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Pratidin Ek Kavita

Pratidin Ek Kavita

1,141 episodes — Page 18 of 23

Ep 293Ukti | Suryakant Tripathi 'Nirala'

उक्ति | सूर्यकांत त्रिपाठी निरालाकुछ न हुआ, न हो। मुझे विश्व का सुख, श्री, यदि केवल पास तुम रहो ! मेरे नभ के बादल यदि न कटे— चंद्र रह गया ढका, तिमिर रात को तिरकर यदि न अटे लेश गगन-भास का, रहेंगे अधर हँसते, पथ पर, तुम हाथ यदि गहो। बहु-रस साहित्य विपुल यदि न पढ़ा— मंद सबों ने कहा— मेरा काव्यानुमान यदि न बढ़ा— ज्ञान जहाँ का रहा, रहे, समझ है मुझमें पूरी, तुम कथा यदि कहो।

Jan 19, 20241 min

Ep 292Angor | Jacinta Kerketta

अंगोर | जसिंता केरकेट्टाशहर का अंगार जलता है, जलाता है फिर राख हो जाता है। गाँव के अंगोर एक चूल्हे से जाते हैं दूसरे चूल्हे तक और सभी चूल्हे सुलग उठते हैं।

Jan 18, 20241 min

Ep 291Hawa Mein Pul | Madan Kashyap

हवा में पुल | मदन कश्यपहवा में पुल थाइसीलिए हवा का पुल था क्योंकि हवा का पुल ही हवा में हो सकता था (आप चाहें तो इस पाठ को बदल सकते हैं, वह इस प्रकार:हवा का पुल था इसीलिए हवा में पुल थाक्योंकि हवा का पुलहवा में ही हो सकता था)....वैसे पुल के होने के लिए कहीं न कहीं धरती से उसका जुड़ा हुआ होना ज़रूरी होता है।पुल क्या कोई भी ढाँचाकेवल हवा में नहीं होता हवा भी हवा में नहीं होती वह भी पृथ्वी के होने पर टिकी होती है अपनी जगह पर इस सच के होने के बावजूदयह सच थाकि हवा का पुल हवा में थालोग हवा की सड़क से हवा के पुल पर आते थे और उसे पार कर हवा की किसी दूसरी सड़क से किसी तीसरी तरफ़ चले जाते थे जब वे उसी पुल से वापस लौटते थे तब हवा का वही पुल नहीं होता था हर बार नयी हवा नया पुल बनाती थीहवा के पुल पर चलते हुए लोगों को अक्सर यह पता नहीं होता था कि वे हवा के पुल पर चल रहे हैं उनके पैरों के नीचे कोई नदी भी तो नहीं दिखती थी हवा की एक नदी वहाँ होती थी मगर, वह हवा के पुल से इस तरह जुड़ी होती थी कि अलग से उसे पहचानना असम्भव होता थाइस तरह हवा में सब कुछ हवाई था उसके हवाई होने के भी कुछ अपने नियम थे इस हद तक बेकायदा थाकि बेकायदा नहीं था हवा में पुलसारी चीज़ों की पहचान यही थीकि वे अपनी-अपनी पहचान खो चुकी थीं आदमी के लिए यह तय करना कठिन हो रहा थाकि पहचान खोकर सब कुछ पा लेने और सब कुछ गँवाकर पहचान बचा लेने मेंसही क्या है जो पहचान बचा रहे थेवे चीज़ो के लिए ललचा रहे थे और जो चीज़ें हथिया रहे थे वे पहचान खोने पर पछता रहे थेएक आपाधापी थी चारों ओरकुछ लोग हवा का पुल पार कर हवा में जा रहे थे कुछ लोग हवा के पुल से लौटकरहवा में आ रहे थेहम ने भी कई-कई बारहवा का पुल पार कियाहवा में कविता लिखीहवा में क्रान्ति कीहवा को तरह-तरह से हवा देने की कोशिश कीहवा के पुल पर हमारे कदमों के निशानइतने स्पष्ट और घने बनते थेकि एक पल को ऐसा लगताहवा का पुल कहीं पदचिह्नों का पुल न बन जाए पर दूसरे ही पल इस तरह नहीं होते थे वे निशान जैसे कभी थे ही नहींहवा में पुलहवा होने के बाद भी हवा हो जाने वाला नहीं थाउसका न था कुछ ऐसा थाकि कई-कई हवाओं के गुज़र जाने के बावजूदहवा में टिका हुआ था हवा का पुल !

Jan 17, 20244 min

Ep 290Kavita | Damodar Khadse

कविता | दामोदर खड़सेसमयजब कहींगिरवी हो जाता हैसाँसें तबकितनी भारी हो जाती हैंआसपास दिखता नहीं कुछ भीकेवल देह दौड़ती हैबरसाती बादलों की तरह हाँफना भी भुला देती है थकान!ऐसे में तब तुमकविता की ताबीजबाँहों पर बाँध लेना!एक गुनगुनाहट छोटे-छोटे छंदों कीफुसफुसाहटशब्दों की दस्तक और अपनी आहटभीतर ही भीतर पा लेना!कविता,अँधेरी रातों कोचुभती विसंगत बातों कोदेगी एक संदेशऔर रह-रहकर टूटता समयएक लड़ी बनकरकभी सीढ़ी बनकरतुम्हारे सामने जगमगाएगादेखते-देखते हर गिरवी पल तुम्हारा अपना हो जाएगा...कविता का ओर-छोर तुम अपने हाथों मेंजगाए रखना...!

Jan 16, 20242 min

Ep 289Laut Ke Wapas Aana | Shrey Karkhur

लौट के वापस आना | श्रेय कारखुर मेरी भाषा के एक बुजुर्ग कवि ने कहा है कि घर बाहर जाने के लिए उतना नहीं होता जितना लौट के वापस आने के लिए होता हैमैंने हमेशा इन पंक्तियों को भरा हुआ पाया है बहुत सी उम्मीद और ढेर सारे इंतज़ार सेलौट के वापस आने में इंतज़ार भर की दूरी होती है जिसे तय करती है पहाड़ों से लौटती गूंज इस उम्मीद में, कि कोई उसके लौटने का इंतजार कर रहा है जैसे कवि करता है इंतज़ार, कविता के लौटने कामैं कविता की तरह साँस के लौटने का इंतज़ार नहीं करता मैं अपनी देह को उसका घर समझता हूँसमझता हूँ कि वह मेरे देह की बासी है जहाँ उसे ज़िन्दा रहने तक लौटना होगा उसके मरने के बाद उसके घर का क्या होगा मैं नहीं जानता, पर मैं जानता हूँ, कि न-जाने ऐसे कितने घर होंगे जहाँ के बासी नहीं चढ़े थे मरने की उम्र तक कोई सीढ़ी और फिर भी कभी लौट के वापस नहीं आएमकानों की भीड़ में यह कुछ घर आज भी पड़े हैं खाली जो खाली पड़े घोंसलों की तरह हर शाम करते है उनका इंतज़ार जिनके नामों की तख्ती आज भी लटक रही है उन दरवाजों पर जहाँ से हर शाम दिलासा देकर अपने घर को लौटती हैं हवाएँ और जिन्हें खाली पाकर वहाँ नहीं लौटता थोड़ा बसंत, आधा सावन और पूर्णिमा का पूरा चाँदमैं आदतन अपने घर से निकलता हूँराह चलते ऐसे ही किसी घर को देखता हूँ, ठिठकता हूँ और सोचता हूँ क्या यह घर उन बच्चों के हो सकते हैं? जो अपने झुंड से बिछड़े बछड़े की तरह भटक रहे हैं मेरे मोहल्ले की गलियों में जिन्हें मैंने कई-कई बार देखा हैभीड़ भरे बाजारों में, शहर के चौराहों पर और उन मंदिरों के चबूतरों पर जहाँ उनकी माएं उन्हें जनकर छोड़ गईं जहाँ मैं उन्हें भीख के अलावा और कुछ नहीं दे सकाक्या यह घर उन औरतों के हो सकते हैं? जो अपने पीहर से नहीं ला सकीं सौदे बराबर पैसा, जिन्हें नहीं समझा गया लायक़ समाज के किसी दर्जे के, या जो कभी एक लड़की हुआ करती थीं कच्चेपन में अपने घर से निकली हुईं और पाई गईं उन दड़बों में जहाँ से लौटने का रास्ता उन्हें भूल जाना पड़ाक्या यह घर उन आदमियों के हो सकते हैं? जो बंजारों की तरह किसी के दुत्कारे जाने तक बसते हैं गलियों के कोनों में और दुत्कारे जाते हीउन कोनों से कूच कर जाते हैं और लिए जाते हैं अपने हिस्से की तमाम संपत्ति न जाने किस गली के किस कोने में बसने कोमैं आदतन अपने घर को लौटता हूँ और गली के पीपल तले रखी मूर्तियों को देखता हूँ, ठिठकता हूँ और सोचता हूँ, क्या उन बच्चों, औरतों और आदमियों की ही तरह ईश्वर का भी घर होगा? क्या सबकी देखा-देखी निकल आया है ईश्वर भी अपने घर से और पड़ा हुआ है इस पीपल तले किसी खंडित मूर्ति की तरह?यदि मैं उस कवि को ईश्वर की जगह रखकर देखूँ तो घर का संदर्भ संसार से होता जहाँ यह शहर, यहाँ की गलियां, कोने, बाज़ार, मोहल्ले मंदिर और चौराहे सभी होते एक ही घर के हिस्से, जहाँ इन बच्चों, औरतों और आदमियों कि ही तरह ईश्वर का भी एक कमरा होता जहाँ वह परिवार के बुजुर्ग की तरह रहता और किसी को बाहर जाता देखहर बार टोककर कहता कि संसार बाहर जाने के लिए उतना नहीं होता जितना लौट के वापस आने के लिए होता है

Jan 15, 20244 min

Ep 288Apradh | Leeladhar Jagudi

अपराध | लीलाधर जगूड़ी जहाँ-जहाँ पर्वतों के माथे थोड़ा चौड़े हो गए हैं वहीं-वहीं बैठेंगे फूल उगने तक एक-दूसरे की हथेलियाँ गर्माएँगे दिग्विजय की ख़ुशी में मन फटने तक देह का कहाँ तक करें बँटवारा आजकल की घास पर घोड़े सो गए हैं मृत्यु को जन्म देकर ईश्वर अपराधी है इतनी ज़ोरों से जिएँ हम दोनों कि ईश्वर के अँधेरे को क्षमा कर सकें।

