
Pratidin Ek Kavita
1,141 episodes — Page 10 of 23

Ep 693Pehli Pension | Anamika
पहली पेंशन /अनामिकाश्रीमती कार्लेकरअपनी पहली पेंशन लेकरजब घर लौटीं–सारी निलम्बित इच्छाएँअपना दावा पेश करने लगीं।जहाँ जो भी टोकरी उठाईउसके नीचे छोटी चुहियों-सीदबी-पड़ी दीख गई कितनी इच्छाएँ!श्रीमती कार्लेकर उलझन में पड़ींक्या-क्या ख़रीदें, किससे कैसे निपटें !सूझा नहीं कुछ तो झाड़न उठाईंझाड़ आईं सब टोकरियाँ बाहरचूहेदानी में इच्छाएँ फँसाईं(हुलर-मुलर सारी इच्छाएँ)और कहा कार्लेकर साहब से–“चलो ज़रा, गंगा नहा आएँ!”

Ep 692Is Tarah Rehna Chahunga | Shahanshah Alam
इस तरह रहना चाहूँगा | शहंशाह आलम इस तरह रहना चाहूँगा भाषा मेंजिस तरह शहद मुँह में रहता हैरहूँगा किताब में मोरपंख की तरहरहूँगा पेड़ में पानी में धूप में धान मेंहालत ख़राब है जिस आदमी की बेहदउसी के घर रहूँगा उसके चूल्हे को सुलगाताजिस तरह रहता हूँ डगमग चल रहीबच्ची के नज़दीक हमेशा उसको सँभालताइस तरह रहूँगा तुम्हारे निकटजिस तरह पिता रहते आए हैंहर कठिन दिनों में मेरे साथ हाथ में अपना पुराना छाता लिए।

Ep 691Ye Log | Naresh Saxena
ये लोग | नरेश सक्सेना तूफान आया थाकुछ पेड़ों के पत्ते टूट गए हैंकुछ की डालेंऔर कुछ तो जड़ से ही उखड़ गए हैंइनमें से सिर्फ़कुछ ही भाग्यशाली ऐसे बचेजिनका यह तूफान कुछ भी नहीं बिगाड़ पायाये लोग ठूँठ थे।

Ep 690Kya Bhoolun Kya Yaad Karun Main | Harivansh Rai Bachchan
क्या भूलूं क्या याद करूं मैं | हरिवंश राय बच्चनअगणित उन्मादों के क्षण हैं,अगणित अवसादों के क्षण हैं,रजनी की सूनी की घड़ियों को किन-किन से आबाद करूं मैं!क्या भूलूं, क्या याद करूं मैं!याद सुखों की आसूं लाती,दुख की, दिल भारी कर जाती,दोष किसे दूं जब अपने से, अपने दिन बर्बाद करूं मैं!क्या भूलूं, क्या याद करूं मैं!दोनों करके पछताता हूं,सोच नहीं, पर मैं पाता हूं,सुधियों के बंधन से कैसे अपने को आबाद करूं मैं!क्या भूलूं, क्या याद करूं मैं!

Ep 689Manch Se | Vaibhav Sharma
मंच से | वैभव शर्मामंच के एक कोने से शोर उठता है और रोशनी भीसामने बैठी जनता डर से भर जाती है।मंच से बताया जाता है शांती के पहले जरूरी है क्रांतितो सामने बैठी जनता जोश से भर जाती है।शोर और रोशनी की ओर बढ़ती है।डरी हुई जनताखड़े होते हैं हाथ और लाठियांखड़ी होती है डरी हुई भयावह जनताडरी हुई भीड़ बड़ी भयानक होती है।डरे हुए लोग अपना डर मिटाने हेतुकाट सकते हैं अपने ही अंगडर मिटाने के लिए अंग काटने का चलन आया है।मंच के दूसरे कोने से अटृहासखून की बौछारशोर खूंखार, भयावह आकृतियां अपारजनता डरी और सहमी, खड़ी हाथ में लिएतीखे नुकीले कटीले हथियारडरी हुई जनता, अंगो को काटकरडर को छांट छांट कर अलग करतीफिर भी डरा करती, निरन्तरडरी हुई जनता, मंच के नीचे सेऊपर वालों को तकतीपर उनके पास ना दिखे उसको कोई हथियारमंच पे दिखे, सुशील मुखी, सुन्दर, चरित्रवानएवं मोहक कलाकारडरी सहमी, खून से लथपथ जनतादेखती शोर और अट्हास के बीचसमूचे निगले जाते अपने अंग हज़ार।

Ep 688Bacchu Babu | Kailash Gautam
बच्चू बाबू | कैलाश गौतमबच्चू बाबू एम.ए. करके सात साल झख मारेखेत बेंचकर पढ़े पढ़ाई, उल्लू बने बिचारेकितनी अर्ज़ी दिए न जाने, कितना फूँके तापेकितनी धूल न जाने फाँके, कितना रस्ता नापेलाई चना कहीं खा लेते, कहीं बेंच पर सोतेबच्चू बाबू हूए छुहारा, झोला ढोते-ढोतेउमर अधिक हो गई, नौकरी कहीं नहीं मिल पाईचौपट हुई गिरस्ती, बीबी देने लगी दुहाईबाप कहे आवारा, भाई कहने लगे बिलल्लानाक फुला भौजाई कहती, मरता नहीं निठल्लाख़ून ग़रम हो गया एक दिन, कब तक करते फाकालोक लाज सब छोड़-छाड़कर, लगे डालने डाकाबड़ा रंग है, बड़ा मान है बरस रहा है पैसासारा गाँव यही कहता है बेटा हो तो ऐसा ।

Ep 687Maut Ke Farishtey | Abdul Bismillah
मौत के फ़रिश्ते | अब्दुल बिस्मिल्लाहअपने एक हाथ में अंगाराऔर दूसरे हाथ में ज़हर का गिलास लेकरजिस रोज़ मैंनेअपनी ज़िंदगी के साथपहली बार मज़ाक़ किया थाउस रोज़ मैंदुनिया का सबसे छोटा बच्चा थाजिसे न दोज़ख़ का पता होतान ख़ुदकुशी काऔर भविष्य जिसके लिएमाँ के दूध से अधिक नहीं होताउसी बच्चे ने मुझे छलाऔर मज़ाक़ के बदले मेंज़िंदगी ने ऐसा तमाचा लगायाकि गिलास ने मेरे होंठों को कुचल डालाऔर अंगाराउस ख़ूबसूरत पोशाक के भीतर कहीं खो गयाजिसे रो-रो कर मैंनेज़माने से हासिल किया थाइस तरह एक पूरा का पूरा हादसानिहायत सादगी के साथ वजूद में आयाऔर दुनियाकिसी भयानक खोह की शक्ल में बदलती चली गईमेरा विषैला जिस्मशोलों से घिरता चला गयाज़िंदगीबिगड़े हुए ज़ख़्म की तरह सड़ने लगीऔर काँच को तरह चटखता हुआ मैंएक कोने में उगी हुई दूब को देखता रहाजो उस खोह में हरी थीवह मेरे चड़चड़ाते हुए मांसपिंड मेंताक़त पैदा करती रहीऔर आग हो गई मेरी इकाई मेंयह आस्थाकि मौत के फ़रिश्तेसिर्फ़ हारे हुए लोगों से ख़ुश होते हैंउनसे नहींजो ज़िंदगी कोअसह्म बदबू के बावजूदप्यार करते हैं।

