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Pratidin Ek Kavita

Pratidin Ek Kavita

1,141 episodes — Page 23 of 23

Ep 41Bas Ek Khwab | Pratibha Katiyar

बस एक ख़्वाब कविता- प्रतिभा कटियार स्वर- शुबा सुभाष रावतपूरे शहर में तितलियां उड़ती फिर रही हैं. रंग बिरंगी तितलियां, छोटी बड़ी तितलियां. खूबसूरत तितलियां. आज शहर को अचानक क्या हो गया है? पूरा शहर तितलियों से भरा है. हर कोई तितलियों के पीछे भाग रहा है. भागता ही जा रहा है. कोई छोटी तितली के पीछे भाग रहा है, कोई बड़ी तितली के पीछे. न कोई गाड़ी, न बस, न ऑटो. सारे ऑफिस बंद, दुकानें भी बंद. घर में कोई नहीं, बड़े-छोटे, स्त्री-पुरुष सब के सब सड़कों पर दौड़ते हुए. पता चला ये जो तितलियां हैं. दरअसल, ये तितलियां नहीं हैं, ख़्वाब हैं.नये राजा ने यह मुनादी करवायी है कि हर कोई अपने जीवन का एक ख़्वाब पूरा कर सकता है. सरकार हर किसी का एक ख़्वाब जरूर पूरा करेगी. अब जो यह मुनादी हुई तो सबकी ख़्वाबों की पोटलियां निकलकर बाहर आ गईं. सदियों से पलकों के पीछे दबे पड़े ख़्वाब जरा सा मौका मिलते ही भाग निकले सारे ख़्वाब तितली हो गये. अब हर कोई अपने ख़्वाबों के पीछे भाग रहा है. कौन सा पकड़े, कौन सा छोड़ा जाए. वो वाला, नहीं वो वाला. नहीं, सबसे अज़ीज तो वो था, इसके बगैर तो काम चल सकता है. कोई किसी से बात नहीं कर रहा है. सब ख़्वाबों के पीछे भाग रहे हैं और जिन्होंने पकड़ लिया है अपने ख़्वाबों को, वे इस पसोपेश में हैं कि कौन सा पूरा कराया जाए. भई, ऐसा मौका रोज तो नहीं मिलता है ना?इसी आपाधापी में दिन बीत गया. बच्चों के हंसने की आवाजें शहर में गूंजने लगीं. पूरे दिन जब सारे बड़े अपने-अपने ख़्वाबों के पीछे भाग रहे थे बच्चों ने मिलकर खूब मजे किए. न स्कूल का झंझट था, न घरवालों की रोक-टोक. जो जी चाहा वो किया, जितनी मर्जी आयी उतनी देर खेलने का लुत्फ उठाया. शाम को उनके खुलकर हंसने की आवाजें शहर में गूंजने लगीं. बड़ों ने डांटा, चुप रहो, डिस्टर्ब कर रहे हो तुम लोग?किस बात में डिस्टर्ब कर रहे हैं हम ?बच्चों ने पूछा।आज नये राजा का फरमान है कि वो सबका एक ख़्वाब पूरा करेंगे. हम लोग अपना-अपना सबसे प्यारा ख़्वाब ढूंढ रहे हैं. बच्चे हंसे,'लेकिन ख़्वाब तो पूरा हो गया.'बड़े चौंके.हां, दिन बीत चुका है,और ख़्वाब पूरा हो चुका है. आप लोग सारा दिन ख़्वाब ढूंढते रहे और हमारा एक ही ख़्वाब था एक दिन अपनी मर्जी से जीने का, वो पूरा हो गया. अब बंद करिये ढूंढना-वूंढना. समय बीत चुका है.तितलियां गायब हो गईं सब की सब. शहर में बस गाड़ियाँ ही दौड़ रही थीं फिर से.

May 14, 20234 min

Ep 40Ek Vriksh Ki Hatya | Kunwar Narayan

एक वृक्ष की हत्या - कुँवर नारायणअबकी घर लौटा तो देखा वह नहीं था— वही बूढ़ा चौकीदार वृक्ष जो हमेशा मिलता था घर के दरवाज़े पर तैनात। पुराने चमड़े का बना उसका शरीर वही सख़्त जान झुर्रियोंदार खुरदुरा तना मैला-कुचैला, राइफ़िल-सी एक सूखी डाल, एक पगड़ी फूल पत्तीदार, पाँवों में फटा-पुराना जूता चरमराता लेकिन अक्खड़ बल-बूता धूप में बारिश में गर्मी में सर्दी में हमेशा चौकन्ना अपनी ख़ाकी वर्दी में दूर से ही ललकारता, “कौन?” मैं जवाब देता, “दोस्त!” और पल भर को बैठ जाता उसकी ठंडी छाँव में दरअसल, शुरू से ही था हमारे अंदेशों में कहीं एक जानी दुश्मन कि घर को बचाना है लुटेरों से शहर को बचाना है नादिरों से देश को बचाना है देश के दुश्मनों से बचाना है— नदियों को नाला हो जाने से हवा को धुआँ हो जाने से खाने को ज़हर हो जाने से : बचाना है—जंगल को मरुस्थल हो जाने से, बचाना है—मनुष्य को जंगल हो जाने से।

May 13, 20233 min

Ep 39Itne Bhale Nahi Ban Jana | Viren Dangwal | Varun Grover

इतने भले नहीं बन जाना साथी - वीरेन डंगवालइतने भले नहीं बन जाना साथी जितने भले हुआ करते हैं सरकस के हाथी गदहा बनने में लगा दी अपनी सारी कूवत सारी प्रतिभा किसी से कुछ लिया नहीं न किसी को कुछ दिया ऐसा भी जिया जीवन तो क्या जिया? इतने दुर्गम मत बन जाना संभव ही रह जाए न तुम तक कोई राह बनाना अपने ऊँचे सन्नाटे में सर धुनते रह गए लेकिन किंचित भी जीवन का मर्म नहीं जाना इतने चालू मत हो जाना सुन-सुन कर हरकतें तुम्हारी पड़े हमें शरमाना बग़ल दबी हो बोतल मुँह में जनता का अफ़साना ऐसे घाघ नहीं हो जाना ऐसे कठमुल्ले मत बनना बात नहीं जो मन की तो बस तन जाना दुनिया देख चुके हो यारो एक नज़र थोड़ा-सा अपने जीवन पर भी मारो पोथी-पतरा-ज्ञान-कपट से बहुत बड़ा है मानव कठमुल्लापन छोड़ो, उस पर भी तो तनिक विचारो काफ़ी बुरा समय है साथी गरज रहे हैं घन घमंड के नभ की फटती है छाती अंधकार की सत्ता चिल-बिल चिल-बिल मानव-जीवन जिस पर बिजली रह-रह अपना चाबुक चमकाती संस्कृति के दर्पण में ये जो शक्लें हैं मुस्काती इनकी असल समझना साथी अपनी समझ बदलना साथी

May 12, 20232 min

Ep 33Jo Tum Aa Jaate Ek Baar | Mahadevi Verma

जो तुम आ जाते एक बार - महादेवी वर्मा जो तुम आ जाते एक बारकितनी करुणा कितने सँदेश,पथ में बिछ जाते बन पराग,गाता प्राणों का तार-तारअनुराग-भरा उन्माद-राग;आँसू लेते वे पद पखार !जो तुम आ जाते एक बार !हँस उठते पल में आर्द्र नयनघुल जाता ओठों से विषाद,छा जाता जीवन में वसंतलुट जाता चिर-संचित विराग;आँखें देतीं सर्वस्व वार |जो तुम आ जाते एक बार !

May 11, 20232 min

Ep 35Pita - Uday Prakash

पिता - उदय प्रकाशपिता झाड़-झंखाड़, घाटियों और पत्थरों से भरे चटियल मैदान थे। पिता सागौन, शीशम, बबूल, तेंदुओं और हिरनों से भरे बीहड़ थे। बचपन में अक्सर किसी ऊँचे टीले पर चढ़ कर मैं आस-पास के गाँवों में ललकार दिया करता था नाके के पार शहर तक में पिता का रोब था। एक-एक इमारत पर उनकी कन्नियाँ सरकी थीं। एक-एक दीवार पर उनकी उँगलियों के निशान थे। हर दरवाज़े की काठ पर उनका रंदा चला था। नाके के इस पार जहाँ से गाँव की वीरानगी शुरू होती है हर खेत की कठोर छाती पर पिता अपनी कुदाल धँसा गए थे। हल की हर मूठ पर उनकी घट्ठेदार हथेलियों की छाप थी। हर गरियार बैल के पुट्ठों पर उनके डंडे के दाग थे... बचपन में पिता के कंधे पर बैठ कर मैं बाज़ार घूमने जाता था। पिता पहाड़ की तरह चलते भीड़ की तरह उनके कंधे पर मैं जंगली तोते की तरह बैठा रहता। बाद में पिता ग़ायब हो गए कहते हैं खेल, कुदाल, बैल, इमारतें, ईंटे, दरवाज़े, बाज़ार उन्हें पचा गए। मुझे लगता है उस चटियल मैदान के भीतर (जो पिता थे) ज़मीन की दूसरी-तीसरी परतों में। सरकता हुआ कोई नम सोता भी था जो मेहनत करते पिता की देह के अलावा कभी-कभी मेरी आँखों से भी रिसने लगता था।

