
Pratidin Ek Kavita
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Ep 443Din Bhar | Ramdarash Mishra
दिन भर | रामदरश मिश्राआज दिन भर कुछ नहीं कियासुबह की झील मेंएक कंकड़ी मारकर बैठ गया तट परऔर उसमें उठने वाली लहरों को देखता रहाशाम को लोग घर लौटे तोन जाने क्या-क्या सामान थे उनके पासमेरे पास कुछ नहीं थाकेवल एक अनुभव थाकंकड़ी और लहरों के सम्बन्ध से बना हुआ।

Ep 442Aurat Ki Ghulami | Sheoraj Singh 'Bechain'
औरत की गुलामी | डॉ श्योराज सिंह ‘बेचैन’ किसी आँख में लहू है-किसी आँख में पानी है।औरत की गुलामी भी-एक लम्बी कहानी है।पैदा हुई थी जिस दिन-घर शोक में डूबा था।बेटे की तरह उसका-उत्सव नहीं मना था।बंदिश भरा है बचपन-बोझिल-सी जवानी है।औरत की गुलामी भी-एक लम्बी कहानी है।तालीम में कमतर है--बाहरी हवा ज़हर है।लड़का कहीं भी जाए-उस पर कड़ी नज़र है।उसे जान गँवा कर भी-हर रस्म निभानी है।औरत की गुलामी भी-एक लम्बी कहानी है।कभी अग्नि परीक्षा में-औरत ही तो बैठी थी।होती थी जब सती तो-औरत ही तो होती थी।उसी जुल्म की बकाया--पर्दा भी निशानी है।औरत की गुलामी भी-एक लम्बी कहानी है।कानून समाजों के-एकतरफा नसीहत है।जिसे दिल से नहीं चाहा-वही प्यार मुसीबत है।दौलत-पसन्द दुनिया-मतलब की दीवानी है।औरत की गुलामी भी-एक लम्बी कहानी है।अब वक़्त है वो अपने-आयाम ख़ुद बनाये।तालीम हो या सर्विस-अपने हकूक पाये।मिलजुल के विषमता-की दीवार गिरानी है।औरत की गुलामी भी-एक लम्बी कहानी है।ससुराल सताये फिर-मुमकिन ही नहीं होगा।स्टोव जलाये फिर-मुमकिन ही नहीं होगा।दिन-चैन के आएँगे-यह रात तो जानी है।औरत की गुलामी भी-एक लम्बी कहानी है।

Ep 441Chal Insha Apne Gaon Mein | Ibn e Insha
चल इंशा अपने गाँव में | इब्ने इंशायहाँ उजले उजले रूप बहुतपर असली कम, बहरूप बहुतइस पेड़ के नीचे क्या रुकनाजहाँ साये कम,धूप बहुतचल इंशा अपने गाँव मेंबेठेंगे सुख की छाओं मेंक्यूँ तेरी आँख सवाली है ?यहाँ हर एक बात निराली हैइस देस बसेरा मत करनायहाँ मुफलिस होना गाली हैजहाँ सच्चे रिश्ते यारों केजहाँ वादे पक्के प्यारों केजहाँ सजदा करे वफ़ा पांव मेंचल इंशा अपने गाँव में

Ep 440Saat Panktiyan | Manglesh Dabral
सात पंक्तियाँ - मंगलेश डबराल मुश्किल से हाथ लगी एक सरल पंक्तिएक दूसरी बेडौल-सी पंक्ति में समा गईउसने तीसरी जर्जर क़िस्म की पंक्ति को धक्का दियाइस तरह जटिल-सी लड़खड़ाती चौथी पंक्ति बनीजो ख़ाली झूलती हुई पाँचवीं पंक्ति से उलझीजिसने छटपटाकर छठी पंक्ति को खोजा जो आधा ही लिखी गई थीअन्ततः सातवीं पंक्ति में गिर पड़ा यह सारा मलबा।

Ep 439Bahurupiya | Madan Kashyap
बहुरूपिया | मदन कश्यप जब वह पास आयातो पाँव में प्लास्टिक की चप्पल देखकर एकदम से हँसी फूट पड़ीफिर लगाभला कैसे संभव हैमहानगर की क्रूर सड़कों पर नंगे पाँव चलना चाहे वह बहुरूपिया ही क्यों न होवैसे उसने अपनी तरफ़ से कोशिश की थीदुम इतनी ऊँची लगायी थीकि वह सिर से काफ़ी ऊपर उठी दिख रही थीबाँस की खपच्चियों पर पीले काग़ज़ साटकर बनी गदाकमज़ोर भले हो चमकदार ख़ूब थीसिर पर गत्ते की चमकती टोपी थीचेहरे और हाथ-पाँव पर ख़ूब लाल रंग पोत रखा था लेकिन लाल लँगोटे की जगह धारीदार अंडरवियर और बदन में सफ़ेद बनियानउसकी पोल खोल रही थीउसने हनुमान का बाना धरा थापर इतने भर से भला क्या हनुमान लगता वह भी इस 'टेक्नो मेक-अप' के युग में जहाँ फ़िल्मों और टीवी सीरियलों में तरह-तरह के हनुमान उछलकूद करते दिखते रहते हैं वह भी समझ रहा था अपनी दिकदारियों कोतभी तो चाल में हनुमान होने की ठसक नहीं थी।बनने की विवशताऔर नहीं बन पाने की असहायता के बीच फँसा हुआ एक उदास आदमी था वह जो जीने का और कोई दूसरा तरीक़ा नहीं जानता थाइस बहुरूपिया लोकतन्त्र मेंकिसी साधारण तमाशागर के लिएबहुत कठिन है बहुरूपिया बनना और बने रहना जबकि निगमित हो रही है साम्प्रदायिकता प्रगतिशील कहला रहा है जातिवादसमृद्धि का सूचकांक बन गयी हैं किसानों की आत्महत्याएँ और आदिवासियों के खून से सजायी जा रही है भूमण्डलीकरण की अल्पनाबस केवल बहुरूपिया है जो बहुरूपिया नहीं है!

