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Pratidin Ek Kavita

Pratidin Ek Kavita

1,141 episodes — Page 13 of 23

Ep 543Tinka Tinka Kaante Tode Sari Raat Kataai Ki | Gulzar

तिनका तिनका काँटे तोड़े सारी रात कटाई की | गुलज़ारतिनका तिनका काँटे तोड़े सारी रात कटाई कीक्यूँ इतनी लम्बी होती है चाँदनी रात जुदाई कीनींद में कोई अपने-आप से बातें करता रहता हैकाल-कुएँ में गूँजती है आवाज़ किसी सौदाई कीसीने में दिल की आहट जैसे कोई जासूस चलेहर साए का पीछा करना आदत है हरजाई कीआँखों और कानों में कुछ सन्नाटे से भर जाते हैंक्या तुम ने उड़ती देखी है रेत कभी तन्हाई कीतारों की रौशन फ़सलें और चाँद की एक दरांती थीसाहू ने गिरवी रख ली थी मेरी रात कटाई की

Sep 25, 20242 min

Ep 542Kare Jo Parvarish Vo Hi Khuda Hai | Ajay Agyat

करे जो परवरिश वो ही ख़ुदा है | अजय अज्ञातकरे जो परवरिश वो ही ख़ुदा है उसी का मर्तबा सब से बड़ा हैबुरे हालात में जो काम आएउसे पूजो वो सचमुच देवता हैधुआं फैला है हर सू नफरतों कामुहब्बत का परिंदा लापता हैन जाने हश्र क्या हो मंज़िलों कायहाँ अंधों की ज़द पे रास्ता हैअगर हो साधना निष्काम अपनीजहाँ ढूढ़ो वहीं मिलता ख़ुदा हैवहीं होती सदा सच्ची कमाईजहाँ भी नेकियों का क़ाफ़िला है

Sep 24, 20241 min

Ep 541Rath Daudte Hain Rangeen Phoolon Ke

रथ दौड़ते हैं रंगीन फूलों के | केदारनाथ अग्रवाल रंग नहींरथ दौड़ते हैं रंगीन फूलों केसांध्य गगन में।देखो-बस-देखो।रंग नहींध्वज फहरते हैं रंगीन स्वप्नों केसांध्य गगन में।झूमो-बस-झूमो!रंग नहींनट नाचते हैं रंगीन छंदों केसांध्य गगन में!नाचो-बस-नाचो!

Sep 23, 20241 min

Ep 540Jo Hawa Me Hai | Umashankar Tiwari

जो हवा में है | उमाशंकर तिवारीजो हवा में है,लहर में हैक्यों नहीं वह बात,मुझमें है?शाम कन्धों पर लिए अपनेज़िन्दगी के रू-ब-रू चलनारोशनी का हमसफ़र होनाउम्र की कन्दील का जलनाआग जोजलते सफ़र में हैक्यों नहींवह बात मुझमें है?रोज़ सूरज की तरह उगनाशिखर पर चढ़ना, उतर जानाघाटियों में रंग भर जानाफिर सुरंगों से गुज़र जानाजो हँसीकच्ची उमर में हैक्यों नहीं वह बातमुझमें है?एक नन्हीं जान चिडि़या काडा़ल से उड़कर हवा होनासात रंगों की लिए दुनियावापसी में नींद भर सोनाजो खुला आकाश स्वर में हैक्यों नहीं वह बातमुझमें है?

Sep 22, 20241 min

Ep 539Maine Kaha Baarish | Shahanshah Alam

मैंने कहा बारिश | शहंशाह आलम मैंने कहा बारिशउसने कहा प्रेममैंने कहा प्रेमउसने कहा पेड़मैंने कहा पेड़उसने कहा चिड़ियाँमैंने कहा चिड़ियाँउसने कहा जलकुंडमैंने कहा जलकुंडउसने कहा चंद्रमामैंने कहा चंद्रमाउसने कहा उदासीफिर मैंने कुछ नहीं कहादेखा बादल उसकी उदासी कोअपने पानी से धो रहा था।

Sep 21, 20241 min

Ep 538Dukh | Achal Vajpeyi

दुख / अचल वाजपेयीउसे जब पहली बार देखालगा जैसेभोर की धूप का गुनगुना टुकड़ाकमरे में प्रवेश कर गया हैअंधेरे बंद कमरे का कोना-कोनाउजास से भर गया हैएक बच्चा हैजो किलकारियाँ मारतामेरी गोद में आ गया हैएकांत में सैकड़ों गुलाब चिटख गए हैंकाँटों से गुँथे हुए गुलाबएक धुन है जो अंतहीन निविड़ मेंदूर तक गहरे उतरती हैमेरे चारों ओर उसनेएक रक्षा-कवच बुन दिया हैअब मैं तमाम हादसों के बीचसुरक्षित गुज़र सकता हूँ

Sep 20, 20241 min

Ep 537Khali Ghar | Chandrakanta

खाली घर | चंद्रकांता सब कुछ वही थासांगोपांगघर ,कमरे,कमरे की नक्काशीदार छतनदी पर मल्लाहों की इसरार भरी पुकार सडक पर हंगामों के बीच दौड़ते- भागते बेतरतीब हुजूम के हुजूम ! और आवाज़ों के कोलाज में खड़ा खाली घर!बोधिसत्व सा,निरुद्वेग,निर्पेक्ष समयसुन रहा था उसका बेआवाज़झुनझुने की तरह बजना!देख रहा थागोद में चिपटाए दादू के झाड़फ़ानूस पापा की कद्दावार चिथड़ा तस्वीर,इधर उल्टे -सीधे खिलौनों के छितरे ढेर!उधर ताखे पर धूल-मैल से बदरंग हुईबाँह भर चूड़ियाँ काल के गह्वर में गुम हुई अल्हड़ प्रेमिका की!अनन्त दूरियों और अगम्य विस्तारों मेंकाँप रहा है बियाबान !वक्त़ के मलबे में दबा इतिहास का करुण वर्तमान!कैसा अथक इंतज़ार? बाहर के कानफाडू शोर में ढूँढ रहा हैग़ायब होती भीतर कीशब्दातीत मौलिक ध्वनियाँ !