May 10, 20233 min

Ep 36Yun Safar Bhar Yaad Hai | Dr Sheoraj Singh Bechain

यूँ सफ़र भर याद हैं - शिवराज सिंह बेचैन यूँ सफ़र भर याद हैं गुज़रे मुक़ामातों के लोग मेरी मजबूती तो हैं कमज़ोर हालातों के लोग दोस्त-दुश्मन, ग़ैर-अपने पास से देखे सभी यूँ तो इन्सां ही हैं आख़िर सब धर्म-जातों के लोग मैं कई सदियों से यूँ ख़ामोश था, संतप्त था मेरी जानिब से बहुत बोलें हैं बेबातों के लोग बात मंज़िल की तो करने का कोई मतलब नहीं ये तजुर्बात-ए-सफ़र लें मुझसे जो चाहते हैं लोग ये मेरा बचपन करोड़ों बेसहारों का वजूद है उन्हीं के हाथ में जीवन जो दे पाते हैं लोग बच गईं साँसें तो ले आया मैं इस अंजाम तक कल मिलूँगा मुझसे मिल लेना बहुत चाहते हैं लोग

May 9, 20233 min

Ep 38Amarphal | Arun Kamal

तोते का जुठाया अमरूद दो मुझेजिसके भीतर की लामिला फूटती हो बाहरगिलहरी के दाँतों के दागवाला जामुन दो काला अंधकार के रस से भरा हुआपक कर अपने ही उल्‍लास से फटताएक फल दो शरीफे काऔर रस के तेज वेग से जिस ईख केफटे हों पोरवह ईख दो मुझेऔर खूब चौड़े थन वाली गाय का दूधजिसके चलने भर सेछीमियों से झरता हो दूधमुझे छप्‍पन व्‍यंजन नहींबस एक फल दोसूर्य का लाल फलअंधकार का काला फलजिसे बस एक बार काटूँऔर अमर हो जाऊँवही अमरफल !सबसे अच्‍छे फल थे वेजो ऋतु में आएजब पौधा थापूरे उठान परलेकिन सबसे अंतिम फल हीजो पड़े डाल पर ज्‍वाएटेढ़े बाँगुरअगली ऋतु के लिए सहेजे हमनेवही अमरफल!

May 8, 20233 min

Ep 37Amrapali - Anamika

आम्रपाली - अनामिकाथा आम्रपाली का घरमेरी ननिहाल के उत्तर !आज भी हर पूनो की रातखाली कटोरा लिए हाथगुज़रती है वैशाली के खण्डहरों सेबौद्धभिक्षुणी आम्रपाली ।अगल-बगल नहीं देखती,चलती है सीधी मानो ख़ुद से बातें करतीशरदकाल में जैसे(कमण्डल-वमण्डल बनाने की ख़ातिर)पकने को छोड़ दी जाती हैलतर में ही लौकीपक रही है मेरी हर मांसपेशी,खदर-बदर है मेरे भीतर काहहाता हुआ सत !सूखती-टटाती हुईहड्डियाँ मेरीमरे कबूतर-जैसीइधर-उधर फेंकी हुई मुझमेंसोचती हूँ क्या वो मैं ही थीनगरवधू-बज्जिसँघ के बाहर के लोग भी जिसकीएक झलक को तरसते थे ?ये मेरे सन-से सफ़ेद बालथे कभी भौंरे के रँग के कहते हैं लोग,नीलमणि थीं मेरी आँखेंबेले के फूलों-सी झक सफ़ेद दन्तपँक्ति :खण्डहर का अर्द्धध्वस्त दरवाज़ा हैं अब जो !जीवन मेरा बदला, बुद्ध मिले,बुद्ध को घर न्योतकरअपने रथ से जब मैं लौट रही थीकुछ तरुण लिच्छवी कुमारों के रथ सेटकरा गया मेरे रथ काधुर से धुर, चक्के से चक्का, जुए से जुआ !लिच्छवी कुमारों को ये अच्छा कैसे लगता,बोले वे चीख़कर —“जे आम्रपाली, क्यों तरुण लिच्छवी कुमारों के धुर सेधुर अपना टकराती है ?”“आर्यपुत्रो, क्योंकि भिक्खुसंघ के साथभगवान बुद्ध ने भात के लिए मेरा निमन्त्रण किया है स्वीकार !”“जे आम्रपाली !सौ हजार ले और इस भात का निमन्त्रण हमें दे !”“आयपुत्रो, यदि तुम पूरा वैशाली गणराज्य भी दोगे,मैं यह महान भात तुम्हें नहीं देने वाली !”मेरा यह उत्तर सुन वे लिच्छवी कुमारचटकाने लगे उँगलियाँ :‘हाय, हम आम्रपाली से परास्त हुए तो अब चलो,बुद्ध को जीतें !’कोटिग्राम पहुँचे, की बुद्ध की प्रदक्षिणा,उन्हें घर न्योता,पर बुद्ध ने मान मेरा ही रखाऔर कहा ‘रह जाएगी करुणा, रह जाएगी मैत्री,बाक़ी सब ठह जाएगा...’“तो बहा काल-नद में मेरा वैभव...राख की इच्छामती,राख की गँगा,राख की कृष्णा-कावेरी,गरम राख़ की ढेरीयह कायाबहती रहीसदियोंइस तट से उस तट तक !टिमकता रहा एक अँगारा,तिरता रहा राख़ की इस नदी परबना-ठनाठना-बनातैरा लगातार !तैरी सोने की तरी !राख़ की इच्छामती !राख़ की गंगा !राख़ की कृष्णा-कावेरी ।झुर्रियों की पोटली मेंबीज थोड़े-से सुरक्षित हैंवो ही मैं डालती जाती हूँअब इधर-उधर !गिर जाते हैं थोड़े-से बीज पत्थर पर,चिड़िया का चुग्गा बन जाते हैं वे,बाक़ी खिल जाते हैं जिधर-तिधरचुटकी-भर हरियाली बनकर ।”सुनती हूँ मैं गौर से आम्रपाली की बातेंसोचती हूँ कि कमण्डल या लौकी या बीजकोषजो भी बने जीवन, जीवन तो जीवन है !हरियाली ही बीज का सपना,रस ही रसायन है !कमण्डल-वमण्डल बनाने की ख़ातिरशरदकाल में जैसे पकने को छोड़ दी जाती हैलतर में ही लौकीपक रही है मेरी हर मांसपेशी तो पकने दो, उससे क्या ?कितनी तो सुन्दर हैहर रूप में दुनिया !

May 7, 20236 min

Ep 34Apne Ghar Ki Talash Mein - Nirmala Putul

अपने घर की तलाश में - निर्मला पुतुलअंदर समेटे पूरा का पूरा घर मैं बिखरी हूँ पूरे घर में पर यह घर मेरा नहीं है बरामदे पर खेलते बच्चे मेरे हैं घर के बाहर लगी नेम-प्लेट मेरे पति की है मैं धरती नहीं पूरी धरती होती है मेरे अंदर पर यह नहीं होती मेरे लिए कहीं कोई घर नहीं होता मेरा बल्कि मैं होती हूँ स्वयं एक घर जहाँ रहते हैं लोग निर्लिप्त गर्भ से लेकर बिस्तर तक के बीच कई-कई रूपों में... धरती के इस छोर से उस छोर तक मुट्ठी भर सवाल लिए मैं छोड़ती-हाँफती-भागती तलाश रही हूँ सदियों से निरंतर अपनी ज़मीन, अपना घर अपने होने का अर्थ!

May 6, 20232 min

Ep 32Ityaadi - Rajesh Joshi

कुछ लोगों के नामो का उल्लेख किया गया था जिनके ओहदे थेबाकी सब इत्यादि थेइत्यादि तादात में हमेशा ही ज्यादा होते थेइत्यादि भाव ताव कर के सब्जी खरीदते थे और खाना वाना खा करखास लोगों के भाषण सुनने जाते थेइत्यादि हर गोष्ठियों में उपस्थिति बढ़ाते थेइत्यादि जुलूस में जाते थे तख्तियां उठाते थे नारे लगाते थेइत्यादि लम्बी लाइनों में लग कर मतदान करते थेउन्हें लगातार ऐसा भ्रम दिया गया था कि वो हीइस लोकतंत्र में सरकार बनाते थेइत्यादि हमेशा ही आन्दोलनों में शामिल होते थेइसलिए कभी कभी पुलिस की गोली से मार दिए जाते थे।जब वे पुलिस की गोली से मार दिए जाते थेतब उनके वो नाम भी हमें बतलाये जाते थेजो स्कूल में भरती करवाते समय रखे गए थेया जिससे उनमे से कुछ पगार पाते थेकुछ तो ऐसी दुर्घटना में भी इत्यादि रह जाते थे।इत्यादि यूँ तो हर जोखिम से डरते थेलेकिन कभी - कभी जब वो डरना छोड़ देते थेतो बाकी सब उनसे डरने लगते थे।इत्यादि ही करने को वो सारे काम करते थेजिनसे देश और दुनिया चलती थीहालाँकि उन्हें ऐसा लगता था कि वो ये सारे कामसिर्फ अपना परिवार चलाने को करते हैंइत्यादि हर जगह शामिल थे पर उनके नाम कहीं भीशामिल नहीं हो पाते थे।इत्यादि बस कुछ सिरफिरे कवियों की कविता मेंअक्सर दिख जाते थे।

May 5, 20233 min

Ep 31Mallikarjun Mansoor | Ashok Vajpeyi

मल्लिकार्जुन मंसूर - अशोक वाजपेयी मल्लिकार्जुन मंसूरअपने भरे पर फिर भी सीधे बुढ़ापे मेंहलका -सा झुककररखते हैंकल के कंधे पर पर अपना हाथठिठककर सुलगाते हैं अपनी बीड़ीचल पड़ते हैं फिर किसी अप्रत्‍याशितपड़ाव की ओरअपने लिए कुछ नहीं बटोरते उनके संत-हाथसिर्फ लुटाते चलते हैं सब कुछगुनगुनाते चलते हैं पंखुरी-पंखुरी सारा संसारईश्‍वर आ रहा होताघूमने इसी रास्‍तेतो पहचान न पाता कि वह स्‍वयं हैया मल्लिकार्जुन मंसूर

