
Pratidin Ek Kavita
1,183 episodes — Page 22 of 24

Ep 135Kalam, Aaj Unki Jai Bol | Ramdhari Singh 'Dinkar'
कलम, आज उनकी जय बोल | रामधारी सिंह ‘दिनकर’ कलम, आज उनकी जय बोल जला अस्थियाँ बारी-बारीछिटकाई जिनने चिंगारी,जो चढ़ गये पुण्यवेदी पर लिए बिना गर्दन का मोल।कलम, आज उनकी जय बोल। जो अगणित लघु दीप हमारेतूफानों में एक किनारे,जल-जलकर बुझ गए, किसी दिन माँगा नहीं स्नेह मुँह खोल।कलम, आज उनकी जय बोल। पीकर जिनकी लाल शिखाएँउगल रहीं लू लपट दिशाएं,जिनके सिंहनाद से सहमी धरती रही अभी तक डोल।कलम, आज उनकी जय बोल। अंधा चकाचौंध का माराक्या जाने इतिहास बेचारा?साखी हैं उनकी महिमा के सूर्य, चन्द्र, भूगोल, खगोल।कलम, आज उनकी जय बोल।

Ep 134Ja Raha Tha Mendhakon Ka Kafila | Ashok Chakradhar
जा रहा था मेंढकों का काफ़िला | अशोक चक्रधरजा रहा था मेंढकों का काफ़िलाएक कुआँ मार्ग में उनको मिलावे लगे कुएँ के अंदर झाँकनेऔर जल में बिंब अपना ताकनेकुछ कुदकते थे कुएँ की मेंड़ परकुछ लगे आपस की छेड़मछेड़ परनाचने और कूदने में मस्त थेगिर गए उनमें से दो जो स्वस्थ थेखिलखिलाकर सभी टर्राने लगेजो गिरे थे डर से थर्राने लगेथीं निकल आने की उनकी ख़्वाहिशेंकुआँ गहरा था न थीं गुजाइशेंसतह चिकनी सीढ़ियाँ भी थीं नहींजो गिरा वो कभी निकला ही नहींकुआँ तत्पर था निगलने के लिएव्यग्र थे दोनों निकलने के लिएकोशिशें करते थे तेज़ तपाक सेकिंतु गिर जाते थे वहीं छपाक सेदृश्य ऊपर का विकट घनघोर थामेंढकों का झुंड करता शोर थादेख उन दोनों की व्याकुल बेबसीऊपर से एक मेंढक ने कुटिल फब्ती कसी–अब तुम्हारी कोशिशें सब व्यर्थ हैंटाँग लंबी हैं मगर असमर्थ हैंकुछ समय बस चित्त को बहलाओगेकुंएँ के मेंढक सदा कहलाओगे!अगर जीना है तो कोशिश मत करोऔर चाहो तो यूँ हीं थककर मरोअब हमारा कथन यही परोक्ष हैआत्महत्या ही तुम्हारा मोक्ष हैसभी मेंढक मिल के चिल्लाने लगेमौत मातम मर्सिया गाने लगे–डूब जा, डूब जा डूब जा रेदूर हैं ज़िंदगी के किनारे!तुम हो मेंढक नहीं तुम हो उल्लूडूबने को तो काफ़ी है चुल्लू!डूबे क़िस्मत के सारे सितारे!डूब जा, डूब जा, डूब जा रेदूर हैं ज़िंदगी के किनारे!दोनों डूबो जल्दी-जल्दीइत्ती देली कैछे कल्दी?शोर कुएँ में निराशा भर गयाएक उनमें से तड़प कर मर गयादूसरे ने यत्न पर त्यागा नहींमृत्यु का भय भी उसे लागा नहींहै निकलना मन में इतना ठान करसाँस खींची टाँग लंबी तान करमोड़ कर पंजे झुका घुटनों के बलभींच कर मुँह सँजो ली ताकत सकलदेह को स्प्रिंग सरीखा कर लियाहौसला ख़ुद में लबालब भर लियाएक दिव्य छलाँग मारीआ गया, आ गया, आ गया, लो आ गयाजी छा गया दे रहे थे जो अभी तक गालियाँअब बजाने लग गए वे तालियाँसीख जिसने दी सिमट कर रह गयाकोसने वाला भी कट कर रह गयावो उछलना क्या था एक उड़ान थीआत्मबल की जागती पहचान थीगगन में गूँजा उसी का क़हक़हामेंढकों की भीड़ से उसने कहा–हूँ तो बहरा किंतु सबका शुक्रियाआपने जो काम ऊपर से कियासुन न पाया आपकी मैं टिप्पणीपर इशारों से मेरी हिम्मत बनीआपके संकेत बाहर लाए हैंजानता हूँ कैसे गाने गाएँ हैंशीघ्र आता समझ मैं पाता अगरलय में हिलते हाथ तो देखे मगरआपसे ही बल मिला संबल मिलाआपकी मेहनत का मुझको फल मिलाआप सबका दिल से आभारी हूँ मैंकरूँगा सेवा ये व्रतधारी हूँ मैंवचन सुन मेंढक सभी लज्जित हुएहाथ जोड़े ग्लानि से मज्जित हुएभई भूल जाना तुम हमारे पाप कोवो चतुर नक़ली बधिर बोला मैं सुन न पाया आपको!दोस्तो तुमने सुनी ये दास्तां?दोस्तो मन में गुनी ये दास्तां?सीख ये पाई कि खुद गहरे बनोहर निराशा के लिए बहरे बनो!

Ep 133Sheher Ki Subah | Adnan Kafeel Darwesh
शहर की सुबह / अदनान कफ़ील दरवेशशहर खुलता है रोज़ानाकिसी पुराने सन्दूक़-सा नहींकिसी बच्चे की नरम मुट्ठियों-सा नहींबल्कि वो खुलता है सूरज की असँख्य रौशन धारों सेजो शहर के बीचों-बीच गोलम्बरों पर गिरती हैंऔर फैल जाती हैं उन तारीक गलियों तकजहाँ तक जाने में एक शरीफ़ आदमी कतराता हैलेकिन जहाँ कुत्ते और सुअर बेधड़क घुसे चले जाते हैंशहर खुलता है मज़दूरों की क़तारों सेजो लेबर-चौकों को आरास्ता करते हैंशहर खुलता है एक शराबी की तनी आँखों मेंनौकरीपेशा लड़कियों की धनक से खुलता है शहर,गाजे-बाजे और लाल बत्तियों की परेडों से नहींबल्कि रिक्शे की ट्रिंग-ट्रिंगऔर दूध के कनस्तरों की उठा-पटक से खुलता हैशहर रेलयात्रियों के आगमन से खुलता हैउनके आँखों में बसी थकान से खुलता हैशहर खुलता है खण्डहरों में टपकी ओस सेजहाँ प्रेमी-युगल पाते हैं थोड़ी-सी शरणशहर खुलता है गन्दे सीवरों में उतरते आदमीनुमा मज़दूर सेशहर भिखमँगों के कासे में खुलता है; पहले सिक्के की खनक सेशहर खुलता है एक नए षड्यन्त्र सेजो सफ़ेदपोशों की गुप्त-बैठकों में आकर लेता हैशहर खुलता है एक मृतक सेजो इस लोकतन्त्र में बेनाम लाश की तरहशहर के अन्धेरों में पड़ा होता हैशहर खुलता है पान की थूकों सेउबलती चाय की गन्ध सेशहर खुलता है एक कवि की धुएँ से भरी आँखों मेंजिसमें एक स्वप्न की चिताअभी-अभी जल कर राख हुई होती है...

Ep 132Ghar Pahunchna | Kunwar Narayan
घर पहुँचना - कुंवर नारायणहम सब एक सीधी ट्रेन पकड़कर अपने-अपने घर पहुँचना चाहतेहम सब ट्रेनें बदलने की झंझटों से बचना चाहतेहम सब चाहते एक चरम यात्राऔर एक परम धामहम सोच लेते कि यात्राएँ दुखद हैं और घर उनसे मुक्तिसचाई यूँ भी हो सकती है कि यात्रा एक अवसर हो और घर एक सम्भावनाट्रेनें बदलनाविचार बदलने की तरह हो और हम जब जहाँ जिनके बीच हों वही होघर पहुँचना।

Ep 131Hamd | Nida Fazli
हम्दनील गगन पर बैठेकब तकचाँद सितारों से झाँकोगेपर्वत की ऊँची चोटी से कब तक दुनिया को देखोगेआदर्शों के बन्द ग्रन्थों मेंकब तकआराम करोगेमेरा छप्परटपक रहा हैबनकर सूरज इसे सुखाओख़ाली हैआटे का कनस्तर बनकर गेहूँइसमें आओमाँ का चश्माटूट गया हैबनकर शीशाइसे बनाओचुप-चुप हैं आँगन में बच्चेबनकर गेंदइन्हें बहलाओशाम हुई है चाँद उगाओपेड़ हिलाओहवा चलाओकाम बहुत हैंहाथ बटाओअल्लाह मियाँमेरे घर भी आ ही जाओ -अल्लाह मियाँ...!