Sep 19, 20242 min

Ep 536Naye Din Ke Saath | Kedarnath Singh

नए दिन के साथ | केदारनाथ सिंह नए दिन के साथएक पन्ना खुल गया कोराहमारे प्यार कासुबह,इस पर कहीं अपना नाम तो लिख दोबहुत से मनहूस पन्नों मेंइसे भी कहीं रख दूंगा।और जब-जबहवा आकरउड़ा जाएगी अचानक बन्द पन्नों कोकहीं भीतरमोरपंखी की तरह रक्खे हुए उस नाम कोहर बार पढ़ लूगा।

Sep 18, 20241 min

Ep 535Registan Ki Raat Hai | Deepti Naval

रेगिस्तान की रात है / दीप्ति नवलरेगिस्तान की रात हैऔर आँधियाँ सीबनते जाते हैं निशांमिटते जाते हैं निशांदो अकेले से क़दमना कोई रहनुमांना कोई हमसफ़ररेत के सीने में दफ़्न हैंख़्वाबों की नर्म साँसेंयह घुटी-घुटी सी नर्म साँसें ख़्वाबों कीथके-थके दो क़दमों का सहारा लिएढूँढ़ती फिरती हैंसूखे हुए बयाबानों मेंशायद कहीं कोई साहिल मिल जाएरात के आख़री पहर से लिपटे इन ख़्वाबों सेइन भटकते क़दमों सेइन उखड़ती सांसों सेकोई तो कह दो!भला रेत के सीने में कहीं साहिल होते हैं।

Sep 17, 20241 min

Ep 534Ped Aur Patte | Adarsh Kumar Mishra

पैड़ और पत्ते | आदर्श कुमार मिश्र पेड़ से पत्ते टूट रहे हैंपेड़ अकेला रहता है,उड़ - उड़कर पते दूर गए हैंपेड़ अकेला रहता है,कुछ पत्तों के नाम बड़े हैं, पहचान है छोटेकुछ पत्तों के काम बड़े पर बिकते खोटेकुछ पत्तों पर कोई शिल्पी अपने मन का चित्र बनाकर बेच रहा हैकुछ पत्तों को लाला साहूअपने जूते पोंछ - पोंछकर फेक रहा हैकुछ पत्ते बेनाम पड़े हैं,सूख रहें हैं, गल जायेंगेकुछ पत्तों के किस्मत में ही आग लिखी है जल जायेंगेकुछ पत्ते, कुछ पत्तों सेलाग - लिपटकर रो लेते हैंकुछ पत्ते अपने आंसू अपने सीने में बो लेते हैकुछ पत्तों को रह - रहकरउस घने पेड़ की याद सतातीवो भी दिन थे, शाख हरी थीदूर कहीं से चिड़िया आकर,अण्डे देती. गना गातीए्क अकेला मुरझाया सापेड़ बेचारा सूख रहा हैएक अकेला ग़म खाया साउसका धीरज टूट रहा हैपत्ते हैं परदेसी फिर वोउनका रस्ता तकता क्यों है सारी दुनिया सो जाती है पेड़ अकेला जगता क्यों है

Sep 16, 20242 min

Ep 533Main Isliye Likh Raha Hun | Achyutanand Mishra

मैं इसलिए लिख रहा हूं | अच्युतानंद मिश्रमैं इसलिए लिख रहा हूंकि मेरे हाथ काट दिए जाएंमैं इसलिए लिख रहा हूंकि मेरे हाथतुम्हारे हाथों से मिलकरउन हाथों को रोकेंजो इन्हें काटना चाहते हैं

Sep 15, 20241 min

Ep 532Lok Malhar | Dr Sheoraj Singh 'Bechain'

लोक मल्हार | डॉ श्योराज सिंह 'बेचैन'सुन बहिना!मेरे जियरबा की बातउदासी मेरे मन बसी।सैंया तलाशें री बहना नौकरीदेवर स्वप्न में फिल्‍मी छोकरी।मेरी बहिना, ननदीतलाशे भरतार, ससुरढूँढे लखपति........मेरी बहिना! मैं ना पढ़ी , नमेरे बालकाशोषण करे हैंमेरे मालिकामोइ न मिल्यौ रीस्वराज ।मेरी बहनागुलामों जैसी जिन्दगी ।सुन बहनामेरे जियरबा की बातउदासी मेरे मन बसीकड़वी, दुखीली,बैरिन रात है।रोटी-रोजी कीउलझन ख़ास है।मेरी बहना ललुआपड़यौ है बीमारनकद माँगे वैद्य जी....करजा में गिरवीखेती बाप की माया है पटवरिया के पाप कीमेरी बहिनापुलिस, वकलिन का मारपड़ी है मोपे बेतुकी मायके रहूं या ससुराल में मैं तो हूँ जैसेमछली जाल मेंमेरी बहना, करकेअमीरी को ढोंग,गरीबी मेरे घर बसी।मेरी बहना मेरे जियरबा की बातसोने की कीमतराशन है गयोस्नेह सुख को सपनोंसपनो ही रह गयौ।मेरी बहना, नैया पड़ी हैमझधार,समूचे मेरे देश की।....मेरी बहना मेरे जियरबा की बातउदासी मेरे मन बसी।।

Sep 14, 20244 min

Ep 531Khushi Kaisa Durbhagya | Manglesh Dabral

खुशी कैसा दुर्भाग्य | मगलेश डबराल जिसने कुछ रचा नहीं समाज मेंउसी का हो चला समाजवही है नियन्ता जो कहता है तोडँगा अभी और भी कुछजो है खूँखार हँसी है उसके पासजो नष्ट कर सकता है उसी का है सम्मानझूठ फ़िलहाल जाना जाता है सच की तरहप्रेम की जगह सिंहासन पर विराजती घृणाबुराई गले मिलती अच्छाई सेमूर्खता तुम सन्तुष्ट हो तुम्हारे चेहरे पर उत्साह है।घूर्तता तुम मज़े में हो अपने विशाल परिवार के साथप्रसन्न है पाखंड कि अभी और भी मुखौटे हैं उसके पासचतुराई कितनी आसानी से खोज लिया तुमने एक चोर दरवाज़ा क्रूरता तुम किस शान से टहलती हो अपनी ख़ूनी पोशाक मेंमनोरोग तुम फैलते जाते हो सेहत के नाम परख़ुशी कैसा दुर्भाग्यतम रहती हो इन सबके साथ।

Sep 13, 20242 min

Ep 530Chupchap Ullas | Bhawani Prasad Mishra

चुपचाप उल्लास | भवानीप्रसाद मिश्रहम रात देर तकबात करते रहेजैसे दोस्तबहुत दिनों के बादमिलने पर करते हैंऔर झरते हैंजैसे उनके आस पासउनके पुरानेगाँव के स्वरऔर स्पर्शऔर गंधऔर अंधियारेफिर बैठे रहेदेर तक चुपऔर चुप्पी मेंकितने पास आएकितने सुखकितने दुखकितने उल्लास आएऔर लहराएहम दोनों के बीचचुपचाप !

Sep 12, 20241 min

Ep 529Seene Me Kya Hai Tumhare | Akshay Upadhyay

सीने में क्या है तुम्हारे / अक्षय उपाध्यायकितने सूरज हैं तुम्हारे सीने मेंकितनी नदियाँ हैंकितने झरने हैंकितने पहाड़ हैं तुम्हारी देह मेंकितनी गुफ़ाएँ हैंकितने वृक्ष हैंकितने फल हैं तुम्हारी गोद मेंकितने पत्ते हैंकितने घोंसले हैं तुम्हारी आत्मा मेंकितनी चिड़ियाँ हैंकितने बच्चे हैं तुम्हारी कोख मेंकितने सपने हैंकितनी कथाएँ हैं तुम्हारे स्वप्नों मेंकितने युद्ध हैंकितने प्रेम हैंकेवल नहीं है तो वह मैं हूँअभी और कितना फैलना है मुझेकितना और पकना है मुझेकहोमैं भीतुम्हारी जड़ों के साथ उग सकूँकितने सूरज हैं तुम्हारे सीने मेंकितने सूरज?