Jan 14, 20241 min

Ep 287Sangatkaar | Manglesh Dabral

संगतकार | मंगलेश डबरालमुख्य गायक के चट्टान जैसे भारी स्वर का साथ देती वह आवाज़ सुंदर कमज़ोर काँपती हुई थी वह मुख्य गायक का छोटा भाई है या उसका शिष्य या पैदल चलकर सीखने आने वाला दूर का कोई रिश्तेदार मुख्य गायक की गरज में वह अपनी गूँज मिलाता आया है प्राचीन काल से गायक जब अंतरे की जटिल तानों के जंगल में खो चुका होता है या अपने ही सरगम को लाँघकर चला जाता है भटकता हुआ एक अनहद में तब संगतकार ही स्थाई को सँभाले रहता है जैसे समेटता हो मुख्य गायक का पीछे छूटा हुआ सामान जैसे उसे याद दिलाता हो उसका बचपन जब वह नौसिखिया थातारसप्तक में जब बैठने लगता है उसका गला प्रेरणा साथ छोड़ती हुई उत्साह अस्त होता हुआ आवाज़ से राख जैसा कुछ गिरता हुआ तभी मुख्य गायक हो ढाढ़स बंधाता कहीं से चला आता है संगतकार का स्वर कभी-कभी वह यों ही दे देता है उसका साथ यह बताने के लिए कि वह अकेला नहीं है और यह कि फिर से गाया जा सकता है गाया जा चुका राग और उसकी आवाज़ में जो एक हिचक साफ़ सुनाई देती है यों अपने स्वर को ऊँचा न उठाने की जो कोशिश है उसे विफलता नहीं उसकी मनुष्यता समझा जाना चाहिए।

Jan 13, 20243 min

Ep 286Naye Tarah Se | Shashwat Upadhyay

नए तरह से लैस होकर आ गई है नई सदी | शाश्वत उपाध्याय जो दिख नहीं रही मनिहारिन,उसके चूड़ियों का बाज़ारबेड़ियों के भेंट चढ़ गया है।मोतियों की दुकान सेसीपियों ने रार ठान लिया हैनई तरह की लड़ाई लेकर आई है नई सदी।टिकुली साटती-दोपहर काटतीसारी औरतेंशिव चर्चाओं में गूंथ दी गईं हैं।शिव के गीतों में,अब छपरा-सिवान के सज्जन का ज़िक्र भी होने लगा हैनई तरह की आस्था भी लेकर आ गई है नई सदी।खेत, भूरे होकर अलसा गए हैंहवा के सहारे गोते लगाते गेहूँडर कर चीख देते हैं सरेआम।किसानी के नाम चढ़े चैत में खेत नहीं, समय काट रही बनिहारन।'आग लागो- बढ़नी बहारो, हेतना घाम'बोलने वाली गाँव भर की ठेकेदारननेपाल से आँख बनवा कर लौटी तो ज़रूरलेकिन खेत में नहीं डाले पाँव उसनेमोतियाबिंद ने आंख का पानी जगा दिया।कि नई बिमारी भी लेकर आ गई नई सदी।चहक कर पेड़ के गोदी में झूल जाने वाले बच्चे,समय से पहले बड़े हो गए ऐसा भी नहीं हैजीवन जीने को साधने के लिए सूरत से दमन तक बिछ गए हैं ज़रूर।भय यही हैकिरोटी-कपड़ा-मकान देने के लिएशराब में खप कर अगर बचेंगेतो अंत में धर्म के नाम पर चीख देंगे सरेआमजैसे पके हुए गेहूँ हों।और चीख तो एक जैसी होती हैक्या गेहूँ-क्या इंसानभले ही नई तरह से लैस होकर आई है नई सदी,नई तरह की चीख लेकर नहीं आ सकी।

Jan 12, 20242 min

Ep 285Pramaan Patra | Archana Verma

प्रमाणपत्र - अर्चना वर्मा लक्षणों की किताब से उसनेचुन लिया एक रोग और उसे जीवन का भोग बना लियाउसके पास भी था आखिरकार दिखाने के लिए एक घाव वह उसे चाव से सहलाते हुए पालने लगाशामों का अकेलापन अब काटने नहीं दौड़ताबातचीत के लिए विषयों की कमी नहीं चिकित्सा की नवीनतम शोध से मृत्यु दर के आँकड़े तक बिकाऊ हैं उसकी दुकान मेंवे अब आते हैं अक्सर हाथों में फूल, चेहरों पर मुस्कान घण्टों बिता जाते हैंकारोबार चल निकला हैफूलों के बदले में उनको वह उनकी दया माया ममता वगैरह का प्रमाणपत्र देता है साथ ही आश्वासन सहने का धीरज, बहादुरी का खिताब वे दे जाते हैं सर माथे पर लेता हैहालाँकि वह न लड़ रहा है न सह रहा है सिर्फ उनकी दया माया ममता वगैरह के ज्वार में बह रहा है

Jan 11, 20241 min

Ep 284Ma Ka Chehra | Krishna Kalpit

माँ का चेहरा | कृष्ण कल्पित जब छीन ली जाएगी हमसे एक-एक स्मृति जब किसी के पास कुछ नहीं बचेगा पीतल के तमग़ों के सिवाजब सब कुछ ठहर जाएगा एक-एक पत्ता झर जाएगा सब पत्थर हो जाएगा ठोस और खुरदुरा नदी में नहीं दिखाई देगी चाँद की परछाईं किसी आँख में नहीं बचेगा सपनाहम सब कुछ भूल जाएँगे घर का रास्ता, गाँव का नाम दस का पहाड़ा, सब कुछ तब कौन जान पाएगा छब्बीस अगस्त उन्नीस सौ पिचासी तक मुझे एक-एक झुर्री समेत याद था अपनी माँ का चेहरा।

Jan 10, 20242 min

Ep 283Rekhte Mein Kavita | Uday Prakash

रेखते में कविता | उदय प्रकाश जैसे कोई हुनरमन्द आज भी घोड़े की नाल बनाता दीख जाता है ऊँट की खाल की मसक में जैसे कोई भिश्ती आज भी पिलाता है जामा मस्जिद और चाँदनी चौक में प्यासों को ठण्डा पानीजैसे अमरकंटक में अब भी बेचता है कोई साधू मोतियाबिन्द के लिए गुलबकावली का अर्कशर्तिया मर्दानगी बेचता है हिन्दी अख़बारों और सस्ती पत्रिकाओं में अपनी मूँछ और पग्गड़ के फ़ोटो वाले विज्ञापन में हकीम बीरूमल आर्यप्रेमीजैसे पहाड़गंज रेलवे स्टेशन के सामने सड़क की पटरी पर तोते की चोंच में फँसा कर बाँचता है ज्योतिषी किसी बदहवास राहगीर का भविष्य और तुर्कमान गेट के पास गौतम बुद्ध मार्ग पर ढाका या नेपाल के किसी गाँव की लड़की करती है मोलभाव रोगों, गर्द, नींद और भूख से भरी अपनी देह काजैसे कोई गड़रिया रेल की पटरियों पर बैठा ठीक गोधूलि के समयभेड़ों को उनके हाल पर छोड़ता हुआ आज भी बजाता है डूबते सूरज की पृष्ठभूमि में धरती का अन्तिम अलगोझाइत्तेला है मीर इस ज़माने में लिक्खे जाता है मेरे जैसा अब भी कोई-कोई उसी रेख़्ते में कविता।

Jan 9, 20242 min

Ep 282Vastutah | Bhawani Prasad Mishra

वस्तुतः | भवानी प्रसाद मिश्रमैं जो हूँमुझे वही रहना चाहिए।यानीवन का वृक्षखेत की मेंड़नदी की लहरदूर का गीतव्यतीतवर्तमान मेंउपस्थित भविष्य मेंमैं जो हूँमुझे वही रहना चाहिएतेज़ गर्मीमूसलाधार वर्षाकड़ाके की सर्दीख़ून की लालीदूब का हरापनफूल की जर्दीमैं जो हूँमुझे वही रहना चाहिएमुझे अपनाहोनाठीक-ठीक सहना चाहिएतपना चाहिएअगर लोहा हूँतो हल बनने के लिएबीज हूँतो गड़ना चाहिएफल बनने के लिएमैं जो हूँमुझे वही बनना चाहिएधारा हूँ अन्तःसलिलातो मुझे कुएँ के रूप मेंखनना चाहिएठीक ज़रूरतमन्द हाथों सेगान फैलाना चाहिए मुझेअगर मैं आसमान हूँमगर मैंकब से ऐसा नहींकर रहा हूँजो हूँवही होने से डर रहा हूँ!

Jan 8, 20242 min

Ep 281Naye Saal Par | Snehamayi Choudhary

नए साल पर | स्नेहमयी चौधरी दोपहर जिस समय थोड़ी देर के लिए स्थिर हो जाती है, चहल-पहल रुकती-सी जान पड़ती है, उस पार का जंगल गहरा हरा हो उठता है, अपने कामों की गिनती करते-करते जब सिर ऊपर उठाती हूँ— सूरज दूसरी दिशा में पहुँच चुकता है।दिन सरक कर चिड़ियों के पंखों में दुबक जाता है। मैं अपने को वहीं बैठी पाती हूँ जहाँ सुबह थी। हर साल की तरह पिछले सारे अधूरे कामों की गड्डी की ओर से आँख बंद कर नया कुछ करने की सोचते-सोचते... एक दिन और ढल जाता है।

Jan 7, 20242 min

Ep 280Haq | Kedarnath Singh

हक़ | केदारनाथ सिंह पक्षियों कोअपने फैसले खुद लेने दोउड़ने दो उन्हें हिन्द से पाकऔर पाक सेहिन्द के पेड़ों की ओरअगर सरहद जरूरी हैपड़ी रहने दो उसेजहाँ पड़ी है वहपर हाथों को हक दोकि मिलते रहें हाथों सेपैरों को हक दो कि जब भी चाहेंजाकर मिल आएँउधर के रास्तों सेचलती रहे वार्ताहोते रहें हस्ताक्षरये सब सहीये सब ठीकपर हक को भी हक दोकि ज़िंदा रहे वह!

