
Pratidin Ek Kavita
1,141 episodes — Page 20 of 23

Ep 193Desh Kagaz Par Bana Naksha Nahi Hota | Sarveshwar Dayal Saxena
देश कागज़ पर बना नक्शा नहीं होता | सर्वेश्वरदयाल सक्सेना यदि तुम्हारे घर केएक कमरे में आग लगी होतो क्या तुमदूसरे कमरे में सो सकते हो?यदि तुम्हारे घर के एक कमरे मेंलाशें सड़ रहीं होंतो क्या तुमदूसरे कमरे में प्रार्थना कर सकते हो?यदि हाँतो मुझे तुम सेकुछ नहीं कहना है।देश कागज़ पर बनानक़्शा नहीं होताकि एक हिस्से के फट जाने परबाकी हिस्से उसी तरह साबुत बने रहेंऔर नदियां, पर्वत, शहर, गांववैसे ही अपनी-अपनी जगह दिखेंअनमने रहें।यदि तुम यह नहीं मानतेतो मुझे तुम्हारे साथनहीं रहना है।इस दुनिया में आदमी की जान से बड़ाकुछ भी नहीं हैन ईश्वरन ज्ञानन चुनावकागज़ पर लिखी कोई भी इबारतफाड़ी जा सकती हैऔर ज़मीन की सात परतों के भीतरगाड़ी जा सकती है।जो विवेकखड़ा हो लाशों को टेकवह अंधा हैजो शासनचल रहा हो बंदूक की नली सेहत्यारों का धंधा हैयदि तुम यह नहीं मानतेतो मुझेअब एक क्षण भीतुम्हें नहीं सहना है।याद रखोएक बच्चे की हत्याएक औरत की मौतएक आदमी कागोलियों से चिथड़ा तनकिसी शासन का ही नहींसम्पूर्ण राष्ट्र का है पतन।ऐसा खून बहकरधरती में जज़्ब नहीं होताआकाश में फहराते झंडों कोकाला करता है।जिस धरती परफ़ौजी बूटों के निशान होंऔर उन परलाशें गिर रही होंवह धरतीयदि तुम्हारे ख़ून मेंआग बन कर नहीं दौड़तीतो समझ लोतुम बंजर हो गये हो-तुम्हें यहां सांस लेने तक का नहीं है अधिकारतुम्हारे लिए नहीं रहा अब यह संसार।आखिरी बातबिल्कुल साफकिसी हत्यारे कोकभी मत करो माफचाहे हो वह तुम्हारा यारधर्म का ठेकेदार,चाहे लोकतंत्र कास्वनामधन्य पहरेदार।

Ep 192Sweekaar | Vishnu Khare
स्वीकार | विष्णु खरेआप जो सोच रहे हैं वही सही है मैं जो सोचना चाहता हूँ वह ग़लत है सामने से आपका सर्वसम्मत व्यवस्थाएँ देना सही है पिछली क़तारों में जो मेरी छिछोरी 'क्यों' है वह ग़लत है मेरी वजह से आपको असुविधा है यह सही है हर खेल बिगाड़ने की मेरी ग़ैरज़िम्मेदार हरकत ग़लत है अँधियारी गोल मेज़ के सामने मुझे पेश किया जाना सही है रोशनी में चेहरे देखने की मेरी दरख़्वास्त ग़लत है आपने जो सज़ा तज़वीज़ की है सही है मेरा यह इक़बाल भी चूँकि चालाकी भरा है ग़लत है आपने जो किया है वह मानवीय प्रबंध सही है दीवार की ओर पीठ करने का मेरा ही तरीक़ा ग़लत है उन्हें इशारे के पहले मेरी एक ख़्वाहिश की मंज़ूरी सही है मैंने जो इस वक़्त भी हँस लेना चाहा है ग़लत है

Ep 191Beej | Kumar Ambuj
बीज | कुमार अंबुज जो पराजित है वह धन है संसार कायह हवा बहेगीएक हारे हुए का जीवन सँभालने के लिए हीजो जानती है कि पराजित होना ज़िंदगी से बाहर होना नहींदाख़िल होना है एक विशाल दुनिया मेंज़िंदगी में दाख़िल हो गए इस व्यक्ति कोईर्ष्या और प्रशंसा और अचरज सेदेखता है जीवन से बाहर खड़ा आदमीवह समझ ही नहीं पाता है कि वह तोफ्रेम से बाहर खड़ा हुआ प्रेक्षक है एकजो पराजित है और टूट नहीं गया हैवहनए संसार के होने के लिएएक नया बीज है!

Ep 190Darshan | Ajanta Dev
दर्शन | अजंता देव मुझे कभी नहीं दीखताअपना असली चेहरावह चेहराजो दूसरे देखते हैं।मुझे हर बार सहारा लेना पड़ता हैआईने काऔर जब आईने के सामने होती हूँतब मेरा चेहरा होता हैतनावरहितख़ुशमिज़ाजप्रसाधनों से दमकतामुझे कभी पता नहीं चलेगाग़ुस्से और नफ़रत से जलती आँखों कानींद में ढलके होठों काखाते समय फूलते-पिचकते गालों काप्रियजनों के बीच छलकते अनुराग काबहुत पहलेमेरे जन्म परलोगों ने देखा था मेरा चेहरा पहली बारऐसे ही किसी दिनरुख़्सती होगी पृथ्वी से तब भीशोकगीतों के बीचलोग ही करेंगे मेरा अंतिम दर्शन

Ep 189Char Kauwe | Bhawani Prasad Mishra
चार कौए | भवानी प्रसाद मिश्रबहुत नहीं थे सिर्फ चार कौए थे कालेउन्होंने यह तय किया कि सारे उड़ने वालेउनके ढंग से उड़ें, रुकें, खायें और गायेंवे जिसको त्योहार कहें सब उसे मनायें।कभी-कभी जादू हो जाता है दुनिया मेंदुनिया भर के गुण दिखते हैं औगुनिया मेंये औगुनिए चार बड़े सरताज हो गयेइनके नौकर चील, गरूड़ और बाज़ हो गये।हंस मोर चातक गौरैयें किस गिनती मेंहाथ बांधकर खडे़ हो गए सब विनती मेंहुक्म हुआ, चातक पंछी रट नहीं लगायेंपिऊ-पिऊ को छोड़ें कौए-कौए गायॆं ।बीस तरह के काम दे दिए गौरैयों कोखाना-पीना मौज उड़ाना छुटभैयों कोकौओं की ऐसी बन आयी पांचों घी मेंबड़े-बड़े मनसूबे आये उनके जी मेंउड़ने तक के नियम बदल कर ऐसे ढालेउड़ने वाले सिर्फ रह गये बैठे ठाले ।आगे क्या कुछ हुआ सुनाना बहुत कठिन हैयह दिन कवि का नहीं चार कौओं का दिन हैउत्सुकता जग जाये तो मेरे घर आ जानालंबा किस्सा थोड़े में किस तरह सुनाना।

Ep 188Rai Ka Daana | Monika Kumar
राई का दाना | मोनिका कुमार उपेक्षा अस्तित्व के किसी अमूर्त हिस्से पर नहीं सीधा दिल पर आघात करती है। हर बार की दुत्कार से हमारा दिल थोड़ा सिकुड़ जाता है। एक दिन यह सिकुड़ कर इतना छोटा हो जाता है जैसे राई का दाना, राई का दाना इतना छोटा होता है जैसे है ही नहीं, लिहाज़ा चम्मच भर डालने की सलाह देती हैं चाचियाँ जिन्होंने सदियों पहले समझ लिया था उपेक्षा से मिले दुःख अपनी जगह और अरहर की दाल का स्वाद अपनी जगह है। प्रणय-प्रस्ताव के प्रत्युत्तर में तुम्हें देने के लिए मेरे पास राई के दाने जितना दिल है, यह तुम देखो इतना छोटा दिल अगर ठीक होगा प्रेम के लिए।

