
Pratidin Ek Kavita
1,183 episodes — Page 15 of 24

Ep 485Khali Jagah | Amrita Pritam
ख़ाली जगह | अमृता प्रीतमसिर्फ़ दो रजवाड़े थे –एक ने मुझे और उसेबेदखल किया थाऔर दूसरे कोहम दोनों ने त्याग दिया था।नग्न आकाश के नीचे –मैं कितनी ही देर –तन के मेंह में भीगती रही,वह कितनी ही देरतन के मेंह में गलता रहा।फिर बरसों के मोह कोएक ज़हर की तरह पीकरउसने काँपते हाथों सेमेरा हाथ पकड़ा!चल! क्षणों के सिर परएक छत डालेंवह देख! परे – सामने उधरसच और झूठ के बीच –कुछ ख़ाली जगह है...

Ep 484Tum Hansi Ho | Agyeya
तुम हँसी हो | अज्ञेयतुम हँसी हो - जो न मेरे होंठ पर दीखे, मुझे हर मोड़ पर मिलती रही है। धूप - मुझ पर जो न छाई हो, किंतु जिसकी ओर मेरे रुद्ध जीवन की कुटी की खिड़कियाँ खुलती रही हैं। तुम दया हो जो मुझे विधि ने न दी हो, किंतु मुझको दूसरों से बाँधती है जो कि मेरी ही तरह इंसान हैं। आँख जिनसे न भी मेरी मिले, जिनको किंतु मेरी चेतना पहचानती है। धैर्य हो तुम : जो नहीं प्रतिबिंब मेरे कर्म के धुँधले मुकुर में पा सका, किंतु जो संघर्ष-रत मेरे प्रतिम का, मनुज का, अनकहा पर एक धमनी में बहा संदेश मुझ तक ला सका, व्यक्ति की इकली व्यथा के बीज को जो लोक-मानस की सुविस्तृत भूमि में पनपा सका। हँसी ओ उच्छल, दया ओ अनिमेष, धैर्य ओ अच्युत, आप्त, अशेष।

Ep 483Choolhe Ke Paas | Madan Kashyap
चूल्हे के पास - मदन कश्यप गीली लकड़ियों को फूँक मारतीआँसू और पसीने से लथपथचूल्हे के पास बैठी है औरतहज़ारों-हज़ार बरसों सेधुएँ में डूबी हुईचूल्हे के पास बैठी है औरतजब पहली बार जली थी आग धरती परतभी से राख की परतों में दबाकरआग ज़िंदा रखे हुई है औरत!

Ep 482Koi Aadmi Mamuli Nahi Hota | Kunwar Narayan
कोर्ई आदमी मामूली नहीं होता | कुंवर नारायण अकसर मेरा सामना हो जाताइस आम सचाई सेकि कोई आदमी मामूली नहीं होताकि कोई आदमी ग़ैरमामूली नहीं होताआम तौर पर, आम आदमी ग़ैर होता हैइसीलिए हमारे लिए जोग़ैर नहीं, वह हमारे लिएमामूली भी नहीं होतामामूली न होने की कोशिशदरअसल किसी के प्रति भीग़ैर न होने की कोशिश है।

Ep 481Bazaar | Anamika
बाज़ार | अनामिकासुख ढूँढ़ा, गैया के पीछे बछड़े जैसा दुःख चला आया! जीवन के साथ बँधी मृत्यु चली आई! दिन के पीछे डोलती आई रात बाल खोले हुई। प्रेम के पीछे चली आई दाँत पीसती कछमछाहट! ‘बाई वन गेट वन फ़्री!' लेकिन अतिरेकों के बीच कहीं कुछ तो था जो जस का तस रह गया लिए लुकाठी हाथ- डफ़ली बजाता हुआ और मगन गाता हुआ-‘मन लागो मेरो यार फ़क़ीरी में!

Ep 480Ma | Damodar Khadse
माँ - दामोदर खड़से नदी सदियों से बह रही है इसका संगीत पीढ़ियों को लुभा रहा है आकांक्षाओं और आस्थाओं के संगम पर वह धीमी हो जाती है...उफनती है आकांक्षाओं की पुकार से पीढ़ियाँ, बहाती रही हैं इच्छा-दीप और निर्माल्य बिना जाने कि थोड़ी-सी आँच भी नदी को तड़पा सकती हैपर नदी ने कभी प्रतिकार नहीं किया...हर फूल, हवन, राख को पहुँचाया है अखंड आराध्य तक कभी नहीं करती वह शिकायत भीड़ भरे किनारों से चाँद छू लेने की हर हाथ की चाहत को माँ जानती है!

Ep 479Har Taraf Har Jagah Beshumar Aadmi | Nida Fazli
हर तरफ़ हर जगह बेशुमार आदमी | निदा फ़ाज़लीहर तरफ़ हर जगह बेशुमार आदमीफिर भी तनहाईयों का शिकार आदमीसुबह से शाम तक बोझ ढोता हुआअपनी ही लाश का ख़ुद मज़ार आदमीहर तरफ़ भागते दौड़ते रास्तेहर तरफ़ आदमी का शिकार आदमीरोज़ जीता हुआ रोज़ मरता हुआहर नए दिन नया इंतज़ार आदमीज़िन्दगी का मुक़द्दर सफ़र दर सफ़रआख़िरी साँस तक बेक़रार आदमी

Ep 478Baadal Raag | Awadhesh Kumar
बादल राग | अवधेश कुमारबादल इतने ठोस हों कि सिर पटकने को जी चाहे पर्वत कपास की तरह कोमल हों ताकि उन पर सिर टिका कर सो सकें झरने आँसुओं की तरह धाराप्रवाह हों कि उनके माध्यम से रो सकें धड़कनें इतनी लयबद्ध कि संगीत उनके पीछे-पीछे दौड़ा चला आए रास्ते इतने लंबे कि चलते ही चला जाए पृथ्वी इतनी छोटी कि गेंद बनाकर खेल सकें आकाश इतना विस्तीर्ण कि उड़ते ही चले जाएँ दुख इतने साहसी हों कि सुख में बदल सकें सुख इतने पारदर्शी हों कि दुनिया बदली हुई दिखाई दे इच्छाएँ मृत्यु के समान चेहरे हों ध्यानमग्न बादल इस तरह के परदे हों कि उनमें हम छुपे भी रहें और दिखाई भी दें मेरा हास्य ही मेरा रुदन हो उनके सपने और उनका व्यंग्य हो घोरतम तमस के सच में विजन में जन हों अपनेपन में सूप में धूप हो धूप में सब अपरूप हो बादल इतने डरे हों कि अपनी छाती पर मेरा सिर न टिकने दें झरने इतने धारा प्रवाह न हों कि मेरे आँसुओं को पछाड़ सकें।

