरासर सविशेष कर दूँगा !

Aug 6, 20251 min

Ep 857Swapn Me Bhi Swapn Ke Bahar | Adnan Kafeel Darwesh

स्वप्न में भी स्वप्न के बाहर | अदनान कफ़ील दरवेश सोचो तोघर भी एक गुल्लक है।जिसमें बजते हैंतरल-ठोस दिनखड़-खड़ उदास...कागज़ हैं दीवारेंजिन्हें सोख लिया हैढेर सारे समय का बजता पानीअहाते में हैंइमली और अमरूद के चमकदार दरख़्तदो बुज़ुर्गों की तरह खड़ेशायद बच्चे होंबुत बनेकिसी बरहम हुए खेल के बीचरेहल पर धरा है कलाम-पाकहरे ग़िलाफ़ में बन्दरोककर समय की धारदीवार घड़ीमुँह फेरे टँगी हैअलमारी के थोड़ा-सा ऊपर एक रहस्यमयी ख़ुशबू का झोंकाहवा के साथ उड़ता हुआपास से गुज़र जाता हैरौशनदान से झरती है चाँदनीअचरज की तरहमैं भटकता हूँ मुँह-अँधेरेकिसी और समय मेंचुपचाप...घर एक द्वीप हैसमंदर मेंदूर से चमकताअजगर की गुंजलकों में कसामैं स्वप्न में भीस्वप्न के बाहरबुरी तरह हाँफता...

Aug 5, 20252 min

Ep 856Samaj Unhe Mardana Kehta Hai | Ekta Verma

समाज उन्हें मर्दाना कहता है | एकता वर्मा जो राजाओं के युद्ध से लौटने का इन्तिज़ार नहीं करती उनके पीछे जौहर नहीं करती बल्कि निकलती हैं संतान को पीठ पर बाँध कर तलवार खींच कर रणभूमि में समाज उन्हें मर्दाना कहता है जो थाली में छोड़ी गई जूठन से संतोष नहीं धरती जो अपनी हथेलियों से दरेर कर तोड़ देती हैं भूख के जबड़े जो खाती हैं घर के मर्दों से देवढी ख़ुराक और पीती हैं लोटा भर पानी समाज उन्हें मर्दाना कहता है जिनके व्यक्तित्व में स्त्रीयोचित व्यवहार की बड़ी कमी होती है जिनकी चाल में सिखाई गई सौम्यता नहीं है स्त्रीत्व नहीं बल्कि गुरुत्व के अनुकूल जो धमक कर चलती हैं टाँगें खोल कर पसर कर बैठती हैं जिनके ख़ून की गरमी सारे षड्यंत्रों के बावजूद शेष है समाज उन्हें मर्दाना कहता है जो गरज सकती हैं क्रोध में बरस सकती हैं आशंकाओं से निश्चित जो अपने जंघाओं पर ताब देकर खुलेआम चुनौती दे सकती हैं भरी सभा मूँछें ऐंठ सकती हैं मूँछ दार बेटियाँ जन सकती हैं समाज उन्हें मर्दाना ही कहता है वे मर्दानगी के खूँटे में बंधी सत्ता को उसके नुकीले सींघों के पकड़ कर धोती हैं घर की इकलौती कमाऊ लड़कियों से लेकर प्रदेश की मुख्यमंत्री अथवा देश की प्रधानमन्त्री तक वे सभी औरतें जो नायिकाओं की तरह सापेक्षताओं में नहीं अपितु एक नायक की भाँति जीती हैं केन्द्रीय भूमिकाओं में यह समाज यह देश मर्दाना ही कहता है

