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Show Notes
19 सितंबर 1927 को उत्तर प्रदेश के फ़ैज़ाबाद में जन्में कुँवर नारायण समकालीन कविता के अग्रणी कवि हैं। उनका पहला कविता-संग्रह ‘चक्रव्यूह’ 1956 में प्रकाशित हुआ था। 1959 में उन्हें अज्ञेय के संपादन में प्रकाशित ‘तीसरा सप्तक’ में शामिल किया गया। 15 नवंबर 2017 में लखनऊ में उनका निधन हुआ।
मेरा घनिष्ठ पड़ोसी - कुँवर नारायण
मेरा घनिष्ठ पड़ोसी है
एक पुराना पेड़
- न जाने क्या तो है उसका नाम, क्या उसकी जात-
पर इतना निकट है कि उसकी डालें
हमेशा बनी ही रहती हैं
मेरे घर के वराण्डे में
कुछ इस तरह कि जब चाहता
हाथ बढ़ा कर सहला सकता उसका माथा
और वह गऊ-सा
मुझे निहारता रहता निरीह आँखों से
मेरी उससे गाढ़ी दोस्ती हो गई है
इतनी कि जब हवा चलती
तो लगता वह मेरा नाम लेकर
मुझे बुला रहा,
सुबह की धूप जब उसे जगाती
वह बाबा की तरह खखारते हुए उठता
और मुझे भी जगा देता।
अकसर हम घण्टों बातें करते
इधर-उधर की बातें
अपनी-अपनी भाषा में...
लेकिन भाषा से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता-वह कहता-
हमारे सुख-दुख की भाषा एक ही है,
जाड़ा गर्मी बरसात उसे भी उसी तरह भासते जैसे मुझे,
पतझर की उदासी
वसन्त का उल्लास
कितनी ही बार हमने साथ मनाया है
एक दूसरे के जन्मदिन की तरह...
जब भी बैठ जाता हूँ थक कर
उसकी बगल में
चाहे दिन हो चाहे रात
वह ध्यान से सुनता है मेरी बातों को,
कहता कुछ नहीं
बस, एक नया सवेरा देता है मेरी बेचैन रातों को
उसकी बाँहों में चिड़ियों का बसेरा है,
हर घड़ी लगा रहता उनका आना-जाना...
कभी-कभी जब अपना ही घर समझ कर
मेरे घर में आकर ठहर जाते हैं
उसके मेहमान-
तो लगता चिड़ियों का घोंसला है मेरा मकान,
और एक भागती ऋतु भर की सजावट है मेरा सामान...
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