Ep 477Samay Aur Bachpan | Hemant Deolekar
समय और बचपन - हेमंत देवलेकर उसने मेरी कलाई परटिक टिक करती घड़ी देखीतो मचल उठी वैसी ही घड़ी पाने के लिएउसका जी बहलातेस्थिर समय की एक खिलौना घड़ीबाँध दी उसकी नन्हीं कलाई परपर घड़ी का खिलौनामंज़ूर नहीं था उसेटिक टिक बोलती, समय बतातीघड़ी असली मचल रही थी उसके हठ मेंयह सच है कि बच्चे समय का स्वप्न देखते हैंलेकिन मैं उसे समय के हाथों में कैसे सौंप दूँक्योंकि वह एक कुख्यात बच्चा चोर हैतभी उसकी ज़िद ने मेरी कलाई पकड़ लीबच्ची की आँखों में जीवन की सबसे चमकदार चीज़ देखीः कौतुहलऔर मेरे पास क्या था? खुरदुरा, घिसा-पिटाः अनुभवजो मुझे डराता ज़्यादा था ऐसा अनुभव किस काम का जो बच्चों का कौतुहल ही नष्ट कर देहो सकता है बच्चों की संगत सेसमय बदल जाएमैंने टिक टिक करती असली घड़ीबच्ची की कलाई पर बाँध दीऔर समय उसके हवाले कर दिया।

Ep 476Barson Ke Baad | Girija Kumar Mathur
बरसों के बाद | गिरिजा कुमार माथुर बरसों के बाद कभीहम-तुम यदि मिलें कहींदेखें कुछ परिचित-सेलेकिन पहिचाने ना।याद भी न आये नामरूप, रंग, काम, धामसोचें यह संभव हैपर, मन में माने ना।हो न याद, एक बारआया तूफान ज्वारबंद, मिटे पृष्ठों कोपढ़ने की ठाने ना।बातें जो साथ हुईबातों के साथ गईआँखें जो मिली रहींउनको भी जानें ना।

Ep 475Prem Mein Main Aur Tum | Anshu Kumar
प्रेम में मैं और तुम | अंशू कुमारएक दिन तुम और मैं जब अपनी अपनी धुरी पर लौट रहे होंगे ख़ाली हाथ, बेआवाज़ और बदहवास अपने-अपने हिस्से के सुख और दुःख लिए अब कब मिलेंगे, मिलेंगे भी या नहीं जैसे ख़ौफ़नाक सवाल लिए अनंत ख़ालीपन के साथ तब सबसे अंत में हमारे हिस्से का प्रेम ही बचेगा जो अगर बचा सकता तो बचा लेगा हमें एक बार फिर से मिलने की उम्मीद में...!

Ep 474Baarish Ya Punyavarsha | Arunabh Saurabh
बारिश या पुण्यवर्षा | अरुणाभ सौरभ धरती पर गिरतीबूँदें बारिश कीछोटी - छोटीये बूँद-बूँद गोलाइयाँधरती को चुंबन हैआकाश काया धरती सेआकाश केमिलने का सबूतया प्यार हैमर मिटनेवालाया प्यार कीसिफ़ारिशये बारिश हैया हृदय केभीतर कीबची हुई करुणाहमारे भीतर कीबची हुई मनुष्यतापितरों केपुण्य कीपुष्पवर्षाइसी के सहारेजीते हैं हमइसे देखकरजवान होते हैं

Ep 473Jagat Ke Kuchle Hue Path | Harishankar Parsai
जगत के कुचले हुए पथ पर भला कैसे चलूं मैं? | हरिशंकर परसाईकिसी के निर्देश पर चलना नहीं स्वीकार मुझकोनहीं है पद चिह्न का आधार भी दरकार मुझकोले निराला मार्ग उस पर सींच जल कांटे उगाताऔर उनको रौंदता हर कदम मैं आगे बढ़ाताशूल से है प्यार मुझको, फूल पर कैसे चलूं मैं?बांध बाती में हृदय की आग चुप जलता रहे जोऔर तम से हारकर चुपचाप सिर धुनता रहे जोजगत को उस दीप का सीमित निबल जीवन सुहातायह धधकता रूप मेरा विश्व में भय ही जगाताप्रलय की ज्वाला लिए हूं, दीप बन कैसे जलूं मैं?जग दिखाता है मुझे रे राह मंदिर और मठ कीएक प्रतिमा में जहां विश्वास की हर सांस अटकीचाहता हूँ भावना की भेंट मैं कर दूं अभी तोसोच लूँ पाषान में भी प्राण जागेंगे कभी तोपर स्वयं भगवान हूँ, इस सत्य को कैसे छलूं मैं?

Ep 472Akaal Aur Uske Baad | Nagarjun
अकाल और उसके बाद | नागार्जुनकई दिनों तक चूल्हा रोया, चक्की रही उदास कई दिनों तक कानी कुतिया सोई उनके पास कई दिनों तक लगी भीत पर छिपकलियों की गश्त कई दिनों तक चूहों की भी हालत रही शिकस्त दाने आए घर के अंदर कई दिनों के बाद धुआँ उठा आँगन से ऊपर कई दिनों के बाद चमक उठी घर भर की आँखें कई दिनों के बाद कौए ने खुजलाई पाँखें कई दिनों के बाद

Ep 471Santaan Saate | Nilesh Raghuvanshi
संतान साते - नीलेश रघुवंशी माँ परिक्रमा कर रही होगी पेड़ कीहम परिक्रमा कर रहे हैं पराये शहर कीजहाँ हमारी इच्छाएँ दबती ही जा रही हैं ।सात पुए और सात पूड़ियाँ थाल में सजाकररखी होंगी नौ चूड़ियाँआठ बहन और एक भाई की ख़ुशहालीऔर लंबी आयुपेड़ की परिक्रमा करतेकभी नहीं थके माँ के पाँव।माँ नहीं समझ सकी कभीजब माँग रही होती है वह दुआहम सब थक चुके होते हैं जीवन से।माँ के थाल में सजी होंगीसात पूड़ियाँ और सात पुएपूजा में बेख़बर माँ नहीं जानतीउसकी दो बेटियाँपराये शहर में भूखी होंगीसबसे छोटी और लाड़ली बेटीजिसके नाम की पूड़ीइठला रही होगी माँ के थाल में पूड़ी खाने की इच्छा को दबा रही होती है ।

Ep 470Jo Hua Vo Hua Kis Liye | Nida Fazli
जो हुआ वो हुआ किसलिए | निदा फ़ाज़लीजो हुआ वो हुआ किसलिएहो गया तो गिला किसलिएकाम तो हैं ज़मीं पर बहुतआसमाँ पर ख़ुदा किसलिएएक ही थी सुकूँ की जगहघर में ये आइना किसलिए