May 4, 20232 min

Ep 25Sainik Pati Ke Prati | Kalyani Sen | Dr Deoshankar Naveen

सैनिक पति के प्रति - कल्याणी सेन तुम फ़ौजी वर्दी में सजे हुए घर आये और तुमने अपनी माँ से कहा - कल सुबह चला जाऊँगा पता नहीं बन्दूक, राइफ़लों के जंगल से कब लौट कर आऊँगा तो मैंने लाल फूलों की माला तुम्हें नहीं पहनाई मैंने चन्दन तिलक तुम्हें नहीं लगाया नहीं की तुम्हारी आरती-वंदना या तुम्हारे सकुशल लौट आने की पूजा और प्रार्थना बिना पते-ठिकाने की आती हैं तुम्हारी चिट्ठियाँ सीमा पर बंद है युद्ध बीत चुकी हैं सर्दियाँ गर्मी आ गई है पिघल रहा है हिमालय का बर्फ़ हवा में फिर लू-लपट भर आई है अब कुछ ही दिनों में मानसून फटेगा बरसात आ जायेगी आसमान में बादल छटेगा मुझे पता नहीं तुम कब वापस आओगे बिना पते-ठिकाने की आती हैं तुम्हारी चिट्ठियाँ मगर सुनों, कान में कहती हूँतुम आ रहे हो नन्हें से शिशु बनकर बहुत जल्दी आ रहे हो अपने साथ नया युग, नए गीत ला रहे हो इस गीत और इस युग का प्रणाम तुम्हे भेजती हूँ आगत शिशु की हर मुस्कान तुम्हें भेजती हूँ जब तुम आओगे तीन युग और तीन गीत तुम्हारा स्वागत करेंगे तुम्हारी माँ की ज्योतिहीन आँखों में उजाला भर आएगा तुम्हारी पत्नी का आश्वस्त चेहरा ख़ुशी के आँसू से गीला हो जायेगा और तुम्हारा नन्हा सा शिशु तुम्हारी बाँहों में मुस्कुराएगामुस्कुराता जाएगा कभी समाप्त नहीं होगी उसकी मुस्कान।

May 3, 20233 min

Ep 30Chait Ki Chaupahi | Dinesh Kumar Shukla

चैत की चौपही - दिनेश कुमार शुक्लदिन नेवर्तों के महीना चैत का हैपड़ चले फीके मगर रह-रह दहकते हैं अभी तक रंग होली केहवा के तेवर जरा बदले हुए हैं और गाढ़ी हो चली है धूपफसल के पकने का मौसम आ गया पर लॉक अब तक हरी हैइस बार भुस तो बहुत होगा किन्तु दाने कम पड़ेंगे बालियों मेंमगर कोई क्या करे!दिन नेवर्तों के महीना चैत का हैचौपही में सज सँवर कर स्वाँग निकलेंगे,जग रही है रूप-रूपक की वो दिल-अंगेज दुनिया-फाँद कर संसार उसके पार का संसार रचतीबुलबुले में रंग भरतीकिसी फक्कड़ शरारत की हरारत माहौल में हैएक पल को पलक खोलो ध्यान गहराओ तो पाओगेयहीं इस अधगिरी चौपाल में कुछ लोग बैठे सज रहे होंगे-भेस धर कर कोई डाइन का पहन कर रात कालीहाथ में छप्पर व मूसल ले के गलियों में छमाछम दौड़तासंसार को ललकारता, आतंक को मुँह बिराता-सा आ रहा होगा,कोई पागल बनके ठरें की महक में बलबलातापाँव में दस हाथ की जंजीर बाँधे घूमता होगा तुड़ा कर,कोई जोकर कोई भालू औ कोई अरधंग बन करकोई गालों में चुभोकर साँग लोहे कीहवा पर चला रहा होगा दुखों से बहुत ऊपरचौपही में देव-दानव-ठग-अधम-सज्जन सभी के रूप होंगेभाँजते अपनी बनैठी चल रहे होंगे कई इतिहासऔर करतब पटेबाज़ी के दिखाता तर्क भी होगामौत के काँधे पे धर के हाथ हँसती जिन्दगी होगीसात पर्तों में हवा की तरसा-मरसा बज रहा होगाकान के पर्दों में दँहिकी गमकती होगीऔर पानी के गले में गूँजता होगा कुआँउधर ऊपर चन्द्रमा के पास खिड़की खोल करअर्धपरिचित एक चेहरा झाँकता होगा,दूर जाती और गहरे डूबती-सी मुस्कुराहट की कठिन आभावहीं पर खो रही होगी,और झालर की तरह उड़ती हुई चिड़ियाँगगन की अस्त होती नीलिमा में लहर भरती जा रही होंगी-तब गगन के काँपते जल में वो चेहरा डूब जायेगा!चौपही का ढोल धरती की तरह प्रतिध्वनित होतारात भर बजता रहेगा और तारों से झरेगी धूल,तनी गेहूँ की कँटीली बालियों की झील पर तब चन्द्रमा-सी एक थालीसरकती दस कोस तक हँसती फिसलती चली जायेगीभेड़िये उस फसल में जो छिपे हैं अब डर रहे होंगे!

May 2, 20235 min

Ep 29Bahamuni | Nirmala Putul

बहामुनी - निर्मला पुतुल तुम्हारे हाथों बने पत्तल पर भरते हैं पेट हज़ारोंपर हज़ारों पत्तल भर नहीं पाते तुम्हारा पेटकैसी विडम्बना है किज़मीन पर बैठ बुनती हो चटाईयाँऔर पंखा बनाते टपकता हैतुम्हारे करियाये देह से टप....टप...पसीना...!क्या तुम्हें पता है कि जब कर रही होती हो तुम दातुनतब तक कर चुके होते हैं सैकड़ों भोजन-पानीतुम्हारे ही दातुन से मुँह-हाथ धोकर?जिन घरों के लिए बनाती हो झाड़ूउन्हीं से आते हैं कचरे तुम्हारी बस्तियों मे?इस ऊबड़-खाबड़ धरती पर रहतेकितनी सीधी हो बहामुनीकितनी भोली हो तुमकि जहाँ तक जाती है तुम्हारी नज़रवहीं तक समझती हो अपनी दुनियाजबकि तुम नहीं जानती कि तुम्हारी दुनिया जैसीकई-कई दुनियाएँ शामिल हैं इस दुनिया मेंनहीं जानतीकि किन हाथों से गुज़रतीतुम्हारी चीज़ें पहुँच जाती हैं दिल्लीजबकि तुम्हारी दुनिया से बहुत दूर है अभी दुमका भी!

May 1, 20232 min

Ep 28Naye Ilake Mein |Arun Kamal

इस नए बसते इलाके मेंजहाँ रोज़ बन रहे हैं नये-नये मकानमैं अक्सर रास्ता भूल जाता हूँधोखा दे जाते हैं पुराने निशानखोजता हूँ ताकता पीपल का पेड़खोजता हूँ ढहा हुआ घरऔर ज़मीन का खाली टुकड़ा जहाँ से बाएँमुड़ना था मुझेफिर दो मकान बाद बिना रंग वाले लोहे के फाटक काघर था इकमंज़िलाऔर मैं हर बार एक घर पीछेचल देता हूँया दो घर आगे ठकमकातायहाँ रोज़ कुछ बन रहा हैरोज़ कुछ घट रहा हैयहाँ स्मृति का भरोसा नहींएक ही दिन में पुरानी पड़ जाती है दुनियाजैसे वसन्त का गया पतझड़ को लौटा हूँजैसे बैशाख का गया भादों को लौटा हूँअब यही उपाय कि हर दरवाज़ा खटखटाओऔर पूछोक्या यही है वो घर?समय बहुत कम है तुम्हारे पासआ चला पानी ढहा आ रहा अकासशायद पुकार ले कोई पहचाना ऊपर से देख कर