Aug 4, 20252 min

Ep 855Churchgate Ka Platform | Anup Sethi

चर्चगेट का प्लेट्फॉर्म | अनूप सेठीशाम के समय जब प्लेटफॉर्म बहुत व्यस्त होता हैढलती धूप के चौकोर टुकड़ेपैरों से खचाखच भरते जाते हैंरीत जाते हैं फिर भर जाते हैंदीवारों पर लगे बड़े पँखों की हवा मेंसाँस लेने पसीना सुखानेकिसी का इंतज़ार करने कोरुक जाते हैं कई लोगदो-दो मिनट में लोगों का रेला आता हैदनदनाता धकियाताछूता आसपासगुजर जाता हैजैसे टयूब वैल का बंबाछूटता है रुक रुक करकलकल करता सिहराता जज़्ब हो जाता हैखेतों की मिट्टी के रग रेशे मेंबहुत सारे पैरों कोप्लेटफॉर्म की रोशनी के हवाले करधूप चली जाएगी मैरीन ड्राइव की तरफ़समुद्र में उतर जाएगा सूरजनई दुनिया की टोह लेतादो-दो मिनट में लोगों का रेलादिन भर के काम से थकाट्रेनों में ठुँस कर निकल जाएगाघरों की दूसरी दुनिया कोट्यूब वेल के बंबे का छलछलाता पानीमिट्टी के रग रेशे में जान डालता हैठंडी ताज़ी महक सी उठती हैपसीने में रची हुईबड़े पँखों की हवा के नीचेबेहद व्यस्त प्लेटफॉर्मबहुत सारे शोर मेंउम्मीद की आहट देता हैचर्चगेट बहुत सुन्दर दिखता है।

Aug 3, 20252 min

Ep 854Deh | Devi Prasad Mishra

देह | देवी प्रसाद मिश्रदेह प्रेम के काम आती है।वह यातना देने और सहने के काम आती है।पीटने में जला देने मेंआत्मा को तबाह करने के लिये कई बार राज्य और धर्मदेह को अधीन बनाते हैंबाज़ार भी करता है यह कामवह देह को इतना सजावटी बना देता है किउसे सामान बना देता हैबहुत दुःख की तुलना मेंबहुत सुख से ख़त्म होती है आत्मा

Aug 2, 20251 min

Ep 853Ilahabad | Satyam Tiwari | Satyam Tiwari

इलाहबाद | सत्यम तिवारी तय तो यही हुआ था घोर असहमति के साथ जब भी वर्षा होगी हम यात्रा पर निकलेंगे असबाब उतना ही रहेगा जितना एक नाव पर सिमट आए भटकाव की सहूलत मिलेगी और निरपराध की भावना फिर भी कैसे तुमने मेरे रेतीले अस्तित्व को पग पग पर भास्काया जैसे रेत से घर नहीं बन सकता जैसे हम चाहते भी तो उसमें रह नहीं पाते तब से लेकर अब तक न जाने कितनी बरसातें बीतीं इलाहबाद डूबता रहा आकंठ और सिर्फ़ नूह का जहाज़ बचता रहा दुबारा तुम्हें मैंने कोसने के क्रम में ढूँढा तुम्हें नहीं पाता तो किसके आगे पटकता थाली हाथ नहीं फैलाता तो कैसे दिखलाता कि पीने के लिए पानी नहीं है खाने के लिए सत्तू करने के लिए याद

