
Pratidin Ek Kavita
1,141 episodes — Page 19 of 23

Ep 243Ghar Rahenge | Kunwar Narayan
घर रहेंगे - कुँवर नारायणघर रहेंगे, हमीं उनमें रह न पाएँगे : समय होगा, हम अचानक बीत जाएँगे : अनर्गल ज़िंदगी ढोते किसी दिन हम एक आशय तक पहुँच सहसा बहुत थक जाएँगे। मृत्यु होगी खड़ी सम्मुख राह रोके, हम जगेंगे यह विविधता, स्वप्न, खो के, और चलते भीड़ में कंधे रगड़ कर हम अचानक जा रहे होंगे कहीं सदियों अलग होके। प्रकृति औ' पाखंड के ये घने लिपटे बँटे, ऐंठे तार-जिनसे कहीं गहरा, कहीं सच्चा, मैं समझता-प्यार, मेरी अमरता की नहीं देंगे ये दुहाई, छीन लेगा इन्हें हमसे देह-सा संसार। राख-सी साँझ, बुझे दिन की घिर जाएगी : वही रोज़ संसृति का अपव्यय दुहराएगी।

Ep 242Matrabhasha Ki Maut | Jacinta Kerketta
मातृभाषा की मौत - जसिंता केरकेट्टामाँ के मुँह में ही मातृभाषा को क़ैद कर दिया गया और बच्चे उसकी रिहाई की माँग करते-करते बड़े हो गए। मातृभाषा ख़ुद नहीं मरी थी उसे मारा गया था पर, माँ यह कभी न जान सकी। रोटियों के सपने दिखाने वाली संभावनाओं के आगे अपने बच्चों के लिए उसने भींच लिए थे अपने दाँत और उन निवालों के सपनों के नीचे दब गई थी मातृभाषा। माँ को लगता है आज भी एक दुर्घटना थी मातृभाषा की मौत।

Ep 241Kalpana | Hemant Devlekar
कल्पना - हेमंत देवलेकरउसने काग़ज़ पर एक चौकुट्टा सा गोला बनाया और मन में कहा ‘चिड़िया’। फिर उसने उस गोले में कहीं एक बिंदी मांड दी और मन में कहा ‘आसमान’। सच, चिड़िया की आँखों में आसमान बिंदु भर ही तो होगा

Ep 240Hum Apna Beetna Dekhte Hain | Yash Malviya
हम अपना बीतना देखते हैं - यश मालवीयकल पर उड़ती नज़र फेंकते हैं हम अपना बीतना देखते हैं अपने से ही अनबन मगर तक़ाज़े हैं सपने खुले-खुले, जकड़े दरवाज़े हैं चलते-चलते बीच रास्ते में अपना ही रास्ता छेंकते हैं सुबहों के कुहरे को झीना करने की तारीख़ों को भीना-भीना करने की जीते जाने की उम्मीदों की, सँवलाई-सी धूप सेंकते हैं गलियों-सड़कों की धुँधली पहचान लिए अब तक लगी न ऐसी एक थकान लिए थक जाने के डर ही से अक्सर हाथ टेकते, पाँव टेकते हैं।

Ep 239Aisi Bhasha | Bhagwat Rawat
ऐसी भाषा | भगवत रावत | आरती जैनसारी उम्र बच्चों को पढ़ाई भाषा और विदा करते समय उनकेपास में नहीं था एक ऐसा शब्द जिसे देकर कह सकता कि लो इसे सँभाल कर रखना यह संकट के समय काम आएगा या कि वह तुम्हें शर्मिंदगी से बचाएगा या कि वह तुम्हें गिरने से रोकेगा या कि ज़रूरत पड़ने पर यह तुम्हें टोकेगा या कि तुम इसके सहारे किसी भी नीचता का सामना कर सकोगे या इतना ही कि कभी-कभी तुम इससे अपना ख़ालीपन भर सकोगे या कि यह शब्द ज़मीन की मिट्टी का टुकड़ा है या कि यह शब्द दो जून की रोटी से बड़ा है कुछ भी नहीं था मेरे पास कुछ भी नहीं है-यह तक कह सकने की भाषा न थी।

Ep 238Lauta Main Is bade Sheher Me | Manglesh Dabral
लौटा मैं इस बड़े शहर में | मंगलेश डबरालइस बड़े शहर में रहता मैं एक आदमी अदना-सा था उस छोटे क़स्बे में गया तो पाया मेरा क़द बहुत बड़ा थासभी देखते नज़र उठाकर मुझको किसी बड़ी-सी आशा में मैं भी पता नहीं क्या बोला उनसे भीषण भरकम भाषा मेंवाह वाह कर सुनते थे मेरी कविता कहते थोड़ी और पीजिए बड़े शहर में जब हम आएँ कृपया थोड़ा समय दीजिएमार्ग दिखाते रहें कहा उन्होंने नतमस्तक हो विदा समय चला वहाँ से मैं शर्मिन्दा लगा मुझे खुद से ही भयफिर गया गाँव अपने तो देखा मुझसे लोग ज़रा सहमते थेकैसा दुर्भाग्य मुझे वेसबसे बड़ा मनुष्य समझते थेतुम तो बड़े-बड़ों के संगखाते-पीते खू़ब मजे़ से रहते होगेइतनी अकल कमा ली तुमने हमें याद क्यों करते होगे बीस मिले बेरोज़गार कि छोटा-मोटाकाम कहीं दिलवाओदस वृद्धों ने कहा कि बेटाताक़त की बढ़िया दवा भिजवाओजल्दी ही कुछ करने अगली बार दवा लाने का आश्वासन देकर लौटा मैं इस बड़े शहर मेंफिर से नीचा करने सिर।

Ep 237Usha | Shamsher Bahadur Singh
उषा | शमशेर बहादुर सिंह | आरती जैनप्रात नभ था बहुत नीला शंख जैसे भोर का नभ राख से लीपा हुआ चौका [अभी गीला पड़ा है] बहुत काली सिल ज़रा-से लाल केसर से कि जैसे धुल गई हो स्लेट पर या लाल खड़िया चाक मल दी हो किसी ने नील जल में या किसी की गौर झिलमिल देह जैसे हिल रही हो। और... जादू टूटता है इस उषा का अब सूर्योदय हो रहा है।

Ep 236Pattiyan Ye Cheed KI | Naresh Saxena
पत्तियाँ यह चीड़ की | नरेश सक्सेना सींक जैसी सरल और साधारण पत्तियाँयदि न होतीं चीड़ कीतो चीड़ कभी इतने सुंदर नहीं होतेनीम या पीपल जैसी आकर्षकहोतीं यदि पत्तियाँ चीड़ कीतो चीड़आकाश में तने हुए भालों से उर्जस्वितऔर तपस्वियों से स्थितिप्रज्ञ न होतेसूखी और झड़ी हुई पत्तियाँ चीड़ कीशीशम या महुए की पत्तियों सीपैरों तले दबने परचुर्र-मुर्र नहीं होतींबल्कि पैरों तले दबने परआपको पटकनी दे सकती हैंखून बहा सकती हैंप्राण तक ले सकती हैंपहाड़ी ढलानों परसाधारण, सरल और सुंदर यह पत्तियाँ चीड़ की

Ep 235Kahin Kabhi | Bhuwaneshwar
कहीं कभी | भुवनेश्वर कहीं कभी सितारे अपने आपकीआवाज पा लेते हैं औरआसपास उन्हें गुजरते छू लेते हैं…कहीं कभी रात घुल जाती हैऔर मेरे जिगर के लाल-लालगहरे रंग को छू लेते हैं,हालाँकि यह सब फालतू लगता हैयह भागदौड़ और यह सबसब कुछ रूखा-सूखा हैलेकिन एक बच्चे की किलकारी की तरहयह सब मधुर हैलेकिन कहीं कभी एक शांत स्मृति मेंहम अपने सपनों काइंतजार कर रहे हैं

