
Pratidin Ek Kavita
1,141 episodes — Page 22 of 23

Ep 94Upkaran | Nandkishore Acharya
उपकरण - नंदकिशोर आचार्य पत्थर क्या नींद से भी ज्यादा पारदर्शी होता हैकि और भी साफ दिख जाता है उसमें तुम्हें अपना सपनातुम जिसे उकेरने लगते हो, शिल्पी जो ठहरेपर क्या होता है उन टुकड़ों काजिन्हें तुम अपने उकेरने में पत्थर से उतार देते होऔर उस मूरत का जो जैसी भी होतुम्हारी ही पहचान होती है, पत्थर की नहींउनमें क्या सशक्तता नहीं रहता होगापत्थर का भी कोई क्षत-विक्षत सपना अपनाहाँ पत्थर तो उपकरण ठहरा, उसका अपना क्या सपना क्याक्या वे जिनका अपना नहीं होता कुछ, उपकरण हो जाते हैंमूरत करने को किसी और का सपना!

Ep 93Tab Tum Kya Karoge? | Om Prakash Valmiki
तब तुम क्या करोगे? - ओमप्रकाश वाल्मीकि यदि तुम्हें, धकेलकर गाँव से बाहर कर दिया जाए पानी तक न लेने दिया जाए कुएँ से दुतकारा-फटकारा जाए चिलचिलाती दुपहर में कहा जाए तोड़ने को पत्थर काम के बदले दिया जाए खाने को जूठन तब तुम क्या करोगे? यदि तुम्हें, मरे जानवर को खींचकर ले जाने के लिए कहा जाए और, कहा जाए ढोने को पूरे परिवार का मैला पहनने को दी जाए उतरन तब तुम क्या करोगे? यदि तुम्हें, पुस्तकों से दूर रखा जाए जाने नहीं दिया जाए विद्या मंदिर की चौखट तक ढिबरी की मंद रोशनी में कालिख पुती दीवारों पर ईसा की तरह टाँग दिया जाए तब तुम क्या करोगे? यदि तुम्हें, रहने को दिया जाए फूस का कच्चा घर वक़्त-बेवक़्त फूँक कर जिसे स्वाह कर दिया जाए बरसात की रातों में घुटने-घुटने पानी में सोने को कहा जाए तब तुम क्या करोगे? यदि तुम्हें, नदी के तेज़ बहाव में उल्टा बहना पड़े दर्द का दरवाज़ा खोलकर भूख से जूझना पड़े भेजना पड़े नई-नवेली दुल्हन को पहली रात ठाकुर की हवेली तब तुम क्या करोगे? यदि तुम्हें, अपने ही देश में नकार दिया जाए मानकर बँधुआ छीन लिए जाएँ अधिकार सभी जला दी जाए समूची सभ्यता तुम्हारी नोच-नोच कर फेंक दिए जाएँ गौरवमय इतिहास के पृष्ठ तुम्हारे तब तुम क्या करोगे? यदि तुम्हें, वोट डालने से रोका जाए कर दिया जाए लहूलुहान पीट-पीटकर लोकतंत्र के नाम पर क़दम-क़दम पर याद दिलाया जाए जाति का ओछापन दुर्गंध भरा हो जीवन हाथ में पड़ गए हों छाले फिर भी कहा जाए खोदो नदी-नाले तब तुम क्या करोगे? यदि तुम्हें, सरेआम बेइज़्ज़त किया जाए छीन ली जाए संपत्ति तुम्हारी धर्म के नाम पर कहा जाए बनने को देवदासी तुम्हारी स्त्रियों को कराई जाए उनसे वेश्यावृत्ति तब तुम क्या करोगे? साफ़-सुथरा रंग तुम्हारा झुलसकर साँवला पड़ जाएगा खो जाएगा आँखों का सलोनापन तब तुम काग़ज़ पर नहीं लिख पाओगे सत्यम, शिवम्, सुंदरम्। देवी-देवताओं के वंशज तुम हो जाओगे लूले-लंगड़े और अपाहिज जो जीना पड़ जाए युगों-युगों तक मेरी तरह, तब तुम क्या करोगे?

Ep 92Udaas Tum | Dharmvir Bharti
उदास तुम - धर्मवीर भारती तुम कितनी सुंदर लगती हो, जब तुम हो जाती हो उदास! ज्यों किसी गुलाबी दुनिया में, सूने खंडहर के आस-पास मदभरी चाँदनी जगती हो! मुँह पर ढक लेती हो आँचल, ज्यों डूब रहे रवि पर बादल। या दिन भर उड़ कर थकी किरन, सो जाती हो पाँखें समेट, आँचल में अलस उदासी बन; दो भूले-भटके सांध्य विहग पुतली में कर लेते निवास। तुम कितनी सुंदर लगती हो, जब तुम हो जाती हो उदास! खारे आँसू से धुले गाल, रूखे हल्के अधखुले बाल, बालों में अजब सुनहरापन, झरती ज्यों रेशम की किरने संझा की बदरी से छन-छन, मिसरी के होंठों पर सूखी, किन अरमानों की विकल प्यास! तुम कितनी सुंदर लगती हो, जब तुम हो जाती हो उदास! भँवरों की पाँते उतर-उतर कानों में झुक कर गुन-गुन कर, हैं पूछ रही क्या बात सखी? उन्मन पलकों की कोरों में क्यों दबी-ढुकी बरसात सखी? चंपई वक्ष को छू कर क्यों उड़ जाती केसर की उसाँस! तुम कितनी सुंदर लगती होज्यों किसी गुलाबी दुनिया में, सूने खंडहर के आस-पास मदभरी चाँदनी जगती हो!

Ep 91Ek Ajeeb Din | Kunwar Narayan
एक अजीब दिन - कुंवर नारायण और कोई दुर्घटना नहीं हुई।आज सारे दिन लोगों से मिलता रहाऔर कहीं अपमानित नहीं हुआ।आज सारे दिन सच बोलता रहाऔर किसी ने बुरा न माना।आज सबका यकीन कियाऔर कहीं धोखा नहीं खाया।और सबसे बड़ा चमत्कार तो यहकि घर लौटकर मैंने किसी और को नहींअपने ही को लौटा हुआ पाया।

Ep 90Rohit Vemula Par Paanch Kavitayein | Priyadarshan
रोहित वेमुला पर पाँच कविताएँ / प्रियदर्शन सत्ताईस साल से मौत की तिल-तिल अदा की जा रही किस्तेंउसने एक बार चुकाने का फैसला कियाऔर एक लंबी छलाँग लगाकर चला गयाउस बेहद लंबी अंधी सुरंग के पार जो उसकी जिंदगी थीउसकी लहू-लुहान पीठ पर सदियों से पड़ते कोड़ों के निशान थेउसकी जुबान सिल दी गई थीअपने जख्मी होठों से जिन शब्दों कोवह अपने मुक्ति के मंत्र की तरह बुदबुदाना चाहता थाउन्हें व्यर्थ बना दिया गया थाउसे दंडित किया गया क्योंकि उसने ऊपर उठने की कोशिश कीवह रामायण का शंबूक था, रोम का स्पार्टाकसवह उन लाखों लाख गुमनाम गुलामों दासों और शूद्रों की साझा चीख थाजो पीटे गए, मारे गए, सूली पर चढ़ा दिए गएजिनके कानों में सीसा डाला गया, जिनकी आँख निकाल ली गईजिनके शव सड़ने के लिए छोड़ दिए गए सड़कों परवो हमारी आत्मा में चुभता हुआ भारत थाजिसे खत्म किया जाना जरूरी थाइतिहास की ताकतें चुपके से तैयार कर रही थीं उसका फंदाजब वह मारा गया तो बताया गया कि वह एक कायर था, उसने जान दे दी।’ दो–‘उसकी माँ थी, उसके भाई थे, उसके दोस्त थे, उसके सपने थे, उसका कार्ल सागान थाउसके भीतर छटपटाती कविताएँ थींउसके भीतर आकार लेती कुछ विज्ञान कथाएँ थींउसके भीतर उम्मीद थी, उसके भीतर गुस्सा थाउसके भीतर प्रतिरोध की कामना थीलेकिन अपने अंतिम समय में वह बिल्कुल खाली थावह कौन सा ड्रैक्युला था जिसने उसके भीतरउतरकर सोख लिया था उसका पूरा संसार।’ तीन–‘उसने अपने खुदकुशी के लिए सिर्फ खुद कोजिम्मेदार ठहराया किसी और को नहींअब उसके हत्यारे उसका दिया प्रमाण-पत्र दिखाकरसाबित कर रहे हैं कि उन्होंने उसे नहीं मारावह बस अपना जीवन जीना चाहता थालेकिन इतने भर के लिएउसे इतिहास की उन ताकतों से टकराना पड़ाजो थकाकर मार डालने का हुनर जानती थीवे किसी कृपा की तरह वज़ीफ़े बाँटती थींउनके पास बहुत सारा सब्र था, बहुत सारी करुणाजिससे वह अपने भीतर की घृणा को छुपाए रखती थींउस दिन के इंतजार मेंजब कोई रोहित वेमुला हार मानकर छोड़ देगा अपनी और उनकी दुनियावे नहीं चाहती थीं कोई उन्हें आईना दिखाएकोई याद दिलाए उन्हें उनका ओछापन।’चार–‘हमें तो उसका शोक मनाने का हक भी नहींहम तो उसे ठीक से जानते तक नहींहमने कभी उसे देखा तक नहीं कि किस हाल में वह जीता था/किस तरह मरता था, क्यों लड़ता थाजब उसे इंतजार था हमारा तो हम दूर खड़े रहेउसकी आत्मा से बेखबर या बेपरवाहकोई नहीं जानता जिस बैनर से वह ताकत हासिल करता थाउसे मौत की रस्सी में बदलने से पहलेउसने कितनी रस्सियाँ थामने की कोशिश की होंगीउस सर्द एहसास तक पहुँचने से पहलेजिसमें कोई उदासी नहीं होतीसिर्फ निचाट अकेलापन होता हैउसने कितनी बार शब्दों की आँच से ऊष्मा चाही होगीजब उसे यह छोटी-सी डोर भी छिनती लगीतो उसने यह रस्सी बनाईऔर चला गया सब कुछ छोड़करजान देकर ही असल में उसने हासिल की वह जिंदगीजिसका वह जीते-जी हकदार था और जो हक हमसे अदा न हुआ।’पाँच–‘लेकिन एक दिन यह कर्ज इतिहास को चुकाना होगाएक दिन एकलव्य लौटेगा अपना रिसता हुआ अँगूठा माँगनेएक दिन रोम स्पार्टाकस का होगाएक दिन शंबूक वाल्मीकि के सामने खड़ा होगापूछेगा आदिकवि सेकिस अपराध में एक महाकाव्य पर उसके खून के छींटे डाले गएअपने खून से जो स्याही तुमने बनाई है रोहित वेमुलाएक दिन वो भी काम आएगी।’

