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Show Notes
जब जब तुम चाहोगे मुझसे । अदीबा ख़ानम
जब जब तुम चाहोगे मुझसे एक प्रेम पगी कविता
मेरी जान मैं तम्हें टूट कर प्रेम दूँगी
मेरे पसंदीदा मौसमों का आगाज़ हो तुम
जानते हो मैं तुम्हें शिउली की तरह मिलूँगी
हमेशा हर बरस बिखरती रहूँगी
तुम्हारे ज़हन के कच्चे रास्तों पर उजली - उजली
सुबह के शफ़्फ़ाफ़ उजालों सी
कुछ क्षणों का ये मिलन
यूँही न भूल पाओगे तुम,
साल दर साल
मेरी गन्ध से तुम्हारी स्मृतियाँ
झंकृत हो उठेगी किसी नाद की तरह
मैं वो हूँ जिसकी आँखें
अपने पसंदीदा फूलों के वियोग में
खुद फूल हो झरती रहीं हैं।
मैं दुआओं में अपनी
माँग लूँगी तुम्हारे लिए
हर मौसम में तुम्हारे पसंद के फूल
कि तुम कभी उन खुशबुओं से महरूम न रहो
जिनसे तुम्हें प्रेम है
क्या तुमने देखी है मुझ जैसी कोई बावरी
जिसने हमेशा ही चाहा खुशबू हो जाना,
कोई ऐसी गन्ध
जो तुम्हारी श्वास की आवाजाही में बसे
इस दुनिया में कुछ लोग ही यूँ जीते हैं कि
समझ पाएँ प्रेम के जादू को
और उनसे भी कम होते हैं वो लोग जिन्हें
प्रेम समझने की धुन
जीने नहीं देती,
और देखा जाए
तो मरने भी नहीं देती
दर असल कविता मेरे हदय से उठी
एक तीखी हूँक है
और मैंने कहा भी कि
जब जब तुम चाहोगे मुझसे एक प्रेम पगी कविता
मेरी जान मैं तम्हें दूट कर प्रेम दूँगी।