PLAY PODCASTS
Pratidin Ek Kavita

Pratidin Ek Kavita

1,140 episodes — Page 3 of 23

Ep 1042Phool Khilkar Rahenge | Vishnu Nagar

फूल खिल कर रहेंगे । विष्णु नागर तुमने पत्थर बोए तो पत्थर ही उगे लेकिन पत्थरों ने अपने ऊपर मिट्टी जमने नहीं दिया हवा से नमी खींच ली पौधे उगने बढ़ने लगे पौधों ने फूल उगाए फूलों ने ख़ुशबू बिखेरे रंगों की बहार ला दी पत्थर भी महकने लगे पत्थरों ने पत्थर लगने से इन्कार कर दिया तुमने पत्थरों पर बेवफ़ाई का आरोप लगाया जवाब में पत्थरों ने और ख़ुशबू और रंग बिखेर दिए तुम कुछ भी बोओ फूल खिल कर रहेंगे तुम उन्हें कितना ही तोड़ो उजाड़ो वे उग कर रहेंगे वे महक कर रहेंगे रंग बिखेर कर रहेंगे तुम मिट्टी से लड़ नहीं सकते जो पत्थरों को भी अपना घर बना लेती है

Feb 6, 20261 min

Ep 1041Kasbon Mein Chal Pustakalay | Anamika

क़स्बों में चल पुस्तकालय । अनामिका भाषाविद तो मैं नहीं हूँ,पर बचपन में अक्सर ही सोचती थी मैं-हमारी तरफ़ रूठ जाने को क्यों कहते हैं रूस जाना ।औरतें हमारी तरफ़ की रह- रह कर क्यों रूस जाती हैं ।ऐसा क्या आकर्षण है सोवियत रूस में क्या उसका आकर्षण है वे किताबें जो सुन्दर हिंदी अनुवादों में लाती है, चल पुस्तकालय की बड़ी बड़ी वैनेंजब देखो तब रूस जाने को तैयारकस्बे की ये उदास औरतें जाओ वहाँ न जाने कहाँ लाओ उसे न जाने किसेज़ार निकोलाई कहता था दाँत पीसकर जब किसानों से रूठी हुई औरतें सुनतीं मन ही मन कुछ ठानकर कहतीं हम भी अनंत यात्रा पर निकल जाएँगी हमको अनंत यात्रा पर लिए जाएँगी ये किताबें जो आयीं हैं हमसे मिलने चल पुस्तकालय की बड़ी गाड़ियों मेंएक - दूसरे से कंधे भिड़ाती,आपस में हँसती- बतियाती किताबें जैसे कि वृद्धाएँ-किसी तीर्थयात्रा की बस में सवार एकदम मगन मन में,सोचती हुई ये कि एक पिकनिक तो हुई जीवन में ।चल पुस्तकालय की इन गाड़ियों में सट- सटकर बैठे हुए दीखते थे वेद और क़ुरान, टॉल्सटॉय, चेखव, रवीन्द्र और प्रेमचंद,यशपाल, स्वेताएवा और जैनेन्द्र ।छरियाकर घर से निकल आयी औरतों के जीवन का पहला और अंतिम रोमांस थीं किताबें ।हाथों में पुस्तक आते ही धीरे - धीरे उनकी साँसों में उगने लगती थी नरम दूब पहली बारिश से नहायी हुई ।लंबी- लंबी साँसें खींचने लगती थीं वे जैसे कि पूरी धरती की सुगन्ध खींच लेनी हो इसी वक़्त कल किसने देखा है ।इन गुप्त किताबी सुरंगों का धन्यवाद इनसे ही होती हुई तो कहाँ से कहाँ निकल गईंदुनिया से रूठी,अन्यायों से टूटी सब औरतें ।कहाँ से कहाँ निकल गईं-इसका इतिहास है गवाह! कहीं तो पहुँचती है अक्सर बेकस की आह।

Feb 5, 20264 min

Ep 1040Loktantrikta Mein Choona | Rupam Mishra

लोकतांत्रिकता में छूना। रूपम मिश्र बुख़ार से देह इतनी निढाल है कि मौत से पहले ही माटी की लगने लगी हूँघर से दूर हूँ तो घर की ज़्यादा लगने लगी हूँकदमों में चलने की ताकत नहींपर दोस्त से झूठ कहती हूँ कि आराम हैघर जाने के लिए बस की एक सुरक्षित सीट पर पसर जाती हूँखिड़की के पास की सीट अपनी लगती हैक्यों कि उसके बाद कोई कहाँ धकेलेगाबस चली नहीं है और एक सज्जन बगल की सीट पर आ गये हैंकुछ नये रंगरुट से हैं पूछते हैं कहाँ पढ़ाती होतकलीफ़ इतनी है कि होंठ खुलना ही नहीं चाहते लेकिन जवाब तो देना थाकहा कहीं नहीं! सिर को आगे की सीट पर टिका दिया है जिसपर टेरीकॉट कुर्ता पहने एक अधेड़ और उदास आदमी बैठा है जिसकी धुंवासी उंगलियों पर खड्डे ही खड्डे हैं वो मुझे चिर-परिचित सा लग रहा हैबाबतपुर हवाई अड्डे पर एक जहाज़ अभी उड़ान पर थीरास्ते में बाबतपुर हवाई अड्डे पर एक जहाज़ अभी उड़ान पर थीबगल में बैठे साहब मुझे खिड़की से जहाज़ दिखाने लगे देखो अब उड़ेगी !!पल भर को लगा जैसे कोई चीन्हार बच्ची को जादुई दुनिया दिखा रहा हो पितृ स्नेह को अहका मेरा मन सिर न उठाने की मंशा को त्याग कर उनका मन रखने को जहाज़ देखने लगादेह और मन दोनों इतने विक्लांत थे कि बार- बार देह का दाहिना हिस्सा किसी छुवन से खीजतापर भ्रम समझ फिर निढाल हो जातालेकिन अंततः देह ने कहा ये भ्रम नहीं है एक धृष्टता हैलेकिन विरोध का चेत न मन में है न देह मेंअंततः एक लोकतांत्रिक भाषा में धीमे से मैंने कहाभाई साहब आप मुझे न छुइये , देखिए मैंने अब तक एक बार भी आपको नहीं छुआ।

Feb 4, 20264 min

Ep 1039Dharti Ka Pehla Premi | Bhawani Prasad Mishra

धरती का पहला प्रेमी । भवानीप्रसाद मिश्रएडिथ सिटवेल नेसूरज को धरती कापहला प्रेमी कहा हैधरती को सूरज के बादऔर शायद पहले भीतमाम चीज़ों ने चाहाजाने कितनी चीज़ों नेउसके प्रति अपनी चाहत कोअलग-अलग तरह से निबाहाकुछ तो उस परवातावरण बनकर छा गएकुछ उसके भीतर समा गएकुछ आ गए उसके अंक मेंमगर एडिथ नेउनका नाम नहीं लियाठीक किया मेरी भी समझ मेंप्रेम दिया उसे तमाम चीज़ों नेमगर प्रेम किया सबसे पहलेउसे सूरज नेप्रेमी के मन मेंप्रेमिका से अलग एक लगन होती हैएक बेचैनी होती हैएक अगन होती हैसूरज जैसी लगन और अगनधरती के प्रतिऔर किसी में नहीं हैचाहते हैं सब धरती कोअलग-अलग भाव सेउसकी मर्ज़ी को निबाहते हैंखासे घने चाव सेमगर प्रेमी मेंएक ख़ुदगर्ज़ी भी तो होती हैदेखता हूँ वह सूरज में हैरोज़ चला आता हैपहाड़ पार कर केउसके द्वारेऔर रुका रहता हैदस-दस बारह-बारह घंटोंमगर वह लौटा देती है उसेशाम तक शायद लाज के मारेऔर चला जाता है सूरजचुपचापटाँक कर उसकी चूनरी मेंअनगिनत तारेइतनी सारी उपेक्षा केबावजूद।