Ep 89Jal Prapat Hai Sameep | Vinod Kumar Shukla
जल प्रपात है समीप - विनोद कुमार शुक्ल जल प्रपात है समीप जल बिंदु के साथ हवा का झोंका आ रहा है ।जलप्रपात अपनी जलप्रपात ध्वनि सेसब ध्वनियों को निस्तब्ध कर रहा है ।वहाँ जाने के पहलेजो कुछ कहना सुन्ना हैकह सुन लिया गया कि जलप्रपात के पासकेवल जलप्रपात ध्वनि को सुना जाता हैइस भाषा को पुरखे सुन चुके होते हैंऔर पीढ़िया सुनने वाली होती हैं अलावा कुछ भी सुनाई नहीं देता।तब भी प्रपात के पास पेड़ कि पत्ती से इकट्ठी हुई बूँद -के टपकने कि आवाज़ होती होगी।चिड़िया चहचहाती है जिसकी चहचहाहट सुनाई नहीं देतीऔर चिड़िया के बच्चे जवाब दे रहे होते हैं।एक गीली काली चट्टान के नीचे से निकल कर एक कीड़ा भीबोल रहा होगासब अपनी आवाज़ बोल रहे होते हैंवहाँ मै कोरस गाता हूँ ।

Ep 88Barf Bahar Gir Rahi Hai | Nandkishore Acharya
बर्फ़ बाहर गिर रही है - नंदकिशोर आचार्य बर्फ़ बाहर गिर रही है, यह अलाव भी बुझ चला सा हैएक अधजली लकड़ी से मैं झाड़ता हूँ राखबुझ रही लकड़ियों को नए क्रम में पुन: चुनता हूँफूँक से जगाता हूँ आग सोई हुईएक धीमा ताप सब पर व्याप जाता हैमीठा और उदास, बर्फ़ बाहर गिर रही होगी।

Ep 87Ullanghan | Rajesh Joshi
उल्लंघन - राजेश जोशी उल्लंघन कभी जानबूझकर किये और कभी अनजाने में बंद दरवाज़े बचपन से ही मुझे पसंद नहीं रहेएक पाँव हमेशा घर की देहरी से बाहर ही रहा मेरा व्याकरण के नियम जानना कभी मैंने ज़रूरी नहीं समझा और इसी कारण मुझे दीमक के कीड़ों को खाने की लत नहीं लगी और किसी व्यापारी के हाथ मैंने अपना पंख देकर उन्हें खरीदा नहीं बहुत मुश्किल से हासिल हुई थी आज़ादी और उससे भी मुश्किल था हर वक़्त उसकी हिफाज़त करना कोई न कोई बाज़ झपट्टा मारने, आँख गड़ाए बैठा ही रहता था किसी न किसी डगाल परकोई साँप रेंगता हुआ चुपचाप चला आता था घोंसले तक अंडे चुराने मैंने तो अपनी आँख ही तब खोली जब सविनय अवज्ञा के आह्वान पर सड़कों पर निकल आया देश उसके नारे ही मेरे कानों में बोले गए पहले शब्द थे मुझे नहीं पता मैं कितनी चीज़ों को उलांघ गया उलांघी गई चीज़ों की बाढ़ रुक जाती है ऐसा माना जाता था कई बार लगता है कि उल्लंघन की प्रक्रिया उलटबाँसी बनकर रह गई है हमारे मुल्क मेंहमने सोचा था कि लाँघ आए हैं हम बहुत सारी मूर्खताओं को अब वो कभी सिर नहीं उठाएंगी लेकिन एक दिन वो पहाड़ सी खड़ी नज़र आईं और हम उनकी तलहटी में खड़े बौने थे लेकिन ये न समझना कि मैं हताश होकर बैठ जाऊँगा उल्लंघन की आदत तो मेरी रग-रग में मौजूद है बंदर से आदमी बनने की प्रक्रिया के बीच इसे अपने पूर्वजों से पाया है मैंने मैं एक कवि हूँ और कविता तो हमेशा से ही एक हुक़्म-उदूली है हुक़ूमत के हर फ़रमान को ठेंगा दिखाती कविता उल्लंघन की एक सतत प्रक्रिया है व्याकरण के तमाम नियमों और भाषा की तमाम सीमाओं का उल्लंघन करती ये अपनेआप ही पहुँच जाती है वहाँ जहाँ पहुँचने के बारे में कभी सोचा भी नहीं था मैंने एक कवि ने कहा था कभी कि स्वाधीनता घटना नहीं, प्रक्रिया है उसे पाना होता है बार-बार, लगातार तभी से न जाने कितने नियमों की अविनय-सविनय अवज्ञा करता पहुँचा हूँ मैं यहाँ तक।

Ep 86Kavita Si Rachi Ma | Suryabala
कविता सी रची माँ - सूर्यबाला सुनो, मुझे समय का सिर्फ एक पृष्ठ सहज लेने दो जिस पर कविता सी रची है मेरी माँ वह पृष्ठ फड़फड़ाता है जो किसी ऊँची डाल से हरसिंगार चढ़ती लोरी के बूंदों की तरह और खो सी जाती हूँसोन चिड़िया सी मैवह पृष्ठ, ऊँची डाल और वे लोरी के बोल नहीं सहेजे गए न ,तो लोरियां कहाँ आकर गाएंगी?और ऋतुएं कहाँ से सुनाएंगी ?वन पाखी सी !तो सुनो, मुझे समय का सिर्फ एक पृष्ठ सहज लेने दो

Ep 85Yeh Bhi Prem Kavitayein | Priyadarshan
यह भी प्रेम कविताएँ / प्रियदर्शन ‘ये भी प्रेम कविताएँ’ एक–‘प्रेम को लेकर इतनी सारी धारणाएँ चल पड़ी हैंकि ये समझना मुश्किल हो गया है कि प्रेम क्या हैएक धारणा कहती है, सबसे करो प्रेमदूसरी धारणा बोलती है, बस किसी एक से करो प्रेमतीसरी धारणा मानती है, प्रेम किया नहीं जाता हो जाता हैएक चौथी धारणा भी है, पहला प्रेम हमेशा बना रहता हैबशर्ते याद रह जाए कि कौन-सा पहला था या प्रेम थापाँचवीं धारणा है, प्रेम-व्रेम सब बकवास है, नजरों का धोखा हैअब वो शख्स क्या करे जिसे इतनी सारी धारणाएँ मिल जाएँऔर प्रेम न मिले या मिले तो प्रेम को पहचान न पाएया जिसे प्रेम माने, वह प्रेम जैसा हो, लेकिन प्रेम न निकलेक्या वाकई जो प्रेम करते हैं वे प्रेम कविताएँ पढ़ते हैंया प्रेम सिर्फ उनकी कल्पनाओं में होता हैलेकिन कल्पनाओं में ही हो तो क्या बुरा हैआखिर कल्पनाओं से ही तो बनती है हमारी जिंदगीशायद ठोस कुछ कम होती हो, मगर सुंदर कुछ ज्यादा होती हैऔर इसमें यह सुविधा होती है कि आप अपने दुनिया को, अपने प्रेम कोमनचाहे ढंग से बार-बार रचें, सिरजें और नया कर देंहममें से बहुत सारे लोग जीवन भर कल्पनाओं में ही प्रेम करते रहेऔर शायद खुश रहे कि इस काल्पनिक प्रेम ने भी किया उनका जीवन समृद्ध।दूसरा–‘जो न ठीक से प्रेम कर पाए न क्रांतिवे प्रेम और क्रांति को एक तराजू पर तौलते रहेबताते रहे कि प्रेम भी क्रांति है और क्रांति भी प्रेम हैकुछ तो ये भरमाते रहे कि क्रांति ही उनका पहला और अंतिम प्रेम हैकविता को भी अंतिम प्रेम बताने वाले दिखेप्रेम के नाम पर शख्सियतें भी कई याद आती रहींमजनूँ जैसे दीवाने और लैला जैसी दु:साहसी लड़कियाँऔर इन दोनों से बहुत दूर खड़ा और शायद बेखबर भीअपना कबीर जो कभी राम के प्रेम में डूबा मिलाऔर कभी सिर काटकर प्रेम हासिल करने की तजवीज़ बताता रहान जाने कितनी प्रेम कविताएँ लिखी गईंन जाने कितने प्रेमी नायक खड़े हुएन जाने कितने फिल्मों में कितनी-कितनी बारकितनी-कितनी तरह से कल्पनाओं केसैकड़ों इंद्रधनुषी रंग लेकर रचा जाता रहा प्रेमलेकिन जिन्होंने किया उन्होंने भी पाया/परेम का इतना पसरा हुआ रायता किसी काम नहीं आयाजब हुआ, हर बार बिल्कुल नया-सा लगाजिसकी कोई मिसाल कहीं हो ही नहीं सकती थीजिसमें छुआ-अनछुआ जो कुछ हुआ, पहली बार हुआ।तीसरा–‘वे जो घरों को छोड़कर, दीवारों को फलाँग करजातियों और खाप को अँगूठा दिखाकरएक दिन भाग खड़े होते हैंवे शायद अपने सबसे सुंदर और जोखिम भरे दिनों मेंछुपते-छुपाते कर रहे होते हैंअपनी जिंदगी का सबसे गहरा प्रेमवे बसों, ट्रेनों, होटलों और शहरों को अदलते-बदलतेइस उम्मीद के भरोसे दौड़ते चले जाते हैंकि एक दिन दुनिया उन्हें समझेगी, उनके प्रेम को स्वीकार कर लेगीये हमारे लैला-मजनूँ, ये हमारे शीरीं-फ़रहाद, ये हमारे रोमियो-जूलियटनहीं जानते कि वे सिर्फ प्रेम नहीं कर रहेएक सहमी हुई दुनिया कोउसकी दीवारों का खोखलापन भी दिखा रहे होते हैंवे नहीं समझते कि उन दो लोगों का प्रेमकैसे उस समाज के लिए खतरा हैजिसकी बुनियाद में प्रेम नहीं घृणा हैबराबरी नहीं दबदबा है, साझा नहीं बँटवारा हैवे तो बस कर रहे होते हैं प्रेमजिसे अपने ही सड़ाँध से बजबजाती और दरकती हुईएक दुनिया डरी-डरी देखती हैऔर जल्द से जल्द इसे मिटा देना चाहती है।’