Ep 469Bachao | Uday Prakash
बचाओ - उदय प्रकाश चिंता करो मूर्द्धन्य 'ष' कीकिसी तरह बचा सको तो बचा लो ‘ङ’देखो, कौन चुरा कर लिये चला जा रहा है खड़ी पाईऔर नागरी के सारे अंकजाने कहाँ चला गया ऋषियों का “ऋ'चली आ रही हैं इस्पात, फाइबर और अज्ञात यौगिकधातुओं की तमाम अपरिचित-अभूतपूर्व चीज़ेंकिसी विस्फोट के बादल की तरह हमारे संसार मेंबैटरी का हनुमान उठा रहा है प्लास्टिक का पहाड़और बच्चों के हाथों में बोल रही है कोईडरावनी चीज़डींप...डींप...डींप...बचा लो मेरी नानी का पहियोंवाला काठ का नीला घोड़ासंभाल कर रखो अपने लटूटूपतंगें छुपा दो किसी सुरक्षित जगह परदेखो, हिलता है पृथ्वी परअमरूद का अंतिम पेड़उड़ते हैं आकाश में पृथ्वी के अंतिम तोतेबताएँ सारे विद्दान्मैं कहाँ पर टाँग दूँ अपने दादा की मिरजईकिस संग्रहालय को भेजूँ पिता का बसूलामाँ का करधन और बहन के विछुए मैं किस सरकार को सौपूँ हिफ़ाज़त के लिएमैं अपील करता हूँ राष्ट्रपति से किवे घोषित करेंखिचड़ी, ठठेरा, मदारी, लोहार, किताब, भड़भूँजा,कवि और हाथी कोविलुप्तप्राय राष्ट्रीय प्राणीवैसे खड़ाऊँ, दातुन और पीतल के लोटे कोबचाने की इतनी सख्त ज़रूरत नहीं हैरथ, राजकुमारी, धनुष, ढाल और तांत्रिकों केसंरक्षण के लिए भी ज़रूरी नहीं है कोई क़ानूनबचाना ही हो तो बचाए जाने चाहिएगाँव में खेत, जंगल में पेड़, शहर में हवा,पेड़ों में घोंसले, अख़बारों में सच्चाई, राजनीति मेंनैतिकता, प्रशासन में मनुष्यता, दाल में हल्दीक्या कुम्हार, धर्मनिरपेक्षता औरएक-दूसरे पर भरोसे को बचाने के लिएनहीं किया जा सकता संविधान में संशोधनसरदार जी, आप तो बचाइए अपनी पगड़ीऔर पंजाब का टप्पामुल्ला जी, उर्दू के बाद आप फ़िक्र करें कोरमे के शोरबे काज़ायका बचाने कीइधर मैं एक बार फिर करता हूँ प्रयत्नकि बच सके तो बच जाए हिंदी में समकालीन कविता।

Ep 468Jab Main Tera Geet Likhne Lagi
जब मैं तेरा गीत लिखने लगी/अमृता प्रीतममेरे शहर ने जब तेरे कदम छुएसितारों की मुट्ठियाँ भरकरआसमान ने निछावर कर दींदिल के घाट पर मेला जुड़ा ,ज्यूँ रातें रेशम की परियांपाँत बाँध कर आई......जब मैं तेरा गीत लिखने लगीकाग़ज़ के ऊपर उभर आईंकेसर की लकीरेंसूरज ने आज मेहंदी घोलीहथेलियों पर रंग गई,हमारी दोनों की तकदीरें

Ep 467Telephone Par Pita Ki Awaz | Nilesh Raghuvanshi
टेलीफ़ोन पर पिता की आवाज़ - नीलेश रघुवंशी टेलीफ़ोन परथरथराती है पिता की आवाज़दिये की लौ की तरह काँपती-सी।दूर से आती हुईछिपाये बेचैनी और दुख।टेलीफ़ोन के तार से गुज़रती हुईकोसती खीझती इस आधुनिक उपकरण पर।तारों की तरह टिमटिमातीटूटती-जुड़ती-सी आवाज़।कितना सुखदपिता को सुनना टेलीफ़ोन परपहले-पहल कैसे पकड़ा होगा पिता ने टेलीफ़ोन।कड़कती बिजली-सी पिता की आवाज़कैसी सहमी-सहमी-सी टेलीफ़ोन पर।बनते-बिगड़ते बुलबुलों की तरहआवाज़ पिता की भर्राई हुईपकड़े रहे होंगेटेलीफ़ोन देर तकअपने ही बच्चों सेदूर से बातें करते पिता।

Ep 456Saamya | Naresh Saxena
साम्य | नरेश सक्सेना समुद्र के निर्जन विस्तार को देखकरवैसा ही डर लगता हैजैसा रेगिस्तान को देखकरसमुद्र और रेगिस्तान में अजीब साम्य हैदोनों ही होते हें विशाललहरों से भरे हुएऔर दोनों हीभटके हुए आदमी को मारते हैंप्यासा।

Ep 466Nani Ki Kahani Mein Devraj Indra | Arunabh Saurabh
नानी की कहानी में देवराज इन्द्र - अरुणाभ सौरभ कठोरतम तप सेकिसी साधक कोमिलने लगेगी सिद्धितो आपका स्वर्ग सिंहासनडोल जाएगा देवराजबचपन में आपसेनानी की कहानियों मेंमिलता रहा हूँजवान हुआ तो समझाकि सबसे सुंदरतम दुनिया की अप्सराएँसबसे मादक पेयऔर अमरत्वआपके अधीनजहाँ प्रवेश अत्यंत कठिन हैमरणोपरांतपर हरेक हंदय मेंस्वर्ग की चाहना- कामना - इच्छा अपारतिसपर एकक्षत्र राज प्रभो!नानी को गए बरसों बीत गएपता नहीं उस स्वर्ग मेंबुढ़िया को जगह थोड़ीमिली कि नहींजिसकी हर कहानी मेंकमजोर, लाचार और मोहग्रस्त पाया आपकोकि जिसके पाससबसे विशालसुंदरतम दुनियाकठोरतम अस्त्र होवह महानतम कायर होता हैइस एकमात्र बड़ी सीख के लिएआपको सदैव प्रणामइन्द्रदेव!

Ep 465Aakhri Kavita | Imroz
आख़िरी कविता | इमरोज़अनुवाद : अमिया कुँवरजन्म के साथ मेरी क़िस्मत नहीं लिखी गई जवानी में लिखी गई और वह भी कविता में... जो मैंने अब पढ़ी है पर तू क्यों मेरी क़िस्मत कविता को अपनी आख़िरी कविता कर रही हो... मेरे होते तेरी तो कभी भी कोई कविता आख़िरी कविता नहीं हो सकती...