Sep 11, 20241 min

Ep 528Bhookh | Achyutanand Mishra

भूख / अच्युतानंद मिश्रमेरी माँ अभी मरी नहींउसकी सूखी झुलसी हुई छातीऔर अपनी फटी हुई जेबअक्सर मेरेसपनों में आती हैंमेरी नींद उचट जाती हैमैं सोचने लगता हूँमुझे किसका ख्यालकरना चाहिएकिसके बारे में लिखनी चाहिए कविता

Sep 10, 20241 min

Ep 527Khejadi Se Ugi Ho | Nandkishore Acharya

खेजड़ी-सी उगी हो | नंदकिशोर आचार्य खेजड़ी-सी उगी हो मुझ मेंहरियल खेजड़ी सी तुमसूने, रेतीले विस्तार में :तुम्हीं में से फूट आया हूँताज़ी, घनी पत्तियों-सा।कभी पतझड़ की हवाएँझरा देंगी मुझेजला देंगी कभी ये सुखे की आहें!तब भी तुम रहोगीमुझे भजती हुई अपने मेंसींचता रहूँगा मैं तुम्हेंअपने गहनतम जल से।जब तलक तुम होमेरे खिलते रहने कीसभी सम्भावनाएँ हैं।

Sep 9, 20241 min

Ep 526Raat Yun Kehne Laga Mujhse Gagan Ka Chand | Ramdhari Singh 'Dinkar'

रात यों कहने लगा मुझसे गगन का चाँद / रामधारी सिंह "दिनकर"रात यों कहने लगा मुझसे गगन का चाँद,आदमी भी क्या अनोखा जीव होता है!उलझनें अपनी बनाकर आप ही फँसता,और फिर बेचैन हो जगता, न सोता है।जानता है तू कि मैं कितना पुराना हूँ?मैं चुका हूँ देख मनु को जनमते-मरते;और लाखों बार तुझ-से पागलों को भीचाँदनी में बैठ स्वप्नों पर सही करते।आदमी का स्वप्न? है वह बुलबुला जल का;आज उठता और कल फिर फूट जाता है;किन्तु, फिर भी धन्य; ठहरा आदमी ही तो?बुलबुलों से खेलता, कविता बनाता है।मैं न बोला, किन्तु, मेरी रागिनी बोली,देख फिर से, चाँद! मुझको जानता है तू?स्वप्न मेरे बुलबुले हैं? है यही पानी?आग को भी क्या नहीं पहचानता है तू?मैं न वह जो स्वप्न पर केवल सही करते,आग में उसको गला लोहा बनाती हूँ,और उस पर नींव रखती हूँ नये घर की,इस तरह दीवार फौलादी उठाती हूँ।मनु नहीं, मनु-पुत्र है यह सामने, जिसकीकल्पना की जीभ में भी धार होती है,वाण ही होते विचारों के नहीं केवल,स्वप्न के भी हाथ में तलवार होती है।स्वर्ग के सम्राट को जाकर खबर कर दे,"रोज ही आकाश चढ़ते जा रहे हैं वे,रोकिये, जैसे बने इन स्वप्नवालों को,स्वर्ग की ही ओर बढ़ते आ रहे हैं वे।"

Sep 8, 20242 min

Ep 525Pita Ke Ghar Me | Rupam Mishra

पिता के घर में | रूपम मिश्रापिता क्या मैं तुम्हें याद हूँ!मुझे तो तुम याद रहते होक्योंकि ये हमेशा मुझे याद कराया गयाफासीवाद मुझे कभी किताब से नहीं समझना पड़ापिता के लिए बेटियाँ शरद मेंदेवभूमि से आई प्रवासी चिड़िया थींया बँसवारी वाले खेत में उग आई रंग-बिरंगी मौसमी घासपिता क्या मैं तुम्हें याद हूँ!शुकुल की बेटी हो!ये आखर मेरे साथ चलता रहाजब सबको याद रहा कि मैं तुम्हारी बेटी हूँ तो तुम्हें क्यों नहीं याद रहामाँ को मैं हमेशा याद रहीबल्कि बहत ज़्यादा याद रहीपर पिता को!कभी पिता के घर मेरा जाना होतामाँ बहुत मनुहार से कहतीपिता से मिलने दालान तक नहीं गईजा! चली जा बिटिया, तुम्हें पूछ रहे थेकह रहे थे कि कब आई! मैंने उसे देखा नहीं!मैं बेमन ही भतीजी के संग बैठक तक जाती हूँपिता देखते ही गदगद होकर कहते हैं।अरे कब आई! खड़ी क्यों हो आकर बैठ जाओमैं संकोच से झुकी खड़ी ही रहती हूँपिता पूछते हैं मास्टर साहब (ससुर) कैसे हैं?मैं कहती हूँ ठीक हैं!अच्छा घर में इस समय गाय- भैंस का लगान तो है ना!बेटवा नहीं आया?मैं कहती हूँ नहीं आयादेखो अबकी चना और सरसों ठीक नहीं हैब्लॉक से इंचार्ज साहब ने बीज ही गलत भिजवायापंचायत का कोई काम ठीक नहीं चल रहा है।ये नया ग्रामसेवक अच्छा नहीं हैअब मुझसे वहाँ खड़ा नहीं हुआ जातामैं धीरे से चलकर चिर-परिचित गेंदे के फूलों के पास आकर खड़ी हो जाती हूँपिता अचानक कहते हैं अरे वहाँ क्यों खड़ी हो वहाँ तो धूप है!मैं चुप रहती हूँमाँ कहती हैं अभी मॅँह लाल हो जाएगापिता गर्वमिश्रित प्रसन्नता से कहते हैंऔर क्या धूप और भूख ये कहाँ सह पाती हैमेरी आँखें रंज से बरबस भर आती हैं।मैं चीख कर पूछना चाहती हूँये तुम्हें पता था पिता!पर चुप रहकर खेतों की ओर देखने लगती हूँपिता के खेत-बाग सब लहलहा रहे हैंबूढ़ी बुआ कहती थींदैय्या! इत्ती बिटिया!गाय का चरा वन और बेटी का चरा घर फिर पेनपै तब जाना।बुआ तुम कहाँ हो! देख लो!हमने नहीं चरा तुम्हारे भाई-भतीजों का घरसब खूब जगमग हैइतना उजाला कि ध्यान से देखने पर आँखों में पानी आ जाए।