Ep 234Ek Vaakiya | Sahir Ludhianvi
एक वाक़िआ | साहिर लुधियानवी अँध्यारी रात के आँगन में ये सुब्ह के क़दमों की आहट ये भीगी भीगी सर्द हवा ये हल्की हल्की धुंदलाहट गाड़ी में हूँ तन्हा महव-ए-सफ़र और नींद नहीं है आँखों में भूले-बिसरे अरमानों के ख़्वाबों की ज़मीं है आँखों में अगले दिन हाथ हिलाते हैं पिछली पीतें याद आती हैं गुम-गश्ता ख़ुशियाँ आँखों में आँसू बन कर लहराती हैं सीने के वीराँ गोशों में इक टीस सी करवट लेती है नाकाम उमंगें रोती हैं उम्मीद सहारे देती है वो राहें ज़ेहन में घूमती हैं जिन राहों से आज आया हूँ कितनी उम्मीद से पहुँचा था कितनी मायूसी लाया हूँ

Ep 233Safal Aadmi | Bhagwat Rawat
सफल आदमी | भगवत रावत सफल आदमी के चेहरे पर उसकी उम्र की जगह लिखा होता है सफल आदमी वह नायक बनकर निकलता है अपने बचपन से और याद करता है उन्हें जो पड़े रह गए वहीं के वहीं कि एक वही निकल पाया ऊपर केवल अपने बलबूते पर वह अक्सर सोचता है उन चीज़ों के बारे में जिन्हें होना चाहिए था केवल उसके जीवन में वह उस दौड़ में कभी शामिल नहीं होता जहाँ पराजय का सुख होता है सफल आदमी में इतनी प्रतिभा होती है कि वह चाहता तो जो वह है उसके अलावा कुछ और भी हो सकता था लेकिन वह ऐसा कुछ नहीं होता वह केवल एक सफल आदमी होता है सफल आदमी के बारे में हम सब कुछ जानते हैं केवल उसका दुख नहीं जान पाते।

Ep 232Jaise | Arun Kamal
जैसे | अरुण कमल जैसेमैं बहुत सारी आवाज़ें नहीं सुन पा रहा हूँचींटियों के शक्कर तोड़ने की आवाज़पंखुड़ी के एक एक कर खुलने की आवाज़गर्भ में जीवन बूँद गिरने की आवाज़अपने ही शरीर में कोशिकाएँ टूटने की आवाज़इस तेज़ बहुत तेज़ चलती पृथ्वी के अंधड़ मेंजैसे मैं बहुत सारी आवाज़ें नहीं सुन रहा हूँवैसे ही तो होंगे वे लोग भीजो सुन नहीं पाते गोली चलने की आवाज़ ताबड़तोड़और पूछते हैं - कहाँ है पृथ्वी पर चीख?

Ep 231Phir Kya Hoga Uske Baad? | Balkrishna Rao
फिर क्या होगा उसके बाद? | बालकृष्ण राव फिर क्या होगा उसके बाद? उत्सुक होकर शिशु ने पूछा, माँ, क्या होगा उसके बाद? रवि से उज्ज्वल, शशि से सुंदर, नव किसलय दल से कोमलतर वधू तुम्हारी घर आएगी उस विवाह उत्सव के बाद! पल भर मुख पर स्मित की रेखा, खेल गई, फिर माँ ने देखा— कर गंभीर मुखाकृति शिशु ने फिर पूछा, माँ क्या उसके बाद? फिर नभ के नक्षत्र मनोहर, स्वर्ग-लोक से उतर-उतरकर, तेरे शिशु बनने को, मेरे घर आएँगे उसके बाद। मेरे नए खिलौने लेकर, चले न जाएँ वे अपने घर! चिंतित हो कह उठा, किंतु फिर पूछा शिशु ने, उसके बाद? अब माँ का जी ऊब चुका था, हर्ष श्रांति में डूब चुका था; बोली, फिर मैं बूढ़ी होकर मर जाऊँगी उसके बाद। यह सुनकर भर आए लोचन, किंतु पोंछ कर उन्हें उसी क्षण, सहज कुतूहल से फिर शिशु ने पूछा, माँ, क्या उसके बाद? कवि को बालक ने सिखलाया सुख-दुख है पल भर का माया, है अनंत का तत्त्व-प्रश्न यह फिर क्या होगा उसके बाद?

Ep 230Apne Ko Dekhna Chahta Hoon | Chandrakant Devtale
अपने को देखना चाहता हूँ | चंद्रकांत देवतालेमैं अपने को खाते हुए देखना चाहता हूँ किस जानवर या परिंदे की तरह खाता हूँ मैं मिट्ठू जैसी हरी मिर्च कुतरता है या बंदर गड़ाता है भुट्टे पर दाँत या साँड़ जैसे मुँह मारता है छबड़े पर मैं अपने को सोए हुए देखना चाहता हूँ माँद में रीछ की तरह मछली पानी में सोती होती जैसे मैं धुँध में सोया हुआ हूँ हँस रहा हूँ नींद में मैं सपने में पतंग उड़ाते बच्चे की तरह सोया अपने को देखना चाहता हूँ मैं अपने को गिरते हुए देखना चाहता हूँ जैसे खाई में गिरती है आवाज़ जैसे पंख धरती पर जैसे सेंटर फ़ॉरवर्ड गिर जाता है हॉकी समेत ऐन गोल के सामने मैं गिरकर दुनिया भर से माफ़ी माँगने की तरह अपने को गिरते हुए देखना चाहता हूँ मैं अपने को लड़ते हुए देखना चाहता हूँ नेक और कमज़ोर आदमी जिस तरह एक दिन चाक़ू खुपस ही देता है फ़रेबी मालिक के सीने में जैसे बेटा माँ से लड़ता है और छिपकर ज़ार-ज़ार आँसू बहाता है जैसे अपनी प्रियतम से लड़ते हैं और फिर से लड़ते हैं प्रेम बनाने के लिए मैं अपने को साँप से लड़ते नेवले की तरह लड़ते हुए देखना चाहता हूँ मैं अपने को डूबते हुए देखना चाहता हूँ पानी की सतह के ऊपर बचे सिर्फ़ अपने दोनों हाथों के इशारों से तट पर बैठे मज़े में सुनना चाहता हूँ मुझे मत बचाओ कोई मुझे मत बचाओ आते हुए अपने को देखना संभव नहीं था मैं अपने को जाते हुए देखना चाहता हूँ जैसे कोई सुई की आँख से देखे कबूतर की अंतिम उड़ान और कहे अब नहीं है अदृश्य हो गया कबूतर पर हाँ दिखाई दे रही है उड़ान मैं अपनी इस बची उड़ान की छाया को देखते हुए अपने को देखना चाहता हूँ।

Ep 229Prithvi Ka Mangal Ho | Ashok Vajpeyi
पृथ्वी का मंगल हो | अशोक वाजपेयी सुबह की ठंडी हवा में अपनी असंख्य हरी रंगतों में चमक-काँप रही हैं अनार-नींबू-नीम-सप्रपर्णी-शिरीष-बोगेनबेलिया-जवाकुसुम-सहजन की पत्तियाँ : धूप उनकी हरीतिमा पर निश्छल फिसल रही है : मैं सुनता हूँ उनकी समवेत प्रार्थना : पृथ्वी का मंगल हो! एक हरा वृंदगान है विलम्बित वसंत के उकसाए जिसमें तरह-तरह के नामहीन फूल स्वरों की तरह कोमल आघात कर रहे हैं : सब गा-गुनगुना-बजा रहे हैं स्वस्तिवाचन पृथ्वी के लिए। साइकिल पर एक लड़की लगातार चक्कर लगा रही है खिड़कियाँ-बालकनियाँ खुली हैं पर निर्जन एकांत एक नए निरभ्र नभ की तरह सब पर छाया हुआ है पर धीरे-धीरे बहुत धीमे बहुत धीरे एकांत भी गा रहा है पृथ्वी के लिए मंगलगान। घरों पर, दरवाज़ों पर कोई दस्तक नहीं देता— पड़ोस में कोई किसी को नहीं पुकारता अथाह मौन में सिर्फ़ हवा की तरह अदृश्य हल्के से धकियाता है हर दरवाज़े, हर खिड़की को मंगल आघात पृथ्वी का। इस समय यकायक बहुत सारी जगह है खुली और ख़ाली पर जगह नहीं है संग-साथ की, मेल-जोल की, बहस और शोर की, पर फिर भी जगह है : शब्द की, कविता की, मंगलवाचन की। हम इन्हीं शब्दों में, कविता के सूने गलियारे से पुकार रहे हैं, गा रहे हैं, सिसक रहे हैं पृथ्वी का मंगल हो, पृथ्वी पर मंगल हो। पृथ्वी ही दे सकती है हमें मंगल और अभय सारे प्राचीन आलोकों को संपुंजित कर नई वत्सल उज्ज्वलता हम पृथ्वी के आगे प्रणत हैं।