Ep 464Kivaad | Kumar Ambuj
किवाड़ | कुमार अम्बुजये सिर्फ़ किवाड़ नहीं हैं जब ये हिलते हैं माँ हिल जाती है और चौकस आँखों से देखती है—‘क्या हुआ?’ मोटी साँकल की चार कड़ियों में एक पूरी उमर और स्मृतियाँ बँधी हुई हैं जब साँकल बजती है बहुत कुछ बज जाता है घर में इन किवाड़ों पर चंदा सूरज और नाग देवता बने हैं एक विश्वास और सुरक्षा खुदी हुई है इन पर इन्हें देख कर हमें पिता की याद आती है। भैया जब इन्हेंबदलवाने का कहते हैंमाँ दहल जाती हैऔर कई रातों तक पिताउसके सपनों में आते हैंये पुराने हैं लेकिन कमज़ोर नहीं इनके दोलन में एक वज़नदारी है ये जब खुलते हैं एक पूरी दुनिया हमारी तरफ़ खुलती है जब ये नहीं होंगे घर घर नहीं रहेगा।

Ep 463Likhne Se Hi Likhi Jaati Hai Kavita | Udayan Vajpeyi
लिखने से ही लिखी जाती है कविता | उदयन वाजपेयीलिखने से ही लिखी जाती है कविता प्रेम भी करने की ही चीज़ है जैसे जंगल सुनने की किताब डूबने की मृत्यु इंतज़ार की जीवन, अपने को चारों ओर से समेट कर किसी ऐसे बिंदु पर ला देने की जहाँ नर्तकी की तरह अपने पाँव के अँगूठे पर कुछ देर खड़ा रह सके वियोग

Ep 462Sirf Mohabbat Hi Mazhab Hai Har Sacche Insaan Ka | Lakshmi Shankar Vajpeyi
सिर्फ मोहब्बत ही मज़हब है हर सच्चे इंसान का | लक्ष्मीशंकर वाजपेयीमाँ की ममता, फूल की खुशबू, बच्चे की मुस्कान कासिर्फ़ मोहब्बत ही मज़हब है हर सच्चे इंसान काकिसी पेड़ के नीचे आकरराही जब सुस्ताता हैपेड़ नहीं पूछे हैकिस मज़हब से तेरा नाता हैधूप गुनगुनाहट देती है चाहे जिसका आँगन होजो भी प्यासा आ जाता है, पानी प्यास बुझाता हैमिट्टी फसल उगाये पूछे धर्मन किसी किसान का।ये श्रम युग है जिसमे सबका संग-संग बहे पसीना हैसाथ-साथ हंसना मुस्काना संग-संग आंसू पीना हैएक समस्याएँ हैं सबकी जाति धर्म चाहे कुछ होसब इंसान बराबर सबका एक सा मरना जीना हैबेमानी हर ढंग पुराना इंसानी पहचान का।किसी प्रांत का रहनेवाला या कोई मज़हब वालाकोई भाषा हो कैसी भी रीति रिवाजों का ढालाचाहे जैसा खान-पान हो रहन सहन पहनावा होजिसको भी इस देश की मिट्टी और हवाओं ने पालाहै ये हिन्दुस्तान उसी का और वो हिन्दुस्तान का

Ep 461Umr | Hemant Deolekar
उम्र - हेमंत देवलेकर तुम कितने साल की होडिंबू ?"तीन साल की”"और तुम्हारी मम्मी ?""तीन साल की""और पापा?""तीन साल"अचानक मुझे यह दुनियाकच्चे टमाटर सी लगीमहज़ तीन साल पुरानी

Ep 460Kavi Log | Rituraj
कवि लोग | ऋतुराजकवि लोग बहुत लंबी उमर जीते हैं मारे जा रहे होते हैं फिर भी जीते हैं कृतघ्न समय में मूर्खों और लंपटों के साथ निभाते अपनी दोस्ती उनके हाथों में ठूँसते अपनी किताब कवि लोग बहुत दिनों तक हँसते हैं चीख़ते हैं और चुप रहते हैं लेकिन मरते नहीं हैं कमबख़्त! कवि लोग बच्चों में चिड़ियाँ और चिड़ियों में लड़कियाँ और लड़कियों में फूल देखते हैं सब देखे हुए के बीज समेटते हैं फिर ख़ुद को उन बीजों के साथ बोते हैं कवि लोग बीजों की तरह छिपकर नए रूप में लौट आते हैं फ़िलहाल उनकी नस्ल को कोई ख़तरा नहीं है

Ep 459Parinde Par Kavi Ko Pehchante Hain | Rajesh Joshi
परिन्दे पर कवि को पहचानते हैं - राजेश जोशी सालिम अली की क़िताबें पढ़ते हुएमैंने परिन्दों को पहचानना सीखा।और उनका पीछा करने लगापाँव में जंज़ीर न होती तो अब तक तो .न जाने कहाँ का कहाँ निकल गया होताहो सकता था पीछा करते-करते मेरे पंख उग आतेऔर मैं उड़ना भी सीख जाताजब परिन्दे गाना शुरू करतेंऔर पहाड़ अँधेरे में डूब जाते।ट्रक ड्राइवर रात की लम्बाई नापने निकलतेतो अक्सर मुझे साथ ले लेतेमैं परिन्दों के बारे में कई कहानियाँ जानता थामुझे किसी ने बताया था कि जिनके पास पंख नहीं होतेऔर जिन्हें उड़ना नहीं आतावे मन-ही-मन सबसे लम्बी उड़ान भरते हैंइसलिए रास्तों में जो जान-पहचानवाले लोग मिलतेमुझसे हमेशा परिन्दों की कहानियाँ सुनाने को कहतेदोस्त जब पूछते थे तो मैं अक्सर कहता थामुझे चिट्ठी मत लिखनापरिन्दों का पीछे करनेवाले काकोई स्थायी पता नहीं होतामुझे क्या ख़बर थी कि एक दिन ऐसा आएगाजब चिट्ठी लिखने का चलन ही अतीत हो जाएगान जाने किन कहानियों से उड़ान भरतेकुछ अजीब-से परिन्दे हमारे पास आते थेजो गाते-गाते एक लपट में बदल जातेऔर देखते-देखते राख हो जातेपर एक दिन बरसात आतीऔर वे अपनी ही राख से फिर पैदा हो जातेपता नहीं हमारे आकाश में उड़नेवाले परिन्दे कहानियों से निकलकर आए परिन्दों के बारे मेंकुछ जानते थे या नहीं...उनकी आँख देखकर लेकिन लगता थाकि उन कवियों को परिन्दे पर जानते हैंजो क़ुक़्नुस जैसे हज़ारों काल्पनिक परिन्दों की -कहानियाँ बनाते हैं ।पाँव में ज़ंजीर न होती तो शायदएक न एक दिन मैं भी किसी कवि के हत्थे चढ़करऐसे ही किसी परिन्दे में बदल गया होता!