Sep 7, 20243 min

Ep 524Paas | Ashok Vajpeyi

पास | अशोक वाजपेयी पत्थर के पास था वृक्षवृक्ष के पास थी झाड़ीझाड़ी के पास थी घासघास के पास थी धरतीधरती के पास थी ऊँची चट्टानचट्टान के पास था क़िले का बुर्जबुर्ज के पास था आकाशआकाश के पास था शुन्यशुन्य के पास था अनहद नादनाद के पास था शब्दशब्द के पास था पत्थरसब एक-दूसरे के पास थेपर किसी के पास समय नहीं था।

Sep 6, 20242 min

Ep 523Padhakku Ka Soojh | Ramdhari Singh 'Dinkar'

पढ़क्‍कू की सूझ | रामधारी सिंह "दिनकर"एक पढ़क्कू बड़े तेज थे, तर्कशास्त्र पढ़ते थे,जहाँ न कोई बात, वहाँ भी नए बात गढ़ते थे।एक रोज़ वे पड़े फिक्र में समझ नहीं कुछ न पाए,"बैल घुमता है कोल्हू में कैसे बिना चलाए?"कई दिनों तक रहे सोचते, मालिक बड़ा गज़ब है?सिखा बैल को रक्खा इसने, निश्चय कोई ढब है।आखिर, एक रोज़ मालिक से पूछा उसने ऐसे,"अजी, बिना देखे, लेते तुम जान भेद यह कैसे?कोल्हू का यह बैल तुम्हारा चलता या अड़ता है?रहता है घूमता, खड़ा हो या पागुर करता है?"मालिक ने यह कहा, "अजी, इसमें क्या बात बड़ी है?नहीं देखते क्या, गर्दन में घंटी एक पड़ी है?जब तक यह बजती रहती है, मैं न फिक्र करता हूँ,हाँ, जब बजती नहीं, दौड़कर तनिक पूँछ धरता हूँ"कहा पढ़क्कू ने सुनकर, "तुम रहे सदा के कोरे!बेवकूफ! मंतिख की बातें समझ सकोगे थोड़े!अगर किसी दिन बैल तुम्हारा सोच-समझ अड़ जाए,चले नहीं, बस, खड़ा-खड़ा गर्दन को खूब हिलाए।घंटी टून-टून खूब बजेगी, तुम न पास आओगे,मगर बूँद भर तेल साँझ तक भी क्या तुम पाओगे?मालिक थोड़ा हँसा और बोला पढ़क्कू जाओ,सीखा है यह ज्ञान जहाँ पर, वहीं इसे फैलाओ।यहाँ सभी कुछ ठीक-ठीक है, यह केवल माया है,बैल हमारा नहीं अभी तक मंतिख पढ़ पाया है।

Sep 5, 20242 min

Ep 522Dhahai | Prashant Purohit

ढहाई | प्रशांत पुरोहित उसने पहले मेरे घर के दरवाज़े को तोड़ा,छज्जे को पटका फिर,बालकनी को टहोका,अब दीवारों का नम्बर आया,तो उन्हें भी गिराया,मेरे छोटे मगर उत्तुंग घर की ज़मीन चौरस की,मेरी बच्ची किसी बची-खुची मेहराब के नीचेसो न जाए कहीं, हरिक छोटे छज्जे को अपनेलोहे के हाथ से सहलाया,मेरे आँगन को पथरायाउसका लोहा ग़ुस्से से गर्म था,लाल था,उसे लगा मेरे विरोध की आवाज़ में कोई भारी बवाल था वो जब उठी थी तो अकेली नहीं थी,अब घर बैठ गया है तो भी खड़ी है -मेरी आवाज़। साहूकार की योजना है -ऐसी सब आवाज़ों को घर ढहा अकेला करने कीमगर अब सब बेघर आवाज़ें समवेत उठती हैं,घर गिरा मगर स्वर न गिरे ये आवाज़ें अल्ट्रासोनिक हैं,जो सुनाई नहीं पड़तीं मगर दिखती हैं,दिखाती हैं -कभी आपके गुर्दे में पड़ी पथरी को तोड़कर,कभी आपके अंदर बनी, पलीबच्ची को आँवल से जोड़करये अपने घर के मलबे पर उकड़ूँ बैठीं लोहा-ढलीं आवाज़ें तोड़ेंगी - उन सब पथरियों को जिन्हें व्यवस्था ने चिना,जिनसे ये खिड़की के बिना,सिर्फ़ अंदर खुलते दरवाज़ों वाले भवन बने हैं,ये कमज़ोर शरीरों की भिंची-उठी मुट्ठियों के नीचे पपड़ाए होठों,सूखे गलों से निकलतींअलग-अलग स्वरों में एक ही बात कहतीं, एक ही आवृत्ति की तरंगें निकालतीं,एक ही दिशा में बहतीं आवाज़ें - तोड़ डालेंगी चारों सुनहरे पायेउस मख़मली सिंहासन के,जो अपने आप को प्रजातंत्र कहता है।

Sep 4, 20243 min

Ep 521Us Roz Bhi | Achal Vajpeyi

उस रोज़ भी | अचल वाजपेयी उस रोज़ भी रोज़ की तरहलोग वह मिट्टी खोदते रहेजो प्रकृति से वंध्या थीउस आकाश की गरिमा परप्रार्थनाएँ गाते रहेजो जन्मजात बहरा थाउन लोगों को सौंप दी यात्राएँजो स्वयं बैसाखियों के आदी थेउन स्वरों को छेड़ाजो सदियों से मात्र संवादी थेपथरीले द्वारों परदस्तकों का होना भर थावह न होने का प्रारंभ था

Sep 3, 20241 min

Ep 520Ye Kiska Ghar Hai | Ramdarash Mishra

यह किसका घर है? | रामदरश मिश्रा "यह किसका घर है?""हिन्दू का।""यह किसका घर है?""मुसलमान का।"यह किसका घर है?""ईसाई का।”शाम होने को आयीसवेरे से ही भटक रहा हूँमकानों के इस हसीन जंगल मेंकहाँ गया वह घरजिसमें एक आदमी रहता था?अब रात होने को है।मैं कहाँ जाऊँगा?