Jan 6, 20241 min

Ep 279Barbie Aur Sadak | Shashwat Upadhyay

बार्बी और सड़क | शाश्वत उपाध्याय मुझे मुड़ती हुई सड़कों पर बहुत प्यार आता है सड़क, जो मेरे बचपन के पसंदीदा बार्बी की कमर की तरह है बड़े करीने से मुड़ रही हो जिस पर मैं लट्टुओं की तरह बेतरतीब चलता हूँ, कुलांचे भरत हूँ ऐसी चल में चलता हूँ कि कमर मटक जाती है कि चलना खराब लग जाता है यह सब कुछ इसलिए होता है कि सड़क का मुड़ना बार्बी के कमर जैसा समझ आता है वैसा नहीं समझ आता जैसा है अभी मुड़ती सड़कों पर प्यार करने का समय है इन पर चलने का समय अभी नहीं आयामेरी गुज़ारिश है कि प्यार करने से थोड़ा समय बचाओ और मुड़ती सड़कों पर साथ चलो आओ, चलने के सहारे हम खिलौने के बैग तक पहुँचेंऔर उसकी गुड़ियों को छिपा दें कि सड़क देखकर सिर्फ बार्बी के कमर का ख़याल आए तो दोष ख़याल का नहीं खिलौनों का है उम्मीद करें की हम आखरी पीढ़ी हों जिन्हें बार्बी से प्यार था

Jan 5, 20241 min

Ep 278Saukh | Archana Verma

सौख | अर्चना वर्मा झुनिया को चर्राया इज्जत को सौख बड़के मालिक की उतरन का कुरता देखने में चिक्कन बरतने में फुसफुस नाप में छोटा कंधे पर छाती पर कसताबड़ी जिद और जतन से महंगू को पहनायामुश्किल है महंगू को अब सांस लेना भीझुनिया ने महंगू की एक नहीं मानीसांस बांस रखी रहे इज्जत की ठानीएड़ी से चोटी तक अंगों पर ढांप ली चादर पुरानी जीते जी पगली ने ओढ़ लिया कफन कोठरी में घुस कर कुंडी चढ़ा लीदेहरी के पार अब झांकेगी न भूलकर कोठरी के भीतर का राजपाट देखेगीमलकिन की तरह खुद पियरांती जाएगी जाने इस इज्जत को ले के क्या पायेगीइज्जत की नापबहुत छोटी है झुनियाझरोखा न खिड़की न दिन है न दुनिया अपने कद को तो देख जरा छत से भी ऊँचा है कितना सिकोड़ेगी हाथ पांव अपने गर्दन को पैरों तक कैसे झुकाएगी, कब तक दोहराएगी सीधी सतर पीठ को, मलकिन कीहारी थकी झुकी हुई दीठ कोउठ कुण्डी खोल दे बाहर निकल आ

Jan 4, 20242 min

Ep 277Vagarth | Sunita Jain

वागर्थ | सुनीता जैन एक पके फल-सा रसमय शब्द खोजती रहती है रसना जो भले कुछ न कहे पर संवेद में पूरा उतर जाए एक थिरक लय की खोजती रहती हैं उँगलियाँ जो भले ही सुनाई न दे पर साँसों में ताल-सी बज जाए एक वागर्थ ढूँढ़ती रहती हैं आँखों की पुतलियाँ जो हथेलियों-सा कहने और सहने को संपुट कर जाए

Jan 3, 20241 min

Ep 276Nadi Aur Sabun | Gyanendrapati

नदी और साबुन | ज्ञानेन्द्रपति नदी!तू इतनी दुबली क्यों हैऔर मैली-कुचैलीमारी हुई इच्छाओं की तरह मछलियाँ क्यों उतारे हैंतुम्हारे दुर्दिनों के दुर्जल मेंकिसने तुम्हारा नीर हराकलकल में कलुष भराबाघों के जुठारने से तोकभी दूषित नहीं हुआ तुम्हारा जलन कछुओं की दृढ़ पीठों से उलीचा जाकर भी कम हुआहाथियों की जल-क्रीड़ाओं को भी तुम सहती रहीं सानंदआह! लेकिनस्वार्थी कारख़ानों का तेज़ाबी पेशाब झेलतेबैंगनी हो गई तुम्हारी शुभ्र त्वचाहिमालय के होते भी तुम्हारे सिरहानेहथेली-भर की एक साबुन की टिकिया सेहार गईं तुम युद्ध!

Jan 2, 20241 min

Ep 275Naye Saal Ki Shubhkaamnayein | Sarveshwar Dayal Saxena

नए साल की शुभकामनाएँ! - सर्वेश्वरदयाल सक्सेनानए साल की शुभकामनाएँ!खेतों की मेड़ों पर धूल भरे पाँव कोकुहरे में लिपटे उस छोटे से गाँव कोनए साल की शुभकामनाएं!जाँते के गीतों को बैलों की चाल कोकरघे को कोल्हू को मछुओं के जाल कोनए साल की शुभकामनाएँ!इस पकती रोटी को बच्चों के शोर कोचौंके की गुनगुन को चूल्हे की भोर कोनए साल की शुभकामनाएँ!वीराने जंगल को तारों को रात कोठंडी दो बंदूकों में घर की बात कोनए साल की शुभकामनाएँ!इस चलती आँधी में हर बिखरे बाल कोसिगरेट की लाशों पर फूलों से ख़याल कोनए साल की शुभकामनाएँ!कोट के गुलाब और जूड़े के फूल कोहर नन्ही याद को हर छोटी भूल कोनए साल की शुभकामनाएँ!उनको जिनने चुन-चुनकर ग्रीटिंग कार्ड लिखेउनको जो अपने गमले में चुपचाप दिखेनए साल की शुभकामनाएँ!

Jan 1, 20242 min

Ep 274Bhaap | Shahanshah Alam

भाप | शहंशाह आलमसमुद्र की भाप होकर गया पानीवापस लौट आता हैया जो रेत की भाप गईलौट आई बारिश बनकरशब्द की भाप गईवह भी दिमाग़ को भेदती लौट आईपछतावे की भाप गईफिर जूते के तल्ले के आगे दबी आकरभाप बनकर गया लड़की का ख़्वाबअब नहीं लौटता चाहकरदबे पाँव ख़्वाब जैसे लौट आता थाघोड़ी पर सवार लड़का बनकरअसर कम हो गया है माँ की दुआओं कातभी हत्यारा अपनी भीड़ में पाकर मार डालता हैआग की भाप के बीच राँगे का लेप चढ़ाते क़लईगर कोभीड़ किसी तफ़तीश से पहलेसारे सबूत मिटा चुकी होती हैकई बार मैं जीना चाहता था जिस तरह पेड़ जीते हैंऑक्सीजन की भाप पूरी पृथ्वी पर फैलाते हुए मगरजीने कहाँ दिया जाता है बूँदाबाँदी के बीच गाना गातेभाप तक कहाँ थी औरत की देह पर एक जोड़ी के सिवाजिसको नोचा-खसोटा गया अपनी मिल्कियत समझकरक्या चाँद पर भी पानीपत्थर से टकराकर भाप बनाता होगाजैसे बना लेते हैं प्रेमी जोड़ेएक-दूसरे की साँसों से भापजहाँ पर युद्ध होता होगा लंबावहाँ पर शर्तिया भाप बनती होगीटैंक से छोड़े गए गोला-बारूद कीगोला-बारूद से निकली हुई भापबर्बर होती होगी मेरे राजा की तरहयह सच है एकदम सच हैजैसे कि भाप का बनना सच हैइन दरियाओं के बीच।

