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Pratidin Ek Kavita

Pratidin Ek Kavita

1,141 episodes — Page 17 of 23

Ep 343Jo Kuch Dekha-Suna, Samjha, Likh Diya | Nirmala Putul

जो कुछ देखा-सुना, समझा, लिख दिया | निर्मला पुतुलबिना किसी लाग-लपेट के तुम्हें अच्छा लगे, ना लगे, तुम जानो चिकनी-चुपड़ी भाषा की उम्मीद न करो मुझसे जीवन के ऊबड़-खाबड़ रास्ते पर चलते मेरी भाषा भी रूखड़ी हो गई है मैं नहीं जानती कविता की परिभाषा छंद, लय, तुक का कोई ज्ञान नहीं मुझे और न ही शब्दों और भाषाओं में है मेरी पकड़ घर-गृहस्थी सँभालते लड़ते अपने हिस्से की लड़ाई जो कुछ देखा-सुना-भोगा बोला-बतियाया आस-पड़ोस में संगी-साथी से लिख दिया सीधा-सीधा समय की स्लेट पर टेढ़े-मेढ़े अक्षरों में, जैसे-तैसे तुम्हारी मर्ज़ी तुम पढ़ो न पढ़ो! मिटा दो, या कर दो नष्ट पूरी स्लेट ही पर याद रखो। फिर कोई आएगा, और लिखे-बोलेगा वही सब कुछ जो कुछ देखे-सुनेगा भोगेगा तुम्हारे बीच रहते तुम्हारे पास शब्द हैं, तर्क हैं, बुद्धि है पूरी की पूरी व्यवस्था है तुम्हारे हाथों तुम सच को झुठला सकते हो बार-बार बोलकर कर सकते हो ख़ारिज एक वाक्य में सब कुछ मेरा आँखों देखी को ग़लत साबित कर सकते हो तुम जानती हूँ मैं पर मत भूलो! अभी पूरी तरह ख़त्म नहीं हुए सच को सच और झूठ को पूरी ताक़त से झूठ कहने वाले लोग!

Mar 9, 20242 min

Ep 304Jo Mere Ghar Kabhi Nahi Ayenge | Vinod Kumar Shukla

जो मेरे घर कभी नहीं आएँगे | विनोद कुमार शुक्ल जो मेरे घर कभी नहीं आएँगे मैं उनसे मिलने उनके पास चला जाऊँगा। एक उफनती नदी कभी नहीं आएगी मेरे घर नदी जैसे लोगों से मिलने नदी किनारे जाऊँगा कुछ तैरूँगा और डूब जाऊँगा पहाड़, टीले, चट्टानें, तालाब असंख्य पेड़ खेत कभी नहीं आएँगे मेरे घर खेत-खलिहानों जैसे लोगों से मिलने गाँव-गाँव, जंगल-गलियाँ जाऊँगा। जो लगातार काम में लगे हैं मैं फ़ुरसत से नहीं उनसे एक ज़रूरी काम की तरह मिलता रहूँगा— इसे मैं अकेली आख़िरी इच्छा की तरह सबसे पहली इच्छा रखना चाहूँगा।

Mar 8, 20241 min

Ep 342Baarish Ke Kandhe Par Sar rakhta Hun

बारिश के काँधे पर सिर रखता हूँ | शहंशाह आलमपीड़ा में पेड़ जब दुःख बतियाते हैं दूसरे पेड़ सेमैं बारिश के काँधे पर सिर रखता हूँ अपनाआदमी बमुश्किल दूसरे का दुःख सुनना पसंद करता हैबारिश लेकिन मेरा दुखड़ा सुनने ठहर जाती हैकभी खिड़की के पास कभी दरवाज़े पर तो कभी ओसारे मेंकवि होना कितना कठिन है आज के समय मेंऔर गिरहकट होना कितना आसान काम हैहत्यारा होना तो और भी आसान होता हैबस चाकू निकाला और घोंप डालासामने से आ रहे कम बातचीत करने वाले के पेट मेंगिरहकट से या हत्यारे से बचाने का कोई उपायबारिश के पास कभी नहीं होताहाँ, इतना उसके पास ज़रूर होता हैकि बारिश मेरे आँसुओं को छुपा लेती है अपने पानी मेंताकि मेरे क्रांतिकारी होने का भ्रम बचा रहेइस पूरे कालखंड की कविता में।

Mar 7, 20242 min

Ep 341Ek Ma Ki Bebasi | Kunwar Narayan

एक माँ की बेबसी | कुँवर नारायण न जाने किस अदृश्य पड़ोस से निकल कर आता था वह खेलने हमारे साथ— रतन, जो बोल नहीं सकता था खेलता था हमारे साथ एक टूटे खिलौने की तरह देखने में हम बच्चों की ही तरह था वह भी एक बच्चा। लेकिन हम बच्चों के लिए अजूबा था क्योंकि हमसे भिन्न था। थोड़ा घबराते भी थे हम उससे क्योंकि समझ नहीं पाते थे उसकी घबराहटों को, न इशारों में कही उसकी बातों को, न उसकी भयभीत आँखों में हर समय दिखती उसके अंदर की छटपटाहटों को। जितनी देर वह रहता पास बैठी उसकी माँ निहारती रहती उसका खेलना। अब जैसे-जैसे कुछ बेहतर समझने लगा हूँ उनकी भाषा जो बोल नहीं पाते हैं याद आती रतन से अधिक उसकी माँ की आँखों में झलकती उसकी बेबसी।

Mar 6, 20241 min

Ep 340Ek Ashwasti - Halki Phulki | Prem Vats

एक आश्वस्ति - हल्की फुलकी | प्रेम वत्स एक हल्का घुला हुआ गुलाबीपनपंखुरियों की भाँति चिपक-सा जाता हैउसके हल्के रोंयेदार गालों के दोनों उट्ठलों सेजो हल्का-सा भी अप्रत्याशित होने परउठ खड़े होते हैं खरगोशी कान जैसेप्रेम में अक्सरउसे भी तुम प्रेम ही कहोजब वह अपनी ठुड्ढी पर तड़के आएहल्के नर्म बालों को वजह-बेवजहअपनी उंगलियों से पुचकारता रहता हैऔर ख़यालों में खोए उस महाशय सेजब तुम कुछ पूछते हो तो वह फिर से नापने लगता हैउन दाढ़ियों को इंच-दर-इंचजिन्हें अब तक दाढ़ी कह पाना भीएक अतिशयोक्ति हैवह हताश होकर खट्ट-से बैठ जाता हैगौर करो इतनी जोर की हताशाउसे कभी नहीं आईयह उतनी ही जोर की हैजितनी जोर की हँसी छूटी थी उसकीकलप-कलप के रोने के घंटों बाद उस रोजवह आज भी प्रेम में है...इसलिए अपनी भावनाओं कोस्पर्श कर सकने कीसबसे निकटतम दूरी पर हैऔर शायद इसलिएहर्ष और विषाद के उन क्षणों मेंवह सबसे कुशल अभिव्यंजक होता हैइतना कुशल कि आँसूओं के आगेजो तुम रखते हो कोरा कागजतो रच जाता है अनंत सर्गों का महाकाव्यऔर उसके अट्टहासों और चित्कारों परजब तुम कान धरते होतो सुन पाते होअपनी सदी के सबसे मधुरतम संगीत कोप्रेम में उसके विलापउतने ही कर्णप्रिया होते हैंजितने ज्यादा कर्कशतुम्हारे कौमी रक्षक नेताओं केबहिष्कारी प्रवचन तुम्हें लगते हैंतुमने उसके चेहरे कीअस्पष्ट भंगिमाएं देखीं हैंउनमें कितनी अपार संभावनाएं हैंअर्थ को बहुलता प्रदान करने कीतुम्हारे पर्दे पर का सर्वश्रेष्ठ नायक भीअब एक आयामी अभिनय करने लगा हैतुमने गौर किया है इस बात पर?उसकी मुद्राओं से बहकर गिरता है शृंगारजब-जब भी वह स्पर्श करता हैतुम्हारे अंतःस्थल के भी निचले तल कोकितने सत्-चित्त-आनंद कीआमद होती है तुममेंतुमने टटोला है खुद कोइस धरा पर अपने सबसे ज्यादामत्त हुए क्षणों मेंतुम उन अप्रत्याशित क्षणों मेंएकदम बेडौल-से लगते होकोई चीन्हा-पहचाना भी तुम्हेंअनचीन्हा बता जायेगाइतने वीभत्स दिखते हो तुमक्या उन क्षणों में तुमने अपने अधरों परशहद जैसा कुछ महसूस किया है?वह.. वही है..तुम्हारे सबसे अनाकर्षकपर सबसे ज्यादा मानवीय गंध मेंतुम्हें सब से अधिकअपनी साँसों में भर लेने वाला.प्रेम में अक्सरअप्रत्याशा ही हाथ लगती हैजब भी प्रेमअपने गर्भावस्था में पक रहा होता हैदो नाज़ुक शावकों के बीचजो वयोवृद्ध होने की कगार पर हैंपर उन क्षणों के लिए बने रहते हैंजगत के सबसे प्रियतम जोड़ेजैसे इस क्षण के लिएएक तुम हो और एक वह... देखो वह अब भीअपनी ठुड्ढी के बालों को सहला रहा हैदेखो उसके गालों के दो उट्ठलों मेंफंसे गुलाबीपन कोकिसी के तुम्हारे प्रेम में होने काइससे ज्यादा क्या प्रमाण चाहिए तुम्हें!

