
Gita For Life
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25 श्रीमद् भगवद्गीता - ज्ञान के द्वारा मुक्ति Part 02
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24 श्रीमद् भगवद्गीता - ज्ञान के द्वारा मुक्ति Part 01
We all have heard that knowledge liberates us. But what are the bondages, where are we getting stuck, and how knowledge can lead us to the path to freedom? Chapter 15th of Shrimad Bhagwat Gita is all about this. Ego and ignorance are the major road blocker in attaining any kind of freedom in life. How to get rid of ego and ignorance is explained in chapter number 15th, today we discuss that. Support the showAll by the grace of Guru ji, Brahmleen Sant Samvit Somgiri Ji Maharaj.

23 श्रीमद् भगवद्गीता - अहंकार नरक का द्वार है
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22 श्रीमद् भगवद्गीता - भगवत प्राप्ति का मार्ग
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21 श्रीमद् भगवद्गीता - व्यक्तित्व विकास कि वैज्ञानिक प्रक्रिया- Part 2
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20 श्रीमद् भगवद्गीता - व्यक्तित्व विकास कि वैज्ञानिक प्रक्रिया
Your life is the reflection of your personality. You do, achieve, and have whatever your personality is. Your personality is your life. So how you craft your personality, what is the scientific process, chapter number 17th and chapter 18th of Bhagavad Gita gives you the detailed explanation of this. Today in this episode I will discuss this. I hope you will like it. Support the showAll by the grace of Guru ji, Brahmleen Sant Samvit Somgiri Ji Maharaj.

19 श्रीमद् भगवद्गीता - स्वनिर्माण द्वारा जीवन निर्माण कि प्रक्रिया- भाग 05
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18 श्रीमद् भगवद्गीता - स्वनिर्माण द्वारा जीवन निर्माण कि प्रक्रिया- भाग 04
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17 श्रीमद् भगवद्गीता - स्वनिर्माण द्वारा जीवन निर्माण कि प्रक्रिया- भाग 03
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16 श्रीमद् भगवद्गीता - स्वनिर्माण द्वारा जीवन निर्माण कि प्रक्रिया- भाग 02
हम जिस प्रकार के कर्म करते हैं ( सात्विक कर्म, राजसिक कर्म, तामसिक कर्म) उसी प्रकार के कर्ता ( सात्विक कर्ता, राजसिक कर्ता, तामसिक कर्ता) बन जाते हैं जिस प्रकार के करता होते हैं उसी के अनुरूप हमारी बुद्धि ( सात्विक बुद्धि , राजसिक बुद्धि , तामसिक बुद्धि ) निर्मित होती है जैसे हमारी बुद्धि है वैसे हमारी धारणा ( सात्विक धारणा, राजसिक धारणा, तामसिक धारणा) और जैसी धारणा होती है उसी अनुरूप हम सुख का चुनाव करते हैं और जिस प्रकार का सुख ( सात्विक सुख , राजसिक सुख , तामसिक सुख ) हम चुनते हैं उसके अनुरूप हमारा स्वभाव निर्मित होता है जैसा हमारा स्वभाव है वैसा ही हमारा जीवन है | Support the showAll by the grace of Guru ji, Brahmleen Sant Samvit Somgiri Ji Maharaj.

15 श्रीमद् भगवद्गीता - स्वनिर्माण द्वारा जीवन निर्माण कि प्रक्रिया- भाग ०१
Some of the people make an extraordinary life but others suffer a lot. In chapter number 18th of Bhagavad Gita Lord Shri Krishna gave us a path by which we can make an excellent life. This whole process is based on self-development, how you can have a beautiful and wonderful life by creating the best version of yours. कुछ लोग असाधारण जीवन जीते हैं लेकिन अन्य बहुत कष्ट सहते हैं। भगवद गीता के अध्याय संख्या 18वें में भगवान श्री कृष्ण ने हमें एक ऐसा मार्ग दिया है जिसके द्वारा हम एक उत्कृष्ट जीवन जी सकते हैं। यह पूरी प्रक्रिया आत्म-विकास पर आधारित है कि कैसे आप स्व-निर्माण की प्रक्रिया द्वारा एक सुंदर और अद्भुत जीवन जी सकते हैं।Support the showAll by the grace of Guru ji, Brahmleen Sant Samvit Somgiri Ji Maharaj.