Ep 447Ik Roz Doodh Ne Ki Pani Se Paak Ulfat | Unknown
इक रोज़ दूध ने की पानी से पाक उल्फ़त | अज्ञात इक रोज़ दूध ने की, पानी से पाक उल्फ़तइक ज़ात हो गए वो, मिल-जुल के भाई भाईइनमें बढ़ी वो उल्फ़त, एक रंग हो गए वोएक दूसरे ने पाया, सौ जान से फ़िदाई हलवाई ने उनकी, उल्फ़त का राज़ समझा दोनों से भर के रक्खी, भट्टी पे जब कढ़ाई बरछी की तरह उट्ठे, शोले डराने वाले भाई रहे सलामत, पानी के दिल में आई ख़ामोश भाप बनकर, भाई से ली विदाई क्या पाक-दामनी थी, के जान भी गँवाई जब दूध ने ये देखा, उल्फ़त का जोश आया जब दूध ने ये देखा, उल्फ़त का जोश आया कहने लगा कहां है, वो जॉं निसार भाई अफ़सोस आग ने है, भाई मेरा जलाया मुझको न कहना भाई, जब तक न की चढ़ाई कहते ही बात इतनी, उसको जलाल आया कहते ही बात इतनी, उसको जलाल आया ऐसा उबल के झपटा, कि आग सब बुझाई हलवाई ने उसपे दिया, पानी का एक छीँटा बैठा वो दूध नीचे, समझा कि आया भाई। जिस तरह दूध-पानी, रखते थे पाक उल्फ़त अब रहें जहां में, हर एक भाई भाई!

Ep 434Arrey Ab Aisi Kavita Likho | Raghuvir Sahay
अरे अब ऐसी कविता लिखो | रघुवीर सहायअरे अब ऐसी कविता लिखोकि जिसमें छंद घूमकर आयघुमड़ता जाय देह में दर्दकहीं पर एक बार ठहरायकि जिसमें एक प्रतिज्ञा करूंवही दो बार शब्द बन जायबताऊँ बार-बार वह अर्थन भाषा अपने को दोहरायअरे अब ऐसी कविता लिखोकि कोई मूड़ नहीं मटकायन कोई पुलक-पुलक रह जायन कोई बेमतलब अकुलायछंद से जोड़ो अपना आपकि कवि की व्यथा हृदय सह जायथामकर हँसना-रोना आजउदासी होनी की कह जाय।

Ep 436Prem Karna Ya Phasna | Rupam Mishra
प्रेम करना या फंसना - रूपम मिश्रा हम दोनों नए-नए प्रेम में थेउसके हाथ में महँगा-सा फोन था और बाँह में औसत-सी मैंफोन में कई खूबसूरत लड़कियों की तसवीरें दिखाते हुए उसनेमुस्कुराते हुए गर्व से कहा, देख रही हो ये सब मुझपे मरती थींमैंने कहा और तुम! उसने कहा, ज़ाहिर है मैं भी प्रेम करता थामुझे भी थोड़ा रोमांच हुआमैंने हसरत और थोड़ी रूमानियत से लजाते हुए कहामेरे भी स्कूल में एक पगलेट-सा लड़का थामुझे बहुत अच्छा लगता था, हम खूब बातें करते थेतब उसने मेरी ओर हिकारत से देखकर कहांअच्छा तो तुम एक पागल से फँसी थीमैं आज तक न समझ पाई भाषा का ये व्याकरण कि एक ही संवेदना में वो कैसे प्रेम में था और मैं कैसे फँसी थी।

Ep 435Rin Phoolon Sa | Sunita Jain
ऋण फूलों-सा | सुनीता जैनइस काया कोजिस माया नेजन्म दिया,वह माँग रही-किजैसे उत्सव के बाददीवारों परहाथों के थापे रह जातेजैसे पूजा के बादचौरे के आसपासपैरों के छापे रह जातेजैसे वृक्षों परप्रेम संदेशों के बँधे,बँधे धागे रह जाते,वैसा ही कुछकर जाऊँसोच रही,माया के धीरज काकाया की कथरी कायह ऋणफूलों-सा हल्का-किन शब्दों मेंतोल,चुकाऊँ

Ep 437Saath Chalte Chalte Tum | Rashmi Pathak
साथ चलते चलते तुम | रश्मि पाठक तुम बहुत आगे निकल गए जाने कितना समय लगेगा तुम तक पहुँचने में सोचती थी कैसे कटेंगे ये पल छिन बीत गया एक बरस तुम्हारे बिन बंद हुए अब मन के सारे द्वार रुक गया है मेरा प्रति स्पंदन रह रह कर टीसती है वेदना और बूँद बूँद आँखों के कोनों से झड़ती है चुपचाप तुम नहीं हो मेरे पास

Ep 433Filhaal | Uday Prakash
फ़िलहाल | उदय प्रकाश एक गत्ते का आदमीबन गया था लौहपुरुषबलात्कारी हो चुका था सन्तव्यभिचारी विद्वानचापलूस क्रान्तिकारीमदारी को घोषित कर दिया गया थायुग-प्रवर्तकअख़बार और चैनलचीख़-चीख़ कर कह रहे थेआ गयी है सच्ची जम्हूरियतजहाँ सबसे ज्यादा लाशें बिछी थींवहीं हो रहा था विकासजो बैठा था किसी उजड़े पेड़ के नीचेपढ़ते हुए अकेले मेंकोई बहुत पुरानी किताबवही था सन्दिग्धउसकी हो रही थी लगातारनिगरानी

Ep 432Kavita Ke Liye | Snehmayi Chaudhary
कविता के लिए | स्नेहमयी चौधरीकविता लिखने के लिए जो परेशान करते थे उन सबको मैंने धीरे-धीरे अपने से काट दिया। जैसे : ज़रा सी बात पर बड़ी देर तक घुमड़ते रहना, अपने किए को हर बार ग़लत समझना, निरंतर अविश्वास की झिझक ओढ़े घूमना। अब सिर ऊँचा कर स्वस्थ हो रही हूँ, मकान बनाने में जुटे मज़दूरों को देख रही हूँ।