Mar 5, 20244 min

Ep 339Amma Bachpan Ko Laut Rahi Hai | Ajay Jugran

अम्मा बचपन को लौट रही है | अजेय जुगरान उठने को सहारा चाहेअम्मा बचपन को लौट रही है।चलने को सहारा चाहेअम्मा छुटपन को लौट रही है।बैठने को सहारा चाहेअम्मा शिशुपन को लौट रही है।ज़िद्द से न किनारा पाएअम्मा बालपन को लौट रही है।खाते खाना गिराएअम्मा बचपन को लौट रही है।सोने को टी वी चलाएअम्मा छुटपन को लौट रही है।नितकर्म को टालती जाएअम्मा शिशुपन को लौट रही है।बातों को दोहराती जाएअम्मा बालपन को लौट रही है।दिन में सो रातों को जगाएअम्मा बचपन को लौट रही है।अम्मा से बनी दादी - परनानी के साएअवकाश प्राप्त कर हम घर लौट रहे हैंऔर अम्मा, अम्मा बचपन को लौट रही है।अभिभावक बने उसके ही प्रेम पलाएआशीर्वाद को उसके हम घर लौट रहे हैंऔर अम्मा, अम्मा बचपन को लौट रही है।

Mar 4, 20242 min

Ep 338Bhookhdaan | Mehboob

भूखदान | महबूब शांत अंधेरे सन्नाटे के बीच चीखती गुजरती एक आवाज़ लोहे के लोहे से टकराने कीया उस भूखे पेट के गुर्राने की जो लेटा है उसी लोहे के सड़क किनारे किसी भिनभिनाती-सी जगह पर खेल रही हैं कुछ मक्खियाँ उसके मुख परजैसे वो जानती हों कि गरीब यहाँ सिर्फ खेलने की चीज है इस बीच कुछ लोग गुज़रे उधर से उसे निहारते हुएकोई हँसा कोई मुस्कुराया किसी को घृणा हुई किसी ने अफसोस जताया आखिर करते भी क्या बेचारे इंसान जो ठहरे इनके पास कहाँ इतना वक्त कि जिस थाली के सिर्फ दो निवाले खाने के बाद उससे कूड़े दान का पेट भर दिया गया उसी थाली से उस पेट को भर देजिसमें से आ रही थी वह सन्नाटे को चीरने वाली आवाज और वो शख्स अभी भी घुटनों से पेट को जकड़े हुए हाथों से घुटनों को पकड़े हुएइसी इंतज़ार में बैठा है कि कोई तो अपनीझूठी थाली कूड़ेदान को ना देकर भूखदान को देगा

Mar 3, 20242 min

Ep 337Ye Kaisi Vivashta Hai? | Kunwar Narayan

यह कैसी विवशता है? | कुँवर नारायणयह कैसी विवशता है— किसी पर वार करो वह हँसता रहता या विवाद करता।यह कैसी पराजय है— कहीं घाव करें रक्त नहीं केवल मवाद बहता। अजीब वक़्त है— बिना लड़े ही एक देश का देश स्वीकार करता चला जाता अपनी ही तुच्छताओं की अधीनता! कुछ तो फ़र्क़ बचता धर्मयुद्ध और कीटयुद्ध में— कोई तो हार-जीत के नियमों में स्वाभिमान के अर्थ को फिर से ईजाद करता।

Mar 2, 20241 min

Ep 300Kya Aapko Prem Pasand Hai | Shraddha Upadhyay

क्या आपको प्रेम पसंद है ? | श्रद्धा उपाध्याय मैं पहले भी खो गई थी एक खाई की गहराई के भय में मैं नहीं सुन पाई थी झरने का संगीतशोकगीत लिखने की व्यस्तता में सूरज से आँख ना मिला पाने की निराशा में मैंने फोड़ी ही अपनी आँखें कृत्रिम रौशनियों को घूरकरअतीत के घाव जिन पर लगनी थी समय की मरहमउनको लेकर बेवक्त भागी और तोड़े अपने पैर क्या मैं हमेशा मुँह धोउंगी आँसुओं से और समाज सदा रणभूमि होगा मैं प्रकृति को सौंपती हूँ अपने सारे शब्द और वापस लौटती है वहाँ से प्रेम की ही अनुगूंज मैं आपसे पूछना चाहती हूँ क्या आपको चिड़ियों की चहचहाहट पसंद है

Mar 1, 20241 min

Ep 336Ma | Mamta Kalia

माँ - ममता कालिया पुराने तख़्त पर यों बैठती हैंजैसे वह हो सिंहासन बत्तीसी।हम सबउनके सामने नीची चौकियों पर टिक जाते हैंया खड़े रहते हैं अक्सर।माँ का कमराउनका साम्राज्य है।उन्हें पता है यहाँ कहाँ सौंफ की डिबिया है और कहाँ ग्रन्थ साहबकमरे में कोई चौकीदार नहीं हैपर यहाँ कुछ भीबगैर इजाज़त छूना मना है।माँ जब ख़ुश होती हैंमर्तबान से निकालकर थोड़े से मखाने दे देती हैं मुट्ठी में।हम उनके कमरे में जाते हैंस्लीपर उतार।उनकी निश्छल हँसी मेंतमाम दिन की गर्द-धूल छँट जाती है।एक समाचार हम उन्हें सुनाते हैं अख़बार से,एक समाचार वे हमें सुनाती हैंअपने मुँह ज़ुबानी अख़बार से।उनके अख़बार में हैहमारा परिवार, पड़ोस, मुहल्ला और मुहाने की सड़क।अक्सर उनके समाचारहमारी ख़बरों से ज़्यादा सार्थक होते हैं।उनकी सूचनाएँ ज़्यादा सही और खरी।वे हर बात काएक मुकम्मल हल ढूँढना चाहती हैं।बहुत जल्द उन्हेंहमारी ख़बरें बासी और बेमज़ा लगती हैं।वे हैरान हैंकि इतना पढ़-लिखकर भीहम किस क़दर मूर्ख हैंकि दुनिया बदलने का दम भरते हैंजबकि तकियों के ग़िलाफ़ हमसे बदले नहीं जाते!

Feb 29, 20242 min

Ep 335Nritya | Nidhi Sharma

नृत्य - निधि शर्मा मैं नाचती हूं, अपने दुखों के गीत पर।मैं मुस्कुराती हूं जब तुम मुझे छोड़ कर चले जाते हो।मेरे रोम रोम में बजता है विरह का संगीत।और उसमे रस घोलती है मेरे प्राणों की बांसुरी।हर दफा हर दुख के पश्चात्‌ मैं जन्म लेती हृ।पहले से कुछ अलग, पहले से कोमल हृदय और मजबूत भावनाओं के साथ।दुःख के प्रत्येक क्षण को संजो लेती हूं अपने बालों के जूड़े मेंआंसुओं के मोती टांक देती हूं अपने आंचल में।और छिपा कर रख देती हूं उस चुनर को दुनिया भर की नज़रों से।जब दुख मुझे छोड़ कर चला जाता है,तुम वापस लौट आते हो।मैं रोक देती हूं अपने कदम।मैं बंद कर देती हूँ अपना नृत्य।मेरे भीतर का संगीत भी शांत हो जाता है।हृदय कठोर और भावनाएं कमज़ोर पड़ जाती हैं।मैं समझ जाती हूं कि मेरी मृत्यु का वक़्त नज़दीक है।मैं जानती हूं कि मैं दोबारा जन्म लूंगी।दोबारा करूंगी नृत्य।सो इस दफा घुंघरुओं को कस लेती हूं और भी अधिक मज़बूती से।और ओढ़ लेती हूं वो चुनर जिसमें कुछ और मोतियों को टांकने की गुंजाइश अभीबाकी है।