Ep 84Farz Karo | Ibn-e-Insha
फ़र्ज़ करो - इब्न इ इंशा फ़र्ज़ करो हम अहले वफ़ा हों, फ़र्ज़ करो दीवाने हों फ़र्ज़ करो ये दोनों बातें झूठी हों अफ़साने होंफ़र्ज़ करो ये जी की बिपता, जी से जोड़ सुनाई हो फ़र्ज़ करो अभी और हो इतनी, आधी हमने छुपाई होफ़र्ज़ करो तुम्हें ख़ुश करने के ढूंढे हमने बहाने हों फ़र्ज़ करो ये नैन तुम्हारे सचमुच के मयख़ाने होंफ़र्ज़ करो ये रोग हो झूठा, झूठी पीत हमारी हो फ़र्ज़ करो इस पीत के रोग में सांस भी हम पर भारी होफ़र्ज़ करो ये जोग बिजोग का हमने ढोंग रचाया हो फ़र्ज़ करो बस यही हक़ीक़त बाक़ी सब कुछ माया हो

Ep 83Khandahar Par Hariyali | Nandkishore Acharya
खंडहर पर हरियाली - नंदकिशोर आचार्य यूँ ही आ गई थी तुमखंडहर पर हरियाली आ जाए बरसात में जैसेइसलिए लौट ही जाना था तुमकोऔर खंडहर करती हुई मुझे।

Ep 75Sapney | Dr Vishwanath Prasad Tiwari
सपने - विश्वनाथ प्रसाद तिवारीकैसे कटती हैं उनकी रातेंजो सपने नहीं देखते?सपने आकाश की तरह अनंतसपने क्षितिज की तरह अजनबीसपने बच्चों की तरह मुलायमसपने परियों की तरह पंख फैलाएसपने कोहरे में सोए जंगलों की तरहउगते दिन की तरह सपनेकहते हैं वेअपने सपने बेच दोक्या खरीदूँगा मैंअपने सपने बेचकर?

Ep 82Genhui Kalaiyon Mein Kaamdani Chudiyan | Suryabala
गेहुंई कलाइयों में कामदानी चूड़ियाँ - सूर्यबाला यादें भी अजीब हैं....कभी लोरी बनती हैंकभी घोडे की जीन।....जरा ऐड़ लगाते हीझालरदार इक्के के साथसरपट भागती हैं...हिट-हिट, हुर्र-हुर्र, बड़ी, छोटी बहनें बैठीं-खिल-खिल बतियाती हैंगेहुईं कलाइयों में कामदानी चूड़ियांफूलदार फ्रॉक और लाल पीले रिबनों में गूंजती मिठ बोलियांअध फूटी सड़कों परखदराते पहियेजंगल जलेबियां औरचिलबिल के भीटे..... पोखर शिवाले सेबावड़ी की सीडियों तकचढती उतरती जब लौटती थीं बेटियां-(तब उन्हें)दूर से ही नजर आता था,बाबूजी का चश्मा-और मां के हाथों में थमी लालटेन!....हां, यादें भी अजीब है-सहेज कर रखती हैसमय की पिटारी मेंबाबू जी का चश्माऔर मां के हाथों में थमी लालटेन!....

Ep 81Chinta | Priyadarshan
चिंताएँ कभी खत्म नहीं होतींनींद में भी घुसपैठ कर जाती हैंधूसर सपनों वाले कपड़े पहनकरजागते समय साथ-साथ चला करती हैंकभी-कभी उनके दबाव कुछ कम हो जाते हैंतब फैला-फैला लगता है आकाश, प्यारी प्यारी लगती है धूपनरम मुलायम लगती है धरतीलेकिन जब कभी बढ़ जाती हैं चिंताएँबाकी कुछ जैसे सिकुड़ जाता है हवा भी भारी हो जाती हैसाँस लेने में लगती है मेहनतएक एक कदम बढ़ाना पहाड़ चढ़ने के बराबर मालूम होता हैकहाँ से पैदा होती है चिंता?क्या हमारे भीतर बसे आदिम डर से?या हमारे बाहर बसे आधुनिक समय से?या हमारे चारों ओर पसरे इस दुनिया सेजो दरअसल बनने-टूटने कितने खत्म होने वाले सिलसिले का नाम हैया निजी उलझनों के जाल से या बाहरी जंजाल सेहमारे स्वभाव से या दूसरों के प्रभाव से?कभी कभी ऐसे भी वक्त आते हैंजब बिल्कुल चिंतामुक्त होता है आदमीएक तरह के सूफियाना आत्मविश्वास से भरा हुआकि जो भी होगा निबट लेंगेएक तरह की अलमस्त फक्कड़ता से लैसकि ऐसी कौन सी चिंता है जो जिंदगी से बड़ी हैकभी इस दार्शनिक खयाल को जीता हुआकि चिंता है तो जिंदगी हैलेकिन जिंदगी है इसलिए चिंता जाती नहींकुछ न हो तो इस बात की शुरू हो जाती हैकि पता नहीं कब तक बचा रहेगा चिंतामुक्त समयबस इतनी सी बात समझ में आती हैआदमी है तो इसलिए चिंता है।

Ep 74Aaj Nadi Bilkul Udaas Thi | Kedarnath Agarwal
आज नदी बिलकुल उदास थी - केदारनाथ अग्रवालआज नदी बिलकुल उदास थी।सोई थी अपने पानी में,उसके दर्पण पर-बादल का वस्त्र पडा था।मैंने उसको नहीं जगाया,दबे पांव घर वापस आया।

Ep 80Atma Ke Garbh Mein | Nandkishore Acharya
आत्मा के गर्भ में - नंदकिशोर आचार्यचारों खूँट फैलातप रहा मरूथलआवें की तरह भीतर ही भीतरक्या पकाता है ?बोलो, तुम्हीं कुछ बोलो,प्रजापति !मेरी आत्मा के गर्भ मेंक्या धर दिया पकनेमेरे ही पसार के चाक पर घड़ कर ?ये आवाँ कभी तो खोलो,प्रजापति !मुझ में कभी तो हो लो !

Ep 73Shabd Batao, Katha, Akela Mela | Ramesh Chandra Shah
रमेशचंद्र शाह - शब्द बताओ कहना क्या हैशब्द बताओ कहना क्या शब्द बताओ गहना क्या है।मेरा तुम्हें तुम्हारा मुझे उलेहना क्या है शब्द बताओ कहना क्यों हैशब्द बताओ सहना क्यों हैतुमने हमको हमने तुमको पहना क्यों है? कथा खुला घर हैएक साँकल भर लगी हैलौट आएगी अभी माँवह गई है कथा सुननेयहीं ठाकुरद्वार!चल रही है कथा अब भीढल रही है कथा अब भीफूल आते फूल जातेबेल सा मुझ पर चढ़ा संसारहाथ साँकल तक पहुँच कर रह गया ठिठकाकिस कथा के बीचकिस कथा के व्योम में छिटकाफूल आते फूल जाते बेल सा मुझपर चढ़ा संसारकहाँ किसकी कथा, कैसी, कहाँ ठाकुरद्वार! अकेला मेला गोद लिए सन्नाटा, देहरी मोह अकेला मेला। गोद लिए सन्नाटा देहरी मोक अकेला मेलाधूप धूल तारों कीपता नहीं यह किसका घर है, किसका खंडहरलहर ले रहा है समुद्र पत्थर काबस इतना ही जुड़ा और इतना ही बिखराझूल रहा हूँ तार तार में आर पार अपने हीचौतरफा बिखरे आलों से झाँक रहा है बचपन!

Ep 77Sadi Samvaad | Suryabala
सदी संवाद | सूर्यबाला आधी सदी पहले-वह मेरा छुटंका देवररसोई के दरवाजे पर डंका सा पीटता था-कि उसे स्कूल की देरी हो रही है और बाइस की मैं-सहमी, सकपकाई-चूल्हे से फूली गरम रोटियां निकालउसकी थाली में सरकाती थीऔर फिर नल की धार में भाप से जली अपनी उँगलियाँ ठंडाती थी-छज्जे से देखता मेरा पति,मन ही मन आश्वस्त हो लेता थाकि यह स्त्री, उसका कुटुंब संभाल ली जा रही हैआधी सदी बाद - खिचड़ाए बालों वाला वह मेरा अधेड़ देवर अब मेरे पैरों को इस तरह छूता है कि-उन्हें मंदिर की देहरी बना देता है ।....औरजूते के तस्में बांधता मेरा पति रूंधे गले से सोचता है-‘यह भाई’ ‘इस स्त्री’ की संभाल कर ले जाएगा......