Ep 130Ek Aag To Baaki Hai Abhi | Pratibha Katiyar
एक आग तो बाक़ी है अभी / प्रतिभा कटियारउसकी आँखों में जलन थीहाथों में कोई पत्थर नहीं था।सीने में हलचल थी लेकिनकोई बैनर उसने नहीं बनायासिद्धांतों के बीच पलने-बढ़ने के बावजूदनहीं तैयार किया कोई मैनिफेस्टो।दिल में था गुबार किधज्जियाँ उड़ा देसमाज की बुराइयों की ,तोड़ दे अव्यवस्थाओं के चक्रव्यूहतोड़ दे सारे बाँध मजबूरियों केगढ़ ही दे नई इबारतकि जिंदगी हँसने लगेकि अन्याय सहने वालों को नहीं करने वालों को लगे डरप्रतिभाओं को न देनी पड़ेंपुर्नपरीक्षाएँ जाहिलों के सम्मुखकि आसमान ज़रा साफ़ ही हो लेया बरस ही ले जी भर केकुछ हो तो कि सब ठीक हो जाएया तो आ जाए तूफ़ान कोईया थम ही जाए सीने का तूफ़ानलेकिन नहीं हो रहा कुछ भीबस कंप्यूटर पर टाइप हो रहा हैएक बायोडाटातैयार हो रही है फ़ेहरिस्तउन कामों को गिनाने कीजिनसे कई गुना बेहतर वो कर सकता है।सारे आंदोलनों, विरोधों और सिद्धान्तों कोलग गया पूर्ण विरामजब हाथ में आयाएक अदद अप्वाइंटमेंट लेटर....

Ep 129Bachhon Ki Chitrakala Pratiyogita | Rajesh Joshi
बच्चों की चित्रकला प्रतियोगिताउन्होंने बनाए बहुत नीले आसमान फिर सूरज चाँद और सितारों को अलग अलग जगह रखा!पेड़ इतने हरे बनाए उन्होंने जितना हरा उन्हें होना चाहिएया जितने हरे रहे होंगे वे कभी हमारी धरती पर !फिर पहाड़ों, नदियों और झरनों को उन्होंने अलग-अलग जगह रखा!उन्होंने मकान, सड़कें और पुल भी बनाए जिन्हें ईश्वर ने भी नहीं बनाया था कभी फिर उन्होंने बनाई बसें, स्कूटर और कारें साइकिल चलाते और पैदल चलतेलोग भी बनाए उन्होंने!चीज़ों को बनाते चले जाने के उत्साह में इतना ज़्यादा भर गया चित्रकि गेंद को रखने की कोई जगह हीनहीं बची चित्र मेंतब समझ आया उन्हेंकि बड़ों ने कैसी-कैसी गलतियाँ की हैं इस दुनिया को बनाने में!

Ep 128Kapas Ke Phool | Kedarnath Singh
कपास के फूल - केदारनाथ सिंह कपास के फूल वे देवता को पसंद नहीं लेकिन आश्चर्य इस पर नहीं आश्चर्य तो ये है कि कविगण भी लिखते नहीं कविता कपास के फूल परप्रेमीजन भेंट में देते नहीं उसेकभी एक-दूसरे को जबकि वह है कि नंगा होने सेबचाता है सबकोऔर सुतर गया मौसमतो भूख और प्यास से भी बचाता है वहईश्वर को तो ठण्ड लगती नहीं वैसे नंगा होना भीवहाँ उतना ही सहज हैउतना ही दिव्य इसलिए इतना तय है कि ठंड के विरुद्ध आदमी ने ही खोजा होगापृथ्वी पर पहला कपास का फूलपर पहला झिंगोला कब पहना उसनेपहले तागे से पहले सुई कीकब हुई थी भेंट यह भूल गई है हमारी भाषाजैसे अपनी कमीज़ पहनकरभूल जाते हैं हमअपने दर्ज़ी का नामपर क्या कभी सोचा है आपनेवह जो आपकी कमीज़ हैकिसी खेत में खिलाएक कपास का फूल हैजिसे पहन रखा है आपनेजब फ़ुर्सत मिलेतो कृपया एक बार इस पर सोचें ज़रूरकि इस पूरी कहानी में सूत से सुई तक सब कुछ हैपर वह कहाँ गया जो इसका शीर्षक था।

Ep 126Jeevdhara | Arun Kamal
जीवधारा - अरुण कमलखूब बरस रहा है पानीजीवन रस में डूब गयी है धरतीअभी भी बादल छोप रहे हैंअमावस्या का हाथ बँटातेबज रही है धरतीहज़ारों तारों वाले वाद्य-सी बज रही है धरतीचारों ओर पता नहीं कितने जीव-जन्तुबोल रहे हैं हज़ारों आवाज़ों मेंकभी मद्धिम कभी मन्द्र कभी शान्तकभी-कभी बथान में गौएँ करवट बदलती हैं बैल ज़ोर से छोड़ते हैं साँसअचानक दीवार पर मलकी टॉर्च की रोशनीकोई निकला है शायद खेत घूमनेधरती बहुत सन्तुष्ट बहुत निश्चिन्त है आजदूध भरे थन की तरह भारी और गर्म

Ep 125Namak | Anamika
नमक - अनामिकानमक दुख है धरती का और उसका स्वाद भी!पृथ्वी का तीन भाग नमकीन पानी हैऔर आदमी का दिल नमक का पहाड़कमज़ोर है दिल नमक का,कितनी जल्दी पसीज जाता है!गड़ जाता है शर्म से जब फेंकी जाती हैं थालियाँदाल में नमक कम या ज़रा तेज़ होने पर!वो जो खड़े हैं न-सरकारी दफ्तर-शाही नमकदान हैं।बड़ी नफ़ासत से छिड़क देते हैं हरदमहमारे जले पर नमक!जिनके चेहरे पर नमक है-पूछिए उन औरतों से-कितना भारी पड़ता है उनकोउनके चेहरे का नमक!जिन्हे नमक की कीमतकरनी होती है अदा-उन नमकहलालों सेरंज रहता है महासागर।दुनिया में होने न दीं उन्होंने क्रांतियाँ,रहम खा गए दुश्मनों पर!गाँधी जी जानते थे नमक की कीमतऔर अमरूदों वाली मुनिया भी!दुनिया में कुछ और रहे-न-रहे-रहेगा नमक-ईश्वर के आँसू और आदमी का पसीना-ये ही वो नमक है कि जिससे थिराई रहेगी ये दुनिया।

Ep 124Meri Duniya Ke Tamaam Bacche | Adnan Kafeel Darwesh
मेरी दुनिया के तमाम बच्चे / अदनान कफ़ील दरवेशवो जमा होंगे एक दिन और खेलेंगे एक साथ मिलकरवो साफ़-सुथरी दीवारों परपेंसिल की नोक रगड़ेंगेवो कुत्तों से बतियाएँगेऔर बकरियों सेऔर हरे टिड्डों सेऔर चीटियों से भी..वो दौड़ेंगे बेतहाशाहवा और धूप की मुसलसल निगरानी मेंऔर धरती धीरे-धीरेऔर फैलती चली जाएगीउनके पैरों के पास..देखना!वो तुम्हारी टैंकों में बालू भर देंगेऔर तुम्हारी बन्दूकों कोमिट्टी में गहरा दबा देंगेवो सड़कों पर गड्ढे खोदेंगे और पानी भर देंगेऔर पानियों में छपा-छप लोटेंगे...वो प्यार करेंगे एक दिन उन सबसेजिससे तुमने उन्हें नफ़रत करना सिखाया हैवो तुम्हारी दीवारों मेंछेद कर देंगे एक दिनऔर आर-पार देखने की कोशिश करेंगेवो सहसा चीख़ेंगे !और कहेंगे —“देखो ! उस पार भी मौसम हमारे यहाँ जैसा ही है”वो हवा और धूप को अपने गालों के गिर्दमहसूस करना चाहेंगेऔर तुम उस दिन उन्हें नहीं रोक पाओगे!एक दिन तुम्हारे महफ़ूज़ घरों से बच्चे बाहर निकल आएँगेऔर पेड़ों पे घोंसले बनाएँगेउन्हें गिलहरियाँ काफ़ी पसन्द हैंवो उनके साथ बड़ा होना चाहेंगे..तुम देखोगे जब वो हर चीज़ उलट-पुलट देंगेउसे और सुन्दर बनाने के लिए..एक दिन मेरी दुनिया के तमाम बच्चेचीटियों, कीटोंनदियों, पहाड़ों, समुद्रोंऔर तमाम वनस्पतियों के साथ मिलकर धावा बोलेंगेऔर तुम्हारी बनाई हर चीज़ कोखिलौना बना देंगे..

