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Makaan Ke Upari Manzil Par | Gulzar
Episode 735

Makaan Ke Upari Manzil Par | Gulzar

Pratidin Ek Kavita

April 5, 20253m 49s

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Show Notes

मकान की ऊपरी मंज़िल पर | गुलज़ार


वो कमरे बंद हैं कब से

जो चौबीस  सीढ़ियां जो उन तक पहुँचती थी, अब ऊपर नहीं जाती


मकान की ऊपरी मंज़िल पर अब कोई नहीं रहता

वहाँ कमरों में, इतना याद है मुझको

खिलौने एक पुरानी टोकरी में भर के रखे थे

बहुत से तो उठाने, फेंकने, रखने में चूरा हो गए


वहाँ एक बालकनी भी थी, जहां एक बेंत का झूला लटकता था

मेरा एक दोस्त था, तोता, वो रोज़ आता था

उसको एक हरी मिर्ची खिलाता था


उसी के सामने एक छत थी, जहाँ पर

एक मोर बैठा आसमां पर रात भर

मीठे सितारे चुगता रहता था


मेरे बच्चों ने वो देखा नहीं,

वो नीचे की मंजिल पे रहते हैं

जहाँ पर पियानो रखा है, पुराने पारसी स्टाइल का

फ्रेज़र से ख़रीदा था, मगर कुछ बेसुरी आवाज़ें  करता है

कि उसकी रीड्स सारी हिल गयी हैं, सुरों के ऊपर दूसरे सुर चढ़ गए हैं


उसी मंज़िल पे एक पुश्तैनी बैठक थी

जहाँ पुरखों की तसवीरें लटकती थी

मैं सीधा करता रहता था, हवा फिर टेढ़ा कर जाती


बहु को मूछों वाले सारे पुरखे क्लीशे [Cliche] लगते थे

मेरे बच्चों ने आख़िर उनको कीलों से उतारा, पुराने न्यूज़ पेपर में

उन्हें महफूज़ कर के रख दिया था

मेरा भांजा ले जाता है फिल्मो में

कभी सेट पर लगाता है, किराया मिलता है उनसे


मेरी मंज़िल पे मेरे सामने

मेहमानखाना है, मेरे पोते कभी

अमरीका से आये तो रुकते हैं

अलग साइज़ में आते हैं वो जितनी बार आते

हैं, ख़ुदा जाने वही आते हैं या

हर बार कोई दूसरा आता है


वो एक कमरा जो पीछे की तरफ़ बंद है,

जहाँ बत्ती नहीं जलती, वहाँ एक

रोज़री रखी है, वो उससे महकता है,

वहां वो दाई रहती थी कि जिसने

तीनों बच्चों को बड़ा करने में

अपनी उम्र दे दी थी, मरी तो मैंने

दफनाया नहीं, महफूज़ करके रख दिया उसको.


और उसके बाद एक दो सीढ़ियाँ हैं,

नीचे तहखाने में जाती हैं,

जहाँ ख़ामोशी रौशन है, सुकून

सोया हुआ है, बस इतनी सी पहलू में

जगह रख कर, कि जब मैं सीढ़ियों

से नीचे आऊँ तो उसी के पहलू

में बाज़ू पे सर रख कर सो जाऊँ


मकान की ऊपरी मंज़िल पर कोई नहीं रहता...

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