Ep 76Jo Pul Banayenge | Agyega | Dr Anunaya Chaubey
जो पुल बनाएंगे - अज्ञेयजो पुल बनाएँगेवे अनिवार्यत:पीछे रह जाएँगे।सेनाएँ हो जाएँगी पारमारे जाएँगे रावणजयी होंगे राम,जो निर्माता रहेइतिहास मेंबन्दर कहलाएँगे।

Ep 79Prem Aur Ghruna | Priyadarshan
प्रियदर्शन - प्रेम और घृणाप्रेम पर सब लिखते हैं,घृणा पर कोई नहीं लिखता,जबकि कई बार प्रेम से ज्यादा तीव्र होती है घृणाप्रेम के लिए दी जाती है शाश्वत बने रहने की शुभकामना,लेकिन प्रेम टिके न टिके, घृणा बची रहती है।कई बार ऐसा भी होता हैकि पहली नज़र में जिनसे प्रेम होता हैदूसरी नज़र में उनसे ईर्ष्या होती हैऔरअंत में कभी-कभी वह घृणा तक में बदल जाती है।यह तजबीज कभी काम नहीं आतीकि सबसे प्रेम करो, ईर्ष्या किसी से न करोऔर घृणा से दूर रहो।हमारे समय में नहीं, शायद हर समयप्रेम की परिणतियां कई तरह की रहींकभी-कभी ईर्ष्या भी बदलती रही प्रेम मेंलेकिन ज़्यादातर प्रेम बदलता रहाकभी-कभी ईर्ष्या और घृणा तक मेंऔर अक्सर ऊब और उदासी में।हालांकि कामना यही करनी चाहिएकि इस परिणति तक न पहुँचे प्रेमऔर कई बार ऐसा होता भी हैकि ऊब और उदासी और ईर्ष्या और नफऱत के नीचेभी तैरती मिलती है एक कोमल भावनाजिसे ज़िन्दगी की रोशनी सिर्फ़ प्रेम की तरह पहचानती है।

Ep 78Bansuri Morpankh | Nandkishore Acharya
बाँसुरी: मोरपाँख - नंदकिशोर आचार्यबुरा तो नहीं मानोगेयदि मुझे अबतुम्हारी बाँसुरी बने रहनास्वीकार नहीं।यह नहीं कि मैं उपेक्षित हुआबल्कि अधरों पर तुम्हारे सदासज्जित रहा,किन्तु मेरा कब रहा संगीत वहजो मेरे ही रन्ध्र-रन्ध्र से बहा ?मुझे से तो अच्छी रहीवह मोरपाँखजो तुम्हारे मुकुट पर चढ़ीऔर न भी चढ़तीपर जिस का सौन्दर्यउस का अपना था।यह अन्तर क्या कम हैकि तुम्हारा संगीतमेरी विवशता हैऔर मोरपाँख का सौन्दर्यतुम्हारी ?बुरा न माननाकि अब मैंतुम्हारी बाँसुरी नहीं रहा

Ep 69Dharm hai | Gopaldas Neeraj
धर्म है - गोपालदास "नीरज"जिन मुश्किलों में मुस्कुराना हो मना,उन मुश्किलों में मुस्कुराना धर्म है।जिस वक़्त जीना गैर मुमकिन सा लगे,उस वक़्त जीना फर्ज है इंसान का,लाजिम लहर के साथ है तब खेलना,जब हो समुन्द्र पे नशा तूफ़ान काजिस वायु का दीपक बुझना ध्येय होउस वायु में दीपक जलाना धर्म है।हो नहीं मंजिल कहीं जिस राह कीउस राह चलना चाहिए इंसान कोजिस दर्द से सारी उम्र रोते कटेवह दर्द पाना है जरूरी प्यार कोजिस चाह का हस्ती मिटाना नाम हैउस चाह पर हस्ती मिटाना धर्म है।आदत पड़ी हो भूल जाने की जिसेहर दम उसी का नाम हो हर सांस परउसकी खबर में ही सफ़र सारा कटेजो हर नजर से हर तरह हो बेखबरजिस आँख का आखें चुराना काम होउस आँख से आखें मिलाना धर्म है।जब हाथ से टूटे न अपनी हथकड़ीतब मांग लो ताकत स्वयम जंजीर सेजिस दम न थमती हो नयन सावन झड़ीउस दम हंसी ले लो किसी तस्वीर सेजब गीत गाना गुनगुनाना जुर्म होतब गीत गाना गुनगुनाना धर्म है।

Ep 66Mat Kaho Akash Me | Dushyant Kumar
मत कहो, आकाश में कुहरा घना है - दुष्यंत कुमारमत कहो, आकाश में कुहरा घना है,यह किसी की व्यक्तिगत आलोचना है ।सूर्य हमने भी नहीं देखा सुबह से,क्या करोगे, सूर्य का क्या देखना है ।इस सड़क पर इस क़दर कीचड़ बिछी है,हर किसी का पाँव घुटनों तक सना है ।पक्ष औ' प्रतिपक्ष संसद में मुखर हैं,बात इतनी है कि कोई पुल बना हैरक्त वर्षों से नसों में खौलता है,आप कहते हैं क्षणिक उत्तेजना है ।हो गई हर घाट पर पूरी व्यवस्था,शौक से डूबे जिसे भी डूबना है ।दोस्तों ! अब मंच पर सुविधा नहीं है,आजकल नेपथ्य में संभावना है ।

Ep 60Joote | Naresh Saxena | Varun Grover
जूते - नरेश सक्सेना जिन्होंने खुद नहीं कीं अपनी यात्राएँ,दूसरों की यात्रा के साधन बने रहे एक जूते का जीवन जिया जिन्होंने यात्रा के बाद उन्हें छोड़ दिया गया, घर के बाहर।

Ep 51Prem Ki Jagah Anishchit Hai | Vinod Kumar Shukla
प्रेम की जगह अनिश्चित है - विनोद कुमार शुक्लप्रेम की जगह अनिश्चित हैयहाँ कोई नहीं होगा की जगह भी नहीं है।आड़ की ओट में होता हैकि अब कोई नहीं देखेगापर सबके हिस्से का एकांतऔर सबके हिस्से की ओट निश्चित है।वहाँ बहुत दोपहर में भीथोड़ा-सा अंधेरा हैजैसे बदली छाई होबल्कि रात हो रही हैऔर रात हो गई हो।बहुत अंधेरे के ज्यादा अंधेरे मेंप्रेम के सुख मेंपलक मूंद लेने का अंधकार हैअपने हिस्से की आड़ मेंअचानक स्पर्श करतेउपस्थित हुएऔर स्पर्श करते, हुए बिदा।

Ep 71Bejagah | Anamika
बेजगह - अनामिका “अपनी जगह से गिर कर कहीं के नहीं रहते केश, औरतें और नाख़ून”— अन्वय करते थे किसी श्लोक को ऐसे हमारे संस्कृत टीचर। और मारे डर के जम जाती थीं हम लड़कियाँ अपनी जगह पर। जगह? जगह क्या होती है? यह वैसे जान लिया था हमने अपनी पहली कक्षा में ही। याद था हमें एक-एक क्षण आरंभिक पाठों का— राम, पाठशाला जा! राधा, खाना पका! राम, आ बताशा खा! राधा, झाड़ू लगा! भैया अब सोएगा जाकर बिस्तर बिछा! अहा, नया घर है! राम, देख यह तेरा कमरा है! ‘और मेरा?’ ‘ओ पगली, लड़कियाँ हवा, धूप, मिट्टी होती हैं उनका कोई घर नहीं होता। जिनका कोई घर नहीं होता— उनकी होती है भला कौन-सी जगह? कौन-सी जगह होती है ऐसी जो छूट जाने पर औरत हो जाती है। कटे हुए नाख़ूनों, कंघी में फँस कर बाहर आए केशों-सी एकदम से बुहार दी जाने वाली? घर छूटे, दर छूटे, छूट गए लोग-बाग कुछ प्रश्न पीछे पड़े थे, वे भी छूटे! छूटती गई जगहें लेकिन, कभी भी तो नेलकटर या कंघियों में फँसे पड़े होने का एहसास नहीं हुआ! परंपरा से छूट कर बस यह लगता है— किसी बड़े क्लासिक से पासकोर्स बी.ए. के प्रश्नपत्र पर छिटकी छोटी-सी पंक्ति हूँ— चाहती नहीं लेकिन कोई करने बैठे मेरी व्याख्या सप्रसंग। सारे संदर्भों के पार मुश्किल से उड़ कर पहुँची हूँ ऐसी ही समझी-पढ़ी जाऊँ जैसे तुकाराम का कोई अधूरा अंभग!

Ep 70Shakkar Si Yaad | Suryabala
शक्कर सी याद - सूर्यबाला धुली-धुली शक्कर सी याद-तन-मन में रच रही मिठास।आओ सब, बैठो मेरे पाससुनो कहानी....न राजा, न रानी....न मोती, न माणिकबस एक अधफूटे जीनेऔर उखड़े पलस्तर वाले घर की-अधफूटी मुंडेरों से सर्र-सर्र उड़ती पतंगों की-फर-फर पतंगें, जैसी मेरी पंचरंग चुनर....मां ने रंगवाई, जतन से पहनाई।हल्दी-दूब, धान-पानकुमकुम से भरी मांग कैसी तो जगर-मगरटोने-टोटके और काजल के टीके से सँवर-देख लो, तब से अब तकजस की तस....देहरी से पनघटऔर खेत खलिहान तकमिठबोलियों की लहलहाती फसल....क्या कहते हो राहगीर?कहाँ चलते हैं छुरे-गंडासे?कहाँ फूटते हैं बम!!किस देस? किस नगर? किस डगर?वह न होगा हमारा घर, हमारा शहर-हमारे पास तो सिर्फ मुट्ठी भर अबीरअनार, फुलझड़ियाँ, बस!लेकिन रुको!तुम जाना क्यों चाहते हो उस देस? उस डगर?मेरी मानो, मत जाओ....रुक जाओ-यहीं हमारे घर.......नहीं, छोटा नहीं पड़ेगा यहक्योंकि आज तक कभी पड़ा ही नहीं।कभी कोई उदास लौटा नहीं-ऐसा है यह घर, ये नगर, ये दर-खाने पीने को भी इफरात है-मक्की जई, गुड़ अचारलइया चना दही भात-अजीब देश है भइया यहयहां खुशियां पतंगों की तरहदस बीस पैसों में खरीदी जाती हैं-और छरहरे आसमान में-जीभर कर उड़ाई जाती हैं-और तो और- दो-चार कट भी गईं तो-लूट-लूट कर दुछत्ती में रख ली जाती हैं।खुशियाँ...खुशियाँ...खुशियाँ