Aug 1, 20252 min

Ep 852Todna Aur Banana | Priyadarshan

तोड़ना और बनाना | प्रियदर्शनबनाने में कुछ जाता हैनष्ट करने में नहींबनाने में मेहनत लगती है. बुद्धि लगती है, वक्त लगता हैतोड़ने में बस थोड़ी सी ताकतऔर थोड़े से मंसूबे लगते हैं।इसके बावजूद बनाने वाले तोड़ने वालों पर भारी पड़ते हैंवे बनाते हुए जितना हांफते नहीं,उससे कहीं ज़्यादा तोड़ने वाले हांफते हैं।कभी किसी बनाने वाले के चेहरे पर थकान नहीं दिखतीपसीना दिखता है, लेकिन मुस्कुराता हुआ,खरोंच दिखती है, लेकिन बदन को सुंदर बनाती है। लेकिन कभी किसी तोड़ने वाले का चेहराआपने ध्यान से देखा है?वह एक हांफता, पसीने से तर-बतर बदहवास चेहरा होता हैजिसमें सारी दुनिया से जितनी नफरत भरी होती है,उससे कहीं ज़्यादा अपने आप से।असल में तोड़ने वालों को पता नहीं चलताकि वे सबसे पहले अपने-आप को तोड़ते हैंजबकि बनाने वाले कुछ बनाने से पहले अपने-आप को बनाते हैं।दरअसल यही वजह है कि बनाने का मुश्किल काम चलता रहता हैतोड़ने का आसान काम दम तोड़ देता है।तोड़ने वालों ने बहुत सारी मूर्तियां तोड़ीं, जलाने वालों ने बहुत सारी किताबें जलाईंलेकिन बुद्ध फिर भी बचे रहे, ईसा का सलीब बचा रहा, कालिदार और होमर बचे रहे।अगर तोड़ दी गई चीज़ों की सूची बनाएं तो बहुत लंबी निकलती हैदिल से आह निकलती है कि कितनी सारी चीज़ें खत्म होती चली गईं-कितने सारे पुस्तकालय जल गए, कितनी सारी इमारतें ध्वस्त हो गईं,कितनी सारी सभ्यताएं नष्ट कर दी गईं, कितने सारे मूल्य विस्मृत हो गएलेकिन इस हताशा से बड़ी है यह सच्चाईकि फिर भी चीज़ें बची रहींबनाने वालों के हाथ लगातार रचते रहे कुछ न कुछनई इमारतें, नई सभ्यताएं, नए बुत, नए सलीब, नई कविताएंऔर दुनिया में टूटी हुई चीज़ों को फिर से बनाने का सिलसिला।ये दुनिया जैसी भी हो, इसमें जितने भी तोड़ने वाले हों,इसे बनाने वाले बार-बार बनाते रहेंगेऔर बार-बार बताते रहेंगेकि तोड़ना चाहे जितना भी आसान हो, फिर भी बनाने की कोशिश के आगे हार जाता है।

Jul 31, 20253 min

Ep 851Prashn | Kunwar Narayan

प्रश्न | कुँवार नारायणतारों की अंध गलियों में गूँजता हुआ उद्दंड उपहास... वह मेरा प्रश्न हैविशाल आडंबर,अभी चुभती दृष्टि की गर्म खोज में मैंने प्रश्नाहत जिस विराट हिमपुरुष कोगलते हुए देखा...क्या वह तेरा उत्तर था?

Jul 30, 20251 min

Ep 850Mom Ka Ghoda | Dushyant Kumar

मोम का घोड़ा | दुष्यंत कुमारमैने यह मोम का घोड़ा,बड़े जतन से जोड़ा,रक्त की बूँदों से पालकरसपनों में ढालकरबड़ा किया,फिर इसमें प्यास और स्पंदनगायन और क्रंदनसब कुछ भर दिया,औ’ जब विश्वास हो गया पूराअपने सृजन पर,तब इसे लाकरआँगन में खड़ा किया!माँ ने देखा—बिगड़ीं;बाबूजी गरम हुए;किंतु समय गुज़रा...फिर नरम हुए।सोचा होगा—लड़का है,ऐसे ही स्वाँग रचा करता है।मुझे भरोसा था मेरा है,मेरे काम आएगा।बिगड़ी बनाएगा।किंतु यह घोड़ाकायर था थोड़ा,लोगों को देखकर बिदका, चौंका,मैंने बड़ी मुश्किल से रोका।और फिर हुआ यहसमय गुज़रा, वर्ष बीते,सोच कर मन में—हारे या जीते,मैने यह मोम का घोड़ा,तुम्हें बुलाने कोअग्नि की दिशाओं को छोड़ा।किंतु जैसे ये बढ़ाइसकी पीठ पर पड़ाआकरलपलपाती लपटों का कोड़ा,तब पिघल गया घोड़ाऔर मोम मेरे सब सपनों पर फैल गया!

Jul 29, 20252 min

Ep 849Ant Mein | Sarveshwar Dayal Saxena

अन्त में | सर्वेश्वरदयाल सक्सेनाअब मैं कुछ कहना नहीं चाहता,सुनना चाहता हूँएक समर्थ सच्ची आवाज़यदि कहीं हो।अन्यथाइसके पूर्व किमेरा हर कथनहर मंथनहर अभिव्यक्तिशून्य से टकराकर फिर वापस लौट आए,उस अनंत मौन में समा जाना चाहता हूँजो मृत्यु है।‘वह बिना कहे मर गया’यह अधिक गौरवशाली हैयह कहे जाने से—‘कि वह मरने के पहलेकुछ कह रहा थाजिसे किसी ने सुना नहीं।’