Ep 686Torch | Manglesh Dabral
टॉर्च | मंगलेश डबराल मेरे बचपन के दिनों मेंएक बार मेरे पिता एक सुन्दर-सी टॉर्च लाएजिसके शीशे में खाँचे बने हुए थेजैसे आजकल कारों की हेडलाइट में होते हैं।हमारे इलाके में रोशनी की वह पहली मशीन थीजिसकी शहतीर एकचमत्कार की तरह रात को दो हिस्सों में बाँट देती थीएक सुबह मेरे पड़ोस की एक दादी ने पिता से कहा बेटा, इस मशीन से चूल्हा जलाने के लिए थोड़ी सी आग दे दो पिता ने हँस कर कहा चाची इसमें आग नहीं होती सिर्फ़ उजाला होता हैइसे रात होने पर जलाते हैंऔर इससे पहाड़ के ऊबड़-खाबड़ रास्ते साफ़ दिखाई देते हैंदादी ने कहा उजाले में थोड़ा आग भी होती तो कितना अच्छा थामुझे रात से ही सुबह का चूल्हा जलाने की फ़िक्र रहती हैपिता को कोई जवाब नहीं सुझा वे ख़ामोश रहे देर तकइतने वर्ष बाद वह घटना टॉर्च की वह रोशनीआग माँगती दादी और पिता की ख़ामोशी चली आती हैहमारे वक्त की विडम्बना में कविता की तरह।

Ep 685Suitcase : New York Se Ghar Tak | Vishwanath Prasad Tiwari
सूटकेस : न्यूयर्क से घर तक | विश्वनाथ प्रसाद तिवारी "इस अनजान देश मेंअकेले छोड़ रहे मुझे"मेरे सूटकेस ने बेबस निगाहों से देखाजैसे परकटा पक्षीदेखता हो गरुड़ कोउसकी भरी आँखों में क्या थाएक अपाहिज परिजन की कराहया किसी डुबते दोस्त की पुकारकि उठा लिया उसेजिसकी मुलायम पसलियां टूट गई थींहवाई यात्रा के मालामाल बक्सों बीचकमरे से नीचे लायाजमा कर दिया उसे होटल के लॉकरूम मेंइस बुरी नीयत के साथकि छोड़ दूँगा यहींयह अर्थहीन अस्थिपंजरमगर चलते वक्त हवाई अड्डेफिर उठा लिया उसेदो डॉलर चुकाकरजैसे कक्षा दो के अपने पुराने सहपाठी कोजिसकी कीमत अब दो कौड़ी भी नहीं रह गई थीफिर नीयत खोट हुईहवाई अड्डे पर उसे छोड़ देने कीमगर उसकी डबडबाई आकुल आँखें उस पिता जैसी लगींजो नब्बे पार की उम्र मेंअकेले पड़े हों गाँव मेंमुझे लगाअभी खतरे के साइरन बजेंगेघेर लेंगे इसे सैनिक और जासूसरेशा-रेशा उधेड देंगे इसकाजो एक कलाकृति था अपनी जवानी मेंउतरा जब दिल्ली हवाई अडडेउसकी पीठ और पेटचिपक गए थे एक मेंबदलू मुसहर की तरहजो भूख से भरा या मलेरिया सेइस पर बरसों बहस चली थीमीडिया और संसद मेंदिल्ली में उससे छुड़ा लेना चाहता था पिंडजो चार बार विदेश यात्राओं में सहयात्री रहामगर आखिर वह आ ही गया मेरे साथ गोरखपुरउस गाय की तरहजो गाहक के हाथ से पगहा झटककरलौट आई हो अपने पुराने खूटे परऔर अब, वह मेरे पुराने सामानों बीचविजयी-सा मुस्करा रहाचुनौती देता और पूछता मुझसे"क्या आगे बढ़ने के लिए ज़रूरी हैउन्हें पीछे छोड़ देनाजिनके पास भाषा नहीं है?"

Ep 684Aangan Gayab Ho Gaya | Kailash Gautam
आँगन गायब हो गया | कैलाश गौतमघर फूटे गलियारे निकले आँगन गायब हो गयाशासन और प्रशासन में अनुशासन ग़ायब हो गया ।त्यौहारों का गला दबायाबदसूरत महँगाई नेआँख मिचोली हँसी ठिठोलीछीना है तन्हाई नेफागुन गायब हुआ हमारा सावन गायब हो गया ।शहरों ने कुछ टुकड़े फेंकेगाँव अभागे दौड़ पड़ेरंगों की परिभाषा पढ़नेकच्चे धागे दौड़ पड़ेचूसा ख़ून मशीनों ने अपनापन ग़ायब हो गया ।नींद हमारी खोई-खोईगीत हमारे रूठे हैंरिश्ते नाते बर्तन जैसेघर में टूटे-फूटे हैंआँख भरी है गोकुल की वृंदावन ग़ायब हो गया ।

Ep 683Nahin Nigaah Mein | Faiz Ahmed Faiz
नहीं निगाह में | फ़ैज़ अहमद फ़ैज़नहीं निगाह में मंज़िल तो जुस्तुजू ही सहीनहीं विसाल मयस्सर तो आरज़ू ही सहीन तन में ख़ून फ़राहम न अश्क आँखों मेंनमाज़-ए-शौक़ तो वाजिब है बे-वुज़ू ही सहीकिसी तरह तो जमे बज़्म मय-कदे वालोनहीं जो बादा-ओ-साग़र तो हाव-हू ही सहीगर इंतिज़ार कठिन है तो जब तलक ऐ दिलकिसी के वादा-ए-फ़र्दा की गुफ़्तुगू ही सहीदयार-ए-ग़ैर में महरम अगर नहीं कोईतो फ़ैज़ ज़िक्र-ए-वतन अपने रू-ब-रू ही सही

Ep 682Talash Mein Wahan | Nandkishore Acharya
तलाश में वहाँ | नंदकिशोर आचार्य जाते हैं तलाश मेंवहाँजड़ों की जो अक्सरखुद जड़ हो जाते हैंइतिहास मक़बरा हैपूजा जा सकता है जिसकोजिसमें पर जिया नहीं जाताजीवन इतिहास बनाता हो-चाहे जितना-साँसें भविष्य की ही लेता है वहरचनाभविष्य का हीइतिहास बनाना है।

Ep 681Gaman | Aagney
गमन | आग्नेयफूल के बोझ सेटूटती नहीं है टहनीफूल ही अलग कर दिया जाता हैटहनी सेउसी तरह टूटता है संसारटूटता जाता है संसार--मेरा और तुम्हाराचमत्कार है या अत्याचार हैइस टूटते जाने मेंसिर्फ़ जानता हैटहनी से अलग कर दिया गयाफूल

Ep 680Hatyare Kuch Nahi Bigaad Sakte | Chandrakant Devtale
हत्यारे कुछ नहीं बिगाड़ सकते/ चंद्रकांत देवतालेनाम मेरे लिएपेड़ से एक टूटा पत्ताहवा उसकी परवाह करेमेरे भीतर गड़ी दूसरी ही चीज़ेंपृथ्वी की गंध औरपुरखों की अस्थियाँ उनकी आँखों समेतमेरे मस्तिष्क में तैनातसंकेत नक्षत्रों के बताते जोनहीं की जा सकती सपनों की हत्यामैं नहीं ज़िंदातोड़ने कुर्सियाँजोड़ने हिसाबईज़ाद करने करिश्मे शैतानों केमैं हूँ उन असंख्य आँखों मेंजो भूखीएक फूल पौध की तरहज़िंदगी को पनपते देखने के लिएहत्यारे कुछ नहीं बिगाड़ सकतेवे नहीं जानते ठिकानेरहस्य सुंदरता के छिपेकहाँ-कहाँ।