Apr 30, 20232 min

Ep 27Aane Walon Se Ek Sawaal | Bharatbhushan Agrawal

आने वालों से एक सवाल - भारतभूषण अग्रवालतुम, जो आज से पूरे सौ वर्ष बाद मेरी कविताएँ पढ़ोगे तुम मेरी धरती की नई पौध के फूल तुम, जिनके लिए मेरा तन-मन खाद बनेगा तुम, जब मेरी इन रचनाओं को पढ़ोगे तो तुम्हें कैसा लगेगा : इस का मेरे मन में बड़ा कौतूहल है। बचपन में तुम्हें हिटलर और गांधी की कहानियाँ सुनाई जाएँगी उस एक व्यक्ति की जिसने अपने देशवासियों को मोह की नींद सुला कर सारे संसार में आग लगा दी, और जब लपटें उसके पास पहुँचीं तो जिसने डर कर आत्महत्या कर ली ताकि उनका मोह न टूटे; और फिर उस व्यक्ति की जिसने अपने देशवासियों को सोते से जगा कर सारे संसार को शांति का रास्ता बताया और जब संसार उसके चरणों पर झुक रहा था तब जिसके देशवासी ने ही उसके प्राण ले लिए कि कहीं सत्य की प्रतिष्ठा न हो जाए। तुम्हें स्कूलों में पढ़ाया जाएगा कि सौ वर्ष पहले इनसानी ताक़तों के दो बड़े राज्य थे जो दोनों शांति चाहते थे और इसीलिए दोनों दिन-रात युद्ध की तैयारी में लगे रहते थे, जो दोनों संसार को सुखी देखना चाहते थे इसीलिए सारे संसार पर क़ब्जा करने की सोचते थे; और यह भी पढ़ाया जाएगा कि एक और राज्य था जो संसार-भर में शांति का मंत्र फूँकता रहा पर जिसे अपने ही घर में भाई-भाई के वीच दीवार खड़ी करनी पड़ी जो हर पराधीन देश की मुक्ति में लगा रहता था पर जिसके अपने ही अंग पराए बंधन में जकड़े रहे। तुम्हें विश्वविद्यालयों में बताया जाएगा कि इंसान का डर दूर करने के लिए सौ साल पहले वैज्ञानिकों ने कुछ ऐसे आविष्कार किए जिनसे इंसान का डर और भी बढ़ गया, और यह भी कि उसने चाँद-सितारों में भी पहुँचने के सपने देखे जबकि उसके सारे सपने चकनाचूर हो गए थे। और तभी किसी दिन किसी प्राचीन काव्य-संग्रह में तुम मेरी कविताएँ पढ़ोगे; और उन्हें पढ़ कर तुम्हें कैसा लगेगा यह जानने का मेरे मन में बड़ा कौतूहल है। तुम जो आज से सौ साल बाद मेरी कविताएँ पढ़ोगे तुम क्या यह न जान सकोगे कि सौ साल पहले जिन्होंने तन्मयता से विभोर होकर आत्मा के मुक्त-आरोहण के या समवेत जीवन के जय के गीत गाए वे आँखें बंद किए सपनों में डूबे थे और मैं जिसका स्वर सदा दर्द से गीला रहा, जिसके भर्राए गले से कुछ चीख़ें ही निकल सकीं मैं सारा बल लगा कर आँखें खोले यथार्थ को देख रहा था।

Apr 29, 20233 min

Ep 26Besan Ki Saundhi Roti Par | Nida Fazli

बेसन की सोंधी रोटी पर - निदा फ़ाज़लीबेसन की सोंधी रोटी पर खट्टी चटनी जैसी माँ ,याद आता है चौका-बासन, चिमटा फुँकनी जैसी माँ ।बाँस की खुर्री खाट के ऊपर हर आहट पर कान धरे ,आधी सोई आधी जागी थकी दुपहरी जैसी माँ ।चिड़ियों के चहकार में गूँजे राधा-मोहन अली-अली ,मुर्गे की आवाज़ से खुलती, घर की कुंड़ी जैसी माँ ।बीवी, बेटी, बहन, पड़ोसन थोड़ी-थोड़ी सी सब में ,दिन भर इक रस्सी के ऊपर चलती नटनी जैसी मां ।बाँट के अपना चेहरा, माथा, आँखें जाने कहाँ गई ,फटे पुराने इक अलबम में चंचल लड़की जैसी माँ ।

Apr 28, 20232 min

Ep 24Aara Machine | Vishwanath Prasad Tiwari

आरा मशीन - विश्वनाथ-प्रसाद-तिवारीचल रही है वहइतने दर्प मेंकि चिनगारियाँ छिटकती हैं उससेदौड़े आ रहे हैंअगल-बगल के यूकिलिप्टसऔर हिमाचल के देवदारुउसके आतंक में खिंचे हुएदूर-दूर अमराइयों मेंपक्षियों का संगीत गायब हो गया हैगुठलियाँ बाँझ हो गई हैंउसकी आवाज सेमेरा छोटा बच्चा देख रहा है उसेकौतुक सेकि कैसे चलती है वहकैसे अपने आप एक लकड़ीदूसरी को ठेलकर आगे निकल जाती हैऔर अपना कलेजा निकालकरसंगमरमर की तरह चमकने लगती हैमेरा बच्चा देख रहा है अचरज सेअपने समय का सबसे बड़ा चमत्कारतेज नुकीले दाँतघूमता हुआ पहिया और पट्टाबच्चा किलकता है ताली बजाकरमैं सिहर जाता हूँअभी वह मेरे सीने से गुजरेगीमेरे भीतर से एक कुर्सी निकालेगीराजा के बैठने के लिएराजा बैठेगा सिंहासन परऔर वन-महोत्सव मनाएगा।

Apr 27, 20232 min

Ep 23Baarish | Nemichandra Jain

बारिश - नेमिचंद्र जैनबारिश सुबह हुई थी जब फुहारों से नहाए थे पेड़ घर-द्वार बच्चे लोगों के मन और अब शाम को पश्चिम में रंगों का मेला भरा है लाल और सुनहरे की कितनी रंगते हैं ऊदे-साँवले बादलों को लपेटे कमरे में उमस के बावजूद बाहर हवा में सरसराहट है तरावट भरी छतों पर बच्चे नौजवान और अधेड़ भी पतंगें उड़ा रहे हैं चारों तरफ़ किलकारियाँ, खिलखिलाहट, भाग-दौड़ पतंगें कटने या काटने की सनसनी है तमाम परेशानियों, दुश्चिंताओं को मुँह चिढ़ाती उत्तेजना है ज़िंदगी की कोई शर्मीली लड़की एक छत की मुँडेर से टिक कर खड़ी है किसी ख़याल में खोई हुई शायद हवा में डगमगाती उठती-गिरती-नाचती पतंगों में अपनी ज़िंदगी की कोई तस्वीर देखती या आसमान के रंगों में कोई अनलिखी इबारत बाँचती पहचानती यह पल कितना ख़ुशनुमा, सुहावना सुनहरी संभावनाओं से भरपूर है अपने आप में संपूर्ण, सार्थक अविस्मरणीय भले ही थोड़ी देर में रंगों का मेला उठ जाएगा बच्चे, नौजवान, अधेड़ शायद कमरों में जाकर दूरदर्शन पर चित्रहार देखने लगेंगे शर्मीली लड़की रसोई में लौटकर बढ़ती हुई महँगाई से खीझी सब्ज़ी काटती माँ से डाँट खाएगी और जीवन फिर अपने पुराने ढर्रे पर चल पड़ेगा।

Apr 26, 20233 min

Ep 22Adha Chand | Naresh Saxena

पूरे चाँद के लिए मचलता है आधा समुद्र आधा चांद मांगता है पूरी रातपूरी रात के लिए मचलता हैआधा समुद्रआधे चांद को मिलती है पूरी रातआधी पृथ्वी की पूरी रातआधी पृथ्वी के हिस्से में आता हैपूरा सूर्यआधे से अधिकबहुत अधिक मेरी दुनिया के करोड़ों-करोड़ लोगआधे वस्त्रों से ढांकते हुए पूरा तनआधी चादर में फैलाते हुए पूरे पांवआधे भोजन से खींचते पूरी ताकतआधी इच्छा से जीते पूरा जीवनआधे इलाज की देते पूरी फीसपूरी मृत्युपाते आधी उम्र में।आधी उम्र, बची आधी उम्र नहींबीती आधी उम्र का बचा पूरा भोजनपूरा स्वादपूरी दवापूरी नींदपूरा चैनपूरा जीवनपूरे जीवन का पूरा हिसाब हमें चाहिएहम नहीं समुद्र, नहीं चांद, नहीं सूर्यहम मनुष्य, हम--आधे चौथाई या एक बटा आठपूरे होने की इच्छा से भरे हम मनुष्य।

Apr 25, 20232 min

Ep 15Achcha Laga | Ramdarash Mishra

'अच्छा लगा' - रामदरश मिश्रआज धरती पर झुका आकाश तो अच्छा लगासिर किये ऊँचा खड़ी है घास तो अच्छा लगाआज फिर लौटा सलामत राम कोई अवध मेंहो गया पूरा कड़ा बनवास तो अच्छा लगाथा पढ़ाया मांज कर बरतन घरों में रात-दिनहो गया बुधिया का बेटा पास तो अच्छा लगालोग यों तो रोज़ ही आते रहे, आते रहेआज लेकिन आप आये पास तो अच्छा लगाक़त्ल, चोरी, रहज़नी व्यभिचार से दिन थे मुखरचुप रहा कुछ आज का दिन ख़ास तो अच्छा लगाख़ून से लथपथ हवाएँ ख़ौफ-सी उड़ती रहींआँसुओं से नम मिली वातास तो अच्छा लगाहै नहीं कुछ और बस इंसान तो इंसान हैहै जगा यह आपमें अहसास तो अच्छा लगाहँसी हँसते हाट की इन मरमरी महलों के बीचहँस रहा घर-सा कोई आवास तो अच्छा लगारात कितनी भी घनी हो सुबह आयेगी ज़रूरलौट आया आपका विश्वास तो अच्छा लगाआ गया हूँ बाद मुद्दत के शहर से गाँव मेंआज देखा चाँदनी का हास तो अच्छा लगादोस्तों की दाद तो मिलती ही रहती है सदाआज दुश्मन ने कहा–शाबाश तो अच्छा लगा