Dec 31, 20234 min

Ep 273Kukurmutta Prem | Kanishka

कुकुरमुत्ता प्रेम | कनिष्का गोले के जिस डायामीटर में हम पैदा हुएवहाँ से शुरू हुई कथाएँ तालू से फुली और दंत के बीच फस गईऐसी दंत कथाए ओंघराए हैं मेरे तुम्हारे घर आँगन मेंशब्दों की नसबंदी मेंप्रेम कुकुरमुत्ता हैकही भी उग आता हैसंसार की माँ ने अपने मैल से जन्मा इस कवक कोजो अपनारजक है संसारपर लगे तरकारी और झोर के दाग से सने कपड़ों परधर्म के सरिए में सुरंग बनापंथी लोक को छोड़ते हुएकुकुरमुत्ता प्रेम ढूँढ़ लेता है मरते हुए लोगों कोनौवारी साड़ी की दुल्हन के लेस से छुड़ाए गए कुकुरमुत्तेबरतन धोते धोते साबून बन गएउन्हें लाल रंग के समीप रखाउनसे महावारीआलतासिंदूरके यहाँ वहाँ पड़े छीटों को साफ करनेया घरेलू हिंसा में गुंजल नसों से प्रवाहित खून धोने में लगायाकुकुरमुत्ता ज्यादातर वक्त अबजिजीविषाको घसने और हल्दी में ओंघराने में बिताता रहातो उसका निकाह पढ़ा गया पीले रंग के साथदुल्हिन पीला पहनती है कोहबर मेंहल्दी लगती है देह मेंदहेज की पीले रंग की अलमारी में बंद दुल्हिनउस दिन हुए पिलिया से भी ज़्यादा पीली रहीउसे गर्म रखा जाता है सर्दियों मेंताकि जून तक आते आते पीली आग में झोंकी औरतगर्मी के पीलेपन का शिकार मानी जाएँउसके शैवाल सीने पर उग आता हैममता का आलापजो नहीं समझेगीउस आदमी की नजर माँ के स्तन पर हैतो कटकटाते हुएअपने ब्लाउज़ से निकालती बीड़ीऔर कुछ छुट्टे में रेंगती गंदी नज़रें रख आती है मस्जिद के दानपात्र मेंघर से निकलते ब्रा लेस औरत को ऐसेघूरा जाताजैसे शरीर के समस्त जीवाणु अपनेब्रह्मांड की पराकाष्ठा पर ऊंघते हो एक तवायफ़ के जोगे मेंगगनचुम्बी बादल सी लड़कीसूरज से रौशनी चुरातीथाली में उतरा चाँद पीती थीवो आँसुओं से मुँह क्यों पोंछ रहीजानने वाला ही उसका सच्चा प्रेमी हैजो कुकुरमुत्ते वाला साग बनारोटी बेलते बेलते बेलन बनते हाथ मेंरख देता थोड़ा घीउसे पिघलाने मेंमर्दों के जूता पौलिश सेकाली होती जा रही स्त्रियों कोमंदिर से उखाड़खेतों में जोत दियाया उन्हें बागबानी सिखाई ताकि वह मिट्टी से जुड़ी रहेमिट्टी से गर्म रिश्ता मदद कर सके ज़िन्दा गाड़ने में हर दिनघर साफ सुथरा रहे इसलिए मर्दों ने घर पर रोकाझाड़ू लगाते लगाते सीको में तब्दील होती औरतों कोपर अब लकड़ियाँ काटते-काटते कुल्हाड़ीबनती औरतें सबसे खूबसूरत लगती है वो काटना जानती हैऔरतों पर लिखी गालियाँबुरी नज़रबुरा स्पर्शऔर हम पर पड़ते नाजायज रंगभूख के दिनों में दाल-चावल बनती रही औरतऔर भूखे संसार को परोसती रहीकितना झूठ लिखा हैऔरतों ने भूख को मार डालाभूख घुसपैठिया था वह औरत के साथ चिता पर सोया तोवो चरित्रहीन बन गईभूखी औरत ईश्वर के घर प्रसाद खाती पकड़ी गईउसकी दो जोड़ी आँखें पहिए के नीचे बनारस चल बसीअपने प्रेमी की तलाश मेंतुम बननापहले तत्व में आकाशअगर टीन टप्पर रही तो वायु बननाइस युग का वासुकीतुम्हें सिर चढ़ा शर्म से जल समाधी ले सकता हैक्योंकि तुम औरत होटीन टप्पर को कनिष्ठ पर लाधे देवकी नंदन नहींकोई बहरूपिया परजीवी हैजो तुम्हारी नाभी में उगे फूल तोड़ देगाटीन टप्पर सेअग्निबनो तो भस्म करना कुरीतियाँ और लांछन कोजल इस हद तक बनना कि तैरा जा सके सब की आँखों मेंफिर तुम कितना भी धरती बनना चाहोअंत में हमारी जैसी औरतों को ग्रहण ही कहा जाएगामैं सोचती हूँकुकुरमुत्ता उग आए तेरे समग्र बदन परताकि कटी जीभजमा गले का विशुद्धी चक्र फैलकर सुदर्शन चक्र बनकंठ से निकल उगल सके व्यथा का वृतांतऔर काट देउन रास्तों पर बनी कस्टडी नाम की ईमारत का धड़ जो रोक रहे संतान से मिलने कोइंतजार कर रहा है अनहत चक्र तुम्हारातुम्हारी ज़बान परअपनी ज़बानें तिजोरी से निकालनिकल जाएँगे औरतों के समर्थकज़बान अपने भीमकाय अवतार मेंकाट देगी अत्याचारियों के फनचाट लेगी अपनी बहनों के दुखऔर दांत बढ़कर चबा लेंगे पितृपक्षोंके नाजायज रीति कोजबान की लार एकत्रित करअपच कंधों औरघुटनों को उगल देगीपच जाएगा पेट और पेटों के इतंजार तकपैरएडीहाथ पानी बन जाएँगेबच जाएगी प्राण शक्ति रीढ़ मेंअब नहीं तोड़ सकेगा कोई औरत की रीढ़क्योंकि रीढ़ पर कुकुरमुत्ता उग आया है

Dec 30, 20235 min

Ep 272Lok Jagat Ka Ladka | Devansh Ekant

लोक जगत का लड़का | देवांश एकांतलगभग देहात और लगभग बीहड़ के बीच सेवह लगभग क़स्बा आया थाऔर उसे यह क़स्बालगभग से आगे बढ़पूरा का पूरा शहर लगा थाउसकी आँखों मेंबल्ब का प्रतिबिम्बअसल रोशनी से अधिक जगमगायामेज़ पर रखा कम्प्यूटर देख स्टीव जॉब्सया बिल गेट्स भी इतना उत्साहित न हुए होंगेजितना वह हो गया था न्योछावरशीशे पर अक्षरों और चित्रों को उड़ते देखगाड़ी के इंजन की ध्वनि सुनउसके भीतर की प्रणालियाँ चल पड़तींवह दौड़ता हुआ गेट पर टंग जाताजब तक गाड़ी न जाती, वह भी न जाताऔर समूचे दृश्य मेंवह खुद एक गेट हो जाताजीवन के दो वर्गों के बीचबोली में पत्थर और पहनावे से धूसरउसकी आँखों में अचरज नदी की तरह बहतामिट्टी के मकान से आया वह मिट्टी सा लड़काहवा की नींव में जड़ों सा फैल जाताउसकी हँसी मेंपगडंडियों पर घूमते टायर जैसा असंतुलन थाडंडे की मार से उड़ी गिल्ली सा उच्छल पन थाचाल में नवजात बछड़े सी फुर्ती थीबातों में अमर बेल सी जटिलतागिलहरी सी तेज़ी जवाबों मेंक़िस्सों में देहाती मसखरी थीबूढ़ों की खैनी बीड़ी थीकिशोरों की चुहल थीफसलों की सिंचाई थीत्योहारों के गीत थेसमूचा जगत था आसपासउसके होने सेनहीं था तो वह स्वयं परिणतअपने उस लोक कोअपनी दुनिया की खपरैल से फाँदता आ पहुँचा थाइस दूसरी दुनिया की दहलीज़ तकजाना नही चाहता था वह वापसउसकी विनत आँखें तत्पर थींहर सम्भव कोशिश कोकरा लेते चाहे जो भी कामन भी होते वाजिब दामबस रहना था उसेतथाकथित ‘नगर’ मेंअंतिम दिन उसकी चाल मेंदिखा था अभाव सदियों कामुड़-मुड़ कर देखता रहा वहहाय जो रुक न सका !बेमन लौटी उसकी भंगिमाअब भी है मेरे भीतरदौड़ती कूदती हँसती चिल्लातीकई अबूझ प्रश्न पूछतीफिर कहीं छिप-छिप जाती ।

Dec 29, 20233 min

Ep 271Connaught Place | Vishwanath Prasad Tiwari

कनॉट प्लेस - विश्वनाथ प्रसाद तिवारीलोग ऐसे भाग रहे हैंकि लगता है कुछ ही घंटों मेंखाली हो जायेगा कनॉट प्लेससबको आशा हैकि सबको मिल जाएगी गाड़ीसबको भय हैकि सबकी छूट जाएगी गाड़ीसबके पास माल- असबाब हैवक़्त नहीं है. किसी के पासकिससे कहूँकि मेरे साथ चलोसभी जानते हैं कि अभी गिरने वाला है. एटम बमसभी जानते हैं कि अभी या फिर कभी नहीं मुझे कोई जल्दी नहीं हैखरामे-खरामे पकड़ ही लूँगाअपनी आखिरी बसऔर बस में मिल ही जायेंगेलोगजिन्हें कोई जल्दी नहीं हैमैं जानता हूँ इस ख़ौफ़नाक क्षण मेंबचने का रास्ता मैं भागते लोगों को भी बताना चाहता हूँछिपने का रास्ता अब इसका क्या करूँकि वे लोग अकेले-अकेले बच जाना चाहते हैं

Dec 28, 20232 min

Ep 270Prem Pita Ka Dikhai Nahi Deta | Chandrakant Devtale

प्रेम पिता का दिखाई नहीं देता - चंद्रकांत देवतालेतुम्हारी निश्चल आँखें तारों-सी चमकती हैं मेरे अकेलेपन की रात के आकाश में प्रेम पिता का दिखाई नहीं देता ईथर की तरह होता है ज़रूर दिखाई देती होंगी नसीहतें नुकीले पत्थरों-सी दुनिया भर के पिताओं की लंबी क़तार में पता नहीं कौन-सा कितना करोड़वाँ नंबर है मेरा पर बच्चों के फूलों वाले बग़ीचे की दुनिया में तुम अव्वल हो पहली क़तार में मेरे लिए मुझे माफ़ करना मैं अपनी मूर्खता और प्रेम में समझता था मेरी छाया के तले ही सुरक्षित रंग-बिरंगी दुनिया होगी तुम्हारी अब जब तुम सचमुच की दुनिया में निकल गई हो मैं ख़ुश हूँ सोचकर कि मेरी भाषा के अहाते से परे है तुम्हारी परछाईं।

Dec 27, 20232 min

Ep 269Jagah Ke Paas | Prakash Sahu

जगह के पास | प्रकाश साहूघर का एक कोना होता हैजहाँ कुछ तस्वीरें होती है माने गए ईश्वर कीया बीते हुए मनुष्य कीउसके आसपास कुछ छोटे बड़े रहस्य खुलते रहते हैंवह कोना कभी चौंकता नहींउसी तरह के रहस्यशराबखाने , अस्पताल और घनिष्ट मित्रके पास भी खुलते हैंये जगहें कभी चौंकतीं नहींगुस्सा नहीं दिखातीअपना लेती है हर बात को (तथ्यों की तरह)साहस देती है अपनाने काबालों में उँगलियाँ फिराकर सुलाती हैयह ध्यान रखते हुएकि उसकी उँगलियाँ बालों में फंसे नहींसदा के लिएसोने के बीच में वह रहस्य में से परेशानी का गट्ठर लेकरउन्हें हल करती हैउनके लिए जीने का एक नुक्ता बनाकरहाथ में धरा देती हैअगली सुबह जब उठते हैंहम समझदार हो चुके होते हैंचले जाते हैंनये रहस्य के साथ फिर लौटनेजगह के पास