Ep 679Labour Chowk | Shivam Chaubey
लेबर चौक | शिवम चौबेकठरे में सूरज ढोकर लाते हुएगमछे में कन्नी, खुरपी, छेनी, हथौड़ी बाँधे हुएरूखे-कटे हाथों से समय को धरकेलते हुएपुलिस चौकी और लाल चौक के ठीक बीचजहाँ रोज़ी के चार रास्ते खुलते हैऔर कई बंद होते हैंजहाँ छतनाग से, अंदावा से, रामनाथपुर सेजहाँ मुस्तरी या कुजाम सेमुंगेरया आसाम सेपूंजीवाद की आंत में अपनी ज़मीनों को पचता देखअगली सुबहग़रीबी की गद्दी पर बैठ विकास की ट्टही साईकिल पे सवारकई-कई मज़दूर आते हैंवहीं है लेबर चौराहाकई शहरों में कई-कई लेबर चौराहे हैं।अल्लापुर या रामबाग मेंबनारस या कानपुर मेंदिल्ली या अमृतसर मेंहर जगह जैसे सिविल लाइन्स है, जैसे घण्टाघर है, जैसे चौक है।वैसे ही लेबर चौराहा हैइन जगहो से बहत अलगलेबर चौराहा ही है।जिसकी हथेली पे पूरा शहर टिका हैआँखों से अभिजातपने की पट्टी हटाकर देखोगे तब समझोगे किदुनिया के कोने-कोने में जहाँ-जहाँ मज़दूर हैंवहाँ -वहाँ भी होता ही है लेबर चौराहाफिर भी कितनी अजीब बात है।जिन रेलों से मज़दूर आते हैं।उनमें उनके डिब्बे सबसे कम है।जिन शहरों को बसाते हैं।उनमें उनके घर नगण्य है।जिन खेतों में अन्न उगाते हैंवहाँ उनकी भुख सबसे कम हैखदानों में, मिलों में, स्कूलों में, बाज़ारों में, अस्पतालों मेंउनके हिस्से न के बराबर हैफिर भी वे आते हैं अपना गाँव-टोला छीन लिए जाने के बादजीने के लिएगंदे पानी, गंदी हवा और गंदी व्यवस्था मेंबचे रहने के लिएउसी विकास की टूटही साईकिल पे सवार उनहें जब भी लेबर चौराहे की तरफ आताहुआ देखोउन्हें पहचानोवे हमारे पड़ोस से ही आये हैंउनसे पूछो- "का हाल बा"वे जवाब ज़रूर देगेइज़राइल या फिलिस्तीन मेंभारत या ब्राज़ील मेंजहाँ दुनिया ढहेगीपहली ईट रखने वे ही आएंगेलेकिन सोचने वाली बात ये है।कि हर बार विकास की ट्टही साईकिल पे सवारगमछे में कन्नी, खुरपी, छेनी, हथौड़ी बाँधे हुएरूखे-कटे हाथों से समय को धकेलतेहुएपुलिस चौकी और लाल चौक के ठीक बीचक्या वे इसी तरह आएंगे..?

Ep 678Kathariyan | Ekta Verma
कथरियाँ | एकता वर्मा कथरियाँगृहस्थियों के उत्सव-गीत होती हैं।जेठ-वैसाख के सूखे हल्के दिनों मेंसालों से संजोये गए चीथड़ों को क़रीने से सजाकरऔरतें बुनती हैं उनकी रंग-बिरंगी धुन।वे धूप की कतरनों पर फैलती हैंतो उठती है, हल्दी और सरसों के तेल की पुरानी सी गंध।गौने में आयी उचटे रंग की साड़ियाँबिछ जाती हैं महुए की ललायी कोपलों की तरहजड़ों की स्मृतियों पर।युगों पुरानी कथरियाँ इतरा उठती हैं, नये लिबास में।कानों तक मोटे सूती धागे की तान उठती है।आलापों के सीधे-आड़े टप्पे पड़ते हैं लकीरों में।औरत के हाथ थिरकते हैं।पृथ्वी पर उभरती हैं अक्षांश और देशांतर।(हतभाग्य! वे भी काल्पनिक कहलायी)घर की औरतें, भरी दोपहरी मेंइन्हे धूप दिखाती हैं,लेसती-रोपती हैंरफू रौगन करती हैं हर सालइस तरह वो अपना इतिहास बचाती हैंपुरुषों के वंश लिखे जाते हैंहरिद्वार में, पंडों के पत्तरों मेंऔरतों की पुरखिनें दर्ज होती हैंघर की इन्हीं पुरानी कथरियों में।ये कथरियाँमानव त्रासदियों की चश्मदीद हैं,इन्होंने, इतिहास को सबसे नंगे क्षणों में हाफते देखा है!उसके धब्बों में मर्सिया के आंसू सोखे हुए हैंसलवटों में प्रार्थनाओं की ख़ाली सीपियाँ दबी हैं,चटखती हैं रात बे-रात करवटों पर।इनमें टॅंके हैं प्यार के नर्म क़िस्से भीकिरोसिया की चद्दर में कढ़े गुलाब की तरह, यहाँ- वहाँ।रातों में फुसफुसाकर कही गई मुहब्बत की मीठी शायरियाँलाड़ में पागे गये बोसे और मनुहारों पररीझी थी कथरियाँ भी, बिदा होकर आयी नई-नवेली दुलहिनों के साथ-साथकथरियाँ ही जानती हैं,दिन में मूँछों के नीचे दबे रहे होंठ सबके सो जाने पर मुस्कुराते है,तब;चाँद उतरकर चारपाई की पाटी तक अता है।ये कथरियाँ कुशल परिचायिकाएँ भी रही,औरतों की सूजी हुई पीठों परधरती रही गर्म फाहे ताउम्र।कथरियों ने भूगोल भी जानावे बताती हैं, औरतों ने खारे समंदरों को अपनी पीठ पर सुखाया है।कथरी का सूखा हुआ कोना(जहां वे आदम को थपक-थपककर सुलाती हैं,)पृथ्वी का एक चौथाई थल है।जिसे किन्ही नाविकों ने नहीऔरतों ने अपनी हथेलियों से टटोलकर ढूँढा है।कथरियों के पास पृथ्वी के अपने मानचित्र हैं।यदि कोई पुरातत्वविद इनका धागा उतके,तो मिलेगाउनका ससुरा, मैका, पाषाण-पुरापाषाण सब।जादुई क़ालीनों की तरह वे ले जाएँगीइतिहास के चिन्हित युगों के और पीछे!पूजागृह के लाल कपड़े में लपेटी किताब की तरहऔरतों को फ़ुरसत की जिल्द न जुरी।घोंसला बुनती बुलबुल की तरह वे गाती ही रहीं बुनती-बिछाती ही रहीं ।इसलिए समय से होड़ मेंमैके की कच्ची दीवार पर छूटी हथेलियों की लाल छाप की तरह,नाम की जगह वे बचा पायी हथेलियाँऔर कविता की जगह कथरियाँ!