Ep 127Char Prem Kavita | Madhusudan Anand
चार प्रेम कविता | मधुसुदन आनंदयह जो तुम्हारे हमारे बीच हुआऔर जो हो रहा हैऔर जो होता रहेगाउसे कभी भूलकर भीमत कहना प्रेम... यह महाविस्फोट के कोईतेरह अरब सत्तर करोड़ साल बादमलबे के दो छोटे-छोटे टुकड़ों काआपसी आकर्षण हैजिसके लिए सारा यूनिवर्सतमाम आकाशगंगाएँ और सौरमंडलऔर तारे कम पड़ गए सिर्फ पृथ्वी ही बनी वह जगहजो खुद तमाम खिंचावोंऔर बलों के बावजूदहमारे लिए एक रस्सी की तरह तन गई पृथ्वी ने ही किया हमारा कायांतरणएक तरफ से तुमदूसरी तरफ से मैंरस्सी पर चढ़ गए आधी दूरी तक तुमआधी दूरी तक मैंइस रस्सी पर चल कर आते हैंन तुम मेरे बीच सेनिकल पाती हो और ना मैंदोनों एक-दूसरे को छू कर वापस लौट आते हैंसिरों पर और फिर चल पड़ते हैंयह सिर्फ एक यात्रा है आधी-अधूरी प्रेम होता तो मैं तुम में मिल जाताया तुम मुझसेऔर इस तरहकोई तो एक सिरे सेदूसरे सिरे तक पहुँच जाता।

Ep 123Bewaqt Guzar Gaya Maali | Dr Sheoraj Singh Bechain
बेवक़्त गुज़र गया माली | डॉ श्यौराज सिंह 'बेचैन' टूटी डार झड़ी सब पत्तियाँ डाल भय लाचार विधाता कैसी विपदा डारी रे माँगत फूल, हवा और पानी ऋतु निर्मोही ने का ठानी काते कहें कौन दुख बाटेंकौन करे रखवाली बे वक्त गुज़र गया मालीकिल्ला नए वक्त के मारेआँधु लु ने निवल कर डालेका खाएँ, का पिएँ बेचारेकैसे कर के जीएँ बेचारेनंगे सिर पर बरसी ज्वालाघर आए कंगाली रेबेवक़्त गुज़र गया मालीउठ गई पैंठ लदे व्यापारीलुट गई, बिक गई रौनक़ सारीशब्द से संदेश रह गएखुद अपने दुख-दर्द मिटानाखुद करना रखवाली रेबेवक़्त गुज़र गया माली रे!

Ep 122Roshni | Rajesh Joshi
रौशनी | राजेश जोशीइतना अँधेरा तो पहले कभी नहीं थाकभी-कभी अचानक जब घर की बत्ती गुल हो जाती थीतो किसी न किसी पड़ोसी के घर जलाई गईमोमबत्ती की कमज़ोर सी रोशनीहमारे घर तक चली आती थीकभी-कभी सड़क की रोशनियाँ खिड़की से झाँक कर घर को रोशन कर देतींऔर कुछ नहींतो कहीं भीतरबची हुई कोई बहुत धुँधली सी ज़िद्दी रोशनीकम से कम इतना तो कर ही देती थीकि दीया सलाईऔर मोमबत्तियाँ ढूँढ़ कर, जला ली जाएँकोई कहता हैइतना अँधेरा तोपहले, कभी नहीं थाइतना अँधेरा तो तब भी नहीं थाजब अग्नि काठ में व पत्थर के गर्भ में छिपी थीतब इतना धुंधला नहीं था आकाशनक्षत्रों की रोशनी धरती तक ज़्यादा आती थीइतना अँधेरा तो पहले कभी नहीं थालगता है, ये सिर्फ़ हमारे गोलार्द्ध पर उतरी रात नहींपूरी पृथ्वी पर धीरे-धीरे फैलता जा रहा अंधकार हैअँधेरे में सिर्फ़ उल्लू बोल रहे हैंऔर उसकी पीठ पर बैठी देवीफिसल कर गिर गई है गर्त मेंइतना अँधेरा तो पहले कभी नहीं थाकि मुँह खोल कर अँधेरे को कोई अँधेरा न कह सकेकि हाथ को हाथ भी न सूझेकि आँख के सामने घटे अपराध की कोई गवाही न दे सकेइतना अँधेरा तो पहले कभी...

Ep 121Hanso Hanso Jaldi Hanso | Raghuvir Sahay
हँसो हँसो जल्दी हँसो- रघुवीर सहाय हँसो तुम पर निगाह रखी जा रही है हँसो अपने पर न हँसना क्योंकि उसकी कड़वाहट पकड़ ली जाएगी और तुम मारे जाओगे ऐसे हँसो कि बहुत ख़ुश न मालूम हो वरना शक होगा कि यह शख़्स शर्म में शामिल नहीं और मारे जाओगे हँसते-हँसते किसी को जानने मत दो किस पर हँसते हो सबको मानने दो कि तुम सबकी तरह परास्त होकर एक अपनापे की हँसी हँसते हो जैसे सब हँसते हैं बोलने के बजाय जितनी देर ऊँचा गोल गुंबद गूँजता रहे, उतनी देर तुम बोल सकते हो अपने से गूँज थमते-थमते फिर हँसना क्योंकि तुम चुप मिले तो प्रतिवाद के जुर्म में फँसे अंत में हँसे तो तुम पर सब हँसेंगे और तुम बच जाओगे हँसो पर चुटकुलों से बचो उनमें शब्द हैं कहीं उनमें अर्थ न हों जो किसी ने सौ साल पहले दिए हों बेहतर है कि जब कोई बात करो तब हँसो ताकि किसी बात का कोई मतलब न रहे और ऐसे मौकों पर हँसो जो कि अनिवार्य हों जैसे ग़रीब पर किसी ताक़तवर की मार जहाँ कोई कुछ कर नहीं सकता उस ग़रीब के सिवाय और वह भी अक्सर हँसता है हँसा-हँसो जल्दी हँसो इसके पहले कि वह चले जाएँ उनसे हाथ मिलाते हुए नजरें नीची किए उसको याद दिलाते हुए हँसो कि तुम कल भी हँसे थे

Ep 120Kya Tum Jaante Ho | Nirmala Putul
क्या तुम जानते हो - निर्मला पुतुलक्या तुम जानते हो पुरुष से भिन्न एक स्त्री का एकांत? घर, प्रेम और जाति से अलग एक स्त्री को उसकी अपनी ज़मीन के बारे में बता सकते हो तुम? बता सकते हो सदियों से अपना घर तलाशती एक बेचैन स्त्री को उसके घर का पता? क्या तुम जानते हो अपनी कल्पना में किस तरह एक ही समय में स्वयं को स्थापित और निर्वासित करती है एक स्त्री? सपनों में भागती एक स्त्री का पीछा करते कभी देखा है तुमने उसे रिश्तों के कुरुक्षेत्र में अपने आपसे तड़ते? तन के भूगोल से परे एक स्त्री के मन की गाँठें खोल कर कभी पढ़ा है तुमने उसके भीतर का खौलता इतिहास? पढ़ा है कभी उसकी चुप्पी की दहलीज़ पर बैठ शब्दों की प्रतीक्षा में उसके चेहरे को? उसके अंदर वंशबीज बाते क्या तुमने कभी महसूसा है उसकी फैलती जड़ों को अपने भीतर? क्या तुम जानते हो एक स्त्री के समस्त रिश्ते का व्याकरण? बता सकते हो तुम एक स्त्री को स्त्री-दृष्टि से देखते उसके स्त्रीत्व की परिभाषा? अगर नहीं! तो फिर जानते क्या हो तुम रसोई और बिस्तर के गणित से परे एक स्त्री के बारे में...?

Ep 119Mitne Ka Adhikaar | Mahadevi Verma
मिटने का अधिकार / महादेवी वर्मा वे मुस्काते फूल, नहींजिनको आता है मुरझाना,वे तारों के दीप, नहींजिनको भाता है बुझ जाना! वे सूने से नयन,नहींजिनमें बनते आँसू मोती,वह प्राणों की सेज,नहीजिसमें बेसुध पीड़ा, सोती! वे नीलम के मेघ, नहींजिनको है घुल जाने की चाहवह अनन्त रितुराज,नहींजिसने देखी जाने की राह! ऎसा तेरा लोक, वेदनानहीं,नहीं जिसमें अवसाद,जलना जाना नहीं, नहींजिसने जाना मिटने का स्वाद! क्या अमरों का लोक मिलेगातेरी करुणा का उपहाररहने दो हे देव! अरेयह मेरे मिटने क अधिकार!