Ep 187Pinjre | Samriddhi Manchanda
पिंजरे | समृद्धि मनचंदाओ पगली लड़की! तुम पिंजरे की नहीं जंगलों की हो स्थिरता नहीं उत्पात चुनो अपनी माँओं को जन्म दो बेटियों को रीढ़ कोई पर्यावरणविद् कभी नहीं बताएगा कि एक ज़िद्दी लड़की दुनिया का सबसे लुप्तप्राय जीव है।

Ep 186Gussa | Mamta Kalia
गुस्सा | ममता कालिया उसने हैरानी से मुझे देखा'मैं तो मज़ाक कर रहा थातुम इतनी नाराज़ क्यों हो गयीं ?'मैं उसे कैसे बतातीयह गुस्सा आज और अभी का नहींइसमें बहुत सा पुराना गुस्सा भी शामिल हैएक सन तिरासी का एक तिरानवे काएक दो हज़ार दो काऔर एक यह आज का

Ep 185Phagun | Anju Ranjan
फाल्गुन | अंजु रंजनएक अलस दुपहरी मेंउस दुपहरी को खोजती हूँकच्ची अमिया और सितुवाँ को पत्थर पर घिसती हूँमलमल के दुपट्टे से रिसते-पिघलते कच्चे चटपटे कचूमर को चखती हूँ कभी चटखारे लेकर आँखें मींचकर अमचूर चुराती हूँ उसी दुपहरी में पीले सरसों में छिपकरकच्चे, कोमल चने और मटर खाना चाहती हूँसरसराती हवाओं में पकते गुड़ कीभीली की मीठी सुगंध कोसाँस खींचकर ढूँढ़ती हूँ।बसंत तो आ गया पर वे सौगातें कहाँ! इस अलस दुपहर में उन चीनों को खोजती हूँउस टेसू भरे फागुन में रंगना चाहती हूँ।सौहार्द, ठहाके, गुलाल, भाँग, मालपुए,गुजिया और पकवान वाली होली में डूबी अपने देश को इस दुपहरी बहुत याद करती हूँ।

Ep 184Kaisa Sant Humara | Sagar Nizami
कैसा संत हमारा | साग़र निज़ामी कैसा संत हमारागांधीकैसा संत हमारादुनिया गो थी दुश्मन उसकी दुश्मन था जग सारा आख़िर में जब देखा साधो वह जीता जग हारा कैसा संत हमारागांधीकैसा संत हमारा!सच्चाई के नूर से उस के मन में था उजियारा बातिन में शक्ती ही शक्ती ज़ाहर में बेचारा कैसा संत हमारागांधीकैसा संत हमारा!बूढ़ा था या नए जनम में बंसी का मतवारा मोहन नाम सही था पर साधो रूप वही था सारा कैसा संत हमारागांधीकैसा संत हमारा!भारत के आकाश पे वो है एक चमकता तारा सचमुच ज्ञानी, सचमुच मोहन सचमुच प्यारा-प्यारा कैसा संत हमारागांधीकैसा संत हमारा!

Ep 183Todti Pathar | Suryakant Tripathi 'Nirala'
तोड़ती पत्थर | सूर्यकांत त्रिपाठी निरालावह तोड़ती पत्थर; देखा उसे मैंने इलाहाबाद के पथ पर-वह तोड़ती पत्थर। कोई न छायादार पेड़ वह जिसके तले बैठी हुई स्वीकार; श्याम तन, भर बँधा यौवन, नत नयन प्रिय, कर्म-रत मन, गुरु हथौड़ा हाथ, करती बार-बार प्रहार :- सामने तरु-मालिका अट्टालिका, प्राकार। चढ़ रही थी धूप; गर्मियों के दिन दिवा का तमतमाता रूप; उठी झुलसाती हुई लू, रुई ज्यों जलती हुई भू, गर्द चिनगीं छा गईं, प्राय: हुई दुपहर :-वह तोड़ती पत्थर। देखते देखा मुझे तो एक बार उस भवन की ओर देखा, छिन्नतार; देखकर कोई नहीं, देखा मुझे उस दृष्टि से जो मार खा रोई नहीं, सजा सहज सितार, सुनी मैंने वह नहीं जो थी सुनी झंकार एक क्षण के बाद वह काँपी सुघर, ढुलक माथे से गिरे सीकर, लीन होते कर्म में फिर ज्यों कहा— ‘मैं तोड़ती पत्थर।’

Ep 182Kothari Aur Duniya | Vishwanath Prasad Tiwari
कोठरी और दुनिया | विश्वनाथ प्रसाद तिवारीवे अपने ताले को देख कर ख़ुश हैं ख़ुश हैं क्योंकि उसके भीतर मैं हूँजिसकी तलाश थी उन्हें मगर मैं वहाँ नहीं हूँ जहाँ वे देख रहे हैं मुझे मैं उस हरे मैदान में हूँ जहाँ रंग-बिरंगे बच्चे खेल रहे हैं मैं उस समुद्र किनारे हूँ जहाँ प्रेमी-प्रेमिकाएँ टहल रहे हैं मैं उस आकाश के नीचे हूँ जहाँ पक्षी उड़ानें भर रहे हैं बाहर पराजित, भीतर मैं अजेय हूँ वे अपने ताले को देखकर ख़ुश हैं और मैं अपनी आत्मा जिसे बचा रखा है बुरे दिनों के लिए क्या दुनिया बड़ी नहीं है उनसे जिनके हाथ में चाभी है कोठरी की।

Ep 181Jugnu | Geet Chaturvedi
जुगनू | गीत चतुर्वेदीसाल में एक रात ऐसी आती है जब एक कविता किताब के पन्नों से निकलती है और जुगनू बनकर जंगल चली जाती है जब सूरज को एक लंबा ग्रहण लगेगा चाँद रूठकर कहीं चला जाएगा जंगल से लौटकर आएँगे ये सारे जुगनू और अँधेरे से डरने वालों को रोशनी देंगे

Ep 180Ujle Din Zaroor | Viren Dangwal
उजले दिन ज़रूर - वीरेन डंगवाल निराला कोआएँगे, उजले दिन ज़रूर आएँगेआतंक सरीखी बिछी हुई हर ओर बर्फ़है हवा कठिन, हड्डी-हड्डी को ठिठुरातीआकाश उगलता अंधकार फिर एक बारसंशय-विदीर्ण आत्मा राम की अकुलातीहोगा वह समर, अभी होगा कुछ और बारतब कहीं मेघ ये छिन्न-भिन्न हो पाएँगे।तहख़ानों से निकले मोटे-मोटे चूहेजो लाशों की बदबू फैलाते घूम रहेहैं कुतर रहे पुरखों की सारी तस्वीरेंचीं-चीं, चिक्-चिक् की धूम मचाते घूम रहेपर डरो नहीं, चूहे आख़िर चूहे ही हैं,जीवन की महिमा नष्ट नहीं कर पाएँगे।यह रक्तपात, यह मारकाट जो मची हुईलोगों के दिल भरमा देने का ज़रिया हैजो अड़ा हुआ है हमें डराता रस्ते मेंलपटें लेता घनघोर आग का दरिया है।सूखे चेहरे बच्चों के उनकी तरल हँसीहम याद रखेंगे, पार उसे कर जाएँगे।मैं नहीं तसल्ली झूठ-मूठ की देता हूँहर सपने के पीछे सच्चाई होती हैहर दौर कभी तो ख़त्म हुआ ही करता हैहर कठिनाई कुछ राह दिखा ही देती है।आए हैं जब हम चलकर इतने लाख वर्षइसके आगे भी तक चलकर ही जाएँगे,आएँगे, उजले दिन ज़रूर आएँगे।

