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Show Notes
नीम के फूल | कुँवर नारायण
एक कड़वी-मीठी औषधीय गंध से
भर उठता था घर
जब आँगन के नीम में फूल आते।
साबुन के बुलबुलों-से
हवा में उड़ते हुए सफ़ेद छोटे-छोटे फूल
दो–एक माँ के बालों में उलझे रह जाते
जब वो तुलसी घर पर जल चढ़ाकर
आँगन से लौटतीं।
अजीब सी बात है मैंने उन फूलों को जब भी सोचा
बहुवचन में सोचा।
उन्हें कुम्हलाते कभी नहीं देखा–उस तरह
रंगारंग खिलते भी नहीं देखा
जैसे गुलमुहर या कचनार–पर कुछ था
उनके झरने में, खिलने से भी अधिक
शालीन और गरिमामय, जो न हर्ष था
न विषाद।
जब भी याद आता वह विशाल दीर्घायु वृक्ष
याद आते उपनिषद् : याद आती
एक स्वच्छ सरल जीवन-शैली : उसकी
सदा शान्त छाया में वह एक विचित्र-सी
उदार गुणवत्ता जो गर्मी में शीतलता देती
और जाड़ों में गर्माहट। याद आती एक तीखी
पर मित्र-सी सोंधी खुशबू, जैसे बाबा का स्वभाव।
याद आतीं पेड़ के नीचे सबके लिए
हमेशा पड़ी रहने वाली
बाघ की दो-चार खाटें :
निबौलियों से खेलता एक बचपन…
याद आता नीम के नीचे रखे
पिता के पार्थिव शरीर पर
सकुचाते फूलों का वह वीतराग झरना
–जैसे माँ के बालों से झर रहे हों–
नन्हें-नन्हें फूल जो आँसू नहीं
सान्त्वना लगते थे।