Ep 431Jo Maar Kha Royi Nahin | Vishnu Khare
जो मार खा रोईं नहीं | विष्णु खरेतिलक मार्ग थाने के सामनेजो बिजली का एक बड़ा बक्स हैउसके पीछे नाली पर बनी झु्ग्गी का वाक़या है यहचालीस के क़रीब उम्र का बापसूखी सांवली लंबी-सी काया परेशान बेतरतीब बढ़ी दाढ़ीअपने हाथ में एक पतली हरी डाली लिए खड़ा हुआनाराज़ हो रहा था अपनीपांच साल और सवा साल की बेटियों परजो चुपचाप उसकी तरफ़ ऊपर देख रही थींग़ु्स्सा बढ़ता गया बाप कापता नहीं क्या हो गया था बच्चियों सेकु्त्ता खाना ले गया थादूध, दाल, आटा, चीनी, तेल, केरोसीन में सेक्या घर में था जो बगर गया थाया एक या दोनों सड़क पर मरते-मरते बची थींजो भी रहा हो तीन बेंतें लगी बड़ी वाली को पीठ परऔर दो पड़ीं छोटी को ठीक सर परजिस पर मुण्डन के बाद छोटे भूरे बाल आ रहे थेबिलबिलाई नहीं बेटियाँ एकटक देखती रहीं बाप को तब भीजो अन्दर जाने के लिए धमका कर चला गयाउसका कहा मानने से पहलेबेटियों ने देखा उसेप्यार, करुणा और उम्मीद सेजब तक वह मोड़ पर ओझल नहीं हो गया

Ep 430Kalpvriksha | Damodar Khadse
कल्पवृक्ष | दामोदर खड़से कविताभीतर से होते हुए जब शब्दों में ढलती हैभीतरी ठिठुरनऊष्मा के स्पर्श सेप्राणवान हो उठती है ज्यों थकी हुई प्रतीक्षाबेबस प्यासदुत्कारी आशाअनायास हीकिसी पुकार को थाम लेती हैशब्द सार्थक हो उठते हैंऔर एकांत भी सान्निध्य से भर जाते हैंकविताकल्पवृक्ष है।

Ep 429Bhasha | Snehmayi Chaudhary
भाषा | स्नेहमयी चौधरीयह नहीं कि उसे कोई शिकायत नहीं, लेकिन अब वह अपने पक्ष में कोई तर्क न देगी, न चाहेगी— लगाए गए आरोपों का कोई निराकरण। यह नहीं कि उसके पास कहने को कुछ नहीं, शायद यह कि बहुत कुछ है। अब कोई न पूछे उसके निजी दस्तावेज़, यही तो उसकी संपत्ति है। यद्यपि निष्क्रिय विद्रोह आज की भाषा नहीं : यह नहीं कि वह जानती नहीं। शायद यही उसके लिए सही भाषा की तलाश का एक तरीक़ा है।

Ep 428Pura Parivaar Ek Kamre Mein | Laxmi Shankar Bajpai
पूरा परिवार एक कमरे में | लक्ष्मीशंकर वाजपेयीपूरा परिवार, एक कमरे मेंकितने संसार, एक कमरे में।हो नहीं पाया बड़े सपनों काछोटा आकार, एक कमरे में।ज़िक्र दादा की उस हवेली कासैंकड़ों बार, एक कमरे में।शोरगुल, नींद, पढ़ाई, टी.वी.रोज़ तकरार, एक कमरे में।एक घर, हर किसी की आँखों मेंसबका विस्तार, एक कमरे में।

Ep 427Main Buddh Nahi Banna Chahta | Shahanshah Alam
मैं बुद्ध नहीं बनना चाहता | शहंशा आलम मैं बुद्ध नहीं बनना चाहतातुम्हारे लिएबुद्ध की मुस्कराहटज़रूर बनना चाहता हूँबुद्ध मर जाते हैंजिस तरह पिता मर जाते हैंकिसी जुमेरात की रात कोबुद्ध की मुस्कान लेकिनजीवित रहती है हमेशामेरे होंठों पर ठहरकरजिस मुस्कान परतुम मर मिटती होतेज़ बारिश के दिनों में।

Ep 426Geet | Sheoraj Singh 'Bechain'
गीत | डॉ श्योराज सिंह 'बेचैन' मज़दूर-किसानों के अधर यूँ ही कहेंगे।हम एक थे, हम एक हैं, हम एक रहेंगे।।मज़हब, धर्म के नाम पर लड़ना नहीं हमें।फिर्को में जातियों में बिखरना नहीं हमें |।हम नेक थे, हम नेक हैं, हम नेक रहेंगे ।समता की भूख हमसे कह रही है अब उठो।सामन्तों, दरिन्दों की बढ़ो, रीढ़ तोड़ दो ।।अपने हकूक दुश्मनों से लेके रहेंगे |कैसा अछूत-छूत क्या, हैं हिन्दू क्या मुसलमान ।यकरसाँ हैं ज़माने के रफीको! सभी इन्सान |।जो फर्क करेगा उसे जाहिल कहेंगे |फिकों से, जुबानों से तो ऊपर उठे हैं हम ।तूफान की रफ़्तार से आगे बढ़े हैं हम ।।मेहनत के हक के वास्ते लड़ते ही रहेंगे ।हमको तो शहीदों की शहादत पर नाज़ है।दलितों के खून में रँगा ये तख़्तो-ताज़ है।।इस मुल्क को महफूज़ हमेशा ही देखेंगे |सदियों से पी रहे हैं सितमगर लहू के जाम।मजलूम की तबाही बढ़ाता है यह निज़ाम |।सहने को बहुत सह लिया बस अब न सहेंगे |दुनिया में कमेरों ने चमत्कार किया है।नाकारों, निठल्लों ने सदा खून पिया है।।इस जोंक सी फितरत को उभरने नहीं देंगे |समता, स्वतन्त्रता के नये गीत गाएँ हम |इंसानी भाईचारे के डंके बजाएँ हम |।मेहनतकशों जहान के मिल बैठ कहेंगे।हम एक थे, हम एक हैं, हम एक रहेंगे।।

