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उपकरण - नंदकिशोर आचार्य
पत्थर क्या नींद से भी ज्यादा पारदर्शी होता है
कि और भी साफ दिख जाता है उसमें तुम्हें अपना सपना
तुम जिसे उकेरने लगते हो, शिल्पी जो ठहरे
पर क्या होता है उन टुकड़ों का
जिन्हें तुम अपने उकेरने में पत्थर से उतार देते हो
और उस मूरत का जो जैसी भी हो
तुम्हारी ही पहचान होती है, पत्थर की नहीं
उनमें क्या सशक्तता नहीं रहता होगा
पत्थर का भी कोई क्षत-विक्षत सपना अपना
हाँ पत्थर तो उपकरण ठहरा, उसका अपना क्या सपना क्या
क्या वे जिनका अपना नहीं होता कुछ, उपकरण हो जाते हैं
मूरत करने को किसी और का सपना!
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