
Pratidin Ek Kavita
1,183 episodes — Page 13 of 24

Ep 585Nadiyan | Alok Dhanwa
नदियाँ | आलोक धन्वाइछामती और मेघनामहानंदारावी और झेलमगंगा गोदावरीनर्मदा और घाघरानाम लेते हुए भी तकलीफ़ होती हैउनसे उतनी ही मुलाक़ात होती हैजितनी वे रास्ते में आ जाती हैंऔर उस समय भी दिमाग कितना कमपास जा पाता हैदिमाग तो भरा रहता हैलुटेरों के बाज़ार के शोर से।

Ep 584Pani Ek Roshni Hai | Kedarnath Singh
पानी एक रोशनी है। केदारनाथ सिंहइन्तज़ार मत करोजो कहना हो कह डालोक्योंकि हो सकता है फिर कहने काकोई अर्थ न रह जाएसोचोजहाँ खड़े हो, वहीं से सोचोचाहे राख से ही शुरू करोमगर सोचोउस जगह की तलाश व्यर्थ है।जहाँ पहुँचकर यह दुनियाएक पोस्ते के फूल में बदल जाती हैनदी सो रही हैउसे सोने दोउसके सोने सेदुनिया के होने का अन्दाज़ मिलता है।पूछोचाहे जितनी बार पूछना पड़ेचाहे पूछने में जितनी तकलीफ़ होमगर पूछोपूछो कि गाड़ी अभी कितनी लेट हैअँधेरा बज रहा है।अपनी कविता की किताब रख दो एक तरफ़और सुनो-सुनोअँधेरे में चल रहे हैंलाखों-करोड़ों पैरपानी एक रोशनी हैअँधेरे में यही एक बात है।जो तुम पूरे विश्वास के साथदूसरे से कह सकते हो

Ep 583Ma | Uttima Keshari
माँ | उत्तिमा केशरीमाँ आसनी पर बैठकर जबएकाकी होकरबाँचती है रामायणतब उनके स्निग्धज्योतिर्मय नयनभीग उठते हैं बार-बार ।माँ जब ज्योत्सना भरी रात्रि मेंसुनाती है अपने पुरखों के बारे मेंतो उनकी विकंपित दृष्टिठहर जाती है कुछ पल के लिएमानो सुनाई पड़ रही होएक आर्तनाद !माँ जब सोती है धरती परसुजनी बिछाकर तबवह ढूँढ़ रही होती हैअपनी ही परछाईजिसे उसने छुपाकररखा है वर्षों से ।

Ep 582Andhere Ki Bhi Hoti Hai Ek Vyavastha | Anupam Singh
अँधेरे की भी होती है एक व्यवस्था | अनुपम सिंह अँधेरे की भी होती है एक व्यवस्थाचीज़ें गतिमान रहती हैं अपनी जगहों परबादल गरजते हैं कहीं टूट पड़ती हैं बिजलियाँबारिश अँधेरे में भी भिगो देती है पेड़पत्तियों से टपकता पानी सुनाई देता हैअँधेरे के आईने में देखती हूँ अपना चेहरातुम आते तो दिखाई देते होबस! ख़त्म नहीं होतीं दूरियाँआँसू ढुलक जाते हैं गालों परअँधेरे में भी दुख की होती है एक चमकदूर दी जा रही है बलिअँधेरे में भी सुना जा सकता है फ़र्श पर गिरा चाकूकोई होता तो रख देता हाथमेरी काँपती-थरथराती देह परअँधेरे में भी उठ रही है चिताओं से गंधराख उड़कर पड़ रही है फूलों परहाथ से छुई जा सकती है ताज़ा खुदी कब्रों की मिटटी वहाँ अभी भी जाग रही हैं मुर्दे की इच्छाएँखेल रहे हैं दो बालक उसकेअँधेरे में भी सुनी जा सकती है उनके हृदय की धकधकबिल्ली अँधेरे में भी खेलती है अपने बच्चों संगऔर कवि गढ़ लेता उजाले का बिम्बअँधेरे में भी लादे-फाँदे रेलगाड़ियाँपहुँच जाती हैं कहाँ से कहाँएक अँधेरे से दूसरे अँधेरे में पैदल ही पहुँच जाते हैं।बच्चे बूढ़े औरतें और अपाहिज सुनाई देती है उनकी कातर पुकारअँधेरे में भी उपस्थित रहता है ब्रम्हांडअँधेरे-उजाले से परे घूमती रहती है पृथ्वीअँधेरे के आर-पार घूमते हैं नक्षत्र सारेअँधेरे की भी होती है व्यवस्थाअँधेरे में अंकुरित होते हैं बीजसादे काग़ज अँधेरे में भी करते हैं इंतज़ार किसी क़लम कालिखे जाने को समय की कविता।

Ep 581Achha Tha Agar Zakhm Na Bharte Koi Din Aur | Faraz
अच्छा था अगर ज़ख्म न भरते कोई दिन और | फ़राज़अच्छा था अगर ज़ख्म न भरते कोई दिन औरउस कू-ए-मलामत में गुज़रते कोई दिन औररातों के तेरी यादों के खुर्शीद उभरतेआँखों में सितारे से उभरते कोई दिन औरहमने तुझे देखा तो किसी और को ना देखाए काश तेरे बाद गुज़रते कोई दिन औरराहत थी बहुत रंज में हम गमतलबों कोतुम और बिगड़ते तो संवरते कोई दिन औरगो तर्के-तअल्लुक था मगर जाँ पे बनी थीमरते जो तुझे याद ना करते कोई दिन औरउस शहरे-तमन्ना से फ़राज़ आये ही क्यों थेये हाल अगर था तो ठहरते कोई दिन औरकू-ए-मलामत - ऐसी गली जहाँ व्यंग्य किया जाता होखुर्शीद - सूर्यरंज - तकलीफ़, ग़मतलब- दुख पसन्द करने वालेतर्के-तअल्लुक - रिश्ता टूटना( यहाँ संवाद हीनता से मतलब है)

Ep 580Vah Jan Mare Nahi Marega | Kedarnath Agarwal
वह जन मारे नहीं मरेगा | केदारनाथ अग्रवाल जो जीवन की धूल चाटकर बड़ा हुआ है,तूफानों से लड़ा और फिर खड़ा हुआ है,जिसने सोने को खोदा, लोहा मोड़ा है,जो रवि के रथ का घोड़ा है,वह जन मारे नहीं मरेगा,नहीं मरेगा!!जो जीवन की आग जलाकर आग बना है,फौलादी पंजे फैलाये नाग बना है,जिसने शोषण को तोड़ा, शासन मोड़ा है,जो युग के रथ का घोड़ा है,वह जन मारे नहीं मरेगा,नहीं मरेगा!!