Sep 2, 20241 min

Ep 519Ek Aashirwad | Dushyant Kumar

एक आशीर्वाद | दुष्यंत कुमारजा तेरे स्वप्न बड़े हों।भावना की गोद से उतर करजल्द पृथ्वी पर चलना सीखें।चाँद तारों सी अप्राप्य ऊचाँइयों के लियेरूठना मचलना सीखें।हँसेंमुस्कुराएँगाएँ।हर दीये की रोशनी देखकर ललचायेंउँगली जलाएँ।अपने पाँव पर खड़े हों।जा तेरे स्वप्न बड़े हों।

Sep 1, 20241 min

Ep 518Baarish Mein Joote Ke Bina Nikalta Hun Ghar Se | Shahanshah Alam

बारिश में जूते के बिना निकलता हूँ घर से | शहंशाह आलम बारिश में जूते के बिना निकलता हूँ घर सेबचपन में हम सब कितनी दफ़ा निकल जाते थेघर से नंगे पाँव बारिश के पानी में छपाछप करनेउन दिनों हम कवि नहीं हुआ करते थेख़ालिस बच्चे हुआ करते थे नए पत्ते के जैसेबारिश में बिना जूते के निकलनाअपने बचपन को याद करना हैइस निकलने में फ़र्क़ इतना भर हैकि माँ की आवाज़ें नहीं आतीं पीछे सेसच यही है माँ की मीठी आवाज़ें पीछा कहाँ छोड़ती हैंदिन बारिश के हों, दिन धूप के हों या दिन बर्फ़ के होंमाँ की आवाज़ों को पकड़े-पकड़े मैं घर से दूर चला आया हूँअब बारिश की आवाज़ें माँ की आवाज़ें हैंबाँस के पेड़ों से भरे हुए इस वन में मेरे लिए।

Aug 31, 20242 min

Ep 517Kumhaar Akela Shaks Hota Hai | Shahanshah Alam

कुम्हार अकेला शख़्स होता है | शहंशाह आलम जब तक एक भी कुम्हार हैजीवन से भरे इस भूतल परऔर मिट्टी आकार ले रही हैसमझो कि मंगलकामनाएं की जा रही हैंनदियों के अविरत बहते रहने कीकितना अच्छा लगता हैमंगलकामनाएं की जा रही हैं अब भीऔर इस बदमिजाज़ व खुर्राट सदी मेंकुम्हार काम-भर मिट्टी ला रहा हैकुम्हार जब सुस्ताता बीड़ी पीता हैबीवी उसकी आग तैयार करती हैऊर्जा से भरी हुईइतिहासकार इतिहास के बारे में चिंतित होते हैंश्रेष्ठजन अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने में भिड़े होते हैंअंधकार को चीरने हेतुख़ुद को तैयार कर रहा होता है कविकुम्हार अकेला शख़्स होता हैजो पैदल पुलिस के साथशिकारी कुत्तों की भीड़ देखकरन बौखलाता हैन उत्तेजित होता हैहालांकि उसको पता हैउसके बनाए बर्तनखिलौने, कैमरामैनअंतरिक्षयात्री, जहाज़ीअबाबील व दूसरी चिड़ियाँसब के सबमौक़े की तलाश में हैंकिसी दूसरे ग्रह पर चले जाने के लिएकुम्हार अकेला शख़्स होता हैजो नेपथ्य में बैठी उद्घोषिका से कहता हैहम मिट्टी से और मिट्टी के रंगवालीपृथ्वी से प्रेम करते रहेंगेदुनिया के बचे रहने तक।

Aug 30, 20243 min

Ep 516Sagar Se Milkar Jaise | Bhavani Prasad Mishra

सागर से मिलकर जैसे / भवानीप्रसाद मिश्रसागर से मिलकर जैसेनदी खारी हो जाती हैतबीयत वैसे हीभारी हो जाती है मेरीसम्पन्नों से मिलकरव्यक्ति से मिलने काअनुभव नहीं होताऐसा नहीं लगताधारा से धारा जुड़ी हैएक सुगंधदूसरी सुगंध की ओर मुड़ी हैतो कहना चाहिएसम्पन्न व्यक्तिव्यक्ति नहीं हैवह सच्ची कोई अभिव्यक्तिनहीं हैकई बातों का जमाव हैसही किसी भीअस्तित्व का अभाव हैमैं उससे मिलकरअस्तित्वहीन हो जाता हूँदीनता मेरीबनावट का कोई तत्व नहीं हैफिर भी धनाढ्य से मिलकरमैं दीन हो जाता हूँ

Aug 29, 20241 min

Ep 502Ek Baar Jo | Ashok Vajpeyi

एक बार जो | अशोक वाजपेयी एक बार जो ढल जाएँगेशायद ही फिर खिल पाएँगे।फूल शब्द या प्रेमपंख स्वप्न या यादजीवन से जब छूट गए तोफिर न वापस आएँगे।अभी बचाने या सहेजने का अवसर हैअभी बैठकर साथगीत गाने का क्षण है।अभी मृत्यु से दाँव लगाकरसमय जीत जाने का क्षण है।कुम्हलाने के बादझुलसकर ढह जाने के बादफिर बैठ पछताएँगे।एक बार जो ढल जाएँगेशायद ही फिर खिल पाएँगे।

Aug 28, 20242 min

Ep 515Aangan | Ramdarash Mishra

आँगन | रामदरश मिश्रा तने हुए दो पड़ोसी दरवाज़े एक-दूसरे की आँखों में आँखें धँसाकरगुर्राते रहे कुत्तों की तरहफेंकते रहे आग और धुआँ भरे शब्दों का कोलाहलखाते रहे कसमें एक -दूसरे को समझ लेने कीफिर रात कोएक-दूसरे से मुँह फेरकर सो गयेरात के सन्नाटे मेंदोनों घरों की खिड़कियाँ खुलींप्यार से बोलीं-"कैसी हो बहना?"फिर देर तक दो आँगन आपस में बतियाते रहेएक-दूसरे में आते-जाते रहेऔर हँसते रहे दरवाजों की कसमों पर।

Aug 27, 20241 min

Ep 514Shabd Jo Parinde Hain | Nasira Sharma

शब्द जो परिंदे हैं | नासिरा शर्मा शब्द जो परिंदे हैं।उड़ते हैं खुले आसमान और खुले ज़हनों मेंजिनकी आमद से हो जाती है, दिल की कंदीलें रौशन।अक्षरों को मोतियों की तरह चुनअगर कोई रचता है इंसानी तस्वीर,तोक्या एतराज़ है तुमको उस पर?बह रहा है समय,सब को लेकर एक साथबहने दो उन्हें भी, जो ले रहें हैं साँस एक साथ।डाल के कारागार में उन्हें, क्या पाओगे सिवाय पछतावे के?अक्षर जो बदल जाते हैं परिंदों में ,कैसे पकड़ोगे उन्हें?नज़र नहीं आयेंगे वह उड़ते,ग़ोल दर ग़ोल की शक्ल में।मगर बस जायेंगे दिल व दिमाग़ में ,सदा के लिए।किसी ऊँची उड़ान के परिंदों की तरह। अक्षर जो बनते हैं शब्द,शब्द बन जाते हैं वाक्य ।बना लेते हैं एक आसमाँ , जो नज़र नहीं आता किसी को।उन्हें उड़ने दो, शब्द जो परिंदे हैं।

Aug 26, 20242 min

Ep 513Bache Hue Shabd | Madan Kashyap

बचे हुए शब्द | मदन कश्यप जितने शब्द आ पाते हैं कविता में उससे कहीं ज़्यादा छूट जाते हैं।बचे हुए शब्द छपछप करते रहते हैंमेरी आत्मा के निकट बह रहे पनसोते मेंबचे हुए शब्दथल कोजल कोहवा कोअग्नि कोआकाश को लगातार करते रहते हैं उद्वेलितमैं इन्हें फाँसने की कोशिश करता हूँ तो मुस्कुरा कर कहते हैं: तिकड़म से नहीं लिखी जाती कविता और मुझ पर छींटे उछाल कर चले जाते हैं दूर गहरे जल मेंमैं जानता हूँ इन बचे हुए शब्दों में ही बची रहेगी कविता!