Jul 28, 20251 min

Ep 848Dhoomil Ki Antim Kavita | Dhoomil

धूमिल की अंतिम कविता | धूमिलशब्द किस तरहकविता बनते हैंइसे देखोअक्षरों के बीच गिरे हुएआदमी को पढ़ोक्या तुमने सुना कि यहलोहे की आवाज़ है यामिट्टी में गिरे हुए ख़ूनका रंगलोहे का स्वादलोहार से मत पूछोउस घोड़े से पूछोजिसके मुँह में लगाम है।

Jul 27, 20251 min

Ep 847Jaane Kis Kiska Khayal Aaya Hai | Dushyant Kumar

जाने किस-किसका ख़्याल आया है | दुष्यंत कुमारजाने किस—किसका ख़्याल आया हैइस समंदर में उबाल आया हैएक बच्चा था हवा का झोंकासाफ़ पानी को खंगाल आया हैएक ढेला तो वहीं अटका थाएक तू और उछाल आया हैकल तो निकला था बहुत सज-धज केआज लौटा तो निढाल आया हैये नज़र है कि कोई मौसम हैये सबा है कि बवाल आया हैइस अँधेरे में दिया रखना थातू उजाले में बाल आया हैहमने सोचा था जवाब आएगाएक बेहूदा सवाल आया है

Jul 26, 20252 min

Ep 846Shahadat | Sunil Jha

शहादत | सुनील झाफूल, रास्तेभीड़नज़ारे सारेतुम्हारे लिएऔर, तुम हो कि चुप हो...न सलामन दुआऐसे भी कोई घर आता है भला!

Jul 25, 20251 min

Ep 845Amarta | Devi Prasad Mishra

अमरता | देवी प्रसाद मिश्रबहुत हुआ तो मैं बीस साल बाद मर जाऊँगामेरी कविताएँ कितने साल बाद मरेंगी कहा नहीं जा सकता हो सकता है वे मेरे मरने के पहले ही मर जाएँ और तानाशाहों के नाम इसलिए अमर रहें किउन्होंने नियन्त्रण के कितने ही तरीके ईज़ाद किएमैंने भी कुछ उपाय खोजे मसलन यह किआदमी तक पहुँचने का टिकट किस खड़की से लिया जाएएक भुला दिया गया कवि बहुत याद किए जाते शासक से बेहतर होता हैऔर अमरता की अनन्तता एक जीवन से बड़ी नहीं होती

Jul 24, 20251 min

Ep 844Vasantsena | Shrikant Verma

वसंतसेना | श्रीकांत वर्मासीढ़ियाँ चढ़ रही हैवसंतसेनाअभी तुम न समझोगीवसंतसेनाअभी तुम युवा होसीढ़ियाँ समाप्त नहींहोतीउन्नति की होंअथवाअवनति कीआगमन की होंयाप्रस्थान कीअथवाअवसान कीअथवाअभिमान कीअभी तुम नसमझोगीवसंतसेनान सीढ़ियाँचढ़नाआसान हैनसीढ़ियाँउतरनाजिन सीढ़ियों परचढ़ते हैं, हम,उन्हीं सीढ़ियों सेउतरते हैं, हमनिर्लिप्त हैं सीढ़ियाँ,कौन चढ़ रहा हैकौन उतर रहा हैचढ़ता उतर रहायाउतरता चढ़ रहा हैकितनी चढ़ चुकेकितनी उतरना हैसीढ़ियाँ न गिनती हैंन सुनती हैंवसंतसेना।

Jul 23, 20252 min

Ep 843Din Ghatenge | Dinesh Singh

दिन घटेंगे | दिनेश सिंहजनम के सिरजे हुए दुखउम्र बन-बनकर कटेंगेज़िन्दगी के दिन घटेंगेकुआँ अन्धा बिना पानीघूमती यादें पुरानीप्यास का होना वसन्तीतितलियों से छेड़खानीझरे फूलों से पहाड़े --गन्ध के कब तक रटेंगे ?ज़िन्दगी के दिन घटेंगेचढ़ गए सारे नसेड़ीवक़्त की मीनार टेढ़ी'गिर रही है -- गिर रही है' --हवाओं ने तान छेड़ीमचेगी भगदड़ कि कितने स्वप्नलाशों से पटेंगे ?ज़िन्दगी के दिन घटेंगेपरिन्दे फिर भी चमन मेंखेत-बागों में कि वन मेंचहचहाएँगेनदी बहती रहेगी उसी धुन मेंचप्पुओं के स्वर लहर बनकरकछारों तक उठेंगेज़िन्दगी के दिन घटेंगे