Ep 579Ma Ki Zindagi | Suman Keshari
माँ की ज़िन्दगी | सुमन केशरीचाँद को निहारतीकहा करती थी माँवे भी क्या दिन थेजब चाँदनी के उजास मेंजाने तो कितनी बार सीए थे मैंनेतुम्हारे पिताजी का कुर्तेकाढ़े थे रूमालअपनी सास-जिठानी की नज़रें बचा केअपने गालों की लाली छिपातीवे झट हाज़िर कर देतीसूई-धागाऔर धागा पिरोने कीबाज़ी लगातीहरदम हमारी जीत की कामना करती माँऐसे पलों में खुद बच्ची बन जातीबिटिया यह नानी की कहानी नहींइसी शहर कीयह तेरी माँ की ज़िंदगानी है...

Ep 578Mujhe Prem Chahiye | Nilesh Raghuvanshi
मुझे प्रेम चाहिए | नीलेश रघुवंशी मुझे प्रेम चाहिएघनघोर बारिश-सा ।कड़कती धूप में घनी छाँव-साठिठुरती ठंड में अलाव-सा प्रेम चाहिए मुझे।उग आये पौधों और लबालब नदियों-सादूर तक पैली दूबउस पर छाई ओस की बुँदों सा ।काले बादलों में छिपा चाँदसूरज की पहली किरण-साप्रेम चाहिए ।खिला-खिला लाल गुलाब-साकुनमुनाती हँसी-साअँधेरे में टिमटिमाती रोशनी-सा प्रेम चाहिए।अनजाना अनचीन्हा अनबोला सापहली नज़र-सा प्रेम चाहिए मुझे ।ऊबड़-खाबड़ रास्तों से मंज़िल तक पहुँचाताप्रेम चाहिए मुझे।मुझे प्रेम चाहिएसारी दुनिया रहती हो जिसमेंप्रेम चाहिए मुझे ।

Ep 577Stree | Sushila Takbhore
स्त्री | सुशीला टाकभौरेएक स्त्रीजब भी कोई कोशिश करती हैलिखने की बोलने की समझने कीसदा भयभीत-सी रहती हैमानो पहरेदारी करता हुआकोई सिर पर सवार होपहरेदारजैसे एक मज़दूर औरत के लिएठेेकेदारया खरीदी संपत्ति के लिएचौकीदारवह सोचती है लिखते समय कलम को झुकाकरबोलते समय बात को संभाल लेऔर समझने के लिएसबके दृष्टिकोण से देखेक्योंकि वह एक स्त्री है!

Ep 576Marne Ki Fursat | Anamika
मरने की फ़ुरसत | अनामिकाईसा मसीहऔरत नहीं थेवरना मासिक धर्म ग्यारह बरस की उमर से उनको ठिठकाए ही रखता देवालय के बाहर!बेथलेहम और यरूशलम के बीच कठिन सफ़र में उनके हो जाते कई तो बलात्कार और उनके दुधमुँहे बच्चे चालीस दिन और चालीस रातें जब काटते सड़क पर, भूख से बिलबिलाकर मरते एक-एक कर—ईसा को फ़ुरसत नहीं मिलती सूली पर चढ़ जाने की भी!

Ep 575Kab Laut Ke Aaoge | Salman Akhtar
कब लौट के आओगे बता क्यों नहीं देते | सलमान अख़्तरकब लौट के आओगे बता क्यों नहीं देतेदीवार बहानों की गिरा क्यों नहीं देतेतुम पास हो मेरे तो पता क्यों नहीं चलतातुम दूर हो मुझसे तो सदा क्यों नहीं देतेबाहर की हवाओं का अगर ख़ौफ़ है इतनाजो रौशनी अंदर है, बुझा क्यों नहीं देते

Ep 574Anupasthit Upasthit | Rajesh Joshi
अनुपस्थित-उपस्थित | राजेश जोशी मैं अक्सर अपनी चाबियाँ खो देता हूँछाता मैं कहीं छोड़ आता हूँऔर तर-ब-तर होकर घर लौटता हूँअपना चश्मा तो मैं कई बार खो चुका हूँपता नहीं किसके हाथ लगी होंगी वे चीजेंकिसी न किसी को कभी न कभी तो मिलती ही होंगीवे तमाम चीज़ें जिन्हें हम कहीं न कहीं भूल आएछूटी हुई हर एक चीज़ तो किसी के काम नहीं आती कभी भीलेकिन कोई न कोई चीज़ तो किसी न किसी केकभी न कभी काम आती ही होगीजो उसका उपयोग करता होगाजिसके हाथ लगी होंगी मेरी छूटी हुई चीजेंवह मुझे नहीं जानता होगाहर बार मेरा छाता लगाते हुएवह उस आदमी के बारे में सोचते हुएमन-ही-मन शुक्रिया अदा करता होगा जिसे वह नहीं जानताइस तरह एक अनाम अपरिचित की तरह उसकी स्मृति मेंकहीं न कहीं मैं रह रहा हूँ जाने कितने दिनों सेजो मुझे नहीं जानताजिसे मैं नहीं जानतापता नहीं मैं कहाँ -कहाँ रह रहा हूँ मैं एक अनुपस्थित-उपस्थित !एक दिन रास्ते में मुझे एक सिक्का पड़ा मिलामैंने उसे उठाया और आस-पास देखकर चुपचाप जेब में रख लियामन नहीं माना, लगा अगर किसी ज़रूरतमन्द का रहा होगातो मन-ही-मन वह कुढ़ता होगाकुछ देर जेब में पड़े सिक्के को उँगलियों के बीच घुमाता रहाफिर जेब से निकालकर एक भिखारी के कासे में डाल दियाभिखारी ने मुझे दुआएँ दींउससे तो नहीं कह सका मैंकि सिक्का मेरा नहीं हैलेकिन मन-ही-मन मैंने कहाकि ओ भिखारी की दुआओजाओं उस शख्स के पास चली जाओ