Ep 118Tumhare Saath Rehkar | Sarveshwar Dayal Saxena
तुम्हारे साथ रहकर - सर्वेश्वरदयाल सक्सेनातुम्हारे साथ रहकर अक्सर मुझे ऐसा महसूस हुआ है कि दिशाएँ पास आ गई हैं, हर रास्ता छोटा हो गया है, दुनिया सिमटकर एक आँगन-सी बन गई है जो खचाखच भरा है, कहीं भी एकांत नहीं न बाहर, न भीतर। हर चीज़ का आकार घट गया है, पेड़ इतने छोटे हो गए हैं कि मैं उनके शीश पर हाथ रख आशीष दे सकता हूँ, आकाश छाती से टकराता है, मैं जब चाहूँ बादलों में मुँह छिपा सकता हूँ। तुम्हारे साथ रहकर अक्सर मुझे महसूस हुआ है कि हर बात का एक मतलब होता है, यहाँ तक कि घास के हिलने का भी, हवा का खिड़की से आने का, और धूप का दीवार पर चढ़कर चले जाने का। तुम्हारे साथ रहकर अक्सर मुझे लगा है कि हम असमर्थताओं से नहीं संभावनाओं से घिरे हैं, हर दीवार में द्वार बन सकता है और हर द्वार से पूरा का पूरा पहाड़ गुज़र सकता है। शक्ति अगर सीमित है तो हर चीज़ अशक्त भी है, भुजाएँ अगर छोटी हैं, तो सागर भी सिमटा हुआ है, सामर्थ्य केवल इच्छा का दूसरा नाम है, जीवन और मृत्यु के बीच जो भूमि है वह नियति की नहीं मेरी है।

Ep 117Mit Gaye Maidanon Wala Gaon | Gyanendrapati
मिट गये मैदानोंवाला गाँव - ज्ञानेन्द्रपतिमिट गये मैदानों वाला गाँवक़स्बे की पान-रँगी मुस्कान मुस्काता जै राम जी की कहता हैडूबती तरैयाँ और डूबती बिरियाँ निकलता था जो दिशा-मैदान के लिएऔर अब जिसकी किसी भी दिशा में मैदान नहींगाँव ने मैदान मार लिया है।शहर बनने की राह मेंअपना मैदान मार दिया हैचौराहे की गुमटियों में मटियाली बीड़ियों के मुट्ठेसफ़ेद सिगरेटों के रंगीन पैकिटों में बदल गये हैंसड़क के दोनों तरफ प्रायः पक्के मकानशेष जो हैं वे भी कच्चे नहीं, अधपके हैंबचपन के दोस्तअसमय अधेड़सुखी सफल गंजेउनकी आँखों में झाँकता हूँआँखों उठाता हूँ उनके मन का बन्द शटरगाँव का मिट गया मैदान वहाँ मिल जाये अँजुरी-भर जल-साबचपन के गाँव का ही नहीं, गाँव के बचपन का मैदानगेंद के केन्द्रबिन्दु वालाजो पहली बार छिनाजब खुला वहाँ ब्लॉक-ऑफिस बने कर्मचारियों के आवासकोने में जहाँ एक पाकड़ था पुराना, वहीं ट्रेजरीकिसी ट्रैजिडी के पहले दृश्य-सा-उत्सव की गहमागहमीवालासिरहाने का मैदान गँवाकर ताका गोड़तारी गाँव नेनीचे, दूरवह जो डँगाल थाअधरात जिसे पंजों खूंदते फेकरते थे सियारआते थे जब गाँव के कुत्तों को कोसने जुड़ते थे जहाँ हम बस बरस में एक बारगाँव-भर की होलिका जलानेलिये हरियर चने का मुट्ठा, भूँजने को अपना होरहा चरवाहे बच्चों की गुहारें ही जब-तब जिसका आकाश पक्षियों के साथ करती थीं पारखुला फैला वह ढलवाँ डँगालबना हमारा मैदानसंझा काजब हमारी उछलती गेंद से नीचे होता था सूरजढलते सूरज को भी जब हम गेंद की तरह उछाल देना चाहते थे ऊपर हमारी गेंद को गुम कर, गाँव की लालटेनों को साँवली उँगलियों जलानेवाली गोधूलि को उतरने न देना चाहते थे किताब के और रात के पन्नों को खोलनेछिन गया वह मैदान भी कब का कस्बे की आहटों और कसमसाहटों नेएकाएक नहीं, धीरे-धीरेभरा उसका धरती आकाशऔर अबयहाँ के बच्चों के लिएमैदान बचा हैटेलीविज़न के पर्दे-भरबस उनके नेत्रगोलकों-भरमिट गये मैदानोंवाला यह गाँवनगर में भी तोरूमाल-भर पार्कों और गोलाम्बरों और खेलनिया न भी तो घुमनिया मैदानोंवाले नगर में भी तोनहीं बदलेगा कभीअधिक-से-अधिक विकसेगा वैसे कस्बे मेंजहाँ गली-गली खुलनेवाले मैदानहीन स्कूलों के आँगन मेंखौलते जल की तरह खलबलाते हैं बच्चेखेल की घण्टी मेंबस रविवार की सड़कों पर बनती उनकी पिचरह-रह पहियों से पिचनेवालीस्मृतिशेष मैदानोंवाला यह गाँवअपने मैदानों को गँवा बैठेगा अन्तिम बार जब हम गुज़रेंगे मैं और मेरे दोस्तअपना शिथिल शीश लिये फैला है जिनके मन की सबसे निचली तह में सूख गये तालाब की पाँक-सा मुलायम मैदानदूब और धूप-भरा।

Ep 116Wah Lete Hain Pratishodh | Nandkishore Acharya
वे लेते हुए प्रतिशोध– नंदकिशोर आचार्य शब्द मेरे मुखौटे हैं जिनमें अपने को छुपाता हूँ मैंअपनी लिप्सा, महत्वाकांक्षा, मक्कारी, फ़रेब और घृणा, भय अबकितनी मदद की है शब्दों ने मेरीउनका धन्यवाद करता जब अपनी ओर मुड़ता हूँपाता हूँ बस खोखल, जिसको छुपाता ख़ुद मुखौटा बन गया हूँ मैंबेचारे नहीं होते शब्द, वे लेते हैं प्रतिशोधशब्दों को जैसा बरतते हो तुम, वे तुमको वैसा बरतते नहीं!

Ep 115Matrubhasha | Kedarnath Singh
मातृभाषा - केदारनाथ सिंहजैसे चींटियाँ लौटती हैंबिलों मेंकठफोड़वा लौटता हैकाठ के पासवायुयान लौटते हैं एक के बाद एकलाल आसमान में डैने पसारे हुएहवाई-अड्डे की ओरओ मेरी भाषामैं लौटता हूँ तुम मेंजब चुप रहते-रहतेअकड़ जाती है मेरी जीभदुखने लगती हैमेरी आत्मा

Ep 114Beghar Log | Jaiprakash Kardam
बेघर लोग - जयप्रकाश कर्दम उनको भी प्यारी हैअपनी और अपने परिवारों की ज़िंदगीकरना चाहते हैं वे भीसरकार के सभी आदेशों, निर्देशों का पालनअपनी ज़िंदगी की सुरक्षा के लिएरहना चाहते हैं अपनेघरों के अंदरइसलिए निकल रहे हैं वेअपने दड़बों से बाहरलौट रहे हैं अपनेगाँव-घरों की ओरफटे हाल, नंगे पाँवभूख और थकान की मार झेलतेसिर पर सामान की पोटली मेंअपना घर उठाएसाइकिल पररिक्शा-ठेले में लादकर याहाथों से छोटे बच्चों के हाथ पकड़करपैदल हीउन्हें अपने साथ घसीटते हुएवृद्धों और बीमारों कोपीठ और कंधों पर लादेमृत बच्चों को गोद में उठाएकोरोना के ख़तरे कासामना करते हुएआँखों में कोरोना से भी अधिकआने वाले कल कीभूख का भय लिएगिरते, पड़ते, ठोकरें खातेऊपर सेपुलिस की लाठी और गालियों काप्रसाद पाते हुएतमाम दुःख और यातनाएँसहते हुए भीतय कर रहे हैं वेसैंकड़ों-हज़ारों किलोमीटर की दूरीअपने घर पहुँचने की जल्दी मेंमहानगरों कोबनाने और बसाने वालेबेघर लोग।

Ep 114Roti | Sudama Pandey 'Dhoomil'
रोटी - धूमिल एक आदमी रोटी बेलता है एक आदमी रोटी खाता है एक तीसरा आदमी भी है जो न रोटी बेलता है, न रोटी खाता है वह सिर्फ़ रोटी से खेलता है मैं पूछता हूँ— ‘यह तीसरा आदमी कौन है?’ मेरे देश की संसद मौन है।