Ep 59Baad | Damodar Khadse
बाढ़ - दामोदर खड़से बाढ़ जब तोड़ती है दरवाज़े बड़े-बड़े बांधों के तब नन्हें-नन्हें गाँव काले बादलों की नीयत समझ जाते हैं पानी का रंग दिमाग बदरंग कर जाता हैपानी जीवन भी है बिजली भी पानी नहर और झील भी है पानी नाचता हुआ समंदर और मदमस्त बादल है पानी पानी, पानी यानी सबकुछ है पर जब बाढ़ आती है, पानी के विवेक पर प्रश्नचिन्ह लगा जाती है बाढ़ नदी-नालों का पानी समेट बहुमत पा जाती है और अपने आप को बहाव के हाथों सौंप जाती है गति जब छूट जाती है पानी के हाथों से पानी विक्राल हो जाता है तब प्यास भी पानी से घबराती है किनारे जल-समाधि को मजबूर हो जाते हैं फसलें उखड़ने लगती हैं वर्तमान काला और भविष्य अंधा हो जाता है भूतकाल से तब उठती हैं सवालों की प्रतिध्वनियाँ तब रिश्तों को रतौंधी हो जाती है और चांदनी रातों में भी बाढ़ अपनी राह निकालने के लिए सरपट काले आँसू दौड़ाती है ऐसे में भरे-पूरे वृक्ष भी हरहराकर टूट पड़ते हैं विवश डूबती आँखें विप्लव के दृश्य देखती हैं सुनों, रिश्तों में भी कभी-कभी ऐसा ही होता है पता नहीं क्या है जो आदमी को बाढ़ की तरह दौड़ाता है और उसी की आँखों से उसे विप्लव दिखाता है पर घबराओं नहीं, इधर देखो नन्हें-नन्हें दूब के पौधे अपनी ज़मीन से किस तरह जुड़े हैं वर्तमान की आँखों में उभरते नहीं होंगे वे पर उनकी रेशमी जड़ें अपनी धरती से जुड़ी हैं विप्लव के बाद भी नई ऊर्जा से उठते हैं वे सृष्टि ऐसे ही पैधों में पाती है सार्थकता आओ, ऐसी अंधी बाढ़ में हम इन कत्थई कोपलों की रक्षा करें धरती हरी-भरी ही अच्छी लगती है।

Ep 56Naye Kavi ka Dukh | Kedarnath Singh
नए कवि का दुख - केदारनाथ सिंहदुख हूँ मैं एक नए हिंदी कवि काबाँधोमुझे बाँधोपर कहाँ बाँधोगेकिस लय, किस छंद में?ये छोटे-छोटे घरये बौने दरवाज़ेताले ये इतने पुरानेऔर साँकल इतनी जर्जरआसमान इतना ज़रा-साऔर हवा इतनी कम-कमनफ़रत यह इतनी गुमसुम-सीऔर प्यार यह इतना अकेलाऔर गोल-मोलबाँधोमुझे बाँधोपर कहाँ बाँधोगेकिस लय, किस छंद में?क्या जीवन इसी तरह बीतेगाशब्दों से शब्दों तकजीनेऔर जीने और जीने और जीने केलगातार द्वंद में?

Ep 65Belly Dancer | Dinesh Kumar Shukla
बेली डान्सर - दिनेश कुमार शुक्लबमाको शहर केखण्डहरों में मेरा जन्म हुआमाली के प्राचीन परास्त राजकुल में ...माँ के सूखते स्तनों सेमिला मुझे मज्जा का स्वाद,जब गोद में ही थी मैंसुनी मैंने मृत्यु की पहली पदचापक्षयग्रस्त माँ की मंद होती धड़कन में,गोद में ही लग गई लत मुझेज़िंदा बने रहने कीसूखी हुई घास, कटीली नागफनी औरठुर्राई झाड़ियों की मिट्टी ने पाला पोसा मुझेसीखा मैंने ज़हरीले साँपों को भून कर खानाचट्टानों से पाया मैंने नमकसहारा की रेत से बनी मेरी हड्डियाँओ हड्डी-की-खाद के सौदागरतुम मुझे क्यों घूरते हो इस तरह!दास प्रथा का तो अन्त हुएबीत गये कितने सालकहते हैं अफ्रीका भीअब बिल्कुल आज़ाद हैअब मुझे भी गिनती आती हैओ पेट्रोल के सौदागरतुम्हारी आँखों में क्यों इतनी आग हैकि हमारी दुनिया ही ख़ाक हुई जाती हैमुझे अपनी सिगरेट के धुएँ में डुबाते हुएमेरे भाइयों से तुम्हें क्यों नहीं लगता डर !कोई हिरनी क्या दौड़ेगी मुझसे तेज़ चने-सा चबा सकती हूँ बंदूक के छर्रेतड़ित् को तो रोज चकित करती हूँअपने चपल नृत्य सेदरअस्ल तुम्हें चीर सकती हूँ मैं शेरनी की तरहफिर भी तुमअपनी जन्मांध आँखों सेमुझे निर्वस्त्र किये जाते होक्या तुम्हें अपनी ज़िन्दगी प्यारी नहींओ सभ्यताओं के सौदागर।कैसे, कैसे हुए तुम इतने निद्र्वन्द्व !एक के बाद एक सीमा लाँघतेपृथ्वी और स्त्रियों कोकरते हुए पयर्टित पद्दलितदेखते हुए मेरा निर्वस्त्र नाचपेट के लिए पेट-का-नाचमेरी देह की थिरकती माँसपेशियाँमछलियाँ हैंजिनकी हलक में धँस गया लोहे का काँटा,खून के कीचड़ सेभर गया है रंगमंच लथपथजुगुप्सा के इतने व्यंजनों के बीचतुम्हारे सिवा और कौन हो सकता था इतना लोलुपओ लोहे बारूद और मृत्यु के सौदागर !

Ep 55Antim Unchai | Kunwar Narayan
अंतिम ऊँचाई - कुँवर नारायणकितना स्पष्ट होता आगे बढ़ते जाने का मतलबअगर दसों दिशाएँ हमारे सामने होतीं,हमारे चारों ओर नहीं।कितना आसान होता चलते चले जानायदि केवल हम चलते होतेबाक़ी सब रुका होता।मैंने अक्सर इस ऊलजलूल दुनिया कोदस सिरों से सोचने और बीस हाथों से पाने की कोशिश मेंअपने लिए बेहद मुश्किल बना लिया है।शुरू-शुरू में सब यही चाहते हैंकि सब कुछ शुरू से शुरू हो,लेकिन अंत तक पहुँचते-पहुँचते हिम्मत हार जाते हैं।हमें कोई दिलचस्पी नहीं रहतीकि वह सब कैसे समाप्त होता हैजो इतनी धूमधाम से शुरू हुआ थाहमारे चाहने पर।दुर्गम वनों और ऊँचे पर्वतों को जीतते हुएजब तुम अंतिम ऊँचाई को भी जीत लोगे—जब तुम्हें लगेगा कि कोई अंतर नहीं बचा अबतुममें और उन पत्थरों की कठोरता मेंजिन्हें तुमने जीता है—जब तुम अपने मस्तक पर बर्फ़ का पहला तूफ़ान झेलोगेऔर काँपोगे नहीं—तब तुम पाओगे कि कोई फ़र्क़ नहींसब कुछ जीत लेने मेंऔर अंत तक हिम्मत न हारने में।

Ep 54Kitna Achha Hota Hai | Sarveshwar Dayal Saxena
कितना अच्छा होता है - सर्वेश्वरदयाल सक्सेनाकितना अच्छा होता हैएक-दूसरे को बिना जानेपास-पास होनाऔर उस संगीत को सुननाजो धमनियों में बजता है,उन रंगों में नहा जानाजो बहुत गहरे चढ़ते-उतरते हैं।शब्दों की खोज शुरू होते हीहम एक-दूसरे को खोने लगते हैंऔर उनके पकड़ में आते हीएक-दूसरे के हाथों सेमछली की तरह फिसल जाते हैं।हर जानकारी में बहुत गहरेऊब का एक पतला धागा छिपा होता है,कुछ भी ठीक से जान लेनाख़ुद से दुश्मनी ठान लेना है।कितना अच्छा होता हैएक-दूसरे के पास बैठ ख़ुद को टटोलना,और अपने ही भीतरदूसरे को पा लेना।