Dec 26, 20232 min

Ep 268Mere Paas Prem Ke Liye Khalipan Hai, Jagah Nahi | Shraddha Upadhyay

Dec 25, 20232 min

Ep 267Gujarat Nahin Tumhara Zila | Shashwat Upadhyay

गुजरात नहीं तुम्हारा जिला | शाश्वत उपाध्यायदो अलग दुनिया के बीचखटकती- झमकती (लगभग) उपस्थिति कवि की तरफ सेकभी “वारी जावां” की लड़ाई लड़ती हैकभी ‘हासिल’ का चोंगा ओढ़ कर खुद पर इठलाने का बहाना ढूंढ़ती हैनशा और नशेमन को दोष देनेबढ़ते ही हैं पांवकि चुप-चाप ‘जो हो रहा है, होने दो’ के भाव से बीयर की घूंट के साथ पानी हुई जाती है हैसियत।पुल गिरने से लेकर सरकार गिरने तकउसी शहर में माला-फूल-बलात्कारउसी शहर में बिलकिस का तनउसी शहर में हाथ हिलाते जनप्रतिनिधिउसी शहर का मॉडल जिसके छद्म में रचे बसे गए तुम, तुम्हारा बेटा, मेरा भी बेटाएक मिनटउसी शहर से तुम्हारा मतलब गुजरात से तो नहींन दोस्तदिल्ली से दरभंगाऔर सीकर से झुनझुनु और खीरी से मुजफ्फरनगरबलिया-बांका-बुलंदशहर और जोड़ोउसी शहर का मतलब तुम्हारा देस है।देस,ताल्वय श नहीं दंत्य सयहां श शुद्धता के मानक को पार कर गया है लोक के लिए ललायित कवि,देश से देस तक की दूरी उस शहर ने बुलेट रेल की गति से नाप ली है।तुम्हारा जिला भी तैयार बैठा है। अब,दो अलग दुनिया के बीच झमकती- खटकती उपस्थिति लिएबीयर की घूंट के साथ ‘जो हो रहा होने दो’ के भाव सेचाहो तो पानी हो जाओचाहो तो कवि।

Dec 24, 20232 min

Ep 266Samooh Gaan | Dr Sheoraj Singh 'Bechain'

समूह गान | डॉ. श्यौराज सिंह 'बेचैन' नौजवां नया ‘जहाँ’ बनाएँगे।नौजवां नया ‘जहाँ’ बनाएँगे।खुशहाली हर किसी को हो–उजाली हर किसी को हो।जो आसमान की रही–वो रोशनी ज़मीं की हो।हमीं ‘शमाँ’ जलाएँगे-जलाएँगे।नौजवां नया ‘जहाँ’ बनाएँगे।नौजवां नया ’जहाँ’ बनाएँगे।जात-पात की तनाव ऊँच-नीच, भेदभावपेट के सवाल काजो दे नहीं सके जवाबऐसी रहनुमाई अब न चाहेंगे। नौजवां नया ‘जहाँ’ बनाएँगे।ये जो सांप्रदायिकता की आग है–भाल पर दरिद्रता का दाग है।जिसके खून ने वसंत ला दिया–ज़िंदगी उसे ‘ख़िज़ाँ’ का बाग़ है‘यूँ’ कैसे बागवाओं को सराहेंगे।नौजवां नया ‘जहाँ’ बनाएँगे।मर्द-औरतों में फ़र्क है अभी ज़मीं पे बेबसी का नर्क है अभी दहेज़ कोढ़ है अभी समाज में बराबरी कहाँ है इस निज़ाम में कदम हमारे पर न लड़खड़ाएँगे।नौजवां नया ‘जहाँ’ बनाएँगे।जिनके वास्ते, शहादतें हुईं वे सच्चाइयाँ कहावतें हुईं जब भी हो गयी सितम की इन्तहाँ,जानते हैं सब बगावतें हुईं हम भी मिलके मुक्ति-गीत गाएँगेनौजवां नया ‘जहाँ’ बनाएँगे।पी गए आँसुओं के साथ रात।कह नहीं सके थे, दिल की बात रात, हम सुबह के वास्ते ही आए हैं हम सुबह ज़रूर लेके आएँगेनौजवां नया ‘जहाँ’ बनाएँगे।

Dec 23, 20233 min

Ep 265Acche Bacche | Naresh Saxena

अच्छे बच्चे | नरेश सक्सेना कुछ बच्चे बहुत अच्छे होते हैं वे गेंद और ग़ुब्बारे नहीं माँगते मिठाई नहीं माँगते ज़िद नहीं करते और मचलते तो हैं ही नहीं बड़ों का कहना मानते हैं वे छोटों का भी कहना मानते हैं इतने अच्छे होते हैं इतने अच्छे बच्चों की तलाश में रहते हैं हम और मिलते ही उन्हें ले आते हैं घर अक्सर तीस रुपए महीने और खाने पर।

Dec 22, 20231 min

Ep 264Vikshipt | Devansh Ekant

विक्षिप्त | देवांश एकांत उनके पैदा होते हीआदमी-औरत से माँ-पिता बने युगल कीकामनाओं को ज्वर आ गयामेडिकल जाँच में ख़ारिज हुई उनकी परिपक्वताऔर मुक्त कर दिया गया उन्हें आकांक्षाओं सेजैसे बहा दी गयीं हों अस्थियाँ गंगा मेंधीरे से उन्हें पागल कहा गयाऔर तेज़ी से यह शब्द उनकी देह पररोया बन उगने लगाउनमें से कुछ को हँसने का रोग थावे ईश्वर का चुटकुला कहलायेकुछ को दृश्यों के पीछे प्रेत दिखेवे किसी तांत्रिक का परीक्षण बनेवे ताउम्र हँसते रहे, रोते रहेयंत्रणाओं का शिकार होते रहेअपनी देह के निशानों पररात-रात भर चकित रहेकमरों के अंधेरों मेंउजाले को टोहते रहेइलेक्ट्रिक शॉकहाई डोज़ की दवाइयों सेउनकी ऐंठी उँगलियों को देखउनकी माताओं की आँखों मेंमृत सपनों की काई जमा हो गयीजिसपर एक पिता फिसलकर गिरता रहाख़ुद को सम्भालते हुएअक्सर मज़ाक़ मेंउनकी खोपड़ी पर मारी गयी टीपभाग्य द्वारा चलायी गयी लाठी हैउन्हें उपेक्षित करके निकल जानाउनकी बेसर-पैर बातों पर ऊब उठनाफूलों की हत्या हैउनका हवाओं से बातें करनाऔर उसपर किसी का दया दिखानाघट रही कला को महसूस न कर पाने की असमर्थता हैमत बुलाना उन्हें पागलमैं कहता हूँ कभी मत बुलाना !किसी दूसरी दुनिया के संपर्क में डूबते उतरातेजाने कौनसी संरचना में फँसे हैं वोउनके संग हँसनाउनपर मत हँसनाउनकी विषमताओं को समझनाखुद विषम मत बननाउनकी काँपती हथेलियों से बने चित्र मेंकोई पूर्णता ढूँढने से अधिकजीवन में किए गए प्रयासों कीआवश्यक स्थिरता को तलाशनाऔर समझ जाना किचंद्रमा पर जो दाग़ हैवह उनकी पेंसिल से घिसा ग्रैफ़ाइट हैबग़ैर जिसके उस उपग्रह के छाया चित्र मेंछाया सम्भव नही ।

Dec 21, 20233 min

Ep 263Maine Prem Kiya | Abhilash Pranav

मैंने प्रेम किया | अभिलाष प्रणव मैंने प्रेम किया,और चाहा कि आज़ाद ही रहूँ,याने मैंने खुद में और प्रेम में,खुद को चुना,सुविधा चुनी,आजादी चुनी,उसी वक़्त,उसने प्रेम कियाऔर चाहा के उसे बाँध लिया जाए,याने उसने खुद में और प्रेम में,प्रेम को चुना,मुझे चुना,बंधन चुना,अब, जबके हम साथ नहीं हैं,मैं चाहता हूँ के वो बंध जाए,वो आगे बढ़ गयी है,और आजाद है.वो चाहती है के मैं आजाद हो जाऊं,और मैं वहीं हूँ,बंधा हुआ