Ep 113Tram Mein Ek Yaad | Gyanendrapati
ट्राम में एक याद - ज्ञानेन्द्रपति चेतना पारीक कैसी हो?पहले जैसी हो?कुछ-कुछ ख़ुुशकुछ-कुछ उदासकभी देखती तारेकभी देखती घासचेतना पारीक, कैसी दिखती हो?अब भी कविता लिखती हो? तुम्हें मेरी याद तो न होगीलेकिन मुझे तुम नहीं भूली होचलती ट्राम में फिर आँखों के आगे झूली होतुम्हारी क़द-काठी की एकनन्ही-सी, नेकसामने आ खड़ी हैतुम्हारी याद उमड़ी है चेतना पारीक, कैसी हो?पहले जैसी हो?आँखों में अब भी उतरती है किताब की आग?नाटक में अब भी लेती हो भाग?छूटे नहीं हैं लाइब्रेरी के चक्कर?मुझ-से घुमन्तूू कवि से होती है टक्कर?अब भी गाती हो गीत, बनाती हो चित्र?अब भी तुम्हारे हैं बहुत-बहुत मित्र?अब भी बच्चों को ट्यूशन पढ़ाती हो?अब भी जिससे करती हो प्रेम उसे दाढ़ी रखाती हो?चेतना पारीक, अब भी तुम नन्हीं सी गेंद-सी उल्लास से भरी हो?उतनी ही हरी हो? उतना ही शोर है इस शहर में वैसा ही ट्रैफ़िक जाम हैभीड़-भाड़ धक्का-मुक्का ठेल-पेल ताम-झाम हैट्यूब-रेल बन रही चल रही ट्राम हैविकल है कलकत्ता दौड़ता अनवरत अविराम है इस महावन में फिर भी एक गौरैये की जगह ख़ाली हैएक छोटी चिड़िया से एक नन्ही पत्ती से सूनी डाली हैमहानगर के महाट्टहास में एक हँसी कम हैविराट धक-धक में एक धड़कन कम है कोरस में एक कण्ठ कम हैतुम्हारे दो तलवे जितनी जगह लेते हैं उतनी जगह ख़ााली हैवहाँ उगी है घास वहाँ चुई है ओस वहाँ किसी ने निगाह तक नहीं डाली है फिर आया हूँ इस नगर में चश्मा पोंछ-पोंछ कर देखता हूँआदमियों को किताबों को निरखता लिखता हूँरंग-बिरंगी बस-ट्राम रंग बिरंगे लोगरोग-शोक हँसी-खुशी योग और वियोगदेखता हूँ अबके शहर में भीड़ दूनी हैदेखता हूँ तुम्हारे आकार के बराबर जगह सूनी है चेतना पारीक, कहाँ हो कैसी हो?बोलो, बोलो, पहले जैसी हो?

Ep 111Tab Bhi Kya Taaliyan Bajti | Nandkishore Acharya
तब भी क्या तालियाँ बजतीं - नंदकिशोर आचार्य तब भी क्या तालियाँ बजतींअभिभूत थे सभी अभिनय पर मेरेतालियों की गड़गड़ाहट थी अनवरत नाटक खत्म होने परऔर मैं शर्म से गढ़ा जा रहा थानहीं, किसी संकोच में नहीं!ये तो सोचता हुआ, क्या ये तालियाँ कुछ जान पाई हैंवो घृणा, वो लोलुपता, और करुणा के नीचे खौलती हुई वह महत्वाकांक्षा और फरेबअपने अभिनय में पहचानता खुद कोउनके लिए जो अभिनय है मेरा, सच है मेरे लिएकाश उनके लिए वह उनका सच होतादेख पाते अभिनय में खुद को अभिनय करते हुएतब भी क्या तालियाँ बजती अनवरत

Ep 112Kavi | Ramesh Chandra Shah
कवि - रमेश चंद्र शाह वह रंकों का रंक मगर राजा होता है।सन्नाटे का शोर नहीं, बाजा होता हैकवि का मन यह नहीं महज़ तुककवि का मन साझा होता है।इसीलिए, इसीलिए हाँ, इसीलिए तोइतना सारा कीच पचा कर भी दुनिया काकवि का मन किस क़दर अरे ताला होता है।

Ep 110Ehsaas Ka Ghar | Kanhaiya Lal Nandan
अहसास का घर - कन्हैयालाल नंदन हर सुबह को कोई दोपहर चाहिए,मैं परिंदा हूं उड़ने को पर चाहिए। मैंने मांगी दुआएँ, दुआएँ मिलीं,उन दुआओं का मुझ पे असर चाहिए। जिसमें रहकर सुकूं से गुज़ारा करूँ,मुझको अहसास का ऐसा घर चाहिए। ज़िंदगी चाहिए मुझको मानी भरी,चाहे कितनी भी हो मुख़तसर चाहिए। लाख उसको अमल में न लाऊँ कभी,शानोशौकत का समाँ मगर चाहिए। जब मुसीबत पड़े और भारी पड़े,तो कहीं एक तो चश्मेतर चाहिए।

Ep 109Kyun Na | Gyanendrapati
क्यों न - ज्ञानेन्द्रपतिक्यों न कुछ निराला लिखेंएक नई देवमाला लिखेंअँधेरे का राज चौतरफएक तीली उजाला लिखेंसच का मुँह चूम करझूठ का मुँह काला लिखेंकला भूल, कविता कराला लिखेंन आला लिखें, निराला लिखेंअमृत की जगह विष-प्याला लिखेंएक नई देवमाला लिखेंखल पोतें दुनिया पर एक ही रंगहम बैनीआहपीनाला लिखें।सारे इंद्रधनुष के रंगों मेंसारे आयामों के बारे में लिखें।

Ep 108Khushbu Rachte Hain Haath | Arun Kamal
ख़ुशबू रचते हैं हाथ - अरुण कमल कई गलियों के बीचकई नालों के पारकूड़े-करकटके ढेरों के बादबदबू से फटते जाते इसटोले के अंदरख़ुशबू रचते हैं हाथख़ुशबू रचते हैं हाथ। उभरी नसोंवाले हाथघिसे नाखूनोंवाले हाथपीपल के पत्ते-से नए-नए हाथजूही की डाल-से ख़ुशबूदार हाथगंदे कटे-पिटे हाथज़ख्म से फटे हुए हाथख़ुशबू रचते हैं हाथख़ुशबू रचते हैं हाथ। यहीं इस गली में बनती हैंमुल्क की मशहूर अगरबत्तियाँबनाते हैं केवड़ा, गुलाब, ख़स और रातरानी अगरबत्तियाँदुनिया की सारी गंदगी के बीचदुनिया की सारी ख़ुशबूरचते रहते हैं हाथख़ुशबू रचते हैं हाथख़ुशबू रचते हैं हाथ।

Ep 107Cheetiyaan | Gagan Gill
चीटियां - गगन गिल चींटियाँ अपने घर का रास्ता भूल गई थीं। हमारी नींद और हमारी देह की बीच वे क़तार बनाती चलतीं। उनकी स्मृति में बिखरा रहता उनका अदृश्य आटा, जो किसी दूसरे देश-काल ने बिखेरा था। उसे ढूँढ़ती वे चलती जातीं पृथ्वी के एक सिरे से दूसरे की ओर। वे अपने दाँत गड़ातीं हर जीवित व मृत वस्तु में। उनके चलने से पृथ्वी के दुख हल्के होने लगते कि दिशाएँ घूमने लगतीं, भ्रमित हो। ध्रुव बदलने लगते अपनी जगह। चींटियों का दुख लेकिन कोई न जानता था। बहुत पहले शायद कभी वे स्त्रियाँ रही हों।

Ep 106Bas Ek Reteela Sapaat Aur Sookha Nahi hai Wah | Nandkishore Acharya
बस एक रेतीला सपाट है - नंदकिशोर आचार्य न ऊँचाइयाँ है, न गहराइयाँ, बस एक रेतीला सपाट हैदूर तक पसरा हुआ निश्छाय तपता जपता नाम कोईकहाँ तक उड़ता आबाद बंसल में प्यासा कलपता पाखीढूँढ़ता छाया अपने ही परछाई मेंआ गिरता रेत पर बेबस, तड़पता झुलस जाता हैसपना पल रहा था जो आँखों से निकलकर ढुलकने भी नहीं पातासूख जाता है नि:संघ पसरा हुआ निश्छाय रेतीला सपाटतपता रहता है।सूखा नहीं है वहवे समझते हैं तुम्हारा कोई अतीत नहीं हैऐसे ही सूखे रहे हो तुम सदा, क्योंकिजिनका कोई भी अतीत रहा होता है वे सदा बिसूरते रहते हैंहाँ, एक दुख वह भी होता है जो पत्थर कर देता हैलेकिन अंदर उबलता रहता है चश्मा और एक दिन फोड़कर उसे निकल आता हैलेकिन तुम तो रेत हो, यानी जो भीतर ही भीतरहो सकता वह भी गया होगा सूखनहीं सूखा नहीं है वह, नहीं तो यों सँजोए नहीं रहतेअपनी जर्जर छाती में वे सारे जीवाश्मजो कभी दुनिया थी तुम्हारीजब तक अपनी दुनिया की यादें दबी है मन में, जीवाश्म सी ही सहीतब तक दुख है इसलिए सपने भीवह जितना गहरा है चश्मा उसी शिद्दत से कभी फूटेगा।

Ep 105Sheher | Amrita Pritam
शहर - अमृता प्रीतम मेरा शहर एक लम्बी बहस की तरह हैसड़कें - बेतुकी दलीलों-सी…और गलियाँ इस तरहजैसे एक बात को कोई इधर घसीटताकोई उधर हर मकान एक मुट्ठी-सा भिंचा हुआदीवारें-किचकिचाती सीऔर नालियाँ, ज्यों मुँह से झाग बहता है यह बहस जाने सूरज से शुरू हुई थीजो उसे देख कर यह और गरमातीऔर हर द्वार के मुँह सेफिर साईकिलों और स्कूटरों के पहियेगालियों की तरह निकलतेऔर घंटियाँ-हार्न एक दूसरे पर झपटते जो भी बच्चा इस शहर में जनमतापूछता कि किस बात पर यह बहस हो रही?फिर उसका प्रश्न ही एक बहस बनताबहस से निकलता, बहस में मिलता… शंख घंटों के साँस सूखतेरात आती, फिर टपकती और चली जाती पर नींद में भी बहस ख़तम न होतीमेरा शहर एक लम्बी बहस की तरह है….