Ep 573Dada Ki Tasveer | Manglesh Dabral
दादा की तस्वीर | मंगलेश डबराल दादा को तस्वीरें खिंचवाने का शौक़ नहीं थाया उन्हें समय नहीं मिलाउनकी सिर्फ़ एक तस्वीर गन्दी पुरानी दीवार पर टँगी हैवे शान्त और गम्भीर बैठे हैं।पानी से भरे हुए बादल की तरहदादा के बारे में इतना ही मालूम हैकि वे माँगनेवालों को भीख देते थेनींद में बेचैनी से करवट बदलते थेऔर सुबह उठकरबिस्तर की सिलवटें ठीक करते थेमैं तब बहुत छोटा थामैंने कभी उनका गुस्सा नहीं देखाउनका मामूलीपन नहीं देखातस्वीरें किसी मनुष्य की लाचारी नहीं बतलातींमाँ कहती है जब हमरात के विचित्र पशुओं से घिरे सो रहे होते हैंदादा इस तस्वीर में जागते रहते हैं।मैं अपने दादा जितना लम्बा नहीं हुआशान्त और गम्भीर नहीं हुआपर मुझमें कुछ है उनसे मिलता-जुलतावैसा ही क्रोध वैसा ही मामूलीपनमैं भी सर झुकाकर चलता हूँजीता हूँ अपने को एक तस्वीर के खाली फ्रेम मेंबैठे देखता हुआ।

Ep 572Andhere Ka Safar | Ramanath Awasthi
अँधेरे का सफ़र मेरे लिए है | रमानाथ अवस्थीतुम्हारी चाँंदनी का क्या करूँ मैंअँधेरे का सफ़र मेरे लिए है।किसी गुमनाम के दुख-सा अनजाना है सफ़र मेरापहाड़ी शाम-सा तुमने मुझे वीरान में घेरातुम्हारी सेज को ही क्यों सजाऊँसमूचा ही शहर मेरे लिए हैथका बादल किसी सौदामिनी के साथ सोता है।मगर इनसान थकने पर बड़ा लाचार होता है।गगन की दामिनी का क्या करूँ मैंधरा की हर डगर मेरे लिए है।किसी चौरास्ते की रात-सा मैं सो नहीं पाताकिसी के चाहने पर भी किसी का हो नहीं पातामधुर है प्यार, लेकिन क्या करूँ मैंज़माने का ज़हर मेरे लिए हैनदी के साथ मैं पहुँचा किसी सागर किनारेगई ख़ुद डूब, मुझको छोड़ लहरों के सहारेनिमंत्रण दे रहीं लहरें करूँ क्याकहाँ कोई भँवर मेरे लिए है

Ep 571Naya Sach Rachne | Nandkishore Acharya
नया सच रचने | नंदकिशोर आचार्यपत्तों का झर जानाशिशिर नहींजड़ों मेंयह सपनों कीकसमसाहट है-अपने लिएनया सच रचने कीख़ातिर-झूठ हो जाता है जोखुद झर जाता है।

Ep 570Aatma | Anju Sharma
आत्मा | अंजू शर्मामैं सिर्फएक देह नहीं हूँ,देह के पिंजरे में कैदएक मुक्ति की कामना में लीनआत्मा हूँ,नृत्यरत हूँ निरंतर,बांधे हुए सलीके के घुँघरू,लौटा सकती हूँ मैं अब देवदूत को भीमेरे स्वर्ग की रचनामैं खुद करुँगी,मैं बेअसर हूँकिसी भी परिवर्तन से,उम्र के साथ कलपिंजरा तब्दील हो जायेगाझुर्रियों से भरेएक जर्जर खंडहर में,पर मैं उतार कर,समय की केंचुली,बन जाऊँगीचिर-यौवना,मैं बेअसर हूँउन बाजुओं में उभरी नसोंकी आकर्षण से,जो पिंजरे के मोह में बंधीघेरती हैं उसे,मैं अछूती हूँ,श्वांसों के उस स्पंदन सेजो सम्मोहित कर मुझेकैद करना चाहता हैअपने मोहपाश में,मैंने बांध लिया हैचाँद और सूरज कोअपने बैंगनी स्कार्फ में,जो अब नियत नहीं करेंगेमेरी दिनचर्या,और आसमान के सिरे खोलदिए हैं मैंने,अब मेरी उड़ान में कोईसीमा की बाधा नहीं है,विचरती हूँ मैंनिरंतर ब्रह्माण्ड मेंओढ़े हुए मुक्ति का लबादा,क्योंकि नियमों और अपेक्षाओंके आवरण टांग दिए हैं मैंनेकल्पवृक्ष पर.......

Ep 569Ladki | Anju Sharma
लड़की | अंजू शर्माएक दिन समटते हुए अपने खालीपन कोमैंने ढूँढा था उस लड़की को,जो भागती थी तितलियों के पीछेसँभालते हुए अपने दुपट्टे कोफिर खो जाया करती थीकिताबों के पीछे,गुनगुनाते हुए ग़ालिब की कोई ग़ज़लअक्सर मिल जाती थी वो लाईब्रेरी में,कभी पाई जाती थी घर के बरामदे मेंबतियाते हुए प्रेमचंद और शेक्सपियर से,कभी बारिश में तलते पकौड़ोंको छोड़करखुले हाथों से छूती थी आसमान,और ज़ोर से सांस खींचते हुएसमो लेना चाहती थी पहली बारिशमें महकती सोंधी मिट्टी की खुशबू,उसकी किताबों में रखेसूखे फूल महका करते थेउसके अल्फाज़ की महक से,और शब्द उसके इर्द-गिर्द नाचतेऔर भर दिया करते थेउसकी डायरी के पन्ने,दोस्तों की महफ़िल छोड़छत पर निहारती थी वोबादल और बनाया करती थीउनमें अनगिनित शक्लें,तब उसकी उंगलियाँ अक्सरमुंडेर पर लिखा करती थी कोई नाम,उसकी चुप्पी को लोग क्योंनहीं पढ़ पाते थे उसे परवाह नहीं थी,हाँ, क्योंकि उसे जानते थेध्रुव तारा, चाँद और सितारे,फिर एक दिन वो लड़की कहींखो गयीसोचती हूँ क्या अब भी उसे प्यारहै किताबों सेक्या अब भी लुभाते हैं उसे नाचते अक्षर,क्या अब भी गुनगुनाती है वो ग़ज़लें,कभी मिले तो पूछियेगा उससेऔर कहियेगा कि उसके झोले मेंरखे रंग और ब्रुश अब सूख गए हैंऔर पीले पड़ गए हैं गोर्की कीकिताब के पन्ने,देवदास और पारो अक्सर उसेयाद करते हैंकहते हैं वो मेरी हमशक्ल थी