Ep 458Ek Tinka | Ayodhya Singh Upadhyay 'Hari Oudh'
एक तिनका | अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ मैं घमण्डों में भरा ऐंठा हुआ।एक दिन जब था मुण्डेरे पर खड़ा।आ अचानक दूर से उड़ता हुआ।एक तिनका आँख में मेरी पड़ा।मैं झिझक उठा, हुआ बेचैन-सा।लाल होकर आँख भी दुखने लगी।मूँठ देने लोग कपड़े की लगे।ऐंठ बेचारी दबे पाँवों भगी।जब किसी ढब से निकल तिनका गया।तब 'समझ' ने यों मुझे ताने दिए।ऐंठता तू किसलिए इतना रहा।एक तिनका है बहुत तेरे लिए।

Ep 457Bahut dinon ke baad | Nagarjun
बहुत दिनों के बाद | नागार्जुनबहुत दिनों के बाद अबकी मैंने जी भर देखी पकी-सुनहली फ़सलों की मुस्कान - बहुत दिनों के बाद बहुत दिनों के बाद अबकी मैं जी भर सुन पाया धान कूटती किशोरियों की कोकिलकंठी तान - बहुत दिनों के बाद बहुत दिनों के बाद अबकी मैंने जी भर सूँघे मौलसिरी के ढेर-ढेर-से ताज़े-टटके फूल - बहुत दिनों के बाद बहुत दिनों के बाद अबकी मैं जी भर छू पाया अपनी गँवई पगडंडी की चंदनवर्णी धूल - बहुत दिनों के बाद बहुत दिनों के बाद अबकी मैंने जी भर तालमखाना खाया गन्ने चूसे जी भर -बहुत दिनों के बाद बहुत दिनों के बाद अबकी मैंने जी भर भोगे गंध-रूप-रस-शब्द-स्पर्श सब साथ-साथ इस भू पर - बहुत दिनों के बाद

Ep 455Uth Jaag Musafir | Vanshidhar Shukla
उठ जाग मुसाफ़िर | वंशीधर शुक्लउठ जाग मुसाफ़िर! भोर भई, अब रैन कहाँ जो सोवत है। जो सोवत है सो खोवत है, जो जागत है सो पावत है। उठ जाग मुसाफ़िर! भोर भई, अब रैन कहाँ जो सोवत है। टुक नींद से अँखियाँ खोल ज़रा पल अपने प्रभु से ध्यान लगा, यह प्रीति करन की रीति नहीं जग जागत है, तू सोवत है। तू जाग जगत की देख उड़न, जग जागा तेरे बंद नयन, यह जन जाग्रति की बेला है, तू नींद की गठरी ढोवत है। लड़ना वीरों का पेशा है, इसमें कुछ भी न अंदेशा है; तू किस ग़फ़लत में पड़ा-पड़ा आलस में जीवन खोवत है। है आज़ादी ही लक्ष्य तेरा, उसमें अब देर लगा न ज़रा; जब सारी दुनिया जाग उठी तू सिर खुजलावत रोवत है। उठ जाग मुसाफ़िर! भोर भई अब रैन कहाँ जो सोवत है।

Ep 454Maut Ik Geet Raat Gaati Thi | Firaq Gorakhpuri
मौत इक गीत रात गाती थीज़िन्दगी झूम झूम जाती थीज़िक्र था रंग-ओ-बू का और दिल मेंतेरी तस्वीर उतरती जाती थीवो तिरा ग़म हो या ग़म-ए-आफ़ाक़शम्मअ सी दिल में झिलमिलाती थीज़िन्दगी को रह-ए-मोहब्बत मेंमौत ख़ुद रौशनी दिखाती थीजल्वा-गर हो रहा था कोई उधरधूप इधर फीकी पड़ती जाती थीज़िन्दगी ख़ुद को राह-ए-हस्ती मेंकारवाँ कारवाँ छुपाती थीहमा-तन-गोशा ज़िन्दगी थी फ़िराक़ मौत धीमे सुरों में गाती थीज़िक्र: चर्चाग़म-ए-आफ़ाक़: क्षितिज / संसार का दुखराह-ए-हस्ती: रास्ताहस्ती: जिन्दगी की राह कारवाँ: क्राफ्रिला हमा-तन-गोश: पूरी जिस्म का कान बन जाना

Ep 453Sir Chupane Ki Jagah | Rajesh Joshi
सिर छिपाने की जगह | राजेश जोशी न उन्होंने कुंडी खड़खड़ाई न दरवाज़े पर लगी घंटी बजाईअचानक घर के अन्दर तक चले आए वे लोगउनके सिर और कपड़े कुछ भीगे हुए थेमैं उनसे कुछ पूछ पाता, इससे पहले ही उन्होंने कहना शुरू कर दियाकि शायद तुमने हमें पहचाना नहीं ।हाँ...पहचानोगे भी कैसेबहुत बरस हो गए मिले हुएतुम्हारे चेहरे को, तुम्हारी उम्र ने काफ़ी बदल दिया हैलेकिन हमें देखो हम तो आज भी बिलकुल वैसे ही हैंहमारे रंग ज़रूर कुछ फीके पड़ गए हैंलेकिन क्या तुम सचमुच इन रंगों को नहीं पहचान सकतेक्या तुम अपने बचपन के सारे रंगों को भूल चुके होभूल चुके हो अपने हाथों से खींची गई सारी रेखाओं कोतुम्हारी स्मृति में क्या हम कहीं नहीं हैं?याद करो यह उन दिनों की बात है जब तुम स्कूल में पढ़ते थेआठवीं क्लास में तुमने अपनी ड्राइंग कॉपी में एक तस्वीर बनाई थीऔर उसमें तिरछी और तीखी बौछारोंवाली बारिश थीजिसमें कुछ लोग भीगते हुए भाग रहे थेवह बारिश अचानक ही आ गई थी शायद तुम्हारे चित्र मेंचित्र पूरा करने की हड़बड़ी में तुम सिर छिपाने की जगहें बनाना भूल गए थेहम तब से ही भीग रहे थे और तुम्हारा पता तलाश कर रहे थेबड़े शहरों की बनावट अब लगभग ऐसी ही हो गई हैजिनमें सड़कें हैं या दुकानें ही दुकानें हैंलेकिन दूर-दूर तक उनमें कहीं सिर छिपाने की जगह नहींशक करने की आदत इतनी बढ़ चुकी है कि तुम्हें भीगता हुआ देखकर भीकोई अपने ओसारे से सिर निकालकर आवाज़ नहीं देताकि आओ यहाँ सिर छिपा लो और बारिश रुकने तक इन्तज़ार कर लोघने पेड़ भी दूर-दूर तक नहीं कि कोई कुछ देर ही सहीउनके नीचे खड़े होकर बचने का भरम पाल सकेइन शहरों के वास्तुशिल्पियों ने सोचा ही नहीं होगा कभीकि कुछ पैदल चलते लोग भी इन रास्तों से गुज़रेंगेएक पल को भी उन्हें नहीं आया होगा ख़याल कि बरसात के अचानक आ जाने पर कहीं सिर भी छिपाना होगा उन्हेंसबको पता है कि बरसात कई बार अचानक ही आ जाती हैसबके साथ कभी न कभी हो चुका होता है ऐसा वाकयालेकिन इसके बाद भी हम हमेशा छाता लेकर तो नहीं निकलतेफिर अचानक उनमें से किसी ने पूछा कि तुम्हारे चित्र में होती बारिश क्या कभी रुकती नहींतुम्हारे चित्र की बारिश में भीगे लोगों को तोतुम्हारे ही चित्र में ढूँढ़नी होगी कहींसिर छिपाने की जगहउन्होंने कहा कि हम बहुत भीग चुके हैं जल्दी करो और बताओकि क्या तुमने ऐसा कोई चित्र बनाया है...जिसमें कहीं सिर छिपाने की जगह भी हो?

