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Pratidin Ek Kavita

Pratidin Ek Kavita

1,141 episodes — Page 16 of 23

Ep 393Khushamadeed | Gagan Gill

ख़ुशआमदीद | गगन गिल दोस्त के इंतज़ार मेंउसने सारा शहर घूमाशहर का सबसे सुंदर फूल देखाशहर की सबसे शांत सड़क सोचीएक क़िताब को छुआ धीरे-धीरेउसे देने के लिएकोई भी चीज़ उसेख़ुशआमदीद कहने के लिएकाफ़ी न थी !

Apr 28, 20241 min

Ep 392Tumhari Filon Mein Gaon Ka Mausam Gulabi Hai | Adam Gondvi

तुम्हारी फ़ाइलों में गाँव का मौसम गुलाबी है | अदम गोंडवी तुम्हारी फाइलों में गाँव का मौसम गुलाबी हैमगर ये आंकड़े झूठे हैं ये दावा किताबी हैउधर जम्हूरियत का ढोल पीटे जा रहे हैं वोइधर परदे के पीछे बर्बरीयत है ,नवाबी हैलगी है होड़ - सी देखो अमीरी औ गरीबी मेंये गांधीवाद के ढाँचे की बुनियादी खराबी हैतुम्हारी मेज़ चांदी की तुम्हारे जाम सोने केयहाँ जुम्मन के घर में आज भी फूटी रक़ाबी है

Apr 27, 20241 min

Ep 391Ab Kabhi Milna Nahi Hoga Aisa Tha | Vinod Kumar Shukla

अब कभी मिलना नहीं होगा ऎसा था | विनोद कुमार शुक्ल अब कभी मिलना नहीं होगा ऎसा थाऔर हम मिल गएदो बार ऎसा हुआपहले पन्द्रह बरस बाद मिलेफिर उसके आठ बरस बादजीवन इसी तरह काजैसे स्थगित मृत्यु हैजो उसी तरह बिछुड़ा देती है,जैसे मृत्युपाँच बरस बाद तीसरी बार यह हुआअबकी पड़ोस में वह रहने आईउसे तब न मेरा पता थान मुझे उसका।थोड़ा-सा शेष जीवन दोनों कापड़ोस में साथ रहने को बचा थापहले हम एक ही घर में रहते थे।

Apr 26, 20241 min

Ep 390Ummeed Ki Chithi | Neelam Bhatt

उम्मीद की चिट्ठी | नीलम भट्ट उदासी भरे हताश दिनों मेंकहीं दूर खुशियों भरे देस सेमेरी दहलीज़ तक पहुंचे कोई चिट्ठी उम्मीद की कलम से लिखीस्नेह भरे दिलासे से सराबोर...मौत की ख़बरों के बीचबीमारी की दहशत से डरे समय मेंजिंदगी की जीत का यक़ीन दिलातीबताती कि शक भरे माहौल मेंअपनेपन का भरोसा ज़िंदा है अभी!

Apr 25, 20241 min

Ep 389Cigarette Peeti Hui Aurat | Sarveshwar Dayal Saxena

सिगरेट पीती हुई औरत | सर्वेश्वर दयाल सक्सेनापहली बार सिगरेट पीती हुई औरत मुझे अच्छी लगी। क्योंकि वह प्यार की बातें नहीं कर रही थी। —चारों तरफ़ फैलता धुआँ मेरे भीतर धधकती आग के बुझने का गवाह नहीं था। उसकी आँखों में एक अदालत थी : एक काली चमक जैसे कोई वकील उसके भीतर जिरह कर रहा हो और उसे सवालों का अनुमान ही नहीं उनके जवाब भी मालूम हों। वस्तुतः वह नहा कर आई थी किसी समुद्र में, और मेरे पास इस तरह बैठी थी जैसे धूप में बैठी हो। उस समय धुएँ का छल्ला समुद्र-तट पर गड़े छाते की तरह खुला हुआ था— तृप्तिकर, सुखविभोर, संतुष्ट, उसको मुझमें खोलता और बचाता भी।

Apr 24, 20241 min

Ep 388Jiske Sammohan Mein Pagal Dharti Hai Aakash Bhi Hai | Adam Gondvi

जिसके सम्मोहन में पागल धरती है आकाश भी है | अदम गोंडवी | आरती जैनजिसके सम्मोहन में पागल धरती है, आकाश भी हैएक पहेली-सी दुनिया ये गल्प भी है, इतिहास भी हैचिंतन के सोपान पे चढ़कर चाँद-सितारे छू आयेलेकिन मन की गहराई में माटी की बू-बास भी हैमानवमन के द्वन्द्व को आख़िर किस साँचे में ढालोगे‘महारास’ की पृष्ठभूमि में ओशो का संन्यास भी हैइन्द्रधनुष के पुल से गुज़रकर इस बस्ती तक आए हैंजहाँ भूख की धूप सलोनी चंचल है, बिन्दास भी हैकंकरीट के इस जंगल में फूल खिले पर गंध नहींस्मृतियों की घाटी में यूँ कहने को मधुमास भी है

Apr 23, 20242 min

Ep 387Restaurant Mein Intezar | Rajesh Joshi

रेस्त्राँ में इंतज़ार | राजेश जोशी वो जिससे मिलने आई है अभी तक नहीं आया है वो बार बार अपना पर्स खोलती है और बंद करती है घड़ी देखती है और देखती है कि घड़ी चल रही है या नहीं एक अदृश्य दीवार उठ रही है उसके आसपास ऊब और बेचैनी के इस अदृश्य घेरे में वह अकेली है एकदम अकेली वेटर इस दीवार के बाहर खड़ा हैवेटर उसके सामने पहले ही एक गिलास पानी रख चुका है धीरे धीरे दो घूँट पानी पीती है और ठंडे गिलास को अपनी दुखती हुई आँखों पर लगाती है वो रेस्त्राँ के बाहर लगे पेड़ों के पार देखने की कोशिश करती है पेड़ जैसे पारदर्शी हों ! अदृश्य दीवार के बाहर खड़ा वेटर असमंजस में है आर्डर लेने जाए या नहींजीवन की न जाने कितनी आपाधापी के बीच से चुरा कर लाई थी वो इस समय को जो धीरे धीरे बीत रहा हैउसने अपनी कुर्सी को घुमा लिया है प्रवेश द्वार की ओर पीठ करके बैठ गई हैजैसे उम्मीद की ओरवो सुनती है कहीं अपने अंदर बहुत धीमी किसी चीज़ के दरकने की आवाज़ !

Apr 22, 20242 min

Ep 386Patang | Arti Jain

पतंग | आरती जैनहम कमरों की कैद से छूटछत पर पनाह लेते हैंजहाँ आज आसमां परदो नन्हे धब्बे एक दूसरे संग नाच रहे हैं"पतंग? यह पतंग का मौसम तो नहीं"नीचे एम्बुलैंस चीरती हैं सड़कों कोलाल आँखें लिए, विलाप करतीअपनी कर्कश थकी आवाज़ मेंदामन फैलायेनिरुत्तर सवाल पूछतीट्रेन में से झांकते हैं बुतों के चेहरेजिनके होठ नहीं पर आंखें बहुत सी हैंजो एकटक घूरतीखोज रही हैं कि दिख जाए कुछखौफ और हिम्मत के धुंधलके में"ऐसा धुआं तो नवंबर में होता है""हाँ, जब पराली जलती है"सन्नाटा जानता है कि ये पराली नहींधुएं की एक लकीरआसमान को घोंपने निकल पड़ी हैजहां दो पतंगें अब भीशरीर बच्चों सीएक दूसरे को चिढ़ा-चिढ़ा करखिलखिला रही हैं,"मौसम तो ये पतंग का भी नहीं"

Apr 21, 20242 min

Ep 385Yatra | Naresh Saxena

यात्रा | नरेश सक्सेना नदी के स्रोत पर मछलियाँ नहीं होतीं शंख–सीपी मूँगा-मोती कुछ नहीं होता नदी के स्रोत पर गंध तक नहीं होती सिर्फ़ होती है एक ताकत खींचती हुई नीचे जो शिलाओं पर छलाँगें लगाने पर विवश करती हैसब कुछ देती है यात्रा लेकिन जो देते हैं धूप-दीप और जय-जयकार देते हैं वही मैल और कालिख से भर देते हैंधुआँ-धुआँ होती है नदी बादल-बादल होती है नदी लौटती है फिर से उन्हीं निर्मल ऊँचाइयों की ओरलेकिन इस यात्रा में कोई भी नहीं देता साथ वे शिलाएँ भी नहीं जो साथ चलने की कोशिश में रेत हो गई थींवापसी की यात्रा में नदी होती है रंगहीन गंधहीन स्वादहीन।