Jul 22, 20251 min

Ep 842Akalmandi Aur Moorkhta | Shubha

अकलमंदी और मूर्खता | शुभास्त्रियों की मूर्खता को पहचानते हुएपुरुषों की अक्लमंदी को भी पहचाना जा सकता हैइस बात को उलटी तरह भी कहा जा सकता हैपुरुषों की मूर्खताओं को पहचानते हुएस्त्रियों की अक्लमंदी को भी पहचाना जा सकता हैवैसे इस बात पर कोई विवाद नहीं है किस्त्रियों में भी मूर्खताएँ होती हैं और पुरुषों में भीसच तो ये हैकि मूर्खों में अक्लमंदऔर अक्लमन्दों में मूर्ख छिपे रहते हैंमनुष्यता ऐसी ही होती हैफिर भी अगर स्त्रियों कीअक्लमंदी पहचाननी है तोपुरुषों की मूर्खताओं पर कैमरा फ़ोकस करना होगा।

Jul 21, 20252 min

Ep 841Bhool Bhulaiyya | Shraddha Upadhyay

भूल-भूलैया | श्रद्धा उपाध्यायहम सबसे पहले मिलेंगे दिल्ली में घुमते बेमक़सद क़दमों में सड़कें तुम्हें घर ले जाएँगी और मुझे भूल-भूलैया में मैं किताबें खरीदूँगी कोई उन्हें पढ़ेगा मैं अपना कॉफ़ी मग अपने घर के नजदीकी पार्क में रोप दूँगी फिर कुछ दिन मैं उस बाग़ में रहूंगी जब वापस आऊँगी तो सोफ़े पर समेट लूँगी तीन कविताएँ पाँच कहानियाँ और साथ में मैं दो बार प्रेम में पडूँगी और छः बार निकस जाऊँगी ख़ून की जाँच करवाउँगी की एड़ियों की कठोरता का सबब मिले रसोई में जाऊँगी और एड़ियों पर खड़े होकर आराम पका लूँगी मैंने अपनी एड़ियां नानी से पाई हैं और घुटने दादी से मैं चलती हूँ तो माँ के बारे में सोचती हूँ माँ ने अपनी चाय का कप घर में बोया वो किताबें नहीं ख़रीदतीं कभी कभी किताबें पढ़ती हैं लेकिन उनके घर से सड़कें नहीं निकलतीं वो मन्नत का धागा बाँधती हैं दरवाज़ों पर वो धागा मुझे भूल भूलैया से खींच लेगा

Jul 20, 20252 min

Ep 840Main Gaane Lagta | Dinesh Singh

मैं गाने लगता | दिनेश सिंहअक्सर क्या होता मुझकोजो मन ही मन शर्माने लगतातुम रोती, मैं गाने लगतातुम घर मैं कितना खटती होकितने हिस्सों में बटती होकड़ी धूप-सी सबकी बातेंआर्द्र भूमि-सी तुम फटती होमेरा मन छल-छल करआँखों-आँखों से बतियाने लगतातुम रोती मैं गाने लगताचूल्हा-चौका रोटी-पानीसुबह-शाम की राम-कहानीदिन भर बच्चों कीचिकचिक सेपोछा करती हो पेशानीदस्तरखान सजाने वाले हाथों कोसहलाने लगतातुम रोती मैं गाने लगतातुम पर सास-ससुर का हक़ हैयह कहने में बड़ी खनक हैचुप हूँ मैं जानते हुए भीयह रिश्ता कितना बुढ़बक हैतदपि अजब परिवार रागमैं बारम्बार बजाने लगतातुम रोती मैं गाने लगता