Ep 179Aabhaar | Shivmangal Singh Suman
आभार - शिवमंगल सिंह ‘सुमन’जिस जिससे पथ पर स्नेह मिलाउस उस राही को धन्यवाद।जीवन अस्थिर अनजाने हीहो जाता पथ पर मेल कहींसीमित पग-डग, लम्बी मंज़िलतय कर लेना कुछ खेल नहींदाएँ-बाएँ सुख-दुख चलतेसम्मुख चलता पथ का प्रमादजिस जिससे पथ पर स्नेह मिलाउस उस राही को धन्यवाद।साँसों पर अवलम्बित कायाजब चलते-चलते चूर हुईदो स्नेह-शब्द मिल गए, मिलीनव स्फूर्ति थकावट दूर हुईपथ के पहचाने छूट गएपर साथ-साथ चल रही यादजिस जिससे पथ पर स्नेह मिलाउस उस राही को धन्यवाद।जो साथ न मेरा दे पाएउनसे कब सूनी हुई डगरमैं भी न चलूँ यदि तो भी क्याराही मर लेकिन राह अमरइस पथ पर वे ही चलते हैंजो चलने का पा गए स्वादजिस जिससे पथ पर स्नेह मिलाउस उस राही को धन्यवाद।कैसे चल पाता यदि न मिलाहोता मुझको आकुल-अन्तरकैसे चल पाता यदि मिलतेचिर-तृप्ति अमरता-पूर्ण प्रहरआभारी हूँ मैं उन सबकादे गए व्यथा का जो प्रसादजिस जिससे पथ पर स्नेह मिलाउस उस राही को धन्यवाद।

Ep 178Andhere Ka Musafir | Sarveshwar Dayal Saxena
अँधेरे का मुसाफ़िर - सर्वेश्वरदयाल सक्सेनायह सिमटती साँझ,यह वीरान जंगल का सिरा,यह बिखरती रात, यह चारों तरफ सहमी धरा;उस पहाड़ी पर पहुँचकर रोशनी पथरा गयी,आख़िरी आवाज़ पंखों की किसी के आ गयी,रुक गयी अब तो अचानक लहर की अँगड़ाइयाँ,ताल के ख़ामोश जल पर सो गई परछाइयाँ।दूर पेड़ों की कतारें एक ही में मिल गयीं,एक धब्बा रह गया, जैसे ज़मीनें हिल गयीं,आसमाँ तक टूटकर जैसे धरा पर गिर गया,बस धुँए के बादलों से सामने पथ घिर गया,यह अँधेरे की पिटारी, रास्ता यह साँप-सा,खोलनेवाला अनाड़ी मन रहा है काँप-सा।लड़खड़ाने लग गया मैं, डगमगाने लग गया,देहरी का दीप तेरा याद आने लग गया;थाम ले कोई किरन की बाँह मुझको थाम ले,नाम ले कोई कहीं से रोशनी का नाम ले,कोई कह दे, "दूर देखो टिमटिमाया दीप एक,ओ अँधेरे के मुसाफिर उसके आगे घुटने टेक!"

Ep 177Kaling | Srikant Verma
कलिंग - श्रीकांत वर्माकेवल अशोक लौट रहा हैऔर सबकलिंग का पता पूछ रहे हैंकेवल अशोक सिर झुकाए हुए हैऔर सबविजेता की तरह चल रहे हैंकेवल अशोक के कानों में चीख़गूँज रही हैऔर सबहँसते-हँसते दोहरे हो रहे हैंकेवल अशोक ने शस्त्र रख दिये हैंकेवल अशोकलड़ रहा था ।

Ep 157Main Jungle Se Guzarta Hun To Lagta Hai | Gulzar
मैं जंगल से गुज़रता हूँ तो लगता है मेरे पुरखे खड़े हैं! | गुलज़ारमैं जंगल से गुज़रता हूँ तो लगता है मेरे पुरखे खड़े हैंमैं इक नौ ज़ाइदा बच्चाये पेड़ों के क़बीलेउठा के हाथ में मुझ को झुलाते हैंकोई इक झुनझुना फूलों का हाथों से बजाता है कोई आँखों पे पुचकाता है खुशबुओं की पिचकारी बहुत बूढ़ा-सा दढ़ियल एक बरगद गोद में लेकर मुझे हैरानहोता है, सुनाता हैतुम अब चलने लगे हो!हमारे जैसे थे तुम भी, जड़ें मिट्टी में रहती थीं बड़ी ताक़त लगाते थे तुम अपने बीज में सूरज पकड़ने की ज़मीं पर आए थे पहलेतुम्हें फिर रेंगते देखा...हमारी शाख़ों पर चढ़ते थे, चढ़ के कूद जाते थे,फुदकते थेमगर दो पाँव पर जब तुम खड़े होकर के दौड़े, फिर नहीं लौटे पहाड़ों पत्थरों के हो गए तुम! मगर फिर भी... तुम्हारे तन में पानी है तुम्हारे तन में मिट्टी हैहमीं से हो…हमीं में फिर से बोए जाओगे, तुम फिर से लौटोगे!

Ep 176Chalne Ke Liye | Vinod Kumar Shukla
चलने के लिए | विनोद कुमार शुक्लचलने के लिएजब खड़े हुए तो जूतों की जगहपैरों मेंसड़कें पहन ली एक नहीं दो नहीं बदल बदलकर हजारों सड़कें तंग ऊबड़ खाबड़बहुत चौड़ी सड़कें।खूब चलेंकि ज़िन्दगी के नजदीक आने कोबहुत मन होता है वाकई ! ज़िन्दगी से होती हुईकोई सड़क जरूर जाती होगी-मैं कोई ऐसा जूता बनवाना चाहता हूँ जो मेरे पैरों में ठीक-ठाक आए।

Ep 175Benaam Sa Ye Dard | Nida Fazli
बे-नाम सा ये दर्द | निदा फ़ाज़लीबे-नाम सा ये दर्द ठहर क्यूँ नहीं जाताजो बीत गया है वो गुज़र क्यूँ नहीं जातासब कुछ तो है क्या ढूँढती रहती हैं निगाहेंक्या बात है मैं वक़्त पे घर क्यूँ नहीं जातावो एक ही चेहरा तो नहीं सारे जहाँ मेंजो दूर है वो दिल से उतर क्यूँ नहीं जातामैं अपनी ही उलझी हुई राहों का तमाशाजाते हैं जिधर सब मैं उधर क्यूँ नहीं जातावो ख़्वाब जो बरसों से न चेहरा न बदन हैवो ख़्वाब हवाओं में बिखर क्यूँ नहीं जाता

Ep 174Kaise Log They Hum | Vishwanath Prasad Tiwari
कैसे लोग थे हम - विश्वनाथ प्रसाद तिवारी गेहूँ की बालियों में लगते रहे कीड़ेहम खामोश रहेसफेद कपड़ों से काँपते रहे गाँवहम खामोश रहेसमुद्र में तूफान आयाहम खामोश रहेज्वालामुखी विस्फोट हुएहम खामोश रहेबादलों से आग की वर्षा हुईहम खामोश रहेउसने खींच ली म्यान से तलवारहम खामोश रहेकैसे लोग थे हमहमें बोलने की छूट दी गईहम खामोश रहे।

Ep 173Bhatka Hua Akelapan | Kailash Vajpeyi
भटका हुआ अकेलापन - कैलाश वाजपेयीयह अधनंगी शाम और यह भटका हुआ अकेलापन मैंने फिर घबराकर अपना शीशा तोड़ दिया। राजमार्ग—कोलाहल—पहिए काँटेदार रंग गहरे यंत्र-सभ्यता चूस-चूसकर फेंके गए अस्त चेहरे झाग उगलती खुली खिड़कियाँ सड़े गीत सँकरे ज़ीने किसी एक कमरे में मुझको बंद कर लिया फिर मैंने यह अधनंगी शाम और यह चुभता हुआ अकेलापन मैंने फिर घबराकर अपना शीशा तोड़ दिया। झरती भाँप, खाँसता बिस्तर, चिथड़ा साँसें उबकाई धक्के देकर मुझे ज़िंदगी आख़िर कहाँ गिरा आई टेढ़ी दीवारों पर चलते मुरदा सपनों के साए जैसे कोई हत्यागृह में रह-रहकर लोरी गाए यह अधनंगी शाम और यह टूटा हुआ अकेलापन मैंने फिर उकताकर कोई पन्ना मोड़ दिया। आई याद—खौलते जल में जैसे बच्चा छूट गिरे। जैसे जलते हुए मरुस्थल में तितली का पंख झरे। चिटख़ गया आकाश देह टुकड़े-टुकड़े हो बिखर गई क्षण-भर में सौ बार घूमकर धरती जैसे ठहर गई यह अधनंगी शाम और यह हारा हुआ अकेलापन मैंने फिर मणि देकर पाला विषधर छोड़ दिया।