Ep 104Goonga Nahi Tha Main | Jaiprakash Kardam
गूंगा नहीं था मै - जयप्रकाश कर्दम गूँगा नहीं था मैंकि बोल नहीं सकता थाजब मेरे स्कूल के मुझसे कई क्लास छोटे बेढँगे से एक जाट के लड़के ने मुझसे कहा था—‘अरे ओ मोरिया! ज्यादै बिगड़े मत,कमीज कू पेंट में दबा कै मत चल।'और मैंने चुपचाप अपनी क़मीज़ पैंट से बाहर निकाल ली थीगूँगा नहीं था मैं न अक्षम, अपाहिज या जड़ था कि प्रतिवाद नहीं कर सकता थाउस लड़के के इस अपमानजनक व्यवहार कालेकिन, अगर मैं बोल जाता जातीय अहं का सिंहासन डोल जाता सवर्ण छात्रों में जंगल की आग की तरह यह बात फैल जाती कि ‘ढेढों के दिमाग़ चढ़ गया है,मिसलगढ़ी का एक चमार का लड़का क़ाज़ीपुरा के एक जाट के छोरे सै अड़ गया है।’आपसी मतभेदों को भुलाकर तुरत-फुरत, स्कूल के सारे सवर्ण छात्र गोल बंद हो जाते, और खेल-अध्यापक से हॉकियाँ ले-लेकर दलित छात्रों पर हमला बोल देते इस हल्ले में कई दलित छात्रों के हाथ-पैर टूटते, कइयों के सिर फूट जाते और फिर, स्कूल-परिसर के अंदर झगड़ा करने के जुर्म में हम ही स्कूल से ‘रस्टीकेट’ कर दिए जाते।

Ep 103Akelepan Ka Anand | Ramdhari Singh Dinkar
अकेलेपन का आनंद - रामधारी सिंह ‘दिनकर’ अकेलेपन से बढ़करआनन्द नहीं , आराम नहीं ।स्वर्ग है वह एकान्त,जहाँ शोर नहीं, धूमधाम नहीं । देश और काल के प्रसार में,शून्यता, अशब्दता अपार मेंचाँद जब घूमता है, कौन सुख पाता है ?भेद यह मेरी समझ में तब आता है,होता हूँ जब मैं अपने भीतर के प्रांत में,भीड़ से दूर किसी निभृत, एकान्त में। और तभी समझ यह पाता हूँपेड़ झूमता है किस मोद मेंखड़ा हुआ एकाकी पर्वत की गोद में । बहता पवन मन्द-मन्द है।पत्तों के हिलने में छन्द है।कितना आनन्द है!

Ep 102Chandini Ki Paanch Partein | Sarveshwar Dayal Saxena
चाँदनी की पाँच परतें / सर्वेश्वर दयाल सक्सेनाचाँदनी की पाँच परतें, हर परत अज्ञात है। एक जल में एक थल में, एक नीलाकाश में। एक आँखों में तुम्हारे झिलमिलाती, एक मेरे बन रहे विश्वास में। क्या कहूँ, कैसे कहूँ….. कितनी ज़रा सी बात है। चाँदनी की पाँच परतें, हर परत अज्ञात है। एक जो मैं आज हूँ, एक जो मैं हो न पाया, एक जो मैं हो न पाऊँगा कभी भी, एक जो होने नहीं दोगी मुझे तुम, एक जिसकी है हमारे बीच यह अभिशप्त छाया। क्यों सहूँ, कब तक सहूँ…. कितना कठिन आघात है। चाँदनी की पाँच परतें, हर परत अज्ञात है।

Ep 101Ek Paarivarik Prashn | Kedarnath Singh
एक पारिवारिक प्रश्न - केदारनाथ सिंह छोटे-से आँगन में माँ ने लगाए हैं तुलसी के बिरवे दो पिता ने उगाया है बरगद छतनार मैं अपना नन्हा गुलाब कहाँ रोप दूँ! मुट्ठी में प्रश्न लिए दौड़ रहा हूँ वन-वन पर्वत-पर्वत रेती-रेती... बेकार!

Ep 100Kuch Bhi To Nahi | Nandkishore Acharya
कुछ भी तो नहीं / नंदकिशोर आचार्य कुछ भी तो नहीं ठीक से हुआ,न बचपना, न समझदारी, न दोस्ती, न दुश्मनी, न प्रेम, न परिवार, न तंदुरुस्ती, न बीमारी, न हँसना, न रोना, न नींद, न जागना, न रेंगना, न तन कर खड़े रह पाना, कविता भी नहीं!न कॉमेडी हुआ, न त्रासदी ठीक से जीवनइसलिए डरता हूँ ठीक से मरूँगा तो न!’

Ep 99Barf, Samundar Aur Glacier | Suryabala
बर्फ़ , समंदर और ग्लेशियर - सूर्यबाला सांसें पहाड़-सी टूटी पड़ रही हैं मुझ पर-और मैं नदी सी बिछलतीधाराधार बहती जा रही हूँअपने ओर-छोर की नियति से बेखबरआकांक्षाहीन...समंदर हो जाने कीया बर्फ बन जम जाने कीकुछ भी हो सकता हैलेकिनबहुत सालों बादजब टूटेंगे ग्लेशियरबहेंगे महानदतब क्या कोई समझेगा?कि, कभी यह महानद-मात्र बरूनियों पर उलझीएक बूंद हुआ करती था!..

Ep 98Jab Rangon Ki Baat Chalti Hai | Shahanshah Alam
जब रंगों की बात चलती है - शहंशाह आलम जब रंगों की बात चलती हैबहुत बुरे रंग में भी तुम ख़ास कुछढूंढ़ लेती होतुमने बतलाया कि ऎसा हमारेप्रेम की वज़ह से होता हैमैं तुम्हारी पसन्द के रंगों वालेकपड़े और जूते पहन करकुमार गंधर्व के आडियो कैसेट खरीदनेइतवार की शाम को निकलता हूँ घर सेमैं जहाँ पर काम करता हूँवहाँ ऎसे रास्ते होकर पहुँचता हूँजिस रास्ते मेंतुम्हारी पसन्द के रंग दिखते हैंऔर जिस रास्ते के लोगअच्छे रंगों के मुंतज़िर रहते हैं हमेशामैं जिस किराए के मकान में रहता हूँउसमें सिर्फ़ एक कील ठोकने की इजाज़त हैमैंने इस एक कील पर तुम्हारी तस्वीर टांग दी हैतुम यही चाहती थींजबकि तुमने मेरी तस्वीर रखने सेसाफ़ इंकार कर दिया थाजितनी हवाएँ और दूसरी चीज़ेंजीने के लिए ज़रूरी होती हैंतुम्हारे लिए तुम्हारी पसंद के रंग भीज़रुरी हो गए हैंबरसात के दिनों में हम दूर-दराज़ केइलाक़े साथ-साथ घूमे थेकश्तियों का सफ़र किया थारथ पर बैठने से तुम डरती थींमैं चाकू से डरता थाअब मुझे चाकू से डर नहीं लगताइसलिए किअपनी पसंद के रंगों को बचाए रखने के लिएआदमी को चाकू से नहीं डरना चाहिए

Ep 97Peeth Ki Khujli | Rajesh Joshi
पीठ की खुजली - राजेश जोशी अभी-अभी लौटा हूँ सारे काम-धाम निपटाकर रात का खाना खाकर अभी-अभी कपडे बदलकर घुसा हूँ होटल के बिस्तर में और रह-रहकर पीठ में खुजली हो रही है रह-रहकर आ रही है इस समय तुम्हारी याद काम आ सकती थी जनेऊ इस समय पर उसे तो बहुत पहले ही छोड़ आया पैतृक घर की खूँटी पर कोई बैलगाड़ी भी नहीं यहाँ कि जिसके पहिए से टिक कर खुजला हूँ अपनी पीठ जहाँ तक जा सकता है ले जाता हूँ खींचकर पीठ पर अपना हाथ लेकिन यह नामुराद खुजली हर बार और आगे खिसक जाती है मेरे हाथ की पहुँच से मेरे हाथ की हद के आगे से शुरू होती है तुम्हारी हथेली की याद याद ने भी क्या कारण खोजा है आने के लिए घर से इतनी दूर इस गुलाबी शहर में!