Ep 568Tumne Is Talaab Mein | Dushyant Kumar
तुमने इस तालाब में | दुष्यंत कुमार तुमने इस तालाब में रोहू पकड़ने के लिएछोटी-छोटी मछलियाँ चारा बनाकर फेंक दीं।तुम ही खा लेते सुबह को भूख लगती है बहुत,तुमने बासी रोटियाँ नाहक उठाकर फेंक दीं।जाने कैसी उँगलियाँ हैं जाने क्या अंदाज़ हैं,तुमने पत्तों को छुआ था जड़ हिलाकर फेंक दीं।इस अहाते के अँधेरे में धुआँ-सा भर गया,तुमने जलती लकड़ियाँ शायद बुझाकर फेंक दीं।

Ep 567Jantar Mantar | Arunabh Saurabh
जंतर-मंतर | अरुणाभ सौरभ लाल - दीवारोंऔर झरोखे परसरसराते दिन मेंसीढ़ी-सीढ़ी नाप रहे होजंतर-मतर परबोल कबूतरमैंना बोली फुदक-फुदककरबड़ी जालिम है।जंतर-मंतरमॉँगन से कछू मिले ना हियाँबताओ किधर चले मियाँपूछ उठाकर भगी गिलहरीकौवा बोला काँव - काँवलोट चलो अब अपने गाँवटिट्ही बोलीं टीं.टीं.राजा मंत्री छी...छीघर - घर माँग रहे वोटऔर नए- पुराने नोटझरोखे से झाँकेइतिहास का कोनाजीना चढ़ि ऊँचे हुएचाँदी और सोनासूरज डूबन को तैयारताड पेड़ के दक्खिन पारपंछी नाचे अपनी तालजनता बनी विक्रम बैताल झाँक लेनालाल झरोरवाबोल देना गज़ब अनोखाबच्चे फांदे बने अनजानधरने पर बैठे पहलवान..

Ep 566Padhiye Gita | Raghuvir Sahay
पढ़िए गीता | रघुवीर सहायपढ़िए गीताबनिए सीताफिर इन सब में लगा पलीताकिसी मूर्ख की हो परिणीतानिज घर-बार बसाइएहोंय कैँटीलीआँखें गीलीलकड़ी सीली, तबियत ढीलीघर की सबसे बड़ी पतीलीभर कर भात पसाइए

Ep 565Saathi | Kedarnath Agarwal
साथी | केदारनाथ अग्रवालझूठ नहीं सच होगा साथी।गढ़ने को जो चाहे गढ़ लेमढ़ने को जो चाहे मढ़ लेशासन के सी रूप बदल लेराम बना रावण सा चल लेझूठ नहीं सच होगा साथी!करने को जो चाहे कर लेचलनी पर चढ़ सागर तर लेचिउँटी पर चढ़ चाँद पकड़ लेलड़ ले ऐटम बम से लड़ लेझूठ नहीं सच होगा साथी!

Ep 564Milna Tha Itefaaq Bichadna Naseeb Tha | Anjum Rehbar
मिलना था इत्तिफ़ाक़ बिछड़ना नसीब था | अंजुम रहबरमिलना था इत्तिफ़ाक़ बिछड़ना नसीब थावो उतनी दूर हो गया जितना क़रीब थामैं उस को देखने को तरसती ही रह गईजिस शख़्स की हथेली पे मेरा नसीब थाबस्ती के सारे लोग ही आतिश-परस्त थेघर जल रहा था और समुंदर क़रीब थामरियम कहाँ तलाश करे अपने ख़ून कोहर शख़्स के गले में निशान-ए-सलीब थादफ़ना दिया गया मुझे चाँदी की क़ब्र मेंमैं जिस को चाहती थी वो लड़का ग़रीब था

Ep 563Pooch Rahe Ho Kya Abhaav Hai | Shailendra
पूछ रहे हो क्या अभाव है | शैलेन्द्रपूछ रहे हो क्या अभाव हैतन है केवल, प्राण कहाँ है ?डूबा-डूबा सा अन्तर हैयह बिखरी-सी भाव लहर है,अस्फुट मेरे स्वर हैं लेकिनमेरे जीवन के गान कहाँ हैं?मेरी अभिलाषाएँ अनगिनपूरी होंगी ? यही है कठिन,जो ख़ुद ही पूरी हो जाएँ -ऐसे ये अरमान कहाँ हैं ?लाख परायों से परिचित है,मेल-मोहब्बत का अभिनय है,जिनके बिन जग सूना-सूनामन के वे मेहमान कहाँ हैं ?