Ep 172Aao, Chale Hum | Gyanendrapati
आओ, चलें हम - ज्ञानेन्द्रपतिआओ, चलें हमसाथ दो क़दमहमक़दम होंदो ही क़दम चाहेदुनिया की क़दमताल से छिटकहाथ कहाँ लगते हैं मित्रों के हाथघड़ी-दो घड़ी कोघड़ीदार हाथ -- जिनकी कलाई की नाड़ी से तेज़धड़कती है घड़ीवक़्त के ज़ख़्म से लहू रिसता ही रहता है लगातारकहाँ चलते हैं हम क़दम-दो क़दमउँगलियों में फँसा उँगलियाँउँगलियों में फँसी है डोरसूत्रधार की नहींकठपुतलियों कीहथेलियों में फँसी हैएक बेलनज़िन्दगी को लोई की तरह बेलकररोटी बनातीकिनकी अबुझ क्षुधाएँउदरंभरि हमारी ज़िन्दगियाँभस्म कर रही हैंबेमकसद बनाए दे रही हैंखास मकसद सेआओ, विचारें हममाथ से जोड़कर माथदो क़दम हमक़दम हों हाथ से जोड़े हाथ

Ep 171Palki | Kunwar Narayan
पालकी - कुँवर नारायण काँधे धरी यह पालकीहै किस कन्हैयालाल की?इस गाँव से उस गाँव तकनंगे बदन, फेंटा कसे,बारात किसकी ढो रहे?किसकी कहारी में फँसे?यह क़र्ज पुश्तैनी अभी किश्तें हज़ारों साल की।काँधे धरी यह पालकी है किस कन्हैयालाल की?इस पाँव से उस पाँव पर,ये पाँव बेवाई फटे :काँधे धरा किसका महल?हम नींव पर किसकी डटे?यह माल ढोते थक गई तक़दीर खच्चर-हाल की।काँधे धरी यह पालकी है किस कन्हैयालाल की?फिर, एक दिन आँधी चलीऐसी कि परदा उड़ गया!अंदर न दुलहन थी न दूल्हाएक कौव्वा उड़ गया...तब भेद जाकर यह खुला—हमसे किसी ने चाल की।काँधे धरी यह पालकी ला ला अशर्फ़ी लाल की!

Ep 170Swapn Me Prem | Babusha Kohli
स्वप्न में प्रेम - बाबुषा कोहलीदूसरे दिनों से ज़रा ज़्यादा ही होती है हरारत उस सुबह कीरॉकेट-सा आसमान चढ़ जाता तापमानयकायक भाप के जंगल में तब्दील होताबाथरूम का आईनाकुल जमा तीन अक्षर भरते कुलाँचे चारों दिशाओं मेंदिशाओं के चार से दस होते देर नहीं लगतीसारी दिशाएँ प्रेम का बहुवचन हैंजब तक शिकारी तानता धनुषओझल हो जाता मायावी हिरण आँखों की चौंध मेंस्वप्न नशे में धुत्त अफ़ीमची नहींकिसी फ़रार मुजरिम की खोज में जागता सिपाही हैऔर तुम!मेरी उनींदी काया में छुप के रहते हो ऐसेकि जैसे 'ऑनेस्टी' में बेईमानी से 'एच' रहता है

Ep 168Chori | Geet Chaturvedi
चोरी | गीत चतुर्वेदी प्रेम इस तरह किया जाए कि प्रेम शब्द का कभी ज़िक्र तक न हो चूमा इस तरह जाए कि होंठ हमेशा ग़फ़लत में रहें तुमने चूमा या मेरे ही निचले होंठ ने औचक ऊपरी को छू लिया छुआ इस तरह जाए कि मीलों दूर तुम्हारी त्वचा पर हरे-हरे सपने उग आएँ तुम्हारी देह के छज्जे के नीचे मुँहअँधेरे जलतरंग बजाएँ रहा इस तरह जाए कि नींद के भीतर एक मुस्कान तुम्हारे चेहरे पर रहे जब तुम आँख खोलो, वह भेस बदल ले प्रेम इस तरह किया जाए कि दुनिया का कारोबार चलता रहे किसी को ख़बर तक न हो कि प्रेम हो गया ख़ुद तुम्हें भी पता न चले किसी को सुनाना अपने प्रेम की कहानी तो कोई यक़ीन तक न करे बचना प्रेमकथाओं का किरदार बनने से वरना सब तुम्हारे प्रेम पर तरस खाएँगे

Ep 167Baat Ki Baat | Shivmangal Singh Suman
बात की बात | शिवमंगल सिंह 'सुमन'इस जीवन में बैठे ठाले ऐसे भी क्षण आ जाते हैंजब हम अपने से ही अपनी बीती कहने लग जाते हैं।तन खोया-खोया-सा लगता मन उर्वर-सा हो जाता हैकुछ खोया-सा मिल जाता है कुछ मिला हुआ खो जाता है।लगता; सुख-दुख की स्मृतियों के कुछ बिखरे तार बुना डालूँयों ही सूने में अंतर के कुछ भाव-अभाव सुना डालूँकवि की अपनी सीमाऍं है कहता जितना कह पाता हैकितना भी कह डाले, लेकिन-अनकहा अधिक रह जाता हैयों ही चलते-फिरते मन में बेचैनी सी क्यों उठती है?बसती बस्ती के बीच सदा सपनों की दुनिया लुटती हैजो भी आया था जीवन में यदि चला गया तो रोना क्या?ढलती दुनिया के दानों में सुधियों के तार पिरोना क्या?जीवन में काम हजारों हैं मन रम जाए तो क्या कहना!दौड़-धूप के बीच एक-क्षण, थम जाए तो क्या कहना!कुछ खाली खाली होगा ही जिसमें निश्वास समाया थाउससे ही सारा झगड़ा है जिसने विश्वास चुराया थाफिर भी सूनापन साथ रहा तो गति दूनी करनी होगीसाँचे के तीव्र-विवर्त्तन से मन की पूनी भरनी होगीजो भी अभाव भरना होगा चलते-चलते भर जाएगापथ में गुनने बैठूँगा तो जीना दूभर हो जाएगा।

Ep 166Aag Hai, Paani Hai, Mitti Hai, Hawa Hai Mujhme | Krishn Bihari Noor
आग है, पानी है, मिट्टी है, हवा है मुझमें | कृष्ण बिहारी नूर आग है, पानी है, मिट्टी है, हवा है मुझमेंऔर फिर मानना पड़ता है ख़ुदा है मुझमेंअब तो ले दे के वही शख़्स बचा है मुझमेंमुझको मुझसे जो जुदा करके छुपा है मुझमेंजितने मौसम हैं सभी जैसे कहीं मिल जाएँइन दिनों कैसे बताऊँ जो फ़ज़ा है मुझमेंआइना ये तो बताता है मैं क्या हूँ लेकिनआइना इस पे है ख़ामोश कि क्या है मुझमेंअब तो बस जान ही देने की है बारी ऐ ‘नूर’मैं कहाँ तक करूँ साबित कि वफ़ा है मुझमें!