Apr 24, 20233 min

Ep 18Phoolan Ke Liye Ek Shokgeet | Mrinal Pande

फूलन के लिए एक शोकगीत - मृणाल पाण्डेसिरहाने आहिस्ता बोलेंगे लोग, तेरे नहीं मीर केक्योंकि फूलन, बिना रोए-धोए तू बस टुक से सो गईतेरे सिरहाने पैताने बस अब एक शोर हैनेता, अभिनेता, अंग्रेज़ी में गोद लेकर तुझे फ़ोटोजेनिक बनाने वाले,सबकी वन्स मोर, वन्स मोर हैसिरहाने आहिस्ता बोलेंगे लोग, तेरे नहीं मीर केबीहड़ों के सतर्क साए सरका किए थे लगातार तेरी निगाह मेंघायल शेरनी सी जब तू चहलकदमी किया करे थीकभी अपने को बीस गुना, कभी सौ गुना गिनती हुईख़बरें तेरी बहुत करके अफ़वाह हुआ करती थींकोई वीरानी से वीरानी थी, जिसे तू जिया करती थीअब तो बस हवाईअड्डे पर जो छूट गया ज़माना भर हैबाद तेरे बचे रहने का बहाना करे सो शबाना भर हैमोमिन को कितनी फ़िक्र रहती थी तेरी तूने नहीं जानाकहता था कहां जायेगी शबाना कुछ ठिकाना कर लेसिरहाने आहिस्ता बोलेंगे लोग, तेरे नहीं मीर के, ऐ फूलनतू तो ना रोई, ना धोई, बस टुक से जैसी थी, वैसी ही सो गई

Apr 23, 20232 min

Ep 20Ek Ladka | Ibn-E-Insha

'एक लड़का' - इब्न-ए-इंशा एक छोटा-सा लड़का था मैं जिन दिनोंएक मेले में पंहुचा हुमकता हुआजी मचलता था एक-एक शै पर मगरजेब खाली थी कुछ मोल ले न सकालौट आया लिए हसरतें सैकड़ोंएक छोटा-सा लड़का था मै जिन दिनोंखै़र महरूमियों के वो दिन तो गएआज मेला लगा है इसी शान सेआज चाहूं तो इक-इक दुकां मोल लूंआज चाहूं तो सारा जहां मोल लूंनारसाई का जी में धड़का कहां?पर वो छोटा-सा अल्हड़-सा लड़का कहां?

Apr 22, 20231 min

Ep 21Gandhi Ho Ya Ghalib Ho | Sahir Ludhiyanvi | Varun Grover

'गाँधी' हो या 'ग़ालिब' हो - साहिर लुधियानवी'गाँधी' हो या 'ग़ालिब' हो ख़त्म हुआ दोनों का जश्न आओ उन्हें अब कर दें दफ़्न ख़त्म करो तहज़ीब की बात बंद करो कल्चर का शोर सत्य अहिंसा सब बकवास हम भी क़ातिल तुम भी चोर ख़त्म हुआ दोनों का जश्न आओ उन्हें अब कर दें दफ़्न वो बस्ती वो गाँव ही क्या जिस में हरीजन हो आज़ाद वो क़स्बा वो शहर ही क्या जो न बने अहमदाबाद ख़त्म हुआ दोनों का जश्न आओ उन्हें अब कर दें दफ़्न 'गाँधी' हो या 'ग़ालिब' हो दोनों का क्या काम यहाँ अब के बरस भी क़त्ल हुई एक की शिकस्ता इक की ज़बाँ ख़त्म हुआ दोनों का जश्न आओ उन्हें अब कर दें दफ़्न

Apr 21, 20231 min

Ep 19Vichar Aate Hain | Muktibodh | Dr Anunaya Chaubey

विचार आते हैं - गजानन माधव मुक्तिबोधविचार आते हैं— लिखते समय नहीं, बोझ ढोते वक़्त पीठ पर सिर पर उठाते समय भार परिश्रम करत समय चाँद उगता है व पानी में झलमलाने लगता है हृदय के पानी में। विचार आते हैं लिखते समय नहीं, ...पत्थर ढोते वक़्त पीठ पर उठाते वक़्त बोझ साँप मारते समय पिछवाड़े बच्चों की नेकर फचीटते वक़्त!! पत्थर पहाड़ बन जाते हैं नक़्शे बनते हैं भौगोलिक पीठ कच्छप बन जाते हैं समय पृथ्वी बन जाता है...

Apr 20, 20232 min

Ep 17Satpura Ke Jungle | Bhawani Prasad Mishra

सतपुड़ा के जंगल - भवानीप्रसाद मिश्रसतपुड़ा के घने जंगल नींद में डूबे हुए-से, ऊँघते अनमने जंगल। झाड़ ऊँचे और नीचे चुप खड़े हैं आँख भींचे; घास चुप है, काश चुप है मूक शाल, पलाश चुप है; बन सके तो धँसो इनमें, धँस न पाती हवा जिनमें, सतपुड़ा के घने जंगल नींद में डूबे हुए-से ऊँघते अनमने जंगल। सड़े पत्ते, गले पत्ते, हरे पत्ते, जले पत्ते, वन्य पथ को ढँक रहे-से पंक दल में पले पत्ते, चलो इन पर चल सको तो, दलो इनको दल सको तो, ये घिनौने-घने जंगल, नींद में डूबे हुए-से ऊँघते अनमने जंगल। अटपटी उलझी लताएँ, डालियों को खींच खाएँ, पैरों को पकड़ें अचानक, प्राण को कस लें कपाएँ, साँप-सी काली लताएँ बला की पाली लताएँ, लताओं के बने जंगल, नींद में डूबे हुए-से ऊँघते अनमने जंगल। मकड़ियों के जाल मुँह पर, और सिर के बाल मुँह पर, मच्छरों के दंश वाले, दाग़ काले-लाल मुँह पर, बात झंझा वहन करते, चलो इतना सहन करते, कष्ट से ये सने जंगल, नींद मे डूबे हुए-से ऊँघते अनमने जंगल। अजगरों से भरे जंगल अगम, गति से परे जंगल, सात-सात पहाड़ वाले, बड़े-छोटे झाड़ वाले, शेर वाले बाघ वाले, गरज और दहाड़ वाले, कंप से कनकने जंगल, नींद मे डूबे हुए-से ऊँघते अनमने जंगल। इन वनों के ख़ूब भीतर, चार मुर्ग़े, चार तीतर, पाल कर निश्चिंत बैठे, विजन वन के बीच बैठे, झोंपड़ी पर फूस डाले गोंड तगड़े और काले जब कि होली पास आती, सरसराती घास गाती, और महुए से लपकती, मत्त करती बास आती, गूँज उठते ढोल इनके, गीत इनके गोल इनके। सतपुड़ा के घने जंगल नींद मे डूबे हुए-से ऊँघते अनमने जंगल। जगते अँगड़ाइयों में, खोह खड्डों खाइयों में घास पागल, काश पागल, शाल और पलाश पागल, लता पागल, वात पागल, डाल पागल, पात पागल, मत्त मुर्ग़े और तीतर, इन वनों के ख़ूब भीतर। क्षितिज तक फैला हुआ-सा, मृत्यु तक मैला हुआ-सा क्षुब्ध काली लहर वाला, मथित, उत्थित ज़हर वाला, मेरु वाला, शेष वाला, शंभु और सुरेश वाला, एक सागर जानते हो? ठीक वैसे घने जंगल, नींद मे डूबे हुए-से ऊँघते अनमने जंगल। धँसो इनमें डर नहीं है, मौत का यह घर नहीं है, उतर कर बहते अनेकों, कल-कथा कहते अनेकों, नदी, निर्झर और नाले, इन वनों ने गोद पाले, लाख पंछी, सौ हिरन-दल, चाँद के कितने किरन दल, झूमते बनफूल, फलियाँ, खिल रहीं अज्ञात कलियाँ, हरित दूर्वा, रक्त किसलय, पूत, पावन, पूर्ण रसमय, सतपुड़ा के घने जंगल लताओं के बने जंगल।

Apr 19, 20235 min

Ep 16Bahut Se Geet | Tejender Sharma

बहुत से गीत ख़्यालों में - तेजेन्द्र शर्माबहुत से गीत ख्यालों में सो रहे थे मेरेतुम्हारे आने से जागे हैं, कसमसाए हैंजो नग़मे आजतक मैं गुनगुना न पाया थातुम्हारी बज़्म में ख़ातिर तुम्हारी गाए हैंमेरे हालात से अच्छी तरह तूं है वाकिफ़ज़माने भर की ठोकरों के हम सताए हैंतेरे किरदार की तारीफ़ में जो लिखे थेउन्हीं नग़मों को अपने दिल में हम बसाए हैंफूल, तारे औ चांद पड़ ग़ये पुराने हैंअपने अरमानों से यादें तेरी सजाए हैंसाक़ी पैमाना सागरो मीना, किसके लिएतेरे मदमस्त नयन मुझको जो पिलाए हैं

Apr 18, 20232 min

Ep 12Dharti Ke Is Hisse Mein | Rajesh Joshi

धरती के इस हिस्से में - राजेश जोशी धरती के इस हिस्से में इस समयसबसे तेज़ आवाज़ें चिड़ियों के चेहचाने की है धरती के इस हिस्से में इस समयसबसे तेज़ आवाज़ें किनारे से लहरों के टकराने की है इस समय इस हिस्से में समुद्रकिनारे की चट्टान पर अपनी लहर कोएक उस्तरे की तरह घिस रहा है क्या वो आसमान की दाढ़ी बनाने की तैयारी कर रहा है ?बहुत पास हलकी हलकी सी डुबुक की छोटी छोटी आवाज़ें हैंवहां मछलियाँ मस्ता रही हैं धरती के इस हिस्से में इस समयसबसे तेज़ आवाज़ें पेड़ों के सरसराने की हैं यहाँ सूर्य धीरे धीरे डूब रहा हैं चाँद धीरे धीरे ऊपर चढ़ रहा हैंनि:शब्द ! बेआवाज़ !!रतजगे की स्मृतियों मेंचाँद के न जाने कितने चेहरे हैं यह चेहरा लेकिन उन सबसे अलग हैंधरती का यह हिस्सा लेकिन एक हिस्सा भर ही हैंहमारी धरती काअफ़सोस !!