Dec 20, 20231 min

Ep 262Kavita Ki Hawa | Kanishka

कविता की हवा | कनिष्काजब भीपापड़ तिलौरीचुराछनतेढक के न रखेंतो हवा लगने से खराब हो जातेहवा न लगे इसलिएमेहमानों को परोसे गए बचेबिस्कुटमठरीनमकीननमकपारोंजैसी चीजों को डब्बे मेंबंद करके रखा जाता हैताकि हवा न लगेहवा लगना कभी भीअच्छा नहीं माना गयाहवाएँ एक भुलक्कड़ जलचर हैजो संसार रुपी समुद्र में यहाँ वहाँ किसी से भी जाटकरा उसे अपने गिरोह में मिला लेते हैंपत्थरों को जब हवा लगी तोवह तैरना भूल गएपानी को हवा लगी तो ठहरना भूल गईवैसे ही परिवर्तनीय प्रकृति को हवा लगीतो वह स्थिरता भूल गईनाना को हवा लगी तो वो साँस लेना भूल गएसुगना जब पढ़ने विदेश गईतो घर भूल गईदादी ने कहाउसे हवा लग गई हैजब बबलू को हवा लगीतो वो माँ बाप भूल गयाहवा लगने के क्रम मेंबस जब घर को हवा लगी तोवो कुछ भी नहीं भूलेबस चुपचाप दो हिस्सों मेंएक लकीर के सहारे खड़े रहेमाँ कविता लिखती हैबेहिसाब लिखती हैवो घंटो नल के आगे बैठतीजैसे नल कोई फनकार हैऔर नल से कविता के शब्दबह रहे हैमाँ जब भी किसी काम में देर करतीघरवाले सोचतेकविता गढ़ रही होगीवो सुनाने जाती तोघरवाले कहतेइन सब के लिए उनके पास टाइम नहींशायद इसीलिए क्योंकि माँ नेकविता में एकान्त ढूंढ लिया हैवो इस तरह एकान्त पर पसरेगीके यादों के चमकीले टुकड़े सीने से पिघल जाएंगेफिर गाहे गाहे माँ के पूरे शरीर को कलेजा चूस लेगाउनका कलेजा बढ़ते बढ़तेघरशहरब्रह्मांडऔर इश्वर तक कोनिगल लेगाफिर वोखुदको जान जाएगीऔर ये घरवालों के लिए ख़तरनाक हैअगर ऐसा हुआतो समाज स्त्रियों को ब्लैक होल साबित कर देगाइसलिएबच जाता हैमाँ के लिएआधे चाँद पर रगड़ा नूनऔर एक रोटी के बराबर का पेटउनसे कितना कहाबिन मसाले का पकाओबढती उम्र में ये सब हम नहीं खा सकतेतब भी बूढ़ी माँ अपनी कविताओं को कभीपक रहे सादे भात में मिला देती हैकभी फीकी दाल मेंतो बेस्वाद सी हो सकने वाली खिचड़ी मेंइस तरह कई बारबस कविताओं ने बनाया माँ के पकवानों कोशायद वो नहीं भूली वो ठंडे दिनजब ग़रीबी में मसालों ने नहींबल्कि भूख और तिरस्कार में जन्मी कविताओं नेबचाया रसोई कोउनके परेशान और घबराए हुए स्पंदनहमारे कपड़ोंऔर बाकी सामानो पर लिपटकरऐसे घूरते के जैसे हमने फिर कोई नादानी का फूलउनसे बचकर बालों की बेल पर हल्के से रख दिया होवो कविताओं से रोज चूल्हा नीपतीऔर जलावन के टुकड़ों पर गीत को सजातीउनके गीत अपने हुनर के चर्म परजुदा हुए प्रेमियों को मिला देतेमाँ प्रेम में एक गोताखोर हैआभाव और दुख के दिनों मेंडुबकी मार वो चुन लाती रहीखुदको ढूंढ़ते हुएकच्ची मछलियों वाली प्रेरणाया फिर डुबकी मारपूर्व जन्म की मेरी माँ यशोधरातथागत को सौंपने निकल गईअपना गर्भ जिसमें जन्मों सेपालती जिम्मेदारी मेंवो नहीं ढूंढ पाई थी खुदकोघरवालों को डर हैमाँ के काफ़िर होते जा रहे शब्दफतवे की मज़ार को लाँघ जाएंगेक्योंकि माँ को हवा लगने लगी हैइसलिए थोड़ी न माँ कोगृहस्ती के डिब्बे में बंद किया थामाँ को हवाओं के विपरित रक्खा है ताकिवो यतीम हवाओं को गोद न ले लेवरना किताबों में उनके देवी होने के प्रमाणउन्हें सजीवएक हुनरबाज़ तैराक चिकना पत्थर बना देंगेजिसके कोरे दर्पण में खुदकी परछाई को रचकर माँ खुदकोनिहारती रहेगी किसी जोगन की तरह कल्पों तकमाँ की उम्रशाख की डाल पर चुपचाप सूखकरफिसलने लगती हैउनकी कविताएँ अपनी केंचुली उतारकरटाँग देते हैं हर जगहजहाँ जहाँ माँ कविताएँ भूल जाती हैतो कविताएँ मृत्यु की सुरंग से गुज़र पकोड़े के तेल सेसने कागज़ से बाहर आमाँ की तलाश मेंफस गए तयखाने के जालों मेंतो अलमारी के पीछे बचे कचड़े मेंइनपर भी नहीं तोइक सिरफिरे प्रेमी की कटी कलाई की तरहउखड़ आए दीवारों की पपड़ियों सेआखरी बार पानी दिए गए सूखे पुराने गमले मेंऐसा नहीं है की माँ अच्छी सफाई नहीं जानतीबस उन कोनों से उसी तरह सरक जाती हैजैसे औरतों कोघर और वसीयतों से सरकाया गयाइस बार वो अपने बच्चों के स्थान परअपनी माँ रुपी कविताओं की कोख से निकलउन्हें अलगाववादी घोषित कर देती हैक्योंकि माँ को आशंका हैमाँ को कविताओं की हवा लग गई हैतो इस बार अगर कविताएँउन से टकराई तोडिब्बा खुल जाएगाऔर माँ उड़ जाएगीक्योंकि माँ को हवा लग जाएगी

Dec 19, 20235 min

Ep 261Hidayatein | Babusha Kohli

हिदायतें | बाबुषा कोहलीउस आदमी से सहानुभूति रखना जो ख़राब कविताएँ लिखता है कविता, हर हाल में जिजीविषा का प्रतीक है इसे तुम इस तरह सोचना कि इस ख़तरनाक समय में कमस्कम वह जीना तो चाहता है उस आदमी पर मत हँसना जो दिशाओं को इतना ही जान पाया हो जितना कि मोबाइल स्क्रीन के चार कोने दरअसल, वह इस बात की संभावना है कि किसी ऐसे ग्रह में भी जीवन संभव है जहाँ पानी न हो उस आदमी को शुक्रिया कहना जिसने तुम्हें धक्का मार दिया था तुम औंधे मुँह गिर भी सकते थे लेकिन ज़मीन पर धप्प् से गिरने की बजाय साफ़ सुनाई देती है आसमान पर तुम्हारे पंखों की फड़फड़ाहट उसके पास अपना वक़्त ख़र्च करना जो तुम्हारा इंतज़ार करता हो एक दिन जान तुम जाओगे कि उसके अलावा इस धरती पर किसी को तुम्हारी ज़रूरत नहीं है चाहे कितने ही धब्बे क्यों न हों देह से भी पहले प्रेमी के सामने अपनी आत्मा निर्वस्त्र करना दुनिया को किसी बच्चे की नज़र से देखना आँखें केवल सोने के लिए मत मूँदना नदियों से एक संगीतकार की तरह मिलना बुद्धिजीवी सेना का सामना करने के पहले मौन का कवच पहन लेना बुद्धिमान के पास प्रश्नों के साथ जाना बुद्धू के पास प्यार लेकर जाना बुद्ध के पास नींद में चलते हुए जाना मृत्यु जब आए तो उसे जागते हुए मिलना भीड़ है बाज़ार में चमकीले जीवन का हर यंत्र उपलब्ध है चाक़ू है, चम्मच है, चाभी है चाँदी है, चंदन है, चादर है कितने ही रंगों के धागे हैं चोरी की चिंदी है कम्बख़्त! एक सुई नहीं मिलती जो आत्मा के मांस पर ठक्क्क्क से चुभ जाए अदृश्य के लहू का क़तरा है आँसू दुनिया-जहान में सूखा पड़ा है सुई गुम गई है सो आख़िरी हिदायत कोठरी में गुमी सुई को बाज़ार में मत ढूँढ़ना

Dec 18, 20233 min

Ep 260Purkhon ka Dukh | Madan Kashyap

पुरखों का दुःख - मदन कश्यप दादा की एक पेटी पड़ी थी टीन की उसमें ढेर सारे काग़ज़ात के बीच जरी वाली एक टोपी भी थीज़र-ज़मीन के दस्तावेज़बँटवारे की लादाबियाँ...उनकी लिखावट अच्छी थी अपने ज़माने के ख़ासे पढ़े-लिखे थे दादा तभी तो कैथी नहीं नागरी में लिखते थेउनमें कोई भी दस्तावेज़ नहीं था दुख का दादा ने अपनी पीड़ाओं को कहीं भी दर्ज नहीं किया था उनके ऐश्वर्य की कुछ कथाएँ ज़रूर सुनाती थी दादी कि कैसे टोपी पहनकर हाथ में छड़ी लेकर निकलते थे गाँव में दादालेकिन दादी ने कभी नहीं बताया कि भादों में जब झड़ी लगती थी बरसात की और कोठी के पेंदे में केवल कुछ भूसा बचा रह जाता थातब पेट का दोज़ख भरने के लिए अन्न कैसे जुटाते थे दादानदी और चौर-चाँचर से घिरे इस गाँव में अभी मेरे बचपन तक तो घुस आता था गंडक का पानी फिर दादा के बचपन में कैसा रहा होगा यह गाँव कैसी रही होगी यह नदी सदानीरा कभी जिसको पार करने से ही बदल गयी थी संस्कृति सभ्यता ने पा लिया था अपना नया अर्थऔर कुछ भी तो दर्ज नहीं है कहीं फ़क़त कुछ महिमागानों के सिवा हम महान ज्ञात्रिक कुल के वंशज हैं हम ने ही बनाया था वैशाली का जनतंत्र कोई तीन हज़ार वर्षों से बसे हैं हम इस सदानीरा शालिग्रामी नारायणी के तट पर लेकिन यह किसी ने नहीं बताया है कि बाढ़ और वर्षा की दया पर टिकी छोटी जोत की खेती से कैसे गुज़ारा होता था पुरखों का क्या स्त्रियों और बेटियों को मिल पाता था भरपेट खानाबचपन में बीमार रहने वाले मेरे पिता बहुत पढ़-लिख भी नहीं पाये थे वे तो जनम से ही चुप्पा थे हर समय अपने सीने में नफ़रत और प्रतिहिंसा की आग धधकाये रहते थे और जो कभी भभूका उठता थातो पूरा घर झुलस जाता थाउनकी पीड़ा थी कोशी की तरह प्रचंड बेगवतीजिसे भाषा में बाँधने की कभी कोशिश नहीं की उन्होंनेमैंने माँ की आँखों और पिता की चुप्पी मेंमहसूस किया था जिस दुख कोअचानक उसे अपने रक्त में बहते हुए पायाकिसी भी अन्य नदी से ज़्यादा प्राचीन है वेदना की नदीजो समय की दिशा में बहती हैपी़ढी-दर-पी़ढी पुश्त-दर-पुश्त!दुख का कारण और निदान ढूँढ़ने ही तो निकले थे बुद्धवे तो मर-खप ही जाते ढोंगेश्वर की गुफाओं मेंकि उनके दुख को करुणा में बदल दियासुजाता की खीर ने!