Ep 425Suraj | Akanksha Pandey
सूरज | आकांक्षा पांडेतुम, हां तुम्हींतुमसे कुछ बताना चाहती हूँ।माना अनजान हूंदिखती नादान हूं कुछ ज्यादा कहने को नहीं हैकोई बड़ा फरमान नही हैबस इतना दोहराना हैजग में सबने जाना हैपीड़ा घटे बताने सेरात कटे बहाने सेलेकिन की थोड़ी कंजूसीकरके इतनी कानाफूसीबात का बतंगड़ बनायाऐसा मायाजाल पिरोयाकि अब डरते हो तुम कहने से अपने मन की देने दुहाई तन्हा दिल कीकरना साझा अपना बिसरा कोई दुख पुराना किसी अपने का दूर जाना सब रखते हो तकिए के नीचे गठरी बांध कही कोने में चूक से भी खोल न दे जुबां कही बोल न दे बिखर न जाए दुख बथेरेआंसू शायद फिर न ठहरे माना है ये खौफ बड़ा चौखट छांके पिशाच खड़ा पर एक कदम की दूरी है सांझ के बाद ही नूरी हैथाम ज़रा दिल तुम अपना धीरे से आगे बढ़ना हाथ मिलेंगे बहुतेरे तुम किसी एक से रिश्ता गढ़ना थोड़ा तुम उसकी सुनना कुछ थोड़ी अपनी कहना हौले हौले बातों से खुल जाएंगी गांठे मन कीहो जाएगा दिल हल्का जब धार बहेगी लफ्जों कीहल्के हल्के कदमों से फिरजाना तुम किवाड़ के पास तुलु ए सेहर या चांदनी रात दोनों देंगे तुम्हे कुछ आसपिशाच थोड़ा घबराएगा भड़केगा, गुर्राएगा फिर भी तुम धीरज रखना हाथ पकड़ आगे बढ़ना मुंह छोटी पर बात बड़ी बस इतना ही कहना हैदीर्घकाल के शिशिर के बाद फागुन में सब खिलता हैछः महीने के बाद ही सही ध्रुव पर भी सूरज उगता है

Ep 424Andhera Bhi Ek Darpan Hai | Anupam Singh
अँधेरा भी एक दर्पण है | अनुपम सिंह अँधेरा भी एक दर्पण है साफ़ दिखाई देती हैं सब छवियाँयहाँ काँटा तो गड़ता ही हैफूल भी भय देता हैकभी नहीं भूली अँधेरे में गही बाँहपृथ्वी सबसे उच्चतम बिन्दु पर काँपी थीजल काँपा था काँपे थे सभी तत्त्ववह भी एक महाप्रलय थाआँधेरे से सन्धि चाहते दिशागामी पाँवटकराते हैं आकाश तक खिंचे तम के पर्दे सेजीवन-मृत्यु और भय का इतना रोमांच!भावों की पराकाष्ठा है यह अँधेराअँधेरे की घाटी में सीढ़ीदार उतरन नहीं होतीसीधे ही उतरना पड़ता है मुँह के बलअँधेरे के आँसू वही देखता हैजिसके होती है अँधेरे की आँख।उजाले के भ्रम से कहीं अच्छा हैइस दर्पण को निहारतेदेखूँ काँपती पृथ्वी कोतत्वों के टकराव कोअँधेरे की देह धर उतरूँ उस बिन्दु परजहाँ सृजित होता है अँधेरातो उजाले में मेरी लाश आएगीयह कविता के लिए जीवन होगा।

Ep 423Tahniyan | Jaiprakash Kardam
टहनियाँ | जयप्रकाश कर्दमकाटा जाता है जब भी कोई पेड़बेजान हो जाती हैं टहनियां बिना कटे हीपेड़ है क्योंकि टहनियां हैंटहनियां हैं क्योंकि पेड़ हैअर्थहीन हैं एक दूसरे के बिनापेड़ और टहनियां ठूंठ हो जाता है पेड़टहनियों के अभाव मेंटहनियां हैं पेड़ का कुनबापेड़ ने देखा हैअपने कुनबे को बढते हुएटहनियों ने देखा है पेड़ को कटते हुएकटकर गिरने से पहलेअंतिम शंवास तक संघर्ष करते हुएटहनियां उदास हैं कि पेड़ कट गयापेड़ उदास है कि टहनियां कटेंगीउन पर भी चलेगी कुल्हाड़ीकटते रहेंगे कब तक पेड़ज़रूरतों के नाम परसूखते रहेंगे स्रोत टहनियों केक्यों ज़िंदा नहीं रह सकता पेड़अपनी टहनियों के साथ।

Ep 422Ek Avishwasniya Sapna | Vishwanath Prasad Tiwari
एक अविश्वसनीय सपना - विश्वनाथ प्रसाद तिवारीएक दिन उसने सपना देखाबिना वीसा बिना पासपोर्टसारी दुनिया में घूम रहा है वहन कोई सरहद, न कोई चेकपोस्टसमुद्रों और पहाड़ों और नदियों और जंगलों सेगुज़रते हुए उसने अद्भुत दृश्य देखे...आकाश के, बादलों और रंगों के...अक्षत यौवना प्रकृति उसके सामने थी...निर्भय घूम रहे थे पशु पक्षी।पुरुष स्त्री बच्चे क्या शहर थे वे और कैसे गाँवकोई राजा कोई सिपाहीकोई जेल कोई बन्दूक नहींचारों ओर खिले हुए चेहरेऔर उगते हुए अँखुएऔर उड़ती हुई तितलियाँ उसे अचरज हुआउसे सपने में भी लगा यह सपना हैतभी एक धमाका हुआ ज़ोर काएक तानाशाह की तलवार चमकी वह काँपता हुआ उठ बैठा अब वह फिर कोशिश कर रहा थाउसी सपने में लौटने की।

Ep 421Rok Sako To Roko | Poonam Shukla
रोक सको तो रोको | पूनम शुक्ला उछलेंगी ये लहरेंअपनी राह बना लेंगीये बल खाती सरिताएँअपनी इच्छाएँ पा लेंगीरोको चाहे जितना भीये झरने शोर मचाएँगेरोड़े कितने भी डालोकूद के ये आ जाएँगेचाहे ऊँची चट्टानें होंविहंगों का वृंद बसेगासूखती धरा भले होपुष्पों का झुंड हँसेगाहो रात घनेरी जितनीरोशनी का पुंज उगेगारोक सको तो रोकोयम भी विस्मित चल देगाडालो चाहे जितने विघ्नचाहे जितने करो प्रयत्नरोक नहीं सकते तुम हमकोपाने से जीवन के कुछ रत्न ।

Ep 420Ghar-Baar Chhorkar Sanyaas Nahin Lunga | Vinod Kumar Shukla
घर-बार छोड़कर संन्यास नहीं लूंगा | विनोद कुमार शुक्लघर-बार छोड़कर संन्यास नहीं लूंगाअपने संन्यास मेंमैं और भी घरेलू रहूंगाघर में घरेलूऔर पड़ोस में भी।एक अनजान बस्ती मेंएक बच्चे ने मुझे देखकर बाबा कहावह अपनी माँ की गोद में थाउसकी माँ की आँखों मेंख़ुशी की चमक थीकि उसने मुझे बाबा कहाएक नामालूम सगा।