Apr 17, 20232 min

Ep 14Tumhara Pyar | Manglesh Dabral

तुम्हारा प्यार - मंगलेश डबरालतुम्हारा प्यार लड्डुओं का थाल हैजिसे मैं खा जाना चाहता हूँतुम्हारा प्यार एक लाल रूमाल हैजिसे मैं झंडे-सा फहराना चाहता हूँतुम्हारा प्यार एक पेड़ हैजिसकी हरी ओट से मैं तारॊं को देखता हूँतुम्हारा प्यार एक झील हैजहाँ मैं तैरता हूँ और डूब रहता हूँतुम्हारा प्यार पूरा गाँव हैजहाँ मैं होता हूँ ।

Apr 16, 20231 min

Ep 11Thimpu - Bhutan | Gulzar

थिंपू - भूटान | गुलज़ार पिछली बार भी आया थातो इसी पहाड़ नेनीचे खड़ा थामुझसे कहा थातुम लोगों के कद क्यूँ छोटे होते हैं ?आओ हाथ पकड़ लो मेरापसलियों पर पांव रखो ऊपर आ जाओआओ ठीक से चेहरा तो देखूं तुम कैसे लगते होजैसे मेरे चींटियों को तुम अलग अलग पहचान नहीं सकतेमुझको भी तुम एक ही जैसे लगते हो सब एक ही फर्क हैमेरी कोई चींटी जो बदन पर चढ़ जाएतो चुटकी से पकड़ के फेक उसको मार दिया करते हो तुममैं ऐसा नहीं करतामेरे सरोवर देखो,कितने उचें उचें कद हैं इनकेतुमसे सात गुना तो होंगेशायद दस या बारह गुना होउम्रे देखो उसकी तुम, कितनी बढ़ी हैं, सदियों जिंदा रहते हैंकह देते हो कहने कोलेकिन अपने बड़ों की इज्ज़त करते नहीं तुमइसीलिए तुम लोगों के कदशायद छोटे रह जाते हैंइतना अकेला नहीं हूँ मैंतुम जितना समझते होतुम ही लोग ही भीड़ में रहकर भी तनहा तनहा लगते होभरे हुए जब काफिले बादलों के जाते हैंझप्पा डाल के मिल कर जाते हैं मुझसे दरिया भी उतरते हैं तो पांव छू के विदा होते हैंमौसम मेहमान है आते हैं तो महीनों रह कर जाते हैंअज़ल अज़ल के रिश्ते निभाते हैंतुम लोगों की उम्रें देखता हूँकितनी छोटी छोटी मायादों में मिलते और बिछड़ते होख्वाबें और उम्मीदें भीबस छोटी छोटी उम्रों जितनीइसीलिए क्यातुम लोगों के कद इतने छोटे रह जाते हैं

Apr 15, 20233 min

Ep 12Mangal Gaan | Ashok Vajpayi

मंगल गान - अशोक वाजपेयी नदी गा रही हैनदी से नहा कर लौटता देव-शिशु गा रहा है किनारे के किसी झुरमुट में अदृश्य एक चिड़िया गा रही हैनदी तक जाती पगडंडी अपनी हरी घास में धीरे से गा रही हैनदी पर झलकता रक्तिम सूर्यास्त गा रहा हैफ़ीकी सी आभा लिए उभरता अर्धचंद्र गा रहा हैगा रहे हैं सभी एक असमाप्य मंगलकामनामुझे सुनाई नहीं देता पृथ्वी का आकाश का मंगल गान?सुनता हूँ विलाप,चीख पुकार, चीत्कार सुनाई नहीं देता कोई मंगल गान!लगता है सुनाई दे रहा है ईश्वर का सिसकना, आकाश का कोने में जाकर बिलखना,पृथ्वी का अपने निबिड़ एकांत में चीखना।सुनाई नहीं देता कोई मंगल गान।

Apr 14, 20232 min

Ep 10Parvaah | Jacinta Kerketta

परवाह | जसिंता केरकेट्टामाँ एक बोझा लकड़ी के लिए क्यों दिन भर जंगल छानती, पहाड़ लाँघती, देर शाम घर लौटती हो? माँ कहती है : जंगल छानती, पहाड़ लाँघती, दिन भर भटकती हूँ सिर्फ़ सूखी लकड़ियों के लिए। कहीं काट न दूँ कोई ज़िंदा पेड़!

Apr 13, 20231 min

Ep 9Kate Haath | Ashok Chakradhar

कटे हाथ | अशोक चक्रधर बगल में एक पोटली दबाएएक सिपाही थाने में घुसाऔर सहसाथानेदार को सामने पाकरसैल्‍यूट माराथानेदार ने पोटली की तरफ निहारासैल्‍यूट के झटके में पोटली भिंच गईऔर उसमें से एक गाढी-सी कत्‍थई बूंद रिस गईथानेदार ने पूछा:'ये पोटली में से क्‍या टपक रहा है ?क्‍या कहीं से शरबत की बोतलेंमारके आ रहा है ?सिपाही हडबढाया , हुजूर इसमें शरबत नहीं हैशरबत नहीं हैतो घबराया क्‍यों है, हद हैशरबत नहीं है, तो क्‍या शहद है?सिपाही कांपा, शर शहद भी नहीं हैइसमें से तोकुछ और ही चीज बही हैऔर ही चीज, तो खून है क्‍?अबे जल्‍दी बताक्‍या किसी मुर्गे की गरदन मरोड़ दीक्‍या किसी मेमने की टांग तोड़ दीअगर ऐसा है तो बहुत अच्‍छा हैपकाएंगेहम भी खाएंगे, तुझे भी खिलाएंगे!सिपाही घिघियायासर! न पका सकता हूं, न खा सकता हूंमैं तो बस आपको दिखा सकता हूंइतना कहकर सिपाही ने मेज पर पोटली खोलीदेखते ही, थानेदार की आत्‍मा भी डोलीपोटली से निकलेकिसी नौजवान के दो कटे हुए हाथथानेदार ने पूछाए , बता क्‍या है बातयह क्‍या कलेस है ?सिपाही बोला, हुजूर!रेलवे लाइन एक्‍सीडेंट का केस हैएक्‍सीडेंट का केस है।तो यहां क्‍यों लाया है,और बीस परसेंट बाडी ले आया है।एट़टी परसेंट कहां छोड़ आया है।सिपाही ने कहा, माई-बापयह बंदा इसलिए तो शर्मिंदा हैक्‍योंकि एट्टी परसेंट बाडी तो जिंदा हैपूरी लाश होती तो यहां क्‍यों लातावहीं उसका पंचनामा न बनातालेकिन गजब बहुत बड़ा हो गयावह तो हाथ कटवा के खड़ा हो गयारेल गुजर गई तो मैं दौडावह तो तना था मानिंदे हथौडामुझे देखकर मुसकराने लगाऔर अपनी ठूंठ बाहों कोहिला-हिलाकर बताने लगाले जा, ले जाये फालतू हैं, बेकार हैंऔर बुलरा ले कहां पत्रकार हैं ?मैं उन्‍हें बताऊंगा कि काट दिएइसलिए किमैंने झेला है भूख और गरीबी काएक लंबा सिलसिलापंद्रह वर्ष हो गएइन हाथों को कोई काम ही नहीं मिलाहां, इसलिए-इसलिएमैंने सोचा कि फालतू हैंइन्‍हें काट दूंऔर इस सोए हुए जनतंत्र केआलसी पत्रकारों कोलिखने के लिए प्‍लाट दूंप्‍लाट दूं कि इन कटे हाथों कोपंद्रह साल सेरोजी-रोटी की तलाश हैआदमी जिंदा है औरये उसकी तलाश की लाश है।इसे उठा लेअरे, इन दोनों हाथों को उठा लेकटवा के भी मैं तो जिंदा हूंतू क्‍यो मर गया ?हुजूर, इतना सुनकर मैं तो डर गयाजिन्‍न है या भूतमैने किसी तरह अपने-आपको साधाहाथों को झटके से उठायापोटली में बांधाऔर यहां चला आयाहुजूर, अब मुझे न भेजेंऔर इन हाथों को भीआप ही सहेजें।थानेदार चकरा गयाशायद कटे हाथ देखकर घबरा गयाबोला, इन्‍हें मे‍डिकल कालेज ले जा,लडके इन्‍हें देखकर डरेंगे नहींइनकी चीर-फाड़ करके स्‍टडी करेंगे।इसके बाद पता नहीं क्‍या हुआलेकिन घटना ने मन को छुआअरे उस पढ़े लिखे नौजवान नेअपने हाथों को खो दियाऔर सच कहता हूं अखबार मेंयह खबर पढ़कर मैं रो दिया।सोचने लगाकि इसे पढ़करतथाकथित बडे लोगशर्म से क्‍यों नही गड़ गएदेखिए, आज एक अकेले पेट के लिएदो हाथ भी कम हो गए।वह उकता गया झूठे वादों, झूठी बातों से,वरना क्‍या नहीं कर सकता थाअपने हाथों सेवह इन हाथों से किसी मकान कानक्‍शा बना सकता थाहाथों में बंदूक थामकरदेश को सुरक्षा दिला सकता था।इन हाथों से वह कोईसडक बना सकता थाऔर तो औरब्‍लैक बोर्ड पर 'ह' से हाथ लिखकरबच्‍चों को पढ़ा सकता था,मैं सोचता हूंइन्‍हीं हाथों से उसे बचपन मेंतिमाही, छमाही, सालाना परीक्षाएं दी होंगी,मां ने पास होने की दुआएं की होंगी।इन्‍हीं हाथों से वहप्रथम श्रेणी में पास होने कीखबर लाया होगा,इन्‍हीं हाथों से उसनेखुशी का लड़डू खाया होगा।इन्‍हीं हाथों में डिग्रियां सहेजी होंगीइन्‍हीं हाथों से अर्जियां भेजी होंगी।और अगर काम पा जातातो यह नपूताइन्‍हीं हाथों से मां के पांव भी छूताखुशी में इन हाथों से ढपली बजाताऔर किसी खास रात कोइन्‍हीं हाथों सेदुलहन का घूंघट उठाता।इन्‍हीं हाथों से झुनझुना बजाकरबेटी को बहलातारोते हुए बेटे के गाल सहलातातूने तो काट लिए मेरे दोस्‍तलेकिन तू कायर नहीं हैकायर तो तब होताजब समूचा कट जाताऔर देश के रास्‍ते सेहमेशा-हमेशा को हट जातासरदार भगत सिंह नेयह बताने के लिए देश में गुलामी हैपर्चे बांटेऔर तूने बेरोजगारी हैयह बताने के लिए हाथ काटेबडी बात बोलने का तोमुझमें दम नहीं हैलेकिन प्‍यारे, तू किसी शहीद से कम नहीं है।

