
Pratidin Ek Kavita
1,141 episodes — Page 11 of 23

Ep 643Ishwar Ke Bacche | Alok Azad
ईश्वर के बच्चे | आलोक आज़ाद क्या आपनेईश्वर के बच्चों को देखा है?ये अक्सरसीरिया और अफ्रीका के खुले मैदानों मेंधरती से क्षितिज की औरदौड़ लगा रहे होते हैंये अपनी माँ की कोख से ही मज़दूर है।और अपने पिता के पहले स्पर्श से ही युद्धरत है।ये किसी चमत्कार की तरहयुद्ध में गिराए जा रहेखाने के थैलों के पास प्रकट हो जाते हैं।और किसी चमत्कार की तरह ही अट्श्य हो जाते हैं।ये संसद और देवताओं केसामूहिक मंथन से निकली हुई संताने हैं।जो ईश्वर के हवाले कर दी गई हैं।ईश्वर की संतानों को जब भुख लगती है।तो ये आस्था से सर उठा करऊपर आकाश में देखते हैं।और पश्चिम से आए देव-दूर्तों के हाथों मारे जाते हैंईश्वर की संतानेउसे बहुत प्रिय हैं।वो उनकी अस्थियों पर लोकतंत्र केनए शिल्प रचता हैऔर उनके लह से जगमगाते बाज़ारों में रंग भरता हैमैं अक्सरजब पश्चिम की शोख़ चमकती रात कोऔर उसके उगते सुरज के रंग को देखता हूँमुझे उसका रंग इसानी लहू-साखालिस लाल दिखाई देता है।

Ep 642Sukh Ka Dukh | Bhavani Prasad Mishra
सुख का दुख / भवानीप्रसाद मिश्रज़िन्दगी में कोई बड़ा सुख नहीं है,इस बात का मुझे बड़ा दु:ख नहीं है,क्योंकि मैं छोटा आदमी हूँ,बड़े सुख आ जाएँ घर मेंतो कोई ऎसा कमरा नहीं है जिसमें उसे टिका दूँ।यहाँ एक बातइससे भी बड़ी दर्दनाक बात यह है कि,बड़े सुखों को देखकरमेरे बच्चे सहम जाते हैं,मैंने बड़ी कोशिश की है उन्हेंसिखा दूँ कि सुख कोई डरने की चीज़ नहीं है।मगर नहींमैंने देखा है कि जब कभीकोई बड़ा सुख उन्हें मिल गया है रास्ते मेंबाज़ार में या किसी के घर,तो उनकी आँखों में ख़ुशी की झलक तो आई है,किंतु साथ-साथ डर भी आ गया है।बल्कि कहना चाहिये ख़ुशी झलकी है, डर छा गया है,उनका उठना उनका बैठनाकुछ भी स्वाभाविक नहीं रह पाता,और मुझे इतना दु:ख होता है देख करकि मैं उनसे कुछ कह नहीं पाता।मैं उनसे कहना चाहता हूँ कि बेटा यह सुख है,इससे डरो मत बल्कि बेफ़िक्री से बढ़ कर इसे छू लो।इस झूले के पेंग निराले हैंबेशक इस पर झूलो,मगर मेरे बच्चे आगे नहीं बढ़तेखड़े खड़े ताकते हैं,अगर कुछ सोचकर मैं उनको उसकी तरफ ढकेलता हूँ।तो चीख मार कर भागते हैं,बड़े बड़े सुखों की इच्छाइसीलिये मैंने जाने कब से छोड़ दी है,कभी एक गगरी उन्हें जमा करने के लिये लाया थाअब मैंने उन्हें फोड़ दी है।

Ep 641Vah Mujhi Main Hai Bhay | Nandkishore Acharya
वह मुझी में है भय | नंदकिशोर आचार्य एक अनन्त शून्य ही होयदि तुमतो मुझे भय क्यों है ?कुछ है ही नहीं जबजिस पर जा गिरूँचूर-चूर हो छितर जाऊँउड़ जायें मेरे परखच्चेतब क्यों डरूँ?नहीं, तुम नहींवह मुझी में है भयमुझ को जो मार देता है।और इसलिए वह रूप भीजो तुम्हें आकार देता है।

Ep 640Ek Aadmi Do Pahadon Ko Kuhniyon Se Thelta | Shamsher Bahadur Singh
एक आदमी दो पहाड़ों को कुहनियों से ठेलता | शमशेर बहादुर सिंहएक आदमी दो पहाड़ों को कुहनियों से ठेलतापूरब से पच्छिम को एक क़दम से नापताबढ़ रहा हैकितनी ऊँची घासें चाँद-तारों को छूने-छूने को हैंजिनसे घुटनों को निकालता वह बढ़ रहा हैअपनी शाम को सुबह से मिलाता हुआफिर क्योंदो बादलों के तारउसे महज़ उलझा रहे हैं?

Ep 639Ma, Mozey Aur Khwab | Prashant Purohit
माँ, मोज़े, और ख़्वाब | प्रशांत पुरोहित माँ के हाथों से बुने मोज़े मैं अपने पाँवों में पहनता हूँ, सिर पे रखता हूँ। मेरे बचपन से कुछ बुनती आ रही है,सब उसी के ख़्वाब हैं जो दिल में रखता हूँ। पाँव बढ़ते गए, मोज़े घिसते-फटते गए,हर माहे-पूस में एक और ले रखता हूँ। मैं माँगता जाता हूँ, वो फिर दे देती है -और एक नया ख़्वाब नए रंगो-डिज़ाइन में मेरे सब जाड़े नए-नए फूले-फूले, गर्म-गर्म ताज़े बुने मोज़ों की मौज में कटते हैं कल मैंने माँ से कहा, पाँवों का बढ़ना रुक गया है अब नए मोज़े नहीं चाहिएँ। माँ बोली, चलना नहीं, पाँवों का बढ़ना रुका है,और जाड़ा भी अभी कहाँ चुका है,हर बरस जो आता है!मेरे डिज़ाइन तो अभी और बाक़ी हैं, वो सभी डिज़ाइन तुझे पहनाऊँगी जाड़े से ज़्यादा चलते हैं मोज़े, यह मैं मौसम को साबित कर दिखलाऊँगी।

Ep 638Dukh | Madan Kashyap
दुख | मदन कश्यप दुख इतना था उसके जीवन में कि प्यार में भी दुख ही थाउसकी आँखों में झाँका दुख तालाब के जल की तरह ठहरा हुआ थाउसे बाँहों में कसापीठ पर दुख दागने के निशान की तरह दिखाउसे चूमना चाहादुख होंठों पर पपड़ियों की तरह जमा थाउसे निर्वस्त्र करना चाहाउसने दुख पहन रखा था जिसे उतारना संभव नहीं था।