Apr 20, 20242 min

Ep 384Prem Ke Liye Faansi | Anamika

प्रेम के लिए फाँसी | अनामिका मीरा रानी तुम तो फिर भी ख़ुशक़िस्मत थीं,तुम्हें ज़हर का प्याला जिसने भी भेजा,वह भाई तुम्हारा नहीं थाभाई भी भेज रहे हैं इन दिनोंज़हर के प्याले!कान्हा जी ज़हर से बचा भी लें,क़हर से बचाएँगे कैसे!दिल टूटने की दवामियाँ लुक़मान अली के पास भी तो नहीं होती!भाई ने जो भेजा होताप्याला ज़हर का,तुम भी मीराबाई डंके की चोट परहँसकर कैसे ज़ाहिर करतीं किसाथ तुम्हारे हुआ क्या!‘राणा जी ने भेजा विष का प्याला’कह पाना फिर भी आसान था‘भैया ने भेजा’—ये कहते हुएजीभ कटती!कि याद आते वे झूले जो उसने झुलाए थेबचपन में,स्मृतियाँ कशमकश मचातीं;ठगे से खड़े रहतेराह रोककरसामा-चकवा और बजरी-गोधन के सब गीत:‘राजा भैया चल ले अहेरिया,रानी बहिनी देली आसीस हो न,भैया के सिर सोहे पगड़ी,भौजी के सिर सेंदुर हो न…’हँसकर तुम यही सोचतीं-भैया को इस बारमेरा ही आखेट करने की सूझी?स्मृतियाँ उसके लिए क्या नहीं थीं?स्नेह, सम्पदा, धीरज-सहिष्णुताक्यों मेरे ही हिस्से आयीक्यों बाबा नेये उसके नाम नहीं लिखीं?

Apr 19, 20242 min

Ep 383Bhadka Rahe Hain Aag | Sahir Ludhianvi

भड़का रहे हैं आग | साहिर लुधियानवी भड़का रहे हैं आग लब-ए-नग़्मागर से हमख़ामोश क्या रहेंगे ज़माने के डर से हम।कुछ और बढ़ गए जो अँधेरे तो क्या हुआमायूस तो नहीं हैं तुलू-ए-सहर से हम।ले दे के अपने पास फ़क़त इक नज़र तो हैक्यूँ देखें ज़िंदगी को किसी की नज़र से हम।माना कि इस ज़मीं को न गुलज़ार कर सकेकुछ ख़ार कम तो कर गए गुज़रे जिधर से हम।

Apr 18, 20241 min

Ep 382Koi Bas Nahi Jaata | Nandkishore Acharya

कोई बस नहीं जाता | नंदकिशोर आचार्यकोई बस नहीं जाता खंडहरों में लोग देखने आते हैं बस । जला कर अलाव आसपास उग आये घास-फूस और बिखरी सूखी टहनियों का एक रात गुज़ारी भी किसी ने यहाँ सुबह दम छोड़ जाते हुए केवल राख ।खंडहर फिर भी उस का कृतज्ञ है बसेरा किया जिस ने उसे – रात भर की खातिर ही सही। उसे भला यह इल्म भी कब थाः गुज़रती है जो खंडहर पर फिर से खंडहर हो जाने में !

Apr 17, 20241 min

Ep 381Agar Tum Meri Jagah Hotey | Nirmala Putul

अगर तुम मेरी जगह होते | निर्मला पुतुल ज़रा सोचो, कितुम मेरी जगह होतेऔर मैं तुम्हारीतो, कैसा लगता तुम्हें?कैसा लगताअगर उस सुदूर पहाड़ की तलहटी मेंहोता तुम्हारा गाँवऔर रह रहे होते तुमघास-फूस की झोपड़ियों मेंगाय, बैल, बकरियों और मुर्गियों के साथऔर बुझने को आतुर ढिबरी की रोशनी मेंदेखना पड़ता भूख से बिलबिलाते बच्चों का चेहरातो, कैसा लगता तुम्हें?कैसा लगता?अगर तुम्हारी बेटियों को लाना पड़ताकोस-भर दूर से ढोकर झरनों से पानीऔर घर का चूल्हा जलाने के लिएतोड़ रहे होते पत्थरया बिछा रहे होते सड़क पर कोलतार, या फिरअपनी खटारा साइकिल परलकड़ियों का गट्टर लादेभाग रहे होते बाज़ार की ओर सुबह-सुबहनून-तेल के जोगाड़ में!कैसा लगता, अगर तुम्हारे बच्चेगाय, बैल, बकरियों के पीछे भागतेबगाली कर रहे होतेऔर तुम, देखते कंधे पर बैग लटकाएकिसी स्कूल जाते बच्चे को?ज़रा सोचो न, कैसा लगता?अगर तुम्हारी जगह मैं कुर्सी पर डटकर बैठीचाय सुड़क रही होती चार लोगों के बीचऔर तुम सामने हाथ बाँधे खड़ेअपनी बीमार भाषा में रिरिया रहे होतेकिसी काम के लिएबताओ न कैसा लगता?जब पीठ थपथपाते हाथअचानक माँपने लगते माँसलता की मात्राफ़ोटो खींचते, कैमरों के फ़ोकसहोंठो की पपड़ियों से बेख़बरकेंद्रित होते छाती के उभारों परसोचो, कि कुछ देर के लिए ही सोचो, पर सोचो,कि अगर किसी पंक्ति में तुमसबसे पीछे होतेऔर मैं सबसे आगे, और तो औरकैसा लगता, अगर तुम मेरी जगह काले होतेऔर चिपटी होती तुम्हारी नाकपाँवों में बिवाई होती?और इन सबके लिए कोई फब्ती कसलगाता ज़ोरदार ठहाकाबताओ न कैसा लगता तुम्हें...?कैसा लगता तुम्हें...

Apr 16, 20243 min

Ep 380Mann Bahut Sochta Hai | Agyeya

मन बहुत सोचता है | अज्ञेयमन बहुत सोचता है कि उदास न हो पर उदासी के बिना रहा कैसे जाए? शहर के दूर के तनाव-दबाव कोई सह भी ले, पर यह अपने ही रचे एकांत का दबाव सहा कैसे जाए! नील आकाश, तैरते-से मेघ के टुकड़े, खुली घास में दौड़ती मेघ-छायाएँ, पहाड़ी नदी : पारदर्श पानी, धूप-धुले तल के रंगारंग पत्थर, सब देख बहुत गहरे कहीं जो उठे, वह कहूँ भी तो सुनने को कोई पास न हो— इसी पर जो जी में उठे वह कहा कैसे जाए! मन बहुत सोचता है कि उदास न हो, न हो, पर उदासी के बिना रहा कैसे जाए!

Apr 15, 20241 min

Ep 379Bhutha Baag | Kedarnath Singh

भुतहा बाग़ | केदारनाथ सिंह उधर जाते हुए बचपन में डर लगता थाराही अक्सर बदल देते थे रास्ताऔर उत्तर के बजायनिकल जाते थे दक्खिन से अबकी गया तो देखाभुतहा बाग़ में खेल रहे थे बच्चेवहाँ बन गए थे कच्चे कुछ पक्के मकानदिखते थे दूर से कुछ बिजली के खंभे भी लोगों ने बतायाजिस दिन गाड़ा गया पहला खम्भाएक आवाज़-सी सुनाई पड़ी थीमिट्टी के नीचे से पर उसके बाद कभी कुछ नहीं सुनाई पड़ा।उनका अनुमान था कुछ भूत बह गए सन् सरसठ की बाढ़ में कुछ उड़ गए जेठ की पीली आँधी में जो बच गए चले गए शायद किसी शहर की ओरधन्धे की तलाश मेंबेचारे भूत!कितने ग़रीब थे वे कि रास्ते में मिल गएतो आदमी से माँगते थे सिर्फ़ चुटकी-भर सुर्तीया महज़ एक बीड़ीअब रहा नहीं बस्ती में कोई सुनसानकोई सन्नाटायहाँ तक कि नदी के किनारे कावह वीरान पीपल भी कट चुका है कब कासोचता हूँ - जब होते थे भूततो कम से कम इतना तो करते थेकि बचाए रखते थे हमारे लिए,कहीं कोई बावड़ीकहीं कोई झुरमुटकहीं निपट निरल्ले में एकदम अकेला कोई पेड़ छतनार!