Feb 28, 20242 min

Ep 334Thodi Si Umeed Chahiye | Gagan Gill

थोड़ी-सी उम्मीद चाहिए | गगन गिलजैसे मिट्टी में चमकतीकिरण सूर्य कीजैसे पानी में स्वाद भीगे पत्थर काजैसे भीगी हुई रेत परमछली में तड़पनथोड़ी-सी उम्मीद चाहिएजैसे गूँगे के कंठ मेंयाद आया गीतजैसे हल्की-सी साँससीने में अटकीजैसे काँच से चिपटेकीट में लालसाजैसे नदी की तह मेंडूबी हुई प्यासथोड़ी-सी उम्मीद चाहिए

Feb 27, 20241 min

Ep 333Sankraman | Satyam Tiwari

संक्रमण | सत्यम तिवारी रेखा के उस पार सब संदिग्ध थेइस तरह वह लंपट था और मुँहफटसूचियों से नदारदचौकसी से अंजानवह जिस देवता को फूल चढ़ाताउसकी कृपा चट्टानी पत्थरों के बरक्स ढुलकतीउसकी प्रार्थना अँधेरी काली सड़कों-सी अंतहीनजहाँ नीचे वाला ही ऊपर वाला होवहाँ फाँसी के फंदे परगिलोटिन के तख्ते परउन्मादियों के झंडे परवह किसके भरोसे चढ़ा?अगर उसे अपने ही गुनाहों की सजा मिलीतो उसका होना इतना भी बुरा नहीं होतावह जो समय रहते कालातीत हो गयाउसके लिए मैं ठीक इस जगह परएक पंक्ति भी नहीं सोच सकायह कितना गलत होताअगर उसके बारे में मैं गलत होतायह कितना गलत होताअगर इस बारे में मैं सही होताबात गुलमोहर और अनजान गलियों की नहीं हैहै तो यह जीवन और मृत्यु मेंश्रेष्ठताबोध की भी नहींलेकिन जब लोग कहते हैं कि उन्हें जीना पड़ातो लगता है कि मरने को मिला होता तो मर गए होते!

Feb 26, 20242 min

Ep 332Khichdi | Anamika

खिचड़ी | अनामिकाइतने बरस बीते, इतने बरस ! सन्तोष है तो बस इतना कि मैंने ये बाल धूप में तो सफेद नहीं किए ! इन खिचड़ी बालों का वास्ता, देखा है संसार मैंने भी थोड़ा-सा ! दुनिया के हर कोने क्या जाने क्या-क्या खिचड़ी पक रही है : संसद में, निर्णायक मंडल में, दूर वहाँ इतिहास के खंडहरों में ! 'चाणक्य की खिचड़ी' से लेकर 'बीरबल की खिचड़ी' तक सल्तनतें हैं और रणकौशल ! मुझे खिचड़ी-भाषा से कोई शिकायत नहीं ! खिचड़ी गरीब मेहनतकश का सबसे सुस्वादु और पौष्टिक भोजन है, पर मैं सुपली में फटककर कुछ कंकड़ चुन लेना चाहती हूँ! और तब धो-धोकर सीधा डबका लेना चाहती हूँ अपना सचसादा हीनमक-मिर्च मिलाए बिना ! डबकाना चाहती हूँ अपना सच उस बड़े सच की हँड़िया में जो साझा है! और चाहे जो हो- साझी सच्चाई काठ की हंड़िया नहीं है कि दुबारा न चढ़े आँच पर ! रोज़ वह करती है आग की सवारी, रोज़ रगड़घस सहती है हमारी-तुम्हारी ! मुझे खिचड़ी-भाषा से कोई शिकायत नहीं। छौंक के करछुल में जीरा बराबर चटक रहे हैं मेरे सपने- इसी में !

Feb 25, 20242 min

Ep 331Loktantra Se Umeed | Mayank Aswal

लोकतंत्र से उम्मीद | मयंक असवालएक देश की संसद को कीचड़ के बीचों बीच होना चाहिए ताकि अपने हर अभिभाषण के बाद संसद से निकलते ही एक राजनेता को पुल बनाना याद रहे।एक लोकतांत्रिक कविता को गाँव, मोहल्ले और शहर के हर चौराहे पर होना चाहिए ताकि जनता के बीच आजादी और तानाशाही का अंतर स्पष्ट रहें।एक लेखक को प्रतिपक्ष की कविता लिखने की समझ होनी चाहिए ताकि सिर्फ किताबों के बीच न सिमटकर वो मंचों की प्रसिद्धि से परे जन-जन की आवाज बन सकेएक नागरिक को अपने हक की आवाज का बोध होना चाहिए ताकि इस कागजी जम्हूरियत में सभ्य नागरिक बनने का अभिनय करते हुए वो सिर्फ मौन जीवन बिताकर न मरें।जम्हूरियत: लोकतंत्र, गणतन्त्र, जनतंत्र, प्रजातंत्र

Feb 24, 20241 min

Ep 330Chup Ki Saazish | Amrita Pritam

चुप की साज़िश | अमृता प्रीतमरात ऊँघ रही है...किसी ने इनसान कीछाती में सेंध लगायी है हर चोरी से भयानक यह सपनों की चोरी है।चोरों के निशान -हर देश के हर शहर कीहर सड़क पर बैठे हैं पर कोई आँख देखती नहीं, न चौंकती है। सिर्फ़ एक कुत्ते की तरह एक जंजीर से बंधी किसी वक़्त किसी की कोई नज़्म भौंकती है।

Feb 23, 20241 min

Ep 329Kavitayein | Naresh Saxena

कविताएं | नरेश सक्सेनाजैसे चिड़ियों की उड़ान में शामिल होते हैं पेड़ क्या कविताएँ होंगी मुसीबत में हमारे साथ?जैसे युद्ध में काम आए सैनिक की वर्दी और शस्त्रों के साथ खून में डूबी मिलती है उसके बच्चे की तस्वीर क्या कोई पंक्ति डूबेगी खून में?जैसे चिड़ियों की उड़ान में शामिल होते हैं पेड़ मुसीबत के वक्त कौन सी कविताएँ होंगी हमारे साथ लड़ाई के लिए उठे हाथों में कौन से शब्द होंगे?

Feb 22, 20241 min

Ep 328Gayatri | Kushagra Adwait

गायत्री | कुशाग्र अद्वैततुमसे कभी मिला नहीं कभी बातचीत नहीं हुई कहने को कह सकते हैं तुम्हारे बारे में कुछ नहीं जानता ऐसा भी नहीं कि एकदम नहीं जानता ख़बर है कि इस नगर में नई आई हो इधर एक कामचलाऊ कमरा ढूँढ़ने में व्यस्त रही और रोज़गार की दुश्चिंताएँ कुतरती रहीं तुमको रात के इस पहर तुम्हारे नाम कविता लिखने बैठ जाऊँ ऐसी हिमाक़त करने जितना तो शायद नहीं जानतामेरा एक दोस्त तुम्हारा नाम गुनता रहता है जैसे कोई मंत्र गुनता हो आज हम दोनों काफ़ी देर तुम्हारे बारे में बतियाते रहे बेसिर-पैर के अंदाज़े लगाते रहे मसलन इस महानगर में परांपरा के खित्ते से बाहर दूब बराबर जगह खोजती लड़की का जाने किसने रखा होगा पारांपरिक-सी शक्ल वाला यह नामकहाँ से आया होगा यह नाम― वैदिक छंद से या उस वैदिक मंत्र से जिसे तुतलाते हुए याद किया और अब भी जपता हूँ कभी-कभी क्या पता तुम्हारे पुरखों के वेदों को छू सकने की वंचित इच्छा से आया होया फिर उस रानी सेजिससे मिसेज गाँधी केअदावत के क़िस्से अख़बारों में नमक-मिर्च के साथ शाया होते रहेया तुम्हारे पिता की इस ही नामराशि की कोई प्रेयसी रही हो और उसकी याद में… तुम्हें नहीं पता चलो कोई बात नहींसंभव है इस नामकरण के उपक्रम में इतने विचार न शामिल रहे हों किसी पंडित ने ‘ग’ अक्षर सुझाया हो फिर किसी स्वजन की गोद में रखकर कोई नाम देने को कहा हो और जल्दबाज़ी में बतौर पुकारू नाम यही रखाया हो कहते हुए कि नाम का क्या है नहीं जमा तो दाख़िले के बखत देखेंगे कुछ भी रहा हो बोलचाल से ग़ायब ‛त्र’ को बचाने के लिए तो नहीं करेगा कोई ऐसी क़वायद!