Ep 637Bachpan Ki Wah Nadi | Nasira Sharma
बचपन की वह नदी | नासिरा शर्मा बचपन की वह नदीजो बहती थी मेरी नसों मेंजाने कितनी बारउतारा है मैंने उसे अक्षरों मेंपढ़ने वाले करते हैं शिकायतयह नदी कहाँ है जिसका ज़िक्र हैअकसर आपकी कहानियों में?कैसे कहूँ कि यादों का भी एक सच होता हैजो वर्तमान में कहीं नज़र नहीं आतावर्तमान का अतीत हो जाना भीसमय के बहने जैसा हैजैसे वह नदी बहती थी कभी पिघली चाँदी जैसीअभी अलसाई सी पड़ी रहती है तलहटी मेंशायद कल वह भी न होऔर ज़िक्र हो उसका सिंधु घाटी की तरह कोर्स की पुस्तक के किसी पन्ने परअतीत में बहती एक नदी की तरह।

Ep 636Daily Passenger | Arun Kamal
डेली पैसेंजर | अरुण कमलमैंने उसे कुछ भी तो नहीं दियाइसे प्यार भी तो नहीं कहेंगेएक धुँधले-से स्टेशन पर वह हमारे डब्बे मेंचढ़ीऔर भीड़ में खड़ी रही कुछ देर सीकड़ पकड़ेपाँव बदलतीफिर मेरी ओर देखाऔर मैंने पाँव सीट से नीचे कर लिएऔर नीचे उतार दिया झोलाउसने कुछ कहा तो नहीं थावह आ गईऔर मेरी बग़ल में बैठ गईधीरे से पीठ तख़्ते से टिकाईऔर लंबी साँस लीट्रेन बहुत तेज़ चल रही थीआवाज़ से लगता थाट्रेन बहुत तेज़ चल रही थीझोंक रही थी हवा को खिड़कियों की राहबेलचे में भर-भरचेहरे परबाँहों परखुल रहा था रंध्र-रंध्रकि सहसा मेरे कंधे सेलग गयाउस युवती का माथालगता है बहुत थकी थीवह कामगार औरतकाम से वापस घर लौट रही थीएक डेली पैसेंजर।

Ep 635Dehri | Geetu Garg
देहरी | गीतू गर्ग बुढ़ा जाती है मायके की ढ्योडियॉंअशक्त होती मॉं के साथ..अकेलेपन कोसीने की कसमसाहट में भरने की आतुरता निढाल आशंकाओं में झूलती उतराती..थाली में परसी एक तरकारी और दालदेती है गवाही दीवारों पर चस्पाँ कैफ़ियत कीअब इनकी उम्र कोलच्छेदार भोजन नहीं पचता मन को चलाना इस उमर में नहीं सजता होंठ भीतर ही भीतर फड़फड़ाते हैं बिटिया को खीर पसंद हैऔर सबसे बाद में करारा सा पराठाँवो प्यारी मनुहार बाबुल कीखो गई कब कीसमय ने किस किस को कहॉं कहॉं बाँटा..मॉं !तू इतना भी चुप मत रहन होने दें ये सन्नाटे खुद पर हावीउमर ही बढ़ी हैपर जीना है अभी भी बाक़ी इस घर की बगिया कोतूने ही सँवारा हैहर चप्पे पर सॉंस लेतास्पर्श तुम्हारा है बरसों पहले छोड़ी देहरी अब भी पहचानती हैबूढ़ी हो गई तो क्या पदचापों को खूब जानती है माना कि ओहदों की पारियाँ बदल गई है रिश्तों की प्रमुखता हाशियों पर फिसल गई है पर जाने से पहले यों जीना ना छोड़ना अधिकार की डोरी न हाथों से छोड़ना..

Ep 634Pura Din | Gulzar
पूरा दिन | गुलज़ारमुझे खर्ची में पूरा एक दिन, हर रोज़ मिलता हैमगर हर रोज़ कोई छीन लेता है,झपट लेता है, अंटी सेकभी खीसे से गिर पड़ता है तो गिरने कीआहट भी नहीं होती,खरे दिन को भी खोटा समझ के भूल जाता हूँ मैंगिरेबान से पकड़ कर मांगने वाले भी मिलते हैं"तेरी गुज़री हुई पुश्तों का कर्जा है, तुझे किश्तें चुकानी है "ज़बरदस्ती कोई गिरवी रख लेता है, ये कह करअभी 2-4 लम्हें खर्च करने के लिए रख ले,बकाया उम्र के खाते में लिख देते हैं,जब होगा, हिसाब होगाबड़ी हसरत है पूरा एक दिन इक बार मैंअपने लिए रख लूं,तुम्हारे साथ पूरा एक दिनबस खर्चकरने की तमन्ना है !!

Ep 633Onth | Ashok Vajpeyi
ओंठ | अशोक वाजपेयीतराशने में लगा होगा एक जन्मांतरपर अभी-अभी उगी पत्तियों की तरह ताज़े हैं।उन पर आयु की झीनी ओस हमेशा नम हैउसी रास्ते आती है हँसीमुस्कुराहटवहीं खिलते हैं शब्द बिना कविता बनेवहीं पर छाप खिलती है दूसरे ओठों कीवह गुनगुनाती हैसमय की अँधेरी कंदरा में बैठाकालदेवता सुनता हैवह हंसती है।बर्फ़ में ढँकी वनराशि सुगबुगाती हैवह चूमती है।सदियों की विजड़ित प्राचीनता पिघलती हैरति मेंप्रार्थना मेंस्वप्न मेंउसके ओंठ बुदबुदाते हैं...

Ep 632Saundarya Ka Aashcharyalok | Savita Singh
सौंदर्य का आश्चर्यलोक | सविता सिंहबचपन में घंटों माँ को निहारा करती थीमुझे वह बेहद सुंदर लगती थीउसके हाथ कोमल गुलाबी फूलों की तरह थेपाँव ख़रगोश के पाँव जैसेउसकी आँखें सदा सपनों से सराबोर दिखतींउसके लंबे काले बाल हर पल उलझाए रखते मुझेयाद है सबसे ज़्यादा मैं उसके बालों से ही खेला करती थीउसे गूँथती फिर खोलती थीजब माँ नहा-धोकर तैयार होतीसाड़ी बाँधतीमेरे लिए वह विश्व का सुंदरतम दृश्य होताजिसके रंगों और ख़ुशबुओं में मैं यूँ खो जातीजैसे कोई एलिस आश्चर्यलोक मेंजब मैं थोड़ी बड़ी हुईमुझे अपनी बड़ी बहन दुनिया की सबसे सुंदरलड़की लगने लगीउसकी लगभग सोने जैसी देहअपनी दमक से संसार को भरतीउसे भी मैं घंटों देखती जब वह तैयार होतीनहा-धोकर लगभग माँ की तरह हीअपने लंबे बालों को सुखाती सँवारती बाँधतीउसकी आँखें माँ की आँखों से भी ज़्यादास्वप्निल दिखतींअब मुझे अपनी बेटियाँ इतनी सुंदर लगती हैंकि मैं उनके पाँवों को चूमती रहती हूँमन ही मन ख़ुश होती हूँकि एक स्त्री हूँऔर घिरी हूँ इतने सौंदर्य से।

Ep 631Sankat | Madan Kashyap
संकट | मदन कश्यप अक्सर ताला उसकी ज़ुबान पर लगा होता है जो बहुत ज़्यादा सोचता हैजो बहुत बोलता है उसके दिमाग पर ताला लगा होता हैसंकट तब बढ़ जाता हैजब चुप्पा आदमी इतना चुप हो जाए कि सोचना छोड़ दे और बोलने वाला ऐसा शोर मचाये कि उसकी भाषा से विचार ही नहीं, शब्द भी गुम हो जाएँ!