Apr 14, 20242 min

Ep 378Aparibhashit | Ajay Jugran

अपरिभाषित | अजेय जुगरानबारह - तेरह के होते - होते कुछ बच्चेखो जाते हैं अपनी परिभाषा खोजते - खोजतेकिसी का मन अपने तन से नहीं मिलताकिसी का तन बचपन के अपने दोस्तों से।ये किशोर कट से जाते हैं आसपास सबसेऔर अपनी परिभाषा खोजने की ऊहापोह मेंअपने तन पर लिखने लगते हैंसुई काँटों टूटे शीशों सेएक घनघोर तनाव - अपवाद की भाषाजो आस्तीनों - मफ़लरों के नीचे से यदाकदा झलककभी - कहीं उनकी माँओं को आ ही जाती है नज़र।तब उनसे बंद कमरों में शुरू होती है ऐसी बातचीतजिसे बाहर दरवाज़े से कान लगा सुनसुन्न हो जाते हैं कई सहमे हुए बापऔर फिर वो रोने - कोसने लगते हैंअपने आप, अपनी क़िसमत, और परिभाषाओं को।ऐसे में अभिभावक अकसर भूल जाते हैंप्रकृति में शरीर रूप - रचनाओं की अनेकताऔर ठहराने लगते हैं ज़िम्मेदार एक दूसरे को।अफसोस इस सारी कटु क़वायद के केंद्र में“लोग क्या कहेंगे” से डरा अस्वीकार होता हैकोई अपरिभाष्य किशोर नहीं।इस कारण सुलझती नहीं ये पहेलीबस असुलझी सुलगती रहती हैधुएँ के एक काले बादल नीचेऔर अफसोस फिर मिलतीं हैंनस कटी, रेल के पहियों तले और पंखों पर लटकींलाशें कई अपरिभाषित - अर्धनारीश्वरीय संतानों कीजो सरल स्वीकार से जी सकतीं थीं होकर परिभाषित।

Apr 13, 20242 min

Ep 377Haath Thaamna | Tanmay Pathak

हाथ थामना | तन्मय पाठक तुम समंदर से बेशक़ सीखनागिरना उठना परवाह ना करनापर तालाब से भी सीखते रहनाकुछ पहर ठहर कर रहनातुम नदियों से बेशक़ सीखनाअपनी राह पकड़ कर चलनासंगम से भी पर सीखते रहनाबाँहें खोल कर मिलना घुलनातुम याद रखना कि डूबना भी उतना ही ज़रूरी हैजितना कि तैरनातुम डूबने उतरना दरिया मेंबचपने पर भरोसा करनाबच पाने की उम्मीद रखनाये बताने के लिए बचनाकि अंतिम क्षणों में कुछ थातो सिर्फ़ तिनका-तिनका साँसेंबिखरे-बिखरे लम्हेऔर एक हाथ की चाहतये बताने के लिए बचना कि बुनियादी तौर परहाथ थामनाआगे बढ़ने से कहीं ज़्यादा खूबसूरत होता है

Apr 12, 20242 min

Ep 376Hitler Ki Chitrakala | Rajesh Joshi

हिटलर की चित्रकला | राजेश जोशीयह उम्मीस सौ आठ में उन दिनों की बात हैजब हिटलर ने पेन्सिल से एक शांत गाँव काचित्र बनाया थायह सन्‌ उन्‍नीस सौ आठ में उन दिनों की बात हैजब दूसरी बार वियना की कला दीर्धा नेचित्रकला के लिए अयोग्य ठहरा दिया थाहिटलर कोउस छोटे से चित्र पर हिटलर के हस्ताक्षर थेइसलिए इंगलैण्ड के एक व्यवसायी ने जबनीलाम किया उस चित्र कोजिसका आकार सिर्फ़ एक पोस्टकार्ड के बराबर थाऔर जो पेन्सिल से बनाया गया थातो बिका वो पूरे सात हज़ार ब्रिटिश पौण्ड में।क्या यह उस साधारण से चित्र की कीमत थीक्या यह हिटलर के हस्ताक्षर की कीमत थीजो किये गये थे उस चित्र के एक कोने परयह कीमत क्या उस बर्बर युद्ध ने पैदा कीजिसमें नहीं बचा कोई भी गाँव वैसाजैसा उस चित्र में थाया जैसा रहा होगा कोई भी गाँव उस चित्र से पहले वियना की कला दीर्घा के फ़ैसले कोसही सिद्ध किया हिटलर नेअपने सारे जीवन में

Apr 11, 20242 min

Ep 375Nadi Kabhi Nahi Sookhti | Damodar Khadse

नदी कभी नहीं सूखती | दामोदर खड़से पौ फटने से पहलेसारी बस्ती हीगागर भर-भरकरअपनी प्यासबुझाती रहीफिर भीनदी कुँवारी ही रहीक्योंकि,नदी कभी नहीं सूखती नदी, इस बस्ती की पूर्वज है!पीढ़ियों के पुरखेइसी नदी मेंडुबकियाँ लगाकरअपना यौवनजगाते रहेसूर्योदय से पहलेसतह पर उभरे कोहरे मेंअंजुरी भर अनिष्ट अँधेरानदी में बहाते रहेहर शामबस्ती की स्त्रियाँअपनी मन्नतों के दीयेइसी नदी में सिराती रहींनदी बड़ी रोमांचित, बड़ी गर्वीली होअपने भीतरसब कुछ समेट लेतीहरियाली भरेउसके किनारेउगाते रहे निरंतर वरदान कभी-कभी असमय छितराए प्राणों के,फूलों के स्पर्शनदी को भावुक कर जाते पर नदी बहती रहीउसकी आत्मा हमेशा ही धरती रहीबस्ती के हर छोर कोनदी का प्यार मिलता रहा सुख-दुख की गवाह रही नदी...कुछ दिनों से बस्ती मेंआस्थाओं और विश्वासों परबहस जारी हैकभी-कभी नदीचारों ओर से अकेली हो जाती हैनदी को हर शामइंतजार रहता दीपों काकोई कहतानदी सूख रही हैभीतर सेसुनकर यहपिघलता है हिमालयऔर नदी मेंबाढ़ आ जाती है फिरउसकी बूँदें नर्तनऔर उसका संगीतबहाव पा जाता हैकिनारे गीत गाते हैंगागर भर-भर ले जाती हैं बस्तियाँ नदी कभी नहीं सूखती!

Apr 10, 20243 min

Ep 374Din Dooba | Ramdarash Mishra

दिन डूबा | रामदरश मिश्रा दिन डूबा अब घर जाएँगेकैसा आया समय कि साँझेहोने लगे बन्द दरवाज़े देर हुई तो घर वाले भीहमें देखकर डर जाएँगेआँखें आँखों से छिपती हैं नज़रों में छुरियाँ दिपती हैंहँसी देख कर हँसी सहमतीक्या सब गीत बिखर जाएँगे? गली-गली औ' कूचे-कूचे भटक रहा पर राह ने पूछेकाँप गया वह, किसने पूछा- “सुनिए आप किधर जाएँगे?"

Apr 9, 20241 min

Ep 373Thithurtey Lamp Post | Adnan Kafeel Darvesh

ठिठुरते लैंप पोस्ट | अदनान कफ़ील दरवेशवे चाहते तो सीधे भी खड़े रह सकते थे लेकिन आदमियों की बस्ती में रहते हुए उन्होंने सीख ली थी अतिशय विनम्रता और झुक गए थे सड़कों पर आदमियों के पास, उन्हें देखने के अलग-अलग नज़रिए थे : मसलन, किसी को वे लगते थे बिल्कुल संत सरीखे दृढ़ और एक टाँग पर योग-मुद्रा में खड़े किसी को वे शहंशाह के इस्तक़बाल में क़तारबंद खड़े सिपाहियों-से लगते थे किसी को विशाल पक्षियों से जो लंबी उड़ान के बाद थक कर सुस्ता रहे थे लेकिन एक बच्चे को वे लगते थे उस बुढ़िया से जिसकी अठन्नी गिर कर खो गई थी; जिसे वह ढूँढ़ रही थी जबकि किसी को वे सड़क के दिल में धँसी सलीब की तरह लगते थे आदमियों की दुनिया में वे रहस्य की तरह थे वे काली ख़ूनी रातों के गवाह थे शराबियों की मोटी पेशाब की धार और उल्टियों के भी जिस दिन हमारे भीतर लगातार चलती रही रेत की आँधी जिसमें बनते और मिटते रहे कई धूसर शहर उस रोज़ मैंने देखा ख़ौफ़नाक चीख़ती सड़कों पर झुके हुए थे बुझे हुए ठिठुरते लैंप पोस्ट…

