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Rahe Na Koi Bhookha-Nanga | Koduram Dalit
Episode 1066

Rahe Na Koi Bhookha-Nanga | Koduram Dalit

Pratidin Ek Kavita

March 2, 20262m 57s

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Show Notes

रहे न कोई भूखा–नंगा | कोदूराम दलित


पराधीन रहकर सरकस का शेर नित्य खाता है कोड़े,

पराधीन रहकर बेचारे बोझा ढोते हाथी-घोड़े ।


माता–पिता छुड़ा, पिंजरे में रखा गया नन्हा–सा तोता,

वह स्वतंत्र उड़ते तोतों को देख सदा मन ही मन रोता ।


चाहे पशु हो, चाहे पंछी परवशता कब, किसको भायी,

कहने का मतलब यह कि ‘परवशता’ होती दुखदायी।


ऐसी दुखदायी परवशता मानव को कैसे भायेगी?

औरों की दासता किसी को राहत कैसे पहुँचायेगी?


जो गुलाम हैं, उन लोगों से उनके दुख: की बातें पूछो,

औ’ हैं जो आज़ाद मुल्क़ के उनके सुख की बातें पूछो।


कहा सयानों ने सच ही है आज़ादी से जीना अच्छा,

किंतु ग़ुलामी में जिंदा रहने से मर जाना है अच्छा।


रह करके गोरों की परवशता में हम क्या-क्या न खो चुके,

पर पंद्रह अगस्त सन सैंतालीस को हम आज़ाद हो चुके।


यह सब अपने अमर शहीदों के भारी जप-तप का फल है,

मिलकर रहें, देश पनपावें तब तो फिर भविष्य उज्जवल है ।


आज़ादी पर आँच न आवे लहर-लहर लहराए तिरंगा,

हम संकल्प आज लेवें कि रहे न कोई भूखा–नंगा।

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