Ep 62Girna | Naresh Saxena
गिरना - नरेश सक्सेनाचीज़ों के गिरने के नियम होते हैं! मनुष्यों के गिरने के कोई नियम नहीं होते। लेकिन चीज़ें कुछ भी तय नहीं कर सकतीं अपने गिरने के बारे में मनुष्य कर सकते हैं बचपन से ऐसी नसीहतें मिलती रहीं कि गिरना हो तो घर में गिरो बाहर मत गिरो यानी चिट्ठी में गिरो लिफ़ाफ़े में बचे रहो, यानी आँखों में गिरो चश्मे में बचे रहो, यानी शब्दों में बचे रहो अर्थों में गिरो यही सोच कर गिरा भीतर कि औसत क़द का मैं साढ़े पाँच फ़ीट से ज़्यादा क्या गिरूँगा लेकिन कितनी ऊँचाई थी वह कि गिरना मेरा ख़त्म ही नहीं हो रहा चीज़ों के गिरने की असलियत का पर्दाफ़ाश हुआ सत्रहवीं शताब्दी के मध्य, जहाँ, पीसा की टेढ़ी मीनार की आख़िरी सीढ़ी चढ़ता है गैलीलियो, और चिल्ला कर कहता है— “इटली के लोगो, अरस्तू का कथन है कि भारी चीज़ें तेज़ी से गिरती हैं और हल्की चीज़ें धीरे-धीरे लेकिन अभी आप अरस्तू के इस सिद्धांत को ही गिरता हुआ देखेंगे गिरते हुआ देखेंगे, लोहे के भारी गोलों और चिड़ियों के हल्के पंखों, और काग़ज़ों को एक साथ, एक गति से गिरते हुए देखेंगे लेकिन सावधान हमें इन्हें हवा के हस्तक्षेप से मुक्त करना होगा...” और फिर ऐसा उसने कर दिखाया चार सौ बरस बाद किसी को कुतुबमीनार से चिल्लाकर कहने की ज़रूरत नहीं है कि कैसी है आज की हवा और कैसा इसका हस्तक्षेप कि चीज़ों के गिरने के नियम मनुष्यों के गिरने पर लागू हो गए हैं और लोग हर क़द और हर वज़न के लोग यानी हम लोग और तुम लोग एक साथ एक गति से एक ही दिशा में गिरते नज़र आ रहे हैं इसीलिए कहता हूँ कि ग़ौर से देखो, अपने चारों तरफ़ चीज़ों का गिरना और गिरो गिरो जैसे गिरती है बर्फ़ ऊँची चोटियों पर जहाँ से फूटती हैं मीठे पानी की नदियाँ गिरो प्यासे हलक़ में एक घूँट जल की तरह रीते पात्र में पानी की तरह गिरो उसे भरे जाने के संगीत से भरते हुए गिरो आँसू की एक बूँद की तरह किसी के दुख में गेंद की तरह गिरो खेलते बच्चों के बीच गिरो पतझर की पहली पत्ती की तरह एक कोंपल के लिए जगह ख़ाली करते हुए गाते हुए ऋतुओं का गीत “कि जहाँ पत्तियाँ नहीं झरतीं वहाँ वसंत नहीं आता” गिरो पहली ईंट की तरह नींव में किसी का घर बनाते हुए गिरो जलप्रपात की तरह टरबाइन के पंखे घुमाते हुए अँधेरे पर रोशनी की तरह गिरो गिरो गीली हवाओं पर धूप की तरह इंदधनुष रचते हुए लेकिन रुको आज तक सिर्फ़ इंदधनुष ही रचे गए हैं उसका कोई तीर नहीं रचा गया तो गिरो, उससे छूटे तीर की तरह बंजर ज़मीन को वनस्पतियों और फूलों से रंगीन बनाते हुए बारिश की तरह गिरो, सूखी धरती पर पके हुए फल की तरह धरती को अपने बीज सौंपते हुए गिरो गिर गए बाल दाँत गिर गए गिर गई नज़र और स्मृतियों के खोखल से गिरते चले जा रहे हैं नाम, तारीख़ें, और शहर और चेहरे... और रक्तचाप गिर रहा है देह का तापमान गिर रहा है गिर रही है ख़ून में मिक़दार होमोग्लोबीन की खड़े क्या हो बिजूके से नरेश, इससे पहले कि गिर जाए समूचा वजूद एकबारगी तय करो अपना गिरना अपने गिरने की सही वजह और वक़्त और गिरो किसी दुश्मन पर गाज की तरह गिरो उल्कापात की तरह गिरो वज्रपात की तरह गिरो मैं कहता हूँ गिरो।

Ep 53Kitab Padkar Rona | Raghuvir Sahai
किताब पढ़कर रोना - रघुवीर सहाय रोया हूँ मैं भी किताब पढ़कर केपर अब याद नहीं कि कौन-सीशायद वह कोई वृत्तांत थापात्र जिसके अनेकबनते थे चारों तरफ़ से मँडराते हुए आते थेपढ़ता जाता और रोता जाता था मैंक्षण-भर में सहसा पहचानायह पढ़ता कुछ और हूँरोता कुछ और हूँदोनों जुड़ गए हैं पढ़ना किताब काऔर रोना मेरे व्यक्ति कालेकिन मैंने जो पढ़ा थाउसे नहीं रोया थापढ़ने ने तो मुझमें रोने का बल दियादु:ख मैंने पाया था बाहर किताब के जीवन सेपढ़ता जाता और रोता जाता था मैंजो पढ़ता हूँ उस पर मैं नहीं रोता हूँबाहर किताब के जीवन से पाता हूँरोने का कारण मैंपर किताब रोना संभव बनाती है।

Ep 58Tum Likho Kavita | Damodar Khadse
तुम लिखो कविता | दामोदर खडसे तुम लिखो कविता और मैं देखूँ जी भरकर कलम, स्याही, कागज़ पर गुनगुनाता ज़िन्दगी का अनगाया गीत सफ़र के बहुत पीछे कोई गुमनाम मोड़ और इमली के पेड़ पर कटी हुई पतंग कबूतरों का जत्था, राह से उड़ती धूल मुड़-मुड़कर ठिठकते कदम लहराता हाथ कुछ-कुछ क़रीबी बहुत कुछ दूरियाँ भीतर-बाहर उतराते आँखों की डोरों में किए-अनकिए की उलझन आत्महंता सिसकन कैसे बरगलाए कोई अपनी ही आवाज़ लिखो तुम कविता और मैं देखूँ मैं देखूँ तुम्हारी अँगुलियों में एक बेचैन कलम मैं देखूँ शब्दों में नहायी पुतलियाँ आँखों में बहुत गहरे अर्थों की कतारें माथे पर उड़ती सागर सी हिलोरें तुम लिखो कविता और मैं देखूँ मैं देखूँ तुमको कविता में बदलते हुए।

Ep 50Maine Aahuti Bankar Dekha | Sachchidananda Hirananda Vatsyayan Agyeya
मैंने आहुति बन कर देखा - सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’मैं कब कहता हूँ जग मेरी दुर्धर गति के अनुकूल बने,मैं कब कहता हूँ जीवन-मरू नंदन-कानन का फूल बने?काँटा कठोर है, तीखा है, उसमें उसकी मर्यादा है,मैं कब कहता हूँ वह घटकर प्रांतर का ओछा फूल बने?मैं कब कहता हूँ मुझे युद्ध में कहीं न तीखी चोट मिले?मैं कब कहता हूँ प्यार करूँ तो मुझे प्राप्ति की ओट मिले?मैं कब कहता हूँ विजय करूँ मेरा ऊँचा प्रासाद बने?या पात्र जगत की श्रद्धा की मेरी धुंधली-सी याद बने?पथ मेरा रहे प्रशस्त सदा क्यों विकल करे यह चाह मुझे?नेतृत्व न मेरा छिन जावे क्यों इसकी हो परवाह मुझे?मैं प्रस्तुत हूँ चाहे मेरी मिट्टी जनपद की धूल बने-फिर उस धूली का कण-कण भी मेरा गति-रोधक शूल बने!अपने जीवन का रस देकर जिसको यत्नों से पाला है-क्या वह केवल अवसाद-मलिन झरते आँसू की माला है?वे रोगी होंगे प्रेम जिन्हें अनुभव-रस का कटु प्याला है-वे मुर्दे होंगे प्रेम जिन्हें सम्मोहन कारी हाला हैमैंने विदग्ध हो जान लिया, अन्तिम रहस्य पहचान लिया-मैंने आहुति बन कर देखा यह प्रेम यज्ञ की ज्वाला है!मैं कहता हूँ, मैं बढ़ता हूँ, मैं नभ की चोटी चढ़ता हूँकुचला जाकर भी धूली-सा आंधी सा और उमड़ता हूँमेरा जीवन ललकार बने, असफलता ही असि-धार बनेइस निर्मम रण में पग-पग का रुकना ही मेरा वार बने!भव सारा तुझपर है स्वाहा सब कुछ तप कर अंगार बने-तेरी पुकार सा दुर्निवार मेरा यह नीरव प्यार बने।

Ep 63Kaash Ki Pehle Likhi Jaati Ye Kavitayein | Priyadarshan
काश कि पहले लिखी जातीं ये कविताएँ - प्रियदर्शन एकवह एक उजली नाव थी जो गहरे आसमान में तैर रही थीचाँदनी की झिलमिल पतवार लेकर कोई तारा उसे खे रहा थाआकाशगंगाएँ गहरी नींद में थींअपनी सुदूर जमगग उपस्थिति से बेख़बररात इतनी चमकदार थी कि काला आईना बन गई थीसमय-समय नहीं था एक सम्मोहन था जिसमें जड़ा हुआ था यह सारा दृश्ययह प्रेम का पल था जिसका जादू टूटा तो सारे आईने टूट गए।दोवह एक झील थी जो आँखों में बना करती थीइंद्रधनुष के रंग चुराकर सपने अपनी पोशाक सिला करते थेकामनाओं के खौलते समुद्र उसके आगे मुँह छुपाते थेएक-एक पल की चमक में न जाने कितने प्रकाश वर्षों का उजाला बसा होता थाजिस रेत पर चलते थे वह दोस्त हो जाती थीजिस घास को मसलते थे, वह राज़दार बन जाती थीकल्पनाएँ जैसे चुकती ही नहीं थींसामर्थ्य जैसे सँभलती ही नहीं थीसमय जैसे बीतता ही नहीं थावह भी एक जीवन था जो हमने जिया थातीनवह एक शहर था जो रोज़ नए रूप धरता थाहर गली में कुछ बदल जाता, कुछ नया हो जातालेकिन हमारी पहचान उससे इतनी पक्की थी कि उसके तिलिस्म से बेख़बर हम चलते जाते थेरास्ते बेलबूटों की तरह पाँवों के आगे बिछते जातेन कहीं खोने का अंदेशा न कुछ छूटने का डरन कहीं पहुँचने की जल्दी न किसी मंज़िल का पतावे आश्वस्ति भरे रास्ते कहीं खो गएवे अपनेपन के घर खंडहर हो गएहम भी न जाने कहाँ आ पहुँचेकभी ख़ुद को पहचानने की कोशिश करते हैंकभी इस शहर को। कुछ वह बदल गयाकुछ हम बीत गए।