Aug 25, 20241 min

Ep 512Parichay | Anjana Tandon

परिचय | अंजना टंडनअब तकहर देह के ताने बाने परस्थित है जुलाहे की ऊँगलियों के निशानबस थोड़ा सा अंदररूह तकजा धँसे हैं,विश्वास ना होतो कभीकिसी कीरूह की दीवारों परहाथ रख देखनातुम्हारे दस्ताने का माप भीशर्तिया उसके जितना निकलेगा।

Aug 24, 20241 min

Ep 511Surya | Naresh Saxena

सूर्य | नरेश सक्सेनाऊर्जा से भरे लेकिनअक्ल से लाचार, अपने भुवनभास्करइंच भर भी हिल नहीं पातेकि सुलगा दें किसी का सर्द चुल्हाठेल उढ़का हुआ दरवाजाचाय भर की ऊष्मा औ' रोशनी भर देंकिसी बीमार की अंधी कुठरिया मेंसुना सम्पाती उड़ा थाइसी जगमग ज्योति को छूने झुलस कर देह जिसकी गिरी धरती परधुआँ बन पंख जिसके उड़ गए आकाश मेंहे अपरिमित ऊर्जा के स्रोतकोई देवता हो अगर सचमुच सूर्य तुम तोक्रूर क्यों हो इस क़दरतुम्हारी यह अलौकिक विकलांगताभयभीत करती है।

Aug 23, 20242 min

Ep 510Ladki | Pratibha Saxena

लड़की | प्रतिभा सक्सेनाआती है एक लड़की,मगन-मुस्कराती,खिलखिलाकर हँसती है,सब चौंक उठते हैं -क्यों हँसी लड़की ?उसे क्या पता आगे का हाल,प्रसन्न भावनाओं में डूबी,कितनी जल्दी बड़ी हो जाती है,सारे संबंध मन से निभाती !कोई नहीं जानता,जानना चाहता भी नहींक्या चाहती है लड़कीमन की बात बोल देतो बदनाम हो जाती है लड़कीऔर एक दिनएक घर से दूसरे घर,अनजान लोगों मेंचुपचाप चली जाती है नाम-धाम, पहचान सब यहीं छोड़,एकदम गुमनाम हो जाती है लड़कीनिभाती है जीवन भरकभी इस घर, कभी उस घर देह में नई देह रचतीविदेह होती लड़कीसब-कुछ सौंप सबकोनये रूप, नये नाम सिरज,अरूप अनाम हो,झुर्रियोंदार काया ओढ़हवाओं में विलीन हो जातीकोई नही जानता,यही थीवह हँसती-खिलखिलाती,नादान सी लड़की!

Aug 22, 20242 min

Ep 509Jarkhareed Deh | Rupam Mishra

जरखरीद देह - रूपम मिश्र हम एक ही पटकथा के पात्र थेएक ही कहानी कहते हुए हम दोनों अलग-अलग दृश्य में होतेजैसे एक दृश्य तुम देखते हुए कहते तुमसे कभी मिलने आऊँगातुम्हारे गाँव तो नदी के किनारे बैठेंगे जी भर बातें करेंगेतुम बेहया के हल्के बैंगनी फूलों की अल्पना बनानाउसी दृश्य में तुमसे आगे जाकर देखती हूँ नदी का वही किनारा है बहेरी आम का वही पुराना पेड़ है।जिसके तने को पकड़कर हम छुटपन में गोल-गोल घूमते थे।उसी की एक लम्बी डाल पर दो लाशें झूल रही हैं ।एक मेरी हैं दूसरी का बस माथा देखकर ही मैंचीख पड़ती हूँ और दृश्य से भाग आती हूँतुम रूमानियत में दूसरा दृश्य देखते होकिसी शाम जब आकाश के थाल में तारे बिखरे होंगेसंसार मीठी नींद में होगा तो चुपके से तुमसे मिलने आ जाऊँगामैं झट से बचपन में चली जाती हूँ जहाँ दादी भाई को गोद में लियेरानी सारंगा और सदावृक्ष की कहानी सुना रही हैंमैं सीधे कहानी के क्लाइमेक्स में पहुँचती हूँजहाँ रानी सारंगा से मिलने आए प्रेमी का गला खचाक से काट दिया जाता हैऔर छोटा भाई ताली पीटकर हँसने लगता हैदृश्य और भी था जिसमें मेरा चेहरा नहीं था देहों से भरा एक मकान थामैं एक अछूत बर्तन की तरह घर के एक कोने में पड़ी थीतुम और भी दृश्य बताते हो जिसमें समन्दर बादल और पहाड़ होते हैंमैं कहती हूँ कहते रहो ये सुनना अच्छा लग रहा हैबस मेरे गाँव-जवार की तरफ न लौटना क्योंकिये आत्मा प्रेम की जरखरीद है और देह कुछ देहों की।

Aug 21, 20243 min

Ep 507Khalipan | Vinay Kumar Singh

ख़ालीपन | विनय कुमार सिंहमाँ अंदर से उदास हैसब कुछ वैसा ही नहीं हैजो बाहर से दिख रहा हैवैसे तो घर भरा हुआ हैसब हंस रहे हैंखाने की खुशबू आ रही हैशाम को फिल्म देखना हैपिताजी का नया कुर्तासबको अच्छा लग रहा हैलेकिन माँ उदास है.बच्चा नौकरी करने जा रहा हैकई सालों से घर, घर थाअब नहीं रहेगाअब माँ के मन के एक कोने मेंहमेशा खालीपन रहेगा !

Aug 20, 20241 min

Ep 506Hum Na Rahenge | Kedarnath Agarwal

हम न रहेंगे | केदारनाथ अग्रवाल हम न रहेंगे-तब भी तो यह खेत रहेंगे;इन खेतों पर घन घहरातेशेष रहेंगे;जीवन देते,प्यास बुझाते,माटी को मद-मस्त बनाते,श्याम बदरिया केलहराते केश रहेंगे!हम न रहेंगे-तब भी तो रति-रंग रहेंगे;लाल कमल के साथपुलकते भृंग रहेंगे!मधु के दानी,मोद मनाते,भूतल को रससिक्त बनाते,लाल चुनरिया मेंलहराते अंग रहेंगे।

Aug 19, 20241 min

Ep 505Tan Gayi Reedh | Nagarjun

तन गई रीढ़ | नागार्जुनझुकी पीठ को मिलाकिसी हथेली का स्पर्शतन गई रीढ़महसूस हुई कन्धों कोपीछे से,किसी नाक की सहज उष्ण निराकुल साँसेंतन गई रीढ़कौंधी कहीं चितवनरंग गए कहीं किसी के होंठनिगाहों के ज़रिये जादू घुसा अन्दरतन गई रीढ़गूँजी कहीं खिलखिलाहटटूक-टूक होकर छितराया सन्नाटाभर गए कर्णकुहरतन गई रीढ़आगे से आयाअलकों के तैलाक्त परिमल का झोंकारग-रग में दौड़ गई बिजलीतन गई रीढ़

