
Dheere Bahut Dheere Chhoot Jaata hai Sab | Adiba Khanum
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Show Notes
धीरे बहुत धीरे छूट जाता है सब । अदीबा ख़ानम
धीरे, बहुत धीरे छूट जाता है सब
अपना घर
अपने लोग
अपना मन
अपना जीवन
जिए हुए के प्रति प्रेम
आने वाले के प्रति ईमानदारी
अपनी इच्छाएँ और उम्मीदें
धरती की हरी घास का मोह
मिटटी की कच्ची सुगंध का पाश
हिलते हुए
पीले परदों से झँकती रौशनी
चाँद की कीमती ठंडक
सितारों की चमक
और रात के आसमान की नीली रोशनाई
नहरों का गंदला पानी
नदियों की बेख़ौफ़ दौड़
समुद्र का अथाह वितान
ब्रहमांड की निर्जन हूक
नहीं!
कभी नहीं छूटती अपनी धरती
अपनी धरती पर बसे हम
हम, खुद से कभी नहीं छूटते
साथ रहता है अपना आकाश
आकाश को घेरे काले बादल
आकाश का फिरोज़ी अपनापन
आकाश की-सी खूली दुनिया
आकाश का अनंत कभी नहीं छूटता
न छूटे मुझसे या किसी से
उसका आकाश!!