Ep 48Lautna | Vishnu Khare
लौटना - विष्णु खरेउसे जहाँ छोड़ा थाकभी-कभी वहाँ जाकर खड़ा हो जाता हूँकूडे़ के जिस अम्बार को देखवह लपक कर दौड़ गया थाअब वहाँ नहीं हैदरअसल अब कुछ भी वहाँ उस दिन जैसा नहीं हैमैंने उसे आधे दिल से पुकारा भी थाकि अगर लौट आए तो उसे वापस ले जाऊँलेकिन वह सिर्फ़ एक बार मेरी तरफ़ देख करमुझे ऐसा लगा कि जैसे हँसता हुआकूड़ा खोदने में जुटा रहाउसके बाद मैं चला आया लेकिन कई बार लौटा हूँवह जगह अब एकदम बदल चुकी हैनई इमारतों दूकानों की वजह से पहचानी नहीं जातीवह कूड़ा भी नहीं रहा वहाँवह सड़क अंदर जहाँ जाती थीउस पर भी कुछ दूर तक गया हूँ वह या उससे मिलता-जुलता कुछ भी दिखाई नहीं देताकभी कभी एकाध आदमी पूछ लेता हैकिसे देखते हैं भाई साहबनहीं यूँ ही या कोई और झूठ बोल कर चला आता हूँकई कारणों से वहाँ जाना कम होता गया हैऔर अब तो बहुत ज़्यादा बरस भी हो गएफिर भी कभी लौटता हूं सारी उम्मीदों के खिलाफ़और जहाँ वह कूड़े का ढेर था उससे कुछ दूरवह उतनी ही देरयाद करता खड़ा रहता हूँ कि कोई मददगार फिर पूछे नहींएक दिन ऐसे जाऊंगा कि कोई मुझे देख नहीं पाएगा और बिना पुकारे पता नहीं कहाँ सेवह झपटता हुआ तीर की तरह आएगापहचानता हुआ मुझे अपने साथ ले जाने के लिए

Ep 64Prajapati | Rajesh Joshi
प्रजापति - राजेश जोशीचीज़ों का हूबहू दिखना अपनी ही शक्ल में कविता में मुझे पसंद नहीं बिल्कुल मैं चाहता हूँ मेरा फटा-पुराना जूता भी दिखे वहाँ पूर्णिमा के पूरे चाँद की तरह एक साबुन की तरह दिखे मेरी आत्मा छोटी-छोटी विकृतियाँ और अंतर्विरोध भी दिखें वहाँ फूली हुई नसों वाले राक्षसों से इतने वीभत्स और दैत्याकार कि आसानी से की जा सके उनसे घृणा की जा सके नफ़रत मुझे पसंद हैं वे विदूषक जो मंच पर आने से पहले ही रँग लेते हैं अपना पूरा चेहरा मैं चाहता हूँ बेहद थका और ऊबा हुआ फ़ोरमैन भी जब अपने घर में घुसे तो बदल जाए तत्काल उसका चेहरा अपनी पाँच बरस की बेटी के पिता की तरह बदल जाएँ, बदल जाएँ लोगों के चेहरे जब वे मेरी कविता में आएँ हीरे की तरह चमकती हुई दिखें लोगों की बहुत छोटी-छोटी अच्छाइयाँ कि आत्महत्या करता आदमी पलट कर दौड़ पड़े जीवन की ओर चिल्लाता हुआ कुछ नहीं है जीवन से ज़्यादा सुंदर जीवन से ज़्यादा प्यारा जीवन की तरह अमर मैं चाहता हूँ कि कविता के भीतर फैली आसमान की टेबिल पर मैं जब सूरज के साथ चाय पी रहा होऊँ एक विशाल समुद्र की तरह दिखे मेरा कप।

Ep 57Kavi | Viren Dangwal
कवि - वीरेन डंगवाल मैं ग्रीष्म की तेजस्विता हूँऔर गुठली जैसाछिपा शहद का ऊष्म तापमैं हूँ वसंत में सुखद अकेलापनजेब में गहरी पड़ी मूँगफली को छाँटकरचबाता फ़ुरसत सेमैं चेकदार कपड़े की क़मीज़ हूँउमड़ते हुए बादल जब रगड़ खाते हैंतब मैं उनका मुखर ग़ुस्सा हूँइच्छाएँ आती हैं तरह-तरह के बाने धरेउनके पास मेरी हर ज़रूरत दर्ज हैएक फ़ेहरिस्त में मेरी हर कमज़ोरीउन्हें यह तक मालूम हैकि कब मैं चुप होकर गर्दन लटका लूँगामगर फिर भी मैं जाता रहूँगा हीहर बार भाषा को रस्से की तरह थामेसाथियों के रास्ते परएक कवि और कर ही क्या सकता हैसही बने रहने की कोशिश के सिवा

Ep 72Angarey Ko Tumne Chhua | Kanhaiya Lal Nandan
अंगारे को तुमने छुआ - कन्हैयालाल नंदनअंगारे को तुमने छुआऔर हाथ में फफोला नहीं हुआइतनी-सी बात परअंगारे पर तोहमत मत लगाओज़रा तह तक जाओआग भी कभी-कभीअपना धर्म निभाती हैऔर जलने वाले की क्षमता देखकर जलाती है

Ep 49Main Tumhe Phir Milungi | Amrita Pritam
मैं तुम्हें फिर मिलूँगी - अमृता प्रीतम मैं तुम्हें फिर मिलूँगी कहाँ? किस तरह? नहीं जानती शायद तुम्हारे तख़्ईल की चिंगारी बन कर तुम्हारी कैनवस पर उतरूँगी या शायद तुम्हारी कैनवस के ऊपर एक रहस्यमय रेखा बन कर ख़ामोश तुम्हें देखती रहूँगी या शायद सूरज की किरन बन कर तुम्हारे रंगों में घुलूँगी या रंगों की बाँहों में बैठ कर तुम्हारे कैनवस को पता नहीं कैसे-कहाँ? पर तुम्हें ज़रूर मिलूँगी या शायद एक चश्मा बनी होऊँगी और जैसे झरनों का पानी उड़ता है मैं पानी की बूँदें तुम्हारे जिस्म पर मलूँगी और एक ठंडक-सी बन कर तुम्हारे सीने के साथ लिपटूँगी... मैं और कुछ नहीं जानती पर इतना जानती हूँ कि वक़्त जो भी करेगा इस जन्म मेरे साथ चलेगा... यह जिस्म होता है तो सब कुछ ख़त्म हो जाता है पर चेतना के धागे कायनाती कणों के होते हैं मैं उन कणों को चुनूँगी धागों को लपेटूँगी और तुम्हें मैं फिर मिलूँगी...

Ep 61Sankhyaein | Naresh Saxena
संख्याएँ - नरेश सक्सेनाशब्द तो आए बहुत बाद मेंसँख्याएँ हमारे साथ जन्म से ही हैंगर्भ में जबनिर्माण हो रहा था हमारी हड्डियों कारक्तकणों और कोशिकाओं कासाथ-साथ सँख्याएँ भी निर्मित होती जा रही थींएक हमारी देह की इकाई की वो सँख्या हैजिसमें समाहित हैं सारी सँख्याएँदो आँखों में स्थित है दोतीन है उँगलियों के तीन जड़ों मेंहृदय के हिस्से हैं चारऔर पाँच का निवासपाँच उँगलियों में हैआगे की सारी सँख्याओं कोदेह में तलाशना बहुत मज़ेदार खेल हैनौ को तो अमर कर गए कबीरकि नौ द्वारे का पिंजरा ता में पंछी पौन...मुझे तो बहुत चकित करती है यह बातकि देह की सँख्याएँ आठ की सँख्या निर्धारित करती हैंक्योंकि आठ तरह से ही मुड़ती है यह देहइसीलिए तो कृष्ण कहलाते हैं अष्टावक्रसात रंग दीखते हैं आँखों कोऔर जीभ छह तरह के स्वादों को पहचानती हैइसीलिए तो भोजन को कहा गया षट्रसदेखिए एक से बना कैसा प्यारा शब्दएकाएक जो दूसरे के बिना रह नहीं सकताजिसके बिना सम्भव नहीं थीइस दुनिया की शुरुआतमैंने तो शुरू में ही कही थी यह बातकि सँख्याएँ शब्दों की पूर्वज हैंशब्द तो आए बहुत बाद मेंऔर आते ही चले जा रहे हैंजबकी सँख्याएँ सबकी सब आ चुकी हैंक्या कोई नई सँख्या बता सकते हैं आप ।

Ep 47Khidkiyan | Kumar Vikal
खिड़कियाँ - कुमार विकलजिन घरों में खिड़कियाँ नहीं होतींउनमें रहने वाले बच्चों कासूरज के साथ किस तरह का रिश्ता होता है?सूरज उन्हें उस अमीर मेहमान —सा लगता हैजो किसी सुदूर शहर सेकभी —कभार आता हैएकाध दिन के लिए घर में रुकता हैसारा वक्त माँ से हँस—हँस के बतियाता हैऔर जाते समयउन सबकी मुठ्ठियों मेंकुछ रुपये ठूँस जाता है|जिन घरों में खिड़कियाँ नहीं होतींवहाँ से धूप बाहर की दीवार से लौट जाती हैजैसे किसी बच्चे के बीमार पड़ने परमाँ की कोई सहेली मिजाजपुर्सी के लिए तो आती हैकिंतु घर की दहलीज़ से हीहाल पूछ पर चली जाती है|जिन घरों में खिड़कियाँ नहीं होतींवहाँ के बच्चों को रोशनी की प्रतीक्षा—कुछ इस तरह से होती हैजिस तरह राखी के कुछ दिनों बादघर के सामने सेपोस्टमैन के गुज़र जाने के बादपहले पोस्टमैन को कोसती हैबाद में रसोई में जाकरअपने भाई की मजबूरी समझ करबहुत रोती है|जिन घरों में खिड़कियाँ नहीं होतींवहाँ पर चाँदनी कुछ इस तरह से आती हैजैसे किसी खिड़कियों वाले घर मेंपक रहे पकवानों की ख़ुशबूदूर तक के घरों में फैल जाती है|जिन घरों में खिड़कियाँ नहीं होतींवहाँ पर कोई लोरियाँ नहीं गाताचाँद को चंदा मामा नहीं कहतापियक्कड़ पिता की आवाज़ ही बच्चों को सुलाती हैऔर किसी औरत के सिसकने की आवाज़चौकीदार के ‘जागते रहो’ स्वर में खो जाती है|