Ep 165Kal Humara Hai | Shailendra
कल हमारा है | शैलेन्द्रग़म की बदली में चमकता एक सितारा हैआज अपना हो न हो पर कल हमारा हैधमकी ग़ैरों की नहीं अपना सहारा हैआज अपना हो न हो पर कल हमारा हैग़र्दिशों से से हारकर ओ बैठने वालेतुझको ख़बर क्या अपने पैरों में भी छाले हैंपर नहीं रुकते कि मंज़िल ने पुकारा हैआज अपना हो न हो पर कल हमारा हैये क़दम ऐसे जो सागर पाट देते हैंये वो धाराएँ हैं जो पर्वत काट देते हैंस्वर्ग उन हाथों ने धरती पर उतारा हैआज अपना हो न हो पर कल हमारा हैसच है डूबा-सा है दिल जब तक अन्धेरा हैइस रात के उस पार लेकिन फिर सवेरा हैहर समन्दर का कहीं पर तो किनारा हैआज अपना हो न हो पर कल हमारा है

Ep 164Dussehri Aam | Uday Prakash

Ep 163Laut Aao Tum | Dr Damodar Khadse
‘लौट आओ तुम’ | डॉ दामोदर खड़सेलौट आओ तुम कि काले बादलों की ओट मेंसूरज अंधा हो गया थाऔर दिन चिकने फर्श परऔंधे गिर पड़ालहूलुहान उसकी नाक और कटा फटा उसका मुंहकिससे करे शिकायत...कि क्यों और कैसे फिसल पड़ा वह क्या सोच रहा था दिनसूरज के बिनातुम लौट आओ किअब दिन रास्ता भटक गए हैंऔर शाम भी होने वालीतुम लौट आओ कि काले बादल सिर्फ तुम्हीं से कतराते हैंफिर सूरज निकलेगाऔर दिन की चेतना लौटेगीलौट आओ तुमअब शाम होने वाली है!

Ep 162Chote Chote Ishwar | Madan Kashyap
छोटे-छोटे ईश्वर | मदन कश्यपछोटे-छोटे ईश्वरछोटे-छोटे मंदिरों में रहते हैंछोटे-छोटे ईश्वरविशाल ऐतिहासिक मंदिरों की भीतरी चारदीवारियों कोनों-अंतरों मेंबने नक्काशीदार आलों ताकों कोटरों में दुबके बैठे इन ईश्वरों का अपना कोई साम्राज्य नहीं होता ये तो महान ईश्वरतंत्र के बस छोटे-छोटे पुर्जे होते हैं किसी-किसी की बड़े ईश्वर से कुछ नाते-रिश्तेदारी भी होती है और महात्म्य- कथाओं में इस बारे में लिखे होते हैं एक-दो वाक्यइनके पुजारी इन्हीं जैसे दीन-हीन होते हैं उनकी न तो फैली हुई तोंद होती है ना ही गालों पर लाली वे रेशम और साटन के महँगे रंगीन कपड़े नहीं पहनते बस हैंडलूम की एक मटमैली धोती को बीच से फाड़कर आधा पहन लेते हैं आधा ओढ़ लेते हैं उनके त्रिपुंड में भी वह आक्रामक चमक नहीं होतीबड़े ईश्वर के महान मंदिर की परिक्रमा कर रहे लोगों कोपुकार-पुकार कर बुलाता है छोटा पुजारी अपने ईश्वर का उनसे नाता-रिश्ता बतलाता हैइक्का-दुक्का कोई छिटककर पास आ गया तोझट से हाथ में जल-अक्षत देकर संकल्प करा देता है फिर ग्यारह सौ आशीर्वादों के बाद माँगता है ग्यारह रुपये की दक्षिणा इससे अधिक कुछ माँगने की हिम्मत नहीं जुटा पाता है छोटा पुजारी वैसे मिलने को सवा रुपया भी मिल जाए तो संतोष कर लेता हैलगभग अप्रचलित हो चुकी छोटी रेजगारियाँ इन छोटे ईश्वरों पर ही चढ़ती हैं एक बहुत ही छोटी और अविश्वसनीय कमाई पर पलते हैं इन छोटे-छोटे पुजारियों के कुनबे कई बार तो ऐसे गिड़गिड़ाता है छोटा पुजारी कि पता नहीं चलता दक्षिणा माँग रहा है या भीखसबसे छोटे और दयनीय होते हैं उजाड़ में नंगी पहाड़ियों पर या मलिन बस्तियों के निकट ढहते-ढनमनाते मंदिरों के वे ईश्वरजिनके होने की कोई कथा नहीं होती उनके तो पुजारी तक नहीं होते रोटी की तलाश में किसी शहर को भाग चुका होता है पुजारी का कुनबा अपने ईश्वर को अकेला असहाय छोड़करअपनी देह की धूल तक झाड़ नहीं पाता है अकेला ईश्वर वह तो भूलने लगता है अपना वजूद तभी छठे-छमाहे आ जाता है कोई राहगीरकुएँ के जल से धोता है उसकी देह मंदिर की सफाई करके जलाता है दीया इस तरह ईश्वर को उसके होने का एहसास कराता है तब ईश्वर को लगता है कि ईश्वर की कृपा से यह सब हुआकभी-कभी तो शहरों के भीड़-भाड़ वाले व्यस्त चौराहों पर अट्टालिकाओं में दुबके मंदिरनुमा ढाँचों में सिमटकर बैठा होता है कोई छोटा सा ईश्वर धूल और धुएँ में डूबा भूखा-प्यासा आने-जाने वालों को कई बार पता भी नहीं चलता कि जहाँ वे जाम में फँसे कसमसा रहे होते हैं वहीं उनके बाजू में धुएँ से जलती आँखें मींचे बैठा है कोई ईश्वर कई-कई दिनों तक अगरबत्तियाँ भी नहीं जलतीं कालकोठरी से भी छोटे उसके कक्ष में कि अचानक किसी स्त्री को उसकी याद आती है और वह एक लोटा जल उसके माथे पर उलीच आती हैछोटे ईश्वर की छोटी-छोटी ज़रूरतें भीठीक से पूरी नहीं हो पाती हैंछोटी-छोटी मजबूरियाँ एक दिन इतना विकराल रूप ले लेती हैं कि वह एकदम लाचार हो जाता हैतब किसी छोटे पुजारी के सपने में आता है और कहता है : आदमी हो या ईश्वर छोटों की हालत कहीं भी अच्छी नहीं है!

Ep 161Neem Ke Phool | Kunwar Narayan
नीम के फूल | कुँवर नारायणएक कड़वी-मीठी औषधीय गंध सेभर उठता था घरजब आँगन के नीम में फूल आते।साबुन के बुलबुलों-सेहवा में उड़ते हुए सफ़ेद छोटे-छोटे फूलदो–एक माँ के बालों में उलझे रह जातेजब वो तुलसी घर पर जल चढ़ाकरआँगन से लौटतीं।अजीब सी बात है मैंने उन फूलों को जब भी सोचाबहुवचन में सोचा।उन्हें कुम्हलाते कभी नहीं देखा–उस तरहरंगारंग खिलते भी नहीं देखाजैसे गुलमुहर या कचनार–पर कुछ थाउनके झरने में, खिलने से भी अधिकशालीन और गरिमामय, जो न हर्ष थान विषाद।जब भी याद आता वह विशाल दीर्घायु वृक्षयाद आते उपनिषद् : याद आतीएक स्वच्छ सरल जीवन-शैली : उसकीसदा शान्त छाया में वह एक विचित्र-सीउदार गुणवत्ता जो गर्मी में शीतलता देतीऔर जाड़ों में गर्माहट। याद आती एक तीखीपर मित्र-सी सोंधी खुशबू, जैसे बाबा का स्वभाव।याद आतीं पेड़ के नीचे सबके लिएहमेशा पड़ी रहने वालीबाघ की दो-चार खाटें :निबौलियों से खेलता एक बचपन…याद आता नीम के नीचे रखेपिता के पार्थिव शरीर परसकुचाते फूलों का वह वीतराग झरना–जैसे माँ के बालों से झर रहे हों–नन्हें-नन्हें फूल जो आँसू नहींसान्त्वना लगते थे।