Apr 12, 20237 min

Ep 8Aagman | Dinesh Kumar Shukla

आगमन / दिनेश कुमार शुक्ल जंगी बेड़ों पर नहींन तो दर्रा-खैबर सेआयेंगे इस बार तुम्हारे भीतर से वेधन-धरती ही नहींतुम्हारा मर्म, तुम्हारे सपने भी वे छीनेंगे इस बार,वे तुम सबके रक्त पसीने और आँसुओंका बदलेंगे रंगतुम्हारी दृष्टि तुम्हारा स्वादतुम्हारी खालतुम्हारी चाल-ढाल का भी बदलेगे ढंग,बीजों के अंकुरणऔर जीवों के गर्भाधाननियंत्रित होंगे उनके कानूनों सेतुम्हें पता ही नहींतुम्हारी कविता में वेपहले से ही घोल चुके हैंअपने छल के छन्दतुम्हारी भाषाओं के अंक मिथक किस्से मुहावरेसिर्फ अजायबघर में अब पाये जायेंगेदेशों की सीमाओं का उनकी सेनायेंखुलेआम इस बार अतिक्रमण नहीं करेंगीवे तो सिर्फ इरेज़र से ही मिटा रहे हैं देश-देश की सीमा रेखासात द्वीप-नवखण्ड और सातों समुद्र मेंसिर्फ पण्य की सार्वभौम सत्ता का सिक्काचला करेगाइस एकीकृत विश्वग्राम के मत्स्य-न्याय मेंएक साथ सब जीव जलेंगे दावानल मेंजिंसों की इलहाम भरी नई खेप अवतरित हुई हैएक-भाव रस एक-एक भाषा में सारेबन्दीजन गुणगान कर रहे हैं उसका हीनये ब्रान्ड का प्रेम उतारा था बाज़ार मेंजिसने पहलेलान्च किये हैं उसी कम्पनी नेहत्या के नये उपकरण,दाल-भात लिट्टी-चोखे की यादें आई हैं बाज़ार मेंसोहर चैता कजरी कीस्वर लहरी के पाउच बिकते हैंविश्व शान्ति के सन्नाटे मेंसोनल चिड़िया अभी कहीं फड़फड़ा रही है आसमान मेंनई रोशनी की गर्मी मेंउसके पंख जले जाते हैं।

Apr 11, 20234 min

Ep 7Namaskar 2064 | Anamika

नमस्कार, दो हजार चौंसठ - अनामिकानमस्कार दो हजार चौंसठ! कैसे हो? इन दिनों कहां हो?नमस्कार, पानी!नमस्कार, पीपल के पत्तो, तुमको बरफ की शकल याद है न? दूर वहां उस पहाड़ की चोटी पर उसका घर था, कभी-कभी घाटी तक आती थी- मनिहारिन-सी अपनी टोकरी उठाए: दिन-भर कहानियां सुनाती थी परियों की! कैसे तुम भूल गए उसको? नमस्कार, नदियो! दुबली कितनी हो गई हो!आंखों के नीचे पसर आए हैं साये! क्या स्वास्थ्य अच्छा नहीं रहता? स्वास्थ्य केन्द्र चल तो रहा है?कैसा है पीपल का पेड़ और ढाबा? कई बरस पहले मुझे ट्रेन में एक लड़का मिला था, उसकी उन आंखों में इस पूरी दुनिया की बेहतरी का सपना था! क्या तुमने उसको कहीं देखा ? उसके ही नाम एक चिट्ठी है, एक शुभकामना सन्देश मंगल ग्रह का:चाँद की मुहर उस पर है, आई है कोरियर से लेकिन पता है अधूरा,मोबाइल नम्बर भी है आधा मिटा हुआ ! क्या मिट्टी कर लेगी इसको रिसीव उसकी तरफ से ?आओ, अंगूठा लगाओ, मिट्टी रानी, नमस्कार!अच्छा है- कम-से-कम तुम हो- पीछे-पीछे दूर तक मेरे-उड़ती हुई !

Apr 10, 20233 min

Ep 6Des Me Nikla Hoga Chand | Rahi Masoom Raza

देश में निकला होगा चाँद - राही मासूम रज़ाहिन्दी और उर्दू के लेखक, शायर और कथाकार रही मासूम रज़ा का जन्म 1 सितंबर 1927 को उत्तर प्रदेश के गाज़ीपुर में हुआ था। उन्होंने बी आर चोपड़ा के कालजई शो ‘महाभारत’ के लिए कथानक और संवाद लिखे थे। हम तो हैं परदेस में देस में निकला होगा चाँदअपनी रात की छत पर कितना तन्हा होगा चाँदजिन आँखों में काजल बन कर तैरी काली रातउन आँखों में आँसू का इक क़तरा होगा चाँदरात ने ऐसा पेँच लगाया टूटी हाथ से डोरआँगन वाले नीम में जा कर अटका होगा चाँदचाँद बिना हर दिन यूँ बीता जैसे युग बीतेमेरे बिना किस हाल में होगा कैसा होगा चाँद

Apr 9, 20231 min

Ep 5Main Jhukta Hun - Rajesh Joshi

मैं झुकता हूँ - राजेश जोशीराजेश जोशी साहित्य अकादमी पुरस्कृत कवि और साहित्यकार हैं। उनका जन्म 18 जुलाई 1946 को नरसिंहगढ़, मध्य प्रदेश में हुआ। प्रमुख कृतियों के लिए उन्हें शिखर सम्मान, पहल सम्मान, कैफ़ी आजमी सम्मान, शशि भूषण स्मृति नाट्य सम्मान आदि कई प्रतिष्ठित सम्मानों से सम्मानित किया जा चुका है। दरवाज़े से बाहर जाने से पहलेअपने जूतों के तस्मे बाँधने के लिए मैं झुकता हूँरोटी का कौर तोड़ने और खाने के लिएझुकता हूँ अपनी थाली परजेब से अचानक गिर गई क़लम या सिक्के को उठाने कोझुकता हूँझुकता हूँ लेकिन उस तरह नहींजैसे एक चापलूस की आत्मा झुकती हैकिसी शक्तिशाली के सामनेजैसे लज्जित या अपमानित होकर झुकती हैं आँखेंझुकता हूँजैसे शब्दों को पढ़ने के लिए आँखें झुकती हैंताक़त और अधीनता की भाषा से बाहर भी होते हैंशब्दों और क्रियाओं के कई अर्थझुकता हूँजैसे घुटना हमेशा पेट की तरफ़ ही मुड़ता हैयह कथन सिर्फ़ शरीर के नैसर्गिक गुणोंया अवगुणों को ही व्यक्त नहीं करताकहावतें अर्थ से ज़्यादा अभिप्राय में निवास करती हैं।