Ep 228Abhirupa | Anamika
अभिरूपा | अनामिका नहीं जानती मेरे जीवन का हासिल क्यामेरे वे सारे संबंध जो बन ही नहीं पाएवे मुलाकातें जो हुई ही नहींवे रस्ते जो मुझसे छूट गए, या मैंने छोड़ दियेउड़ के दरवाज़े जो खोले नहीं मैंनेशब्द जो उचारे नहीं और प्रस्ताव जो विचारे नहींमेरे सगे थे वही जिनकी मैं सगी न हुईकरते हैं मेरी परिचर्या इस घने जंगल में वे हीजब आधी रात को फूलती है वह कुमुदनीमेरी हताहत शिराओं में और टूट जाती है नींदएक पक्षी चीखता है कहीं विरह दर्द आसमान भी किसी आहत जटायु साबस गिरा ही चाहता है मेरे कंधों परऔर उमड़ता है हृदय में सन्नाटा प्रलय मेघ साभंते बताइए कैसे समझे कोई कौन सगाबुद्ध ने कहा जिसकी उपस्थिति चित्त की लौ को निष्कंप करेवही सगा अभिरूपा सदा वही जो तुमको मंथरगति से सीधा चलना सिखाए, बढ़ना सिखाएजो ऐसे, जैसे कि युद्धभूमि में हाथी बढ़ता है बौछार तीरों की हर तरफ से झेलता

Ep 227Ye Baat Samajh Me Aayi Nahi | Ahmed Hatib Siddiqui
ये बात समझ में आई नहीं | अहमद हातिब सिद्दीक़ी ये बात समझ में आई नहीं और अम्मी ने समझाई नहीं में कैसे मीठी बात करूँ जब मैं ने मिठाई खाई नहीं आपी भी पकाती हैं हलवा फिर वो भी क्यूँ हलवाई नहीं ये बात समझ में आई नहीं और अम्मी ने समझाई नहीं नानी के मियाँ तो नाना हैं दादी के मियाँ भी दादा हैं जब आपा से मैं ने ये पूछा बाजी के मियाँ क्या बाजा हैं वो हँस हँस कर ये कहने लगीं ऐ भाई नहीं ऐ भाई नहीं ये बात समझ में आई नहीं और अम्मी ने समझाई नहीं जब नया महीना आता है तो बिजली का बिल आ जाता है हालाँकि बादल बेचारा ये बिजली मुफ़्त बनाता है फिर हम ने अपने घर बिजली बादल से क्यूँ लगवाई नहीं ये बात समझ में आई नहीं और अम्मी ने समझाई नहीं गर बिल्ली शेर की ख़ाला है तो हम ने उसे क्यूँ पाला है क्या शेर बहुत नालायक़ है ख़ाला को मार निकाला है या जंगल के राजा के हाँ क्या मिलती दूध मिलाई नहीं ये बात समझ में आई नहीं और अम्मी ने समझाई नहीं क्यूँ लम्बे बाल हैं भालू के क्यूँ उस की टुंड कराई नहीं क्या वो भी गंदा बच्चा है या उस के अब्बू भाई नहीं ये उस का हेयर स्टाइल है या जंगल में कोई नाई नहीं ये बात समझ में आई नहीं और अम्मी ने समझाई नहीं जो तारे झिलमिल करते हैं क्या उन की चच्ची ताई नहीं होगा कोई रिश्ता सूरज से ये बात हमें बतलाई नहीं ये चंदा कैसा मामा है जब अम्मी का वो भाई नहीं ये बात समझ में आई नहीं और अम्मी ने समझाई नहीं

Ep 226Zameen Ko Jaadu Aata Hai! | Gulzar
ज़मीं को जादू आता है! | गुलज़ार ये मेरे बाग की मिट्टी में कुछ तो हैये जादुई ज़मीं है क्या?ज़मीं को जादू आता है!अगर अमरूद बीजूँ मैं, तो ये अमरूद देती हैअगर जामुन की गुठली डालूँ तो जामुन भी देती हैकरेला तो करेला.....निम्बू तो निम्बू!अगर मैं फूल माँगू तो गुलाबी फूल देती हैमैं जो रंग दूँ उसे, वो रंग देती हैये सारे रंग क्या उसने कहीं नीचे छुपा रक्खे हैं मिट्टी मेंबहुत खोदा मगर कुछ भी नहीं निकला.....!ज़मीं को जादू आता है!ज़मीं को जादू आता हैबड़े करतब दिखाती हैये लम्बे-लम्बे ऊँचे ताड़ के जब पेड़, उँगली पर उठाती है!तो गिरने भी नहीं देती!हवाएँ खूब हिलाती हैं, ज़मीं हिलने नहीं देती!मेरे हाथों से शर्बत, दूध, पानीकुछ गिरे सब डीक जाती हैये कितना पानी पीती है!गटक जाती है जितना दो,इसे लोटे से दो या बाल्टी से,या नल दिन भर खुला रख दोगज़ब है, पेट भरता ही नहीं इस कासुना है ये नदी को भी छुपा लेती है अन्दर!ज़मीं को जादू आता है!ज़मी के नीचे क्या ‘चीनी’ की खानें हैं?खटाई की चट्टानें हैं?फलों में मीठा कैसे डालती है ये ज़मीं?लाती कहाँ से है?अनारों, बेरों और आमों में, सेबों में,सभी मीठों में भी मीठे अलग हैं,की पत्ते खाओ तो फीके हैं और फल मीठे लगते हैंमौसम्मी मीठी है तो नींबू खट्टा है!यकीनन जादू आता है!!वगरना बांस फीका, सख्त और गन्नों में रस क्यों है?ज़मीं के पेट में क्या कोई मकनातीस का टुकड़ा रखा है,कि जो गिरता है, उसके पास जाता हैवो चिड़िया हो या ‘उल्का’ हो!ज़मीं को जादू आता है!!

Ep 225Muhana | Dr Damodar Khadse
मुहाना | डॉ दामोदर खड़से मैं चाहता हूँज्वालामुखी के मुहाने पर बैठकर लिखूं कविता...पर सोचता हूँजो लिखता है कविताक्या नहीं होता वहज्वालामुखी के मुहाने पर

Ep 224Ma Ka Kargha | Dr Suryabala
माँ का करघा | डॉ सूर्यबाला हीरे की कनियों से, मोती की लड़ियों से,चाँदी के तारों, बूटे, लाड़ दुलारों के,ख़ुशबू के धागों से, आँसू की धारों सेइतने सपने, और सब सपने,इतने-इतने सारे सपनेमेरी अम्माँ ने बुनेझलमली आखों के हथकरघे पे