Feb 3, 20262 min

Ep 1038Main Kiski Aurat Hun | Savita Singh

मैं किसकी औरत हूँ । सविता सिंहमैं किसकी औरत हूँकौन है मेरा परमेश्वरकिसके पाँव दबाती हूँकिसका दिया खाती हूँकिसकी मार सहती हूँ...ऐसे ही थे सवाल उसकेबैठी थी जो मेरे सामनेवाली सीट पर रेलगाड़ी मेंमेरे साथ सफ़र करतीउम्र होगी कोई सत्तर-पचहत्तर सालआँखें धँस गई थीं उसकीमांस शरीर से झूल रहा थाचेहरे पर थे दुख के पठारथीं अनेक फटकारों की खाइयाँसोचकर बहुत मैंने कहा उससे‘मैं किसी की औरत नहीं हूँमैं अपनी औरत हूँअपना खाती हूँजब जी चाहता है तब खाती हूँमैं किसी की मार नहीं सहतीऔर मेरा परमेश्वर कोई नहीं'उसकी आँखों में भर आई एक असहज ख़ामोशीआह! कैसे कटेगा इस औरत का जीवन!संशय में पड़ गई वहसमझते हुए सभी कुछमैंने उसकी आँखों को अपने अकेलेपन के गर्व से भरना चाहाफिर हँसकर कहा ‘मेरा जीवन तुम्हारा ही जीवन हैमेरी यात्रा तुम्हारी ही यात्रालेकिन कुछ घटित हुआ जिसे तुम नहीं जानतीं-हम सब जानते हैं अबकि कोई किसी का नहीं होतासब अपने होते हैंअपने आप में लथपथ-अपने होने के हक़ से लक़दक़'यात्रा लेकिन यहीं समाप्त नहीं हुई हैअभी पार करनी हैं कई और खाइयाँ फटकारों कीदुख के एक दो और समुद्रपठार यातनाओं के अभी और दो चारजब आख़िर आएगी वह औरतजिसे देख तुम और भी विस्मित होओगीभयभीत भी शायदरोओगी उसके जीवन के लिए फिर हो सशंकितकैसे कटेगा इस औरत का जीवन फिर से कहोगी तुमलेकिन वह हँसेगी मेरी ही तरहफिर कहेगी—‘उन्मुक्त हूँ देखो,और यह आसमानसमुद्र यह और उसकी लहरेंहवा यहऔर इसमें बसी प्रकृति की गंध सब मेरी हैंऔर मैं हूँ अपने पूर्वजों के शाप और अभिलाषाओं से दूरपूर्णतया अपनी'

Feb 2, 20263 min

Ep 1037Mera Ghar | Purnima Varman

मेरा घर। पूर्णिमा वर्मनमैंने सुई से खोदी ज़मीन ‘फुलकारियां’ उगाई दुपट्टों परमैंने दीवारों में रचे ‘ताख़’ दीवट वालेमैंने दरवाज़ों को दी राह बंदनवार वालीमैंने आग पर पकाया स्वादअंजुरी में भरा तालाबमैंने कमरों को दी बुहारमैंने नवजीवन को दी पुकारमैंने सहेजाउमरदराज़ों को उनकी अंतिम सांस तकमैंने सुरों को भी छेड़ा बांस तकमेरे पसीने से बहा यश का गानपरमेरे घर पर लिखा तुम्हरा नाम...!

Feb 1, 20261 min

Ep 1036Zayid Zindagi | Shariq Kaifi

ज़ाइद ज़िन्दगी । शारिक़ कैफ़ीकहानी और होती कुछ हमारीअगर हम वक़्त से सोने की आदत डाल लेतेमगर हम तोन जाने क्या समझते थे सहर तक जागने कोजो हम ने जाग कर काटी हैं नींद आते हुए भीवो ज़ाइद ज़िंदगी हैवो ज़ाइद ज़िंदगी है जिस ने सारे मसअले पैदा किए हैंजिसे जीने मेंख़्वाबों के ये उल्झट्टे हुए हैंज़ाइद: अतिरिक्त

Jan 31, 20261 min

Ep 1035Do Boondein | Jaishankar Prasad

दो बूँदें। जयशंकर प्रसादशरद का सुंदर नीलाकाशनिशा निखरी, था निर्मल हासबह रही छाया पथ में स्वच्छसुधा सरिता लेती उच्छ्वासपुलक कर लगी देखने धराप्रकृति भी सकी न आँखें मूँदसु शीतलकारी शशि आयासुधा की मनो बड़ी सी बूँद!

Jan 30, 20261 min

Ep 1034Neend | Alok Dhanwa

नींद। आलोक धन्वारात के आवारामेरी आत्मा के पास भी रुकोमुझे दो ऐसी नींदजिस पर एक तिनके का भी दबाव ना होऐसी नींदजैसे चांद में पानी की घास

Jan 29, 20261 min

Ep 1033Koi Awaz Nahin | Tanwir Anjum

कोई आवाज़ नहीं। तनवीर अंजुमअनुवाद: रिचर्ड जे कोहेनगर्द हमारे घरों तक फैल गईउस मौसम में कोई बारिश नहींहम ने बादल के आख़िरी टुकड़े को गुज़र जाने दियाअब वो मेरे ना-फ़रमान बेटे की तरहवापस नहीं आएगादुश्मनी हमारे दिलों तक फैल गईउस रात में कोई करामात नहींहम ने पानी को कीचड़ में मिल जाने दियाअब वो बूढ़े की खोई हुई बीनाई की तरह वापस नहीं आएगामौत हमारे जिस्मों तक फैल गईइन गलियों में कोई आवाज़ नहींहम ने ख़ून को सड़कों पर बह जाने दियाअब वो मेरे बिछड़े हुए ख़ुदा की तरहवापस नहीं आएगा

Jan 28, 20261 min

Ep 1032Ujda Mera Gaon | Rita Shukla

उजड़ा मेरा गाँव। ऋता शुक्लआम नीम महुआ की छायानंदन कानन गाँव हमाराकाशी मथुरा वृन्दावन गंगासागर से अधिक दुलारा चैता फगुआ ढोल झाल से मह मह करती थीं चौपालें कजरी सोहर बारहमासाअंगनाई की गमक संभाले गंगा मईया की गोदी लहरों संग वह डोला पाँतीनिर्गुण की लय साँझ उदासीआजी करती दीया बातीपहली पूजा काली मईयाखीर बताशा भोग लगातीगाँव की उसकी रक्षा करना भोले बाबा से यह विनतीकाम रसोई फिर जब जातीघर-घर अगिल बिताई जातीबालक बूढ़े सब होते पितफिर आती गृहणी की बारीपिछवाड़े की नीम दार से कोयल आती भद बतियाती और सुनहरी पाँखो वाली महुआ शुभ संदेशा लातीहल बैलों की जोड़ी सजतीबद्री काका तड़के उठके भोर भई उठ जाग मुसाफ़िरसुरती मलते हाथ लगाते रामू कर्मा धर्मा मिल कर गेंहूँ चना गवार उगाते अरहर सरसो मड़ुआ मकई फ़सल काटते परब मनाते हँसी ख़ुशी दिन पूरा होता साँझ रात को गले लगाती रामायण की बैठन खुलती ओसारे पर भीड़ उमड़तीदरी बिछाओ रेहन लाओ धूप-दीप से पोथी पूजन तुलसी के दोहे चौपाईराम कथा अनुपम मनभावन सिया राम मय सब जग जाने तान उठाते गिरिधर काका कुबलय बिपिन कुंत बन सरिसा। बारिद तपत तेल जनु बरिसा॥जनक दुलारी के वियोग में वन-वन भटके श्री रघुनन्दन अम्मा की बिछोह में बाबू जी का वह बौराया सा मन गौरैया सा तिनका-तिनका आस जगाती छोटी बहिना बड़की दिदिया को संग लेकर कब लौटेंगे मेरे पहुना दीपू मुन्नू पढ़ने जाते रतनारी अंखियों में काजल कभी कुदीठ न लगने पाएये बालक ही माँओं का धन बेंत सूतते पंडित जी की आँख बचा कर दौड़ लगाते खेल कबड्डी कुश्ती जमती लोट-पोट हो जाती माटी

Jan 27, 20263 min

Ep 1031Humein Bhool Jana Chahiye | Afzal Ahmed Sayyid

हमें भूल जाना चाहिए । अफ़ज़ाल अहमद सय्यदउस ईंट को भूल जाना चाहिएजिस के नीचे हमारे घर की चाबी हैजो एक ख़्वाब में टूट गयाहमें भूल जाना चाहिएउस बोसे को (बोसा: चुम्बन)जो मछली के काँटे की तरह हमारे गले में फँस गयाऔर नहीं निकलताउस ज़र्द रंग को भूल जाना चाहिएजो सूरज-मुखी से अलाहिदा दिया गयाजब हम अपनी दोपहर का बयान कर रहे थेहमें भूल जाना चाहिएउस आदमी कोजो अपने फ़ाक़े परलोहे की चादरें बिछाता हैउस लड़की को भूल जाना चाहिएजो वक़्त कोदवाओं की शीशों में बंद करती हैहमें भूल जाना चाहिएउस मलबे सेजिस का नाम दिल हैकिसी को ज़िंदा निकाला जा सकता हैहमें कुछ लफ़्ज़ों को बिल्कुल भूल जाना चाहिएमसलनबनी-नौ-ए-इंसान (बनी-नौ-ए-इंसान: मानव समष्टि)

Jan 26, 20262 min

Ep 1030Badi Bi | Aniruddh Umat

बड़ी-बी। अनिरुद्ध उमटबड़ी-बी दरवाज़ा खोलोतुम्हारी पानघुँघरू, ख़त लाने में हुई मुझसे देरी बहुत'हम नहीं जानते तुम कौन हो'बड़ी-बी हाथ में ख़त लिएमुँह में पान चबाएछमछम करती दरवाज़े की दहलीज़ पर आहैरान थी'हमने अपने मरने का दिन तय कर रखा थाहमने समझा वह आ गया है'कहती बड़ी-बी मेरी आँखों में झाँक रही थी'ठीक है गड्ढा ठीक ही खुदा है'कहती वह उतरी और एक मुट्ठी मिट्टीहमें दे गई