Ep 630Hum Nadi Ke Saath Saath | Agyeya
हम नदी के साथ-साथ | अज्ञेयहम नदी के साथ-साथसागर की ओर गएपर नदी सागर में मिलीहम छोर रहे:नारियल के खड़े तने हमेंलहरों से अलगाते रहेबालू के ढूहों से जहाँ-तहाँ चिपटेरंग-बिरंग तृण-फूल-शूलहमारा मन उलझाते रहेनदी की नावन जाने कब खुल गईनदी ही सागर में घुल गईहमारी ही गाँठ न खुलीदीठ न धुलीहम फिर, लौट कर फिर गली-गलीअपनी पुरानी अस्ति की टोह में भरमाते रहे।

Ep 629Sui | Ramdarash Mishra
सूई | रामदरश मिश्रा अभी-अभी लौटी हूँ अपनी जगह परपरिवार के एक पाँव में चुभा हुआ काँटा निकालकरफिर खोंस दी गयी हूँधागे की रील मेंजहाँ पड़ी रहूंगी चुपचापपरिवार की हलचलों में अस्तित्वहीन-सी अदृश्यएकाएक याद आएगी नव गृहिणी को मेरीजब ऑफिस जाता उसका पति झल्लाएगा-अरे, कमीज़ का बटन टूटा हुआ है"गृहिणी हँसती हुई आएगी रसोईघर सेऔर मुझे लेकर बटन टाँकने लगेगीपति सिसकारी भर उठेगा"क्यों क्या हुआ, चुभ गयी निगोड़ी?" गृहिणी पूछेगी।"हाँ चुभ गयी लेकिन सूई नहीं।"दोनों की मुस्कानों के साथ ओठ भी पास आने लगेंगेऔर मैं मुस्कराऊँगी अपने सेतु बन जाने परमैं खुद नंगी पड़ी होती हूँलेकिन मुझे कितनी तृप्ति मिलती हैकि मैं दुनिया का नंगापन ढांपती रहती हूँशिशुओं के लिए झबला बन जाती हूँऔर बच्चों, बड़ों के लिएकुर्ता, कमीज़, टोपी और न जाने क्या-क्याकपड़ों के छोटे-बड़े टुकड़ों को जोड़ती हूँऔर रचना करती रहती हूँ आकारों कीआकारों से छवियों कीछवियों से उत्सवों कीकितना सुख मिलता हैजब फटी हुई गरीब साड़ियों और धोतियों कोबार-बार सीती हूँऔर भरसक नंगा होने से बचाती हूँ देह की लाज कोजब फटन सीने के लायक नहीं रह जातीतो चुपचाप रोती हूँ अपनी असमर्थता परमैं जाड़ों में बिछ जाती हूँकाँपते शरीरों के ऊपर-नीचे गुदड़ी बनकरऔर उनकी ऊष्मा में अपनी ऊष्मा मिलाती रहती हूँ ।

Ep 628Daraar mein Ugaa Peepal | Arvind Awasthi
दरार में उगा पीपल | अरविन्द अवस्थीज़मीन से बीस फीट ऊपरकिले की दीवार कीदरार में उगा पीपलमहत्वकांक्षा की डोर पकड़लगा है कोशिश मेंऊपर और ऊपर जाने कीजीने के लिएखींच ले रहा हैहवा से नमीसूरज से रोशनीअपने हिस्से कीपत्तियाँ लहराकरदे रहा है सबूतअपने होने का

Ep 627Kya Karun Kora Hi Chhor Jaun Kaagaz? | Anup Sethi
क्या करूँ कोरा ही छोड़ जाऊँ काग़ज़? | अनूप सेठीक से लिखता हूँ कव्वा कर्कशक से कपोत छूट जाता है पंख फड़फड़ाता हुआलिखना चाहता हूँ कलाकल बनकर उत्पादन करने लगती हैलिखता हूँ कर्मठ पढ़ा जाता है कायरडर जाता हूँ लिखूँगा क़ायदाअवतार लेगा उसमें से क़ातिलकैसा है यह काल कैसी काल की रचना-विरचनाऔर कैसा मेरा काल का बोधबटी हुई रस्सी की तरहउलझते, छिटकते, टूटते-फूटतेपहचान बदलते चले जाते हैंशब्द, अर्थ, विचार, आचार और व्यवहारक से खोलना चाहा अपने समय का खाताक से ही शुरू हो गया क्लेशक्या क्ष, त्र, ज्ञ तक पहुँचना होगा मुमकिन?जब जुड़ेंगे स्वर व्यंजनबनेंगे शब्दफिर अर्थगर्भा शब्दवाक्य और विचारआचार और व्यवहारतो किस-किस तरह के खुलेंगे अर्थऔर कितना होगा अनर्थक्या करूँ कोरा ही छोड़ जाऊँ काग़ज़?

Ep 626Itna Mat Door Raho Gandh Kahin Kho Jaye | Girija Kumar Mathur
इतना मत दूर रहो गन्ध कहीं खो जाए | गिरिजाकुमार माथुरइतना मत दूर रहोगन्ध कहीं खो जाएआने दो आँचरोशनी न मन्द हो जाएदेखा तुमको मैंने कितने जन्मों के बादचम्पे की बदली सी धूप-छाँह आसपासघूम-सी गई दुनिया यह भी न रहा यादबह गया है वक़्त लिए मेरे सारे पलाशले लो ये शब्दगीत भी कहीं न सो जाएआने दो आँचरोशनी न मन्द हो जाएउत्सव से तन पर सजा ललचाती मेहराबेंखींच लीं मिठास पर क्यों शीशे की दीवारेंटकराकर डूब गईं इच्छाओं की नावेंलौट-लौट आई हैं मेरी सब झनकारेंनेह फूल नाज़ुक न खिलना बन्द हो जाएआने दो आँचरोशनी न मन्द हो जाए.क्या कुछ कमी थी मेरे भरपूर दान मेंया कुछ तुम्हारी नज़र चूकी पहचान मेंया सब कुछ लीला थी तुम्हारे अनुमान मेंया मैंने भूल की तुम्हारी मुस्कान मेंखोलो देह-बन्धमन समाधि-सिन्धु हो जाएआने दो आँचरोशनी न मन्द हो जाएइतना मत दूर रहोगन्ध कहीं खो जाए