Ep 96Dastakhat | Suryabala
दस्तख़त – सूर्यबाला छमाही के नतीजे पर दस्तख़त करती-हंसी थी मां-‘तू फिर फर्स्ट आई है?...’दुबली उंगलियों में कांपी है कलम- यज्ञ की समिधा की अग्नि सीऔर पूजा की चौकी पर,झुके माथे के नीचे-उसकी आंखों की कोर डबडबाई है!...हो गए दस्तख़त

Ep 95Ek Stree Par Kijiye Vishwas | Kumar Ambuj
एक स्त्री पर कीजिए विश्वास - कुमार अंबुज जब ढह रही हों आस्थाएँजब भटक रहे हों रास्तातो इस संसार में एक स्त्री पर कीजिए विश्वासवह बताएगी सबसे छिपाकर रखा गया अनुभवअपने अँधेरों में से निकालकर देगी वही एक कंदीलकितने निर्वासित, कितने शरणार्थी,कितने टूटे हुए दुखों से, कितने गर्वीलेकितने पक्षी, कितने शिकारीसब करते रहे हैं एक स्त्री की गोद पर भरोसाजो पराजित हुए उन्हें एक स्त्री के स्पर्श ने ही बना दिया विजेताजो कहते हैं कि छले गए हम स्त्रियों सेवे छले गए हैं अपनी ही कामनाओं सेअभी सब कुछ गुजर नहीं गया हैयह जो अमृत है यह जो अथाह हैयह जो अलभ्य दिखता हैउसे पा सकने के लिए एक स्त्री की उपस्थितिउसकी हँसी, उसकी गंधऔर उसके उफान पर कीजिए विश्वासवह सबसे नयी कोंपल हैऔर वही धूल चट्टानों के बीच दबी हुए एक जीवाश्म की परछाईं।

Ep 94Upkaran | Nandkishore Acharya
उपकरण - नंदकिशोर आचार्य पत्थर क्या नींद से भी ज्यादा पारदर्शी होता हैकि और भी साफ दिख जाता है उसमें तुम्हें अपना सपनातुम जिसे उकेरने लगते हो, शिल्पी जो ठहरेपर क्या होता है उन टुकड़ों काजिन्हें तुम अपने उकेरने में पत्थर से उतार देते होऔर उस मूरत का जो जैसी भी होतुम्हारी ही पहचान होती है, पत्थर की नहींउनमें क्या सशक्तता नहीं रहता होगापत्थर का भी कोई क्षत-विक्षत सपना अपनाहाँ पत्थर तो उपकरण ठहरा, उसका अपना क्या सपना क्याक्या वे जिनका अपना नहीं होता कुछ, उपकरण हो जाते हैंमूरत करने को किसी और का सपना!

Ep 93Tab Tum Kya Karoge? | Om Prakash Valmiki
तब तुम क्या करोगे? - ओमप्रकाश वाल्मीकि यदि तुम्हें, धकेलकर गाँव से बाहर कर दिया जाए पानी तक न लेने दिया जाए कुएँ से दुतकारा-फटकारा जाए चिलचिलाती दुपहर में कहा जाए तोड़ने को पत्थर काम के बदले दिया जाए खाने को जूठन तब तुम क्या करोगे? यदि तुम्हें, मरे जानवर को खींचकर ले जाने के लिए कहा जाए और, कहा जाए ढोने को पूरे परिवार का मैला पहनने को दी जाए उतरन तब तुम क्या करोगे? यदि तुम्हें, पुस्तकों से दूर रखा जाए जाने नहीं दिया जाए विद्या मंदिर की चौखट तक ढिबरी की मंद रोशनी में कालिख पुती दीवारों पर ईसा की तरह टाँग दिया जाए तब तुम क्या करोगे? यदि तुम्हें, रहने को दिया जाए फूस का कच्चा घर वक़्त-बेवक़्त फूँक कर जिसे स्वाह कर दिया जाए बरसात की रातों में घुटने-घुटने पानी में सोने को कहा जाए तब तुम क्या करोगे? यदि तुम्हें, नदी के तेज़ बहाव में उल्टा बहना पड़े दर्द का दरवाज़ा खोलकर भूख से जूझना पड़े भेजना पड़े नई-नवेली दुल्हन को पहली रात ठाकुर की हवेली तब तुम क्या करोगे? यदि तुम्हें, अपने ही देश में नकार दिया जाए मानकर बँधुआ छीन लिए जाएँ अधिकार सभी जला दी जाए समूची सभ्यता तुम्हारी नोच-नोच कर फेंक दिए जाएँ गौरवमय इतिहास के पृष्ठ तुम्हारे तब तुम क्या करोगे? यदि तुम्हें, वोट डालने से रोका जाए कर दिया जाए लहूलुहान पीट-पीटकर लोकतंत्र के नाम पर क़दम-क़दम पर याद दिलाया जाए जाति का ओछापन दुर्गंध भरा हो जीवन हाथ में पड़ गए हों छाले फिर भी कहा जाए खोदो नदी-नाले तब तुम क्या करोगे? यदि तुम्हें, सरेआम बेइज़्ज़त किया जाए छीन ली जाए संपत्ति तुम्हारी धर्म के नाम पर कहा जाए बनने को देवदासी तुम्हारी स्त्रियों को कराई जाए उनसे वेश्यावृत्ति तब तुम क्या करोगे? साफ़-सुथरा रंग तुम्हारा झुलसकर साँवला पड़ जाएगा खो जाएगा आँखों का सलोनापन तब तुम काग़ज़ पर नहीं लिख पाओगे सत्यम, शिवम्, सुंदरम्। देवी-देवताओं के वंशज तुम हो जाओगे लूले-लंगड़े और अपाहिज जो जीना पड़ जाए युगों-युगों तक मेरी तरह, तब तुम क्या करोगे?

Ep 92Udaas Tum | Dharmvir Bharti
उदास तुम - धर्मवीर भारती तुम कितनी सुंदर लगती हो, जब तुम हो जाती हो उदास! ज्यों किसी गुलाबी दुनिया में, सूने खंडहर के आस-पास मदभरी चाँदनी जगती हो! मुँह पर ढक लेती हो आँचल, ज्यों डूब रहे रवि पर बादल। या दिन भर उड़ कर थकी किरन, सो जाती हो पाँखें समेट, आँचल में अलस उदासी बन; दो भूले-भटके सांध्य विहग पुतली में कर लेते निवास। तुम कितनी सुंदर लगती हो, जब तुम हो जाती हो उदास! खारे आँसू से धुले गाल, रूखे हल्के अधखुले बाल, बालों में अजब सुनहरापन, झरती ज्यों रेशम की किरने संझा की बदरी से छन-छन, मिसरी के होंठों पर सूखी, किन अरमानों की विकल प्यास! तुम कितनी सुंदर लगती हो, जब तुम हो जाती हो उदास! भँवरों की पाँते उतर-उतर कानों में झुक कर गुन-गुन कर, हैं पूछ रही क्या बात सखी? उन्मन पलकों की कोरों में क्यों दबी-ढुकी बरसात सखी? चंपई वक्ष को छू कर क्यों उड़ जाती केसर की उसाँस! तुम कितनी सुंदर लगती होज्यों किसी गुलाबी दुनिया में, सूने खंडहर के आस-पास मदभरी चाँदनी जगती हो!