Ep 223Vishwa Ki Vasundhara Suhagini Bani Rahe | Sheoraj Singh 'Bechain'
विश्व की वसुंधरा सुहागिनी बनी रहे | श्यौराज सिंह ‘बेचैनगगन में सूर्य-चंद्रऔर चाँदनी बनी रहेचमन बना रहेचमन की स्वामिनी बनी रहे।कोयलों केकंठ की माधुरी बनी रहे।रागियों के–अधरों की रागिनी बनी रहे।गूँजते रहेंभ्रमर किसलयों की चाह में,मेल-प्यारहो अपार, ज़िंदगी की राह मेंसबतरु सरस रहें, न पात टूट भू गहें।कली-कली–की गोद, नित सुगंध से भरी रहे।ये गिरी–शिखर बने रहें, ये सुरसुरी बनी रहे।भँवर कोचीरती चली, प्रगति ‘तरी’ बनी रहे।छूतछातजातिभेद की प्रथा नहीं रहे।लोकतंत्रहो सजीव, मनुकथा नहीं रहे।गरज ये कितृतीय विश्व युद्ध नहीं चाहिए। विश्व की–वसुंधरा सुहागिनी बनी रहे।हवा सुचैनशांति की सदा सुहावनी रहे।नहीं रहे तोदेश की दरिद्रता नहीं रहे।आदमी की आदमी सेशत्रुता नहीं रहे।ये भुखमरी नहीं रहे,ये खुदकुशी नहीं रहे।देवियों कीदेह की तस्करी नहीं रहे।मनुष्यताकी भावना प्रबल घनी बनी रहे।चमन बना रहेचमन की स्वामिनी बनी रहे।

Ep 222Mausiyan | Dr Anamika
मौसियाँ | डॉ अनामिका वे बारिश में धूप की तरह आती हैं— थोड़े समय के लिए और अचानक! हाथ के बुने स्वेटर, इंद्रधनुष, तिल के लड्डू और सधोर की साड़ी लेकर वे आती हैं झूला झुलाने पहली मितली की ख़बर पाकर और गर्भ सहलाकर लेती हैं अंतरिम रपट गृहचक्र, बिस्तर और खुदरा उदासियों की! झाड़ती हैं जाले, सँभालती हैं बक्से, मेहनत से सुलझाती हैं भीतर तक उलझे बाल, कर देती हैं चोटी-पाटी और डाँटती भी जाती हैं कि पगली तू, किस धुन में रहती है जो बालों की गाँठे भी तुझसे ठीक से निकलती नहीं। बाल के बहाने वे गाँठे सुलझाती हैं जीवन की! करती हैं परिहास, सुनाती हैं क़िस्से और फिर हँसती-हँसाती दबी-सधी आवाज़ में बताती जाती हैं चटनी-अचार-मुँगबड़ियाँ और बेस्वाद संबंध चटपटा बनाने के गुप्त मसाले और नुस्ख़े— सारी उन तकलीफ़ों के जिन पर ध्यान भी नहीं जाता औरों का। आँखों के नीचे धीरे-धीरे जिसके पसर जाते हैं साये और गर्भ से रिसते हैं जो महीनों चुपचाप— ख़ून से आँसू-से, चालीस के आस-पास के अकेलेपन के काले-कत्थई उन चकत्तों का मौसियों के वैद्यक में एक ही इलाज है— हँसी और कालीपूजा और पूरे मोहल्ले की अम्मागिरी। बीसवीं शती की कूड़ागाड़ी लेती गई खेत से कोड़कर अपने जीवन की कुछ ज़रूरी चीज़ें— जैसे मौसीपन, बुआपन, चाचीपंथी और अम्मागिरी मग्न सारे भुवन की।

Ep 221Meri Bansuri Meri Bhasha Hai | Shahanshah Alam
मेरी बाँसुरी मेरी भाषा है | शहंशाह आलम | शहंशाह आलमसुबह उठा तो देर शाम को घर पहुँचा सूरजचाँद था कि रात भर जागा क़बीले में अथकहम दिन भर शहरी हुए और रात को आदिवासीयह मेरी भाषा की आवाज़ थी जो पहुँच रही थीआदमी के झुंड में पूरी तरह साफ़ सुनी जाने वालीइतनी साफ़ भाषा कि हम लड़ सकें अपने शत्रुओं सेमेरी भाषा मेरी बाँसुरी है और बाँसुरी मेरी आवाज़इसी भाषा के सहारे बादलों पर चलता-फिरता हुआतुम तक पहुँचता रहा था पुराना परिचित बनकरआम के पकने और शहद के मीठे होने वाले इन दिनों में उदासी कहाँ थी मेघ के चेहरे पर पिछले कई माह वालीउदासी को तुम्हारे अलावा कौन अपना मान सकता हैसहस्र बार तुम्हारे घर गया पूर्णिमा वाला उदित मेरा चाँदतुम्हारे कहने से ताकि तुम मुझे रोक लो यात्रा पर जाने सेऔर मैं जितना कविता में कह लेता था बुद्ध बनकरतुम्हारे समक्ष कहाँ सुना पाता था कोई मार्मिक वृत्तांतएक सच यह भी था कि हमने कितने-कितने जीवाश्मइकट्ठा किए साथ रहकर उस टेढ़े-मेढ़े गुप्त सुरंग मेंमेरा निरापद, सरल और प्राचीन प्रेम भी जीवाश्म ठहराअगर तुम मानते हो प्रेम को पूर्ण प्रेम भाषा को पूर्ण भाषा अगर तुम जकड़ लेते अपने आलिंगनपाश में बारिश वाली रातमेरी बाँसुरी की आवाज़ को प्रेम की नई खोज स्वीकारतेअपनी सहस्र यात्राएँ पूरी कर लौट आता तुम्हारे समय के सच में।

Ep 220Naak | Viren Dangwal
नाक | वीरेन डंगवाल हस्ती की इस पिपहरी कोयों ही बजाते रहियो मौला!आवाज़बनी रहे आख़िर तक साफ-सुथरी-निष्कंप

Ep 219Likhne Ka Arth | Vishwanath Prasad Tiwari
लिखने का अर्थ | विश्वनाथ प्रसाद तिवारी तुम किसे तलाश रहे होइस ढिबरी की रौशनी में, लिखता था प्रेमचंदइस बेंच पर जाड़े की रातों में, नंगे सोता था निरालाऔर ये है असंख्य शैया वाला अस्पतालइसके बेड नंबर 101 पर, मरा था मुक्तिबोध102 पर राजकमल, 103 पर धूमिलबेड नंबर 104, 105, 106तुम कौनसे बेड पर मरना पसंद करोगेज़िन्दा रहना और मरते जाना, एक ही बात हैकविता की दुनिया में

Ep 218Ab Wahan Ghonsle Hain | Damodar Khadse
अब वहाँ घोंसले हैं | दामोदर खड़से एक सूखा पेड़खड़ा था नदी के किनारे विरक्त पतझड़ की विभूति लगाए काल का साक्षी अंतिम घड़ियों के ख़याल में...नदी,वैसे अर्से से इस इलाके से बहती है नदी ने कभी ध्यान नहीं दियापेड़ के पत्तेसूख कर इसी नदी में बह लेते थे...इस बरसात में जब वह जवान हुईतब उसका किनारापेड़ तक पहुँचा सावन का संदेशा पाकर लहरों ने बाँध दिया एक झूला पेड़ के पाँवों में...पेड़ हरियाने लगा उसकी भभूति धुलने लगी और आँखों के वैराग्य नेदेखा एक छलकता दृश्य नदी के हृदय की ऊहापोह...भँवर...फेनिल...बस,झूम कर झूमता रहा वह अब वहाँ घोंसले हैं चिड़ियाँ रोज चहचहाती हैं नदी का किनारा वापस लौट भी जाए कोई बात नहीं -पेड़ की जड़ें नदी की सतह में उतर चुकी हैं!