Feb 21, 20242 min

Ep 327Hindi Si Ma | Ajay Jugran

हिंदी सी माँ | अजेय जुगरानजब पर्दे खोलने परठंड की नर्म धूपपलंग तक आ गईतो बड़ा भाईगेट पर अटका हिंदी अख़बारले आया माँ के लिए।तेज़ी से वर्तमान भूल रही माँअब रज़ाई के भीतर ही बैठतीन तकियों पर टिका पीठहोने लगी तैयार उसे पढ़ने को।सर पर पल्लूमाथे पर बिंदीहृदय में भाषामन में जिज्ञासाहाथ में हिंदी अख़बारऔर उसे पढ़ने कोभूली ऐनक ढूँढती मेरी माँहिंदी कदाचित् नहीं भूलतीमातृभाषा सी प्यारी मेरी माँ।

Feb 20, 20241 min

Ep 326Abki Agar Lauta To | Kunwar Narayan

अबकी अगर लौटा तो | कुँवर नारायणअबकी अगर लौटा तो बृहत्तर लौटूंगाचेहरे पर लगाए नोकदार मूँछे नहीं कमर में बाँधे लोहे की पूँछें नहीं जगह दूँगा साथ चल रहे लोगों कोतरेर कर न देखूँगा उन्हें भूखी शेर-आँखों सेअबकी अगर लौटा तो मनुष्यतर लौटूंगाघर से निकलते सड़कों पर चलते बसों पर चढ़ते ट्रेनें पकड़तेजगह-बेजगह कुचला पड़ा पिद्दी-सा जानवर नहींअगर बचा रहा तो कृतज्ञतर लौटूंगाअबकी अगर लौटा तो हताहत नहीं सबके हिताहित को सोचता पूर्णतर लौटूंगा।बृहत्तर - और बड़ा

Feb 19, 20241 min

Ep 325Haare Hue Budhhijeevi Ka Vaktavya

हारे हुए बुद्धिजीवी का वक्तव्य | सत्यम तिवारी हारे हुए बुद्धि जीवी का वक्तव्यमैं माफ़ी माँगता हूँजैसे हिम्मत माँगता हूँमेरे कंधे पर बेलगाम वितृष्णाएँमेरा चेहरा हारे हुए राजा कारनिवास में जाते हुएमेरी मुद्रा भाड़ में जाते मुल्क कीनाव जले सैनिक का मेरा नैराश्यमैं अपना हिस्सासिर्फ़ इसलिए नहीं छोडूँगाकि संतोष परम सुख हैया मृत्यु में ही मुक्ति मिलती हैमैं खुली आँख से जीनाऔर बंद आँखों से मरना पसंद करूँगामैं काठ का एक घोड़ाएक तीर का दूसरा शिकारमेरे बुझने से पहले की लपट पर लानत होअगर रस्सी न हो तोउसके बल को भी मैं ठोकर मारता हूँयह कौन ध्वजा उठाएदुनिया को चपटी करता हैमैं नहीं मानता किमेरा कोई दुश्मन नहींमैं जाऊँगा तोकम से कमदो-चार कोअपने साथ लेता जाऊँगा

Feb 18, 20242 min

Ep 324Waapsi | Kedarnath Singh

वापसी | केदारनाथ सिंह आज उस पक्षी को फिर देखा जिसे पिछले साल देखा था लगभग इन्हीं दिनों इसी शहर मेंक्या नाम है उसका खंजन टिटिहिरी, नीलकंठ मुझे कुछ भी याद नहीं मैं कितनी आसानी से भूलता जा रहा हूँ पक्षियों के नाम मुझे सोचकर डर लगाआख़िर क्या नाम है उसका मैं खड़ा-खड़ा सोचता रहा और सिर खुजलाता रहा और यह मेरे शहर में एक छोटे-से पक्षी के लौट आने का विस्फोट था जो भरी सड़क पर मुझे देर तक हिलाता रहा।

Feb 17, 20241 min

Ep 323Avikalp | Kinshuk Gupta

(अ)विकल्प | किंशुक गुप्तातुम्हारी महत्वकांक्षाओं से माँ चटक गई है मेरी रीढ़ की हड्डी जिस लहज़े से तुमने पिता सुनाया था फ़रमान कि रेप में लड़की की गलती ज़रूर होगीमैं समझ गया था मेरे धुकधुकाते दिल कोकिसी भी दिन घोषित कर दोगे टाइम बम मेरे आकाश के सभी नक्षत्र अनाथ होते जा रहे हैंचीटियों की बेतरतीब लकीरों से काली पड़ रही है सफेद पक्षी की देह चोंच के हर प्रहार से कठफोड़वा खोखला कर रहा है बोधी का वृक्ष जब रीतना ही अंतिम सत्य है तब यह कैसा विलंबरीतना: खाली होना

Feb 16, 20241 min

Ep 322Nat | Rajesh Joshi

नट | राजेश जोशीदीमकें जगह-जगह से खा चुकी हैं तुम्हारे बाँसों को भूख खा चुकी है तुम्हारा सारा बदनक़दमों को साधकर चलते हो जिस रस्सी पर इस छोर से उस छोर टूट चुके हैं उसके रेशे, जर्जर हो चुकी है वो रस्सी जब-जब शुरू करते हो तुम अपना खेल कहीं बहुत क़रीब से आती है यम के भैंसे के खुरों की आवाज़ कहीं बहुत पास सुनाई पड़ती हैं उसके गले में लटकी घंटियाँ।नट!क्या कभी डर नहीं लगता तुम्हें?आशंका से कभी काँपते नहीं क्या तुम्हारे पाँव?सच कहते हो बाबू एकदम सच पर ज़रा कहो तो- युद्ध में बार-बार घाव पर घाव सहतेक्या कम जर्जर हुई है यह पृथ्वी? कीड़ों, मकोड़ों और चूहों ने क्या कम खाया है इस पृथ्वी को पर कौन डरता है बाबू इस धरती पर चलते हुए? क्या यहाँ कम साध कर चलना पड़ते हैं पाँव? जीवन की जोत पर जब तक टिकी रहें आँखें कौन डरता है यमराज के भैंसे से?मैं इस जर्जर रस्सी पर नहीं बाबू भरोसे की डोर पर चलता हूँ दिन रात।

Feb 15, 20242 min

Ep 321Basant Aaya | Kedarnath Aggarwal

बसंत आया | केदारनाथ अग्रवाल बसंत आया : पलास के बूढ़े वृक्षों ने टेसू की लाल मौर सिर पर धर ली! विकराल वनखंडी लजवंती दुलहिन बन गई, फूलों के आभूषण पहन आकर्षक बन गई। अनंग के धनु-गुण के भौरे गुनगुनाने लगे, समीर की तितिलियों के पंख गुदगुदाने लगे। आम के अंग बौरों की सुगंध से महक उठे, मंगल-गान के सब गायक पखेरू चहक उठे। विकराल : भयंकर, भयानकवनखंडी: वन का एक छोटा भाग या हिस्सासमीर: मंद हवा, हल्की हवा

Feb 14, 20241 min

Ep 320Titliyon Ki Bhasha | Mayank Aswal

तितलियों की भाषा | मयंक असवालयदि मुझे तितलियों कि भाषा आती मैं उनसे कहता तुम्हारी पीठ पर जाकर बैठ जाएंबिखेर दें अपने पंखों के रंग जहाँ जहाँ मेरे चुम्बन की स्मृतियाँ शेष बची हैं ताकि वो जगह इस जीवन के अंत तक महफूज रहे।महफूज़ रहे, वो हर एक कविता जिन्होंने अपनी यात्राएँ तुम्हारी पीठ से होकर की जिनकी उत्पत्ति तुमसे हुई और अंत तुम्हारे प्रेम के साथयदि मौन की कोई साहित्यिक भाषा होती तो मेरा प्रेम, तुम्हारे लिए अभिव्यक्ति की कक्षा में पहला स्थान पातातुम्हारी आंखों से सीखे हुए मौन संवाद पर लिखता मैं एक लंबा सा निबंध इतना लंबा की, वो निंबध उपन्यास बन जाता और हमारा प्रेम एक जीवंत मौन कहानीमुझे हमेशा से आदम जात के शब्दों में शोर महसूस हुआ है तुमने बताया की प्रेम और भावनाओं की भाषा उत्पत्ति से मौन रही तुम उसी मौन से होकर मेरी हर कविता का हिस्सा बनी।

Feb 13, 20242 min

Ep 319Log Kehte Hain | Mamta Kalia

लोग कहते है | ममता कालियालोग कहते हैंमैं अपना ग़ुस्सा कम करूँसमझदार औरतों की तरह सहूँ और चुप रहूँ।ग़ुस्सा कैसे कम किया जाता है?क्या यह चाट के ऊपर पड़ने वाला मसाला हैयारेडियो का बटन?जिसे कभी भी कर दो ज़्यादा या कम।यह तो मेरे अन्दर की आग है।एक खौलता कढ़ाह, मेरा दिमाग़ है।मैं एक दहका हुआ कोयलाजिस पर जिन्होंने ईंधन डाला हैऔर तेल,फिर हवा भी की है,उन्होंने ही उँगली ठोढ़ी पर टिकाचकित होने का चोचला भी किया है।वे अच्छी तरह जानते हैंकब, क्यों और कैसेऔरत एक अग्निकाण्ड बन जाती हैलेकिन खेलकूद के नाम परअब उन्हें यही क्रीड़ा भाती है।