Apr 8, 20242 min

Ep 372Khud Se | Renu Kashyap

ख़ुद से | रेणु कश्यपगिरो कितनी भी बार मगर उठो तो यूँ उठो कि पंख पहले से लंबे हों और उड़ान न सिर्फ़ ऊँची पर गहरी भी हारना और डरना रहे बस हिस्सा भर एक लंबी उम्र का और उम्मीद और भरपूर मोहब्बत हों परिभाषाएँ जागो तो सुबह शाँत हो ठीक जैसे मन भी हो कि ख़ुद को देखो तो चूमो माथा गले लगो ख़ुद से चिपककर कि कब से कितने वक़्त से, सदियों से बल्कि उधार चल रहा है अपने आपका प्यार का जब हो ज़िक्र तो सबसे पहला नाम ख़ुद का याद आए दुख का हो तो जैसे किसी भूली भटकी चीज़ का माँ का हो ज़िक्र तो बस चेहरे का चूमना याद आए बेतहाशा, एक साँस में बीसों बार ग़लतियों और माफ़ियों को भूल जाएँ ठीक वैसे ही जैसे लिखकर मिटाया हो कोई शब्द या लकीर।

Apr 7, 20242 min

Ep 371Mera Mobile Number Delete Kar Dein Please | Uday Prakash

मेरा मोबाइल नम्बर डिलीट कर दें प्लीज़ - उदय प्रकाशसबसे पहले सिर्फ़ आवाज़ थीकोई नाद थाऔर उसके सिवा कुछ भी नहींउसी आवाज़ से पैदा हुआ था ब्रह्माण्डआवाज़ जब गायब होती हैतो कायनात किसी सननाटे में डूब जाती हैजब आप फ़ोन करते हैंक्या पता चलता नहीं आपकोकि सननाटे के महासागर में डूबेकिसी बहुत प्राचीन अभागे जहाज कोआप पुकार रहे हैं? मेरा मोबाइल नम्बर डिलीट कर दें प्लीज़

Apr 6, 20241 min

Ep 370Prem Me Prem Ki Ummeed | Mamta Barhath

प्रेम में प्रेम की उम्मीद | ममता बारहठजीवन से बचाकर ले जाऊँगी देखना प्रेम के कुछ क़तरे मुट्ठियों में भींचकर प्रेम की ये कुछ बूँदें जो बची रह जाएँगी छाया से मृत्यु की बनेंगी समंदर और आसमान मिट्टी और हवा यही बनेंगी पहाड़ और जंगल और स्वप्न नए देखना तुम यह बचा हुआ प्रेम ही बनेगा फिर नया जन्म मेरा!

Apr 5, 20241 min

Ep 369Duniya Me Acche Logon Ki Kami Nahi Hai | Vinod Kumar Shukla

दुनिया में अच्छे लोगों की कमी नहीं है | विनोद कुमार शुक्ल दुनिया में अच्छे लोगों की कमी नहीं है कहकर मैं अपने घर से चला। यहाँ पहुँचते तक जगह-जगह मैंने यही कहा और यही कहता हूँ कि दुनिया में अच्छे लोगों की कमी नहीं है। जहाँ पहुँचता हूँ वहाँ से चला जाता हूँ। दुनिया में अच्छे लोगों की कमी नहीं है— बार-बार यही कह रहा हूँ और कितना समय बीत गया है लौटकर मैं घर नहीं घर-घर पहुँचना चाहता हूँ और चला जाता हूँ।

Apr 4, 20241 min

Ep 368Stree Ko Samajhne Ke Liye | Vishwanath Prasad Tiwari

स्त्री को समझने के लिए - विश्वनाथ प्रसाद तिवारी कैसे उतरता है स्तनों में दूध कैसे झनकते हैं ममता के तारकैसे मरती हैं कामनाएँकैसे झरती हैं दंतकथाएंकैसे टूटता है गुड़ियों का घरकैसे बसता है चूड़ियों का नगरकैसे चमकते हैं परियों के सपने...कैसे फड़कते हैं हिंस्र पशुओं के नथुनेकितना गाढ़ा लांछन का रंगकितनी लम्बी चूल्हे की सुरंग कितना गाढ़ा सृजन का अंधकारकितनी रहस्यमय मौन की पुकारस्त्री, तुम्हे समझने के लिएजन्म लेना पड़ेगा स्त्री-रूप में

Apr 3, 20241 min

Ep 367Keerti ka Vihan Hun | Kanhaiya Lal Pandya 'Suman'

कीर्ति का विहान हूँ | स्व. कन्हैया लाल पण्ड्या ‘सुमन’मैं स्वतंत्र राष्ट्र की कीर्ति का विहान हूँ।काल ने कहा रुकोशक्ति ने कहा झुकोपाँव ने कहा थकोकिन्तु मैं न रुक सका, न झुक सका, न थक सकाक्योंकि मैं प्रकृति प्रबोध का सतत् प्रमाण हूँकीर्ति का विहान हूँ।भीत ने कहा डरोज्वाल ने कहा जरोमृत्यु ने कहा मरोकिन्तु मैं न डर सका, न जर सका, न मर सकाक्योंकि राष्ट्र भाग्य-व्योम का ज्वलंत प्राण हूँकीर्ति का विहान हूँ।ले नवीन साधनाले नवीन कामनाले नवीन भावनानाश से न मैं फिरा, न मैं गिरा, न मैं डराक्योंकि मैं सृजन नवीन का अजर निशान हूँकीर्ति का विहान हूँ।मैं नया तूफ़ान हूँमैं नया वितान हूँमैं नया विधान हूँदेश के सौभाग्य का भूत-वर्त-भावी हूँराष्ट्र के सघन तिमिर के नाश में प्रधान हूँकीर्ति का विहान हूँ।मैं नया विकास हूँमैं नया प्रकाश हूँमैं नवीन आश हूँमैं नवीन दृश्य हूँ, भविष्य हूँ, मनुष्य हूँक्योंकि मैं क्षितिज अनन्त सा नया वितान हूँकीर्ति का विहान हूँ।मैं स्वतंत्र राष्ट्र की कीर्ति का विहान हूँ।

Apr 2, 20242 min

Ep 366Tay To Yehi Hua Tha | Sharad Bilore

तय तो यही हुआ था - शरद बिलाैरेसबसे पहले बायाँ हाथ कटा फिर दोनों पैर लहूलुहान होते हुए टुकड़ों में कटते चले गए ख़ून दर्द के धक्के खा-खा कर नशों से बाहर निकल आया था तय तो यही हुआ था कि मैं कबूतर की तौल के बराबर अपने शरीर का मांस काट कर बाज़ को सौंप दूँ और वह कबूतर को छोड़ दे सचमुच बड़ा असहनीय दर्द था शरीर का एक बड़ा हिस्सा तराज़ू पर था और कबूतर वाला पलड़ा फिर नीचे था हार कर मैं समूचा ही तराज़ू पर चढ़ गया आसमान से फूल नहीं बरसे कबूतर ने कोई दूसरा रूप नहीं लिया और मैंने देखा बाज़ की दाढ़ में आदमी का ख़ून लग चुका है।

Apr 1, 20241 min

Ep 365Pagdandiyan | Madan Kashyap

पगडण्डियाँ - मदन कश्यप हम नहीं जानते उन उन जगहों कोवहाँ-वहाँ हमें ले जाती हैं पगडण्डियाँजहाँ-जहाँ जाती हैं पगडण्डियाँकभी खुले मैदान मेंतो कभी सघन झाड़ियों में कभी घाटियों में तो कभी पहाड़ियों में जाने कहाँ-कहाँ ले जाती हैं पगडण्डियोंराजमार्गों की तरहपगडण्डियों का कोई बजट नहीं होता कोई योजना नहीं बनतीबस बथान से बगान तकमेड़ से मचान तकखेत से खलिहान तकऔर टोले से सिवान तक चक्कर लगाने वाले कामकाजी पाँव बनाते हैं पगडण्डियाँथकी हुई नींद की तरह सपाट होती हैं पगडण्डियाँ जिन पर सपनों की तरह उगे होते हैं पाँव के निशानसपनों काजो कभी कीचड़ से गीले होकर संकल्पों के पाँव से चिपक जाते हैं तो कभी धूल से हल्के होकर इधर-उधर बिखर जाते हैं बड़ा अटूट रिश्ता है पगडण्डियों सेसिर्फ पाँव ही नहीं सपने भी बनाती हैं पगडण्डियाँपूरे गाँव की जिजीविषा के पाँव पूरे गाँव का गाँव की तरह ज़िन्दा रहने का सपनापगडण्डियों पर गाड़ियाँ नहीं चलतीं फौजी झण्डा-परेड नहीं होती टैंकों की गड़गड़ाहट भी सुनायी नहीं देती पगडण्डियों पर चलते हैं गाँवचलते हैंखेतों से धान के बोझे और हरे चारे लाने वाले किसान नमक-हल्दी के लिए हाट जाने वाली कलकतियों की औरतें जलावन के लिए बगीचों से सूखे पत्ते चुनकर लाने वाले बच्चेअपनी मिहनत सेकिसान, औरतें और बच्चे इतिहास के साथ-साथ पगडण्डियाँ बनाते हैं और जब कभी पगडण्डियों को छोड़ राजमार्गों पर निकल आते हैं इतिहास बदल जाता है!