Jan 25, 20261 min

Ep 1029Aadmi Akela | Leeladhar Jagudi

आदमी अकेला । लीलाधर जगूड़ीतारीख़ें भी तीसऔर आदमी अकेलाहफ़्ते भी चारऔर आदमी अकेलामहीने भी बारहऔर आदमी अकेलाऋतुएँ भी छहऔर आदमी अकेलावर्ष भी अनेकऔर आदमी अकेलाकाम भी बहुत सेऔर आदमी अकेला।

Jan 24, 20261 min

Ep 1028Dus Se Upar | Sarwat Hussain

दस से ऊपर। सरवत हुसैनइतने घरइतने सय्यारेकंकर पत्थर कौन गिनेदस से ऊपर कौन गिनेऔज़ारों के नाम बहुत हैंहथियारों के दाम बहुत हैंऐ सौदागर कौन गिनेदस से ऊपर कौन गिनेऐ दिलऐ बे-कल फ़व्वारेकितने घाव बने हैं प्यारेअपने अंदर कौन गिनेदस से ऊपर कौन गिनेकितनी लहरें टूट गई हैं बीच समुंदर कौन गिने

Jan 23, 20261 min

Ep 1027Ek Accha Gaon | Ajay

एक अच्छा गाँव । अजेयएक अच्छे आदमी की तरहएक अच्छा गाँव भीएक बहुचर्चित गाँव नहीं होताअपनी गति से आगे सरकताअपनी पाठशाला में ककहरा सीखताअपनी ज़िंदगी के पहाड़े गुनगुनाताअपनी खड़िया सेअपनी सलेट पट्टी पेअपने भविष्य की रेखाएँ उकेरतावह एक गुमनाम क़िस्म का गाँव होता हैअपने कुएँ से पानी पीताअपनी कुदाली सेअपनी मिट्टी गोड़ताअपनी फ़सल खाताअपने जंगल के बियाबानों में पसरावह एक गुमसुम क़िस्म का गाँव होता हैअपनी चटाइयों और टोकरियों परअपने सपनों की अल्पनाएँ बुनताअपने आँगन की दुपहरी मेंअपनी खटिया पर लेटाअपनी यादों का हुक्का गुड़गुड़ाताचुपचाप अपने होने को जायज़ ठहरातावह एक चुपचाप क़िस्म गाँव होता हैएक अच्छे गाँव से मिलनेचुपचाप जाना पड़ता हैबिना किसी योजना की घोषणा किएबिना नारा लगाएबिना मुद्दे उछालेबिना परचम लहराएएक अच्छे आदमी की तरह।

Jan 22, 20262 min

Ep 1026Vimanspardhi | Gyanendrapati

विमानस्पर्धी। ज्ञानेन्द्रपति खगपथों परपक्षियों से जा टकराते हैं विमान, अन्धाधुन्दऔर ध्वन्स का ज़िम्मेदारपक्षी को ठहराया जाता हैबेसबब बेसब्र चील कोदूर धरती के एक कसाईखाने की धुरी पर गगन मँडराते गिद्ध कोजबकि वेखगपथों को मेघपथों से जोड़ने वाली आकासी सिवान पर तारापथ जहाँ से दीख जाता दिन में ही उन्हें -अंक रही अंतिम उड़ानें हैं पक्षीकुल कीजिन्हेंविमान-कम्पनियों और बीमा-कम्पनियों का अभिशाप-किन्हीं का लाभ नीचे, धरती पर, कीटनाशकों का ज़हर बनकर मार रहा हैउनके अण्डों को तुनुक बनाकर तोड़ रहा है, असमयघोंसलों में ही बुझा दे रहा है जीवन-जोत, भ्रूण का अनबना गला टीपकरखेचर प्रजातियों को पोंछ रहा है आकाश सेपंख-भर आकाश के आश्वासन के साथ जिन्हें उपजाया था धरती नेभेजा था आकाश की सैर परजिनके लौट आने काइंतज़ार करती है धरतीऊँचे वृक्षों की फुनगियों में रोपे कानएक बिमान के गर्म लहू से गीली-झुलसी धरतीउस पक्षी का भी शोक करती हैजो लहू की एक बूँद बन चू पड़ावह आकाश का आँसू नहींधरती की उमंग था ।

Jan 21, 20262 min

Ep 1025Ma Aur Aag | Vishwanath Prasad Tiwari

माँ और आग। विश्वनाथ प्रसाद तिवारीयह उस समय की बात हैजब माचिस का आविष्कार नहीं हुआ थामाँ थोड़ी-सी आग जलाकर रख देतीसवेरे रोटी सेंकने के लिएरात को जब सभी सो जातेमाँ आग को ऐसे ढककर छिपातीएक कोने मेंजैसे कोई रतन हो अमोलजैसे कोई शिशु हो मुलायमजैसे कोई दुल्हन हो लाल-लालमेघ गरजते थे रातों कोकड़कती थी बिजलीखेतों में फेंकरते थे सियारऔर गलियों में रोते थे कुत्तेहम डर से चिपक जातेमाँ की गोद मेंउस अँधेरे की जंग मेंमाँ के लिए कवच-कुंडल थी आगराख से लिपटीमाँ के दिल की तरह धुकधुकातीमाँ के सपनों-सी दहकतीमाँ की इच्छाओं-सी सुलगतीमाँ हमें ढाढ़स देती -‘घर में आग हैतो कोई नहीं आ सकता भूत-प्रेत’अँधेरे में वह धीरे से उठतीआग को और सावधानी सेछिपा देती राख मेंजैसे अपने आँचल से ढककर हमें दूध पिला रही हो।

Jan 20, 20262 min

Ep 1024Gori Soyi Sej Par | Madan Kashyap

गोरी सोयी सेज पर । मदन कश्यपशब्द जो नंदिनी के खुर के नीचे दब कर भी नहीं मरे, राजा दिलीप के आतंक से मर गये कालिदास से पूछो कि धमनियों का रक्त पिला-पिला कर कैसे पुनरुज्जीवित किया उन शब्दों कोमैं एक ऐसे टीले पर चक्कर काट रहा हूँजिसके नीचे एक सभ्यता ही नहीं एक भाषा भी दफ्न हैमुझे ढूँढने हैं हजारों शब्दजो कहीं उतनी छोटी-सी जगह में दुबके हैं जितनी-सी जगहतुम्हारे नाखून और उस पर चढ़ी पालिश के बीच बची होती हैतुम्हारे दुपट्टे को लहराने वाली हवा ने हीउन नावों के पालों को लहराया थाजिन पर पहली बार लदे थे हड़प्पा के मृदभाँडइतिहास की अजस्त्र धारा पर अध्यारोपित तुम्हारी हँसीकाल की सहस्त्र भंगिमाओं का मोंताज तुम्हारा चेहरासबसे लंबे समयखंड कोअपनी नन्हीं भुजाओं में समेट लेने को आतुर मेरा मनतुम्हें ढूंढता रहता है अक्षरों से भी पुराने गुफाचित्रों मेंमुझे याद आ रहे हैं अमीर खुसरोसुनो वे तब भी याद आए थेजब पहली और आखिरी बार मैंने तुम्हारे होंठों को चूमा थावह एक यात्रा थी एक भय से दूसरे भय मेंऔर इस तरह भय का बदल जाना भी कम भयानक नहीं होता‘गोरी सोयी सेज पर, मुख पर डारे केसचल खुसरो घर आपने, रैन भयी चहुं देस’छह सौ बहत्तर वर्षों में भी जब तुम्हारे मुख पर से केश हटा नहीं सकातब जाकर एहसास हुआ कि यह रैन इतनी लंबी हैसुबह तो उस रात की होती है जो सूरज के डूबने से हुई होजिसे रच रहे थे अमीर खुसरोकुछ शब्द गुम हो गए उस भाषा केऔर कुछ आततायी व्याकरण की जंग लगी बेड़ियों में कैद हो गएएकल कोशिकीय अनुजीवों के जगल से गुजरते हुएमुझे पहुंचना है उस पनघट परजहां स्वच्छ जामुनी जल की तरह तरल शब्द कर रहे हैं मेरी प्रतीक्षामैं धीरे-धीरे एक विषाल स्पाइरोगाइरा में बदलते जा रहेइस महादेश के जेहन में अपनी कविता के साथ जाना चाहता हूँअंधेरी सुरंगों में सपनों के कुछ गहरे रंग भरना चाहता हूँएक शून्य जो पसरता जा रहा है हमारे चारों ओरमैं उसे पाटना चाहता हूँकविता की आँखों में तैर रहे नये छंदों सेमैं भाषा के समुद्र का सिंदबादअपने पास रखना चाहता हूं केवल यात्राओं की पीड़ाबाकी सबकुछ तुम्हें दे देना चाहता हूँतुम्हें दे देना चाहता हूँअपने अच्छे दिनों में संचित सारे शब्दअपनी बोली की तमाम महाप्राण ध्वनियाँमैं चाँद के रैकेट से सारे सितारों को उछाल देना चाहता हूं तुम्हारी ओर!