Feb 12, 20241 min

Ep 318Ghor Andhkaar Hai | Dr Sheoraj Singh 'Bechain'

घोर अंधकार है | डॉ. श्यौराज सिंह 'बेचैन' घोर अन्धकार हैबड़ी उदास रात है न मेल है न प्यार है। जलाओ दीप साथियो कि घोर अन्धकार है। सिसक रहा है चाँद अब तड़प रही है चाँदनी। गली-गली दरिद्रता सुना रही है रागनी। ज़िन्दगी गरीब की अमीर का शिकार है। जलाओ दीप.... कहाँ स्वतन्त्रता, कहाँ समाजवाद की लहर देश तेरी धमनियों में भर दिया गया है ज़हर कली-कली उदास बागवाँ ये क्या बहार है। जलाओ दीप... साधुओं का भेष आज डाकुओं का भेष है दुखीः बहुत और चन्द खुश तो क्या स्वतन्त्र देश है? साधना के म्यान में भी वासना कटार है। जलाओ दीप... जाति, धर्म, मज़हबों केनाम पर लड़ाइयाँबेकसूरवार लोग सह रहे तन्हाइयाँ मन्दिरों और मस्जिदों की आड़ में प्रहार है। जलाओ दीप…नींद की गिरफ्त में चली गयीं जवानियाँ क्रान्तिकारिता की शेष रह गयीं कहानियाँ हुकूमतों को जुल्म का नया नशा सवार है। जलाओ दीप... राग सब जुदा-जुदा सुना रही हैं जातियाँ जला हमारा खूने दिल न दीप हैं न बातियाँ स्वतन्त्रता समानता का बेसुरा सितार है। जलाओ दीप... दलित हनन नारी दहनया क्रूरता का जिक्र हो उसी के सिर को दर्द है जिसे वतन की फ़िक्र हो पंजाब चैन से नहीं, बिहार वेकरा है। जलाओ दीप…भूख बेबसी कीं मंडियों में बिक रही है लाज। राम-रावणों ने त्रस्त कर दिया दलित समाज । अनसुना बलात्कारिता – का चीत्कार है। जलाओ दीप…नौकरी तवायफों-सी माँगती हैं दाम दो भलों की लिस्ट में रखा है रिश्वती के नाम को रोज़गार-दफ्तरों पै लग रही कतार है। जलाओ दीप… रोशनी की सुन्दरी के अपहरण को रोक दो। स्वयं सुदीप हो तुम्हीं तिमिर को दूर फेंक दो। अगर कबीर, बुद्ध, जायसी का इन्तज़ार है, तोजलाओ दीप साथियोकि घोर अन्धकार है।

Feb 11, 20244 min

Ep 317Ye Chetavni Hai | Vinod Kumar Shukla

ये चेतावनी है | विनोद कुमार शुक्ल यह चेतावनी हैकि एक छोटा बच्चा हैयह चेतावनी है कि चार फूल खिले हैंयह चेतावनी है कि खुशी है और घड़े में भरा हुआ पानी पीने के लायक है, हवा में साँस ली जा सकती है।यह चेतावनी है कि दुनिया हैबची दुनिया मेंमैं बचा हुआयह चेतावनी हैमैं बचा हुआ हूँकिसी होने वाले युद्ध से जीवित बच निकलकर मैं अपनी अहमियत से मरना चाहता हूँ कि मरने के आखिरी क्षणों तक अनन्तकाल जीने की कामना करूँ कि चार फूल हैं और दुनिया है।

Feb 10, 20241 min

Ep 316Kitna Lamba Hoga Jharna | Gulzar

कितना लंबा होगा झरना | गुलज़ारकितना लंबा होगा झरना सारा दिन कोहसार पकड़ के नीचे उतरता रहता है फिर भी ख़त्म नहीं होता...!सारा दिन ही बादलों में, ये वादी चलती रहती है न रुकती है, न थमती है बारिश का बर्बत भी बजता रहता है लंबी लंबी हवा की उंगलियाँ थकतीं नहीं जंगल में आवाज़ नदी की बोलते बोलते बैठ गई है भारी लगती है आवाज़ नदी की!!कोहसार - पर्वतीय शृंखलाबर्बत -(शाब्दिक) बत्तख़ अर्थात हंस का सीना, एक बाजा, जो सितार की तरह होता है, परन्तु उसकी तुंबी बड़ी और लम्बाई कम होती है

Feb 9, 20241 min

Ep 315Bada Beta | Kinshuk Gupta

बड़ा बेटा | किंशुक गुप्तापिता हृदयाघात से ऐसे गएजैसे साबुन की घिसी हुई टिकियाहाथ से छिटक कर गिर जाती है नाली मेंया पत्थर लगने से अचानक चली जाती हैमोबाइल की रोशनीअचानक मैं बड़ा हो गयाअनिद्रा के शिकार मेरे पिता कोन बक्शी गई गद्दे की नर्माईया कंबल की गरमाईपटक दिया गया कमरे के बाहरजैसे बिल्ली के लिए कसोरे मेंछोड़ दिया जाता है दूधपूरी रात माँ की पुतलियों में शोक सेकहीं ज़्यादाठहरा रहा भविष्य का पिशाचउनकी छुअन में प्रेम नहींचाह थी एक सहारे कीजैसी लोहे के जंगलों से रखी जाती हैसुबह तक मुझे लगता रहाठंड से बिलबिलाते पिता की दहाड़ सेमैं फिर छोटा हो जाऊँगामैंने उनके तलवों को गुदगुदायादो-चार बार झटकार कर देखालेकिन पिता नहीं उठेफिर मैंने ज़बरदस्ती उनकी आँखें खोल दींऔर घबराकर अपने कमरे में दौड़ गयाजिन आँखों से मैंने दुनिया देखना सीखा थावो काली हो चुकी थीं

Feb 8, 20242 min

Ep 314Shamil Hota Hun | Malay

शामिल होता हूँ | मलय मैं चाँद की तरहरात के माथे परचिपका नहीं हूँ,ज़मीन में दबा हुआगीला हूँ गरम हूँफटता हूँ अपने अंदरअंकुर की उठती ललक कोमहसूसतादेखने और रचने के सुख मेंथरथराते पानी मेंउगते सूर्य की तरहसड़क पर निकला हूँपूरे आकाश पर नज़र रखे,भाषा की सुबहमेरे रोम-रोम मेंहरी दूब की तरहहज़ार-हज़ार आँखों से खुली हैज़मीन में दबा हुआगीला हूँ गरम हूँमैं शामिल होता हूँ तुम सब मेंडूबकर चलता हूँरचता हूँ उगता हूँभाषा की सुबह में।

Feb 7, 20241 min

Ep 313In Sardiyon Mein | Manglesh Dabral

इन सर्दियों में | मंगलेश डबरालपिछली सर्दियाँ बहुत कठिन थींउन्हें याद करने पर मैं इन सर्दियों में भी सिहरता हूँ हालाँकि इस बार दिन उतने कठोर नहींपिछली सर्दियों में मेरी माँ चली गई थीमुझसे एक प्रेमपत्र खो गया था एक नौकरी छूट गई थी रातों को पता नहीं कहाँ-कहाँ भटकता रहा कहाँ-कहाँ करता रहा टेलीफ़ोन पिछली सर्दियों में मेरी ही चीजें गिरती थीं मुझ परइन सर्दियों में पिछली सर्दियों के कपड़े निकालता हूँ कंबल टोपी मोजे मफ़लर उन्हें ग़ौर से देखता हूँ सोचता हुआ पिछला समय बीत गया है ये सर्दियाँ क्यों होंगी मेरे लिए पहले जैसी कठोर।