Ep 419Agnipath | Harivansh Rai Bachchan
अग्निपथ | हरिवंश राय बच्चनवृक्ष हों भले खड़े,हों घने हों बड़े,एक पत्र छाँह भी,माँग मत, माँग मत, माँग मत,अग्निपथ अग्निपथ अग्निपथ।तू न थकेगा कभी,तू न रुकेगा कभी,तू न मुड़ेगा कभी,कर शपथ, कर शपथ, कर शपथ,अग्निपथ अग्निपथ अग्निपथ।यह महान दृश्य है,चल रहा मनुष्य है,अश्रु स्वेद रक्त से,लथपथ लथपथ लथपथ,अग्निपथ अग्निपथ अग्निपथ।

Ep 418Phagun Ka Geet | Kedarnath Singh
फ़ागुन का गीत | केदारनाथ सिंहगीतों से भरे दिन फागुन के ये गाए जाने को जी करता!ये बाँधे नहीं बँधते, बाँहें रह जातीं खुली की खुली,ये तोले नहीं तुलते, इस परये आँखें तुली की तुली,ये कोयल के बोल उड़ा करते, इन्हें थामे हिया रहता!अनगाए भी ये इतने मीठेइन्हें गाएँ तो क्या गाएँ,ये आते, ठहरते, चले जातेइन्हें पाएँ तो क्या पाएँये टेसू में आग लगा जाते, इन्हें छूने में डर लगता!ये तन से परे ही परे रहते,ये मन में नहीं अँटते,मन इनसे अलग जब हो जाता,ये काटे नहीं कटते,ये आँखों के पाहुन बड़े छलिया, इन्हें देखे न मन भरता!गीतों से भरे दिन फागुन के ये गाए जाने को जी करता!

Ep 417Sach Hai Vipatti Jab Aati Hai | Ramdhari Singh 'Dinkar'
सच है, विपत्ति जब आती है | रामधारी सिंह दिनकर सच है, विपत्ति जब आती है,कायर को ही दहलाती है,सूरमा नहीं विचलित होते,क्षण एक नहीं धीरज खोते,विघ्नों को गले लगाते हैं,काँटों में राह बनाते हैं।मुख से न कभी उफ कहते हैं,संकट का चरण न गहते हैं,जो आ पड़ता सब सहते हैं,उद्योग-निरत नित रहते हैं,शूलों का मूल नसाने को,बढ़ खुद विपत्ति पर छाने को।है कौन विघ्न ऐसा जग में,टिक सके वीर नर के मग मेंखम ठोंक ठेलता है जब नर,पर्वत के जाते पाँव उखड़।मानव जब जोर लगाता है,पत्थर पानी बन जाता है।गुण बड़े एक से एक प्रखर,हैं छिपे मानवों के भीतर,मेंहदी में जैसे लाली हो,वर्तिका-बीच उजियाली हो।बत्ती जो नहीं जलाता हैरोशनी नहीं वह पाता है।पीसा जाता जब इक्षु-दण्ड,झरती रस की धारा अखण्ड,मेंहदी जब सहती है प्रहार,बनती ललनाओं का सिंगार।जब फूल पिरोये जाते हैं,हम उनको गले लगाते हैं।वसुधा का नेता कौन हुआ?भूखण्ड-विजेता कौन हुआ?अतुलित यश क्रेता कौन हुआ?नव-धर्म प्रणेता कौन हुआ?जिसने न कभी आराम किया,विघ्नों में रहकर नाम किया।जब विघ्न सामने आते हैं,सोते से हमें जगाते हैं,मन को मरोड़ते हैं पल-पल,तन को झँझोरते हैं पल-पल।सत्पथ की ओर लगाकर ही,जाते हैं हमें जगाकर ही।वाटिका और वन एक नहीं,आराम और रण एक नहीं।वर्षा, अंधड़, आतप अखंड,पौरुष के हैं साधन प्रचण्ड।वन में प्रसून तो खिलते हैं,बागों में शाल न मिलते हैं।कङ्करियाँ जिनकी सेज सुघर,छाया देता केवल अम्बर,विपदाएँ दूध पिलाती हैं,लोरी आँधियाँ सुनाती हैं।जो लाक्षा-गृह में जलते हैं,वे ही सूरमा निकलते हैं।बढ़कर विपत्तियों पर छा जा,मेरे किशोर! मेरे ताजा!जीवन का रस छन जाने दे,तन को पत्थर बन जाने दे।तू स्वयं तेज भयकारी है,क्या कर सकती चिनगारी है?

Ep 416Chithi Hai Kissi Dukhi Mann Ki | Kunwar Bechain
चिट्ठी है किसी दुखी मन की | कुँवर बेचैन बर्तन की यह उठका-पटकीयह बात-बात पर झल्लानाचिट्ठी है किसी दुखी मन की।यह थकी देह पर कर्मभारइसको खाँसी, उसको बुखारजितना वेतन, उतना उधारनन्हें-मुन्नों को गुस्से मेंहर बार, मारकर पछतानाचिट्ठी है किसी दुखी मन की।इतने धंधे! यह क्षीणकाय-ढोती ही रहती विवश हायखुद ही उलझन, खुद ही उपायआने पर किसी अतिथि जन केदुख में भी सहसा हँस जानाचिट्ठी है किसी दुखी मन की।

Ep 415Need Ka Nirman | Harivansh Rai Bachchan
नीड़ का निर्माण | हरिवंश राइ बच्चन नीड़ का निर्माण फिर-फिर,नेह का आह्वान फिर-फिर!वह उठी आँधी कि नभ मेंछा गया सहसा अँधेरा,धूलि धूसर बादलों नेभूमि को इस भाँति घेरा,रात-सा दिन हो गया, फिररात आई और काली,लग रहा था अब न होगाइस निशा का फिर सवेरा,रात के उत्पात-भय सेभीत जन-जन, भीत कण-कणकिंतु प्राची से उषा कीमोहिनी मुस्कान फिर-फिर!नीड़ का निर्माण फिर-फिर,नेह का आह्वान फिर-फिर!वह चले झोंके कि काँपेभीम कायावान भूधर,जड़ समेत उखड़-पुखड़करगिर पड़े, टूटे विटप वर,हाय, तिनकों से विनिर्मितघोंसलो पर क्या न बीती,डगमगाए जबकि कंकड़,ईंट, पत्थर के महल-घर;बोल आशा के विहंगम,किस जगह पर तू छिपा था,जो गगन पर चढ़ उठातागर्व से निज तान फिर-फिर!नीड़ का निर्माण फिर-फिर,नेह का आह्वान फिर-फिर!क्रुद्ध नभ के वज्र दंतोंमें उषा है मुसकराती,घोर गर्जनमय गगन केकंठ में खग पंक्ति गाती;एक चिड़िया चोंच में तिनकालिए जो जा रही है,वह सहज में ही पवनउंचास को नीचा दिखाती!नाश के दुख से कभीदबता नहीं निर्माण का सुखप्रलय की निस्तब्धता सेसृष्टि का नव गान फिर-फिर!नीड़ का निर्माण फिर-फिर,नेह का आह्वान फिर-फिर!