Jan 19, 20265 min

Ep 1023Atmaparichay | Harivansh Rai Bachchan

आत्मपरिचय। हरिवंशराय बच्चनमैं जग-जीवन का भार लिए फिरता हूँ,फिर भी जीवन में प्यार लिए फिरता हूँ;कर दिया किसी ने झंकृत जिनको छूकरमैं साँसों के दो तार लिए फिरता हूँ!मैं स्नेह-सूरा का पान किया करता हूँ,मैं कभी न जग का ध्यान किया करता हूँ,जग पूछ रहा उनको,जो जग की गाते,मैं अपने मन का गान किया करता हूँ!मैं निज उर के उद्गार लिए फिरता हूँ,मैं निज उर के उपहार लिए फिरता हूँ;है यह अपूर्ण संसार न मुझको भातामैं स्वप्नों का संसार लिए फिरता हूँ!मैं जला ह्रदय में अग्नि दहा करता हूँ,सुख-दुख दोनों में मग्न रहा करता हूँ;जग भव-सागर तरने को नाव बनाए,मैं भव मौजों पर मस्त बहा करता हूँ!मैं यौवन का उन्माद लिए फिरता हूँ,उन्मादों में अवसाद लिए फिरता हूँ,जो मुझको बाहर हँसा, रुलाती भीतर,मैं, हाय, किसी की याद लिए फिरता हूँ!कर यत्न मिटे सब,सत्य किसी ने जाना?नादान वहीं है,हाय,जहाँ पर दाना!फिर मूढ़ न क्या जग, जो इस पर भी सीखे?मैं सीख रहा हूँ, सीखा ज्ञान भुलाना!मैं और, और जग और, कहाँ का नाता,मैं बना-बना कितने जग रोज़ मिटाता;जग जिस पृथ्वी पर जोड़ा करता वैभव,मैं प्रति पग से उस पृथ्वी को ठुकराता!मैं निज रोदन में राग लिए फिरता हूँ,शीतल वाणी में आग लिए फिरता हूँ,हों जिस पर भूषों के प्रसाद निछावर,मैं वह खंडहर का भाग लिए फिरता हूँ।मैं रोया, इसको तुम कहते हो गाना,मैं फूट पड़ा, तुम कहते, छंद बनाना;क्यों कवि कहकर संसार मुझे अपनाए,मैं दुनिया का हूँ एक नया दीवाना!मैं दीवानों का वेश लिए फिरता हूँ,मैं मादकता नि:शेष लिए फिरता हूँ;जिसको सुनकर जग झूम, झुके, लहराए,मैं मस्ती का संदेश लिए फिरता हूँ!

Jan 18, 20263 min

Ep 1022Dushwari | Javed Akhtar

दुश्वारी। जावेद अख़्तरमैं भूल जाऊँ तुम्हेंअब यही मुनासिब हैमगर भुलाना भी चाहूँ तो किस तरह भूलूँकि तुम तो फिर भी हक़ीक़त होकोई ख़्वाब नहींयहाँ तो दिल का ये आलम है क्या कहूँकम-बख़्तभुला न पाया वो सिलसिलाजो था ही नहींवो इक ख़यालजो आवाज़ तक गया ही नहींवो एक बातजो मैं कह नहीं सका तुम सेवो एक रब्तजो हम में कभी रहा ही नहींमुझे है याद वो सबजो कभी हुआ ही नहीं

Jan 17, 20262 min

Ep 1021Tumhari Jeb Mein Ek Suraj Hota Tha | Ajay

तुम्हारी जेब में एक सूरज होता था । अजेयतुम्हारी जेबों में टटोलने हैं मुझेदुनिया के तमाम ख़ज़ानेसूखी हुई ख़ुबानियाँभुने हुए जौ के दानेकाठ की एक चपटी कंघी और सीप की फुलियाँसूँघ सकता हूँ गंध एक सस्ते साबुन कीआज भीमैं तुम्हारी छाती से चिपकातुम्हारी देह को तापता एक छोटा बच्चा हूँ माँमुझे जल्दी से बड़ा हो जाने देमुझे कहना है धन्यवादएक दुबली लड़की की कातर आँखों कोमूँगफलियाँ छीलती गिलहरी कीनन्ही पिलपिली उँगलियों कोदो-दो हाथ करने हैं मुझेनदी की एक वनैली लहर सेआँख से आँख मिलानी हैहवा के एक शैतान झोंके सेमुझे तुम्हारी सबसे भीतर वाली जेब सेचुराना है एक दहकता सूरजऔर भाग कर गुम हो जाना हैतुम्हारी अँधेरी दुनिया में एक फ़रिश्ते की तरहजहाँ औंधे मुँह बेसुध पड़ी हैंतुम्हारी अनगिनत सखियाँमेरे बेशुमार दोस्त खड़े हैं हाथ फैलाएकोई ख़बर नहीं जिनकोकि कौन-सा पहर अभी चल रहा हैऔर कौन गुज़र गया है अभी-अभीसौंपना है माँउन्हें उनका अपना सपनालौटाना है उन्हें उनकी गुलाबी अमानतसहेज कर रखा हुआ हैजो तुमने बड़ी हिफ़ाज़त सेअपनी सबसे भीतर वाली जेब में!

Jan 16, 20262 min

Ep 1020Ek Rajnitik Pralap | Kumar Ambuj

एक राजनीतिक प्रलाप। कुमार अम्बुज यहाँ अब कुछ इच्छाओं का गुम हो जाना सबसे मामूली बात है।मसलन धुएँ के घेरे के बाहर एक जगहया एक ठहाका या एक किताबकबाड़ में ऐसी कई चीज़ें हैं जिन पर जंग और मायूसी हैकबाड़ के बाहर भी ऐसी कई चीज़ें हैं जिन पर जम गई हैं उदासी की परतेंमूर्त यातना जैसा कुछ नहींबर्बरता एक वैधानिक कार्यवाहीजिसके ज़रिये निबटा जा रहा है फालतू जनता सेअखबार और हास्य धारावाहिकों के असंख्य चैनल हैं।कंप्यूटर पर खेल हैं नानाविधमेरे गाँव तक जाने का रास्ता बंद है अभी भीवर्षों पुरानी निर्माणाधीन पुलिया की प्रतीक्षा मेंउस पार करोड़ों लोग हैं जिनके जीवन से इधर कोई सरोकार नहींजो लोग दुर्घटनाओं में मरे उनकी लाशें अभी सड़कों पर हैंशेर, शेर होने के जुर्म में मारे गए हैं।और सियार, सियार होने की वजह सेनिर्दोष मारे गए उस गली में जहाँ वे अल्पसंख्यकयह एक बस्ती अभी-अभी उजड़ी है ज़हरीली शराब सेमेरी माँ के पैर में पिछले नौ बरस से फोड़ा हैहर गर्मी में फूट पड़ती है बेटे की नक़सीरऔर उपाय मेरी पहुँच से दस हज़ार मील दूर हैं उधर एक कवि कूद जाता है तेरहवीं मंज़िल सेएक वह अलग था जिसे चौराहे पर पुलिस ने मार डाला था लाठियों सेफिर भी करोड़ों लोग हैं जो जीवित रहने के रास्ते पर हैंमैं ख़ुद ज़हर नहीं खा पा रहा हूँ और ठीक-ठीक नहीं कह सकता कि यह एक आशा हैकायरता है या साहसइतनी ज़्यादा मुश्किलें हैं जिनमें जीवित हैं लोगकरोड़ों लोग गरीबी के नर्क में हैंकरोड़ों बच्चे झुलस रहे हैं फैक्ट्रियों मेंकरोड़ों स्त्रियाँ जर्जर शोकमय शरीरों में मुस्करा रही हैंअदृश्य सुखों की प्रतीक्षा में हाड़ तोड़ रहे हैं करोड़ों लोगजो भी मुश्किलें हैं वे करोड़ों की गिनती में हैंऔर नामुमकिन-सा ही है उनका बयानअभाव और बीमारी-हज़ारों लोहकूटों द्वारा कूट दिए गए शब्द हैंकरोड़ों ऐसे फ़ैसले लिए गए हैं हमारे वास्ते जिनमें हम शामिल नहींलोग पसीज रहे हैं मगर दाँव पर कुछ नहीं लगा पा रहेजिन्हे दुःखों को पार करना था वे अब रह रहे हैं दुःखों के ही साथअंत में मेरे पास फिर वही कुछ निराश शब्द बचे रहते हैंचमक-दमक और रईसी के बीच चमकते हैं करोड़ों पैबंदअनंत आश्वासनों के बीच मेरे पास कोई नारा नहीं हैन मैं मारो-काटो-बचाओं कह सकता हूँ मैं ही क्या करोड़ों लोग हैं जो इतनी आपाधापी में हैंकि रोज़ी-रोटी के अलावा बमुश्किल ही कर सकते हैंकोई और काम।