Dec 17, 20234 min

Ep 259Pita Ke Shraadh Par | Ajay Jugran

पिता के श्राद्ध पर | अजेय जुगरानहम कान लगाए बैठे हैं लगता है अभी आवाज़ देंगे लेकिन नहीं, वो हैं ही नहीं ।मस्तिष्क पर आघात से पहले वे पूर्णतः आत्मनिर्भर थे या यूँ कहें केवल अम्मा पर निर्भर थे ।हमसे कभी कुछ माँगा ही नहीं केवल ताश, शतरंज या कैरम खेलने का साथ छोड़ ।उसके बाद उनकी आखें बोलने लगीं और जब तक वो जिंदा थे तब तक हम उन्हें पढ़ मददगार साक्षी रहे बने उनके लिए टीवी लगाकर उनके कमरे से आते जातेहाल चाल पूछ उनका तकिया, बिस्तर, दवा, पानी ठीक कर उनके जूते चप्पल टोपी छड़ी सीधे कर हम फिर अपने कामों में व्यस्त उनकी पहले से मीठी और आघात से क्षीण हुई आवाज़ कोतब तक न सुन पाते जब तक वो झल्ला के हमें डाँट न देते अपनी खोई ताक़त खोजते क्षणिक गुस्से में जिसके बाद जो हमसे अनसुना हुआ होता अम्मा उनका हाव भाव देख उसका अनुवाद करतीं और हम वह सब चुपचाप करते, उससे थोड़ा ज़्यादा ही ।लेकिन अब जब वो हैं नहीं हम कान लगाए बैठे हैं दिल चाहता है वो आवाज़ दें लेकिन नहीं, वो हैं ही नहीं ।अब वो न्यायाधीश हैं और हम तरसते हैं उनकी कोमल डाँट के आशीर्वाद को जो वो अब दंडस्वरूप लगाते ही नहीं । हम कान लगाए बैठे हैं लेकिन अब वो बस पूजा से झाँकते भर हैं इक शांत मुस्कान लिए माथे तिलक लगी तस्वीर से ।

Dec 16, 20232 min

Ep 258Thand Mein Gauraiyya | Kedarnath Singh

ठंड में गौरैया | केदारनाथ सिंहठंड पर लिखी जाने वाली इस कविता में यह गौरैया कहाँ से आ गई सबसे पहले?भला वह क्यों नहीं जो चला जा रहा है सड़क पर अपने कोट का कॉलर ठीक करता हुआ? क्यों नहीं वह स्त्री जो तार पर जल्दी-जल्दी फैला रही है अपने स्वेटर? वह धुनिया क्यों नहीं जो चला जा रहा है गली में रुई के रेशों कोआवाज़ देता हुआ?क्यों आख़िर क्यों कविता के शुरू में वही गौरैया छज्जे पर बैठी हुई जिसे बरसों पहले मैंने कहाँ देखा था याद नहींमौसम की पहली सिहरन! और देखता हूँअस्त-व्यस्त हो गया है सारा शहर और सिर्फ़ वह गौरैया है जो मेरी भाषा की स्मृति में वहाँ ठीक उसी तरह बैठी है और ख़ूब चहचहा रही है वह चहचहा रही है क्योंकि वह ठंड को जानती है जैसे जानती है वह अपनी गर्दन के पास भूरे-भूरे रोओं को वह जानती है कि वह जिस तरफ़ जाएगी उसी तरफ़ उड़कर चली जाएगी ठंड भी क्योंकि ठंड और गौरैया दोनों का बहुत कुछ है बहुत कुछ साझा और बेहद मूल्यवान जो इस समय लगा है दाँव पर...

Dec 15, 20232 min

Ep 257Selfi | Anamika

सेल्फी | अनामिका माएरी मैं तो गोविंद लीनों मौलचित्तौड़ के एक लिपे-पुते दालान में मुझे मिल गई मीरा बाई गोविंद को तौलतीं एक विराट से तराज़ू पर जो है आदमी का मन डोलता ही रहता है हमेशा और कभी एकाद पल संतुलित होकरफिर से झुक जाता है एक तरफ बेचारगी मेंमीराबाई को मगन देखकर मेरे मन में यह अचानक जगा कि मैं सेल्फ़ी लूँइधर मेरे बच्चों ने मुझे एक मोबाइल दी थी और सिखाया था मनोयोग से कि कैसे लेते हैं सेल्फ़ीलेकिन यह गुर मैंने कभी आजमाया नहीं था क्योंकि मेरे पल्ले बात ही नहीं पड़ती थी कि सेल्फ का दायरा इतना टुन्ना मुन्ना भी हो सकता हैजो एक क्लिक में समा जाएखुद फ़रीद बाबा कबीर और मीरा नेमुझको सिखाया था यही सदा कि आदमी के विराट सेल्फ में पूरा ब्रह्मांड है समाया एक साथ इसमें समाए हैं बूंद और समुद्र, पहाड़ और चींटीयह दुनिया वह दुनिया जंगल की वीथियाँसूरज चंदा यह उनचास पवन बादल-बिजली, माटी, आकाश, पानी, गगन एक क्लिक में सब समाएगा कैसेसुनी सुनाई बात भी इसको मानें अगर इतना तो आखिर देखी है न कि मेरा यह वजूद खासा छितराइन छरिया और घनचक्कर हैइतनी जल्दी वह पकड़ में नहीं आएगा मैं जन्मों से एक धुनिया हूँ धुनती ही रहती हूँ नाकमेरे वजूद की कोठरिया में दुविधाएँ फैली हैंधुनी हुई रुई की तरहनीरस, बेरंग, विपुल विस्तार धुनी हुई रूई का, यही है मेरा वजूद एक तो समाएगा नहीं एक क्लिक में फिर इसमें ऐसा क्या है आँकने लायक यही सब समझाती खुद को रही और कभी खीचीं नहीं सेल्फ़ी लेकिन उस दिन जब दिखीं मीराबाई तो मुझको सूझा मैं ले ही लूँमीराबाई के संग अपनी भी सेल्फ़ीमैं उनसे सट कर खड़ी हो गई कंधे पर मैंने झुकाया ज़रामा था पर जब दुलार से छुआ मुझको मीरा ने मैं तो बस भूल ही गई कि क्या करने मैं यहाँ आई थी सदियों के मेरी थकान मुआवज़ा माँगने आ गईऔर मैं सो ही गई उनके कंधे पर सेल्फ़ी वेल्फ़ी भूलकर

Dec 14, 20234 min

Ep 256Ma Ki Aankhen | Shrikant Verma

माँ की आँखें | श्रीकांत वर्मा मेरी माँ की डबडब आँखें मुझे देखती हैं यों जलती फ़सलें, कटती शाखें। मेरी माँ की किसान आँखें! मेरी माँ की खोई आँखें मुझे देखती हैं यों शाम गिरे नगरों को फैलाकर पाँखें। मेरी माँ की उदास आँखें।

Dec 13, 20231 min

Ep 255Aage Badhenge | Ali Sardar Jafri

आगे बढ़ेंगे | अली सरदार जाफ़री | आरती जैनवो बिजली-सी चमकी, वो टूटा सितारा,वो शोला-सा लपका, वो तड़पा शरारा,जुनूने-बग़ावत ने दिल को उभारा,बढ़ेंगे, अभी और आगे बढ़ेंगे!गरजती हैं तोपें, गरजने दो इनकोदुहुल बज रहे हैं, तो बजने दो इनको,जो हथियार सजते हैं, सजने दो इनकोबढ़ेंगे, अभी और आगे बढ़ेंगे!कुदालों के फल, दोस्तों, तेज़ कर लो,मुहब्बत के साग़र को लबरेज़ कर लो,ज़रा और हिम्मत को महमेज़ कर लो,बढ़ेंगे, अभी और आगे बढ़ेंगे!विज़ारत की मंज़िल हमारी नहीं है,ये आंधी है, बादे-बहारी नहीं है,जिरह हमने तन से उतारी नहीं है,बढ़ेंगे, अभी और आगे बढ़ेंगे!हुकूमत के पिंदार को तोड़ना है,असीरो-गिरफ़्तार को छोड़ना है,जमाने की रफ्तार को मोड़ना है,बढ़ेंगे, अभी और आगे बढ़ेंगे!चट्टानों में राहें बनानी पड़ेंगी,अभी कितनी कड़ियां उठानी पड़ेंगी,हज़ारों कमानें झुकानी पड़ेंगी,बढ़ेंगे, अभी और आगे बढ़ेंगे!हदें हो चुकीं ख़त्म बीमो-रजा की,मुसाफ़त से अब अज़्मे-सब्रआज़मां की,ज़माने के माथे पे है ताबनाकी,बढ़ेंगे, अभी और आगे बढ़ेंगे!उफ़क़ के किनारे हुए हैं गुलाबी,सहर की निगाहों में हैं बर्क़ताबी,क़दम चूमने आई है कामयाबी,बढ़ेंगे, अभी और आगे बढ़ेंगे!मसाइब की दुनिया को पामाल करके,जवानी के शोलों में तप के, निखर के,ज़रा नज़्मे-गीती से ऊंचे उभर के,बढ़ेंगे, अभी और आगे बढ़ेंगे!महकते हुए मर्ग़ज़ारों से आगे,लचकते हुए आबशारों से आगे,बहिश्ते-बरीं की बहारों से आगे,बढ़ेंगे, अभी और आगे बढ़ेंगे!

Dec 12, 20232 min

Ep 254Kavita Ka Janam | Ramdarash Mishra

कविता का जन्म | रामदरश मिश्र | कार्तिकेय खेतरपालआजकल सोते-सोते जागता हूँ जागते-जागते सोता हूँ कहीं हो कर भी वहाँ नहीं होता हूँ वाचाल भाषा गर्भिणी युवती की तरह अपनी ही आभा के भार से भर जाती है आँखें दृश्यों से होकर हो जाती हैं दृश्यों के पार टूटे हुए रास्तों में जुड़ जाता है संवाद अपने ही भीतर कुछ खोया हुआ आता है याद चारों ओर के अवकाशों में कुछ थर्राने लगता है सन्नाटा भी धीरे-धीरे गाने लगता है मैं भूल जाता हूँ– अपना नाम, ग्राम और वल्दियत और रह जाता हूँहवा में खोयी ख़ुशबू की तरह आदमी की पहचान आँधी के ख़िलाफ छोटे-छोटे पौधे तन जाते हैं मार खायी आँखों के आँसुओं में धीरे-धीरे आग के चित्र बन जाते हैं क्या मेरे भीतर किसी कविता का जन्म हो रहा है?