Ep 452Mere Bete | Kavita Kadambari
मेरे बेटे | कविता कादम्बरीमेरे बेटे कभी इतने ऊँचे मत होना कि कंधे पर सिर रखकर कोई रोना चाहे तो उसे लगानी पड़े सीढ़ियाँ न कभी इतने बुद्धिजीवी कि मेहनतकशों के रंग से अलग हो जाए तुम्हारा रंग इतने इज़्ज़तदार भी न होना कि मुँह के बल गिरो तो आँखें चुराकर उठो न इतने तमीज़दार ही कि बड़े लोगों की नाफ़रमानी न कर सको कभी इतने सभ्य भी मत होना कि छत पर प्रेम करते कबूतरों का जोड़ा तुम्हें अश्लील लगने लगे और कंकड़ मारकर उड़ा दो उन्हें बच्चों के सामने से न इतने सुथरे ही होना कि मेहनत से कमाए गए कॉलर का मैल छुपाते फिरो महफ़िल में इतने धार्मिक मत होना कि ईश्वर को बचाने के लिए इंसान पर उठ जाए तुम्हारा हाथ न कभी इतने देशभक्त कि किसी घायल को उठाने को झंडा ज़मीन पर न रख सको कभी इतने स्थायी मत होना कि कोई लड़खड़ाए तो अनजाने ही फूट पड़े हँसी और न कभी इतने भरे-पूरे कि किसी का प्रेम में बिलखना और भूख से मर जाना लगने लगे गल्प।

Ep 451Baad Ke Dinon Mein Premikayein | Rupam Mishra
बाद के दिनों में प्रेमिकाएँ | रूपम मिश्रा बाद के दिनों में प्रेमिकाएँ पत्नियाँ बन गईंवे सहेजने लगीं प्रेमी को जैसे मुफलिसी के दिनों में अम्मा घी की गगरी सहेजती थींवे दिन भर के इन्तजार के बाद भी ड्राइव करते प्रेमी से फोन पर बात नहीं करतींवे लड़ने लगीं कम सोने और ज़्यादा शराब पीने परप्रेमी जो पहले ही घर में बिनशी पत्नी से परेशान थाअब प्रेमिका से खीजने लगावो सिर झटक कर सोचता कि कहीं गलती सेउसने फिर से तो एक ब्याह नहीं कर लियापत्नियाँ जो कि फोन पर पति की लरजती मुस्कान देख खरमनशायन रहतींउनकी अधबनी पूर्वधारणाएँ गझिन होतींप्रेमी यहाँ भी चूकते, वे मुस्कान और सम्बन्ध दोनों सहेजने में नाकाम होतेजबकि प्रेमिकाएँ यहाँ भी ज़िम्मेदार ही साबित रहींवे खचाखच भरी मेट्रो और बस में भी हँसी के साथ इमेज भी मैनेज करतींप्रेमिकाएँ भी खुद के पत्नी बनने पर थोड़ी-सी हैरान ही थींआख़िर ये पत्नीपना हममें आता कहाँ से हैप्रेमी खिसियाए रहे कि ये लड़कियाँ कभी कायदे से आधुनिक नहीं हो सकतींहमेशा बीती बातें, बीती रातों के ही गीत गाती हैं ख़ैर ये वो प्रेमी नहीं थे जो प्रेमिका का फोन खुद रिचार्ज कराते बाद उसका रोना रोतेये करिअरिज्म व बाजार के दरमेसे प्रेमी थे जो जीवन की दौड़ में सरपट भाग रहे थेऔर इस दौड़ारी में प्रेम उनकी जेब से अक्सर गिर कर बिला जाता है।

Ep 450Ishwar Aur Pyaz | Kedarnath Singh
ईश्वर और प्याज़ | केदारनाथ सिंह क्या ईश्वर प्याज़ खाता है?एक दिन माँ ने मुझसे पूछाजब मैं लंच से पहलेप्याज़ के छिलके उतार रहा थाक्यों नहीं माँ मैंने कहाजब दुनिया उसने बनाईतो गाजर मूली प्याज़ चुकन्दर-सब उसी ने बनाया होगाफिर वह खा क्यों नहीं सकता प्याज़?वो बात नहीं-हिन्दू प्याज़ नहीं खाताधीरे-से कहती है वहतो क्या ईश्वर हिन्दू हैं माँ?हँसते हुए पूछता हूँ मैं माँ अवाक देखती है मुझे उधर छिल चुकने के बादअब पृथ्वी जैसा गोल कत्थई प्याज़मेरी हथेली पर थाऔर ईश्वर कहीं और हो या न होउन आँखों में उस समय ज़रूर कहीं थामेरे छोटे-से प्याज़ मेंअपना वजूद खोजता हुआ

Ep 449Anant Janmon Ki Katha | Vishwanath Prasad Tiwari
अनंत जन्मों की कथा | विश्वनाथ प्रसाद तिवारी मुझे याद हैअपने अनंत जन्मों की कथापिता ने उपेक्षा कीसती हुई मैंचक्र से कटे मेरे अंग-प्रत्यंगजन्मदात्री माँ ने अरण्य में छोड़ दिया असहायपक्षियों ने पालाशकुंतला कहलाईजिसने प्रेम कियाउसी ने इनकार किया पहचानने सेसीता नाम पड़ाधरती से निकलीसमा गई अग्नि-परीक्षा की धरती मेंजन्मते ही फेंक दी गई आम्र कुंज मेंआम्रपाली कहलाई;सुंदरी थीइसलिए पूरे नगर का हुआ मुझ पर अधिकारजली मैं वीरांगनाबिकी मैं वारांगना देवदासी द्रौपदी कुलवधू नगरवधूकितने-कितने मिले मुझे नाम-रूपपृथ्वी, पवनजल, अग्नि, गगनमरु, पर्वत, वनसबमें व्याप्त है मेरी व्यथा।मुझे याद हैअपने अनंत जन्मों की कथा