Jan 15, 20264 min

Ep 1019Tum Itna Jo Muskura Rahe Ho | Kaifi Azmi

तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो । कैफ़ी आज़मीतुम इतना जो मुस्कुरा रहे होक्या ग़म है जिस को छुपा रहे होआँखों में नमी हँसी लबों परक्या हाल है क्या दिखा रहे होबन जाएँगे ज़हर पीते पीतेये अश्क जो पीते जा रहे होजिन ज़ख़्मों को वक़्त भर चला हैतुम क्यूँ उन्हें छेड़े जा रहे होरेखाओं का खेल है मुक़द्दररेखाओं से मात खा रहे हो

Jan 14, 20261 min

Ep 1018Sochna Aur Hona | Nilesh Raghuvanshi

सोचना और होना। नीलेश रघुवंशीबनाना चाहती थी घर पहाड़ों के ऊपरडर गई लेकिन जंगली जानवरों और हवाओं से..बहुत प्यार है पानी से सोचा क्यों न घर बनाऊं समुद्र तट परलेकिन डर गई तूफान और लहरों से..फिर सोचा कहीं एकांत में शहर के कोलाहल से दूरलेकिन बिछड़ने से पहले दोस्तों की याद ने ऐसा करने से रोकाफिर जाने कैसे बिना कोई ना नुकुर किए बन गया घरसोचती हूँ अब खिड़की से झाँकतेसंसार को त्यागने से अच्छा है माया-मोह त्यागकर संसार में रहनामेरी इस बात पर हँसता है बाज़ार खूबखिड़की भी तो है उसी के भीतरहवाओं से डरी जानवरों से डरी तूफ़ान और लहरों से भी डरीजिससे डरना चाहिए था उसी की गोद में जाकर गिरी..

Jan 13, 20262 min

Ep 1017Shashwat | Doodhnath Singh

शाश्वत । दूधनाथ सिंहयह उदासी जन्म से ही है।यह सहज, संभाव्य अकुलाहटमौन में यह दबी घबराहटयह तुम्हारा अंतरिक्ष-अभाव-तटकौन जानेगा कि यह जो बादलों में टँका मेरा हठ—तुम्हारे लिए—यह सचजन्म से ही है।और कोई एक भाषा-विपदऔर कोई एक कवि-पदऔर कोई एक हाहाकारऔर कोई तुम—सतत...कुछ भी हो—सभी कुछ है बराबर... सभी कुछ है व्यर्थसभी कुछ है साधु...लेकिन यह तुम्हारा अंतरिक्ष-अभाव तटयह उदासी-भरा हठ—यहजन्म से ही है।

Jan 12, 20262 min

Ep 1016Koi Ek Ko | Dheeraj

कोई एक को। धीरज कोई एक को कहूँगाकि साथ चलेंगे,मैं अकेला नही जाना चाहता पहाड़।अकेले देखे जाने का डरहमेशा लगता है,पहाड़ को,मुझको ।हम जब भी मिले,कोई एक को लेकर मिलेकि दोनों के अकेलेपन के मिल जाने का डरहमेशा रहता है पहाड़ को और मुझको

Jan 11, 20261 min

Ep 1015Reshmi Patola | Alka Sinha

रेशमी पटोला । अलका सिन्हाख़ूबसूरत, चिरजीवी होता हैरेशमी पटोलातार-तार बुना जाता हैबार-बार बिंधा जाता हैबाँधा जाता हैकई-कई रंगों में रंगा जाता हैरेशमी पटोला।मगर अब इक्का-दुक्का परिवार ही बचे हैंजो सहेजते हैंइतने प्यार और इतमीनान सेरेशमी पटोला।लंबा समय लगता है इन्हें तैयार करने मेंजैसेकि आत्मीय स्पर्श सेरेशा-रेशा खिलती हैंइंद्रधनुषी वितान रचातीरंगोली सजातीतितली-सी लड़कियाँ।आसान नहीं होताकई-कई गाँठों में बंधनाऔर डूब जाना हरबारएक नए रंग में बदले जाने के लिए।कठिन होती है यह प्रक्रियाजिसमें पिछला रंग भी सहेजना होता हैऔर होता है नए रंग में निखरना।कभी पिता के घर का रंगतो कभी ससुराल काकभी बेटी तो कभी बहूपत्नी कभी तो कभीमाँ के रंग में संवरना।जन्म लेने से जन्म देने केचक्र को पूरा करने की यत्न मेंबार-बार बिंधती हैबंधती है, खुलती हैफिर-फिर बंधती है।इसलिए रेशमी पटोला-सीबेशकीमती होती हैंलड़कियाँ।

Jan 10, 20262 min

Ep 1014Dheere Bahut Dheere Chhoot Jaata hai Sab | Adiba Khanum

धीरे बहुत धीरे छूट जाता है सब । अदीबा ख़ानमधीरे, बहुत धीरे छूट जाता है सब अपना घरअपने लोगअपना मनअपना जीवनजिए हुए के प्रति प्रेमआने वाले के प्रति ईमानदारीअपनी इच्छाएँ और उम्मीदें धरती की हरी घास का मोहमिटटी की कच्ची सुगंध का पाशहिलते हुएपीले परदों से झँकती रौशनी चाँद की कीमती ठंडकसितारों की चमकऔर रात के आसमान की नीली रोशनाईनहरों का गंदला पानीनदियों की बेख़ौफ़ दौड़समुद्र का अथाह वितानब्रहमांड की निर्जन हूकनहीं!कभी नहीं छूटती अपनी धरतीअपनी धरती पर बसे हमहम, खुद से कभी नहीं छूटतेसाथ रहता है अपना आकाशआकाश को घेरे काले बादलआकाश का फिरोज़ी अपनापनआकाश की-सी खूली दुनियाआकाश का अनंत कभी नहीं छूटतान छूटे मुझसे या किसी सेउसका आकाश!!

Jan 9, 20262 min

Ep 1013Baat Un Dinon Ki Hai | Rajendra Sharma

बात उन दिनों की है । राजेंद्र शर्माबात उन दिनों की हैजब नहीं था रंगीन टेलीविज़न इक्का-दुक्का समृद्ध घरों में ही होता थाशटर वाला ब्लैक एंड व्हाइट टेलीविज़न ।रविवार को आने वाली पिक्चरदेखने पूरा मोहल्ला पहुँचताटेलीविज़न वाले घरअहाते मे लगाया जाता टेलीविज़न पूरा मोहल्ला देखता पिक्चरमध्यातंर मे जब सलमा सुल्तानअपने जूड़े मे लगाए गुलाब का फूलअपनी बेशक़ीमती मुस्कुराहट से पढ़ती समाचारपूरे मोहल्ले को चाय पिलाताटेलीविज़न वाला घर।इस बीच लोग बतियातेपूछते एक-दूसरे का हालपिक्चर ख़त्म होने परपूरा मोहल्ला लौटताअपने-अपने घरमनोरंजन के साथसंबंधों की असीम ऊष्मा के साथ।अब हर घर में रंगीन टेलीविज़न कोई किसी के यहाँ नहीं जातादेखने टेलीविज़न पुराने पड़ोसी को नहीं पताअपने नए पड़ोसी का नामनए पड़ोसी की कोई दिलचस्पी नहींपुराने पड़ोसी मेंअब हर आदमी है अपने में समृद्धबात उन दिनों की हैजब नहीं था मोबाइल फ़ोनइक्का-दुक्का समृद्ध घरों में ही होता थाकाला चोग़े वाला टेलीफ़ोनजिसका नंबर पूरा मोहल्लाबाँटता अपने रिश्तेदारों कोपीपी के रूप मेंपड़ोसी का फ़ोन आतापाँच मिनट का समय माँगकरटेलीफ़ोन वाला पड़ोसीबुलाता अपने पड़ोसी कोवह आताफ़ोन अटैंड करता।फिर वही बैठता कुछ देरभाई साहब, भाभी जी से बतियातापूछता और बताता कुशल-क्षेमचाय पीकर वहाँ से लौटतासंबंधों की असीम ऊष्मा के साथअब हर जेब में है मोबाइलहर आदमी है समृद्धकोई किसी के यहाँ नहीं सुनने जाताटेलीफ़ोनपुराने पड़ोसी को नहीं पतानए पड़ोसी का नामनए पड़ोसी की कोई दिलचस्पी नहींपुराने पड़ोसी मेंमोहल्ले भर मेंसंबंधों की जो ऊष्‍मा महकती थीदिन-रातवह अब लुप्त हो गई हैसोचता हूँ मैंसमृद्धिक्‍यों लील लेती हैसंबंधों की ऊष्‍मा...