Ep 562Raakh | Arun Kamal
राख | अरुण कमलशायद यह रुक जातासही साइत पर बोला गया शब्दसही वक्त पर कन्धे पर रखा हाथसही समय किसी मोड़ पर इंतज़ारशायद रुक जाती मौतओफ! बार बार लगता है मैंने जैसे उसे ठीक से पकड़ा नहींगिरा वह छूट कर मेरी गोद सेकिधर था मेरा ध्यान मैं कहाँ थाअचानक आता है अँधेराअचानक घास में फतिंगों की हलचलअचानक कोई फूल झड़ता हैऔर पकने लगता है फलमैंने वे सारे क्षण खो दियेवे अन्तिम साँस के क्षणअपनी साँस उसके होठों में भरने के क्षणभरी थीं सारी टंकियाँ जब वह एक घूँट पानी कोतड़पा इतनी हवा थी चारों ओरउस समय क्या कर रहा था मैंयाद करो तुम क्या कर रहे थे उस वक्तमुझे सोना नहीं था नहींमुझे अपनी पलकें अंकुशों से खींचे रखनी थींमैं चीख तो सकता था मैं रो तो सकता था ज़ोर सेमेरे तलवे काँपते तो भूकम्प सेजिसमें इतनी आग थीउसकी इतनी कम राख!

Ep 561Tumko Bhula Rahi Thi Ki Tum Yaad Aa Gaye | Anjum Rehbar
तुम को भुला रही थी कि तुम याद आ गए | अंजुम रहबरतुम को भुला रही थी कि तुम याद आ गएमैं ज़हर खा रही थी कि तुम याद आ गएकल मेरी एक प्यारी सहेली किताब मेंइक ख़त छुपा रही थी कि तुम याद आ गएउस वक़्त रात-रानी मिरे सूने सहन मेंख़ुशबू लुटा रही थी कि तुम याद आ गएईमान जानिए कि इसे कुफ़्र जानिएमैं सर झुका रही थी कि तुम याद आ गएकल शाम छत पे मीर-तक़ी-'मीर' की ग़ज़लमैं गुनगुना रही थी कि तुम याद आ गए'अंजुम' तुम्हारा शहर जिधर है उसी तरफ़इक रेल जा रही थी कि तुम याद आ गए

Ep 560Tumhari Jaati Kya Hai? | Kumar Ambuj
तुम्हारी जाति क्या है? | कुमार अंबुजतुम्हारी जाति क्या है कुमार अंबुज?तुम किस-किस के हाथ का खाना खा सकते होऔर पी सकते हो किसके हाथ का पानीचुनाव में देते हो किस समुदाय को वोटऑफ़िस में किस जाति से पुकारते हैं लोग तुम्हेंजन्मपत्री में लिखा है कौन सा गोत्र और कहां ब्याही जाती हैंतुम्हारे घर की बहन-बेटियांबताओ अपना धर्म और वंशावली के बारे मेंकिस मस्जिद किस मंदिर किस गुरुद्वारे में किस चर्च में करते हो तुम प्रार्थनाएंतुम्हारी नहीं तो अपने पिताअपने बच्चों की जाति बताओबताओ कुमार अंबुजइस बार दंगे में रहोगे किस तरफ़और मारे जाओगेकिसके हाथों?

Ep 559Ankur | Ibbar Rabbi
अँकुर | इब्बार रब्बीअँकुर जब सिर उठाता हैज़मीन की छत फोड़ गिराता हैवह जब अन्धेरे में अंगड़ाता हैमिट्टी का कलेजा फट जाता हैहरी छतरियों की तन जाती है कतारछापामारों के दस्ते सज जाते हैंपाँत के पाँतनई हो या पुरानीवह हर ज़मीन काटता हैहरा सिर हिलाता हैनन्हा धड़ तानता हैअँकुर आशा का रँग जमाता है।

Ep 558Bachcha | Ramdarash Mishra
बच्चा | रामदरश मिश्रा हम बच्चे से खेलते हैं।हम बच्चे की आँखों में झाँकते हैं।वह हमारी आँखों में झाँकता हैहमारी आँखों मेंउसकी आँखों की मासूम परछाइयाँ गिरती हैंऔर उसकी आँखों मेंहमारी आँखों के काँटेदार जंगल।उसकी आँखेंधीरे-धीरे काँटों का जंगल बनती चली जाती हैंऔर हम गर्व से कहते हैं-बच्चा बड़ा हो रहा है।

Ep 557Pita | Vinay Kumar Singh
पिता | विनय कुमार सिंह ख़ामोशी से सो रहे पिता कीफैली खुरदुरी हथेली को छूकर देखाउन हथेलियों की रेखाएं लगभग अदृश्य हो चली थीं फिर उन हथेलियों को देखते समय नज़र अपनी हथेली पर पड़ीऔर एहसास हुआ न जाने कब उन्होंने अपनी क़िस्मत की लकीरों को चुपचाप मेरी हथेली में रोप दिया था अपनी ओर से कुछ और जोड़कर

Ep 556Mann Ke Jheel Mein | Shashiprabha Tiwari
मन के झील में | शशिप्रभा तिवारीआज फिर तुम्हारे मन के झील की परिक्रमा कर रही हूं धीरे-धीरे यादों की पगडंडी पर गुज़रते हुए वह पीपल का पुराना पेड़ याद आया उसके छांव में बैठ कर मुझसे बहुत सी बातें तुम करते थे मेरे कानों में बहुत कुछ कह जाते जो नज़रें मिला कर नहीं कह पाते थे क्या करूं गोविन्द!बहुत रोकती हूंमन कहा नहीं मानता तुम द्वारका वासीमैं बरसाने में बैठीतुम्हें घड़ी-घड़ी सुमरती हूं।अनायास, बंशी की धुन गूंजने लगती है मेरे आस-पास मेरा रोम-रोम फिर, नाचने लगता है और मैं भी गुनगुनाने लगती हूं तुम प्रेम होतुम प्रीत होतुम मनमीत होमनमोहन, इसी प्रीत की रीत कोनिभाया है, मैंने और धीरे धीरे मन के झील में तुम्हें निहार कर अपने मिलन केनए सपने फिर संजोकर नयनों को मूंदकर खुद में तुम कोसमा लेती हूं और तुम्हारे भीतर मैं विलीन हो गईफिर, मैं मैं नहीं रही राधेश्याम बन गई।राधे राधे, श्याम।