Ep 625Mit Mit Kar Main Seekh Raha Hun | Kedarnath Agarwal
मिट मिट कर मैं सीख रहा हूँ | केदारनाथ अग्रवालदूर कटा कविमैं जनता का,कच-कच करताकचर रहा हूँ अपनी माटी;मिट-मिट करमैं सीख रहा हूँ प्रतिपल जीने की परिपाटीकानूनी करतब से माराजितना जीता उतना हारान्याय-नेह सब समय खा गयाभीतर बाहर धुआँ छा गयाधन भी पैदा नहीं कर सकापेट-खलीसा नहीं भर सकालूट खसोट जहाँ होती है मेरी ताव वहाँ खोटी हैमिली कचहरी इज़्ज़त थोपीपहना चोंगा उतरी टोपीलिये हृदय में कविता थातीमैं ताने हूँ अपनी छाती।

Ep 624Isliye To Tum Pahad Ho | Rajesh Joshi
इसीलिए तो तुम पहाड़ हो | राजेश जोशी शिवालिक की पहाड़ियों पर चढ़ते हुए हाँफ जाता हूँ साँस के सन्तुलित होने तक पौड़ियों पर कई-कई बार रुकता हूँआने को तो मैं भी आया हूँ यहाँ एक पहाड़ी गाँव सेविंध्याचल की पहाड़ियों से घिरा है जो चारों ओर सेमेरा बचपन भी गुज़रा है पहाड़ियों को धाँगतेअवान्तर दिशाओं की पसलियों को टटोलते औरपहाड़ी के छोर से उगती यज्ञ-अश्व की खोपड़ीजैसी उषाएँ देखते हुएसब कहते हैं विंध्याचल एक झुका हुआ पहाड़ हैअगस्त्य को दक्षिण का रास्ता देने के लिए वो झुक गया थाऔर सदियों से उनके लौटने की प्रतीक्षा कर रहा हैमैंने कितनी बार विंध्याचल के कान में जाकर फुसफसाकर कहाचिल्ला-चिल्लाकर, गला फाड़कर कहाकि ऋषियों की बातों पर भरोसा करना बन्द करऋषि अपने स्वयं के झूठ से नहीं डरतेवो सिर्फ़ दूसरों को झूठ से डरना सिखाते हैं।पौड़ियाँ चढ़ते हाँफ जाता हूँ पर शिवालिक की चढ़ाइयाँ हैंकि कहीं ख़त्म होने का नाम ही नहीं लेतींमेरी हिम्मत जहाँ जवाब दे जाती हैवहाँ से ही कोई अगली चढ़ाई शुरू हो जाती हैसाथ चलता दोस्त कहता है कि अगस्त्य यहीं आए थेऔर इन पहाड़ों से वापस कभी नहीं लौटेमैं कहता हूँ मुझे कोई मतलब नहीं कि अगस्त्य दक्षिण गए थेया आए थे शिवालिक की पहाड़ियों मेंमैं कोई ऋषि नहीं, एक साधारण-सा कवि हूँजो दिन-रात की जद्दोजहद के गीत लिखता हैमैं वापस लौटकर जाऊँगालौटकर जाऊँगा ज़रूर और एक बार फिर विंध्याचल को बताने की कोशिश करूँगाकि अगस्त्य के लौटने की प्रतीक्षा फ़िज़ूल हैतुम अब अपनी कमर सीधी कर लोऔर अपने पूरे क़द के साथ खड़े हो जाओ तनकरमैं तब भी तुम्हारे मज़बूत कंधों पर बैठकरदूर तक फैले जीवन के रंग-बिरंगे मेले देखूँगाहिमालय से ज़्यादा है तुम्हारी आयु जानता हूँऔर ज़्यादा मज़बूत हैं तुम्हारे कंधेज्वालामुखी के बहते हुए लावे के अचानकरुककर ठहर जाने की छवियाँ हैं तुम्हारी चट्टानों मेंतुम्हारी गुफाओं में सुरक्षित हैं हमारे पूर्वजों की उकेरी हुईशिकार खेलने और आग जलाने की छवियाँमुझे तुम हमेशा अच्छे लगते होमेरी आत्मा की चील ने तो बना लिया हैतुम्हारी चट्टान पर अपना स्थायी घोंसलातुम्हीं ने सिखाया है मुझे कि झुक जानाछोटा हो जाना नहीं हैजानता हूँ किसी ज़रूरतमन्द को रास्ता देने कोतुम झुक गएइसीलिए तो तुम पहाड़ हो!

Ep 623Humare Sheher Ki Streeyan | Anup Sethi
हमारे शहर की स्त्रियाँ | अनूप सेठीएक साथ कई स्त्रियाँ बस में चढ़ती हैंएक हाथ से संतुलन बनाएएक हाथ में रुपए का सिक्का थामेबिना धक्का खाए काम पर पहुँचना है उन्हेंदिन भर जुटे रहना है उन्हेंटाइप मशीन पर, फ़ाइलों मेंसाढ़े तीन पर रंजना सावंत ज़रा विचलित होंगीदफ़्तर से तीस मील दूर सात साल का अशोक सावंतस्कूल से लौट रहा है गर्मी से लाल हुआपड़ोसिन से चाबी लेकर घर में घुस जाएगारंजना सावंत उँगलियाँ चटका कर घर से तीस मील दूरटाइप मशीन की खटपट में खो जाएँगीवह नहीं सुनेंगी सड़ियल बॉस की खटर-पटर।मंजरी पंडित लौटते हुए वी.टी. पर लोकल में चढ़ नहीं पाएँगीधरती घूमेगी ग़श खाकर गिरेंगीलोग घेरेंगे दो मिनटकोई सिद्ध समाज सेविका पानी पिलाएगीमंजरी उठ खड़ी होंगीरक्त की कमी है छाती में ज़िंदगी जमी हैसाँस लेना है अकेली संतान होने का माँ-बाप को मोल देना हैएक साथ कई स्त्रियाँ बस में चढ़ती हैंएक हाथ से संतुलन बनाएछाती से सब्ज़ी का थैला सटाएबिना धक्का खाए घर पहुँचना है उन्हेंबंद घरों में बत्तियाँ जले रहने तक डटे रहना हैअँधेरे में और सपने में खटना हैनल के साथ जगना है हर जगह ख़ुद को भरना हैचल पड़ना है एक हाथ से संतुलन बनाएरोज़ सुबह वी.टी. चर्चगेट पर ढेर गाड़ियाँ ख़ाली होती हैंरोज़ शाम को वहीं से लद कर जाती हैंबहुत सारे पुरुष भी इन्हीं गाड़ियों से आते-जाते हैंउपनगरों में जाकर सारे पुरुष दूसरी दुनिया में ओझल हो जाते हैंवे समय और सुविधा से सिक्के, सब्ज़ियाँ और देहें देखते हैंसारी स्त्रियाँ किसी दूसरी ही दुनिया में रहती हैंकिसी को भी नहीं दिखतीं स्त्रियाँ।

Ep 622Andhere Ka Swapn | Priyanka
अंधेरे का स्वप्न | प्रियंका मैं उस ओर जाना चाहती हूँजिधर हो नीम अँधेरा !अंधेरे में बैठा जा सकता हैथोड़ी देर सुकून सेऔर बातें की जा सकती हैंख़ुद सेथोड़ी देर ही सहीजिया जा सकता हैस्वयं को !अंधेरे में लिखी जा सकती है कविताहरे भरे पेड़ कीफूलों से भरे बाग़ीचे की ओरउड़ती हुई तितलियों कीअंधेरे में देखा जा सकता है सपनातुम्हारे साथ होने कातुम्हारे स्पर्श की,अनुभूतियों के स्वाद चखने कासफ़ेद चादरों को रंगने काऔर फिर तुम्हारे लौट जाने परउदास होने का !मैं उस ओर जाना चाहती हूँजिधर हो नीम अँधेरा !क्यूँकि अंधेरे में,दिखाई नहीं देती उदासियाँ !