Ep 677Rishta | Anamika
रिश्ता | अनामिकावह बिल्कुल अनजान थी!मेरा उससे रिश्ता बस इतना थाकि हम एक पंसारी के गाहक थेनए मुहल्ले में!वह मेरे पहले से बैठी थी-टॉफी के मर्तबान से टिककरस्टूल के राजसिंहासन पर!मुझसे भी ज़्यादाथकी दिखती थी वहफिर भी वह हँसी!उस हँसी का न तर्क था,न व्याकरण,न सूत्र,न अभिप्राय!वह ब्रह्म की हँसी थी।उसने फिर हाथ भी बढ़ाया,और मेरी शॉल का सिरा उठाकरउसके सूत किए सीधेजो बस की किसी कील से लगकरभृकुटि की तरह सिकुड़ गए थे।पल भर को लगा-उसके उन झुके कंधों सेमेरे भन्नाये हुए सिर काबेहद पुराना है बहनापा।

Ep 676Kaise Bachaunga Apna Prem | Alok Azad
कैसे बचाऊँगा अपना प्रेम | आलोक आज़ाद स्टील का दरवाजागोलियों से छलनी हआ कराहता हैऔर ठीक सामने,तुम चांदनी में नहाए, आँखों में आंसू लिए देखती होहर रात एक अलविदा कहती है।हर दिन एक निरंतर परहेज में तब्दील हुआ जाता हैक्या यह आखिरी बार होगाजब मैं तुम्हारे देह में लिपर्टी स्जिग्धता को महसूस कर रहा हूंऔर तुम्हारे स्पर्श की कस्तूरी में डूब रहा हूंदेखो नाजिस शहर को हमने चुना थावो धीरे- धीरे बमबारी का विकृत कैनवास बन चुका है,जहाँ उम्मीद मोमबत्ती की तरह चमकती हैऔर हमारी- तुम्हारी लड़ाई कहींबारूदों के आसमान में गौरैया सी खो गई है,तुम्हारी गर्दन पर मेरे अधरों का चुंबनअपनी छाप छोड़ने के लिए संघर्ष कर रहा है।मेरी उँगलियों पर तुम्हारे प्यार के निशान हैंलेकिन मेरी समूची देह सत्ता के लिएयुद्ध का नक्शा घोषित की जा चुकी है।और इन सब के बीचतुम्हारी आँखें मेरी स्मृतियों का जंगल है।जिसमे मैं आज भी महए सा खिलने को मचलता हूँ,मैं घोर हताशा मेंतुम्हारे कांधे का तिल चूमना चाहता हूँमैं अनदेखा कर देना चाहता हूपुलिस की सायरन को, हमारी तरफ आते कटीले तारों को,मैं जीना चाहता हूएक क्षणभगुर राहत,मैं तुम्हें छू कर एक उन्मादी,पागल- प्रेमी में बदल जाना चाहता हूँमैं टाल देना चाहता हूँ दुनिया का अनकहा आतंक,मैं जानता हूआकाश धूसर हो रहा है,नदियां सूख रही हैं।शहरो के बढ़ते नाखून से,मेरे कानों में सैलाब की तरह पड़ते विदा- गीतमुझे हर क्षण ख़त्म कर रहे हैंपर फिर भी,मैं कबूल करता हूँ, प्रिये,मैं तुम्हारी प्रतीक्षा करूँगाहम मिलेंगे किसी दिन, जहां नदी का किनारा होगाजहां तुम अप्रैल की महकती धूप में, गुलमोहर सी मिलोगीजहाँ प्रेम की अफवाह, यूदध के सच से बहुत ताकतवर होगी

Ep 675Kankreela Maidan | Kedarnath Aggarwal
कंकरीला मैदान | केदारनाथ अग्रवाल कंकरीला मैदानज्ञान की तरह जठर-जड़ लंबा-चौड़ा,गत वैभव की विकल याद में-बड़ी दूर तक चला गया है गुमसुम खोया!जहाँ-तहाँ कुछ- कुछ दूरी पर,उसके ऊपर,पतले से पतले डंठल के नाज़ुक बिरवेथर-थर हिलते हुए हवा में खड़े हुए हैंबेहद पीड़ित!हर बिरवे पर मुँदरी जैसा एक फूल है।अनुपम मनहर, हर ऐसी सुंदर मुँदरी कोमीनों ने चंचल आँखों से,नीले सागर के रेशम के रश्मि -तार से,हर पत्ती पर बड़े चाव से बड़ी जतन से,अपने-अपने प्रेमी जन को देने कीख़ातिर काढ़ा थासदियों पहले ।किन्तु नहीं वे प्रेमी आये,और मछलियाँ-सूख गयी हैं, कंकड़ हैं अब!आह! जहाँ मीनों का घर थावहाँ बड़ा वीरान हो गया।

Ep 674Tabdili | Akhtarul Iman
तब्दीली | अख़्तरुल ईमानइस भरे शहर में कोई ऐसा नहींजो मुझे राह चलते को पहचान लेऔर आवाज़ दे ओ बे ओ सर-फिरेदोनों इक दूसरे से लिपट कर वहींगिर्द-ओ-पेश और माहौल को भूल करगालियाँ दें हँसें हाथा-पाई करेंपास के पेड़ की छाँव में बैठ करघंटों इक दूसरे की सुनें और कहेंऔर इस नेक रूहों के बाज़ार मेंमेरी ये क़ीमती बे-बहा ज़िंदगीएक दिन के लिए अपना रुख़ मोड़ ले

Ep 673Meera Majumdar Ka Kehna Hai | Kumar Vikal
मीरा मजूमदार का कहना है | कुमार विकलसामने क्वार्टरों में जो एक बत्ती टिमटिमाती हैवह मेरा घर हैइस समय रात के बारह बज चुके हैंमैं मीरा मजूमदार के साथमार्क्सवाद पर एक शराबी बहस करके लौटा हूँऔर जहाँ से एक औरत के खाँसने की आवाज़ आ रही हैवह मेरा घर हैमीरा मजूमदार का कहना हैकि इन्क़लाब के रास्ते पर एक बाधा मेरा घर हैजिसमें खाँसती हुई एक बत्ती हैकाँपता हुआ एक डर हैइन्क़लाब मीरा की सबसे बड़ी हसरत हैलेकिन उसे अँधेरे क्वार्टरोंखाँसती हुई बत्तियों से बहुत नफ़रत हैवह ख़ुद खनकती हुई एक हँसी हैजो रोशनी की एक नदी की तरह बहती हैलेकिन अपने आपकोगुरिल्ला नदी कहती हैमीरा मजूमदार इन्क़लाबी दस्तावेज़ हैपार्टी की मीटिंग का नया गोलमेज़ हैमीरा मजूमदार एक क्रांतिकारी कविता हैअँधेरे समय की सुलगती हुई सविता हैउसकी हँसी में एक जनवादी आग हैजिससे इन्क़लाबी अपनी सिगरेटें सुल्गाते हैंइन्क़लाब के रास्ते को रोशन बनाते हैंमैंने भी आज उसकी जनवादी आग सेअधजले सिगरेट का एक टुकड़ा जलाया थाऔर जैसे ही मैंने उसे उँगलियों में दबाया थाझट से मुझे अपना क्वार्टर याद आया थामीरा मजूमदार तब—मुझको समझाती है.मेरे विचारों में बुनियादी भटकाव हैकथनी और करनी का गहरा अलगाव हैमेरी आँखों में जो एक बत्ती टिमटिमाती हैमेरी क्रांति—दृष्टि को वह धुँधला बनाती हैऔर जब भी मेरे सामनेकोई ऐसी स्थिति आती है—एक तरफ़ क्रांति है और एक तरफ़ क्वार्टर हैमेरी नज़र सहसा क्वार्टर की ओर जाती है