Ep 217Intezaar | Sahir Ludhianvi
इंतिज़ार | साहिर लुधियानवी चाँद मद्धम है आसमाँ चुप है नींद की गोद में जहाँ चुप है दूर वादी में दूधिया बादल झुक के पर्बत को प्यार करते हैं दिल में नाकाम हसरतें ले कर हम तिरा इंतिज़ार करते हैं इन बहारों के साए में आ जा फिर मोहब्बत जवाँ रहे न रहे ज़िंदगी तेरे ना-मुरादों पर कल तलक मेहरबाँ रहे न रहे! रोज़ की तरह आज भी तारे सुब्ह की गर्द में न खो जाएँ आ तिरे ग़म में जागती आँखें कम से कम एक रात सो जाएँ चाँद मद्धम है आसमाँ चुप है नींद की गोद में जहाँ चुप है

Ep 216Pani Ko Kya Soojhi | Bhawani Prasad Mishra
पानी को क्या सूझी | भवानीप्रसाद मिश्र मैं उस दिन नदी के किनारे पर गया तो क्या जाने पानी को क्या सूझी पानी ने मुझे बूँद-बूँद पी लिया और मैं पिया जाकर पानी से उसकी तरंगों में नाचता रहा रात-भर लहरों के साथ-साथ बाँचता रहा!

Ep 215Geet | Gopaldas Neeraj
गीत - गोपालदास नीरजविश्व चाहे या न चाहे, लोग समझें या न समझें, आ गए हैं हम यहाँ तो गीत गाकर ही उठेंगे। हर नज़र ग़मगीन है, हर होंठ ने धूनी रमाई, हर गली वीरान जैसे हो कि बेवा की कलाई, ख़ुदकुशी कर मर रही है रोशनी तब आँगनों में कर रहा है आदमी जब चाँद-तारों पर चढ़ाई, फिर दियों का दम न टूटे, फिर किरन को तम न लूटे, हम जले हैं तो धरा को जगमगा कर ही उठेंगे। विश्व चाहे या न चाहे॥ हम नहीं उनमें हवा के साथ जिनका साज़ बदले, साज़ ही केवल नहीं अंदाज़ औ' आवाज़ बदले, उन फ़क़ीरों-सिरफिरों के हमसफ़र हम, हमउमर हम, जो बदल जाएँ अगर तो तख़्त बदले ताज बदले, तुम सभी कुछ काम कर लो, हर तरह बदनाम कर लो, हम कहानी प्यार की पूरी सुनाकर ही उठेंगे। विश्व चाहे या न चाहे॥ नाम जिसका आँक गोरी हो गई मैली सियाही, दे रहा है चाँद जिसके रूप की रोकर गवाही, थाम जिसका हाथ चलना सीखती आँधी धरा पर है खड़ा इतिहास जिसके द्वार पर बनकर सिपाही, आदमी वह फिर न टूटे, वक़्त फिर उसको न लूटे, ज़िंदगी की हम नई सूरत बनाकर ही उठेंगे। विश्व चाहे या न चाहे॥ हम न अपने आप ही आए दुखों के इस नगर में, था मिला तेरा निमंत्रण ही हमें आधे सफ़र में, किंतु फिर भी लौट जाते हम बिना गाए यहाँ से जो सभी को तू बराबर तौलता अपनी नज़र में, अब भले कुछ भी कहे तू, ख़ुश कि या नाख़ुश रहे तू, गाँव भर को हम सही हालत बताकर ही उठेंगे। विश्व चाहे या न चाहे॥ इस सभा की साज़िशों से तंग आकर, चोट खाकर गीत गाए ही बिना जो हैं गए वापिस मुसाफ़िर और वे जो हाथ में मिज़राब पहने मुशकिलों की दे रहे हैं ज़िंदगी के साज़ को सबसे नया स्वर, मौर तुम लाओ न लाओ, नेग तुम पाओ न पाओ, हम उन्हें इस दौर का दूल्हा बनाकर ही उठेंगे। विश्व चाहे या न चाहे॥

Ep 214Tumhare Bheetar | Mangesh Dabral
तुम्हारे भीतर - मंगलेश डबरालएक स्त्री के कारण तुम्हें मिल गया एक कोनातुम्हारा भी हुआ इंतज़ारएक स्त्री के कारण तुम्हें दिखा आकाशऔर उसमें उड़ता चिड़ियों का संसारएक स्त्री के कारण तुम बार-बार चकित हुएतुम्हारी देह नहीं गई बेकारएक स्त्री के कारण तुम्हारा रास्ता अंधेरे में नहीं कटारोशनी दिखी इधर-उधरएक स्त्री के कारण एक स्त्रीबची रही तुम्हारे भीतर।

Ep 213Kutta | Udayan Vajpeyi
कुत्ता | उदयन वाजपेई कुत्ता होने वाली मृत्यु पर रोता है। देर रात किसी गली से निकल कर किसी घर के दरवाज़े पर ठिठकती मृत्यु को देखकर पहले वह भौंकता हैफिर यह पाकर कि वह उसकी ओर ध्यान दिए बिना घर के भीतर जा रही है, वह रोना शुरू करता हैदरअसल उसका भौंकना ही पिघलकर रोने में तब्दील हो जाता हैउसका भौंकना उसका रोना ही है, झटकों में बाहर आता हुआकुत्ता रोए या भौंके, वह किसी आसन्न मृत्यु की ख़बर ही पहुँचाता है। दूसरे शब्दों में, कुत्ता न जाने कैसे यह जानता है कि जिस शहर या गली में वह इतनी शान से चल रहा है,वह महज़ एक ख़्वाब है जिसे देखने वाला बस जागने को है।

Ep 212Tum Rehna Nayan | Ajay Jugran
तुम रहना नयन | अजय जुगरान जीवन के अंतिम क्षण मेंजब काल बाँधें हथेलियाँएकटक जब हों पुतलियाँएकांत शयन मेंतुम रहना नयन में!जब टूटता श्वास खोले नई पहेलियाँऔर मन लौटे विस्मृत बचपन मेंखेलने संग ले सब सखा सहेलियाँउस खेल के अंतिम क्षण मेंतुम रहना नयन में!जब यम अथक बहेलियाजाल डाल घर उपवन मेंले जाए तन की सब तितलियाँसूदूर गगन मेंतुम रहना नयन में!जीवन के अंतिम क्षण मेंजब क्षण की चमक हो क्षण में तमसजब रुके जैसे रुके श्वास तब बसएकांत शयन मेंतुम रहना नयन में!

Ep 211Gendh | Rajesh Joshi
गेंद | राजेश जोशीएक बच्चा करीब सात-आठ के लगभगअपनी छोटी-छोटी हथेलियों मेंगोल-गोल घुमाता एक बड़ी गेंदइधर ही चला आ रहा हैऔर लो उसने गेंद कोहवा में उछाल दिया!सूरज, तुम्हारी उम्रक्या रही होगी उस वक़्त!

Ep 210Ve Isi Prithvi Par Hain | Bhagwat Rawat
वे इसी पृथ्वी पर हैं | भगवत रावत | कार्तिकेय खेतरपालइस पृथ्वी पर कहीं न कहीं कुछ न कुछ लोग हैं ज़रूरजो इस पृथ्वी को अपनी पीठ परकच्छपों की तरह धारण किए हुए हैंबचाए हुए हैं उसेअपने ही नरक में डूबने सेवे लोग हैं और बेहद नामालूम घरों में रहते हैंइतने नामालूम कि कोई उनका पताठीक-ठीक बता नहीं सकताउनके अपने नाम हैं लेकिन वेइतने साधारण और इतने आमफहम हैंकि किसी को उनके नामसही-सही याद नहीं रहतेउनके अपने चेहरे हैं लेकिन वेएक दूसरे में इतने घुले-मिले रहते हैंकि कोई उन्हें देखते ही पहचान नहीं पातावे हैं, और इसी पृथ्वी पर हैंऔर यह पृथ्वी उन्हीं की पीठ पर टिकी हुई हैऔर सबसे मजेदार बात तो यह है कि उन्हेंरत्ती भर यह अंदेशा नहींकि उन्हीं की पीठ परटिकी हुई यह पृथ्वी।