Jul 19, 20252 min

Ep 839Uski Grahasthi | Rajesh Joshi

उसकी गृहस्थी | राजेश जोशी थकी हारी लौटी है वो आफिस से अभीटिफिन बाक्स को रसोई में रखती है।मुँह पर पानी के छीटे मारती हैबाहर निकल आई लट को वापस खोंसती है।बालों मेंआँखों को हौले से दबाती है हथेलियों सेउठती है और रसोईघर की ओर जाने को होती है।मैं कहता हूँ, 'बैठो, तुम, आज मैं चाय बनाता हूँ !मेरी आवाज़ की नोक मुझ़ी को चुभती है।गैस जला कर चाय का पानी चढ़ाता हूँऔर दूसरे ही पल आवाज़ लगाता हूँसुनो शक्कर किस डब्बे में रखी हैऔर चाय की पत्ती कहाँ है ?साड़ी का पल्लू कमर में खोंसती हुई वो आती है।मुझे हटाते हुए कहती है- हटो, तुम्हें नहीं मिलेगी कोई चीज़।होठों को तिरछा करती अजीब ढंग से मुस्कुराती है।मुश्किल है उस मुस्कुराहट का ठीक-ठीक अर्थसमझा पानाजैसे कहती हो यह मेरी सृष्टि हैतुम नहीं जान पाओगे कभीकि किन बादलों में रखी हैं बारिशें और किनमें रखा है कपासकोई डब्बा खोलते हुए कहती है :यह तो मैं हूँ कि अबेर रखा है सब कुछ वरना तुम तो ढूंढ नहीं पाते अपने आप कोजाओं बाहर जाकर टी वी देखोएक काम पूरा नहीं करोगे और फैला दोगेमेरी पूरी रसोई ।

Jul 18, 20252 min

Ep 838Tumhari Kavita | Abha Bodhisattva

तुम्हारी कविता | आभा बोधिसत्त्वतुम्हारी कविता से जानती हूँतुम्हारे बारे मेंतुम सोचते क्या हो ,कैसा बदलाव चाहते होकिस बात से होते हो आहत;किस बात से खुशतुम्हारा कोई बायोडटा नहीं मेरे पासफिर भी जानती हूँ मैंतुम्हें तुम्हारी कविताओं सेक्या यह बडी़ बात नही किनहीं जानती तुम्हारा देश ,तुम्हारी भाषा तुम्हारे लोगमैं कुछ भी नहीं जानती,फिर भी कितना कुछ जानती हूँतुम्हारे बारे मेंतुम्हारे घर के पास एकजंगल हैउस में एक झाड़ीहै अजीबजिस में लगता हैएक चाँद-फल रोज़ जिसके नीचे रोती हैविधवाएँ रात भरदिन भर माँजती हैघरों के बर्तनबुहारती हैं आकाश मार्गकि कब आएगा तारन हारऐसे ही चल रहा हैउस जंगल मेंबताती है तुम्हारी कविताकि सपनों को जोड़ कर बुनते हो एक ताराऔर उसे समुद्र में डुबो देते हो।

Jul 17, 20252 min

Ep 837Kaling | Shrikant Verma

कलिंग - श्रीकांत वर्माकेवल अशोक लौट रहा हैऔर सबकलिंग का पता पूछ रहे हैंकेवल अशोक सिर झुकाए हुए हैऔर सबविजेता की तरह चल रहे हैंकेवल अशोक के कानों में चीख़गूँज रही हैऔर सबहँसते-हँसते दोहरे हो रहे हैंकेवल अशोक ने शस्त्र रख दिये हैंकेवल अशोकलड़ रहा था ।

Jul 16, 20251 min

Ep 836Algani | Shahanshah Alam

अलगनी | शहंशाह आलम अलगनी पर मैंने क्या चीज़ सुखाईकविता की वो गीली किताबेंजिसे बारिश ने पढ़ा था पूरे मन सेजो बारिश मेघालय में होती होगीवही बारिश हुई इस दफ़ा मेरे पटना मेंअलगनी पर मैंने और क्या चीज़ सुखाईकविता की किताबों के अलावाअपने कपड़े… नहीं नअपने जूते… नहीं नअपने मोजे… नहीं नअपना पूरा घर सुखायाधूप के निकलने परऔर अपनी देह को भीटाँगकर रखा अलगनी परअब जब बारिश के बाद ठंड आएगीदस्तक देगी अलगनी ही मेरे दरवाज़े पर।

Jul 15, 20252 min