Ep 621Itna To Zindagi Main Kisi Ki Khalal Pade | Kaifi Azmi
इतना तो ज़िन्दगी में किसी की ख़लल पड़े | कैफ़ी आज़मीइतना तो ज़िन्दगी में किसी की ख़लल पड़ेहँसने से हो सुकून ना रोने से कल पड़ेजिस तरह हँस रहा हूँ मैं पी-पी के अश्क-ए-ग़मयूँ दूसरा हँसे तो कलेजा निकल पड़ेएक तुम के तुम को फ़िक्र-ए-नशेब-ओ-फ़राज़ हैएक हम के चल पड़े तो बहरहाल चल पड़ेमुद्दत के बाद उस ने जो की लुत्फ़ की निगाहजी ख़ुश तो हो गया मगर आँसू निकल पड़ेसाक़ी सभी को है ग़म-ए-तश्नालबी मगरमय है उसी के नाम पे जिस के उबल पड़े

Ep 620Itihaas | Naresh Saxena
इतिहास | नरेश सक्सेना बरत पर फेंक दी गई चीज़ें, ख़ाली डिब्बे, शीशियाँ और रैपर ज़्यादातर तो बीन ले जाते हैं बच्चे,बाकी बची, शायद कुछ देर रहती हो शोकमग्नलेकिन देखते-देखते आपस में घुलने मिलने लगती हैं।मनाती हुई मुक्ति का समारोह।बारिश और ओस और धूप और धूल में मगनउड़ने लगती हैं उनकी इबारतेंमिटने लगते हैं मूल्य और निर्माण की तिथियाँछपी हुई चेतावनियाँ होने लगतीं अदृश्यकंपनी की मॉडल के स्तनों पर लगने लगती है फफूंदचेहरे पर भिनकती हैं मक्खियाँएक दिन उनके ढेर पर उगता हैएक पौधा-पौधे में फूलफूलों में उन सबका सौंद्यऔरख़ुश्बू में उनका इतिहास।

Ep 619Jo Yuva Tha | Shrikant Verma
जो युवा था | श्रीकांत वर्मालौटकर सब आएँगेसिर्फ़ वह नहींजो युवा था—युवावस्था लौटकर नहीं आती।अगर आया भी तोवह नहीं होगा।पके बाल, झुर्रियाँ,ज़रा,थकानवह बूढ़ा हो चुका होगा।रास्ते मेंआदमी का बूढ़ा हो जानास्वाभाविक है—रास्ता सुगम हो या दुर्गमकोई क्यों चाहेगाबूढ़ा कहलाना?कोई क्यों अपनेपके बालगिनेगा?कोई क्योंचेहरे की सलें देखचाहेगा चौंकना?कोई क्यों चाहेगाकोई उससे कहेआदमी कितनी जल्दी बूढ़ा हो जाता है—तुम्हीं को लो!कोई क्यों चाहेगाकि वहजरा, मरण और थकान की मिसाल बने।लौटकर सब आएँगेसिर्फ़ वह नहींजो युवा था।

Ep 618Yadi Prem Hai Mujhse | Ajay Jugran
यदि प्रेम है मुझसे | अजय जुगरान यदि प्रेम है मुझसे तो मेरी घृणा का विरोध करना फिर वो चाहे किसी भी व्यक्ति किसी नस्ल से हो,यदि प्रेम है मुझसे तो मेरे क्रोध का विरोध करना फिर वो चाहे मेरे स्वयं या किसी और के प्रति हो,यदि प्रेम है मुझसे तो मेरी हिंसा का विरोध करना फिर वो चाहे किसी पशु किसी पेड़ के विरुद्ध हो,यदि प्रेम है मुझसे तो मेरी उपेक्षा का विरोध करना फिर वो चाहे किसी भी विचार मत या तर्क की हो,यदि प्रेम है मुझसे तो मेरे हर असत्य का विरोध करनाफिर वो चाहे अर्ध किसी भी रंग- किसी भी ढंग का हो,यदि प्रेम है मुझसे तो मेरी बुराई, मेरे पाखंड का विरोध करना मेरे सामने समर्पण ना करना चाहे तुम्हें कितना प्रेम हो मुझसे,सच यदि प्रेम है मुझसे तो मुझे वाणी के तिरस्कार से बचानामुझे सोच- विचार कर ही सब शब्द शांत स्वर में बोलने देना,सच यदि प्रेम है मुझसे तो कोरी इच्छा और महत्वाकांक्षा के परे मुझे अर्थपूर्ण जीवन के लिए एक करुणा भरा कोमल ध्येय देना,प्रिय मेरी, यदि प्रेम है मुझसे तो देख मेरे अधूरेपन को भले से उबार प्रेम से मुझे तुम रचना और उभार प्रेम से मुझे तुम मथना।

Ep 617Vah Ma Hai | Damodar Khadse
वह माँ है | दामोदर खड़से दुःख जोड़ता है माँ के अहसासों में... माँ की अँगुलियों में होती है दवाइयों की फैक्ट्री! माँ की आँखों में होती हैं अग्निशामक दल की दमकलें माँ के सान्निध्य में होती है झील हर प्यास के लिए। स्वर्ग की कल्पना है माँ, माँ स्वर्ग होती है... समय की बेवफाई दुनिया के खिंचाव आकाश की ढलान सपनों के खौफ यात्राओं की भूख और सूरज के होते हुए अँधेरे के डर को काटता है कोई– वह माँ है।

Ep 616Ek Pal Hi Sahi | Nandkishore Acharya
एक पल ही सही | नंदकिशोर आचार्य कभी निकाल बाहर करूँगा मैं समय कोहमारे बीच सेअरे, कभी तो जीने दो थोड़ाहम को भी अपने मेंठेलता ही रहता हैजब देखो जाने कहाँफिर चाहे शिकायत कर दे वहउस ईश्वर कोदेखता जो आँखों से उसकीउसी के कानों से सुनतादे दे वह भी सज़ा जो चाहेएक पल ही सहीजी तो लेंगे हमथोड़ा एक-दूसरे मेंसमय के-और उस पर निर्भरईश्वर के-बिनादेखता हूँ पर हमारे बिनाकैसे जिएँगे वे ख़ुद?