Ep 209Neembu Maangkar | Chandrakant Devtale
नीम्बू माँगकर | चन्द्रकान्त देवतालेबेहद कोफ़्त होती है इन दिनोंइस कॉलोनी में रहते हुएजहाँ हर कोई एक-दूसरे कोजासूस कुत्ते की तरह सूँघता हैअपने-अपने घरों में बैठे लोग वहीं से कभी-कभारटेलीफोन के ज़रिये अड़ोस-पड़ोस की तलाशी लेते रहते हैंपर चेहरे पर एक मुस्कान चिपकी रहती हैजो एक-दूसरे को कह देती है — " हम स्वस्थ हैं और सानंदऔर यह भी की तुम्हें पहचानते हैं, ख़ुश रहो ",यहाँ तक भी ठीक हैपर अजीब लगता है की घरु ज़रूरतों के मामले मेंसब के सब आत्मनिर्भर और बढ़िया प्रबंधक हो गए हैंपुरानी बस्ती में कोई दिन नहीं जाता थाकी बड़ी फज़र की कुण्डी नहीं खटखटाई जातीऔर कोई बच्चा हाथ में कटोरी लिए नहीं कहता 'बुआमाँ ने चाय-पत्ती मँगाई है'किसी के यहाँ आटा खुट जाताऔर कभी ऐन छौंक से पहलेप्याज, लहसुन या अदरक की गाँठ की माँग होतीहोने पर बराबर दी जाती चाहे कुढ़ते-बड़बड़ करते हुएपर यह कुढ़न दूसरे या तीसरे दिन हीआत्मीय आवाज़ में बदल जातीजब जाना पड़ता कहते हुएभाभी ! देख थोड़ी देर पहले ही ख़त्म हुआ दूधऔर फिर आ गए हैं चाय पीने वालेरोज़मर्रा की ऐसी माँगा-टूँगी की फेहरिस्त मेंऔर भी कई चीज़ें शामिल रहतींजैसे तुलसी के पत्ते या कढ़ी-नीमबेसन-बड़े भगोने, बाम की शीशीऔर वक़्त पड़ने पर दस-बीस रुपए भीऔर इनके साथ ही आपसी सुख-दुःख भी बँटता रहताजो इस पृथ्वी का दिया होता प्राकृतिकऔर दुनिया के हत्यारों का भीपर इस कॉलोनी में लगता हैसभी घरों में अपने-अपने बाज़ार हैं और बैंकें भीपर नीम्बू शायद ही मिलेहाँ ! नीम्बू एक सुबह मैं इसी को माँगने दो-तीन घर गयापद्मा जी, निर्मला जी, आशा जी के घर तो होने ही थेनीम्बू क्यूँकि इसके पेड़ भी हैं उनके यहाँपर हर जगह से 'नहीं है' का टका-सा जवाब मिलामैंने फ़ोन भी किएदीपा जी ने तो यहाँ तक कह दिया'क्यों माँगते है आप मुझसे नीम्बू'मै क्या जवाब देताबुदबुदाया — इतने घर और एक नीम्बू तक नहींउज्जैन फ़ोन लगाकरकमा को बताया यह वाक़यावहीं से वह बड़बड़ाईवहाँ माँगा-देही का रिवाज़ नहींसमझाया था पहले हीफिर भी तुम बाज़ नहीं आए आदत से अपनीवहाँ इंदौर में नीम्बू माँगकर तुमनेयहाँ उज्जैन में मेरी नाक कटवा ही दीहँसी आई मुझे अपनी नाक पर हाथ फेरतेजो कायम मुकम्मल थी और साबूत भी

Ep 208Chand Tanha Hai Aasman Tanha | Meena Kumari Naaz
चाँद तन्हा है आसमाँ तन्हा - मीना कुमारी नाज़चाँद तन्हा है आसमाँ तन्हा दिल मिला है कहाँ कहाँ तन्हा बुझ गई आस छुप गया तारा थरथराता रहा धुआँ तन्हा ज़िंदगी क्या इसी को कहते हैं जिस्म तन्हा है और जाँ तन्हा हम-सफ़र कोई गर मिले भी कहीं दोनों चलते रहे यहाँ तन्हा जलती-बुझती सी रौशनी के परे सिमटा सिमटा सा इक मकाँ तन्हा राह देखा करेगा सदियों तक छोड़ जाएँगे ये जहाँ तन्हा

Ep 207Ek Aurat Ka Pehla Rajkiya Pravas | Anamika
एक औरत का पहला राजकीय प्रवास | अनामिका वह होटल के कमरे में दाख़िल हुई!अपने अकेलेपन से उसनेबड़ी गर्मजोशी से हाथ मिलाया।कमरे में अंधेरा था।घुप्प अंधेरा था कुएँ काउसके भीतर भी!सारी दीवारें टटोली अंधेरे में,लेकिन ‘स्विच’ कहीं नहीं था!पूरा खुला था दरवाज़ा,बरामदे की रोशनी से ही काम चल रहा था!सामने से गुज़रा जो ‘बेयरा’ तोआर्त्तभाव से उसे देखा!उसने उलझन समझी, औरबाहर खड़े-ही-खड़ेदरवाज़ा बंद कर दिया!जैसे ही दरवाज़ा बंद हुआ,बल्बों में रोशनी के खिल गए सहस्रदल कमल!“भला बंद होने से रोशनी का क्या है रिश्ता?”उसने सोचा।डनलप पर लेटी,चटाई चुभी घर की, अंदर कहीं–रीढ़ के भीतर!तो क्या एक राजकुमारी ही होती है हर औरत?सात गलीचों के भीतर भीउसको चुभ जाता हैकोई मटरदाना आदिम स्मृतियों का?पढ़ने को बहुत-कुछ धरा था,पर उसने बाँची टेलीफ़ोन तालिकाऔर जानना चाहाअंतरराष्ट्रीय दूरभाष का ठीक-ठीक ख़र्चा।फिर, अपनी सब डॉलरें ख़र्च करकेउसने किए तीन अलग-अलग कॉल!सबसे पहले अपने बच्चे से कहा“हैलो-हैलो, बेटेपैकिंग के वक्त... सूटकेस में ही तुम ऊँघ गए थे कैसे...सबसे ज़्यादा याद आ रही है तुम्हारीतुम हो मेरे सबसे प्यारे!”अंतिम दोनों पंक्तियाँ अलग-अलग उसने कहींआफ़िस में खिन्न बैठे अंट-शंट सोचते अपने प्रिय सेफिर, चौके में चिंतित, बर्तन खटकाती अपनी माँ से।... अब उसकी हुई गिरफ़्तारी।पेशी हुई ख़ुदा के सामनेकि इसी एक ज़ुबाँ से उसनेतीन-तीन लोगों से कैसे यह कहा“सबसे ज़्यादा तुम हो प्यारे !”यह तो सरासर है धोखासबसे ज़्यादा माने सबसे ज़्यादा!लेकिन, ख़ुदा ने कलम रख दीऔर कहा–“औरत है, उसने यह ग़लत नहीं कहा!”

Ep 206Main Raaste Bhoolta Hun | Chandrakant Devtale
मैं रास्ते भूलता हूँ और इसीलिए नए रास्ते मिलते हैं | चंद्रकांत देवताले मैं रास्ते भूलता हूँऔर इसीलिए नए रास्ते मिलते हैंमैं अपनी नींद से निकल कर प्रवेश करता हूँकिसी और की नींद मेंइस तरह पुनर्जन्म होता रहता हैएक जिंदगी में एक ही बार पैदा होनाऔर एक ही बार मरनाजिन लोगों को शोभा नहीं देतामैं उन्हीं में से एक हूँफिर भी नक्शे पर जगहों को दिखाने की तरह ही होगामेरा जिंदगी के बारे में कुछ कहनाबहुत मुश्किल है बतानाकि प्रेम कहाँ था किन-किन रंगों मेंऔर जहाँ नहीं था प्रेम उस वक्त वहाँ क्या थापानी, नींद और अँधेरे के भीतर इतनी छायाएँ हैंऔर आपस में प्राचीन दरख्तों की जड़ों की तरहइतनी गुत्थम-गुत्थाकि एक दो को भी निकाल करहवा में नहीं दिखा सकताजिस नदी में गोता लगाता हूँबाहर निकलने तकया तो शहर बदल जाता हैया नदी के पानी का रंगशाम कभी भी होने लगती हैऔर उनमें से एक भी दिखाई नहीं देताजिनके कारण चमकता हैअकेलेपन का पत्थर