Ep 448Khul Kar | Nandkishore Acharya
खुल कर | नंदकिशोर आचार्य खुल कर हो रही बारिशखुल कर नहाना चाहती लड़कीअपनी खुली छत पर।किन्तु लोगों की खुली आँखेंउसको बन्द रखती हैंखुल कर हो रहीबरसात में।

Ep 438Janna Zaroori Hai | Indu Jain
जानना ज़रूरी है | इन्दु जैनजब वक्त कम रह जाएतो जानना ज़रूरी है किक्या ज़रूरी हैसिर्फ़ चाहिए के बदले चाहनापहचानना कि कहां हैं हाथ में हाथ दिए दोनोंमुखामुख मुस्करा रहे हैं कहांफ़िर इन्हें यों सराहनाजैसे बला की गर्मी में घूंट भरतेमुंह में आई बर्फ़ की डली।

Ep 446Hum Aur Log | Kedarnath Agarwal
हम ओर लोग | केदारनाथ अग्रवाल हमबड़े नहींफिर भी बड़े हैंइसलिए किलोग जहाँ गिर पड़े हैंहम वहाँ तने खड़े हैंद्वन्द कीलड़ाई भीसाहस से लड़े हैं;न दुख से डरे,न सुख से मरे हैं;काल की मार मेंजहाँ दूसरे झरे हैं,हम वहाँ अब भीहरे-के-हरे हैं।

Ep 445Baarish Ki Bhasha | Shahanshah Alam
बारिश की भाषा | शहंशाह आलम उसकी देह कितनी बातूनी लग रही हैजो बारिश से बचने की ख़ातिर खड़ी हैजामुन पेड़ के नीचे जामुनी रंग के कपड़े में‘जामुन ख़रीदकर घर लाए कितने दिन हुए’हज़ारों मील तक बरस रही बारिश के बीचवह लड़की क्या ऐसा सोच रही होगीया यह कि इस शून्यता में जामुन का पेड़बारिश से उसको कितनी देर बचा पाएगाबारिश किसी नाव की तरहबाँधी नहीं जा सकती, यह सच हैजामुन का पककर गिरना भीबाँधा नहीं जा सकताबारिश को रुकना होता है तो ख़ुद रुक जाती हैबरसना होता है तो ख़ुद बरसने लगती है घनघोरतभी बारिश है लड़की है जामुन का पेड़ है तभी बारिश की भाषा है मेरे कानों तक सुनाई देती।

Ep 444Ve Kaise Din They | Kirti Choudhary
वे कैसे दिन थे | कीर्ति चौधरीवे कैसे दिन थे जब चीज़ें भागती थीं और हम स्थिर थे जैसे ट्रेन के एक डिब्बे में बंद झाँकते हुए ओझल होते थे दृश्य पल के पल में— ...कौन थी यह तार पर बैठी हुई बुलबुल, गौरय्या या नीलकंठ? आसमान को छूता हुआ सवन का जोड़ा था? दूरी पर झिलमिल-झिलमिल करती नदिया थी? या रेती का भ्रम? कभी कम कभी ज़्यादा प्रश्न ही प्रश्न उठते थे हम विमूढ़ ठगे-से सुलझाते ही रहते और चीज़ें हो जाती थीं ओझल वे कैसे दिन थे जो रहे नहीं। सीख ली हमने चाल समय की भागने लगे सरपट बदल गए सारे दृश्य शाखों पर दुबकी भूरी चिड़ियों ने कुतूहल से देखा हमें हवा ने बढ़ाई बाँह रसभीनी गंधमयी लेकिन हम रुके नहीं हमने सुनी ही नहीं झरनों की कलकल ताड़ पत्रों की बाँसुरी पोखर में खिले रहे दल के दल कमल और मुरझाए-से हम आगे और आगे भागते ही रहे छोड़ते चले ही गए जो कुछ पा सकते थे हाथ रही केवल यही अंतहीन दौड़ और छूटते दिनों के संग पीछे सब छूट गया।

Ep 443Din Bhar | Ramdarash Mishra
दिन भर | रामदरश मिश्राआज दिन भर कुछ नहीं कियासुबह की झील मेंएक कंकड़ी मारकर बैठ गया तट परऔर उसमें उठने वाली लहरों को देखता रहाशाम को लोग घर लौटे तोन जाने क्या-क्या सामान थे उनके पासमेरे पास कुछ नहीं थाकेवल एक अनुभव थाकंकड़ी और लहरों के सम्बन्ध से बना हुआ।

Ep 442Aurat Ki Ghulami | Sheoraj Singh 'Bechain'
औरत की गुलामी | डॉ श्योराज सिंह ‘बेचैन’ किसी आँख में लहू है-किसी आँख में पानी है।औरत की गुलामी भी-एक लम्बी कहानी है।पैदा हुई थी जिस दिन-घर शोक में डूबा था।बेटे की तरह उसका-उत्सव नहीं मना था।बंदिश भरा है बचपन-बोझिल-सी जवानी है।औरत की गुलामी भी-एक लम्बी कहानी है।तालीम में कमतर है--बाहरी हवा ज़हर है।लड़का कहीं भी जाए-उस पर कड़ी नज़र है।उसे जान गँवा कर भी-हर रस्म निभानी है।औरत की गुलामी भी-एक लम्बी कहानी है।कभी अग्नि परीक्षा में-औरत ही तो बैठी थी।होती थी जब सती तो-औरत ही तो होती थी।उसी जुल्म की बकाया--पर्दा भी निशानी है।औरत की गुलामी भी-एक लम्बी कहानी है।कानून समाजों के-एकतरफा नसीहत है।जिसे दिल से नहीं चाहा-वही प्यार मुसीबत है।दौलत-पसन्द दुनिया-मतलब की दीवानी है।औरत की गुलामी भी-एक लम्बी कहानी है।अब वक़्त है वो अपने-आयाम ख़ुद बनाये।तालीम हो या सर्विस-अपने हकूक पाये।मिलजुल के विषमता-की दीवार गिरानी है।औरत की गुलामी भी-एक लम्बी कहानी है।ससुराल सताये फिर-मुमकिन ही नहीं होगा।स्टोव जलाये फिर-मुमकिन ही नहीं होगा।दिन-चैन के आएँगे-यह रात तो जानी है।औरत की गुलामी भी-एक लम्बी कहानी है।

