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Aag Aur Aadmi | Deo Shankar Navin
Episode 152

Aag Aur Aadmi | Deo Shankar Navin

Pratidin Ek Kavita

August 31, 20232m 43s

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Show Notes

आग और आदमी | देवशंकर नवीन

 

आग और हवा को अपने-पराए की समझ नहीं होती

वह अपने स्वभाव से काम करती है

आग हर कुछ को जला देती है

जीव-जंतु, फूल, कचरा, विष्ठा सब कुछ को

हवा हर कुछ को सोख लेती है

खुशबू, बदबू, मानवता, दानवता सब कुछ को

आग और हवा वातावरण में सदा से थी

लोगों को दिखती नहीं थी

मनुष्य की किसी वानरी वृत्ति से

आग प्रकट हो गई

मनुष्य ने समझा कि आग उसने पैदा की

आग और बदबू को हवा ने हवा दे दी

मनुष्य ने समझा कि हवा उसने पैदा की

आग सबसे पहले मनुष्य के दिमाग में सुलगती है

फिर धधकता है उसकी आसुरी वृत्ति का उत्ताप

जलते हुए लोग बाग बस्ती खेत देख कर

तृप्त होती हैं उसकी आसुरी वृत्तियाँ

ऊपर से आग के आविष्कर्ता पूर्वज

वेदना से कराह उठते हैं

चीख कर रोकते हैं अपनी संततियों को

मत कर ऐसा मेरे वंशज

आग हमने रक्षा के लिए जलाई थी

संहार के लिए नहीं,

वंशज नहीं सुनता है,

वंशज को नहीं सुनना है

क्षमता पाकर कोई सृजन

सृजता की कहाँ सुनता है!

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