Feb 6, 20241 min

Ep 312Atmahatya | Shashwat Upadhyay

आत्महत्या | शाश्वत उपाध्यायसात आसमानों के पार आठवें आसमान पर जहाँ आकर चाँद रुक जाता है सूरज की रौशनी पर टूटे सपनों के किरचें चमकते हैं दिन और रात की परिभाषायें रद्द हो जाती हैंकि आत्महत्याऊपर उठती दुनिया की सबसे आखिरी मंज़िल है प्यार के भी बाद किया जाने वाला सबसे तिलिस्मी काम। कोई हैजिसके पास काफी कुछ है सुबह है उम्मीद से जगमगाई हुई शाम है चाँदनी की परत लिए हुए वह खुद है मैं से हम होकर नूर बरसाता ख़ल्क़ पर और फिर,जब उसकी उम्मीद से जगर मगर सुबह को खींच कर उसके शाम के चाँदनी के परत को उतार कर उसके मैं से हम हुये अस्तित्व को निधार कर कोई औरअपनी सुबह शाम और खुद को रचता है तो जानिएप्यार के भी बाद किया जाने वाला सबसे तिलिस्मी काम हैआत्महत्यामेरे दोस्त बेशक आपने प्यार किया होगाऔर प्यार के गहनतम क्षण के बाद आप मृतप्राय हुए होंगेलगा होगा यही तो जीवन है, कि जीवन और मृत्यु के इतने करीब जाकर भी आप मरे नही क्योंकि मरना सबके बस की बात नही यह गले में सुई चुभा कर थूक के साथ क्रोध घोंटने की तमीज़ है यह प्यार से भी आगे की चीज़ हैमुझे कुछ आत्महंताओ का पता चाहिए मैं उनसे मिलना चाहता हूँ शायद उन्हें जोड़कर कोई कविता बनाऊँ या फिर आत्महत्या की भूमिका नहीं-नहीं मैं उनके मरने के ठीक पहले की बात जानना चाहता हूँ यह भी जानना है कि इरादों की यह पेंग कहाँ से भरी थी तुमनेक्या किसी बदबूदार सफेदपोश की कार का धुंआँ तुम्हारे सपनों पर पेशाब कर गया था और तुम कुछ नही कर सकते थेक्या तुम्हें ऐसा लग रहा था कि गाँव के खेतों में खुल रही फैक्टरी का काला पानी तुम्हारे बेटे की आँतें निचोड़ लेगा और तुम कुछ नहीं कर सकतेया ऐसा की तुम्हारी बन्द हुई फेलोशिप किसी सूट में सोने के तारों से नाम लिखवाने की बजबजाती सोच है और तुम कुछ नहीं कर सकते?मैं कुछ आत्महंताओ से मिलना चाहता हूँ आप मेरे भीतर का शोर दबा दें आप मेरी सारी कविताएँ फूँक दें या मुझसे स्तुति गान ही लिखवा लें मगर मुझे उन आत्महंताओ का पता दे दें जिनके पास प्यार करने का भी विकल्प था और उन्होंने नहीं चुनावह तो चढ़ गये उस आखिरी मंज़िल जहाँ चाँद रुक जाता है, सूरज की रौशनी पर टूटे सपनों के किरचें चमकते हैं दिन और रात की परिभाषाएँ रद्द हो जाती हैं और रची जाती है प्यार के भी बाद के तिलिस्म की भूमिका सात आसमानों के पार आठवें आसमान पर

Feb 5, 20243 min

Ep 311Apne Bajaye | Kunwar Narayan

अपने बजाय | कुँवर नारायण रफ़्तार से जीते दृश्यों की लीलाप्रद दूरी को लाँघते हुए : या एक ही कमरे में उड़ते-टूटते लथपथ दीवारों के बीच अपने को रोक कर सोचता जब तेज़ से तेज़तर के बीच समय में किसी दुनियादार आदमी की दुनिया से हटाकर ध्यान किसी ध्यान देने वाली बात को, तब ज़रूरी लगता है ज़िंदा रखना उस नैतिक अकेलेपन को जिसमें बंद होकर प्रार्थना की जाती है या अपने से सच कहा जाता है अपने से भागते रहने के बजाय। मैं जानता हूँ किसी को कानोंकान ख़बर न होगी यदि टूट जाने दूँ उस नाज़ुक रिश्ते को जिसने मुझे मेरी ही गवाही से बाँध रखा है, और किसी बातूनी मौक़े का फ़ायदा उठाकर उस बहस में लग जाऊँ जिसमें व्यक्ति अपनी सारी ज़िम्मेदारियों से छूटकर अपना वकील बन जाता है।

Feb 4, 20242 min

Ep 310Band Kamre Mein | Prabha Khaitan

बन्द कमरे में | प्रभा खेतान बन्द कमरे मेंमेरी सब चीज़ें अपना परिचय खोने लगती हैंदीवारों के रंग धूमिलनीले पर्दे फीकेछत पर घूमता पंखागतिहीन।तब मैं निकल पड़ती हूँ—बाहर,फुटपाथ पर मूँगफली बेचनेवालापरिचय की मुस्कान देता हैऔर सामने पानवाले की दुकान परघरवाली का हाल पूछनाकहीं अधिक अपना लगता है।चौराहों परभीड़ के साथ रास्ता पार करनामुझे अकेला नहीं करता।बहुत से लोग हैंइस महानगर में, जो मेरी ही तरहअपने को बाँटते हैंरेस्तराँ और दुकानों मेंसिनेमाघर की लम्बी क़तारों मेंया कभीपार्कों में पड़ी खाली बेंचों परऊबकरया फिर बन्दरों का नाच देखलौट जाते हैं—सब मेरी ही तरहबन्द कमरों केअपने अकेले निर्वासन में…

Feb 3, 20241 min

Ep 309Atmasweekar | Gaurav Singh

आत्मस्वीकार | गौरव सिंहजो अपराध मैंने किये,वो जीवन जीने की न्यूनतम ज़रूरत की तरह लगे!मैंने चोर निगाहों से स्त्रियों के वक्ष देखेऔर कई बार एक लड़की का हृदय ना समझ सकने की शर्म के साथ सोयामुझे परिजनों की मौत पर रुलाई नहीं फूटीऔर कई दफ़े चिड़ियों की चोट पर फफककर रोयामैं अपने लोगों के बीच एक लम्बी ऊब के साथ रहाऔर चाय बेचती एक औरत का सारा दुःख जान लेना चाहामैंने रातभर जागकर लड़कियों के दुःख सुनेपर अपनी यातनाएँ कहने के लिए कोई नदी खोजता रहामुझे अपनी पीड़ाएँ बताने में संकोच होता हैमैं बीमारी से नहीं, उसकी अव्याख्येयता के कारण कुढ़ता हूँजीवन के कई ज़रूरी क्षण भूल रहा हूँऔर तुम्हारे तिलों की ठीक जगह ना बता पाने पर शर्मिंदा हूँमुझ पर स्मृतिहीन होने के लांछन ना लगाओमैं पानी के चहबच्चों की स्मृतियाँ लिए शहर-दर-शहर भटक रहा हूँजितनी मनुष्यता मुझे धर्मग्रंथों ने नहीं सिखायीउससे कहीं ज़्यादा प्रेम एक बीस साल की लड़की ने सिखायाप्रेम में होकर मैंने ज़िन्दगी पर सबसे अधिक गौर कियामैं यह मानने को तैयार नहीं कि प्रेम किसी को जीवन से विमुख कर सकता है।

Feb 2, 20242 min

Ep 308Chattan Ko Todo, Vah Sunder Ho Jayegi

चट्टान को तोड़ो वह सुंदर हो जाएगी | केदारनाथ सिंह चट्टान को तोड़ो वह सुंदर हो जाएगी उसे और तोड़ो वह और, और सुंदर होती जाएगी अब उसे उठाओ रख लो कंधे पर ले जाओ किसी शहर या क़स्बे में डाल दो किसी चौराहे पर तेज़ धूप में तपने दो उसे जब बच्चे आएँगे उसमें अपने चेहरे तलाश करेंगे अब उसे फिर से उठाओ अबकी ले जाओ किसी नदी या समुद्र के किनारे छोड़ दो पानी में उस पर लिख दो वह नाम जो तुम्हारे अंदर गूँज रहा है वह नाव बन जाएगी अब उसे फिर से तोड़ो फिर से उसी जगह खड़ा करो चट्टान को उसे फिर से उठाओ डाल दो किसी नींव में किसी टूटी हुई पुलिया के नीचे टिका दो उसे उसे रख दो किसी थके हुए आदमी के सिरहाने अब लौट आओ तुमने अपना काम पूरा कर लिया है अगर कंधे दुख रहे हों कोई बात नहीं यक़ीन करो कंधों पर कंधों के दुखने पर यक़ीन करो यक़ीन करो और खोज लाओ कोई नई चट्टान!