Dec 11, 20232 min

Ep 253Ab Main Suraj Ko Nahi Doobne Dungi | Sarveshwar Dayal Saxena

अब मैं सूरज को नहीं डूबने दूंगा | सर्वेश्वरदयाल सक्सेनाअब मैं सूरज को नहीं डूबने दूंगा।देखो मैंने कंधे चौड़े कर लिये हैंमुट्ठियाँ मजबूत कर ली हैंऔर ढलान पर एड़ियाँ जमाकरखड़ा होना मैंने सीख लिया है।घबराओ मतमैं क्षितिज पर जा रहा हूँ।सूरज ठीक जब पहाडी से लुढ़कने लगेगामैं कंधे अड़ा दूंगादेखना वह वहीं ठहरा होगा।अब मैं सूरज को नही डूबने दूँगा।मैंने सुना है उसके रथ में तुम होतुम्हें मैं उतार लाना चाहता हूंतुम जो स्वाधीनता की प्रतिमा होतुम जो साहस की मूर्ति होतुम जो धरती का सुख होतुम जो कालातीत प्यार होतुम जो मेरी धमनी का प्रवाह होतुम जो मेरी चेतना का विस्तार होतुम्हें मैं उस रथ से उतार लाना चाहता हूं।रथ के घोड़ेआग उगलते रहेंअब पहिये टस से मस नही होंगेमैंने अपने कंधे चौड़े कर लिये है।कौन रोकेगा तुम्हेंमैंने धरती बड़ी कर ली हैअन्न की सुनहरी बालियों सेमैं तुम्हें सजाऊँगामैंने सीना खोल लिया हैप्यार के गीतो में मैं तुम्हे गाऊँगामैंने दृष्टि बड़ी कर ली हैहर आँखों में तुम्हें सपनों सा फहराऊँगा।सूरज जायेगा भी तो कहाँउसे यहीं रहना होगायहीं हमारी सांसों मेंहमारी रगों मेंहमारे संकल्पों मेंहमारे रतजगों मेंतुम उदास मत होओअब मैं किसी भी सूरज कोनही डूबने दूंगा।

Dec 10, 20232 min

Ep 252Billiyaan | Rajesh Joshi

बिल्लियाँ - राजेश जोशी मन के एक टुकड़े से चांद बनाया गयाऔर दूसरे से बिल्लियाँमन की ही तरह उनके भी हिस्से में आया भटकनाअव्वल तो वे पालतू बनती नहीं और बन जाएंतो भरोसे के लायक नहीं होतींउनके पांव की आवाज़ नहीं होतीहरी चालाकी से बनाई गयीं उनकी आंखेंअंधेरे में चमकती हैंचांद के भ्रम में वो भगोनी में रखा दूध पी जाती हैंमन के एक हिस्से से चांद बनाया गयाऔर दूसरे से बिल्लियाँचांद के हिस्से में अमरता आईऔर बिल्लियों के हिस्से में मृत्युइसलिए चांद से गप्प लड़ाते कवि काउन्होंने अक्सर रास्ता काटाइस तरह कविता में संशय का जन्म हुआवो अपने सद्य: जात बच्चे को अपने दांतों के बीचइतने हौले से पकड़कर एक जगह सेदूसरी जगह ले जाती हैंकवि को जैसे भाषा को बरतने का सूत्रसमझा रही हों।

Dec 9, 20232 min

Ep 251Ma Hai Resham Ke Kaarkhane Mein | Ali Sardar Jafri

मां है रेशम के कारखाने में | अली सरदार जाफ़रीमां है रेशम के कारखाने मेंबाप मसरूफ सूती मिल में हैकोख से मां की जब से निकला हैबच्चा खोली के काले दिल में हैजब यहाँ से निकल के जाएगाकारखानों के काम आयेगाअपने मजबूर पेट की खातिरभूक सरमाये की बढ़ाएगाहाथ सोने के फूल उगलेंगेजिस्म चांदी का धन लुटाएगाखिड़कियाँ होंगी बैंक की रौशनखून इसका दिए जलायेगायह जो नन्हा है भोला भाला हैखूनीं सरमाये का निवाला हैपूछती है यह इसकी खामोशीकोई मुझको बचाने वाला है!

Dec 8, 20231 min

Ep 250Peeche Se | Arun Kamal

पीछे से | अरुण कमल कितना साफ़ आकाश है पानी से पोंछा हुआ दूर ऊपर उठा उठता जाता नील बादलों के तबक कहीं-कहीं और इतने पंछी उठ रहे झुक रहे हवा बस इतनी कि भरी है सब जगह और एक चिड़िया वहाँ अकेली छोटी ठहरी हुई ज़िंदगी की छींटकितना सुन्दर है संसार दिन के दो बजे मनोहर शान्त और यह सब मैं देख रहा हूँ गुलेल के पीछे से।

Dec 7, 20231 min

Ep 249Chunaav | Anamika

चुनाव - अनामिकाअपनी चपलता मुद्राओं में भी नर्तकसम तो नहीं भूलतापहीया नहीं भूलता अपना धूरातू काहे भूल गई अनामिकातू कौन है याद रखशास्त्रों ने कहातू-तू मैं-मैं करती दुनिया ने उंगली उठाईआखिर तू है कौन किस खेत की मूलीमैं तो घबरा ही गईघबराकर सोचाइस विषम जीवन में मेरा सम कौन भलानाम तक कि कोई चौहत दीतो मुझको मिली नहींयों ही पुकारा कि कर किये लोग अनामिकाएक अकेला शब्द अनामिकाआगे नाथ न पीछे पगहपापा ने तो नाम रखते हुए की होगी यह कल्पनाकि नाम रूप के झमेले बांधे नहीं मुझकोऔर मैं अगाध ही रहूँआध्या जैसीघूमूँ-फिरूँ जग में बन कर जगतधात्रि जगत माताचाहती हूँ कि साकार करूं बेचारे पापा की कल्पनाऔर भूल जाऊँ घेरे बंदियाँलेकिन हर पग पर हैं बाड़ेअजकजा जाती हूँ जब पानी पूछते हुएलोग पूछ लेते हैं आज तलक आप लोग होते हैं कौनरह जाती हूँ मौनअपनी जड़ें टटोलतीपर मज़े की बात यह हैकि एक ख़ुफ़िया कार्रवाईएकदम से शुरू हो जाती है तब से ही मेरे उद्गम स्रोतों कीऔर ताड़ से गिरकर सीधा खजूर पर अटकती हूँजब मेरी जाती के लोगझाड़ देते हैं रहस्यवाद मेराऔर मिलाकर हाथ कहते हैं ऐन चुनाव की घड़ीहम एक ही तो हैं मैडमएक कुल गोत्र है हमाराअब की चुनाव में खड़ा हूँआपके भरोसे मत याद रख भूल जागाता है जोगीसारंगी परमुस्का कर बढ़ जाती हूँ आगे

Dec 6, 20234 min

Ep 248Cornice Par | Kunwar Narayan

कार्निस पर -कुँवर नारायण कार्निस परएक नटखट किरण बच्चे-सीखड़ी जंगला पकड़ कर,किलकती है “मुझे देखो!”साँस रोकेबांह फैलाए खड़ा गुलमुहर...कब वह कूद कर आ जाए उसकी गोद में!

Dec 5, 20231 min

Ep 247Ma Ka Ashirwaad | Ajay Jugran

माँ का आशीर्वाद | अजेय जुगरानदोनों छोर पर ऊपर - नीचीढलान और घुमाव लिएबीच में कुछ सीधी सपाट सड़कऔर उस पर चलती मेरी माँदेने को लिए अनेकों आशीर्वाद।हर परिचित - अपरिचितबच्चे के नमस्ते - प्रणाम परचाहे वो कितना ही सांकेतिकपास या दूर से हो“खुश रहो। जीते रहो।”स्थिर होकर सही दिशा में बोलतीमानो निश्चित करना चाहती होकि नज़र मिला आँखों सेदिल में उतार दे अपना आशीर्वाद।इसके चलते कालोनी के बच्चों नेमाँ का परिचय रखा वो आँटी जो देती हैं“खुश रहो। जीते रहो।” का आशीर्वाद।

Dec 4, 20231 min

Ep 246Kavita | Kunwar Narayan

कविता | कुँवर नारायणकविता वक्तव्य नहीं गवाह है कभी हमारे सामने कभी हमसे पहले कभी हमारे बादकोई चाहे भी तो रोक नहीं सकता भाषा में उसका बयान जिसका पूरा मतलब है सचाई जिसकी पूरी कोशिश है बेहतर इन्सानउसे कोई हड़बड़ी नहीं कि वह इश्तहारों की तरह चिपके जुलूसों की तरह निकले नारों की तरह लगे और चुनावों की तरह जीतेवह आदमी की भाषा में कहीं किसी तरह ज़िंदा रहे, बस।

Dec 3, 20231 min

Ep 245Choti Choti Icchayein | Badri Narayan

छोटी-छोटी इच्छाएँ | बद्री नारायण मैं रात-दिन स्मरण करता हूँ अपनी उन छोटी इच्छाओं का जो पूरी हो गईं धीरे-धीरे जिन छोटी-छोटी इच्छाओं के चक्कर में अपनी बड़ी इच्छाओं से किनारा किया धिक्कार है मुझे कि मेरी धरी की धरी रह गई पहाड़ तोड़ने की इच्छा! काग़ज़ की नाव बनाकर मान लिया कि पूरी कर ली बड़ी-बड़ी लहरों से भरे समुद्र लांघने की इच्छा कुछ कविता लिखकर मैंने साध ली है प्रतिरोध करने की इच्छा धिक्कार है मुझे मेरी छोटी इच्छाओं को और उन्हें पूरा करने वालों को।

Dec 2, 20231 min

Ep 244Pustakein | Vishwanath Prasad Tiwari

पुस्तकें | विश्वनाथ प्रसाद तिवारीनहीं, इस कमरे में नहीं उधर उस सीढ़ी के नीचे उस गैरेज के कोने में ले जाओपुस्तकें वहाँ नहीं, जहाँ अँट सकती फ्रिज जहाँ नहीं लग सकता आदमकद शीशाबोरी में बाँधकर चट्टी से ढककर कुछ तख्ते के नीचे कुछ फूटे गमलों के ऊपर रख दो पुस्तकेंले जाओ इन्हें तक्षशिला-विक्रमशिला या चाहे जहाँ हमें उत्तराधिकार में नहीं चाहिए पुस्तकें कोई झपटेगा पासबुक पर कोई ढूँढ़ेगा लॉकर की चाभी किसी की आँखों में चमकेंगे खेत किसी में गड़े हुए सिक्के हाय-हाय, समय बूढ़ी दादी-सी उदास हो जाएँगी पुस्तकेंपुस्तकों !जहाँ भी रख दें वे पड़ी रहना इंतजार मेंआएगा कोई न कोई दिग्भ्रमित बालक ज़रूर किसी शताब्दी में अँधेरे में टटोलता अपनी राहस्पर्श से पहचान लेना उसे आहिस्ते-आहिस्ते खोलना अपना हृदयजिसमें सोया है अनंत समय और थका हुआ सत्य दबा हुआ गुस्सा और गूँगा प्यार दुश्मनों के जासूस पकड़ नहीं सके जिसे ।

Dec 1, 20232 min