Ep 160Aparichit Se Prem | Mamta Kalia
अपरिचित से प्रेम | ममता कालियासबसे पहले तो बताओ अपना नामफिर मोहल्ला, कहाँ रहते तो, क्या करते होरोज़ सवेरे इकत्तीस नबंर की बस सेकहाँ जाते होऔर अक्सर चाय कीउस रद्दी-सी दुकान परक्यों खड़े रहते होतुम्हारे बारे मेंबहुत कुछ जानने की इच्छा हैतुम्हें शहर की कौन-सी सड़कें पसंद हैंक्या वो जो अक्सर वीरान रहती हैंया वो जहाँ भीड़-भाड़ रहती हैतुम कौन-सा अख़बार पढ़ते होकौन-सी पत्रिकाएँखाली समय में क्या पसंद करते होसोना, उदास रहना या ठहाके लगानातुम कौन-सी सिगरेट पीते होकिस साबुन से नहाते होअपने बाल इतने अस्त-व्यस्त और रूखे क्यों रखते होजानबूझकर रखते होया तुमसे सँभलते नहींतुम्हें कौन-सा नेता पसंद हैऔर कौन-सा अभिनेताअभिनेत्रियों के बारे में तुम्हारी क्या राय हैबोर दूर्दरशन से बचने का तुम्हारे पास क्या उपाय हैप्रेमचंद के अलावा कौन रचनाकार तुम्हें अच्छा लगता हैक्या तुम्हें ऐसा नहीं लगतासमकालीन लेखन मेंबेहद एक रास्ता हैइसके अलावा तुम्हारे बारे मेंकितना कुछ जानना चाहती हूँअभी तुम मेरे लिए मात्र जिज्ञासा होआकंठ जिज्ञासा!फिर तुम आश्चर्य में बदल जाओगेसातवाँ, आठवाँ या दसवाँ नहींमेरे लिए मेरा पहला पावन आश्चर्यन जाने क्यों मुझे लगता हैतुम्हारी और मेरी रुचियाँ ज़रूर मिलती होंगीतुम्हें भी, आपसी ताल्लुक मेंबहुत जल्द खरोंच लगती होगीतुम्हें भी छोटी-छोटी बातेंबे-वजह ख़ुशी देती होंगीऔर उससे भी छोटी-छोटी बातों परतुम तुनक जाते होगेतुम भी अकेले में अपने से खूब बोलते होगेलेकिन भीड़-भाड़ में बाहर का रास्ता टटोलते होगेपता नहीं क्यों मुझे लगता हैतुम मेरे अनुमानों से भी ज़्यादाअच्छे हो!

Ep 159Main Chahta Hoon | Mangesh Dabral
मैं चाहता हूँ | मंगलेश डबरालमैं चाहता हूँ कि स्पर्श बचा रहे वह नहीं जो कन्धे छीलता हुआ आततायी की तरह गुज़रता है बल्कि वह जो एक अनजानी यात्रा के बाद धरती के किसी छोर पर पहुँचने जैसा होता हैमैं चाहता हूँ स्वाद बचा रहे मिठास और कड़ुवाहट से दूर जो चीज़ों को खाता नहीं है बल्कि उन्हें बचाये रखने की कोशिश का ही एक नाम हैएक सरल वाक्य बचाना मेरा उद्देश्य है मसलन यह कि हम इनसान हैं मैं चाहता हूँ इस वाक्य की सचाई बची रहे सड़क पर जो नारा सुनाई दे रहा हैवह बचा रहे अपने अर्थ के साथ मैं चाहता हूँ निराशा बची रहे जो फिर से एक उम्मीद पैदा करती है अपने लिएशब्द बचे रहेंजो चिड़ियों की तरह कभी पकड़ में नहीं आते प्रेम में बचकानापन बचा रहे कवियों में बची रहे थोड़ी लज्जा।

Ep 158Parchun | Anamika
परचून | अनामिकापंसारी जहाँ भी लगा दे दस बोरियाँ–पटरी पर, गैराज में, खोली के अन्दर– रख ले दो-चार बोइयाम– आराम से वहीं सज जाती है खुदरा परचून की दुकान– बड़े-बड़े स्टोरों से सीधी आँखें लड़ाती! बकझक, कुछ मोलतोल, हालचाल या आपसदारी, ‘आज नकद, कल उधार’ की पट्टी के बावजूद कई महीनों की बेरोक वह देनदारी–इनके बिना बड़ी बेस्वाद है खरीदारी– नहीं जानती यह एफ.डी.आई.!

Ep 169Bachhe Ke Shikshak Ko Patra | Rajendra Upadhyay
बच्चे के शिक्षक को पत्र - राजेंद्र उपाध्याय उसे नदियों और पेड़ोंऔर पर्वतों के बारे में बतानाउसे बरगद के बारे में बतानातो कली और तुलसी के बारे में भीनीम और पीपल, बादल और बिजलीके बारे में बतानाअजगर, हाथी, घोड़ों के बारे में बताते हुएबेचारे एक केंचुए को न भूल जानाउसे जीतना सिखानापर हारने के सुख के बारे में भी बतानाकमाई की एक पाई बड़ी हैभीख में मांगे गए रुपए से उसे बताना।झूठ बोलकर जीतने से बेहतर हैखेल हार जाना सच पर रहकर।येे सब सीखने में उसेसमय लगेगासमय सिखाएगा उसे बहुत-सी चीजेंहम तुम, नहीं।आज-कल में नहींएक दो दिन में नहींधीरे-धीरे जान पाएगाबुरे-भले के बारे मेंखरे-खोटे के बारे मेंउसे बड़ा आदमी नहींभला आदमी बनानावह सिक्कों की खनक न सुने हमेशाउसे अंधे को रास्ता पार करानेऔर कबूतर के घाव धोने कावक्त मिले हमेशाकिताबों में जो लिखा है उसे पढ़ानाउसे तारों और आकाशगंगाओं के बारे में भीजुगनुओं और केंचुओं औरतितलियों की दुनिया में भीउसे कुछ देर ले जानाएलिस के आश्चर्यलोक मेंशेर की मांद में, मछलियों के अजब संसार मेंउसे कुछ देर भटकने देनाफूलों वाली घाटी मेंहमेशा उसकी उंगली पकड़कर मत चलनाभरे बाज़ार उसे अकेला भी छोड़नातूफानी लहरों के विरुद्ध विपरीत दिशा मेंतैरना भी उसे सिखानाउसके घुटने छिल जाएँ तब भीपरवाह न करना।दूसरों पर नहीं अपने परहँसना सिखाना उसेदूसरों को देखकर जलना नहींअपने पर अफसोस करनाअपने विश्वासों पर अडिग रहनापर बदलना जरूरत पड़ने पर उन्हें अगर उनकी कलई उतर गई होभले लोगों को जीतना भलाई सेकड़े लोगों को कड़ाई सेपर पहले भलाई सेभीड़ में वह शामिल न होएक कोने में खड़ा होकर वह अपनी बारी की प्रतीक्षा करेभले ही प्रतीक्षा में बीत जाए सारा जीवनअन्याय के खिलाफ हाथ उठाने में वह आगे आएवह आवाजें ऊँची करें अपनीउनके लिए जिनकी आवाजें नहीं हैंचाटुकारों से वह सावधान रहेजो बहुत मीठे हैं उनसे वह बाज़ आएवह अपना शरीर और अपना ज्ञानदेश सेवा में लगाएपर कभी भी वह बेचे न अपनीआत्मा को चंद रुपयों की खातिरयह सब सिखाना उसे प्यार से मगर धीरे-धीरेपर पुचकार कर नहीं हमेशाआग में उसे तपानातभी बनेगा वह इस्पात मज़बूत इतनायह सब करना होगा तुम्हेंपर यह सब इतना आसान नहींयह करना ही होगा तुम्हें मेरे दोस्तउसे भला इंसान अगर बनाना है!