Ep 46Democracy Kya Hoti Hai | Ashok Chakradhar | Varun Grover
डेमोक्रेसी क्या होती है? - अशोक चक्रधरपार्क के कोने में घास के बिछौने पर लेटे-लेटे हम अपनी प्रियसी से पूछ बैठे— क्यों डियर! डेमोक्रेसी क्या होती है? वह बोलीं— तुम्हारे वादों जैसी होती है! इंतज़ार में, बहुत तड़पाती है, झूठ बोलती है सताती है, तुम तो आ भी जाते हो, ये कभी नहीं आती है! एक विद्वान से पूछा वह बोले— हमने राजनीति-शास्त्र सारा पढ़ मारा, डेमोक्रेसी का मतलब है— आज़ादी, समानता और भाईचारा। आज़ादी का मतलब रामनाम की लूट है, इसमें गधे और घास दोनों को बराबर की छूट है। घास आज़ाद है कि चाहे जितनी बढ़े, और गधे स्वतंत्र हैं कि लेटे-लेटे या खड़े-खड़े कुछ भी करें, जितना चाहें इस घास को चरें। और समानता! कौन है जो इसे नहीं मानता? हमारे यहाँ— ग़रीबों और ग़रीबों में समानता है, अमीरों और अमीरों में समानता है, मंत्रियों और मंत्रियों में समानता है, संत्रियों और संत्रियों में समानता है। चोरी, डकैती, सेंधमारी, बटमारी राहज़नी, आगज़नी, घूसख़ोरी, जेबकतरी इन सबमें समानता है। बताइए, कहाँ असमानता है? और भाईचारा! तो सुनो भाई! यहाँ हर कोई एक-दूसरे के आगे चारा डालकर भाईचारा बढ़ा रहा है। जिसके पास डालने को चारा नहीं है उसका किसी से भाईचारा नहीं है। और अगर वो बेचारा है तो इसका हमारे पास कोई चारा नहीं है। फिर हमने अपने एक जेलर मित्र से पूछा— आप ही बताइए मिस्टर नेगी। वह बोले— डेमोक्रेसी? आजकल ज़मानत पर रिहा है, कल सींखचों के अंदर दिखाई देगी। अंत में मिले हमारे मुसद्दीलाल, उनसे भी कर डाला यही सवाल। बोले— डेमोक्रेसी? दफ़्तर के अफ़सर से लेकर घर की अफ़सरा तक पड़ती हुई फटकार है! ज़बान के कोड़ों की मार है चीत्कार है, हाहाकार है। इसमें लात की मार से कहीं तगड़ी हालात की मार है। अब मैं किसी से ये नहीं कहता, कि मेरी ऐसी-तैसी हो गई है, कहता हूँ— मेरी डेमोक्रेसी हो गई है!

Ep 45Nadiyaan | Kedarnath Singh
नदियाँ - केदारनाथ सिंहवे हमें जानती हैंजैसे जानती हैं वे अपनी मछलियों की बेचैनीअपने तटों का तापमानजो कि हमीं हैंबस हमीं भूल गए हैंहमारे घर कभी उनका भीआना-जाना थाउनकी नसों में बहता हैपहाड़ों का खूनजिसमे थोड़ा सा खूनहमारा भी शामिल हैऔर गरम-गरम दूधटपकता हुआ भूरे दरख्तों की छाल सेपता लगा लोदरख्तों की छालऔर हमारी त्वचा का गोत्रएक ही हैपरछाइयां भी असल मेंनदियाँ ही हैंहमीं से फूटकरहमारी बगल में चुपचाप बहती हुई नदियाँहर आदमी अपनी परछाई मेंनहाता हैऔर लगता हैनदी में नहा रहा हैजो लगता है वह भीउतना ही सच हैजितना कोई भी नदीपुल -पृथ्वी के सारे के सारे पुलएक गहरा षड्यंत्र हैं नदियों के खिलाफऔर नदियाँ उन्हें इस तरह बर्दाश्त करती हैंजैसे क़ैदी ज़ंजीरों कोहालांकि नदियाँ इसीलिए नदियाँ हैकि वे जब भी चाहती हैंउलट-पुलट आर देती हैं सारा कैलेण्डरऔर दिशाओं के नामहमारे देश में नदियाँजब कुछ नहीं करतींतब वे शवों का इंतजार करती हैंअँधेरे को चीरते हुएआते हैं शववे आते हैं अपनी चुप्पियों की चोट सेजीने की धार को तीव्रतर करते हुएनदियाँ उन्हें देखती हैंऔर जैसे चली जाती हैं कहीं अपने ही अन्दरकिन्हीं जलमग्न शहरों कीगंध की तलाश मेंनदियाँ जो कि असल मेंशहरों का आरम्भ हैंऔर शहर जो कि असल मेंनदियों का अंतमुझे याद नहींमैंने भूगोल की किस किताब में पढ़ा थाअंत और आरम्भअपने विरोध की सारी ऊष्मा के साथजिस जगह मिलते हैंकहीं वहीं से निकलती हैंसारी की सारी नदियाँ.

Ep 44Ho Sakta Hai | Ashok Vajpeyi
हो सकता है - अशोक वाजपेयी हो सकता है, इस बार हम असमय आ गए होंहर समय कुछ ना कुछ काअंत हो रहा होता हैऔर उसी समयकुछ ना कुछ का आरंभ भीऐसा लग सकता है किअंत ही आरंभ हैऔर आरंभ ही अंत हैठीक-ठीक समय तय कर पाना मुश्किल हैक्योंकि हर आना अंत है, आरंभ भीजब मनुष्य अपने एकांत में विलप रहा होता है,तब हरितिमा बाहरखिलखिला रही होती हैफूलों को कतई ख़बर नहींकि मनुष्य के आंसू क्या होते हैंप्रकृति ना हँसती है ना रोती हैफिर भी माटी का चोला पहने मनुष्यउसपर भरोसा करता हैजबकि जीना हर दिनअंत के और पास जाना हैनष्ट करने का उत्साह बढ़ता जाता हैकम होती जाती हैइच्छा कुछ रचने कीकम होती जाती हैं जगहेंठिठककर कुछ सोचने कीजो नष्ट करता है, वो अपने को भीनष्ट कर रहा होता हैजो रचता है, वो अपने को बचा रहा होता हैभुरभुरा है नाश का स्थापत्यभुरभुरा है रचने का स्थापत्यकोई नहीं बचता नश्वरता के श्राप सेखिड़कियाँ और दरवाज़े सब खुले हैंखुला है आंगनउन्हीं में होकर आती है पदचापना होने कीहम उसी पदचाप की ओर आपका ध्यान खींचने शायद असमय आ गए हैं।

Ep 43Auratein | Ramashankar Yadav Vidrohi
औरतें - रमाशंकर यादव विद्रोहीकुछ औरतों ने अपनी इच्छा से कुएँ में कूदकर जान दी थी, ऐसा पुलिस के रिकार्डों में दर्ज है। और कुछ औरतें चिता में जलकर मरी थीं, ऐसा धर्म की किताबों में लिखा है। मैं कवि हूँ, कर्ता हूँ, क्या जल्दी है, मैं एक दिन पुलिस और पुरोहित, दोनों को एक ही साथ औरतों की अदालत में तलब कर दूँगा, और बीच की सारी अदालतों को मंसूख कर दूँगा। मैं उन दावों को भी मंसूख कर दूँगा, जिन्हें श्रीमानों ने औरतों और बच्चों के ख़िलाफ़ पेश किया है। मैं उन डिक्रियों को निरस्त कर दूँगा, जिन्हें लेकर फ़ौजें और तुलबा चलते हैं। मैं उन वसीयतों को ख़ारिज कर दूँगा, जिन्हें दुर्बल ने भुजबल के नाम की होंगी। मैं उन औरतों को जो कुएँ में कूदकर या चिता में जलकर मरी हैं, फिर से ज़िंदा करूँगा, और उनके बयानात को दुबारा क़लमबंद करूँगा, कि कहीं कुछ छूट तो नहीं गया! कि कहीं कुछ बाक़ी तो नहीं रह गया! कि कहीं कोई भूल तो नहीं हुई! क्योंकि मैं उन औरतों के बारे में जानता हूँ जो अपने एक बित्ते के आँगन में अपनी सात बित्ते की देह को ता-ज़िंदगी समोए रही और कभी भूलकर बाहर की तरफ़ झाँका भी नहीं। और जब वह बाहर निकली तो औरत नहीं, उसकी लाश निकली। जो खुले में पसर गई है, माँ मेदिनी की तरह। एक औरत की लाश धरती माता की तरह होती है दोस्तो! जो खुले में फैल जाती है, थानों से लेकर अदालतों तक। मैं देख रहा हूँ कि जुल्म के सारे सबूतों को मिटाया जा रहा है। चंदन चर्चित मस्तक को उठाए हुए पुरोहित, और तमग़ों से लैस सीनों को फुलाए हुए सैनिक, महाराज की जय बोल रहे हैं। वे महाराज जो मर चुके हैं, और महारानियाँ सती होने की तैयारियाँ कर रही हैं। और जब महारानियाँ नहीं रहेंगी, तो नौकरानियाँ क्या करेंगी? इसलिए वे भी तैयारियाँ कर रही हैं। मुझे महारानियों से ज़्यादा चिंता नौकरानियों की होती है, जिनके पति ज़िंदा हैं और बेचारे रो रहे हैं। कितना ख़राब लगता है एक औरत को अपने रोते हुए पति को छोड़कर मरना, जबकि मर्दों को रोती हुई औरतों को मारना भी ख़राब नहीं लगता। औरतें रोती जाती हैं, मरद मारते जाते हैं। औरतें और ज़ोर से रोती हैं, मरद और ज़ोर से मारते हैं। औरतें ख़ूब ज़ोर से रोती हैं, मरद इतने ज़ोर से मारते हैं कि वे मर जती हैं। इतिहास में वह पहली औरत कौन थी, जिसे सबसे पहले जलाया गया, मैं नहीं जानता, लेकिन जो भी रही होगी, मेरी माँ रही होगी। लेकिन मेरी चिंता यह है कि भविष्य में वह आख़िरी औरत कौन होगी, जिसे सबसे अंत में जलाया जाएगा, मैं नहीं जानता, लेकिन जो भी होगी मेरी बेटी होगी, और मैं ये नहीं होने दूँगा।

Ep 42Marna Hai Ye To Tai Hai | Naresh Saxena
मरना है ये तो तय है - नरेश सक्सेना मरना है ये तो तय हैपर कब और किसके हाथयही संचय है जो है सबसे नज़दीक उसी से सबसे ज़्यादा भय है यह इतना बुरा समय है मरना है ये तो तय है