Ep 615Dincharya | Shrikant Varma
दिनचर्या | श्रीकांत वर्माएक अदृश्य टाइपराइटर पर साफ़, सुथरेकाग़ज़-साचढ़ता हुआ दिन,तेज़ी से छपते मकान,घर, मनुष्यऔर पूँछ हिला गली से बाहर आताकोई कुत्ता।एक टाइपराइटर पृथ्वी पररोज़-रोज़छापता हैदिल्ली, बंबई, कलकत्ता।कहीं पर एक पेड़अकस्मात छपकरता है सारा दिनस्याही मेंन घुलने का तप।कहीं पर एक स्त्रीअकस्मात उभरकरती है प्रार्थनाहे ईश्वर! हे ईश्वर!ढले मत उमर।बस के अड्डे परएक चाय की दुकानदिन-भर बुदबुदाती है‘टूटी हुई बेंच परबैठा है उल्लू का पट्ठापहलवान।’जलाशय पर अचानक छप जाता हैमछुए का जालचरकट के कोठे सेउतरती है धूपऔर चढ़ता हैदलाल।एक चिड़चिड़ा बूढ़ा थका क्लर्क ऊबकर छपे हुए शहर कोछोड़ चला जाता है।

Ep 614Kaurav Kaun, Kaun Pandav | Atal Bihari Vajpayee
कौरव कौन, कौन पांडव | अटल बिहारी वाजपेयीकौरव कौनकौन पांडव,टेढ़ा सवाल है।दोनों ओर शकुनिका फैलाकूटजाल है।धर्मराज ने छोड़ी नहींजुए की लत है।हर पंचायत मेंपांचालीअपमानित है।बिना कृष्ण केआजमहाभारत होना है,कोई राजा बने,रंक को तो रोना है।

Ep 613Bachpan | Vinay Kumar Singh
बचपन | विनय कुमार सिंहचाय के कप के दागदिखाई दे रहे थेऔर फिर गुस्से सेदी गई गाली के अक्सउस छोटे बच्चे के चेहरे परदेर तक दिखाई देते रहेजो अपने कमज़ोर हाथों सेनिर्विकार भाव से उन्हेंचुपचाप धुल रहा था ।

Ep 612Nadi | Kedarnath Singh
नदी | केदारनाथ सिंह अगर धीरे चलोवह तुम्हें छू लेगीदौड़ो तो छूट जाएगी नदीअगर ले लो साथतो बीहड़ रास्तों में भीवह चलती चली जाएगीतुम्हारी उँगली पकड़करअगर छोड़ दोतो वहीं अँधेरे मेंकरोड़ों तारों की आँख बचाकरवह चुपके से रच लेगीएक समूची दुनियाएक छोटे-सेघोंघे मेंसच्चाई यह हैकि तुम कहीं भी रहोतुम्हें वर्ष के सबसे कठिन दिनों में भीप्यार करती है एक नदीनदी जो इस समय नहीं है हमारे आसपासपर होगी ज़रूर कहीं-न-कहींकिसी चटाईया फूलदान के नीचेचुपचाप बहती हुईकभी सुननाजब सारा शहर सो जाएतो किवाड़ों पर कान लगाधीरे-धीरे सुननाकहीं आसपासएक मादा घड़ियाल की कराह की तरहसुनाई देगी नदी!

Ep 611Mere Bheetar Ki Koel | Sarveshwar Dayal Saxena
मेरे भीतर की कोयल | सर्वेश्वरदयाल सक्सेनामेरे भीतर कहींएक कोयल पागल हो गई है।सुबह, दुपहर, शाम, रातबस कूदती ही रहती हैहर क्षणकिन्हीं पत्तियों में छिपीथकती नहीं।मैं क्या करूँ?उसकी यह कुहू-कुहूसुनते-सुनते मैं घबरा गया हूँ।कहाँ से लाऊँएक घनी फलों से लदी अमराई?कुछ बूढ़े पेड़पत्तियाँ सँभाले खड़े हैंयही क्या कम है!मैं जानता हूँवह अकेली हैऔर भूखीअपनी ही कूक कीप्रतिध्वनि के सहारेवह जिये जा रही हैएक आस में—अभी कोई आएगाउसके साथ मिलकर गाएगाउसकी चोंच से चोंच रगड़ेगापंख सहलाएगायह बूढ़े पेड़ फलों से लद जाएँगे।कुहू-कुहूउसकी आवाज़—वह नहीं जानतीमैं जानता हूँअब दिन-पर-दिन कमज़ोर होती जा रही है।कुछ दिनों बादइतनी शिथिल हो जाएगीकि प्रतिध्वनियाँ बनाने कीउसकी सामर्थ्य चुक जाएगी।वह नहीं रहेगी।मेरे भीतर की यह पागल कोयलतब मुझे पागल कर जाएगी।मैं बूढ़े पेड़ों की छाँह नापता रहूँगाऔर पत्तियाँ गिनता रहूँगाख़ामोश।

Ep 610Meri Deh Main Paon Sahi Salamat Hain | Shahanshah Alam
मेरी देह में पाँव सही-सलामत हैं | शहंशाह आलम यह उदासी का बीमारी कामारकाट का समय हैतब भी इस उदासी कोइस बीमारी को हराता हूँमैं देखता हूँ इतनी मारकाट के बाद भीमेरी देह में मेरे पाँव सही-सलामत हैंमैं लौट आ सकता हूँ घाट किनारे सेगंगा में बह रहीं लाशों का मातम करकेमेरे दोनों हाथ साबुत हैं अब भीछू आ सकता हूँ उसके गाल कोदे सकता हूँ बूढ़े आदमी कागिर गया पुराना चश्माउस हत्यारे को मार भगा सकता हूँजो बस मारना ही चाहता है लड़की कोमेरे दोनों कान ठीक-ठाक काम कर रहे हैंझूठ बोलने वाली सत्ता की चिल्लपों के बावजूदसुन सकता हूँ दीमकों चींटियों की आवाज़ेंमेरे मुँह में जो मेरी ज़बान है वह बस मेरी हैजो बोल सकती है राजा के विरुद्ध बिना झिझकमेरा दिल मेरा दिमाग़ अब भी सोच सकता हैकि हमारे राजा को बस नरसंहार पसंद है।

Ep 609Ghoos Mahatmay | Kaka Hathrasi
घूस माहात्म्य | काका हाथरसीकभी घूस खाई नहीं, किया न भ्रष्टाचारऐसे भोंदू जीव को बार-बार धिक्कारबार-बार धिक्कार, व्यर्थ है वह व्यापारीमाल तोलते समय न जिसने डंडी मारीकहँ 'काका', क्या नाम पायेगा ऐसा बंदाजिसने किसी संस्था का, न पचाया चंदा