Ep 672Ek Samay Tha | Raghuvir Sahay
एक समय था- रघुवीर सहायएक समय था मैं बताता था कितनानष्ट हो गया है अब मेरा पूरा समाजतब मुझे ज्ञात था कि लोग अभी व्यग्न हैंबनाने को फिर अपना परसों कल और आजआज पतन की दिशा बताने पर शक्तिवानकरते हैं कोलाहल तोड़ दो तोड़ दोतोड़ दो झोंपड़ी जो खड़ी है अधबनीफ़िज़ूल था बनाना ज़िद समता की छोड़ दोएक दूसरा समाज बलवान लोगों काआज बनाना ही पुनर्निर्माण हैजिनका अधिकार छीन जिन्हें किया पराधीनउनको जी लेने का मिलता प्रतिदान है।

Ep 645Desh Ho Tum | Arunabh Saurabh
देश हो तुम | अरुणाभ सौरभ में तुम्हारी कोख से नहींतुम्हारी देह के मैल सेउत्पन्न हुआ हूँभारतमाताविघ्नहरत्ता नहीं बना सकती माँ तुमपर इतनी शक्ति दो किभय-भूख सेमुत्ति का रास्ता खोज सकूँबुद्ध-सी करुणा देकरसंसार में अहिंसा - शांति-त्यागकी स्थापना होमें तुम्हारा हनुपवन पुत्रमेरी भुजाओं को वज्र शक्ति से भर दोकि संभव रहे कुछअमरत्व और पूजा नहींहमें दे दो अनथक कर्मनिर्भीक शक्ति सेबोलने कीस्वायत्ता सोचने कीसच्चाई लिखने कीसुनने कीदुःखित-दुर्बल जन मुक्तिगुनने - बुनने की शक्तिगढ़ने-रचने - बढ़ने कीसहने- कहने - सुनने कीकर्मरत रहने कीनिर्दोष कोशिश करने कीदमन मुक्त रहने कीजमके जीने कीनित सृजनरत रहने कीशक्ति..शक्ति...तुम्हारी मिट्टी के कण- कण से बनातुमने मुझे नहलाया, सींचा-सँवारातुम्हारी भाषा ने जगाकरमेरे भीतर सुप्त - तापउसी पर चूल्हा जोड़करपके भात को खाकरजवान हुआ हूँ मेंनीले आकाश कोअपनी छत समझकरतिसपर धमाचौकड़ी मचाते हुएदुधियायी रोशनी से भरा चाँद हैमेरे भीतर की रोशनीधरती से, जल सेआग से, हवा से, आकाश सेबना है, मेरा जीवनदेश हो तुममेरी सिहरनमेरी गुदगुदीआँसू- खून -भूख - प्यास सब।

Ep 671Hum Milte Hain Bina Mile Hi | Kedarnath Aggarwal
हम मिलते हैं बिना मिले ही | केदारनाथ अग्रवालहे मेरी तुम!हम मिलते हैंबिना मिले हीमिलने के एहसास मेंजैसे दुख के भीतरसुख की दबी याद में।हे मेरी तुम!हम जीते हैंबिना जिये हीजीने के एहसास मेंजैसे फल के भीतरफल के पके स्वाद में।

Ep 670Kam Se Kam Ek Darwaza | Sudha Arora
कम से कम एक दरवाज़ा | सुधा अरोड़ाचाहे नक़्क़ाशीदार एंटीक दरवाज़ा होया लकड़ी के चिरे हुए फट्टों से बनाउस पर खूबसूरत हैंडल जड़ा होया लोहे का कुंडावह दरवाज़ा ऐसे घर का होजहाँ माँ बाप की रज़ामंदी के बग़ैरअपने प्रेमी के साथ भागी हुई बेटी सेमाता पिता कह सकें -'जानते हैं, तुमने ग़लत फ़ैसला लियाफिर भी हमारी यही दुआ हैख़ुश रहो उसके साथजिसे तुमने वरा हैयह मत भूलनाकभी यह फ़ैसला भारी पड़ेऔर पाँव लौटने को मुड़ेंतो यह दरवाज़ा खुला है तुम्हारे लिए'बेटियों को जब सारी दिशाएँबंद नज़र आएँकम से कम एक दरवाज़ा हमेशा खुला रहे उनके लिए!

Ep 669Suno Kabir | Nasira Sharma
सुनो कबीर ! | नासिरा शर्मा सुनो कबीर, चलो मेरे साथवहाँ जहाँ तुम्हारी प्रताड़ना के बावजूद डूब रहे हैं दोनों पक्षज़रूरत है उन्हें तुम्हारी फटकार कीवह नहीं सुन रहे हैं हमारी बातेंहमारी चेतावनी, कर रहे हैं मनमानीअंधविश्वास की पट्टी बंध चुकी हैउनकी रौशन आँखों पर और आगे का रास्ता भूल , वह भटक रहे हैं पीछे बहुत पीछे अतीत की ओर तुम्हीं सिखा सकते हो, उनकी चेतना को जगा सकते होऐसा मेरा विश्वास है कबीर!सब कुछ बदल डालना चाहतें हैं वहहो रहा है विध्वंस गिर रहा है मलबा , सोच और इमारतों काख़ुदा और ईश्वर दोनों ने छूट दे रखी हैवह थक चुके हैं और कर रहे हैं विश्राम ऐसे में, तुम बहुत याद आते हो कबीरकिसी नए रूप में इन्हें जगाने चले आओ कबीर।

Ep 668Suryasth Ke Aasmaan | Alok Dhanwa
सूर्यास्त के आसमान | आलोक धन्वाउतने सूर्यास्त के उतने आसमानउनके उतने रंगलम्बी सडकों पर शामधीरे बहुत धीरे छा रही शामहोटलों के आसपासखिली हुई रौशनीलोगों की भीड़दूर तक दिखाई देते उनके चेहरेउनके कंधे जानी -पह्चानी आवाज़ेंकभी लिखेंगें कवि इसी देश मेंइन्हें भी घटनाओं की तरह!

Ep 667Pehle Bachhe Ke Janam Se Pehle
पहले बच्चे के जन्म से पहले | नरेश सक्सेनासाँप के मुँह में दो ज़ुबानें होती हैं।मेरे मुँह में कितनी हैंअपने बच्चे को दुआ किस ज़ुबान से दूँगाखून सनी उँगलियाँझर तो नहीं जाएँगी पतझर मेंअपनी कौन-सी उँगली उसे पकड़ाऊँगासात रंग बदलता है गिरगिटमैं कितने बदलता हूँकिस रंग की रोशनी का पाठ उसे पढ़ाऊँगाआओ मेरे बच्चेमुझे पुनर्जन्म देते हुएआओ मेरे मैल पर तेज़ाब की तरह!

Ep 666Is Samay | Nilesh Raghuvanshi
इस समय | नीलेश रघुवंशीएक कोने में बिल्ली अपने बच्चों को दूध पिला रही है।छोटे-छोटे बच्चे और बिल्ली इतने सटे हुए हैं आपस मेंमुश्किल है उन्हें गिननाqएक औरतपेड़ में रस्सी का झुला डाल, झुला रही है बच्चे कोसाथ-साथ बच्चे के-औरत भी जा रही है धीरे-धीरे नींद मेंइस समय एक पत्ता भी नहीं खड़कना चाहिए।

Ep 665Maine Poocha Kya Kar Rahi Ho | Agyeya
मैंने पूछा क्या कर रही हो | अज्ञेय मैंने पूछायह क्या बना रही हो?उसने आँखों से कहाधुआँ पोंछते हुए कहा-मुझे क्या बनाना है! सब-कुछअपने आप बनता है।मैने तो यही जाना है।कह लो भगवान ने मुझे यही दिया है।मेरी सहानुभूति में हठ था-मैंने कहा- कुछ तो बना रही होया जाने दो, न सहीबना नहीं रहीक्या कर रही हो?वह बोली- देख तो रहे होछीलती हूँनमक छिड़कती हूँमसलती हूँनिचोड़ती हूँकोड़ती हूँकसती हूँफोड़ती हूँफेंटती हूँमहीन बिनारती हूँमसालों से सँवारती हूँदेगची में पलटती हूँबना कुछ नहीं रहीबनाता जो है - यह सही है-अपने-आप बनाता है।पर जो कर रही हूँ-एक भारी पेंदेमगर छोटे मुँह कीदेगची में सब कुछ झोंक रही हूँदबाकर अँटा रही हूँसीझने दे रही हूँ।मैं कुछ करती भी नहीं-मैं काम सलटती हूँ।मैं जो परोसूँगीजिन के आगे परोसूँगीउन्हें क्या पता हैकि मैंने अपने साथ क्या किया है?