Jan 8, 20263 min

Ep 1012Ghar Ki Baatein | Shraddha Upadhyay

घर की बातें । श्रद्धा उपाध्याय घर की बातें घर में नहीं रहनी चाहिएघर की बातें सड़कों पर होनी चाहिएरास्तों पर बेघर लोगों के साथसोना चाहिए घर की बातों कोघर की बातों को मोर्चा लेकर निकलना चाहिए शहर में पोस्टरों पर लिखी जानी चाहिए घर की बातेंघर की बातें पढ़ी जानी चाहिए अख़बारों पर और फिर उन बातों पर भेल पूरी रख कर खाना चाहिएबना कर पतंग घर की बातों को आकाश में उड़ा देना चाहिए

Jan 7, 20261 min

Ep 1011Rotiyan | Ekta Verma

रोटियाँ । एकता वर्मा रोटियों की स्मृतियों में आँच की कहानियाँ गमकती हैं।अम्मा बताती हैं,सेसौरी के ईंधन पर चिपचिपाई सी फूलती हैं रोटियाँ सौंफ़ला पर सिंकी रोटियाँ धुँवाई; पकती हैं चटक-चटक नीम के ईंधन पर कसैली सी, करुवाती हैं रोटियाँपर, अरहर की जलावन पर पकती हैं भीतर-बाहर बराबर।अम्मा का मानना है, शहर रोटियों के स्वाद नहीं जानतेस्टोव की रोटियों में महकती है किरोसिन की भाप और ग़ैस पर तो पकती हैं, कचाती, बेस्वाद, बेकाम रोटियाँ।रोटियों की इन सोंधाती क़िस्सागोई के बीचों-बीचमेरे सीने पर धक्क से गिरता है एक सवाल सवाल कि -गाज़ा की रोटी कैसी महकती होगी?गाज़ा की रोटी कैसी महकती होगी,जिसे सेंक रही हैं बुर्कानशीं औरतें ध्वस्त इमारत के बीचों-बीच उन्हीं इमारतों का फ़र्नीचर जलाकर।क्या गाज़ा की रोटियों में महकता होगा खून अजवाइन की तरह बीच-बीच में कि राशन के कैंप में, रक्तरंजित लाशों बीच से खींचकर लायी जाती हैं आँटे की बोरियाँ क्या किसी कौर में किसक जाती होगी कोई चिरपरिचित ‘आह’ कि चूल्हे के ठीक नीचे, मलबे की तलहटी में दफ़्न हो गए उस परिवार के सात लोग एक ही साथ इन रोटियों को निगलते हुए गले में अटकता होगा उन किताबों का अलिफ़,गृहस्थी की सबसे व्यर्थ सामग्री की तरहजिन्हें सुहूर की दाल बनाने में चूल्हे में झोंक दिया गया क्या गाज़ा की रोटियाँ कचाती सी, तालु में चिपकती होंगी कि पूरा देश जल जाने बावजूद दुनिया देखती है फ़िलिस्तीन की तरफ़, अब भी बहुत ठंडी, सूखी आँखों से।

Jan 6, 20262 min

Ep 1010Happily Ever After | Satyam Tiwari

हैप्पिली एवर आफ्टर । सत्यम तिवारीहम चाहते थे अंत में नायक ही विजयी होलेकिन जो विजयी हुआउन्होंने उसे ही नायक घोषित कर दियाअबकी बार भी सिनेमा मेंसमय से अधिक, पैसों की बर्बादी खलीवही हुआ फिर उन्होंने अपना नायकपहले से चुन रखा थाकहानी जो चाहे रुख़ लेऊँट किसी भी करवट बैठेराजगद्दी पर उनका ही नायक बैठेगानायिका भी उसी के हिस्से आएगीदिलों में प्यार उमड़ेगा बस उसके ही लिएऔर हमारा हीरो, ठीक हमारी तरहसिनेमा में नंगा, एक नंबर का लफ़ंगामरकर अमर होने का उसका सपनाबेहतर चरित्र निर्माण की तरहइस बार भी अधूरा रह गयाअव्वल तो उसे अपना हाथअपनी जेब में रखना थाऔर एक सुस्त, उबाऊ संगीत के मद्देनज़रसड़कों पर, ख़ासकर मद्धिम रौशनी मेंएक तयशुदा चाल, धीमे-धीमे चलनी थीआख़िर वह हमारा हीरो थाकोई गली का लफ़ंगा नहींअगर होता जोतेज़-तेज़ क़दमों से चलताफ़िल्म से कब का बाहर निकल जातालेकिन वह जानता हैलाख इंटरवल बदलकर भीवह फ़िल्म का क्लाइमेक्स नहीं बदल सकताबेहतर तो यही होतादर्शक ऐसा कोई भी अंतमानने से इनकार कर देतेजो उनकी असल ज़िंदगी केविरोधाभास में है।

Jan 5, 20262 min

Ep 1009Aaj Ki Raat Tujhe | Gopaldas Neeraj

आज की रात तुझे आख़िरी ख़त और लिख दूँ । गोपालदास नीरजआज की रात तुझे आख़िरी ख़त और लिख दूँकौन जाने यह दिया सुबह तक जले न जले?बम बारूद के इस दौर में मालूम नहींऐसी रंगीन हवा फिर कभी चले न चले।ज़िंदगी सिर्फ़ है ख़ुराक टैंक तोपों कीऔर इंसान है एक कारतूस गोली कासभ्यता घूमती लाशों की इक नुमाइश हैऔर है रंग नया ख़ून नई होली का।कौन जाने कि तेरी नर्गिसी आँखों में कलस्वप्न सोए कि किसी स्वप्न का मरण सोएऔर शैतान तेरे रेशमी आँचल से लिपटचाँद रोए कि किसी चाँद का कफ़न रोए।कुछ नहीं ठीक है कल मौत की इस घाटी मेंकिस समय किसके सबेरे की शाम हो जाएडोली तू द्वार सितारों के सजाए ही रहेऔर ये बारात अँधेरे में कहीं खो जाए।मुफ़लिसी भूख ग़रीबी से दबे देश का दुखडर है कल मुझको कहीं ख़ुद से न बाग़ी कर देज़ुल्म की छाँह में दम तोड़ती साँसों का लहूस्वर में मेरे न कहीं आग अंगारे भर दे।चूड़ियाँ टूटी हुई नंगी सड़क की शायदकल तेरे वास्ते कंगन न मुझे लाने देझुलसे बाग़ों का धुआँ खोए हुए पात कुसुमगोरे हाथों में न मेहँदी का रंग आने दें।यह भी मुमकिन है कि कल उजड़े हुए गाँव गलीमुझको फ़ुर्सत ही न दें तेरे निकट आने कीतेरी मदहोश नज़र की शराब पीने कीऔर उलझी हुई अलकें तेरी सुलझाने की।फिर अगर सूने पेड़ द्वार सिसकते आँगनक्या करूँगा जो मेरे फ़र्ज़ को ललकार उठे?जाना होगा ही अगर अपने सफ़र से थक करमेरी हमराह मेरे गीत को पुकार उठे।इसलिए आज तुझे आख़िरी ख़त और लिख दूँआज मैं आग के दरिया में उतर जाऊँगागोरी-गोरी-सी तेरी संदली बाँहों की क़समलौट आया तो तुझे चाँद नया लाऊँगा।

Jan 4, 20263 min

Ep 1008Roshni, Pani, Ped | Atulveer Arora

रोशनी, पानी, पेड़ | अतुलवीर अरोड़ापानी में झाँकता हैएक पूरा पेड़एक पूरा पेड़पानी हो जाता हैझाँकते हुए पानी मेंदो पेड़ दीखते हैंएक पेड़ पानी काएकरोशनी का।

Jan 3, 20261 min

Ep 1007Sardi Aayi | Safdar Hashmi

सर्दी आई | सफ़दर हाश्मीसर्दी आई, सर्दी आईठंड की पहने वर्दी आई।सबने लादे ढेर से कपड़ेचाहे दुबले, चाहते तगड़े।नाक सभी की लाल हो गईसुकड़ी सबकी चाल हो गई।ठिठुर रहे हैं, काँप रहे हैंदौड़ रहे हैं, हाँप रहे हैं।धूप में दौड़ें तो भी सर्दीछाओं में बैठें तो भी सर्दी।बिस्तर के अंदर भी सर्दीबिस्तर के बाहर भी सर्दी।बाहर सर्दी, घर में सर्दी।पैर में सर्दी, सर में सर्दी।इतनी सर्दी किसने करदीअंडे की जम जाए ज़र्दीसारे बदन में ठिठुरन भरदीजाड़ा है मौसम बेदर्दी।