Ep 91Ek Ajeeb Din | Kunwar Narayan
एक अजीब दिन - कुंवर नारायण और कोई दुर्घटना नहीं हुई।आज सारे दिन लोगों से मिलता रहाऔर कहीं अपमानित नहीं हुआ।आज सारे दिन सच बोलता रहाऔर किसी ने बुरा न माना।आज सबका यकीन कियाऔर कहीं धोखा नहीं खाया।और सबसे बड़ा चमत्कार तो यहकि घर लौटकर मैंने किसी और को नहींअपने ही को लौटा हुआ पाया।

Ep 90Rohit Vemula Par Paanch Kavitayein | Priyadarshan
रोहित वेमुला पर पाँच कविताएँ / प्रियदर्शन सत्ताईस साल से मौत की तिल-तिल अदा की जा रही किस्तेंउसने एक बार चुकाने का फैसला कियाऔर एक लंबी छलाँग लगाकर चला गयाउस बेहद लंबी अंधी सुरंग के पार जो उसकी जिंदगी थीउसकी लहू-लुहान पीठ पर सदियों से पड़ते कोड़ों के निशान थेउसकी जुबान सिल दी गई थीअपने जख्मी होठों से जिन शब्दों कोवह अपने मुक्ति के मंत्र की तरह बुदबुदाना चाहता थाउन्हें व्यर्थ बना दिया गया थाउसे दंडित किया गया क्योंकि उसने ऊपर उठने की कोशिश कीवह रामायण का शंबूक था, रोम का स्पार्टाकसवह उन लाखों लाख गुमनाम गुलामों दासों और शूद्रों की साझा चीख थाजो पीटे गए, मारे गए, सूली पर चढ़ा दिए गएजिनके कानों में सीसा डाला गया, जिनकी आँख निकाल ली गईजिनके शव सड़ने के लिए छोड़ दिए गए सड़कों परवो हमारी आत्मा में चुभता हुआ भारत थाजिसे खत्म किया जाना जरूरी थाइतिहास की ताकतें चुपके से तैयार कर रही थीं उसका फंदाजब वह मारा गया तो बताया गया कि वह एक कायर था, उसने जान दे दी।’ दो–‘उसकी माँ थी, उसके भाई थे, उसके दोस्त थे, उसके सपने थे, उसका कार्ल सागान थाउसके भीतर छटपटाती कविताएँ थींउसके भीतर आकार लेती कुछ विज्ञान कथाएँ थींउसके भीतर उम्मीद थी, उसके भीतर गुस्सा थाउसके भीतर प्रतिरोध की कामना थीलेकिन अपने अंतिम समय में वह बिल्कुल खाली थावह कौन सा ड्रैक्युला था जिसने उसके भीतरउतरकर सोख लिया था उसका पूरा संसार।’ तीन–‘उसने अपने खुदकुशी के लिए सिर्फ खुद कोजिम्मेदार ठहराया किसी और को नहींअब उसके हत्यारे उसका दिया प्रमाण-पत्र दिखाकरसाबित कर रहे हैं कि उन्होंने उसे नहीं मारावह बस अपना जीवन जीना चाहता थालेकिन इतने भर के लिएउसे इतिहास की उन ताकतों से टकराना पड़ाजो थकाकर मार डालने का हुनर जानती थीवे किसी कृपा की तरह वज़ीफ़े बाँटती थींउनके पास बहुत सारा सब्र था, बहुत सारी करुणाजिससे वह अपने भीतर की घृणा को छुपाए रखती थींउस दिन के इंतजार मेंजब कोई रोहित वेमुला हार मानकर छोड़ देगा अपनी और उनकी दुनियावे नहीं चाहती थीं कोई उन्हें आईना दिखाएकोई याद दिलाए उन्हें उनका ओछापन।’चार–‘हमें तो उसका शोक मनाने का हक भी नहींहम तो उसे ठीक से जानते तक नहींहमने कभी उसे देखा तक नहीं कि किस हाल में वह जीता था/किस तरह मरता था, क्यों लड़ता थाजब उसे इंतजार था हमारा तो हम दूर खड़े रहेउसकी आत्मा से बेखबर या बेपरवाहकोई नहीं जानता जिस बैनर से वह ताकत हासिल करता थाउसे मौत की रस्सी में बदलने से पहलेउसने कितनी रस्सियाँ थामने की कोशिश की होंगीउस सर्द एहसास तक पहुँचने से पहलेजिसमें कोई उदासी नहीं होतीसिर्फ निचाट अकेलापन होता हैउसने कितनी बार शब्दों की आँच से ऊष्मा चाही होगीजब उसे यह छोटी-सी डोर भी छिनती लगीतो उसने यह रस्सी बनाईऔर चला गया सब कुछ छोड़करजान देकर ही असल में उसने हासिल की वह जिंदगीजिसका वह जीते-जी हकदार था और जो हक हमसे अदा न हुआ।’पाँच–‘लेकिन एक दिन यह कर्ज इतिहास को चुकाना होगाएक दिन एकलव्य लौटेगा अपना रिसता हुआ अँगूठा माँगनेएक दिन रोम स्पार्टाकस का होगाएक दिन शंबूक वाल्मीकि के सामने खड़ा होगापूछेगा आदिकवि सेकिस अपराध में एक महाकाव्य पर उसके खून के छींटे डाले गएअपने खून से जो स्याही तुमने बनाई है रोहित वेमुलाएक दिन वो भी काम आएगी।’

Ep 89Jal Prapat Hai Sameep | Vinod Kumar Shukla
जल प्रपात है समीप - विनोद कुमार शुक्ल जल प्रपात है समीप जल बिंदु के साथ हवा का झोंका आ रहा है ।जलप्रपात अपनी जलप्रपात ध्वनि सेसब ध्वनियों को निस्तब्ध कर रहा है ।वहाँ जाने के पहलेजो कुछ कहना सुन्ना हैकह सुन लिया गया कि जलप्रपात के पासकेवल जलप्रपात ध्वनि को सुना जाता हैइस भाषा को पुरखे सुन चुके होते हैंऔर पीढ़िया सुनने वाली होती हैं अलावा कुछ भी सुनाई नहीं देता।तब भी प्रपात के पास पेड़ कि पत्ती से इकट्ठी हुई बूँद -के टपकने कि आवाज़ होती होगी।चिड़िया चहचहाती है जिसकी चहचहाहट सुनाई नहीं देतीऔर चिड़िया के बच्चे जवाब दे रहे होते हैं।एक गीली काली चट्टान के नीचे से निकल कर एक कीड़ा भीबोल रहा होगासब अपनी आवाज़ बोल रहे होते हैंवहाँ मै कोरस गाता हूँ ।

Ep 88Barf Bahar Gir Rahi Hai | Nandkishore Acharya
बर्फ़ बाहर गिर रही है - नंदकिशोर आचार्य बर्फ़ बाहर गिर रही है, यह अलाव भी बुझ चला सा हैएक अधजली लकड़ी से मैं झाड़ता हूँ राखबुझ रही लकड़ियों को नए क्रम में पुन: चुनता हूँफूँक से जगाता हूँ आग सोई हुईएक धीमा ताप सब पर व्याप जाता हैमीठा और उदास, बर्फ़ बाहर गिर रही होगी।

Ep 87Ullanghan | Rajesh Joshi
उल्लंघन - राजेश जोशी उल्लंघन कभी जानबूझकर किये और कभी अनजाने में बंद दरवाज़े बचपन से ही मुझे पसंद नहीं रहेएक पाँव हमेशा घर की देहरी से बाहर ही रहा मेरा व्याकरण के नियम जानना कभी मैंने ज़रूरी नहीं समझा और इसी कारण मुझे दीमक के कीड़ों को खाने की लत नहीं लगी और किसी व्यापारी के हाथ मैंने अपना पंख देकर उन्हें खरीदा नहीं बहुत मुश्किल से हासिल हुई थी आज़ादी और उससे भी मुश्किल था हर वक़्त उसकी हिफाज़त करना कोई न कोई बाज़ झपट्टा मारने, आँख गड़ाए बैठा ही रहता था किसी न किसी डगाल परकोई साँप रेंगता हुआ चुपचाप चला आता था घोंसले तक अंडे चुराने मैंने तो अपनी आँख ही तब खोली जब सविनय अवज्ञा के आह्वान पर सड़कों पर निकल आया देश उसके नारे ही मेरे कानों में बोले गए पहले शब्द थे मुझे नहीं पता मैं कितनी चीज़ों को उलांघ गया उलांघी गई चीज़ों की बाढ़ रुक जाती है ऐसा माना जाता था कई बार लगता है कि उल्लंघन की प्रक्रिया उलटबाँसी बनकर रह गई है हमारे मुल्क मेंहमने सोचा था कि लाँघ आए हैं हम बहुत सारी मूर्खताओं को अब वो कभी सिर नहीं उठाएंगी लेकिन एक दिन वो पहाड़ सी खड़ी नज़र आईं और हम उनकी तलहटी में खड़े बौने थे लेकिन ये न समझना कि मैं हताश होकर बैठ जाऊँगा उल्लंघन की आदत तो मेरी रग-रग में मौजूद है बंदर से आदमी बनने की प्रक्रिया के बीच इसे अपने पूर्वजों से पाया है मैंने मैं एक कवि हूँ और कविता तो हमेशा से ही एक हुक़्म-उदूली है हुक़ूमत के हर फ़रमान को ठेंगा दिखाती कविता उल्लंघन की एक सतत प्रक्रिया है व्याकरण के तमाम नियमों और भाषा की तमाम सीमाओं का उल्लंघन करती ये अपनेआप ही पहुँच जाती है वहाँ जहाँ पहुँचने के बारे में कभी सोचा भी नहीं था मैंने एक कवि ने कहा था कभी कि स्वाधीनता घटना नहीं, प्रक्रिया है उसे पाना होता है बार-बार, लगातार तभी से न जाने कितने नियमों की अविनय-सविनय अवज्ञा करता पहुँचा हूँ मैं यहाँ तक।