Feb 1, 20242 min

Ep 305Achanak Nahi Gayi Ma | Vishwanath Prasad Tiwari

अचानक नहीं गई माँ | विश्वनाथ प्रसाद तिवारी अचानक नहीं गई माँ जैसे चला जाता है टोंटी का पानी या तानाशाह का सिंहासन थोड़ा-थोड़ा रोज गई वह जैसे जाती है कलम से स्याही जैसे घिसता है शब्द से अर्थसुकवा और षटमचिया से नापे थे उसने समय के सत्तर वर्ष जीवन को कुतरती धीरे-धीरे गिलहरी-सी चढ़ती-उतरती काल वृक्ष परगीली-सूखी लकड़ी-सी चूल्हे की धुआँ देती सुलगती जलतीरात काटने के लिए परियों के किस्से सुनाती अँधेरे से लड़ने के लिए संझा-पराती के गीत गाती पृथ्वी और आकाश के पिंजरे में फड़फड़ाती बीमार घड़ी-सी टिक्-टिक् चलतीअचानक नहीं गई माँ थोड़ा-थोड़ा रोज गई जैसे जाती है आँख की रोशनी या अतीत की स्मृति ।

Jan 31, 20242 min

Ep 307Sach Choocha Hota Hai | Amitava Kumar

सच छूछा होता है।- अमिताव कुमार महात्मा गाँधी की आत्मकथा मेंमौसम का कहीं ज़िक्र नहीं,लंदन की किसी ईमारत यासड़क के बारे में कोई बयान नहीं,किसी कमरे की, कभी एकत्रित भीड़ यायातायात के किसी साधन की कहीं कोईचर्चा नहीं–यह वी. एस. नायपॉल की आलोचना है।लेकिन मौसम तो गांधीजी के अंदर था!तूफान से जूझती एक अडिग आत्मा–नैतिकता की पतली पगडण्डी पर ठोकर खाता,संभलता, रास्ता बनाता बढ़ता हुआ इन्सान!अगर आप सच की खोज कर रहे हैं,क्या फर्क पड़ता है किसूरज आज शाम 6:15 पे डूबा कि 6:25 पे?लेकिन नायपॉल की बात सर-आँखों पर!अगर आप महात्मा नहींमहज लेखक हैं,आपको ध्यान देना होगानोट करना होगा,अपने आसपास की दीवारों परखरोंचे गए प्रेमियों के नामछतों पर गिरती बारिश की बूंदों का अंतराल आंधी में झूमते पेड़ों की डालों का लचीलापनसाइकिल की घंटी की आवाज़या फिर दंगे के बाद का सन्नाटालिखना होगा,कैंटीन में चुपचाप बैठी युवती के बारे मेंजिसके सामने रखे पानी के गिलास मेंपूरी दुनिया उलटी दिखाई देती है।

Jan 30, 20242 min

Ep 303Gaon Gaya Tha, Gaon Se Bhaaga | Kailash Gautam

गाँव गया था, गाँव से भागा | कैलाश गौतम गाँव गया थागाँव से भागा।रामराज का हाल देखकरपंचायत की चाल देखकरआँगन में दीवाल देखकरसिर पर आती डाल देखकरनदी का पानी लाल देखकरऔर आँख में बाल देखकरगाँव गया थागाँव से भागा।गाँव गया थागाँव से भागा।सरकारी स्कीम देखकरबालू में से क्रीम देखकरदेह बनाती टीम देखकरहवा में उड़ता भीम देखकरसौ-सौ नीम हकीम देखकरगिरवी राम-रहीम देखकरगाँव गया थागाँव से भागा।गाँव गया थागाँव से भागा।जला हुआ खलिहान देखकरनेता का दालान देखकरमुस्काता शैतान देखकरघिघियाता इंसान देखकरकहीं नहीं ईमान देखकरबोझ हुआ मेहमान देखकरगाँव गया थागाँव से भागा।गाँव गया थागाँव से भागा।नए धनी का रंग देखकररंग हुआ बदरंग देखकरबातचीत का ढंग देखकरकुएँ-कुएँ में भंग देखकरझूठी शान उमंग देखकरपुलिस, चोर के संग देखकरगाँव गया थागाँव से भागा।गाँव गया थागाँव से भागा।बिना टिकट बारात देखकरटाट देखकर भात देखकरवही ढाक के पात देखकरपोखर में नवजात देखकरपड़ी पेट पर लात देखकरमैं अपनी औक़ात देखकरगाँव गया थागाँव से भागा।गाँव गया थागाँव से भागा।नए-नए हथियार देखकरलहू-लहू त्योहार देखकरझूठ की जै-जैकार देखकरसच पर पड़ती मार देखकरभगतिन का शृंगार देखकरगिरी व्यास की लार देखकरगाँव गया थागाँव से भागा।गाँव गया थागाँव से भागा।मुठ्ठी में क़ानून देखकरकिचकिच दोनों जून देखकरसिर पर चढ़ा जुनून देखकरगंजे को नाख़ून देखकरउज़बक अफ़लातून देखकरपंडित का सैलून देखकरगाँव गया थागाँव से भागा।

Jan 29, 20243 min

Ep 302Kavi Ki Atmahatya | Devansh Ekant

कवि की आत्महत्या | देवांश एकांत अभिनेता अभिनय करते-करते मृत्यु का मंचन करने लगता हैआप उन्मत्त होते हैं अभिनय देखपीटना चाहते हैं तालियाँ मगर इस बार वह नही उठताक्योंकि जीवन के रंगमंच में एक ही ‘कट-इट’ होता हैकोई हँसते-हँसाते शहर के पुल से छलाँग लगा देता है और तब पिता के साथ नवका विहार में आया लड़का जान पाता हैपानी की सतह पर मछलियाँ ही नहींआदमी भी तैरता हैहर वजन को अपनी हद में रखने वाला वैज्ञानिकआत्मा के ख़ालीपन से दबकर मर जाता है,कुछ घरों में उजाला सूरज से नही कई दिनों बाद गरम रोटी की चमक से होता है सुबह रात के जाने से नही मजूर बाप के आधी रात लौटने से होती है माफ़ कीजिए ये दरअसल घर नही हैंसंग्रहालयों में रखे चित्र की व्याख्या हैआपने यह चित्र जीवंत देखा क्या ?मेरी आँखों का कालापन शायद राख है काफ़्का के उन पत्रों कीजो उसने मिलेना को भेजने से पहलेअपनी हीनता के बोध में जला डाले होंगेरात्रि के झींगुर नाद के मध्यजब तुम कर रहे होगे अपनी कविताओं में कांट छाँटतुम अचानक पाओगे कि मुक्ति का साधक मुक्तिबोधसबसे अधिक बंधा था बेड़ियों में ब्रह्मराक्षस आज भी करता है नरक में उसका पीछादेह में रक्त ही नही प्रतीक्षा भी दौड़ती है रक्तचाप से अधिक प्रतीक्षा झँझोड़ती है यह मैंने ड्योढ़ी पे बैठे उस दरवेश से जानाबह गयी जिसकी प्रेमिका गाँव की बाढ़ में जल्द लौटने का वादा करभीतर की एक-एक नस थरथरा उठती है यह सोचकर कि एक दिन नही होगी माँ, नहीं होंगे पितातब कौन पुकारेगा बेटातब कौन लेगा भूख का संज्ञानयह सोचते-सोचतेहर रात मेरे भीतर का कविकर लेता है आत्महत्या।

Jan 28, 20242 min

Ep 301Khudaon Se Keh Do | Kishwar Naheed

ख़ुदाओं से कह दो | किश्वर नाहीद जिस दिन मुझे मौत आएउस दिन बारिश की वो झड़ी लगेजिसे थमना न आता हो,लोग बारिश और आँसुओं मेंतमीज़ न कर सकेंजिस दिन मुझे मौत आएइतने फूल ज़मीन पर खिलेंकि किसी और चीज़ पर नज़र न ठहर सके,चराग़ों की लवें दिए छोड़करमेरे साथ-साथ चलेंबातें करती हुईमुस्कुराती हुईजिस दिन मुझे मौत आएउस दिन सारे घोंसलों मेंसारे परिंदों के बच्चों के पर निकल आएँ,सारी सरगोशियाँ जल-तरंग लगेंऔर सारी सिसकियाँ नुक़रई ज़मज़मे बन जाएँजिस दिन मुझे मौत आएमौत मेरी इक शर्त मानकर आएपहले जीते-जी मुझसे मुलाक़ात करेमेरे घर-आँगन में मेरे साथ खेलेजीने का मतलब जानेफिर अपनी मनमानी करेजिस दिन मुझे मौत आएउस दिन सूरज ग़ुरूब होना भूल जाएकि रौशनी को मेरे साथ दफ़्न नहीं होना चाहिए! अर्थ :सरगोशियाँ- चुपके चुपके बातें करना, कानाफूसी नुक़रई- चाँदी-जैसा उज्ज्वल, वो चीज़ जो चाँदी से बनी होज़मज़मे- स्पंदनग़ुरूब- सूरज का डूबना

Jan 27, 20242 min

Ep 306Pushp Ki Abhilasha | Makhanlal Chaturvedi

पुष्प की अभिलाषा - माखनलाल चतुर्वेदीचाह नहीं, मैं सुरबाला के गहनों में गूँथा जाऊँ। चाह नहीं, प्रेमी-माला में बिंध प्यारी को ललचाऊँ॥ चाह नहीं, सम्राटों के शव पर, हे हरि, डाला जाऊँ। चाह नहीं, देवों के सिर पर चढूँ, भाग्य पर इठलाऊँ॥ मुझे तोड़ लेना वनमाली। उस पथ में देना तुम फेंक॥ मातृ-भूमि पर शीश चढ़ाने। जिस पथ जावें वीर अनेक॥

Jan 26, 20241 min

Ep 299Tera Naam Nahi | Nida Fazli

तेरा नाम नहीं | निदा फ़ाज़ली तेरे पैरों चला नहीं जोधूप छाँव में ढला नहीं जोवह तेरा सच कैसे,जिस पर तेरा नाम नहीं?तुझसे पहले बीत गया जोवह इतिहास है तेरातुझको ही पूरा करना हैजो बनवास है तेरातेरी साँसें जिया नहीं जोघर आँगन का दिया नहीं जोवो तुलसी की रामायण हैतेरा राम नहींतेरा ही तन पूजा घर हैकोई मूरत गढ़ लेकोई पुस्तक साथ न देगीचाहे जितना पढ़ लेतेरे सुर में सजा नहीं जोइकतारे पर बजा नहीं जोवो मीरा की संपत्ति हैतेरा श्याम नहींवह तेरा सच कैसे,जिस पर तेरा नाम नहीं?