Mar 31, 20243 min

Ep 364Ghar | Agyeya

घर | अज्ञेयमेरा घर दो दरवाज़ों को जोड़ता एक घेरा है मेरा घर दो दरवाज़ों के बीच है उसमें किधर से भी झाँको तुम दरवाज़े से बाहर देख रहे होंगे तुम्हें पार का दृश्य दिख जाएगा घर नहीं दिखेगा। मैं ही मेरा घर हूँ।मेरे घर में कोई नहीं रहता मैं भी क्या मेरे घर में रहता हूँ मेरे घर में जिधर से भी झाँको...

Mar 30, 20241 min

Ep 363Abhuwata Samaj | Rupam Mishra

अभुवाता समाज | रूपम मिश्र वे शीशे-बासे से नहीं हरी कनई मिट्टी से बनी थींजिसमें इतनी नमी थी कि एक सत्ता की चाक पर मनचाहा ढाल दिया जातानाचती हुई एक स्त्री को अचानक कुछ याद आ जाता हैसहम कर खड़ी हो जाती है माथे के पल्‍्लू को और खींच करदर्द को दबा कर एक भरभराई-सी हँसी हँसती हैहमार मालिक बहुत रिसिकट हैंहमरा नाचना उनका नाहीं नीक लगतासाथ पुराती दूसरी स्त्री भी चुप हो जातीये वही आखी-पाखी लड़कियाँ थीं जिनके दुख धरती की तरह थेउसी की तरह नाच कर कुछ पल के लिए खुद को भूल जाना चाहती थींहालाँकि इनके नाचने से बहार नहीं लौटतीऔर बज़ झूरे में बादल भी घुमड़ कर नहीं बरसे कभीये रोतीं तो पवित्र ओस से धरती भीग जातीछनछना कर पैर पटकरतीं तो अड़्हुल कनेर चटक कर खिल जातेपर अब ये डरती हिरनियाँ हैंजो कुलाँचे के लिए तरसती हैंये क्यों डरती हैं, बेहद डरती हैं किसी अपराध से नहीं कभी किसी ब्याह, छठ बरही में डर भूलकर ये नाच उठती हैंबम्बई में बैठा पति खूब गाली देता है डेहरजाई पतुरिया की बेटी है बिना नाचे नहीं रहा जाताफिर भी मोरनियाँ थीं जब भी कोई ननद जेठानी हुलस कर कहतीफलाने बहू बाजे पर तोहार नाच देखे बहुत दिन हो गयाफलाने बहू खुद को रोक नहीं पातीं हाझमक कर नाच उठतींगाँव का कोई मनचला देवर फलाने को फोन करताभौजी बाजे पर गजब नाचती हैं हंस कर कहताफलाने अगिया-बैताल हो जातेलौटने पर नचनिया की बेटी को खूब कूटने का वादा करते'फलानेबहू की बूढ़ी माँ के साथ उनके पिता की जगहखुद के सोने का फरमान जारी करतेसाथ में सात साल की बिटिया को संस्कार देने का आदेश देतेएक अभुआता समाज कायनात की सारी बुलबुलों की गर्दन मरोड़ रहा है...!

Mar 29, 20243 min

Ep 362Hum Auratein hain Mukhautey Nahi | Anupam Singh

हम औरतें हैं मुखौटे नहीं - अनुपम सिंहवह अपनी भट्ठियों में मुखौटे तैयार करता है उन पर लेबुल लगाकर सूखने के लिए लग्गियों के सहारे टाँग देता है सूखने के बाद उनको अनेक रासायनिक क्रियाओं से गुज़ारता है कभी सबसे तेज़ तापमान पर रखता है तो कभी सबसे कम ऐसा लगातार करने से अप्रत्याशित चमक आ जाती है उनमें विस्फोटक हथियारों से लैस उनके सिपाही घर-घर घूम रहे हैं कभी दृश्य तो कभी अदृश्य घरों से घसीटते हुए उनको अपनी प्रयोगशालाओं की ओर ले जा रहे हैं वे चीख़ रही हैं... पेट के बल चिल्ला रही हैं फिर भी वे ले जाई जा रही हैं उनके चेहरों की नाप लेते ख़ुश हैं वे कह रहे हैं आपस में कि अच्छा हुआ दिमाग़ नहीं बढ़ा इनका चेहरे लंबे-गोल, छोटे-बड़े हैं लेकिन वे चाहते हैं सभी चेहरे एक जैसे हों एक साथ मुस्कुराएँ और सिर्फ़ मुस्कुराएँ तो उन्होंने अपनी धारदार आरी से उनके चेहरों को सुडौल एक आकार का बनाया अब वे मुखौटों को चेहरों पर ठोंक रहे हैं... वे चिल्ला रही हैं हम औरतें हैं! सिर्फ़ मुखौटे नहीं! वे ठोंके ही जा रहे हैं ठक-ठक लगातार... अब वे सुडौल चेहरों वाली औरतें उनकी भट्ठियों से निकली प्रयोगशालाओं में शोधित आकृतियाँ हैं।

Mar 28, 20242 min

Ep 361Krantipurush | Chitra Pawar

क्रांतिपुरुष | चित्रा पँवार कल रात सपने के बगीचे में हवाखोरी करतेभगत सिंह से मुलाकात हो गईमैंने पूछा शहीव-ए-आज़म!तुम क्रांतिकारी ना होते तो क्‍या होते?वह ठहाका मारकर हँसेफिर भी क्रांतिकारी ही होता पगली !खेतों में धान त्रगाताहल चलाता और भूख के विरुद्ध कर देता क्रांतिमगर सोचो अगर खेत भी ना होते तुम्हारे पास!तब क्‍या करते!!फिर,,ऐसे में कल्रम उठातानिर्धन, मजबूर के हक़ हिस्से की मांग करतारच देता कोई क्रांति गीत जमींदारों, मील मालिकों, सरकारों के जुल्मों के खिलाफमतलब कलम पाकर भी क्रान्तिकारी ही रहते?हा हा हा बिलकुल!जरा सोचो जब निर्धन की पक्षधर होने के जुर्म मेंछीन ली जाती तुम्हारी कलमतब क्या करते क्रांतिकारी जी!तब,, तब तो एक ही मार्ग शेष बचता मेरे पासमैं क्रांतिपुरुषसभी क्रांतियों की मां यानी प्रेम की शरण में बैठबन जाता तुम्हारे जैसी किसी पागल लड़की का प्रेमीतथा प्रेम को पृथ्वी का एकमात्र धर्म, एकमात्र जाति,एकमात्र वर्ग घोषित करने के पक्ष में छेड़ देता क्रान्ति...