Ep 414Gun Gaunga | Arun Kamal
गुन गाऊँगा | अरुण कमलगुन गाऊँगाफाग के फगुआ के चैत के पहले दिन के गुन गाऊँगागुड़ के लाल पुओं और चाशनी में इतराते मालपुओं केगुन गाऊँगादही में तृप्त उड़द बड़ोंऔर भुने जीरोंरोमहास से पुलकित कटहल और गुदाज़ बैंगन केगुन गाऊँगाहोली में घर लौटतेजन मजूर परिवारों के गुनभाँग की सांद्र पत्तियों और मगही पान के नर्म पत्तोंसरौतों सुपारियों केगुन गाऊँगाजन्मजन्मांतर मैं वसंत के धरती केगुन गाऊँगा—आओ वसंतसेना आओ मेरे वक्ष को बेधोआज रात सारे शास्त्र समर्पित करतामैं महुए की सुनसान टाप केगुन गाऊँगाइसी ठाँव मैं सदा सर्वदागुन गाऊँगासदा आनंद रहे यही द्वारे

Ep 413Sahil Aur Samandar | Sarwar
साहिल और समंदर | सरवर ऐ समंदरक्यों इतना शोर करते हो क्या कोई दर्द अंदर रखते हो यूं हर बार साहिल से तुम्हारा टकराना किसी के रोके जाने के खिलाफ तो नहीं पर मुझको तुम्हारी लहरें याद दिलाती हैं कोशिश से बदल जाते हैं हालात तुमने ढाला है साहिलों को बदला है उनके जबीनों को मुझको ऐसा मालूम पड़ता है कि तुम आकर लेते हो बौसा साहिलों के हज़ार ये मोहब्बत है तुम्हारी उस साहिल के लिए जो छोड़ता नहीं है तुम्हारा साथ काश इंसान भी साहिल और समंदर होता कितने भी बिगड़ते हालात फिर भी होते साथ साहिल और समंदर

Ep 412Furniture | Anamika
फ़र्नीचर | अनामिकामैं उनको रोज़ झाड़ती हूँपर वे ही हैं इस पूरे घर मेंजो मुझको कभी नहीं झाड़ते!रात को जब सब सो जाते हैं—अपने इन बरफाते पाँवों परआयोडिन मलती हुई सोचती हूँ मैं—किसी जनम में मेरे प्रेमी रहे होंगे फ़र्नीचर,कठुआ गए होंगे किसी शाप से ये!मैं झाड़ने के बहाने जो छूती हूँ इनको,आँसुओं से या पसीने से लथपथ-इनकी गोदी में छुपाती हूँ सर-एक दिन फिर से जी उठेंगे ये!थोड़े-थोड़े-से तो जी भी उठे हैं।गई रात चूँ-चूँ-चू करते हैं :ये शायद इनका चिड़िया का जनम है,कभी आदमी भी हो जाएँगे!जब आदमी ये हो जाएँगे,मेरा रिश्ता इनसे हो जाएगा क्यावो ही वालाजो धूल से झाड़न का?

Ep 411Dua | Manmeet Narang
दुआ | मनमीत नारंगकतरनें प्यार की जो फेंक दीं थी बेकार समझकर चल चुनें तुम और मैंहर टुकड़ा उस नेमत का और बुनें एक रज़ाई छुप जाएं सभी उसमें आज तुम मेरे सीने पे मैं उसके कंधे पर सिर रखकर रो लें ज़रा कुछ हँस दें ज़रा यूँ ही ज़िंदगी गुज़र बसर हो जाएगी शायद यह दुनिया बच जाएगी

Ep 410Dahi Jamane Ko Thoda Sa Jaman Dena | Yash Malviya
दही जमाने को, थोड़ा-सा जामन देना | यश मालवीयमन अनमन है, पल भर को अपना मन देना दही जमाने को, थोड़ा-सा जामन देना सिर्फ़ तुम्हारे छू लेने से चाय, चाय हो जाती धूप छलकती दूध सरीखी सुबह गाय हो जाती उमस बढ़ी है, अगर हो सके सावन देना दही जमाने को, थोड़ा-सा जामन देना नहीं बाँटते इस देहरी उस देहरी बैना तोता भी उदास, मन मारे बैठी मैना घर से ग़ायब होता जाता, आँगन देना दही जमाने को, थोड़ा-सा जामन देनाअलग-अलग रहने की ये कैसी मजबूरी बहुत दिन हुए, आओ चलो कुतर लें दूरी आ जाना कुछ पास, ज़रा-सा जीवन देना। दही जमाने को, थोड़ा-सा जामन देना

Ep 409Tamasha | Madan Kashyap
तमाशा | मदन कश्यप सर्कस में शेर से लड़ने की तुलना में बहुत अधिक ताकत और हिम्मत की ज़रूरत होती है जंगल में शेर से लड़ने के लिएजो जिंदगी की पगडंडियों पर इतना भी नहीं चल सकाकि सुकून से चार रोटियाँ खा सके वह बड़ी आसानी से आधी रोटी के लिए रस्सी पर चल लेता है। तमाशा हमेशा ही सहज होता है क्योंकि इसमेंबनी-बनायी सरल प्रक्रिया में चीजें लगभग पूर्व निर्धारित गति सेचल कर पहले से सोचे-समझे अंत तक पहुँचती हैंकैसा होता है वह देशजिसका शासक बड़े से बड़े मसले को तमाशे में बदल देता है। और जनता को तमाशबीन बनने पर मजबूर कर देता है।