Aug 18, 20241 min

Ep 504Mrityu | Vishwanath Prasad Tiwari

मृत्यु - विश्वनाथ प्रसाद तिवारी मेरे जन्म के साथ ही हुआ थाउसका भी जन्म...मेरी ही काया में पुष्ट होते रहेउसके भी अंगमें जीवन-भर सँवारता रहा जिन्हेंऔर ख़ुश होता रहाकि ये मेरे रक्षक अस्त्र हैंदरअसल वे उसी के हथियार थेअजेय और आज़माये हुएमैं जानता थाकि सब कुछ जानता हूँमगर सच्चाई यह थीकि मैं नहीं जानता थाकि कुछ नहीं जानता हूँ...मैं सोचता था फतह कर रहा हूँ किले पर किले मगर जितना भी और जिधर भी बढ़ता थाउसी के करीब और उसी की दिशा मेंवक्‍त निकल चुका था दूर।जब मुझे उसके षड्यंत्र का अनुभव हुआआख़िरी बार -जब उससे बचने के लिएमें भाग रहा थातेज़ और तेज़ और अपनी समझ सेसुरक्षित पहुँच गया जहाँवहाँ वह मेरी प्रतीक्षा में .पहले से खड़ी थी..मेरी मृत्यु|

Aug 17, 20242 min

Ep 503Ichhaon Ka Ghar | Anjana Bhatt

इच्छाओं का घर | अंजना भट्टइच्छाओं का घर- कहाँ है?क्या है मेरा मन या मस्तिष्क या फिर मेरी सुप्त चेतना? इच्छाएं हैं भरपूर, जोरदार और कुछ मजबूरपर किसने दी हैं ये इच्छाएं?क्या पिछले जन्मों से चल कर आयींया शायद फिर प्रभु ने ही हैं मन में समाईं?पर क्यों हैं और क्या हैं ये इच्छाएं?क्या इच्छाएं मार डालूँ?या फिर उन पर काबू पा लूं?और यदि हाँ तो भी क्यों?जब प्रभु की कृपा से हैं मन में समाईं?तो फिर क्या है उनमें बुराई?

Aug 16, 20241 min

Ep 508Swadesh Ke Prati | Subhadra Kumari Chauhan

स्वदेश के प्रति / सुभद्राकुमारी चौहानआ, स्वतंत्र प्यारे स्वदेश आ,स्वागत करती हूँ तेरा।तुझे देखकर आज हो रहा,दूना प्रमुदित मन मेरा॥आ, उस बालक के समानजो है गुरुता का अधिकारी।आ, उस युवक-वीर सा जिसकोविपदाएं ही हैं प्यारी॥आ, उस सेवक के समान तूविनय-शील अनुगामी सा।अथवा आ तू युद्ध-क्षेत्र मेंकीर्ति-ध्वजा का स्वामी सा॥आशा की सूखी लतिकाएंतुझको पा, फिर लहराईं।अत्याचारी की कृतियों कोनिर्भयता से दरसाईं॥

Aug 15, 20241 min

Ep 501Apni Devnagri Lipi | Kedarnath Singh

अपनी देवनागरी लिपि | केदारनाथ सिंहयह जो सीधी-सी, सरल-सीअपनी लिपि है देवनागरीइतनी सरल हैकि भूल गई है अपना सारा अतीतपर मेरा ख़याल है'क' किसी कुल्हाड़ी से पहलेनहीं आया था दुनिया में'च' पैदा हुआ होगाकिसी शिशु के गाल परमाँ के चुम्बन से!'ट' या 'ठ' तो इतने दमदार हैंकि फूट पड़े होंगेकिसी पत्थर को फोड़कर'न' एक स्थायी प्रतिरोध हैहर अन्याय का'म' एक पशु के रँभाने की आवाज़जो किसी कंठ से छनकरबन गयी होगी “माँ"!स' के संगीत मेंसंभव है एक हल्की-सी सिसकीसुनाई पड़े तुम्हें।हो सकता है एक खड़ीपाई के नीचेकिसी लिखते हुए हाथ कीतकलीफ़ दबी होकभी देखना ध्यान सेकिसी अक्षर में झाँककरवहाँ रोशनाई के तल मेंएक ज़रा-सी रोशनीतुम्हें हमेशा दिखाई पड़ेगी।यह मेरे लोगों का उल्लास हैजो ढल गया है मात्राओं में।अनुस्वार में उतर आया हैकोई कंठावरोध!पर कौन कह सकता हैइसके अंतिम वर्ण 'ह' मेंकितनी हँसी हैकितना हाहाकार !

Aug 14, 20242 min

Ep 500Dhela | Uday Prakash

ढेला | उदय प्रकाश वह था क्या एक ढेला थाकहीं दूर गाँव-देहात से फिंका चला आया थादिल्ली की ओररोता था कड़कड़डूमा, मंगोलपुरी, पटपड़गंज मेंखून के आँसू चुपचापढेले की स्मृति में सिर्फ़ बचपन की घास थीजिसका हरापन दिल्ली में हर सालऔर हरा होता थाएक दिन ढेला देख ही लिया गया राजधानी मेंलोग-बाग चौंके कि ये तो कैसा ढेला है।कि रोता भी है आदमी लोगों की तरहदया भी उपजी कुछ के भीतरकुछ ने कहा कैसे क्या तो करें इसकानौकरी पर रखें तो क्या पता किसी कासर ही फोड़ देज़्यादातर काँच की हैं दीवारें और इतने कीमतीइलेक्ट्रॉनिक आइटमकुछ ने कहा विश्वसनीयता का भी प्रश्न हैढेले की जात कब किस दिशा को लुढ़क जाएक्या पता किसी बारिश में ही घुल जाएएक दिन एक लड़की ने पढ़ी ढेले की कविताऔर फिरआया उसे खुब ज़ोर का रोनाढेला भीतर से काँपा कि आया उसके भीजीवन में प्यारआखिरकारउस रात उसने रात भर जाग-जागकर लिखीएक कविताकि दिल्ली में भी हैदुनिया के सबसे बड़े बैलून से भी ज़्यादा बड़ाएक दिलजहाँ एक दिन फिरा करते हैं ढेलों के भी दिनलेकिन अगले दिन वह भागाऔर फिर भागता ही रहाजब लड़की ने अपने प्रेमी से कहा-'सँभालकर उठाओ और रख दो इस बेचारे कोगुड़गाँव के किसी खेत मेंया टिकट देकर चढ़ा दो छत्तीसगढ़ एक्सप्रेस मेंऔर भूल जाओउसी तरह जैसे राजधानी की सड़क पर हर रोज़हम भूल जाते हैं कोई- न-कोईदहशतनाक दुर्घटना'आदमी लोगों, सुनो!इस ढेले के भी हैं कुछ विचारढेले को भी करनी है बाज़ार में ख़रीदारीइस कठिन समय में ढेले का सोचना हैउसको भी निभानी है कोई भूमिकाभाई, कोई है ?कोई सुनेगा ढेले का मूल्यवान प्रवचनकोई अखबार छापेगालोकतंत्र और मनुष्यता के संकट परढेले के विचार?भाई, कोई है,जो उसे उठाये उस तरह जिस तरह नहीं उठाया जाता कोई ढेला?