Ep 156Sugiya | Nirmala Putul
सुगिया | निर्मला पुतुल‘सुगिया, तुम्हारे होंठ सुग्गा जैसे हैं’ एक ने कहा ‘सुगिया, तुम्हारे होंठ सुग्गा जैसे हैं’ एक ने कहा सुगिया हँस पड़ी खिलखिला कर ‘तुम हँसती हो तो बहुत अच्छी लगती हो सुगिया’ बादलों में बिजली से चमकते उसके दाँतों को देख दूसरा बोला। तीसरा ने फ़रमाया, ‘तुम बहुत अच्छा गाती हो बिल्कुल कोयल की तरहऔर नाच का तो क्या कहना, धरती नाच उठती है जब तुम नाचती हो’चौथे ने उसकी आँखों की प्रसन्नसा में क़सीदे पढ़े,चौथे ने उसकी आँखों की प्रसन्नसा में क़सीदे पढ़े,‘तुम्हारी बड़ी-बड़ी आँखें बिल्कुल बड़ी ख़ूबसूरत हैं सुगियाबिल्कुल हिरणी के माफिक, तुम पास आकर यहीं बैठी रहो, मुझे देखती रहोपँचवाँ जो बिल्कुल क़रीब था और चुप-चुप उसने चुपके से कान में कहा, ‘मुझसे दोस्ती करोगी सुगिया, सोने की सिकड़ी बनवा दूँगा तुझे’सुनकर उदास हो गई सुगिया, रहने लगी गुमसुम, भूल गई हँसना, गाना, नाचना–सुबह से शाम तक दिन भर मरती-खटती सुगिया सोचती है, अक्सर, यहाँ हर पाँचवा आदमी उससे उसकी देह की भाषा में क्यों बतीयाता हैकाश! कोई कहता तुम बहुत मेहनती हो सुगियाबहुत भोली और ईमानदार हो तुमकाश! कहता कोई ऐसा।

Ep 155Mere Sapne Bahut Nahi Hain | Girija Kumar Mathur
मेरे सपने बहुत नहीं हैं | गिरिजा कुमार माथुरमेरे सपने बहुत नहीं हैंछोटी-सी अपनी दुनिया हो,दो उजले-उजले से कमरेजगने को, सोने को,मोती-सी हों चुनी किताबेंशीतल जल से भरे सुनहले प्यालों जैसीठण्डी खिड़की से बाहर धीरे हँसती होतितली-सी रंगीन बग़ीचीछोटा लॉन स्वीट-पी जैसा,मौलसिरी की बिखरी छितरी छाँहों डूबाहम हों, वे होंकाव्य और संगीत-सिन्धु में डूबे-डूबेप्यार भरे पंछी से बैठेनयनों से रस-नयन मिलाए,हिल-मिलकर करते होंमीठी-मीठी बातें…उनकी लटें हमारे कन्धों पर मुख परउड़-उड़ जाती हों,सुशर्म बोझ से दबे हुए झोंकों से हिलकरअब न बहुत हैं सपने मेरेमैं इस मंज़िल पर आकरसब कुछ जीवन में भर पाया।

Ep 154Hastakshep | Srikant Verma
हस्तक्षेप | श्रीकांत वर्मा कोई छींकता तक नहींइस डर सेकि मगध की शांतिभंग न हो जाए,मगध को बनाए रखना है तोमगध में शांतिरहनी ही चाहिएमगध है, तो शांति हैकोई चीख़ता तक नहींइस डर सेकि मगध की व्यवस्था मेंदख़ल न पड़ जाए,मगध में व्यवस्था रहनी ही चाहिएमगध में न रहीतो कहाँ रहेगी?क्या कहेंगे लोग?लोगों का क्या?लोग तो यह भी कहते हैंमगध अब कहने को मगध है,रहने को नहींकोई टोकता तक नहींइस डर सेकि मगध मेंटोकने का रिवाज़ न बन जाएएक बार शुरू होने परकहीं नहीं रुकता हस्तक्षेप—वैसे तो मगध-निवासियोकितना भी कतराओतुम बच नहीं सकते हस्तक्षेप से—जब कोई नहीं करतातब नगर के बीच से गुज़रता हुआमुर्दायह प्रश्न कर हस्तक्षेप करता है—मनुष्य क्यों मरता है?

Ep 153Amma Dhaniya Kaat Rahi Hai | Yash Malviya
अम्मा धनिया काट रही है | यश मालवीयइसकी उसकी नींद जम्हाई मन से मन की गहरी खाई कमरे-कमरे की मजबूरी चौके से आँगन की दूरी धीरे-धीरे पाट रही है अम्मा धनिया काट रही है काट रही है कठिन समय को दिशा दे रही सूर्योदय को ताग रही बस, ताग रही है कपड़ों जैसे फटे हृदय को सुख की स्वाति बूँद, इस देहरी से उस देहरी बाँट रही है अम्मा धनिया काट रही है ख़ुशियों का बनकर हरकारा सँजो रही है चाँद सितारा अँधायुग, मोतियाबिंद भी आँखों के मोती से हारा द्वारे की माधवी लता की, लतर लाड़ से छाँट रही है चाय पिलाती, पान खिलाती बाबू जी से भी बतियाती बच्चों से उनकी तकलीफ़ें बढ़ा-चढ़ाकर कहती जाती घर परिवार जोड़ती, ऐसी रेशम वाली गाँठ रही हैअम्मा धनिया काट रही है

Ep 152Aag Aur Aadmi | Deo Shankar Navin
आग और आदमी | देवशंकर नवीन आग और हवा को अपने-पराए की समझ नहीं होतीवह अपने स्वभाव से काम करती हैआग हर कुछ को जला देती हैजीव-जंतु, फूल, कचरा, विष्ठा सब कुछ कोहवा हर कुछ को सोख लेती हैखुशबू, बदबू, मानवता, दानवता सब कुछ कोआग और हवा वातावरण में सदा से थीलोगों को दिखती नहीं थीमनुष्य की किसी वानरी वृत्ति सेआग प्रकट हो गईमनुष्य ने समझा कि आग उसने पैदा कीआग और बदबू को हवा ने हवा दे दीमनुष्य ने समझा कि हवा उसने पैदा कीआग सबसे पहले मनुष्य के दिमाग में सुलगती हैफिर धधकता है उसकी आसुरी वृत्ति का उत्तापजलते हुए लोग बाग बस्ती खेत देख करतृप्त होती हैं उसकी आसुरी वृत्तियाँऊपर से आग के आविष्कर्ता पूर्वजवेदना से कराह उठते हैंचीख कर रोकते हैं अपनी संततियों कोमत कर ऐसा मेरे वंशजआग हमने रक्षा के लिए जलाई थीसंहार के लिए नहीं,वंशज नहीं सुनता है,वंशज को नहीं सुनना हैक्षमता पाकर कोई सृजनसृजता की कहाँ सुनता है!

Ep 151Neev Ki Int Ho Tum Didi | Uday Prakash
नींव की ईंट हो तुम दीदी | उदय प्रकाश पीपल होतीं तुम पीपल, दीदीपिछवाड़े का, तोतुम्हारी ख़ूब घनी-हरी टहनियों मेंहारिल हमबसेरा लेते।हारिल होते हैं हमारी तरह हीघोंसले नहीं बनाते कहींबसते नहीं कभीदूर पहाड़ों से आते हैंदूर जंगलों को उड़ जाते हैं।पीपल की छाँहतुम्हारी तरह हीठंडी होती है दोपहर।ढिबरी थीं दीदी तुमहमारे बचपन कीअचार का तलछट तेलअपनी कपास की बाती में सोखकरजलती रहीं।हमने सीखे थे पहले-पहल अक्षरऔर अनुभवों से भरे किस्से तुम्हारी उजली साँस के स्पर्श में।जलती रहीं तुमतुम्हारा धुआँ सोखती रहींघर की गूँगी दीवारेंछप्पर के तिनके-तिनकेधुँधले होते गयेऔर तुम्हारीथोड़ी-सी कठिन रोशनी मेंहम बड़े होते रहे।नदी होतीं, तोहम मछलियाँ होकरकिसी चमकदार लहर कीउछाह में छुपतेकभी-कभी बूँदें लेतेसीपी बनकिनारों पर चमकते।चट्टान थीं दीदी तुमसालों पुरानी।तुम्हारे भीतर के ठोस पत्थर मेंजहाँ कोई सोता नहीं निझरता,हमीं पैदा करते थे हलचलहमीं उड़ाते थे पतंग।चट्टान थीं तुम औरतुम्हारी चढ़ती उम्र के ठोस सन्नाटे मेंहमीं थे छोटे-छोटे पक्षी उड़ते तुम्हारे भीतरवहाँ झूले पड़े थे हमारी ख़ातिर गुड्डे रखे थे हमारी ख़ातिर मालदह पकता था हमारी ख़ातिरहमारी गेंदें वहाँगुम हो गयी थीं।दीदी, अब अपने दूसरे घर की नींव की ईंट हुईं तुम तो तुम्हारी नयी दुनिया में भी होंगी कहीं हमारी खोई हुई गेंदें होंगे कहीं हमारे पतंग और खिलौनेअब तो ढिबरी हुईं तुमनये आँगन कीकोई और बचपनचीन्हता होगा पहले-पहल अक्षरसुनता होगा किस्सेऔर योंदुनिया को समझता होगा।हमारा क्या है, दिदिया री!हारिल हैं हम तोआएँगे बरस-दो बरस में कभीदो-चार दिनमेहमान-सा ठहरकरफिर उड़ लेंगे कहीं और।घोंसले नहीं बनाये हमनेबसे नहीं आज तक।कठिन है हमारा जीवन भी तुम्हारी तरह ही।