Jan 2, 20261 min

Ep 1006Apne Hisse Mein Log Aakash Dekte Hain | Vinod Kumar Shukla

अपने हिस्से में लोग आकाश देखते हैं। विनोद कुमार शुक्लअपने हिस्से में लोग आकाश देखते हैंऔर पूरा आकाश देख लेते हैंसबके हिस्से का आकाशपूरा आकाश है।अपने हिस्से का चंद्रमा देखते हैंऔर पूरा चंद्रमा देख लेते हैंसबके हिस्से का चंद्रमा वही पूरा चंद्रमा है।अपने हिस्से की जैसी-तैसी साँस सब पाते हैंवह जो घर के बग़ीचे में बैठा हुआअख़बार पढ़ रहा हैऔर वह भी जो बदबू और गंदगी के घेरे में ज़िंदा है।सबके हिस्से की हवा वही हवा नहीं है।अपने हिस्से की भूख के साथसब नहीं पाते अपने हिस्से का पूरा भातबाज़ार में जो दिख रही हैतंदूर में बनती हुई रोटीसबके हिस्से की बनती हुई रोटी नहीं है।जो सबकी घड़ी में बज रहा हैवह सबके हिस्से का समय नहीं है।इस समय।

Jan 1, 20262 min

Ep 1005Aao Prem Deep Ek Agyaat Jalao | Nirmala Putul

आओ प्रेम दीप एक अज्ञात जलाओ - निर्मला पुतुल आओ मन के सूने आँगन आओप्रेम पूरित भाव अनोखाएक मन हर दीप जलाओघर पूरा रौशन हो जावे जो दूर भगावे अंधियारेआओ भी ओलती आँगन ताखा भनसा गोहाल गलियारा वो तुलसी चौराहासर्वत्र आस के सपने सजाओ बरसों से बेजान हुई बस्ती की वो बुधनी काकी उसकी देहरी कुटिया आओ और अन्तरंग उसकी उम्मीद बनो कोई एक दीप दिखाओ काल कोठरी कब तक है जीना प्रिय के न आने तक ठीक कहाँ है आँखों का पथरानातेल बिना जब सूखे जब जब बाती ले आना सम्वेदन मन में जहाँ गिले शिकवे भूल सारेसंरक्षित रहते मानवता धन आओ मन के सूने आँगन आओ जहाँ न कोई अनुबंध प्रेम दीप एक अज्ञात जलाओ

Dec 31, 20252 min

Ep 1004Tumko Niharta Hun Subah Se | Dushyant Kumar

तुमको निहारता हूँ सुबह से ऋतम्बरा। दुष्यंत कुमार तुमको निहारता हूँ सुबह से ऋतम्बरा,अब शाम हो रही है मगर मन नहीं भरा।ख़रगोश बन के दौड़ रहे हैं तमाम ख़्वाब,फिरता है चाँदनी में कोई सच डरा-डरा।पौधे झुलस गए हैं मगर एक बात है,मेरी नज़र में अब भी चमन है हरा-भरा।लंबी सुरंग-सी है तेरी ज़िंदगी तो बोल,मैं जिस जगह खड़ा हूँ वहाँ है कोई सिरा।माथे पे रखके हाथ बहुत सोचते हो तुम,गंगा क़सम बताओ हमें क्या है माजरा।

Dec 30, 20251 min

Ep 1003Mujh Se Pehle | Ahmad Faraz

मुझ से पहले। अहमद फ़राज़मुझ से पहले तुझे जिस शख़्स ने चाहा उस नेशायद अब भी तिरा ग़म दिल से लगा रक्खा होएक बे-नाम सी उम्मीद पे अब भी शायदअपने ख़्वाबों के जज़ीरों को सजा रक्खा होजज़ीरा: द्वीपमैं ने माना कि वो बेगाना-ए-पैमान-ए-वफ़ाबेगाना-ए-पैमान-ए-वफ़ा: जो प्रेम का वादा करके भूल गया होखो चुका है जो किसी और की रानाई मेंशायद अब लौट के आए न तिरी महफ़िल मेंऔर कोई दुख न रुलाये तुझे तन्हाई मेंमैं ने माना कि शब-ओ-रोज़ के हंगामों मेंवक़्त हर ग़म को भुला देता है रफ़्ता रफ़्ताचाहे उम्मीद की शमएँ हों कि यादों के चराग़मुस्तक़िल बोद बुझा देता है रफ़्ता रफ़्ताशब-ओ-रोज़: रात-दिन; मुस्तक़िल: निरंतर; बोद : दूरीफिर भी माज़ी का ख़याल आता है गाहे-गाहेमुद्दतें दर्द की लौ कम तो नहीं कर सकतींज़ख़्म भर जाएँ मगर दाग़ तो रह जाता हैदूरियों से कभी यादें तो नहीं मर सकतींमाज़ी: अतीतये भी मुमकिन है कि इक दिन वो पशेमाँ हो करतेरे पास आए ज़माने से किनारा कर लेतू कि मासूम भी है ज़ूद-फ़रामोश भी हैउस की पैमाँ-शिकनी को भी गवारा कर लेपशेमाँ: शर्मिंदा; ज़ूद-फ़रामोश: जल्दी भूलने वाला; ज़ूद-फ़रामोश: वादा तोड़नाऔर मैं जिस ने तुझे अपना मसीहा समझाएक ज़ख़्म और भी पहले की तरह सह जाऊँजिस पे पहले भी कई अहद-ए-वफ़ा टूटे हैंइसी दो-राहे पे चुप-चाप खड़ा रह जाऊँअहद-ए-वफ़ा: प्रेम में दिया गया वचन

Dec 29, 20252 min

Ep 1002Chai Ke Pyale Mein | Rajkamal Chowdhary

चाय के प्याले में । राजकमल चौधरीदुख करने का असली कारण है : पैसा- पहले से कम चीज़ें ख़रीदता है।कश्मीरी सेब दिल के मरीज़ को चाहिएतो क्या हुआ? परिश्रम अब पहले से कमपैसे ख़रीदता है। हम सबके लिए कामइतना ही बचा है कि सुबह वक़्त पर शेवकर सकें। शाम को घर में चाय, औरपड़ोसिनों के बारे में घरेलू कहानियाँ,हज़ार छोटे दंगे-फ़साद होते हैं, इतिहासऔर आर्थिक सभ्यता को उजागर करनेके लिए—एक बड़ी लड़ाई नहीं होती।आदमी केले ख़रीदने में व्यस्त रहता है,(और) बीते हुए, और नहीं बीते हुएके बीच कड़ी बनकर एक छोटी-सीमक्खी पड़ी रहती है, चाय के अधख़ालीप्याले में!

Dec 28, 20252 min

Ep 1001Nukta-Chi Hai | Mirza Ghalib

नुक्ता-चीं है। मिर्ज़ा ग़ालिबनुक्ता-चीं है ग़म-ए-दिल उस को सुनाए न बनेक्या बने बात जहाँ बात बनाए न बनेमैं बुलाता तो हूँ उस को मगर ऐ जज़्बा-ए-दिलउस पे बन जाए कुछ ऐसी कि बिन आए न बनेखेल समझा है कहीं छोड़ न दे भूल न जाएकाश यूँ भी हो कि बिन मेरे सताए न बनेग़ैर फिरता है लिए यूँ तिरे ख़त को कि अगरकोई पूछे कि ये क्या है तो छुपाए न बनेइस नज़ाकत का बुरा हो वो भले हैं तो क्याहाथ आवें तो उन्हें हाथ लगाए न बनेकह सके कौन कि ये जल्वागरी किस की हैपर्दा छोड़ा है वो उस ने कि उठाए न बनेमौत की राह न देखूँ कि बिन आए न रहेतुम को चाहूँ कि न आओ तो बुलाए न बनेबोझ वो सर से गिरा है कि उठाए न उठेकाम वो आन पड़ा है कि बनाए न बनेइश्क़ पर ज़ोर नहीं है ये वो आतिश 'ग़ालिब'कि लगाए न लगे और बुझाए न बने

Dec 27, 20252 min

Ep 1000Agantuk | Agyeya

आगंतुक। अज्ञेयआँखों ने देखा पर वाणी ने बखाना नहीं।भावना ने छुआ पर मन ने पहचाना नहीं।राह मैंने बहुत दिन देखी, तुम उस पर से आए भी, गए भी,- कदाचित्, कई बार -पर हुआ घर आना नहीं।

Dec 26, 20251 min

Ep 999Haar Na Apni Manunga Main | Gopaldas Neeraj

हार न अपनी मानूँगा मैं !। गोपालदास "नीरज"चाहे पथ में शूल बिछाओचाहे ज्वालामुखी बसाओ,किन्तु मुझे जब जाना ही है -तलवारों की धारों पर भी, हँस कर पैर बढ़ा लूँगा मैं ! मन में मरू-सी प्यास जगाओ,रस की बूँद नहीं बरसाओ,किन्तु मुझे जब जीना ही है -मसल-मसल कर उर के छाले, अपनी प्यास बुझा लूँगा मैं !हार न अपनी मानूंगा मैं ! चाहे चिर गायन सो जाए,और ह्रदय मुर्दा हो जाए,किन्तु मुझे अब जीना ही है -बैठ चिता की छाती पर भी, मादक गीत सुना लूँगा मैं !हार न अपनी मानूंगा मैं !