Mar 27, 20242 min

Ep 360Sheetleheri Mein Ek Boodhe Aadmi Ki Prathna | Kedarnath Singh

शीतलहरी में एक बूढ़े आदमी की प्रार्थना | केदारनाथ सिंहईश्वरइस भयानक ठंड में जहाँ पेड़ के पत्ते तक ठिठुर रहे हैं मुझे कहाँ मिलेगा वह कोयला जिस पर इन्सानियत का खून गरमाया जाता है एक ज़िन्दा लाल दहकता हुआ कोयला मेरी अँगीठी के लिए बेहद ज़रूरी और हमदर्द कोयला मुझे कहाँ मिलेगा इस ठंड से अकड़े हुए शहर में जहाँ वह हमेशा छिपाकर रखा जाता है घर के पिछवाड़े या ग़ुसलख़ाने की बग़ल में हथेलियों की रगड़ में दबा रहता है जो जो इरादों में होता है जो यकायक सुलग उठता है याददाश्त की हदों पर पस्ती के दिनों में मुझे कहाँ मिलेगा वह कोयला मेरे ईश्वर! मुझे क्या करना चाहिए इस दिन काजिसमें कोयला नहीं है मुझे क्या करना चाहिए इस ठंड का जो बराबर बढ़ती जा रही है क्या मैं भी इन्तज़ार करूँ ​​जैसे सब कर रहे हैंक्या मैं उदूँ और अपने-आपको बदल लूँएक कोयला झोंकनेवाले बेलचे मेंक्या मैं बाज़ार जाऊँऔर अपनी आत्मा के लिए ख़रीद लूँएक अच्छा-सा कनटोप?मेरे ईश्वर!क्या मेरे लिए इतना भी नहीं कर सकतेकि इस ठंड से अकड़े हुए शहर को बदल दोएक जलती हुई बोरसी में!बोरसी = अंगीठी ; मिट्टी का बरतन जिसमें आग रखकर जलाते हैं

Mar 26, 20242 min

Ep 359Tum Apne Rang Me Rang Lo To Holi Hai | Harivansh Rai Bachchan

तुम अपने रँग में रँग लो तो होली है | हरिवंशराय बच्चनतुम अपने रँग में रँग लो तो होली है।देखी मैंने बहुत दिनों तकदुनिया की रंगीनी,किंतु रही कोरी की कोरीमेरी चादर झीनी,तन के तार छूए बहुतों नेमन का तार न भीगा,तुम अपने रँग में रँग लो तो होली है।अंबर ने ओढ़ी है तन परचादर नीली-नीली,हरित धरित्री के आँगन मेंसरसों पीली-पीली,सिंदूरी मंजरियों से हैअंबा शीश सजाए,रोलीमय संध्या ऊषा की चोली है।तुम अपने रँग में रँग लो तो होली है।

Mar 25, 20241 min

Ep 358Dharti ka Shaap | Anupam Singh

धरती का शाप | अनुपम सिंहमौत की ओर अग्रसर है धरती मुड़-मुड़कर देख रही है पीछे की ओर उसकी आँखें खोज रही हैं आदिम पुरखिनों के पद-चिह्न उन सखियों को खोज रही हैं जिनके साथ बड़ी होती फैली थी गंगा के मैदानों तकउसकी यादों में घुल रही हैं मलयानिल की हवाएँ जबकि नदियाँ मृत पड़ी हैं उसकी राहों में नदियों के कंकाल बटोरती मौत की ओर अग्रसर है धरतीवह ले जा रही है अपने बचे खुचे पहाड़ अपने बटुए में रख लिये जंगल और घास के मैदान अपनी बची हुई सारी चिड़ियाएँ उड़ा रही है तुम्हारे बन्द पिंजड़े सेझील-झरना-ताल-तलैया—सब रख लिया है अपने लोटे में पेड़ों को कंधे पर रखअपना सारा बीज बटोर मौत की ओर अग्रसर है धरतीगरीबचंद की बेटियाँ झुकी हुई हैं निवेदन में उसे रोकती, बुहार रही हैं उसकी राह जबकि उसके महान पुत्र उसके तारनहार अब भी चिमटे हैं उसकी छाती सेयदि अन्तिम क्षण भावुक नहीं हुई वह जैसे माँएँ होती हैं तो माफ़ नहीं करेगी पलटकर शाप देगी धरती।

Mar 24, 20242 min

Ep 357Peet Kamal | Nandkishore Acharya

पीत कमल | नन्दकिशोर आचार्य जल ही जल की नीली-दर-नीली गहराई के नीचे जमे हुए काले दलदल ही दलदल में अपनी ही पूँछ पर सर टिका कर सो रहा था वह : उचटा अचानक भूला हुआ कुछ कहीं जैसे सुगबुगाने लगे।कुछ देर उन्मन, याद करता-सा उसी बिसरी राग की धुन जल के दबावों में कहीं घुटती हुईएक-एक कर लगीं खुलने सलवटें सारीतरंग-सी व्याप गयी जल में : अपनी ही पूँछ के बल खड़ा झूमता था वह फण खिला था राग की मानिन्द ।ऊपर जल की नीली गहराई में से फूट-फूट आते थेपीत कमल !

Mar 23, 20242 min

Ep 356Unka Jeevan | Anupam Singh

उनका जीवन | अनुपम सिंह ख़ाली कनस्तर-सा उदास दिन बीतता ही नहीं रात रज़ाइयों में चीख़ती हैं कपास की आत्माएँ जैसे रुइयाँ नहीं आत्माएँ ही धुनी गई हों गहरी होती बिवाइयों में झलझलाता है नर्म ख़ून किसी चूल्हे की गर्म महक लाई है पछुआ बयार अंतड़ियों की बेजान ध्वनियों से फूट जाती है नकसीर भूख और भोजन के बीच ही वे लड़ रहे हैं लड़ाई बाइस्कोप की रील-सा बस! यहीं उलझ गया है उनका जीवन।

Mar 22, 20241 min

Ep 355Lekar Seedha Naara | Shamsher Bahadur Singh

लेकर सीधा नारा | शमशेर बहादुर सिंहलेकर सीधा नारा कौन पुकारा अंतिम आशाओं की संध्याओं से? पलकें डूबी ही-सी थीं— पर अभी नहीं; कोई सुनता-सा था मुझे कहीं; फिर किसने यह, सातों सागर के पार एकाकीपन से ही, मानो—हार, एकाकी उठ मुझे पुकारा कई बार? मैं समाज तो नहीं; न मैं कुल जीवन; कण-समूह में हूँ मैं केवल एक कण। —कौन सहारा! मेरा कौन सहारा!

Mar 21, 20241 min

Ep 354Azadi Abhi Adhoori Hai | Sheoraj Singh Bechain

आज़ादी अभी अधूरी है-सच है यह बात समझ प्यारे।कुछ सुविधाओं के टुकड़े खा-मत नौ-नौ बाँस उछल प्यारे।गोरे गैरों का जुल्म था कलअब सितम हमारे अपनों काये कुछ भी कहें, पर देशबना नहीं भीमराव के सपनों का।एक डाल ही क्यों? एक फूल ही क्‍यों?सारा उद्यान बदल प्यारे।आज़ादी अभी अधूरी है।सच है ये बात समझ प्यारे।है जिसका लहू मयखाने मेंवो वसर आज तसना-लव हैकुत्तों की हालत बदली हैदलितों की ज़िन्दगी बदतर है।कर हकों की ठंडी बात नहींबदलाव की आग उगल प्यारेआज़ादी अभी अधूरी है।सच है ये बात समझ प्यारे।यह सोच कुँवारी बहन है क्‍यों?माँ-बाप का दिल बेचैन है क्‍यों?पढ़-लिख के मिली बेकारी क्‍यों?मेहनत का फल बेज़ारी क्‍यों?तू मेरे ग़म की बात न करअपना तो दर्द समझ प्यारे ।आज़ादी अभी अधूरी है।सच है यह बात समझ प्यारे।नेता, तस्कर धनवान हैं क्‍यों?हम दलितों का अपमान है क्‍यों?भूखे-नंगे भिखमंगों सेभर रहा ये हिन्दुस्तान है क्‍यों?शोषक जाति और धर्मोंके भी बने देश में दल प्यारे।आज़ादी अभी अधूरी है।सच है यह बात समझ प्यारे।तू वर्दी के व्यभिचार देखखादी की कोठी-कार देखपहले पॉकेट का भार देखफिर रिश्तों का बाज़ार देखरोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा-का कुछ प्रबन्ध तो कर प्यारे।आज़ादी अभी अधूरी है।सच है यह बात समझ प्यारे।हाँ, पूँजीवादी दानव सेखतरे में है शोषित मानवतागूँगे-बहरों से क्या कहिए?अटकी है गले में व्यथा-कथा।पत्थर दिल पर, कोई असर नहींमें तिल-तिल रहा पिचल प्यारे ।आज़ादी अभी अधूरी है।सच है यह बात समझ प्यारे।जिनके हाथों से महल बनेवे खुली सड़क पर लोग पड़ेतन पर कपड़े का तार नहींबुन-बुन कर के भंडार भरेखूँखार भेड़िया-सा दिल मेंसरमायेदारों का है डर प्यारे।आज़ादी अभी अधूरी हैसच है यह बात समझ प्यारे।“बन्दी” बेगुनाह, बरी खूनीक्या यह सारा कुछ कानूनी ?मजदूरों की दुनिया सूनीबढ़ रही मुसीबत दिन दूनीपट॒टे दलितों के नामखेत में गेर दलित का हल प्यारे।आजादी अभी अधूरी है।सच है यह बात समझ प्यारे।निज देश की कंचन काया मेंयह वर्ण-विषमता कोढ़ हुआ।कहीं शोषक, शासक बन बैठाकहीं दोनों में गठजोड़ हुआ।क्या लोकतनन्‍्त्र? कल के राजे-गये मन्त्री बन, सज-धज प्यारे?आज़ादी अभी अधूरी है।सच है यह बात समझ प्यारे।भूखों की भूख मिटा न सकाशोषण और लूट बचा न सको।जिस सुबह की ख़ातिर दलित मरवो सुबह अभी तक आ न सकादख-सख समान किस तरह वैंटयह यक्ति सोच पल छिन प्यार।आजादी अभी अधूरी है।सच है यह बात समझ प्यार।मजबूत हैं हम, कमजार जोर नहीं ।अपना निर्माता और नहींमिल बैठें लें तकदीर बदलदनिया भर की तस्वीर बदलमत अवतारों की राह देखकर स्वयं समस्या हल प्यारे।कुछ सुविधाओं के टुकड़े खामत नौ-नौ बॉस उछल प्यारे।आजादी अभी अधूरी है।सच है यह बात समझ प्यारे ।