Ep 408Jadein | Rajendra Dhodapkar
जड़ें | राजेंद्र धोड़पकरहवा में बिल्कुल हवा में उगा पेड़ बिल्कुल हवा में, ज़मीन में नहीं बादलों पर झरते हैं उसके पत्ते लेकिन जड़ों को चाहिए एक आधार और वे किसी दोपहर सड़क पर चलते एक आदमी के शरीर में उतर जाती हैं उसके साथ उसके घर जाती हैं जड़ें और फैलती हैं दीवारों में भी आदमी झरता जाता है दीवारों के पलस्तर-सा जब भी बारिश होती है उसके स्वप्नों में पत्ते झरते हैं बादलों से जब दोपहर में आदमी चला जाता है शहर में खपने तब एक फल गिरता है आँगन में सुनसान धूप में और उसके सोते हुए बच्चे की आवाज़ खाने दौड़ती है उसे

Ep 407Sanyog | Shahanshah Alam
संयोग | शहंशाह आलमयह संयोगवश नहीं हुआकि मैंने पुरानी साइकिल सेपुराने शहरों की यात्राएं कींख़ानाबदोश उम्मीदों से भरीइस यात्रा में संयोग यह थाकि तुम्हारा प्रेम साथ था मेरेतुम्हारे प्रेम नेमुझे अकेलेपन सेमुठभेड़ नहीं होने दियाएक संयोग यह भी थाकि मेरा शहर जूझ रहा थाअकेलेपन की उदासी सेतुम्हारे ही इंतज़ार मेंऔर मेरे शहर का नामतुमने खजुराहो रखा थाप्रेम की पवित्रता में बहकर।

Ep 406Wahan Nahin Milungi Main | Renu Kashyap
वहाँ नहीं मिलूँगी मैं | रेणु कश्यपमैंने लिखा एक-एक करके हर अहसास को काग़ज़ पर और सँभालकर रखा उसे फिर दरअस्ल, छुपाकर मैंने खटखटाया एक दरवाज़ा और भाग गई फिर डर जितने डर उतने निडर नहीं हम छुपते-छुपाते जब आख़िर निकलो जंगल से बाहर जंगल रह जाता है साथ ही आसमान से झूठ बोलो या सच समझ जाना ही है उसे कि दोस्त होते ही हैं ऐसे। मेरे डरों से पार एक दुनिया है तुम वहीं ढूँढ़ रहे हो मुझे वहाँ नहीं मिलूँगी मैं।

Ep 405Yadi Chune Hon Shabd | Nandkishore Acharya
यदि चुने हों शब्द | नंदकिशोर आचार्य जोड़-जोड़ करएक-एक ईंटज़रूरत के मुताबिकलोहा, पत्थर, लकड़ी भीरच-पच कर बनाया है इसे।गोखे-झरोखे सब हैंदरवाज़े भीकि आ-जा सकें वेजिन्हें यहाँ रहना थायानी तुम।आते भी होपर देख-छू कर चले जाते होऔर यहतुम्हारी खिलखिलाहट से जिसे गुँजारहोना थामक़्बरे-सा चुप है।सोचो,यदि यह मक़्बरा हो भी तोकिस का?और ईंटों की जगहचुने हों यदि शब्द!

Ep 404Dhoop | Roopa Singh
धूप | रूपा सिंहधूप!!धधकती, कौंधती, खिलखिलातीअंधेरों को चीरती, रौशन करती।मेरी उम्र भी एक धूप थीअपनी ठण्डी हड्डियों को सेंका करते थे जिसमें तुम!मेरी आत्मा अब भी एक धूपअपनी बूढ़ी हड्डियों को गरमाती हूँ जिसमें।यह धूप उतार दूँगी,अपने बच्चों के सीने मेंताकि ठण्डी हड्डियों वाली नस्लेंइस जहाँ से ही ख़त्म हो जाएँ।

Ep 403Chidiya | Ramdarash Mishra
चिड़िया | रामदरश मिश्रा चिड़िया उड़ती हुई कहीं से आयीबहुत देर तक इधर उधर भटकती हुईअपना घोंसला खोजती रहीफिर थक कर एक जली हुई डाल पर बैठ गयीऔर सोचने लगी-आज जंगल में कोई आदमी आया था क्या?

Ep 402Uska Chehra | Rajesh Joshi
उसका चेहरा | राजेश जोशी अचानक गुल हो गयी बत्तीघुप्प अँधेरा हो गया चारों तरफउसने टटोल कर ढूँढी दियासलाईऔर एक मोमबत्ती जलाईआधे अँधेरे और आधे उजाले के बीचउभरा उसका चेहरान जाने कितने दिनों बाद देखा मैंनेइस तरह उसका चेहराजैसे किसी और ग्रह से देखा मैंनेपृथ्वी को !

Ep 401Gol Pathar | Naresh Saxena
गोल पत्थर | नरेश सक्सेना नोकें टूटी होंगी एक-एक करतीखापन ख़त्म हुआ होगाकिस-किस से टकराया होगाकितनी-कितनी बारपूरी तरह गोल हो जाने से पहलेजब किसी भक्त ने पूजा या बच्चे ने खेल के लिएचुन लिया होगातो खुश हुआ होगाकि सदमे में डूब गया होगाएक छोटी-सी नोक हीबचाकर रख ली होतीकिसी आततायी के माथे पर वार के लिए।

Ep 400Saankal | Rajni Tilak
सांकल | रजनी तिलक चारदीवारी की घुटनघूँघट की ओटसहना ही नारीत्व तोबदलनी चाहिए परिभाषा।परम्पराओं का पर्यायबन चौखट की साँकलहै जीवन-सारतो बदलना होगा जीवन-सार।

Ep 399Jharber | Kedarnath Singh
झरबेर | केदारनाथ सिंह प्रचंड धूप मेंइतने दिनों बाद (कितने दिनों बाद)मैंने ट्रेन की खिड़की से देखे कँटीली झाड़ियों परपीले-पीले फल’झरबेर हैं’- मैंने अपनी स्मृति को कुरेदाऔर कहीं गहरेएक बहुत पुराने काँटे नेफिर मुझे छेदा