Ep 664Gharaunda | Ekta Verma
घरौंदा | एकता वर्मा धूल में नहाए शैतान बच्चेखेल रहे हैं घरौंदा-घरौंदा।जोड़ रहे हैं ईट के टुकडे, पत्थर, सीमेंट के गुटकेबना रहे हैं नन्हे-न्हे घरहँस रहे हैं, तालियाँ पीट रहे हैं।यह फ़िलिस्तीन का दुर्भाग्य हैकि उसके बच्चे अपने न्हे घरों को बनाने के लिएचुन रहे हैं मलबापड़ोसियों के ज़मीदोज़ हुए मकानों से।मैंने पूछा क्या कर रहे हो?

Ep 663Ek Bosa | Kaifi Azmi
एक बोसा | कैफ़ी आज़मीजब भी चूम लेता हूँ उन हसीन आँखों कोसौ चराग अँधेरे में जगमगाने लगते हैंफूल क्या शगूफे क्या चाँद क्या सितारे क्यासब रकीब कदमों पर सर झुकाने लगते हैंरक्स करने लगतीं हैं मूरतें अजन्ता कीमुद्दतों के लब-बस्ता ग़ार गाने लगते हैंफूल खिलने लगते हैं उजड़े उजड़े गुलशन मेंप्यासी प्यासी धरती पर अब्र छाने लगते हैंलम्हें भर को ये दुनिया ज़ुल्म छोड़ देती हैलम्हें भर को सब पत्थर मुस्कुराने लगते हैं.

Ep 662Ghisi Pencil | Raghuvir Sahay
घिसी पेंसिल | रघुवीर सहाय फिर रात आ रही है।फिर वक्त आ रहा है।जब नींद दुःख दिन कोसंपूर्ण कर चलेंगेएकांत उपस्थत हो, 'सोने चलो' कहेगाक्या चीज़ दे रही है यह शांति इस घड़ी में ?एकांत या कि बिस्तर या फिर थकान मेरी ?या एक मुड़े कागज़ पर एक घिसी पेंसिलतकिये तले दबाकर जिसको कि सो गया हूँ ?

Ep 661Seekho | Shrinath Singh
सीखो | श्रीनाथ सिंहफूलों से नित हँसना सीखो, भौंरों से नित गाना।तरु की झुकी डालियों से नित, सीखो शीश झुकाना!सीख हवा के झोकों से लो, हिलना, जगत हिलाना!दूध और पानी से सीखो, मिलना और मिलाना!सूरज की किरणों से सीखो, जगना और जगाना!लता और पेड़ों से सीखो, सबको गले लगाना!वर्षा की बूँदों से सीखो, सबसे प्रेम बढ़ाना!मेहँदी से सीखो सब ही पर, अपना रंग चढ़ाना!मछली से सीखो स्वदेश के लिए तड़पकर मरना!पतझड़ के पेड़ों से सीखो, दुख में धीरज धरना!पृथ्वी से सीखो प्राणी की सच्ची सेवा करना!दीपक से सीखो, जितना हो सके अँधेरा हरना!जलधारा से सीखो, आगे जीवन पथ पर बढ़ना!और धुएँ से सीखो हरदम ऊँचे ही पर चढ़ना!

Ep 660Apahij Vyatha | Dushyant Kumar
अपाहिज व्यथा | दुष्यंत कुमारअपाहिज व्यथा को सहन कर रहा हूँ,तुम्हारी कहन थी, कहन कर रहा हूँ ।ये दरवाज़ा खोलो तो खुलता नहीं है,इसे तोड़ने का जतन कर रहा हूँ ।अँधेरे में कुछ ज़िन्दगी होम कर दी,उजाले में अब ये हवन कर रहा हूँ ।वे सम्बन्ध अब तक बहस में टँगे हैं,जिन्हें रात-दिन स्मरण कर रहा हूँ ।तुम्हारी थकन ने मुझे तोड़ डाला,तुम्हें क्या पता क्या सहन कर रहा हूँ ।मैं अहसास तक भर गया हूँ लबालब,तेरे आँसुओं को नमन कर रहा हूँ ।समालोचको की दुआ है कि मैं फिर,सही शाम से आचमन कर रहा हूँ ।

Ep 659Dhool | Hemant Deolekar
धूल | हेमंत देवलेकर धीरे-धीरे साथ छोड़ने लगते हैं लोगतब उन बेसहारा और यतीम होती चीज़ों कोधूल अपनी पनाह में लेती है।धूल से ज़्यादा करुण और कोई नहींसंसार का सबसे संजीदा अनाथालय धूल चलाती हैकाश हम कभी धूल बन पातेयूं तो मिट्टी के छिलके से ज़्यादा हस्ती उसकी क्यापर उसके छूने से चीज़ें इतिहास होने लगती हैं।समय के साथ गाढ़ी होते जाना -धूल को प्रेम की तरह महान बनाता हैओह, हम हमेशा उसे झाड़ देते रहे हैं बिना उसका शुक्रिया अदा किए।

Ep 658Donon Jahan Teri Mohabbat Me Haar Ke | Faiz Ahmed Faiz
दोनों जहान तेरी मोहब्बत में हार के | फ़ैज़ अहमद फ़ैज़दोनों जहान तेरी मोहब्बत में हार केवो जा रहा है कोई शब-ए-ग़म गुज़ार केवीराँ है मय-कदा ख़ुम-ओ-साग़र उदास हैंतुम क्या गए कि रूठ गए दिन बहार केइक फ़ुर्सत-ए-गुनाह मिली वो भी चार दिनदेखे हैं हम ने हौसले पर्वरदिगार केदुनिया ने तेरी याद से बेगाना कर दियातुझ से भी दिल-फ़रेब हैं ग़म रोज़गार केभूले से मुस्कुरा तो दिए थे वो आज 'फ़ैज़'मत पूछ वलवले दिल-ए-ना-कर्दा-कार के

Ep 657Berozgaar Hum | Shanti Suman
बेरोज़गार हम / शांति सुमनपिता किसान अनपढ़ माँबेरोज़गार हैं हमजाने राम कहाँ से होगीघर की चिन्ता कमआँगन की तुलसी-सी बढ़तीघर में बहन कुमारीआसमान में चिड़िया-सीउड़ती इच्छा सुकुमारीछोटा भाई दिल्ली जाने का भरता है दम ।पटवन के पैसे होतेतो बिकती नहीं ज़मीनऔर तकाज़े मुखिया केले जाते सुख को छीनपतले होते मेड़ों पर आँखें जाती है थम ।जहाँ-तहाँ फटने को हैसाड़ी पिछली होली कीझुकी हुई आँखें लगती हैंअब करुणा की बोली सीसमय-साल ख़राब टँगे रहते बनकर परचम ।