Ep 555Laut ti Sabhyatayein | Anjana Tandon
लौटती सभ्यताएँ | अंजना टंडनविश्वास की गर्दन प्रायःलटकती है संदेह की कीलों पर,“कहीं कुछ तो है” का भाव दरअसलदिमाग की दबी आवाज़ हैजो अक्सर छोड़ देती हैप्रशंसा में भी कितनी खाली ध्वनियाँ,संदेह के कानआत्ममुग्धता की रूई से बंद हैआँखें ऊगी हैं पूरी देह पर औरखून में है दुनियावी अट्टाहास ,कंठ भर तंजदिल के मर्म को कभी जान नहीं पाएगा,मृत्यु बाद ही धुले थेबुल्लेशाह ,मीरा और अमृता के दाग, वैसे तो हर सभ्यता प्रेम से जन्मती हैविश्वास पर पनपती हैऔर संदेह की हवा में सांस तोड़ती है,पर भुक्तभोगी जानते हैं कि इतिहास झुठला कर इन दिनों उसके रक्तरंजित पदचिन्ह, उल्टे पाँव लौटने के सिम्त दर्ज हो रहे है।

Ep 554Tum Aurat Ho | Parul Chandra
तुम औरत हो | पारुल चंद्राक्योंकि किसी ने कहा है, कि बहुत बोलती हो,तो चुप हो जाना तुम उन सबके लिए...ख़ामोशियों से खेलना और अंधेरों में खो जाना, समेट लेना अपनी ख़्वाहिशें,और कैद हो जाना अपने ही जिस्म में…क्योंकि तुम तो तुम हो ही नहीं…क्योंकि तुम्हारा तो कोई वजूद नहीं...क्योंकि किसी के आने की उम्मीद पर आयी एक नाउम्मीदी हो तुम..बोझ समझी जाती हो, माथे के बल बढ़ाती हो..जो मानती हो ये सब सच, तो ख़ामोश हो जाओ,और जो जानती हो ख़ुद को, तो नज़र आओ,तो दिखाई दो, तो सुनाई दो, तो खिलखिलाओ, गुनगुनाओ,क्योंकि तुम कोई गलती नहीं,एक सच्चाई हो...तुम एक औरत हो…तुम तुम हो!

Ep 553Ishwar Tumhari Madad Chahta Hai | Vishwanath Prasad Tiwari
ईश्वर तुम्हारी मदद चाहता है | विश्वनाथ प्रसाद तिवारी बदल सकता है धरती का रंगबदल सकता है चट्टानों का रूपबदल सकती है नदियों की दिशाबदल सकती है मौसम की गतिईश्वर तुम्हारी मदद चाहता है।अकेले नहीं उठा सकता वहइतना सारा बोझ।

Ep 552Meri Beti | Ibbar Rabbi
मेरी बेटी | इब्बार रब्बीमेरी बेटी बनती हैमैडमबच्चों को डाँटती जो दीवार हैफूटे बरसाती मेज़ कुर्सी पलंग परनाक पर रख चश्मा सरकाती(जो वहाँ नहीं है)मोहनकुमारशैलेशसुप्रियाकनकको डाँटतीख़ामोश रहोचीख़तीडपटतीकमरे में चक्कर लगाती हैहाथ पीछे बांधेअकड़ करफ़्रॉक के कोने कोसाड़ी की तरह सम्हालतीकॉपियाँ जाँचतीवेरी पुअरगुडकभी वर्क हार्डके फूल बरसातीटेढ़े-मेढ़े साइन बनातीवह तरसती हैमाँ पिता और मास्टरनी बनने कोऔर मैं बच्चा बनना चाहता हूँबेटी की गोद में गुड्डे-साजहाँ कोई मास्टर न हो!

Ep 551Mukti | Kedarnath Singh
मुक्ति | केदारनाथ सिंहमुक्ति का जब कोई रास्ता नहीं मिलामैं लिखने बैठ गया हूँमैं लिखना चाहता हूँ 'पेड़'यह जानते हुए कि लिखना पेड़ हो जाना हैमैं लिखना चाहती हूँ ‘पानी’'आदमी' 'आदमी' मैं लिखना चाहता हूँएक बच्चे का हाथएक स्त्री का चेहरामैं पूरी ताक़त के साथशब्दों को फेंकना चाहता हूँ आदमी की तरफ़यह जानते हुए कि आदमी का कुछ नहीं होगामें भरी सड़क पर सुनना चाहता हूँ वह धमाकाजो शब्द और आदमी की टक्कर से पैदा होता हैयह जानते हुए कि लिखने से कुछ नहीं होगामैं लिखना चाहता हूँ

Ep 550Hum Laut Jayenge | Shashiprabha Tiwari
हम लौट जाएंगे | शशिप्रभा तिवारीकितने रात जागकर हमने तुमने मिलकर सपना बुना था कभी इस नीम की डाल पर बैठ कभी उस मंदिर कंगूरे पर बैठ कभी तालाब के किनारे बैठ कभी कुएं के जगत पर बैठ बहुत सी कहानियां मैं सुनाती थी तुम्हें ताकि उन कहानियों में से कुछ अलग कहानी तुम लिख सकोऔर अपनी तकदीर बदल डालोकितने रात जागकर हमने तुमने मिलकर सपना बुना था साथ तुम्हारे हम भी दुनिया के रंग देख पाते! लेकिन, परंतु, और बहुत से सवालव्यवस्था-व्यवसाय!यूं छूट गईं, उन दिवारों परनाहक, भाग्य बदलने कीकोशिश में तुम रोज पिसती रहीं होंगी,अपना दुख छिपातीं होंगी कितने रात जागकर हमने तुमने मिलकर सपना बुना था बंद दरवाज़े केपीछे का सचकौन जान सकता है?हम तो संसार में खाली हाथ आए थे और खाली हाथ ही लौट जाएंगे।उस नीम की डाल को न देखेंगे!न उस बसेरे कोन उस बस्ती कोउजड़े हुए, लोग बसाए घर के उजड़ने का दर्द भला क्या महसूस करेंगे?कितने रात जागकर हमने तुमने मिलकर सपना बुना था।

Ep 549Pehra | Archana Verma
पहरा | अर्चना वर्मा जहां आज बर्फ़ हैबहुत पहलेवहां एक नदी थीएक चेहरा है निर्विकारजमी हुई नदी.आंख, बर्फ़ में सुराख़द्वार के भीतरहै तो एक संसार मगरकैदहलचलों पर मुस्तैदमहज़ अंधेरा हैसख़्त और ख़ूँख़ार और गहरा है.पहरा है उस पर जोबर्फं की नसों में बहानदी ने जिसे जम कर सहा