Dec 25, 20251 min

Ep 998Tumhari Aankhein | Parag Pawan

तुम्हारी आँखें।पराग पावन कितनी सुंदर हैं तुम्हारी आँखें मुझे कुछ और चाहिए जो कहा न गया हो आँखों के बारे में इतनी सुंदर आँखों से कितनी सुंदर दुनिया दिखती होगी और तुम्हारा काजल ओह जैसे पानी पर पानी बरसता है अपनी ही उछाल को उत्सव में बदलते हुए

Dec 24, 20251 min

Ep 997Cheekho Dost | Pratibha Katiyar

चीख़ो दोस्त - प्रतिभा कटियारचीख़ो दोस्तकि इन हालात मेंअब चुप रहना गुनाह हैऔर चुप भी रहो दोस्तकि लड़ने के वक़्त मेंमहज़ बात करना गुनाह हैफट जाने दो गले की नसेंअपनी चीख़ सेकि जीने की आख़िरी उम्मीद भीजब उधड़ रही होतब गले की इन नसों कासाबुत बच जाना गुनाह हैचलो दोस्तकि सफ़र लंबा है बहुतठहरना गुनाह हैलेकिन कहीं न जाते हों जो रास्तेउन रास्तों पर बेसबब चलते जानाभी तो गुनाह हैहँसो दोस्तउन निरंकुश होती सत्ताओं परजो अपनी घेरेबंदी में घेरकर, गुमराह करकेहमारे ही हाथों हमारी तक़दीरों परलगवा देते हैं तालेकि उनकी कोशिशों परनिर्विकार रहना गुनाह हैऔर रो लो दोस्त किबेवजह ज़िंदगी से महरूम कर दिए गए लोगों केलिए न रोना भी गुनाह हैमर जाओ दोस्त कितुम्हारे जीने सेजब फ़र्क़ ही न पड़ता हो दुनिया कोतो जीना गुनाह हैऔर जियो दोस्त किबिना कुछ किएयूँ हीमर जाना गुनाह है...

Dec 23, 20252 min

Ep 996Agnipath | Harivansh Rai Bachchan

अग्निपथ! अग्निपथ! अग्निपथ!। हरिवंशराय बच्चनअग्निपथ! अग्निपथ! अग्निपथ!वृक्ष हों भलें खड़े,हों घने, हों बड़ें,एक पत्र-छाँह भी माँग मत, माँग मत, माँग मत!अग्नि पथ! अग्नि पथ! अग्नि पथ!तू न थकेगा कभी!तू न थमेगा कभी!तू न मुड़ेगा कभी!—कर शपथ, कर शपथ, कर शपथ!अग्नि पथ! अग्नि पथ! अग्नि पथ!यह महान दृश्य है—चल रहा मनुष्य हैअश्रु-स्वेद-रक्त से लथपथ, लथपथ, लथपथ!अग्नि पथ! अग्नि पथ! अग्नि पथ!

Dec 22, 20251 min

Ep 995Jo Shilayein Todte Hain | Kedarnath Aggarwal

जो शिलाएँ तोड़ते हैं । केदारनाथ अग्रवालज़िंदगी कोवह गढ़ेंगे जो शिलाएँ तोड़ते हैं,जो भगीरथ नीर की निर्भय शिराएँ मोड़ते हैं।यज्ञ को इस शक्ति-श्रम केश्रेष्ठतम् मैं मानता हूँ!!ज़िंदगी कोवे गढ़ेंगे जो खदानें खोदते हैं,लौह के सोए असुर को कर्म-रथ में जोतते हैं।यज्ञ को इस शक्ति श्रम केश्रेष्ठतम् मैं मानता हूँ!!ज़िंदगी कोवे गढ़ेंगे जो प्रभंजन हाँकते हैं,शूरवीरों के चरण से रक्त-रेखा आँकते हैं।यज्ञ को इस शक्ति-श्रम केश्रेष्ठतम् मैं मानता हूँ!!ज़िंदगी कोवे गढ़ेंगे जो प्रलय को रोकते हैं,रक्त से रंजित धरा पर शांति का पथ खोजते हैं।यज्ञ को इस शक्ति-श्रम केश्रेष्ठतम् मैं मानता हूँ!!मैं नया इंसान हूँ इस यज्ञ में सहयोग दूँगा।ख़ूबसूरत ज़िंदगी की नौजवानी भोग लूँगा।

Dec 21, 20252 min

Ep 994Ek Bijooke Ki Prem Kahani | Anamika

एक बिजूके की प्रेम कहानी | अनामिका मैं हूँ बिजूका एक ऐसे खेत काजिसमें सालों से कुछ नहीं उगाबेकार पड़ा पड़ा धसक गया है मेरा हाड़ी सा गोल गोल माथा, उखड़ गई हैं मूँछें लचक गए हैं कंधेएक तरफ़ झूल गया है कुर्ता कुर्ते की जेबी में चुटुर- पुटुर करती है लेकिन नीले पीले पंखों वाली इक छोटी-सी चिड़ियाएक वक़्त था जब यह चिड़िया मुझ से बहुत डरती थीधीरे-धीरे उसका डर निकल गयाकल मेरी जेबी में अंडे दिए उसने मेरे भरोसे ही उन्हें छोड़ कर जाती है वह दाना लानेबहुत दूरनया नया है मेरी ख़ातिर भरोसे का कोमल एहसासकाठ के कलेजे में मेरे बजने लगा है इकतारादूर तलक है उजाड़ मगर यह जो चटकने चमकने लगी है बूटी भरोसे कीउसकी ही मूक प्रार्थना फूली है शायद कि बदलियाँ उमड़ आई हैं अचानकखिल जाएंगी बूटियाँ अब तोबस जाएगा फिर से यह उजड़ा दयारलेकिन जब खेत हरे हो जाएँगेमुझको फिर से भयावह बना देंगे खेतों के मालिकहाड़ी मुख पर मेरे कोलतार पोतेंगेलाल नेल पॉलिश से आँखें बनाएँगी ख़ून टपकती हुई, मक्के के मूंछों पर लस्सा लगाकर मुझे बनाएंगे ख़ूब कड़क ढह जाएगी तब तो मेरी निरीहता जब मैं भयावह हो जाऊंगा फिर से डर जाएगी मेरी चिड़िया मुझी से और दूर उड़ जाएगी सदा के लिए क्या बेबसी प्यार का घर हैप्यार हमदर्द नगर है?

Dec 20, 20254 min

Ep 993Champa Kale Kale Acchar Nahi Cheenti | Trilochan

चंपा काले काले अच्छर नहीं चीन्हती । त्रिलोचनचंपा काले-काले अच्छर नहीं चीन्हतीमैं जब पढ़ने लगता हूँ वह आ जाती हैखड़ी-खड़ी चुपचाप सुना करती हैउसे बड़ा अचरज होता है :इन काले चिन्हों से कैसे ये सब स्वरनिकला करते हैंचंपा सुंदर की लड़की हैसुंदर ग्वाला है : गायें-भैंसे रखता हैचंपा चौपायों को लेकरचरवाही करने जाती हैचंपा अच्छी हैचंचल हैन ट ख ट भी हैकभी-कभी ऊधम करती हैकभी-कभी वह क़लम चुरा देती हैजैसे तैसे उसे ढूँढ़ कर जब लाता हूँपाता हूँ—अब काग़ज़ ग़ायबपरेशान फिर हो जाता हूँचंपा कहती है :तुम कागद ही गोदा करते हो दिन भरक्या यह काम बहुत अच्छा हैयह सुनकर मैं हँस देता हूँफिर चंपा चुप हो जाती हैउस दिन चंपा आई, मैंने कहा किचंपा, तुम भी पढ़ लोहारे गाढ़े काम सरेगागांधी बाबा की इच्छा है—सब जन पढ़ना-लिखना सीखेंचंपा ने यह कहा किमैं तो नहीं पढ़ूँगीतुम तो कहते थे गांधी बाबा अच्छे हैंवे पढ़ने लिखने की कैसे बात कहेंगेमैं तो नहीं पढ़ूँगीमैंने कहा कि चंपा, पढ़ लेना अच्छा हैब्याह तुम्हारा होगा, तुम गौने जाओगी,कुछ दिन बालम संग साथ रह चला जाएगा जब कलकत्ताबड़ी दूर है वह कलकत्ताकैसे उसे सँदेसा दोगीकैसे उसके पत्र पढ़ोगीचंपा पढ़ लेना अच्छा है!चंपा बोली : तुम कितने झूठे हो, देखा,हाय राम, तुम पढ़ लिखकर इतने झूठे होमैं तो ब्याह कभी न करूँगीऔर कहीं जो ब्याह हो गयातो मैं अपने बालम को संग साथ रखूँगीकलकत्ता मैं कभी न जाने दूँगीकलकत्ते पर बजर गिरे।

Dec 19, 20253 min