Ep 656Tumse Milkar | Gaurav Tiwari
तुमसे मिलकर | गौरव तिवारी नदी अकेली होती है,पर उतनी नहींजितनी अकेली हो जाती हैसागर से मिलने के बाद।धरा अत्यधिक अकेली होती हैक्षितिज पर,क्योंकि वहाँ मान लिया जाता हैउसका मिलन नभ से।भँवरा भी तब तकनहीं होता तन्हाजब तक आकर्षित नहीं होताकिसी फूल से।गलत है यह धारणा किप्रेम कर देता है मनुष्य को पूरा मैं और भी अकेला हो गया हूँ,तुमसे मिलकर।

Ep 655Ek Dua | Kaifi Azmi
एक दुआ | कैफ़ी आज़मी अब और क्या तेरा बीमार बाप देगा तुझेबस एक दुआ कि ख़ुदा तुझको कामयाब करेवो टाँक दे तेरे आँचल में चाँद और तारेतू अपने वास्ते जिस को भी इंतख़ाब करे

Ep 654Ghat ti Hui Oxygen | Manglesh Dabral
घटती हुई ऑक्सीजन | मंगलेश डबरालअकसर पढ़ने में आता हैदुनिया में ऑक्सीजन कम हो रही है।कभी ऐन सामने दिखाई दे जाता है कि वह कितनी तेज़ी से घट रही हैरास्तों पर चलता हूँ खाना खाता हूँ पढ़ता हूँ सोकर उठता हूँ एक लम्बी जम्हाई आती हैजैसे ही किसी बन्द वातानुकूलित जगह में बैठता हूँ।उबासी का एक झोका भीतर से बाहर आता हैएक ताक़तवर आदमी के पास जाता हूँ तो तत्काल ऑक्सीजन की ज़रूरत महसूस होती हैबढ़ रहे हैं नाइट्रोजन सल्फ़र कार्बन के ऑक्साइड और हवा में झूलते हुए चमकदार और ख़तरनाक कणबढ़ रही है घृणा दमन प्रतिशोध और कुछ चालू किस्म की ख़ुशियाँचारों ओर गर्मी स्प्रे की बोतलें और ख़ुशबूदार फुहारें बढ़ रही हैं।अस्पतालों में दिखाई देते हैं ऑक्सीजन से भरे हुए सिलिंडरनीमहोशी में डूबते-उतराते मरीज़ों के मुँह पर लगे हुए मास्कऔर उनके पानी में बुलबुले बनाती हुई थोड़ी-सी प्राणवायुऐसी जगहों की तादाद बढ़ रही हैजहाँ साँस लेना मेहनत का काम लगता हैदूरियों कम हो रही हैं लेकिन उनके बीच निर्वात बढ़ते जा रहे हैंहर चीज़ ने अपना एक दड़बा बना लिया हैहर आदमी अपने दड़बे में क़ैद हो गया हैस्वर्ग तक उठे हुए चार-पाँच-सात सितारा मकानात चौतरफ़ामहाशक्तियाँ एक लात मारती हैंऔर आसमान का एक टुकड़ा गिर पड़ता हैग़रीबों ने भी बन्द कर लिये हैं अपनी झोपड़ियों के द्वारउनकी छतें गिरने-गिरने को हैंउनके भीतर की ऑक्सीजन वहाँ दबने जा रही है।आबोहवा की फ़िक्र में आलीशान जहाज़ों में बैठे हुए लोगजा रहे हैं एक देश से दूसरे देशऐसे में मुझे थोड़ी ऑक्सीजन चाहिएवह कहाँ मिलेगीपहाड़ तो मैं बहुत पहले छोड़ आया हूँऔर वहाँ भी वह सिर्फ़ कुछ ढलानों-घाटियों के आसपास घूम रही होगी जगह-जगह प्राणवायु के माँगनेवाले बढ़ रहे हैंउन्हें बेचनेवाले सौदागरों की तादाद बढ़ रही हैभाषा में ऑक्सीजन लगातार घट रही हैउखड़ रही है शब्दों की साँस ।

Ep 653Hum Auratein | Viren Dangwal
हम औरतें | वीरेन डंगवालरक्त से भरा तसला हैरिसता हुआ घर के कोने-अंतरों मेंहम हैं सूजे हुए पपोटेप्यार किए जाने की अभिलाषासब्जी काटते हुए भीपार्क में अपने बच्चों पर निगाह रखती हुईप्रेतात्माएँहम नींद में भी दरवाज़े पर लगा हुआ कान हैंदरवाज़ा खोलते हीअपने उड़े-उड़े बालों और फीकी शक्ल परपैदा होने वाला बेधक अपमान हैंहम हैं इच्छा-मृगवंचित स्वप्नों की चरागाह में तोचौकड़ियाँमार लेने दो हमें कमबख्तो !

Ep 652Naagrik Parabhav | Kumar Ambuj
नागरिक पराभव | कुमार अम्बुजबहुत पहले से प्रारंभ करूँ तोउससे डरता हूँ जो अत्यंत विनम्र हैकोई भी घटना जिसे क्रोधित नहीं करतीबात-बात में ईश्वर को याद करता है जोबहुत डरता हूँ अति धार्मिक आदमी सेजो मारा जाएगा अगले दिन की बर्बरता मेंउसे प्यार करना चाहता हूँकक्षा तीन में पढ़ रही पड़ोस की बच्ची को नहीं पताआने वाले समाज की भयावहताउसे नहीं पता उसके कर्णफूलगिरवी रखे जा चुके हैं विश्व-बैंक मेंचिंतित करती है मुझे उसके हिस्से की दुनियाएक छोटा-सा लड़का आठ गिलास का छींका उठा करआस-पास के कार्यालयों में देता है चायसबके चाय पीने तक देखता है सादा आँखों सेसबका चाय पीनामैं एक नागरिक देखता हूँ उसे नागरिक की तरहधीरे-धीरे अनाथ होता हूँठीक करना चाहता हूँ एक-एक पुरज़ामगर हर बार खोजता हूँ एक बहानाहर बार पहले से ज़्यादा ठोस और पुख़्तामेरी निडरता को धीरे-धीरे चूस लेते हैं मेरे स्वार्थअब मैं छोटी-सी समस्या को भीएक डरे हुए नागरिक की तरह देखता हूँसबको ठीक करना मेरा काम नहीं सोचते हुएएक चुप नागरिक की तरह हर ग़लत काम में शरीक होता हूँअपने से छोटों को देखता हूँ हिक़ारत सेडिप्टी कलेक्टर को आता देख कुर्सी से खड़ा हो जाता हूँपड़ोसी के दुःख को मानता हूँ पड़ोस का दुःखऔर एक दिन पिता बीमार होते हैं तो सोचता हूँअब पिता की उमर हो गई हैअंत में मंच संचालन करता हूँउस आदमी के सम्मान समारोह का जो अत्यंत विनम्र हैचरण छूता हूँ जय-जयकार करता हूँ उसी कीजो अति धार्मिक हैऔर फिर एक बच्ची को देखता हूँप्लास्टिक की गुड़िया की तरहजैसे चाय बाँटते बहुत छोटे बच्चे कोनौकर की तरह।