Ep 441Chal Insha Apne Gaon Mein | Ibn e Insha
चल इंशा अपने गाँव में | इब्ने इंशायहाँ उजले उजले रूप बहुतपर असली कम, बहरूप बहुतइस पेड़ के नीचे क्या रुकनाजहाँ साये कम,धूप बहुतचल इंशा अपने गाँव मेंबेठेंगे सुख की छाओं मेंक्यूँ तेरी आँख सवाली है ?यहाँ हर एक बात निराली हैइस देस बसेरा मत करनायहाँ मुफलिस होना गाली हैजहाँ सच्चे रिश्ते यारों केजहाँ वादे पक्के प्यारों केजहाँ सजदा करे वफ़ा पांव मेंचल इंशा अपने गाँव में

Ep 440Saat Panktiyan | Manglesh Dabral
सात पंक्तियाँ - मंगलेश डबराल मुश्किल से हाथ लगी एक सरल पंक्तिएक दूसरी बेडौल-सी पंक्ति में समा गईउसने तीसरी जर्जर क़िस्म की पंक्ति को धक्का दियाइस तरह जटिल-सी लड़खड़ाती चौथी पंक्ति बनीजो ख़ाली झूलती हुई पाँचवीं पंक्ति से उलझीजिसने छटपटाकर छठी पंक्ति को खोजा जो आधा ही लिखी गई थीअन्ततः सातवीं पंक्ति में गिर पड़ा यह सारा मलबा।

Ep 439Bahurupiya | Madan Kashyap
बहुरूपिया | मदन कश्यप जब वह पास आयातो पाँव में प्लास्टिक की चप्पल देखकर एकदम से हँसी फूट पड़ीफिर लगाभला कैसे संभव हैमहानगर की क्रूर सड़कों पर नंगे पाँव चलना चाहे वह बहुरूपिया ही क्यों न होवैसे उसने अपनी तरफ़ से कोशिश की थीदुम इतनी ऊँची लगायी थीकि वह सिर से काफ़ी ऊपर उठी दिख रही थीबाँस की खपच्चियों पर पीले काग़ज़ साटकर बनी गदाकमज़ोर भले हो चमकदार ख़ूब थीसिर पर गत्ते की चमकती टोपी थीचेहरे और हाथ-पाँव पर ख़ूब लाल रंग पोत रखा था लेकिन लाल लँगोटे की जगह धारीदार अंडरवियर और बदन में सफ़ेद बनियानउसकी पोल खोल रही थीउसने हनुमान का बाना धरा थापर इतने भर से भला क्या हनुमान लगता वह भी इस 'टेक्नो मेक-अप' के युग में जहाँ फ़िल्मों और टीवी सीरियलों में तरह-तरह के हनुमान उछलकूद करते दिखते रहते हैं वह भी समझ रहा था अपनी दिकदारियों कोतभी तो चाल में हनुमान होने की ठसक नहीं थी।बनने की विवशताऔर नहीं बन पाने की असहायता के बीच फँसा हुआ एक उदास आदमी था वह जो जीने का और कोई दूसरा तरीक़ा नहीं जानता थाइस बहुरूपिया लोकतन्त्र मेंकिसी साधारण तमाशागर के लिएबहुत कठिन है बहुरूपिया बनना और बने रहना जबकि निगमित हो रही है साम्प्रदायिकता प्रगतिशील कहला रहा है जातिवादसमृद्धि का सूचकांक बन गयी हैं किसानों की आत्महत्याएँ और आदिवासियों के खून से सजायी जा रही है भूमण्डलीकरण की अल्पनाबस केवल बहुरूपिया है जो बहुरूपिया नहीं है!

Ep 447Ik Roz Doodh Ne Ki Pani Se Paak Ulfat | Unknown
इक रोज़ दूध ने की पानी से पाक उल्फ़त | अज्ञात इक रोज़ दूध ने की, पानी से पाक उल्फ़तइक ज़ात हो गए वो, मिल-जुल के भाई भाईइनमें बढ़ी वो उल्फ़त, एक रंग हो गए वोएक दूसरे ने पाया, सौ जान से फ़िदाई हलवाई ने उनकी, उल्फ़त का राज़ समझा दोनों से भर के रक्खी, भट्टी पे जब कढ़ाई बरछी की तरह उट्ठे, शोले डराने वाले भाई रहे सलामत, पानी के दिल में आई ख़ामोश भाप बनकर, भाई से ली विदाई क्या पाक-दामनी थी, के जान भी गँवाई जब दूध ने ये देखा, उल्फ़त का जोश आया जब दूध ने ये देखा, उल्फ़त का जोश आया कहने लगा कहां है, वो जॉं निसार भाई अफ़सोस आग ने है, भाई मेरा जलाया मुझको न कहना भाई, जब तक न की चढ़ाई कहते ही बात इतनी, उसको जलाल आया कहते ही बात इतनी, उसको जलाल आया ऐसा उबल के झपटा, कि आग सब बुझाई हलवाई ने उसपे दिया, पानी का एक छीँटा बैठा वो दूध नीचे, समझा कि आया भाई। जिस तरह दूध-पानी, रखते थे पाक उल्फ़त अब रहें जहां में, हर एक भाई भाई!

Ep 434Arrey Ab Aisi Kavita Likho | Raghuvir Sahay
अरे अब ऐसी कविता लिखो | रघुवीर सहायअरे अब ऐसी कविता लिखोकि जिसमें छंद घूमकर आयघुमड़ता जाय देह में दर्दकहीं पर एक बार ठहरायकि जिसमें एक प्रतिज्ञा करूंवही दो बार शब्द बन जायबताऊँ बार-बार वह अर्थन भाषा अपने को दोहरायअरे अब ऐसी कविता लिखोकि कोई मूड़ नहीं मटकायन कोई पुलक-पुलक रह जायन कोई बेमतलब अकुलायछंद से जोड़ो अपना आपकि कवि की व्यथा हृदय सह जायथामकर हँसना-रोना आजउदासी होनी की कह जाय।

Ep 436Prem Karna Ya Phasna | Rupam Mishra
प्रेम करना या फंसना - रूपम मिश्रा हम दोनों नए-नए प्रेम में थेउसके हाथ में महँगा-सा फोन था और बाँह में औसत-सी मैंफोन में कई खूबसूरत लड़कियों की तसवीरें दिखाते हुए उसनेमुस्कुराते हुए गर्व से कहा, देख रही हो ये सब मुझपे मरती थींमैंने कहा और तुम! उसने कहा, ज़ाहिर है मैं भी प्रेम करता थामुझे भी थोड़ा रोमांच हुआमैंने हसरत और थोड़ी रूमानियत से लजाते हुए कहामेरे भी स्कूल में एक पगलेट-सा लड़का थामुझे बहुत अच्छा लगता था, हम खूब बातें करते थेतब उसने मेरी ओर हिकारत से देखकर कहांअच्छा तो तुम एक पागल से फँसी थीमैं आज तक न समझ पाई भाषा का ये व्याकरण कि एक ही संवेदना में वो कैसे प्रेम में था और मैं कैसे फँसी थी।