Ep 205Sab Tumhe Nahi Kar Sakte Pyar | Kumar Ambuj
सब तुम्हें नहीं कर सकते प्यार | कुमार अंबुज यह मुमकिन ही नहीं कि सब तुम्हें करें प्यार यह तुम बार-बार नाक सिकोड़ते हो और माथे पर जो बल आते हैं हो सकता है किसी एक को इस पर आए प्यार लेकिन इसी वजह से कई लोग चले जाएँगे तुमसे दूर सड़क पार करने की घबराहट खाना खाने में जल्दबाज़ी या ज़रा-सी बात पर उदास होने की आदत कई लोगों को तुम्हें प्यार करने से रोक ही देगी फिर किसी को पसंद नहीं आएगी तुम्हारी चाल किसी को आँख में आँख डालकर बात करना गुज़रेगा नागवार चलते-चलते रुक कर इमली का पेड़ देखना एक बार फिर तुम्हारे ख़िलाफ़ जाएगा फिर भी यदि तुमसे बहुत से लोग एक साथ कहें कि वे सब तुमको करते हैं प्यार तो रुको और सोचो यह बात जीवन की साधारणता के विरोध में है यह होगा ही कि तुम धीरे-धीरे अपनी तरह का जीवन जीयोगेऔर अपने प्यार करने वालों को अजीब मुश्किल में डालते चले जाओगे जो उन्नीस सौ चौहत्तर में, उन्नीस सौ नवासी में और दो हज़ार पाँच में करते थे तुमसे प्यार तुम्हारी जड़ों में देते थे पानी और कुछ जगह छोड़ कर खड़े होते थे कि तुम्हें मिले प्रकाश वे भी एक दिन इसलिए जा सकते हैं दूर कि अब तुम्हारे जीवन की परछाईं उनकी जगह तक पहुँचती है तुम्हारे पक्ष में सिर्फ़ यही बात हो सकती है कि कुछ लोग तुम्हारे खुरदरेपन की वज़ह से भी करने लगते हैं तुम्हें प्यार जीवन में उस रंगीन चिड़िया की तरफ़ देखो जो किसी का मन मोह लेती है और ठीक उसी वक़्त एक दूसरा उसे देखता है शिकार की तरह।

Ep 204Ab Lautna Sambhav Nahi Hai | Ajay Jugran
अब लौटना संभव नहीं है | अजय जुगरानतुम्हारे साथ की यात्रा में अब लौटना संभव नहीं है। क्यों सब कुछ हो रीति में जब प्रीति कम नहीं है?तुम्हारे साथ की यात्रा में अब लौटना संभव नहीं है।चलो सीमापार स्वप्न में जहाँ रूढ़ि बंध नहीं है। क्यों यहाँ रहे नीति में बंद जब श्वास छंद वहीं है?तुम्हारे साथ की यात्रा में अब लौटना संभव नहीं है।यूँ देखो झाँक मुझमेंहृदय बुद्धि संग यहीं है। नहीं सब कुछ काम रीति में प्रेम मर्म यहीं है।तुम्हारे साथ की यात्रा में अब लौटना संभव नहीं है।क्या सुख ऐसे जीवन में जिसमें तू संग नहीं है?अगर शून्य हम और मिले शून्य ही में तो निश्चिंत प्रेम का पर्यंक वहीं है!

Ep 203Ummeed | Damodar Khadse
उम्मीद | दामोदर खड़से कभी-कभी लगता रहा मुझे समय कैसे कटेगा जिंदगी का जब होगा नहीं कोई फूल बहेगी नहीं कोई नदी पहाड़ हो जाएँगे निर्वसन मौसम में न होगा कोई त्योहार हवाओं में होगी नहीं गंध समुद्र होगा खोया-खोया उदास शामें गुमसुम-गुमसुम और सुबह में न कोई उल्लास कैसे कटेगा तब समयजिंदगी का?सोच-सोच मैं होता रहता सदा अकेला पर आ जाती है ऐसे में कोई आवाज़ भीतर से मंदिर की घंटी की तरह ज्यों जाग गए हों देवता सारे चारों ओर हो रहे मंत्रोच्चार से लद गए हों वृक्ष-वनस्पतियाँधूप की रोशनी मेंदिख रहा हो सब पारदर्शी जाग गई हो प्रकृति सारीऔर समय मेरे कानों मेंफुसफुसाता है जोर सेमैं थाम लेता हूँ अचकचाकरपानी से भरे बादलों कोऔर नमी मेरे भीतर तकदौड़ जाती है...अपनी धरती से उठती आवाज़जगाती उम्मीद बहुत हैफिर लगता है, बहुत सहारे बाकी हैं अभी!

Ep 202Main Kyun Likhta Hun | Bhavani Prasad Mishra
मैं क्यों लिखता हूँ / भवानीप्रसाद मिश्रमैं कोई पचास-पचास बरसों सेकविताएँ लिखता आ रहा हूँअब कोई पूछे मुझसेकि क्या मिलता है तुम्हें ऐसाकविताएँ लिखने सेजैसे अभी दो मिनट पहलेजब मैं कविता लिखने नहीं बैठा थातब काग़ज़ काग़ज़ थामैं मैं थाऔर कलम कलममगर जब लिखने बैठातो तीन नहीं रहे हमएक हो गए

Ep 201Katthai Gulab | Shamsher Bahadur Singh
कत्थई गुलाब - शमशेर बहादुर सिंहकत्थई गुलाब दबाए हुए हैं नर्म नर्म केसरिया साँवलापन मानो शाम की अंगूरी रेशम की झलक, कोमल कोहरिल बिजलियाँ-सी लहराए हुए हैं आकाशीय गंगा की झिलमिली ओढ़े तुम्हारे तन का छंद गतस्पर्श अति अति अति नवीन आशाओं भरा तुम्हारा बंद बंद “ये लहरें घेर लेती हैं ये लहरें... उभरकर अर्द्धद्वितीया टूट जाता है...” किसका होगा यह पद किस कवि-मन का किस सरि-तट पर सुना? ओ प्रेम की असंभव सरलते सदैव सदैव!

Ep 200Tukde Tukde Din Beeta | Meena Kumari Naaz
टुकड़े टुकड़े दिन बीता | मीना कुमारी नाज़ टुकड़े टुकड़े दिन बीता धज्जी धज्जी रात मिली जिस का जितना आँचल था उतनी ही सौग़ात मिली रिम-झिम रिम-झिम बूंदों में ज़हर भी है अमृत भी है आँखें हँस दीं दिल रोया ये अच्छी बरसात मिली जब चाहा दिल को समझें हँसने की आवाज़ सुनी जैसे कोई कहता हो ले फिर तुझ को मात मिली मातें कैसी घातें क्या चलते रहना आठ पहर दिल सा साथी जब पाया बेचैनी भी साथ मिली होंटों तक आते आते जाने कितने रूप भरे जलती बुझती आँखों में सादा सी जो बात मिली

Ep 199Ishwar Ke Saamne Nirvastra | Shraddha Upadhyay
ईश्वर के सामने निर्वस्त्र | श्रद्धा उपाध्यायतांबे के ईश्वर सपरिवारजिनको मैंने अमेजन से खरीदामेरी किताबों के आगे स्थापितएक बुझे हुए दीपक के पीछेउन पर समर्पित पुष्प, न ताज़े, न सूखेमेरे साथ रहते हैंमेरे एकाकी एक कमरे के अस्तित्व मेंसामान्यतः न पूजेlकभी कभी न सुमिरेफिर भी रहते हैं सुस्त साथी की तरहऔर कुछ दिन मैं देखती हूंमुझे देखते हुएनिर्वस्त्रकपड़े पहनने से पहलेकपड़े उतारने के बादमैं लजा जाती हूँक्या मैं उन्हें ले जाऊंअपने रहवासे सेकिसी पूजाघर मेंऔर राम को क्या अर्पण करूंकाया जो मैं रोज़ पहनती हूंकाया जिसमें उसको वनवास नहीं हो सकता