Ep 651Karun Prem Khud Se | Shivani Sharma
करूँ प्रेम ख़ुद से | शिवानी शर्मा किसी के लिए हूँ मैं ममता की मूरत, किसी के लिए अब भी छोटी सी बेटी llतजुर्बों ने किया संजीदा मुझको , पर किसी के लिए अब भी अल्हड़ सी छोटी॥कहीं पे हूँ माहिर, कहीं पे अनाड़ी, कभी लाँघ जाऊँ मुश्किलों की पहाड़ी॥कभी अनगिनत यूँ ही यादें पिरोती, कभी होके मायूस पलकें भिगोती॥कभी संग अपनों के बाँटू मैं खुशियाँ, अकेले कभी ढेरों सपने संजोती॥कभी यूँ लगे जैसे सब कुछ है मेरा, कभी भीड़ में ख़ुद को पाऊँ अकेली।।कभी गीत गाऊँ कभी गुनगुनाऊँ, कभी सिसकियों को मैं सबसे छुपाऊँ ॥कोशिश में रहती हूँ हर पल कि कैसे, ख़ुद को समझ कर के बेहतर बनाऊँ ॥ख़ुद से मिलूँ , और पलभर को बोलूँ , हूँ क्या मैं पहेली मैं ख़ुद को बताऊँ॥ज़रूरी है जानूँ , है मुझमें छुपा क्या, ख़ुशी क्या है मेरी, है ये फ़लसफ़ा क्या ॥कई रंग मेरे, कई रूप भी है, मिलाकर मैं सबको, मैं ख़ुद को सजाऊँ॥करूँ नाज़ ख़ुद पर, सुनूँ अपने दिल की, कर ख़ुद पे भरोसा, मैं ख़ुद को निखारूँ ॥चाहे हों रिश्ते या फ़र्ज़ सारे, जितने भी किरदार हिस्से में आये,हंसकर बख़ूबी मैं सबको निभाऊँ ॥मगर मैं ना भूलूँ , कि मैं हूँ ज़रूरी, करूँ प्रेम ख़ुद से, सब पे खुशियां लुटाऊँ ॥

Ep 649Do Minute Ka Maun | Kedarnath Singh
दो मिनट का मौन | केदारनाथ सिंह भाइयो और बहनों यह दिन डूब रहा है।इस डूबते हुए दिन परदो मिनट का मौनजाते हुए पक्षी पररुके हुए जल परघिरती हुई रात परदो मिनट का मौनजो है उस परजो नहीं है उस परजो हो सकता था उस परदो मिनट का मौनगिरे हुए छिलके परटूटी हुई घास परहर योजना परहर विकास परदो मिनट का मौनइस महान शताब्दी परमहान शताब्दी केमहान इरादों परमहान शब्दों परऔर महान वादों परदो मिनट का मौनभाइयो और बहनों इस महान विशेषण परदो मिनट का मौन

Ep 648Bechain Baharon Me Kya Kya Hai | Qateel
बेचैन बहारों में क्या-क्या है / क़तीलबेचैन बहारों में क्या-क्या है जान की ख़ुश्बू आती हैजो फूल महकता है उससे तूफ़ान की ख़ुश्बू आती हैकल रात दिखा के ख़्वाब-ए-तरब जो सेज को सूना छोड़ गयाहर सिलवट से फिर आज उसी मेहमान की ख़ुश्बू आती हैतल्कीन-ए-इबादत की है मुझे यूँ तेरी मुक़द्दस आँखों नेमंदिर के दरीचों से जैसे लोबान की ख़ुश्बू आती हैकुछ और भी साँसें लेने पर मजबूर-सा मैं हो जाता हूँजब इतने बड़े जंगल में किसी इंसान की ख़ुश्बू आती हैकुछ तू ही मुझे अब समझा दे ऐ कुफ़्र दुहाई है तेरीक्यूँ शेख़ के दामन से मुझको इमान की ख़ुश्बू आती हैडरता हूँ कहीं इस आलम में जीने से न मुनकिर हो जाऊँअहबाब की बातों से मुझको एहसान की ख़ुश्बू आती है

Ep 647Daud | Ramdarash Mishra
दौड़ | रामदरश मिश्रवह आगे-आगे थामैं उसके पीछे-पीछेमेरे पीछे अनेक लोग थेहाँ, यह दौड़-प्रतिस्पर्धा थीलक्ष्य से कुछ ही दूर पहलेएकाएक उसकी चाल धीमी पड़ गयी और रुक गयामैं आगे निकल गयाजीत के गर्वीले सुख के उन्माद से मैं झूम उठा उसके हार-जन्य दुख की कल्पना सेमेरा सुख और भी उन्मत्त हो उठामूर्ख कहीं का मैं मन ही मन भुनभुनायाउन्माद की हँसी हँसता हआ मैं लौटा तो देखावह किसी गिरे हुए आदमी को उठा रहा थाऔर उसका चेहरा नहा रहा थासुख और शान्ति की अपूर्व दीप्ति सेधीरे-धीरे मुझे लगने लगा किवह लक्ष्य तो उसके चरणों में लोट रहा है।जिसके लिए मैं बेतहाशा दौड़ता हुआ गया थाऔर वह मुझसे पहले ही दौड़ जीत चुका है।

Ep 646Jaise Jab Se Tara Dekha | Agyeya
जैसे जब से तारा देखा | अज्ञेय क्या दिया-लिया?जैसेजब तारा देखासद्यःउदित—शुक्र, स्वाति, लुब्धक—कभी क्षण-भरयह बिसर गयामैं मिट्टी हूँ;जब से प्यार किया,जब भी उभरा यह बोधकि तुम प्रिय हो—सद्यःसाक्षात् हुआ—सहसादेने के अहंकारपाने की ईहा सेहोने के अपनेपन(एकाकीपन!) सेउबर गया।जब-जब यों भूला,धुल कर मंज करएकाकी से एक हुआ।जिया।

Ep 650Saal Mubarak | Asheesh Pandya
साल मुबारक! | आशीष पण्ड्या साल मुबारक!भगवा हो या लाल, मुबारक!साल मुबारक!आज नया कल हुआ पुराना,टिक टिक करता काल मुबारक!पैसे की भूखी दुनिया को,थाल में रोटी-दाल मुबारक!चिंताओं से लदी चाँद पर,बचे खुचे कुछ बाल मुबारक!यहाँ पड़े हैं जान के लाले,वो कहते लोकपाल मुबारक!काली करतूतों की गठरी,धवल रेशमी शाल मुबारक!ग़ैरत! इज्ज़त! शर्म? निरर्थक,अब तो मोटी खाल मुबारक!आँख का पानी सूख चुका कबबना टपकती राल, मुबारक!जिस पर बैठा उसी को काटे,पल पल गिरती डाल मुबारक!शोर है अँधा, बहरा हल्ला,मंथर दिल की ताल मुबारक!सरपट दौड़े दुनिया, मुझकोअपनी फक्कड़ चाल मुबारक!साल मुबारक!भगवा हो या लाल, मुबारक!साल मुबारक!

Ep 644Jeevan Bacha Hai Abhi | Shalabh Shriram Singh
जीवन बचा है अभी | शलभ श्रीराम सिंह जीवन बचा है अभीज़मीन के भीतर नमी बरक़रार हैबरकरार है पत्थर के भीतर आगहरापन जड़ों के अन्दर साँस ले रहा है!जीवन बचा है अभीरोशनी खाकर भी हरकत में हैं पुतलियाँदिमाग सोच रहा है जीवन के बारे मेंख़ून दिल तक पहुँचने की कोशिश में है!जीवन बचा है अभीसूख गए फूल के आसपास है ख़ुशबूआदमी को छोड़कर भागे नहीं हैं सपनेभाषा शिशुओं के मुँह में आकार ले रही है!जीवन बचा है अभी!