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Sheetleheri Mein Ek Boodhe Aadmi Ki Prathna | Kedarnath Singh
Episode 360

Sheetleheri Mein Ek Boodhe Aadmi Ki Prathna | Kedarnath Singh

Pratidin Ek Kavita

March 26, 20242m 50s

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Show Notes

शीतलहरी में एक बूढ़े आदमी की प्रार्थना | केदारनाथ सिंह


ईश्वर

इस भयानक ठंड में 

जहाँ पेड़ के पत्ते तक ठिठुर रहे हैं 

मुझे कहाँ मिलेगा वह कोयला 

जिस पर इन्सानियत का खून गरमाया जाता है 

एक ज़िन्दा 

लाल 

दहकता हुआ कोयला 

मेरी अँगीठी के लिए बेहद ज़रूरी 

और हमदर्द कोयला 

मुझे कहाँ मिलेगा इस ठंड से अकड़े हुए शहर में 

जहाँ वह हमेशा छिपाकर रखा जाता है 

घर के पिछवाड़े 

या ग़ुसलख़ाने की बग़ल में 

हथेलियों की रगड़ में दबा रहता है जो 

जो इरादों में होता है 

जो यकायक सुलग उठता है याददाश्त की हदों पर 

पस्ती के दिनों में 

मुझे कहाँ मिलेगा वह कोयला 

मेरे ईश्वर! 

मुझे क्या करना चाहिए इस दिन का

जिसमें कोयला नहीं है 

मुझे क्या करना चाहिए इस ठंड का 

जो बराबर बढ़ती जा रही है 

क्या मैं भी इन्तज़ार करूँ 

​​जैसे सब कर रहे हैं

क्या मैं उदूँ और अपने-आपको बदल लूँ

एक कोयला झोंकनेवाले बेलचे में

क्या मैं बाज़ार जाऊँ

और अपनी आत्मा के लिए ख़रीद लूँ

एक अच्छा-सा कनटोप?

मेरे ईश्वर!

क्या मेरे लिए इतना भी नहीं कर सकते

कि इस ठंड से अकड़े हुए शहर को बदल दो

एक जलती हुई बोरसी में!


बोरसी = अंगीठी ; मिट्टी का बरतन जिसमें आग रखकर जलाते हैं

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