Mar 20, 20244 min

Ep 353Maine Dekha | Jyoti Pandey

मैंने देखा | ज्योति पांडेय मैंने देखा, वाष्प को मेघ बनते और मेघ को जल। पैरों में पृथ्वी पहन उल्काओं की सँकरी गलियों में जाते उसे मैंने देखा। वह नाप रहा था जीवन की परिधि। और माप रहा था मृत्यु का विस्तार; मैंने देखा। वह ताक रहा था आकाश और तकते-तकते अनंत हुआ जा रहा था। वह लाँघ रहा था समुद्र और लाँघते-लाँघते जल हुआ जा रहा था। वह ताप रहा था आग और तपते-तपते पिघला जा रहा था; मैंने देखा। देखा मैंने, अर्थहीन संक्रमणों को मुखर होते। अहम क्रांतियों को मौन में घटते मैंने देखा। संज्ञा को क्रिया, और सर्वनाम को विशेषण में बदलते देखा मैंने। सब देखते हुए भोगा मैंने— ‘देख पाने का सुख’ सब देखते हुए मैंने जाना— बिना आँखों से देखे दृश्य, बिना कानों के सुना संगीत, बिना जीभ के लिया गया स्वाद और बिना बुद्धि के जन्मे सच जीवितता के मोक्ष हैं।

Mar 19, 20242 min

Ep 352Kasautiyan | Vishwanath Prasad Tiwari

कसौटियाँ | विश्वनाथ प्रसाद तिवारी'जो एक का सत्य है वही सबका सत्य है'—यह बात बहुत सीधी थी लेकिन वे चीजों पर उलटा विचार करते थेउन्होंने सबके लिए एक आचार—संहिता तैयार की थी लेकिन खुद अपने विशेषाधिकार में जीते थेउनकी कसौटियाँ झाँवें की तरह खुरदरी थीं जिसे वे आदमियों की त्वचा पर रगड़ते थे और इस तरह कसते थे आदमी कोआदमी बड़ा था और कसौटियाँ छोटी इस पर वे झुंझलाते थे और आदमी को रगड़—रगड़कर छोटा करते जाते थेउन्होंने गौर से देखा उस जिद्दी अड़ियल आदमी को नंगा करके उसकी एक-एक मांसपेशी को उसके सीधे तने शरीर और उसकी बुनी हुई रस्सी जैसी भुजाओं को जो उनके सुख बाँटने की माँग कर रहा था'यह पूरा-का-पूरा आदमी एक संक्रामक रोग है' वे बुदबुदाए और जल्दी-जल्दी अध्यादेशों पर दस्तखत करने लगे।

Mar 18, 20242 min

Ep 351Ziladheesh | Alok Dhanwa

ज़िलाधीश | आलोक धन्वा तुम एक पिछड़े हुए वक्ता हो। तुम एक ऐसे विरोध की भाषा में बोलते हो जैसे राजाओं का विरोध कर रहे हो! एक ऐसे समय की भाषा जब संसद का जन्म नहीं हुआ था! तुम क्या सोचते हो संसद ने विरोध की भाषा और सामग्री को वैसा ही रहने दिया जैसी वह राजाओं के ज़माने में थी?यह जो आदमीमेज़ की दूसरी ओर सुन रह है तुम्हेंकितने करीब और ध्यान सेयह राजा नहीं जिलाधीश है!यह जिलाधीश हैजो राजाओं से आम तौर परबहुत ज़्यादा शिक्षित हैराजाओं से ज़्यादा तत्पर और संलग्न !यह दूर किसी किले में - ऐश्वर्य की निर्जनता में नहींहमारी गलियों में पैदा हुआ एक लड़का हैयह हमारी असफलताओं और गलतियों के बीच पला हैयह जानता है हमारे साहस और लालच कोराजाओं से बहुत ज़्यादा धैर्य और चिन्ता है इसके पासयह ज़्यादा भ्रम पैदा कर सकता हैयह ज़्यादा अच्छी तरह हमे आज़ादी से दूर रख सकता हैकड़ीकड़ी निगरानी चाहिएसरकार के इस बेहतरीन दिमाग पर !कभी-कभी तो इससे सीखना भी पड़ सकता है !

Mar 17, 20242 min

Ep 350Tirohit Sitar | Damodar Khadse

तिरोहित सितार | दामोदर खड़सेखूँखार समय केघनघोर जंगल में बहरा एकांत जब देख नहीं पाता अपना आसपास...तब अगली पीढ़ी की देहरी पर कोई तिरोहित सितार अपने विसर्जन की कातर याचना करती है यादों पर चढ़ी धूल हटाने वाला कोई भी तो नहीं होता तब जब आँसू दस्तक देते हैं–बेहिसाब!मकान छोटा होता जाता हैऔर सितार ढकेल दी जाती है कूड़े में आदमी की तरह...सितार के अंतर मेंअमिट प्रतिबिंबबार-बारउन अँगुलियों की याद करते हैंजिन्होंने उसेसँवारते हुएपोर-पोर मेंअलख जगाई थी और आँख भरतृप्ति पाई थी...स्थितियाँ बड़ी चुगलखोर और ईर्ष्यालुतैश में आकर वेविरागी सितार का कान ऐंठती हैं...तार के गर्भ मेंझंकार अब भी बाकी थीतरंगें छिपी थीं तार में बादलों मेंबिजलियों की तरहसुर प्रतीक्षा में थेउम्र के आखिरी पड़ाव तक भी!स्पर्श की यादरोशनी बो गईसुनसान जंगलसपनों में खो गया पेड़ झूमने लगेसितार को फिर मिल गई एक संगत...सितार जीने लगी तरंगें स्पर्शो के अहसास में आदमी के एकांत की तरह!

Mar 16, 20243 min

Ep 349Seekh | Balraj Sahni

सीख | बलराज साहनी वैज्ञानिकों का कथन है किडरे हुए मनुष्य के शरीर सेएक प्रकार की बास निकलती हैजिसे कुत्ता झट सूँघ लेता हैऔर काटने दौड़ता है।और अगर आदमी न डरेतो कुत्ता मुँह खोलमुस्कुराता, पूँछ हिलातामित्र ही नहीं, मनुष्य काग़ुलाम भी बन जाता है।तो प्यारे!अगर जीने की चाह है,जीवन को बदलने की चाह हैतो इस तत्व से लाभ उठाएँ,इस मंत्र की महिमा गाएँ,इस तत्व को मानवी स्तर पर ले जाएँ!जब भी मनुष्य से भेंट होभले ही वह कितना ही महान क्यों न हो,कितना प्रबलकितना ही शक्तिमान हाकिम क्यों न हो,उतने ही निडर हो जाइएजितना कि कुत्ते से।मित्र प्यारे!अगर डरोगे, तो निकलेगी बास जिस्म सेजिसे वह कुत्ते से भी जल्दी सूँघ लेगाऔर कुत्ते से भीबढ़कर काटेगा!