Apr 8, 20232 min

Ep 4Utni Door Mat Byahna Baba - Nirmala Putul

उतनी दूर मत ब्याहना - निर्मला पुतुल निर्मला पुतुल हिंदी और संताली भाषा की बहुचर्चित लेखिका व कवयित्री हैं। उनका काव्य-संसार आदिवासी महिलाओं के मानवाधिकार, लैंगिक भेदभाव, उत्पीड़न और पलायन जैसे ज़रूरी मुद्दों की आवाज़ बना। निर्मला जी एक सोशल एक्टिविस्ट भी हैं और दलित, आदिवासी महिलाओं की शिक्षा एवं जागरुकता हेतु प्रयासरत रही हैं। बाबा!मुझे उतनी दूर मत ब्याहनाजहाँ मुझसे मिलने जाने ख़ातिरघर की बकरियाँ बेचनी पड़े तुम्हेंमत ब्याहना उस देश मेंजहाँ आदमी से ज़्यादाईश्वर बसते होंजंगल नदी पहाड़ नहीं हों जहाँवहाँ मत कर आना मेरा लगनवहाँ तो क़तई नहींजहाँ की सड़कों परमन से भी ज़्यादा तेज़ दौड़ती हों मोटरगाड़ियाँऊँचे-ऊँचे मकान औरबड़ी-बड़ी दुकानेंउस घर से मत जोड़ना मेरा रिश्ताजिस में बड़ा-सा खुला आँगन न होमुर्ग़े की बाँग पर होती नहीं हो जहाँ सुबहऔर शाम पिछवाड़े से जहाँपहाड़ी पर डूबता सूरज न दिखेमत चुनना ऐसा वरजो पोचई और हड़िया में डूबा रहता हो अक्सरकाहिल-निकम्मा होमाहिर हो मेले से लड़कियाँ उड़ा ले जाने मेंऐसा वर मत चुनना मेरी ख़ातिरकोई थारी-लोटा तो नहींकि बाद में जब चाहूँगी बदल लूँगीअच्छा-ख़राब होने परजो बात-बात मेंबात करे लाठी-डंडा कीनिकाले तीर-धनुष, कुल्हाड़ीजब चाहे चला जाए बंगाल, असम या कश्मीरऐसा वर नहीं चाहिए हमेंऔर उसके हाथ में मत देना मेरा हाथजिसके हाथों ने कभी कोई पेड़ नहीं लगाएफ़सलें नहीं उगाईं जिन हाथों नेजिन हाथों ने दिया नहीं कभी किसी का साथकिसी का बोझ नहीं उठायाऔर तो और!जो हाथ लिखना नहीं जानता हो ‘ह’ से हाथउसके हाथ मत देना कभी मेरा हाथ!ब्याहना हो तो वहाँ ब्याहनाजहाँ सुबह जाकरशाम तक लौट सको पैदलमैं जो कभी दुख में रोऊँ इस घाटतो उस घाट नदी में स्नान करते तुमसुनकर आ सको मेरा करुण विलापमहुआ की लट औरखजूर का गुड़ बनाकर भेज सकूँ संदेश तुम्हारी ख़ातिरउधर से आते-जाते किसी के हाथभेज सकूँ कद्दू-कोहड़ा, खेखसा, बरबट्टीसमय-समय पर गोगो के लिए भीमेला-हाट-बाज़ार आते-जातेमिल सके कोई अपना जोबता सके घर-गाँव का हाल-चालचितकबरी गैया के बियाने की ख़बरदे सके जो कोई उधर से गुज़रतेऐसी जगह मुझे ब्याहना!उस देश में ब्याहनाजहाँ ईश्वर कम आदमी ज़्यादा रहते होंबकरी और शेरएक घाट पानी पीते हों जहाँवहीं ब्याहना मुझे!उसी के संग ब्याहना जोकबूतर के जोड़े और पंडुक पक्षी की तरहरहे हरदम हाथघर-बाहर खेतों में काम करने से लेकररात सुख-दुख बाँटने तकचुनना वर ऐसाजो बजाता हो बाँसुरी सुरीलीऔर ढोल-माँदल बजाने में हो पारंगतवसंत के दिनों में ला सके जो रोज़मेरे जूड़े के ख़ातिर पलाश के फूलजिससे खाया नहीं जाएमेरे भूखे रहने परउसी से ब्याहना मुझे!

Apr 7, 20235 min

Ep 3Mera Ghanisht Padosi - Kunwar Narayan

19 सितंबर 1927 को उत्तर प्रदेश के फ़ैज़ाबाद में जन्में कुँवर नारायण समकालीन कविता के अग्रणी कवि हैं। उनका पहला कविता-संग्रह ‘चक्रव्यूह’ 1956 में प्रकाशित हुआ था। 1959 में उन्हें अज्ञेय के संपादन में प्रकाशित ‘तीसरा सप्तक’ में शामिल किया गया। 15 नवंबर 2017 में लखनऊ में उनका निधन हुआ। मेरा घनिष्ठ पड़ोसी - कुँवर नारायण मेरा घनिष्ठ पड़ोसी हैएक पुराना पेड़- न जाने क्या तो है उसका नाम, क्या उसकी जात-पर इतना निकट है कि उसकी डालेंहमेशा बनी ही रहती हैंमेरे घर के वराण्डे मेंकुछ इस तरह कि जब चाहताहाथ बढ़ा कर सहला सकता उसका माथाऔर वह गऊ-सामुझे निहारता रहता निरीह आँखों सेमेरी उससे गाढ़ी दोस्ती हो गई हैइतनी कि जब हवा चलतीतो लगता वह मेरा नाम लेकरमुझे बुला रहा,सुबह की धूप जब उसे जगातीवह बाबा की तरह खखारते हुए उठताऔर मुझे भी जगा देता।अकसर हम घण्टों बातें करतेइधर-उधर की बातेंअपनी-अपनी भाषा में...लेकिन भाषा से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता-वह कहता-हमारे सुख-दुख की भाषा एक ही है,जाड़ा गर्मी बरसात उसे भी उसी तरह भासते जैसे मुझे,पतझर की उदासीवसन्त का उल्लासकितनी ही बार हमने साथ मनाया हैएक दूसरे के जन्मदिन की तरह...जब भी बैठ जाता हूँ थक करउसकी बगल मेंचाहे दिन हो चाहे रातवह ध्यान से सुनता है मेरी बातों को,कहता कुछ नहींबस, एक नया सवेरा देता है मेरी बेचैन रातों कोउसकी बाँहों में चिड़ियों का बसेरा है,हर घड़ी लगा रहता उनका आना-जाना...कभी-कभी जब अपना ही घर समझ करमेरे घर में आकर ठहर जाते हैंउसके मेहमान-तो लगता चिड़ियों का घोंसला है मेरा मकान,और एक भागती ऋतु भर की सजावट है मेरा सामान...प्रतिदिन एक कविता Whatsapp लिंक https://chat.whatsapp.com/HaxCc1qgeZaGE8YPfw42Ge

Apr 6, 20233 min

Ep 2Koi La Ke Mujhe De - Damodar Agrawal

बाल- साहित्य के अग्रणी लेखक दामोदर अग्रवाल का जन्म 4 जनवरी 1932 को वाराणसी में हुआ था। उनकी प्रसिद्ध रचनाओं में आज़ादी की कहानी, चल मेरी नैया कागज वाली, प्राणों के स्वर शामिल हैं। कोई ला के मुझे दे - दामोदर अग्रवालकुछ रंग भरे फूलकुछ खट्टे-मीठे फल,थोड़ी बाँसुरी की धुनथोड़ा जमुना का जलकोई ला के मुझे दे!एक सोना जड़ा दिनएक रूपों भरी रात,एक फूलों भरा गीतएक गीतों भरी बात-कोई ला के मुझे दे!एक छाता छाँव काएक धूप की घड़ी,एक बादलों का कोटएक दूब की छड़ी-कोई ला के मुझे दे!एक छुट्टी वाला दिनएक अच्छी-सी किताब,एक मीठा-सा सवालएक नन्हा-सा जवाब-कोई ला के मुझे दे!प्रतिदिन एक कविता Whatsapp लिंकhttps://chat.whatsapp.com/HaxCc1qgeZaGE8YPfw42Ge

Apr 5, 20231 min

Ep 1Pani Kya Keh Raha Hai - Naresh Saxena

आज की हमारी कविता है 'पानी क्या कर रहा है'। इसे लिखा है नरेश सक्सेना जी ने।सुनिए यह कविता उन्ही के आवाज़ में।इंजीनियरिंग के विद्यार्थी रहे नरेश सक्सेना जी की कविताएँ यथार्थ के धरातल से शुरू होती हैं और मानवीय भावों को टटोलती हैं। उनकी बहुत सी कविताएँ स्कूल और कॉलेज के पाठ्यक्रम का हिस्सा हैं। नरेश जी को साहित्य भूषण समेत कई प्रतिष्ठित सम्मानों से नवाज़ा गया है। कविता - आज जब पड़ रही है कड़ाके की ठंडऔर पानी पीना तो दूरउसे छूने तक से बच रहे हैं लोगतो ज़रा चल कर देख लेना चाहिएकि अपने संकट की इस घड़ी मेंपानी क्या कर रहा हैअरे! वह तो शीर्षासन कर रहा हैसचमुच झीलों, तालाबों और नदियों का पानीसिर के बल खड़ा हो रहा हैसतह का पानी ठंडा और भारी होलगाता है डुबकीऔर नीचे से गर्म और हल्के पानी कोऊपर भेज देता है ठंड से जूझनेइस तरह लगातार लगाते हुए डुबकियाँउमड़ता-घुमड़ता हुआ पानीजब आ जाता है चार डिग्री सेल्सियस परयह चार डिग्री क्या?यह चार डिग्री वह तापक्रम है दोस्तो,जिसके नीचे मछलियों का मरना शुरू हो जाता हैपता नहीं पानी यह कैसे जान लेता हैकि अगर वह और ठंडा हुआतो मछलियाँ बच नहीं पाएँगीअचानक वह अब तक जो कर रहा थाठीक उसका उल्टा करने लगता हैयानी और ठंडा होने पर भारी नहीं होताबल्कि हल्का होकर ऊपर ही तैरता रहता हैतीन डिग्री हल्कादो डिग्री और हल्का औरशून्य डिग्री होते ही, बर्फ़ बन करसतह पर जम जाता हैइस तरह वह कवच बन जाता है मछलियों काअब पड़ती रहे ठंडनीचे गर्म पानी में मछलियाँजीवन का उत्सव मनाती रहती हैंइस वक़्त शीत कटिबंधों मेंतमाम झीलों और समुद्रों का पानी जम करमछलियों का कवच बन चुका हैपानी के प्राण मछलियों में बसते हैंआदमी के प्राण कहाँ बसते हैं, दोस्तोइस वक़्तकोई कुछ बचा नहीं पा रहाकिसान बचा नहीं पा रहा अन्न कोअपन हाथों से फ़सलों को आग लगाए दे रहा हैमाताएँ बचा नहीं पा रहीं बच्चेउन्हें गोद में लेकुओं में छलाँगें लगा रही हैंइससे पहले कि ठंडे होते ही चले जाएँहम, चल कर देख लेंकि इस वक़्त जब पड़ रही है कड़ाके की ठंडतब मछलियों के संकट की इस घड़ी मेंपानी क्या कर रहा है।प्रतिदिन एक कविता Whatsapp लिंक https://chat.whatsapp.com/HaxCc1qgeZaGE8YPfw42Ge

Apr 3, 20233 min