Ep 608Daant | Nilesh Raghuvanshi
दाँत | नीलेश रघुवंशीगिरने वाले हैं सारे दूधिया दाँत एक-एक करटूटकर ये दाँत जायेंगे कहाँ ?छत पर जाकर फेंकूँ या गड़ा दूँ ज़मीन मेंछत से फैंकूँगा चुरायेगा आसमानबनायेगा तारेबनकर तारे चिढ़ायेंगे दूर सेडालूँ चूहे के बिल मेंआयेंगे लौटकर सुंदर और चमकीले चिढ़ायेंगे बच्चे 'चूहे से दाँत’ कहकरखपरैल पर गये तो आयेंगे कवेल की तरहया उड़ाकर ले जायेगी चिड़ियागड़ाऊँगा ज़मीन में बन जायेंगे पेड़खायेगा मिठू मुझसे पहले फल रसीलेमुट्टी में दबाये दाँत दौड़ता है बच्चापीछे-पीडे दौड़ती है माँ।

Ep 607Gum hai Khud | Nandkishore Acharya
गुम है ख़ुद | नंदकिशोर आचार्य ऐसी भी होती होगीखोजन कोई खोजी है जिसमेंन कोई लक्ष्यतलाश ख़ुद की तलाश मेंअनवरत है गुमऔर मैं-जिसे खोजी कहते हैं सब-गुम हूँ उस खोज मेंजो कहीं खो करमुझेगुम है ख़ुद।

Ep 606Apni Mehfil | Kanhaiya Lal Nandan
अपनी महफ़िल | कन्हैया लाल नंदन अपनी महफ़िल से ऐसे न टालो मुझेमैं तुम्हारा हूँ, तुम तो सँभालो मुझेज़िंदगी! सब तुम्हारे भरम जी लिएहो सके तो भरम से निकालो मुझेमोतियों के सिवा कुछ नहीं पाओगेजितना जी चाहे उतना खँगालो मुझेमैं तो एहसास की एक कंदील हूँजब भी चाहो बुझा लो, जला लो मुझेजिस्म तो ख़्वाब है, कल को मिट जाएगारूह कहने लगी है, बचा लो मुझेफूल बन कर खिलूँगा, बिखर जाऊँगाख़ुशबुओं की तरह से बसा लो मुझेदिल से गहरा न कोई समंदर मिलादेखना हो तो अपना बना लो मुझे

Ep 605Baad Ki Sambhavnayein Saamne Hain | Dushyant Kumar
बाढ़ की संभावनाएँ सामने हैं / दुष्यंत कुमारबाढ़ की संभावनाएँ सामने हैं,और नदियों के किनारे घर बने हैं ।चीड़-वन में आँधियों की बात मत कर,इन दरख्तों के बहुत नाज़ुक तने हैं ।इस तरह टूटे हुए चेहरे नहीं हैं,जिस तरह टूटे हुए ये आइने हैं।आपके क़ालीन देखेंगे किसी दिन,इस समय तो पाँव कीचड़ में सने हैं ।जिस तरह चाहो बजाओ इस सभा में,हम नहीं हैं आदमी, हम झुनझुने हैं।अब तड़पती-सी ग़ज़ल कोई सुनाए,हमसफ़र ऊँघे हुए हैं, अनमने हैं ।

Ep 604Suno Bitiya | Suman Keshri
सुनो बिटिया... | सुमन केशरीसुनो बिटियामैं उड़ती हूँ खिड़की के पारचिड़िया बनतुम देखनाखिलखिलातीताली बजातीउस उजास कोजिसमेंचिड़िया के परसतरंगी हो जाएँ ठीक कहानियों की दुनिया की तरहतुम सुनती रहना कहानीदेखनाचिड़िया का उड़ना आकाश मेंहाथों को हवा में फैलाना सीखनाऔर पंजों को उचकानाइसी तरह तुम देखा करनाइक चिड़िया का बननासुनो बिटियामैं उड़ती हूँखिड़की के पारचिड़िया बनतुम आना…..

Ep 603Prem Main Kia Gaya Apradh | Rupam Mishra
प्रेम में किया गया अपराध | रूपम मिश्र प्रेम में किया गया अपराध भी अपराध ही होता है दोस्तपर किसी विधि की किताब में उसका दंड निर्धारण नहीं हुआतुम सुन्दर हो! ये वाक्य स्त्री के साथ हुआ पहला छल थाऔर मैं तुमसे प्रेम करता हूँ आखिरी अपराधउसके बाद किसी और अपराध की जरूरत नहीं पड़ीकभी गैरजरूरी लगने लगे प्रेम या खुद को जाया करने की कीमत मॉगने लगे आत्मातो घृणा या उदासीनता से मुँह न फेरनाअपना कोई बड़ा दुख बताकर किडनी या गुर्दा मॉग लेनावो हूँसकर दे देगी!देने को तो तुम्हें अपनी जान भी दे देगी पर वो तुम्हारे किस काम की दोस्त!

Ep 602Kadam Milakar Chalna Hoga | Atal Bihari Vajpayee
क़दम मिला कर चलना होगा / अटल बिहारी वाजपेयीबाधाएँ आती हैं आएँघिरें प्रलय की घोर घटाएँ,पावों के नीचे अंगारे,सिर पर बरसें यदि ज्वालाएँ,निज हाथों में हँसते-हँसते,आग लगाकर जलना होगा।क़दम मिलाकर चलना होगा।हास्य-रूदन में, तूफ़ानों में,अगर असंख्यक बलिदानों में,उद्यानों में, वीरानों में,अपमानों में, सम्मानों में,उन्नत मस्तक, उभरा सीना,पीड़ाओं में पलना होगा।क़दम मिलाकर चलना होगा।उजियारे में, अंधकार में,कल कहार में, बीच धार में,घोर घृणा में, पूत प्यार में,क्षणिक जीत में, दीर्घ हार में,जीवन के शत-शत आकर्षक,अरमानों को ढलना होगा।क़दम मिलाकर चलना होगा।सम्मुख फैला अगर ध्येय पथ,प्रगति चिरंतन कैसा इति अब,सुस्मित हर्षित कैसा श्रम श्लथ,असफल, सफल समान मनोरथ,सब कुछ देकर कुछ न मांगते,पावस बनकर ढलना होगा।क़दम मिलाकर चलना होगा।कुछ काँटों से सज्जित जीवन,प्रखर प्यार से वंचित यौवन,नीरवता से मुखरित मधुबन,परहित अर्पित अपना तन-मन,जीवन को शत-शत आहुति में,जलना होगा, गलना होगा।क़दम मिलाकर चलना होगा।

Ep 601Kewal Main Nahi Hun | Ramdarash Mishra
केवल मैं नहीं हूँ | रामदरश मिश्र तुम्हारे लिए लाता रहारंग-बिरंगे उपहारलैंडस्केपरेडियोटी.वी.वीडियो-गेम्सफ्रीजतरह-तरह के फर्नीचरऔर न जाने कितने-कितने उपकरण साज-सज्जा के जब देखा किमेरा कमरा एकदम भर गया है इनसेतो मैं कितना ख़ुश हुआ थाओ मेरे सुख!अब सोचता हूँ-सभी कुछ तो है इस कमरे मेंकेवल मैं नहीं हूँ।