Aug 13, 20243 min

Ep 499O Mandir Ke Shankh, Ghantiyon | Ankit Kavyansh

ओ मन्दिर के शंख, घण्टियों | अंकित काव्यांशओ मन्दिर के शंख, घण्टियों तुम तो बहुत पास रहते हो,सच बतलाना क्या पत्थर का ही केवल ईश्वर रहता है?मुझे मिली अधिकांशप्रार्थनाएँ चीखों सँग सीढ़ी पर ही।अनगिन बारथूकती थीं वे हम सबकी इस पीढ़ी पर ही।ओ मन्दिर के पावन दीपक तुम तो बहुत ताप सहते हो,पता लगाना क्या वह ईश्वर भी इतनी मुश्किल सहता है?भजन उपेक्षितहो भी जाएं फिर भी रोज सुने जाएंगे।लेकिन चीखेंसुनने वाला ध्यान कहाँ से हम लाएंगे?ओ मन्दिर के सुमन सुना है ईश्वर को पत्थर कहते हो!लेकिन मेरा मन जाने क्यों दुनिया को पत्थर कहता है?

Aug 12, 20242 min

Ep 498Tum Aayin | Kedarnath Singh

तुम आईं | केदारनाथ सिंहतुम आईंजैसे छीमियों में धीरे- धीरेआता है रसजैसे चलते-चलते एड़ी में काँटा जाए धँसतुम दिखींजैसे कोई बच्चासुन रहा हो कहानीतुम हँसीजैसे तट पर बजता हो पानीतुम हिलींजैसे हिलती है पत्तीजैसे लालटेन के शीशे मेंकाँपती हो बत्ती।तुमने छुआजैसे धूप में धीरे धीरेउड़ता है भुआऔर अन्त मेंजैसे हवा पकाती है गेहूँ के खेतों कोतुमने मुझे पकायाऔर इस तरहजैसे दाने अलगाए जाते हैं भूसे सेतुमने मुझे खुद से अलगाया।

Aug 11, 20242 min

Ep 497Raat Kati Din Tara Tara | Shiv Kumar Batalvi

रात कटी गिन तारा तारा - शिव कुमार बटालवीअनुवाद: आकाश 'अर्श'रात कटी गिन तारा तारा हुआ है दिल का दर्द सहारा रात फुंका मिरा सीना ऐसा पार अर्श के गया शरारा आँखें हो गईं आँसू आँसू दिल का शीशा पारा-पारा अब तो मेरे दो ही साथी इक आह और इक आँसू खारा मैं बुझते दीपक का धुआँ हूँ कैसे करूँ तिरा रौशन द्वारा मरना चाहा मौत न आई मौत भी मुझ को दे गई लारा छोड़ न मेरी नब्ज़ मसीहा बाद में ग़म का कौन सहारा

Aug 10, 20241 min

Ep 496Apne Purkhon Ke Liye | Vishwanath Prasad Tiwari

अपने पुरखों के लिए | विश्वनाथ प्रसाद तिवारी इसी मिट्टी मेंमिली हैं उनकी अस्थियाँअँधेरी रातों मेंजो करते रहते थे भोर का आवाहनबेड़ियों में जकड़े हुएजो गुनगुनाते रहते थे आज़ादी के तरानेमाचिस की तीली थे वेचले गए एक लौ जलाकरथोड़ी सी आग जो चुराकर लाये थे वे जन्नत सेहिमालय की सारी बर्फऔर समुद्र का सारा पानीनहीं बुझा पा रहे हैं उसेलड़ते रहे, लड़ते रहे, लड़ते रहेवे मछुआरे जर्जर नौका की तरहसमय की धार में डूब गएकैसे उन्होंने अपने पैरों को बना लिया हाथऔर एक दिन परचम की तरह लहरा दिए उसेकैसे वे अकेले पड़ गएअपने ही बनाए सिंहासनों, संगीनों और बूटों के आगेऔर कैसे बह गए एक पतझर में गुमनामजंगल की खामोशी तोड़ने के लिएउन्होंने ईजाद की थीं ध्वनियाँऔर आँधी-तूफान में भी ज़िंदा रखने के लिएधरती में बोए थे शब्दअपनी खुरदरी भाग्यरेखाओं वालेकाले हाथों सेउन्होंने मिट॒टी में बसंतऔर बसंत में फूल और फूल में भरे थे रंगधधकाई थीं भट्ठियाँचट्टानों को बनाया था अन्नदाकिसी राजा का नहींइतिहास है यहशरीर में धड़कते हुए खून कामेरे बच्चों युद्ध थे वे हमें छोड़ गए एक युद्ध में ।

Aug 9, 20242 min

Ep 495Amaltaash | Anjana Verma

अमलताश | अंजना वर्माउठा लिया है भारइस भोले अमलताश नेदुनिया को रौशन करने काबिचारा दिन में भीजलाये बैठा है करोड़ों दीये!न जाने किस स्त्री नेटाँग दिये अपने सोने के गहनेअमलताश की टहनियों परऔर उन्हें भूलकर चली गईपीली तितलियों का घर है अमलताशया सोने का शहर है अमलताशदीवाली की रात है अमलताशया जादुई करामात है अमलताश!

Aug 8, 20241 min

Ep 494Atyachari ke Pramaan | Manglesh Dabral

अत्याचारी के प्रमाण | मंगलेश डबराल अत्याचारी के निर्दोष होने के कई प्रमाण हैं उसके नाखुन या दाँत लम्बे नहीं हैंआँखें लाल नहीं रहती...बल्कि वह मुस्कराता रहता हैअक्सर अपने घर आमंत्रित करता हैऔर हमारी ओर अपना कोमल हाथ बढ़ाता हैउसे घोर आश्चर्य है कि लोग उससे डरते हैंअत्याचारी के घर पुरानी तलवारें और बन्दूकें.,सिर्फ़ सजावट के लिए रखी हुई हैंउसका तहख़ाना एक प्यारी-सी जगह हैजहाँ श्रेष्ठ कलाकृतियों के आसपास तैरतेउम्दा संगीत के बीचजो सुरक्षा महसूस होती है वह बाहर कहीं नहीं हैअत्याचारी इन दिनों ख़ूब लोकप्रिय हैकई मरे हुए लोग भी उसके घर आते-जाते हैं।

Aug 7, 20242 min