Mar 15, 20241 min

Ep 348Kuch Bann Jaate Hain | Uday Prakash

कुछ बन जाते हैं | उदय प्रकाशकुछ बन जाते हैंतुम मिसरी की डली बन जाओ मैं दूध बन जाता हूँ तुम मुझमें घुल जाओ।तुम ढाई साल की बच्ची बन जाओमैं मिसरी घुला दूध हूँ मीठामुझे एक साँस में पी जाओ।अब मैं मैदान हूँ तुम्हारे सामने दूर तक फैला हुआ। मुझमें दौड़ो। मैं पहाड़ हूँ। मेरे कंधों पर चढ़ो और फिसलो । मैं सेमल का पेड़ हूँ मुझे ज़ोर-ज़ोर से झकझोरो और मेरी रुई को हवा की तमाम परतों में बादलों के छोटे-छोटे टुकड़ों की तरह उड़ जाने दो।ऐसा करता हूँ कि मैं अखरोट बन जाता हूँ तुम उसे चुरा लो और किसी कोने में छुपकर उसे तोड़ो।गेहूँ का दाना बन जाता हूँ मैं, तुम धूप बन जाओ मिट्टी-हवा-पानी बनकर मुझे उगाओ मेरे भीतर के रिक्त कोषों में लुका-छिपी खेलो या कोंपल होकर मेरी किसी भी गाँठ से कहीं से भी तुरत फूट जाओ।तुम अँधेरा बन जाओ मैं बिल्ली बनकर दबे पाँव चलूँगा चोरी-चोरी ।क्यों न ऐसा करें कि मैं चीनी-मिट्टी का प्याला बन जाता हूँ और तुम तश्तरी और हम कहीं से गिरकर एक साथ टूट जाते हैं सुबह-सुबह ।या मैं गुब्बारा बनता हूँ नीले रंग का तुम उसके भीतर की हवा बनकर फैलो और बीच आकाश में मेरे साथ फूट जाओ।या फिर... ऐसा करते हैं कि हम कुछ और बन जाते हैं।

Mar 14, 20242 min

Ep 347Surya Dhalta Hi Nahi | Ramdarash Mishra

सूर्य ढलता ही नहीं | रामदरश मिश्र | आरती जैनचाहता हूँ, कुछ लिखूँ, पर कुछ निकलता ही नहीं हैदोस्त, भीतर आपके कोई विकलता ही नहीं है!आप बैठे हैं अंधेरे में लदे टूटे पलों सेबंद अपने में अकेले, दूर सारी हलचलों सेहैं जलाए जा रहे बिन तेल का दीपक निरन्तरचिड़चिड़ाकर कह रहे- ‘कम्बख़्त, जलता ही नहीं है!’बदलियाँ घिरतीं, हवाएँ काँपती, रोता अंधेरालोग गिरते, टूटते हैं, खोजते फिरते बसेराकिन्तु रह-रहकर सफ़र में, गीत गा पड़ता उजालायह कला का लोक, इसमें सूर्य ढलता ही नहीं है!तब लिखेंगे आप जब भीतर कहीं जीवन बजेगादूसरों के सुख-दुःखों से आपका होना सजेगाटूट जाते एक साबुत रोशनी की खोज में जोजानते हैं- ज़िन्दगी केवल सफ़लता ही नहीं है!बात छोटी या बड़ी हो, आँच में ख़ुद की जली होदूसरों जैसी नहीं, आकार में निज के ढली होहै अदब का घर, सियासत का नहीं बाज़ार यह तोझूठ का सिक्का चमाचम यहाँ चलता ही नहीं है!

Mar 13, 20242 min

Ep 346Tedhi Kamar KI Auratein | Aishwarya Vijay Amrit Raj

टेढ़ी कमर की औरतें | ऐश्वर्य विजय अमृत राजछः-सात साल की लड़कियाँछोटे भाइयों/बड़े भाई के बच्चे के साथ/सोलह साल कीसालभर पुरानी कन्याएँअपने बच्चे/जेठानी के बच्चे के साथचालीस-साठ की दादी/नानीकमर एक तरफ निकालकरबच्चे को लटकाए कुल्हे की हड्डी से, हो जाती हैं पेड़ के किसी टेढ़े तने सी तिरछी, और ठोंस, किसी पुरानी सभ्यता की मूर्ति सी,जो टिकी-बची हो हर मौसम व समय की मार से।कमर टेढ़ी किये ये औरतें धड़फड़ा कर चढ़ जाती हैं कई सीढ़ियाँ एक साथहल्के कदम से टहलत जाती हैं गाँव के एक छोर से दूसरे छोर तक,झुककर उठा लेती हैं सारे बर्तन,उचक कर चढ़ा देती हैं सबसे ऊपर की दराज़ पर मसाले के डिब्बे,सरकस के सारे करतब निभा लेंगी ये औरतें, कमर से दो हाँथ जितने बड़े बच्चे लटकाये अपने शरीर से किसी भी दिन..'कर्मा' की रात तेज़ी से लगाती हैं दुब घास से भरी बाल्टी के चक्करखाली पेट, गाते हुए भाइयों की सलामती के लिए माँ व गाँव की अन्य औरतों से सीखे हुए गीत,मायके लौटी लड़कियाँ नाचती हैं शर्मीली सखी की बाँह खींचते हुए,कहती हैं, "अब त अलगे साल अयते ई मौका"गाते हुए गीत,वे मन से भूल जातीं हैं वे सारे तिरस्कार जो मिलते हैं उसे औरत के शरीर में 'बहन' होने के कारण,गीत जो करते हैं केवल भाईयों के गुणवान, उनके अस्तित्व की स्तुति,उनकी धुन पर पिटती हैं चूड़ियाँ खनका-खनका तालियाँ…साल भर की आज़ादी इस एक पल में जीते हुएससुराल लौटने का ख़्याल, छः बजते ही किबाड़ से अंदर हो जाने के नियम, सभी को डाल बाल्टी मेंइस रात नाच लेना चाहती हैं कुछ मिनटों में इतना कि दुखे पैर अगली सुबह तक…ताकि इस दर्द को हर दिन याद करें और खुश हो लें उसके पैर जब ससुराल में रखें जाएँ नाप-तौल कर।दोपहर की धूप में जीप खड़ी कर ड्राइवर पसीने से लथपथ मन ही मन कोस रहा है औरतों की जमात कोलड़की धीरे धीरे बढ़ती है जीप की तरफ,माँ बार-बार पोंछती है अपने आँसूउसके बच्चों का मामाकभी पुचकार करकभी आँखें दिखाकररख देता है जीप की सीट पर बैठे जीजा की गोद में बच्चे को,पिता इशारे में कहता है लड़की को बन्द करने जीप का दरवाज़ागाड़ी स्टार्ट करते हुए ड्राइवर लेता है लम्बी साँसगहरी सांस छोड़ती है ससुराल लौटती लड़की।गाँव भर की औरतें जो खड़ी थीं गाड़ी को घेरेहटने लगतीं हैं एक-एक करऔर कमर से अलग-अलग रिश्तों के बच्चे लटकायेऔरतेंऔरतें लग जातीं हैं अपने अपने कामों में।

Mar 12, 20244 min

Ep 345Qile Mein Bacche | Naresh Saxena

क़िले में बच्चे | नरेश सक्सेना क़िले के फाटक खुले पड़े हैं और पहरेदार गायबड्योढ़ी में चमगादड़ें दीवाने ख़ास में जाले और हरम बेपर्दा हैं सुल्तान दौड़ो!आज किले में भर गए हैं बच्चे उन्होंने तुम्हारी बुर्जियों, मेहराबों, खंभों और कंगूरों पर लिख दिए हैं अपने नाम कक्षाएँ और स्कूल के पते अब वे पूछ रहे हैं सवाल कि सुल्तान के घर का इतना बड़ा दरवाज़ा उसकी इतनी ऊँची दीवारें उनके चारों तरफ़ इतनी सारी खाइयाँइतने सारे तहखाने छुपने के लिए और भागने के लिए इतनी लंबी सुरंगें और चोर रास्ते आख़िर... सुल्तान इतना डरपोक क्यों था!

Mar 11, 20242 min

Ep 344Chunav Ki Chot | Kaka Hathrasi

चुनाव की चोट | काका हाथरसीहार गए वे, लग गई इलेक्शन में चोट। अपना अपना भाग्य है, वोटर का क्या खोट? वोटर का क्या खोट, ज़मानत ज़ब्त हो गई। उस दिन से ही लालाजी को ख़ब्त हो गई॥ कह ‘काका’ कवि, बर्राते हैं सोते सोते। रोज़ रात को लें, हिचकियाँ रोते रोते॥

Mar 10, 20241 min