Ep 150Kaka Se | Ashok Vajpeyi
काका से | अशोक वाजपेयी | अशोक वाजपेयीअब जब हमारे बीच कुछ और नहीं बचा हैथोड़े से दु:ख और पछतावे के सिवायऔर हम भूल चुके हैं तुम्हारे गुस्से और विफलताओं कोमेरे बारे में तुम्हारी आशंकाओं को,हम देख सकते हैं कि जीवन में आभिजात्य तो आ जाता है,गरिमा आती है बड़ी मुश्किल सेजीवन गरिमा देने में बहुत कंजूस हैहम दोनों को ऐसी गरिमा पा सकने का उबालता रहा है।कोई भी अपमान फिर वह देवताओं ने किया होया दुष्टों ने हम भूल नहीं पाएजबकि जीने की झंझट में ऐसा भूलनास्वाभाविक और ज़रूरी होताहमें विफलता के बजाय अपमान क्योंअधिक स्मरणीय लगाये हो सकता है एक पारिवारिक दोष होएक किसान बेटे के स्वाभिमान काएक छोटे शहर के कल की आत्मवंचना कातुम्हें गये पैंतीस बरस हो गएऔर मैं तुम्हारी उमर से कहीं ज्यादाउमर का होकर, अभी बूढ़ा रहा हूँतुम्हारे पास मुझे समझने की फ़ुरसत नहीं थीऔर मैं तुम्हें रखने में हमेशा ढील रहाअब जब हमारे बीच थोड़ा-सा दु:ख और पक्षतावा भरबचा है, कुछ पथारे को तुम देख पातेतो तुम्हें लगता, मैंने अपनी जिद पर अड़े रह करऔर अपमान को न भूल कर तुम्हें ही दोहराया हैअसली दु:ख ये नहीं है कि इतने बरस नासमझी में गुज़र गएबल्कि ये अंतत: मैं तुम्हारी फीकी आवृति हूँइसकी तुम्हें या मुझे कभी कोई आशंका या इच्छा नहीं।

Ep 149Reedh | Kusumagraj | Gulzar
रीढ़ - कुसुमाग्रज | अनुवाद - गुलज़ार“सर, मुझे पहचाना क्या?” बारिश में कोई आ गया कपड़े थे मुचड़े हुए और बाल सब भीगे हुएपल को बैठा, फिर हँसा, और बोला ऊपर देखकर“गंगा मैया आई थीं, मेहमान होकर कुटिया में रह कर गईं! माइके आई हुई लड़की की मानिन्द चारों दीवारों पर नाची खाली हाथ अब जाती कैसे? खैर से, पत्नी बची है दीवार चूरा हो गई, चूल्हा बुझा, जो था, नहीं था, सब गया!प्रसाद में पलकों के नीचे चार क़तरे रख गई है पानी के! मेरी औरत और मैं, सर, लड़ रहे हैं मिट्टी कीचड़ फेंक कर, दीवार उठा कर आ रहा हूं!”जेब की जानिब गया था हाथ, कि हँस कर उठा वो…‘न न’, न पैसे नहीं सर, यूंही अकेला लग रहा था घर तो टूटा, रीढ़ की हड्डी नहीं टूटी मेरी… हाथ रखिये पीठ पर और इतना कहिये कि लड़ो… बस!”

Ep 148Goonga Ho Jana Chahta Hai Shabd | Nandkishore Acharya
गूँगा हो जाना चाहता है शब्द | नंदकिशोर आचार्यगूँगा हो जाना चाहता है शब्दनहीं तो भला कह पाएगा कैसे इन ज़ुल्मतों को वहक्या नाम हो उसका दुनिया छाली है ज़ुल्मतों में जोगूँगा हो कर ही अब हो पाएगा शब्दकहानी ज़ुल्मतों की मुझमें व्याप्त।

Ep 147Shishu | Naresh Saxena
शिशु | नरेश सक्सेना शिशु लोरी के शब्द नहींसंगीत समझता हैबाद में सीखेगा भाषाअभी वह अर्थ समझता हैसमझता है सबकी मुस्कानसभी के अल्ले ले ले लेतुम्हारे वेद पुराण कुरानअभी वह व्यर्थ समझता हैअभी वह अर्थ समझता हैसमझने में उसको, तुम होकितने असमर्थ, समझता हैबाद में सीखेगा भाषाउसी से है, जो है आशा।

Ep 146Nazm - 'Raatein Hain Udaas, Din kade Hain' | Ahmad Faraz
नज़्म ‘रातें हैं उदास, दिन कड़े हैं’ | अहमद फ़राज़ रातें हैं उदास दिन कड़े हैं,ऐ दिल तेरे हौसले बड़े हैं,ऐ यादे-हबीब साथ देना,कुछ मरहले सख़्त आ पड़े हैं,रूकना हो अगर तो सौ बहाने,जाना हो तो रास्ते बड़े हैं,अब किसे बतायें वजहे-गिरीया,जब आप भी साथ रो पड़े हैं,अब जाने कहाँ नसीब ले जाए,घर से तो ‘फ़राज़’ चल पड़े हैं,

Ep 145Prem Patra | Badri Narayan
प्रेमपत्र - बद्री नारायण प्रेत आएगा किताब से निकाल ले जाएगा प्रेमपत्र गिद्ध उसे पहाड़ पर नोच-नोच खाएगा चोर आएगा तो प्रेमपत्र चुराएगा जुआरी प्रेमपत्र पर ही दाँव लगाएगा ऋषि आएँगे तो दान में माँगेंगे प्रेमपत्र बारिश आएगी तो प्रेमपत्र ही गलाएगी आग आएगी तो जलाएगी प्रेमपत्र बंदिशें प्रेमपत्र पर ही लगाई जाएँगी साँप आएगा तो डँसेगा प्रेमपत्र झींगुर आएँगे तो चाटेंगे प्रेमपत्र कीड़े प्रेमपत्र ही काटेंगे प्रलय के दिनों में सप्तर्षि, मछली और मनु सब वेद बचाएँगे कोई नहीं बचाएगा प्रेमपत्र कोई रोम बचाएगा कोई मदीना कोई चाँदी बचाएगा, कोई सोना मैं निपट अकेला कैसे बचाऊँगा तुम्हारा प्रेमपत्र।

Ep 144Unka Darr | Gorakh Pandey
उनका डर - गोरख पांडेयवे डरते हैं किस चीज़ से डरते हैं वे तमाम धन-दौलत गोला-बारूद पुलिस-फ़ौज के बावजूद? वे डरते हैं कि एक दिन निहत्थे और ग़रीब लोग उनसे डरना बंद कर देंगे।