Ep 548Bahut Pehle Se | Firaq Gorakhpuri
बहुत पहले से | फ़िराक़ गोरखपुरीबहुत पहले से उन क़दमों की आहट जान लेते हैंतुझे ऐ ज़िंदगी हम दूर से पहचान लेते हैंमिरी नज़रें भी ऐसे क़ातिलों का जान ओ ईमाँ हैंनिगाहें मिलते ही जो जान और ईमान लेते हैंजिसे कहती है दुनिया कामयाबी वाए नादानीउसे किन क़ीमतों पर कामयाब इंसान लेते हैं तबीअ'त अपनी घबराती है जब सुनसान रातों मेंहम ऐसे में तिरी यादों की चादर तान लेते हैंख़ुद अपना फ़ैसला भी इश्क़ में काफ़ी नहीं होताउसे भी कैसे कर गुज़रें जो दिल में ठान लेते हैं

Ep 547Samay Nahin Lagta Hain | Ajay Jugran
समय नहीं लगता है | अजेय जुगरानआज के कल हो जाने मेंकल के कभी नहीं होने मेंसमय नहीं लगता है।अक्सर इस छोटे से जीवन मेंअवसर को पाकर खोने मेंसमय नहीं लगता है।अनुकूल की प्रतीक्षा मेंप्रतिकूल के आ जाने मेंसमय नहीं लगता है।शुभ मुहूर्त का मंतव्य बनातेदृश्य गंतव्य अमूर्त होने मेंसमय नहीं लगता है।इस पल में ही सब बीज हैंइस पल में ही सब हल हैंआज में ही सब तीज हैंशुभमय यही समय हैसोकर इसे गवाँ देने मेंसमय नहीं लगता है।किंकर्तव्यमूढ़ से मूढ़ हो जाने मेंमुखर के गौण हो जाने मेंअगूढ़ के मौन हो जाने मेंप्रतिक्षित पल से छले जाने मेंसमय के असमय हो जाने मेंआज के कल हो जाने मेंकल के कभी नहीं होने मेंसमय नहीं लगता है।

Ep 546Hum Hain Tana Huma Hain Bana | Uday Prakash
हम हैं ताना, हम हैं बाना | उदय प्रकाश हम हैं ताना, हम हैं बाना।हमीं चदरिया, हमीं जुलाहा, हमीं गजी, हम थाना॥ हम हैं ताना''॥नाद हमीं, अनुनाद हमीं, निःशब्द हमीं गंभीरा,अंधकार हम, चाँद-सूरज हम, हम कान्हा, हम मीरा।हमीं अकेले, हमीं दु्केले, हम चुग्गा, हम दाना॥ हम हैं ताना'''॥मंदिर-महजिद, हम. गुरुद्वारा, हम मठ, हम बैरागीहमीं पुजारी, हमीं देवता, हम कीर्तन, हम रागी।आखत-रोली, अलख-भभूती, रूप धरें हम नाना॥ हम हैं ताना''॥मूल-फूल हम, रुत बादल हम, हम माटी, हम पानीहमीं जहूदी-शेख-बरहमन, हरिजन हम खिस्तानी।पीर-अघोरी, सिद्ध-औलिया, हमीं पेट, हम खाना॥ हम हैं ताना॥नाम-पता, ना ठौर-ठिकाना, जात-धरम ना कोईमुलक-खलक, राजा-परजा हम, हम बेलन, हम लोई।हमही दुलहा, हमीं बराती, हम फूँका, हम छाना॥ हम हैं ताना''॥

Ep 545Charitra | Tasleema Nasrin
चरित्र | तस्लीमा नसरीन तुम लड़की हो, यह अच्छी तरह याद रखना तुम जब घर की चौखट लाँघोगी लोग तुम्हें टेढ़ी नज़रों से देखेंगे तुम जब गली से होकर चलती रहोगी लोग तुम्हारा पीछा करेंगे, सीटी बजाएँगे तुम जब गली पार कर मुख्य सड़क पर पहुँचोगी लोग तुम्हें बदचलन कहकर गालियाँ देंगे तुम हो जाओगी बेमानी अगर पीछे लौटोगी वरना जैसे जा रही हो जाओ।

Ep 544Padhna Mere Pair | Jyoti Pandey
पढ़ना मेरे पैर | ज्योति पांडेयमैं गई जबकि मुझे नहीं जाना था। बार-बार, कई बार गई। कई एक मुहानों तक न चाहते हुए भी… मेरे पैर मुझसे असहमत हैं, नाराज़ भी। कल्पनाओं की इतनी यात्राएँ की हैं कि अगर कभी तुम देखो तो पाओगे कि कितने थके हैं ये पाँव! जंगल की मिट्टी, पहाड़ों की घास और समंदर की रेत से भरी हैं बिवाइयाँ। नाख़ूनों पर पुत गया है-हरा-नीला मटमैला सब रंग; कोई भी नेलकलर लगाऊँ दो दिन से ज़्यादा टिकता नहीं। तुमने कभी देखे हैं क्या सोच के ठिकाने? मेरे पाँव पूछते हैं मुझसे कब थमेगी तुम्हारी दौड़? मैं बता नहीं पाती, क्योंकि, जानती नहीं! तुम कभी मिलना इनसे एकांत में-जब मैं भी न होऊँ। ये सुनाएँगे तुम्हें कई वे क़िस्से और बातें जो शायद अब हम तुम कभी बैठकर न कर पाएँ! जब मैं न रहूँ तुम पढ़ना मेरे पैर, वहाँ मैं लिख जाऊँगी सारी वर्जनाओं की स्वीकृति; ठीक उसी क्षण मेरे पैर भी मेरे भार से मुक्त होंगे!