Ep 600Chamba Ki Dhoop | Kumar Vikal
चम्बा की धूप | कुमार विकलठहरो भाई,धूप अभी आयेगीइतने आतुर क्यों होआख़िर यह चम्बा की धूप हैएक पहाड़ी गायआराम से आयेगीयहीं कहीं चौग़ान में घास चरेगीगद्दी महिलाओं के संग सुस्तायेगीकिलकारी भरते बच्चों के संग खेलेगीरावी के पानी में तिर जायेगीऔर खेल कूद के बादयह सूरज की भूखी बिटियाआटे के पेड़े लेने कोहर घर का चूल्हा -चौखट चूमेगीऔर अचानक थककरदूध बेचकर लौट रहेगुज्जर- परिवारों के संग,अपनी छोटी -सी पीठ परअँधेरे का बोझ उठाये,उधर जिधर से उतरी थीचढ़ जायेगीयह चम्बा की धूप -पहाड़ी गाय

Ep 598Bheegna | Prashant Purohit
भीगना | प्रशांत पुरोहित जब सड़क इतनी भीगी है तो मिट्टी कितनी गीली होगी,जब बाप की आँखें नम हैं, तो ममता कितनी सीली होगी। जेब-जेब ढूँढ़ रहा हूँ माचिस की ख़ाली डिब्बी लेकर,किसी के पास तो एक अदद बिल्कुल सूखी तीली होगी। कोई चाहे ऊपर से बाँटे या फिर नीचे से शुरू करे, बीच वाला फ़क़त हूँ मैं, जेब मेरी ही ढीली होगी। ना रहने को ना कहने को, मैं कभी सड़क पर नहीं आतामैं तनख़्वाह का बंधुआ, आज़ादी बड़ी रसीली होगी। मैं मान गया जो तूने बताया-इतिहास या फिर परिहासबेटी ना मानेगी ध्यान रहे, वो बड़ी हठीली होगी।

Ep 599Jeevan | Agyeya
जीवन | अज्ञेयचाबुक खाएभागा जातासागर-तीरेमुँह लटकाएमानो धरे लकीरजमे खारे झागों की—रिरियाता कुत्ता यहपूँछ लड़खड़ाती टांगों के बीच दबाए।कटा हुआजाने-पहचाने सब कुछ सेइस सूखी तपती रेती के विस्तार से,और अजाने-अनपहचाने सब सेदुर्गम, निर्मम, अन्तहीनउस ठण्डे पारावार से!

Ep 597Vaapsi | Ashok Vajpeyi
वापसी | अशोक वाजपेयी जब हम वापस आएँगेतो पहचाने न जाएँगे-हो सकता है हम लौटेंपक्षी की तरहऔर तुम्हारी बगिया के किसी नीम पर बसेरा करेंफिर जब तुम्हारे बरामदे के पंखे के ऊपरघोसला बनाएँतो तुम्हीं हमें बार-बार बरजो !या फिर थोड़ी-सी बारिश के बादतुम्हारे घर के सामने छा गई हरियाली की तरहवापस आएँ हमजिससे राहत और सुख मिलेगा तुम्हेंपर तुम जान नहीं पाओगे किउस हरियाली में हम छिटके हुए हैं !हो सकता है हम आएँपलाश के पेड़ पर नई छाल की तरहजिसे फूलों की रक्तिम चकाचौंध मेंतुम लक्ष्य भी नहीं कर पाओगे !हम रूप बदलकर आएँगेतुम बिना रूप बदले भीबदल जाओगे-हालांकि घर, बगिया, पक्षी-चिड़ियाहरियाली-फूल-पेड़ वहीं रहेंगेहमारी पहचान हमेशा के लिए गड्डमड्ड कर जाएगावह अंतजिसके बाद हम वापस आएँगेऔर पहचाने न जाएँगे।

Ep 596Gaon Gaya Tha Main | Vishwanath Prasad Tiwari
गाँव गया था मैं | विश्वनाथ प्रसाद तिवारी गाँव गया था मैंमेरे सामने कल्हारे हुए चने-सा आया गाँवअफसर नहीं था मैंन राजधानी का जबड़ामुझे स्वाद नहीं मिलायुवतियों के खुले उरोजोंऔर विवश होंठों मेंअँधेरे में ढिबरी- सा टिंमटिमा रहा था गाँवउड़े हुए रंग-सापुँछे हुए सिंदूर-सासूखे कुएँ-साजली हुई रोटी - साहँड़िया में खदबदाते कोदौ के दाने-सा गाँवबतिया रहे थे कुछ समझदार लोगअपने मवेशियों और पुआलऔर आर्द्रा और हस्त नक्षत्र के बारे मेंकउड़े के चारों ओरगॉँव गया था मैंमेरे सामने आएनहारी पर खटते बच्चेखाँसते बूढ़ेपुलिस से भयभीत युवकपति-पत्नी, बाप-बेटेखेत-मेड़, सास- पतोहजाति-कुजाति, पर - पट्टीदारीलेन-देन के झगड़ेभूल गया मैं बिरहा चैतीहोली दीवालीमेला ताजियाखेत की हरियालीमुझे याद आयासीमेंट और कंकरीट काअपना पुख्ता शांत शहरमैं परेशान थाकविता लिखना आसान थामेरे लिए गाँव परमैं भागा सुबह-सुबह हीबिना किसी को बताएपहली गाड़ी सेराजधानी की ओर।

Ep 595Zindagi Se Yehi Gila Hai Mujhe | Ahmed Faraz
ज़िन्दगी से यही गिला है मुझे | फ़राज़ज़िन्दगी से यही गिला है मुझेतू बहुत देर से मिला है मुझेहमसफ़र चाहिये हुजूम नहींइक मुसाफ़िर भी काफ़िला है मुझेतू मोहब्बत से कोई चाल तो चलहार जाने का हौसला है मुझेलब कुशां हूं तो इस यकीन के साथकत्ल होने का हौसला है मुझेदिल धड़कता नहीं सुलगता हैवो जो ख़्वाहिश थी, आबला है मुझेकौन जाने कि चाहतों में फ़राज़क्या गंवाया है क्या मिला है मुझे

Ep 594Pukar | Kedarnath Aggarwal
पुकार | केदारनाथ अग्रवालऐ इन्सानों!आँधी के झूले पर झूलोआग बबूला बन कर फूलोकुरबानी करने को झूमोलाल सवेरे का मूँह चूमोऐ इन्सानों ओस न चाटोअपने हाथों पर्वत काटोपथ की नदियाँ खींच निकालोजीवन पीकर प्यास बुझालोरोटी तुमको राम न देगावेद तुम्हारा काम न देगाजो रोटी का युद्ध करेगावह रोटी को आप वरेगा!