Ep 398Bachana | Rajesh Joshi
बचाना | राजेश जोशी एक औरत हथेलियों की ओट मेंदीये की काँपती लौ को बुझने से बचा रही हैएक बहुत बूढ़ी औरत कमज़ोर आवाज़ में गुनगुनाते हुएअपनी छोटी बहू को अपनी माँ से सुना गीतसुना रही हैएक बच्चा पानी में गिर पड़े चींटे कोएक हरी पत्ती पर उठाने की कोशिश कर रहा हैएक आदमी एलबम में अपने परिजनों के फोटो लगाते हुएअपने बेटे को उसके दादा दादी और नाना नानी केकिस्से सुना रहा हैबची है यह दुनियाकि कोई न कोई, कहीं न कहीं बचा रहा है हर पलकुछ न कुछ जो ज़रूरी हैअभी अभी कुछ लोगों ने उन किताबों को ढूँढ निकाला हैजिनमें इस शहर की पुरानी इमारतों के प्लास्टर कोतैयार करने की विधियाँ दर्ज थींअब खिरनी वाले मैदान की ढहती जा रही पुरानी इमारतों की मरम्मत की जा रही है पुराने सलीक़े से।

Ep 397Paas Aao Mere | Narendra Kumar
पास आओ मेरे | नरेंद्र कुमार पास आओ मेरेमुझे समझाओ ज़राये जो रोम-रोम में तुम्हारे नफ़रत रमी हैतुममें ऐसी क्या कमी है खुद से पूछो ज़रा खुद को बताओ ज़रा व्हाट्सएप की जानकारीटीवी की डिबेट सारीसाइड में रखो इसेइंसानियत की बात करें इसमें ऐसा क्या डर हैमरहम होती है क्याज़ख्म से पूछो ज़रामेरा एक काम कर दोमुझे कहीं से ढूँढ कर वो प्रार्थना दोजिसमें हिंसा, द्वेष, और कलेश हो

Ep 396Jeevan Nahi Mara Karta Hai | Gopaldas Neeraj
जीवन नहीं मारा करता है | गोपालदस नीरज छिप छिप अंश्रु बहाने वालों,मोती व्यर्थ लुटाने वालोंकुछ सपनों के मर जाने से जीवन नहीं मरा करता है।सपना क्या है, नयन सेज परसोया हुया आँख का पानीऔर टूटना है उसको ज्योंजागे कच्ची नींद जवानीगीली उमर बनाने वालों, डूबे बिना नहाने वालोंकुछ पानी के बह जाने से सावन नहीं मरा करता है।माला बिखर गई तो क्या है,खुद ही हल हो गयी समस्याआंसू गर नीलाम हुये तोसमझो पूरी हुई तपस्यारूठे दिवस मनाने वालों, फटी कमीज़ सिलाने वालोंकुछ दीपक के बुझ जाने से आंगन नहीं मरा करता है।खोता कुछ भी नहीं यहाँ परकेवल जिल्द बदलती पोथीजैसे रात उतार चाँदनीपहने सुबह धूप की धोतीवस्त्र बदलकर आने वालों, चाल बदलकर जाने वालोंचंद खिलौनों के खोने से बचपन नहीं मरा करता है।लाखों बार गगरिया फूटीशिकन नहीं आयी पनघट परलाखों बार किश्तियाँ डूबींचहल-पहल वो ही है तट परतम की उमर बढ़ाने वालों लौ की आयु घटाने वालोंलाख करे पतझर कोशिश पर उपवन नहीं मरा करता है।लूट लिया माली ने उपवनलूटी न लेकिन गंध फूल कीतूफानों तक ने छेड़ा परखिड़की बन्द न हुई धूल कीनफ़रत गले लगाने वालों, सब पर धूल उड़ाने वालोंकुछ मुखड़ों की नाराज़ी से दर्पण नहीं मरा करता है।

Ep 395Pitaon Ke Baar Mein Kuch Chooti Hui Panktiyan | Kumar Ambuj
पिताओं के बारे में कुछ छूटी हुई पंक्तियाँ | कुमार अम्बुजएक दिन लगभग सभी पुरुष पिता हो जाते हैं जो नहीं होते वे भी उम्रदराज़ होकर बच्चों से, युवकों से इस तरह पेश आने लगते हैं जैसे वे ही उनके पिता हों पिताओं की सख़्त आवाज़ घर से बाहर कई जगहों पर कई लोगों के सामने गिड़गिड़ाती पाई जाती है वे ज़माने भर से क्रोध में एक अधूरा वाक्य बुदबुदाते हैं— 'यदि बाल-बच्चे न होते तो मैं तुम्हारी...' कभी-कभी वे पिता होने से थक जाते हैं और चुपचाप लेटे रहते हैं पिताओं का प्रेम तुलाओं पर माँओं के प्रेम से कम पड़ जाता है और अदृश्य बना रहता है या फिर टिमटिमाता है अँधेरी रातों में धीरे-धीरे उन्हें जीवन के सारे मुहावरे याद हो जाते हैं और विपत्तियों को भी वे कथाओं की तरह सुनाते हैं एक रात वे सूचना देते हैं : 'बीमा करा लिया है' वे बच्चों को प्यार करना चाहते हैं लेकिन अनायास ही वे बच्चों को डाँटने लगते हैं कभी-कभी वे नाकुछ बात पर ठहाका लगाते हैं हम देखते हैं उनके दाँत पीले पड़ने लगे हैं धीरे-धीरे झुर्रियाँ उन्हें घेर लेती हैं वे अपनी ही खंदकों, अपने ही बीहड़ों में छिपना चाहते हैं यकायक वे किसी कंदरा में, किसी तंद्रा में चले जाते हैं और किसी को भी पहचानने से इनकार कर देते हैं।

Ep 394Salamat Rahein | Deepika Ghildiyal
सलामत रहें | दीपिका घिल्डियाल सलामत रहें, सबके इंद्रधनुष,जिनके छोर चाहे कभी हाथ ना आएं, फिर भीसबके खाने के बाद, बची रहे एक रोटी,ताकि भूखी ना लौटे, दरवाज़े तक आई बिल्ली और चिड़ियासलामत रहे,माँ की आंखों की रौशनी,क्योंकि माँ ही देख पाती है, सूखे हुए आंसू और बारिश में गीले बाल सलामत रहें,बेटियों के हाथों कढ़े मेज़पोश और बहुओं के हल्दी भरे हाथों की थाप,क्योंकि उनके होने के निशान, छोटे ही सही, होने ज़रूरी हैंसलामत रहें,बच्चों की किताबों में दबे मोरपंख, इंद्रगोपताकि कहानियों पर उनका यकीन बना रहेसलामत रहें,सबकी दोपहर की नींदे,चाहे साल में एक बार मिले