Ep 543Tinka Tinka Kaante Tode Sari Raat Kataai Ki | Gulzar
तिनका तिनका काँटे तोड़े सारी रात कटाई की | गुलज़ारतिनका तिनका काँटे तोड़े सारी रात कटाई कीक्यूँ इतनी लम्बी होती है चाँदनी रात जुदाई कीनींद में कोई अपने-आप से बातें करता रहता हैकाल-कुएँ में गूँजती है आवाज़ किसी सौदाई कीसीने में दिल की आहट जैसे कोई जासूस चलेहर साए का पीछा करना आदत है हरजाई कीआँखों और कानों में कुछ सन्नाटे से भर जाते हैंक्या तुम ने उड़ती देखी है रेत कभी तन्हाई कीतारों की रौशन फ़सलें और चाँद की एक दरांती थीसाहू ने गिरवी रख ली थी मेरी रात कटाई की

Ep 542Kare Jo Parvarish Vo Hi Khuda Hai | Ajay Agyat
करे जो परवरिश वो ही ख़ुदा है | अजय अज्ञातकरे जो परवरिश वो ही ख़ुदा है उसी का मर्तबा सब से बड़ा हैबुरे हालात में जो काम आएउसे पूजो वो सचमुच देवता हैधुआं फैला है हर सू नफरतों कामुहब्बत का परिंदा लापता हैन जाने हश्र क्या हो मंज़िलों कायहाँ अंधों की ज़द पे रास्ता हैअगर हो साधना निष्काम अपनीजहाँ ढूढ़ो वहीं मिलता ख़ुदा हैवहीं होती सदा सच्ची कमाईजहाँ भी नेकियों का क़ाफ़िला है

Ep 541Rath Daudte Hain Rangeen Phoolon Ke
रथ दौड़ते हैं रंगीन फूलों के | केदारनाथ अग्रवाल रंग नहींरथ दौड़ते हैं रंगीन फूलों केसांध्य गगन में।देखो-बस-देखो।रंग नहींध्वज फहरते हैं रंगीन स्वप्नों केसांध्य गगन में।झूमो-बस-झूमो!रंग नहींनट नाचते हैं रंगीन छंदों केसांध्य गगन में!नाचो-बस-नाचो!

Ep 540Jo Hawa Me Hai | Umashankar Tiwari
जो हवा में है | उमाशंकर तिवारीजो हवा में है,लहर में हैक्यों नहीं वह बात,मुझमें है?शाम कन्धों पर लिए अपनेज़िन्दगी के रू-ब-रू चलनारोशनी का हमसफ़र होनाउम्र की कन्दील का जलनाआग जोजलते सफ़र में हैक्यों नहींवह बात मुझमें है?रोज़ सूरज की तरह उगनाशिखर पर चढ़ना, उतर जानाघाटियों में रंग भर जानाफिर सुरंगों से गुज़र जानाजो हँसीकच्ची उमर में हैक्यों नहीं वह बातमुझमें है?एक नन्हीं जान चिडि़या काडा़ल से उड़कर हवा होनासात रंगों की लिए दुनियावापसी में नींद भर सोनाजो खुला आकाश स्वर में हैक्यों नहीं वह बातमुझमें है?

Ep 539Maine Kaha Baarish | Shahanshah Alam
मैंने कहा बारिश | शहंशाह आलम मैंने कहा बारिशउसने कहा प्रेममैंने कहा प्रेमउसने कहा पेड़मैंने कहा पेड़उसने कहा चिड़ियाँमैंने कहा चिड़ियाँउसने कहा जलकुंडमैंने कहा जलकुंडउसने कहा चंद्रमामैंने कहा चंद्रमाउसने कहा उदासीफिर मैंने कुछ नहीं कहादेखा बादल उसकी उदासी कोअपने पानी से धो रहा था।

Ep 538Dukh | Achal Vajpeyi
दुख / अचल वाजपेयीउसे जब पहली बार देखालगा जैसेभोर की धूप का गुनगुना टुकड़ाकमरे में प्रवेश कर गया हैअंधेरे बंद कमरे का कोना-कोनाउजास से भर गया हैएक बच्चा हैजो किलकारियाँ मारतामेरी गोद में आ गया हैएकांत में सैकड़ों गुलाब चिटख गए हैंकाँटों से गुँथे हुए गुलाबएक धुन है जो अंतहीन निविड़ मेंदूर तक गहरे उतरती हैमेरे चारों ओर उसनेएक रक्षा-कवच बुन दिया हैअब मैं तमाम हादसों के बीचसुरक्षित गुज़र सकता हूँ

Ep 537Khali Ghar | Chandrakanta
खाली घर | चंद्रकांता सब कुछ वही थासांगोपांगघर ,कमरे,कमरे की नक्काशीदार छतनदी पर मल्लाहों की इसरार भरी पुकार सडक पर हंगामों के बीच दौड़ते- भागते बेतरतीब हुजूम के हुजूम ! और आवाज़ों के कोलाज में खड़ा खाली घर!बोधिसत्व सा,निरुद्वेग,निर्पेक्ष समयसुन रहा था उसका बेआवाज़झुनझुने की तरह बजना!देख रहा थागोद में चिपटाए दादू के झाड़फ़ानूस पापा की कद्दावार चिथड़ा तस्वीर,इधर उल्टे -सीधे खिलौनों के छितरे ढेर!उधर ताखे पर धूल-मैल से बदरंग हुईबाँह भर चूड़ियाँ काल के गह्वर में गुम हुई अल्हड़ प्रेमिका की!अनन्त दूरियों और अगम्य विस्तारों मेंकाँप रहा है बियाबान !वक्त़ के मलबे में दबा इतिहास का करुण वर्तमान!कैसा अथक इंतज़ार? बाहर के कानफाडू शोर में ढूँढ रहा हैग़ायब होती भीतर कीशब्दातीत मौलिक ध्वनियाँ !

Ep 536Naye Din Ke Saath | Kedarnath Singh
नए दिन के साथ | केदारनाथ सिंह नए दिन के साथएक पन्ना खुल गया कोराहमारे प्यार कासुबह,इस पर कहीं अपना नाम तो लिख दोबहुत से मनहूस पन्नों मेंइसे भी कहीं रख दूंगा।और जब-जबहवा आकरउड़ा जाएगी अचानक बन्द पन्नों कोकहीं भीतरमोरपंखी की तरह रक्खे हुए उस नाम कोहर बार पढ़ लूगा।