Jan 25, 20242 min

Ep 298Gawaiyya | Shahanshah Alam

गवैया | शहंशाह आलम गवैया अपनी पीड़ा को पूरी लय के साथ गाता हैआज वह न दुःख को बाँधता है न उदासी कोन धूप को न बादल को न अपनी आत्मा कोगवैया सेतु को गाता है उसके नीचे बहते जल को गाता हैरंग को गाता है शहद को गाता है नमक को गाता हैमहुआ को गाता है जामुन को गाता है नीम को गाता हैगवैया अपनी धुन की गति और उतार-चढ़ाव मेंगायन की शैली में बस अपने समय को गाता हैसमय का यह रूपक किसका है जो दुःख से भरा है।

Jan 24, 20242 min

Ep 297Sharton Par Tika Hai Mera Prem | Anupam Singh

शर्तों पर टिका है मेरा प्रेम | अनुपम सिंह मुझसे प्रेम करने के लिए तुम्हें शुरू से शुरू करना होगा पैदा होना होगा स्त्री की कोख से उसकी और तुम्हारी धड़कन धड़कनी होगी एक साथमुझसे प्रेम करने के लिए सँभलकर चलना होगा हरी घास पर उड़ते हुए टिड्डे को पहले उड़ने देना होगा पेड़ों के पत्ते बहुत ज़रूरत पर ही तोड़ने होंगे कि जैसे आदिवासी लड़के तोड़ते हैं फूलों को नोच कभी मत चढ़ाना देवताओं की मूर्तियों परमुझसे प्रेम करने के लिए तोड़ने होंगे नदियों के सारे बाँध एक्वेरियम की मछलियों को मुक्त कर मछुआरे के बच्चे से प्रेम करना होगा करना होगा पहाड़ों पर रात्रि-विश्राममुझसे प्रेम करने के लिए छाना होगा मेरा टपकता हुआ छप्पर उस पर लौकियों की बेलें चढ़ानी होंगीमेरे लिए लगाना होगा एक पेड़ अपने भीतर भरना होगा जंगल का हरापन और किसी को सड़क पार कराना होगामुझसे प्रेम करने के लिए भटकी हुई चिट्ठियों को पहुँचाना होगा ठीक पते पर मेरे साथ खेतों में काम करना होगा रसोई में खड़े रहना होगा मेरी ही तरह बिस्तर पर तुम्हें पुरुष नहीं मेरा प्रेमी होना होगाहाँ, शर्तों पर टिका है मेरा प्रेम मुझसे प्रेम करने के लिए अलग से नहीं करना होगा तुम्हें मुझसे प्रेम।

Jan 23, 20242 min

Ep 296Vo Kahan Hain Jo Kavita Likhti Hain | Rupam Mishra

वो कहाँ हैं जो कविता लिखती हैं | रूपम मिश्र वे बहुत दिन बाद आए हैं भइया के सखा हैं तो रवायतन मेरे भइया हैं किसी पत्रिका में मेरी कविता पढ़ अभिभूत हैंभइया से अक्सर मेरा बखान करते एक बार मिलना चाहते भइया भी अप्रत्याशित गर्व से भर जाते और लखनऊ आने पर मुझसे मिलवाने का वादा करतेफिर जल्दी संजोग बना भतीजे के हैप्पी बर्थ डे में वे पधारे भइया ने भीड़ में से मुझे बुलाया और हहर कर बताया इनको नहीं पहचान रही हो ये अमरेंदर हैं बहरिया के याद नहीं, पहले कितना घर आते थे अब यहीं रशद विभाग में इंस्पेक्टर हैंअपने घर-जवार की चिन्हारी में ढला हम भाई-बहनों का मन पिता, चाचा, आजा के जनारी भर की हमारी दुनिया यहाँ उजाला भी उनकी ही खादी की धोतियों से छनकर आता था सँझियरई में बिहँसे हमारे गँवई चित्त हम मनुष्य भी उतने ही थे जितना चीन्ह में आते थेभइया के जेहन में कैसे आती मेरी कोई अलग पहचान हम दोनों एक-दूसरे को याद नहीं थे रोज घर आने से क्या होता हैसयानी लड़कियाँ क्या बैठक तक आती हैं मैंने काफी कोशिश की कि उन्हें भर निगाह देख कर नमस्ते कहूँ पर सब बेकारसनई के बोझ से गरुवाई स्थानीयता मुझ पर काबिज हो गई जड़ संकोच से पलकें ऐसे कनरी कि तर से उप्पर न हुईं ढाक के भीगे पेड़-सी खड़ी रही अन्ततः उन्होंने अभिवादन करके निहायत जहीन अन्दाज में मुझसे कहा अच्छा, 'वे कहाँ हैं जो कविता लिखती हैं।'

Jan 22, 20242 min

Ep 295Purusharth | Shraddha Upadhyay

पुरुषार्थ | श्रद्धा उपाध्यायक्या पुरुषार्थ के अधिकार क्षेत्र में शामिल हैं औरतें जो रचाती हैं रास औरतें जो पकड़ी रहती हैं आस औरतें जो अग्नि में तप्ती हैं औरतें जो मूड नेह में घटती हैंऔरतें जो उठाती हैं भांडे औरतें जो चलाती हैं चरखे औरतें जो घर चलाती हैं औरतें जो जूठन खाती हैं औरतें जो लहू में नहाती हैंऔर जो धान लगती हैं औरतें जो तीज मनाती हैं मैं एक थकी हुई औरत हूँ मैं 16000 आदमियों को ब्याह करपुरुषोत्तम पर दाँव लगाना चाहती हूँ

Jan 21, 20241 min

Ep 294Mithai Banane Wale | Shashwat Upadhyay

मिठाई बनाने वाले | शाश्वत उपाध्याय जब दुनिया बनीतो सबसे पहले बने मिठाई बनाने वालेहाथों में भर भर के चीनी की परतपरत भी ऐसी वैसी नहींएकदम गूलर का फूल छुआ केजितना खर्च हो, उतना बढ़ेउंगली के पोरों में घी का कनस्तर,कनस्तर भी वही गूलर के फूलों वालाआँखों में परख,परख भी एकदम पाग चिन्ह लेने वालीइतने सब के बादबोली तो मीठी होनी ही थीसो भी है।लेकिन कलेजा?मठूस हलवाई कहीं का,बचपन में ही काले रसगुल्ले की कीमतआसमान पर रखे थासात रुपया पीसआते जाते स्कूल,मन मार कर साइकिल चलाते लड़कों में,नौकरी की पहली ललक तुम्हारे रसगुल्ले के रेट ने ही तो लगाईसात रुपया पीसरसगुल्ला है कि कलेजे का टुकड़ा तुम्हारे?और समोसा,वह भी हर साल एक रुपये महंगाबहाना तो देखो,महंगाई बढ़ रहीलौंगलत्ता तो ऐसे,जैसे सोखा का लौंग डाले हो ओझइती करकेक्या सोचे हो?कि शो-केश के उस पार की सारी मिठाई तुम्हारी बपौती हैं?सो तो हैं।लेकिन,एक दिन जब होंगे लायकतो ज़रूर देह में घुल चुकी होगी चीनी की परत।जिंदगी उबले हुए आलू को सोख रही होगी।और ज़बान में लड़खड़ाहट भी होगी।फिर भी,किसी दिन आ करतुम्हारी दुकान की सारी मिठाई खा जाएंगेफिर देह में घुल चुकी शर्करा के पार जा करभगवान से आश्वासन लेंगेकिअगली बारलड़की बनानाजिसके पिता और पति दोनों कीअपनी मिठाई की दुकान हो।

Jan 20, 20242 min