Ep 198Kaala | Koduram Dalit
काला | कोदूराम दलितकाला अच्छा है, काले में है अच्छाईदुनियावालों! काले की मत करो बुराईसुनो ध्यान से काले की गुणभरी कहानीबड़ी चटपटी, बड़ी अटपटी, बड़ी सुहानीप्रथम पूज्य है जो गणेश जग में जन-जन कावह है काला मैल, मातु के तन कागोरस काली गैया का अच्छा होता हैपूजन काली मैया का अच्छा होता हैचार किसम के बादल आसमान में छातेलेकिन काले बादल ही जल बरसा जातेकाली कोयल की मधुर वाणी मन हरतीअधिक अन्न पैदा करती है काली धरतीकाले उड़दों से ही तो हम बड़े बनातेस्वर्ग-लोक से जिन्हें पितरगण खाने आतेकाली लैला की महिमा मजनू से पूछोकाली रातों की गरिमा जुगनू से पूछोसकल करम केवल काली रातों में होताराम-राम रटता काले पिंजरे में तोताबनता हीरे जैसा रतन, कोयला कालाकाला लोहा है मनुष्य का मित्र निरालाकाली स्लेट, पेंसिल काली, तख़्ता कालापाता है इंसान इसी से ज्ञान-उजालापाल रही परिवार अनगिनित काली स्याहीकम है, इसकी जितनी भी की जाय बड़ाईकर काला-बाजार कमा लो कस कर पैसाबैलों से बेहतर होता है काला भैंसाकाला कोट कचहरी में शुभ माना जाताकानून-बाज़ इसी पर से पहचाना जाताकाले की खूबियाँ विशेष जानना चाहोतो चाणक्य-चरित्र एक बार पढ़ जाओकाले कंचन बाल और आँखें कजरारीपाती है इनको, क़िस्मत वाली ही नारीबुढ़िया-बुढ़ऊ भी तो नित्य खिजाब लगातेकाले बाल बताओ किसको नहीं सुहातेगोरे गालों पर काला तिल खूब दमकताकाले धब्बे वाला चम-चम चाँद चमकताकाला ही था रचने वाला पावन गीताबिन खटपट के काले ने गोरे को जीताकरो प्रणाम सदा काली कमली वाले कोबुरा न कहना कभी भूल कर भी काले को

Ep 197Dopahar Ka Bhojan | Kumar Vikal
दोपहर का भोजन | कुमार विकलदुःखदुःख को सहनाकुछ मत कहना—बहुत पुरानी बात है।दुःख सहना, परसब कुछ कहनायही समय की बात है।दुःख को बना के एक कबूतरबिल्ली को अर्पित कर देनाजीवन का अपमान है।दुःख को आँख घूरकर देखोअपने हथियारों को परखोऔर समय आते ही उस परपूरी ताक़त संचय करकेऐसा झड़पोभीगी बिल्ली-सा वह भागेतुम पीछे, वह आगे-आगे।दुःख को कविता में रो देना‘यह कविता की रात है’दुःख से लड़कर कविता लिखनागुरिल्ला शुरुआत है।

Ep 196Chidiyon Ko Pata Nahin | Bhagwat Rawat
चिड़ियों को पता नहीं | भगवत रावतचिड़ियों को पता नहीं कि वेकितनी तेज़ी से प्रवेश कर रही हैंकविताओं में।इन अपने दिनों में खासकरउन्हें चहचहाना थाउड़ानें भरनी थींऔर घंटों गरदन में चोंच डालेगुमसुम बैठकरअपने अंडे सेने थे।मैं देखता हूँ कि वेअक्सर आती हैंबेदर डरी हुईंपंख फड़फड़ातीआहतया अक्सर मरी हुईं।उन्हें नहीं पता था किकविताओं तक आते-आतेवे चिड़ियाँ नहीं रह जातीं,वे नहीं जानतीं कि उनके भरोसेकितना कुछ हो पा रहा हैऔर उनके रहते हुएकितना कुछ ठहरा हुआ है।अभी जब वे अचानक उड़ेंगींतो आसमान उतना नहीं रह जाएगाऔर जब वे उतरेंगींतो पेड़ हवा हो जाएँगे।मैं सारी चिड़ियों को इकट्ठा करकेउनकी ही बोली में कहना चाहता हूँकि यह बहुत अच्छा हैकि तुम्हें कुछ नहीं पता।तुम हमेशा की तरहकविताओं की परवाह किए बिना उड़ोचहचहाओऔर बेखटकेआलमारी में रखी किताबों के ऊपरघोंसले बनाकरअपने अंडे सेओ।न सही कविता मेंपर हर रोज़पेड़ से उतरकरघर मेंदो-चार बारज़रूर आओ-जाओ।

Ep 195Tumne Mujhe | Shamsher Bahadur Singh
तुमने मुझे | शमशेर बहादुर सिंहतुमने मुझे और गूँगा बना दिया एक ही सुनहरी आभा-सी सब चीज़ों पर छा गई मै और भी अकेला हो गया तुम्हारे साथ गहरे उतरने के बाद मैं एक ग़ार से निकला अकेला, खोया हुआ और गूँगा अपनी भाषा तो भूल ही गया जैसे चारों तरफ़ की भाषा ऐसी हो गई जैसे पेड़-पौधों की होती है नदियों में लहरों की होती है हज़रत आदम के यौवन का बचपना हज़रत हौवा की युवा मासूमियत कैसी भी! कैसी भी! ऐसा लगता है जैसे तुम चारों तरफ़ से मुझसे लिपटी हुई हो मैं तुम्हारे व्यक्तित्व के मुख में आनंद का स्थायी ग्रास... हूँ मूक।

Ep 194Gaon | Anju Ranjan
गाँव | अंजु रंजनजब पिछली बार गाँव छोड़ती थी उस पोखर वाले मोड़ से मुड़ती थी बरबस ही बाँध लेता था मेरे क़दमों को मेरा गाँव! पिता की तरह वेदना विदुर दृष्टि और आँसू भरे नयनों को पिता की तरह मजबूत दिखावा बनकर मौन खड़ा था मेरा गाँव! माँ की ममता की तरह रूखे हाथों से वे रूखी हवाएँ सूखा जाती थी मेरे आँसूविपरीत दिशा से बह कर वो लिपटा लेती थी ख़ुद सेमेरी माँ बनकर तब नि:शब्द रोता था मेरा गाँव!दीन-हीन, अनपढ़-अनगढ़ मेरा वो मैला-कुचैला गाँव मेरे सनील के ख़ुशबू से सहम गया सा लगता था और गोबर और खाद की बदबू को धनिया पत्ते से छिपाता था तंग गलियों और कच्चे रास्तों के लिए जैसे वही जिम्मेदार है! ऐसा शर्मसार लगता था मेरा गाँव! मेरी लाल बत्ती वाली गाड़ी के साथ सेल्फ़ी लेकर अपनी झेंप मिटाता था उसको ख़बर थी कि अब मेरा लौट कर आना है मुश्किल फिर भी बार-बार लौट आने को कहता था मेरा गाँव!कोई क़ीमत नहीं उन चीज़ों की मेरे लिए मैं उन्हें विमान में ले जा भी न सकूँपर तुलसी, नीम और खट्टे बेरों की सौग़ातें जुटाता फिरता था मेरा गाँव मेरे विदेशी बच्चों को हैरान करता भूतहे इमली और शमशान वाली डायन के झूठे-सच्चे क़िस्से सुनाता था मेरा गाँव!कितने अधूरे प्रेम-प्रसंगों और मेरी कितनी शरारतों और शैतानियों को मुस्कुराकर झेल लेता था गाँव माँ जब तंग आकर मारने दौड़तीं तो अपने आग़ोश में छुपा लेता था गाँव!मेरे बचपन के इस ख़ज़ाने को लेकर मुझे मचलता खोजता फिरता था का गाँव!