14 श्रीमद् भगवद्गीता - सच्चे सुख का मूल मंत्र
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13 श्रीमद् भगवद्गीता - जीवन में सफलता का मूल सूत्र
हमारा स्वभाव सफलता का मूल कारण है | बोलता है चार प्रकार के स्वभाव हम दैनिक जीवन में अनुभव करते हैं | आपका ब्राह्मण स्वभाव जब आप दूसरों के लिए कुछ करना चाहते हैं सीखना चाहते हैं सिखाना चाहते हैं आत्म विकास के पथ पर आगे बढ़ना चाहते हैं, दया करुणा प्रेम सौहार्द आपके स्वभाव से प्रकट होता है| स्वाध्याय आत्म चिंतन मनन मंथन जब आपकी आदत हो जाती है | क्षत्रिय स्वभाव जब आप मेरे के भाव से भर जाते हैं | और जिसे आप मेरा कहते हैं उसे आप प्रोटेक्ट करते हैं | मेरा विचार मेरी सोच मेरी संपत्ति इत्यादि | जब हम वैश्य स्वभाव में होते हैं तो केवल मैं की बात करते हैं | मैंने ऐसा किया, मैं यह कर सकता हूं, इसमें मेरा क्या फायदा, मैं ये, मैं वो, मैं ऐसा, मैं वैसा | मैं व्यक्ति के जीवन के केंद्र पर होता है उसकी बातों का मूल विषय होता है मैं | और चौथा स्वभाव जो व्यक्ति अज्ञान में डूबा अपने स्वास्थ्य के खिलाफ, कर्म करता है| खुद को ही ठेस पहुंचाता है खुद का ही नुकसान करता है | अपने ही कर्मों से खुद को छोटा करता जाता है, खुद के जीवन को छोटा करता जाता है | भगवान कहते हैं हमारे स्वभाव प्रकृति के तीन गुणों से प्रभावित होता | प्रकृति के तीनों गुण सत्व गुण रजोगुण और तमोगुण हमारे स्वभाव पर गहरा प्रभाव डालते हैं | इन तीनों गुणों के प्रभाव को समझ कर, हम अपने स्वभाव के अनुरूप कर्म करते हुए जब जीवन में आगे बढ़ते हैं तो निश्चित रूप से सफलता प्राप्त होती है | आज के इस सत्र में हमने प्रकृति के तीनों गुणों का स्वभाव पर पड़ने वाले प्रभाव पर बात की |आप 18वें अध्याय के 36वें से 40वें श्लोक में इसके विवरण को देख सकते हैं |Support the showAll by the grace of Guru ji, Brahmleen Sant Samvit Somgiri Ji Maharaj.

12 श्रीमद् भगवद्गीता - आत्मा विकास के चार चरण
हम सब जीवन में विकास के चार चरणों से होकर के गुजरते हैं | सबसे पहला पड़ाव जब व्यक्ति स्वयं के खिलाफ होता है अपना ही नुकसान कर रहा होता है, अपनी आदतों से, अपने आचार से, अपने व्यवहार से, अपने विचारों से, अपने ही खिलाफ खड़ा होता है | भगवान इसे शुद्र रूप कहते हैं |इसके बाद जो दूसरा जीवन विकास का पड़ाव है जहां व्यक्ति केवल अपने बारे में सोचता है self-centered होता है भगवान ने इसे वैश्य रूप कहा | व्यक्ति हर चीज में केवल अपना फायदा देखता है | परिवार में भी है तो सोचेगा मेरे पिता ने मेरे लिए क्या किया मेरी पत्नी ने मेरे लिए क्या किया मेरे भाई ने मेरे लिए क्या किया काम पर जाएगा तो कहेगा कि मेरे सहकर्मियों ने मेरे लिए क्या किया | खुद से ऊपर नहीं हो पाता | इसके बाद जीवन विकास का तीसरा पड़ाव जहां व्यक्ति जो मेरा है, जो मेरे हैं, मेरा विचार, मेरा परिवार, मेरा समाज, मेरा देश, व्यक्ति में से मेरे तक पहुंचता है | उसकी रक्षा के लिए, उसके प्रोटेक्शन के लिए खड़ा रहता है | भगवान श्रीकृष्ण ने इस स्वभाव को क्षत्रिय रूप कहा है | जीवन विकास की चौथी प्रक्रिया में व्यक्ति, में और मेरा से ऊपर उठ जाता है | वसुधैव कुटुंबकम की भावना से भर जाता है | वह सब का हो जाता है, सबका भला सोचता है, सबका अच्छा सोचता है, सबके लिए करता है | सबको ज्ञान देगा, सबको सही मार्ग दिखाएगा, अपने जीवन को सब के विकास के लिए, सब की भलाई के लिए, समर्पित कर देगा | यह मैच्योरिटी की अवस्था है सही मायने में सबका विकास ही आत्म विकास का पथ है| आज के पॉडकास्ट में हमने इसी को विस्तार से समझा है | Every human goes through different stages of development. The first step is when one is standing against himself, hurting his own life, his own body, his own mind, his own emotions, all the time and that state is known as Shudra the small one. Shri Krishna tells him the Shudra Roop aur Shudra swabhav. The second phase of the development is the phase when a person is self centered. He is not hurting himself but he is just focusing on himself. He is hurting people around and doing everything for his own sake, for his own benefit. Bhagwan Shri Krishna says him the Vaishya Roop aur Vaishya swabhav. The third stage of development is one person Mature enough to understand that my family is more important than me, my societies more important than me, and my life is to protect my family, my people, my ideas. so the person moves from I to my. Bhagwan Shri Krishna says him the Kshatriya Roop aur Kshatriya swabhav. The full stage of human development is the fully mature state when a person understands that life is interdependent. We all are connected. We all seem different but we are one and in this stage a person starts working for the development of everyone. making things better putting all efforts living ego aside not for the personal gain for the gain of all. Lord Shri Krishna says this state Brahma Roop or Brahman swabhav. These are all four phases of development he explains in chapter number 18th of Shri Bhagavad Gita from shlok 41 to shlok 46.Support the showAll by the grace of Guru ji, Brahmleen Sant Samvit Somgiri Ji Maharaj.

11 श्रीमद् भगवद्गीता - स्वधर्म से जीवन में सफलता
हम वही हैं जो हम करते हैं| हमारे कार्य ही हमारे जीवन को परिभाषित करते हैं | भगवान श्री कृष्ण गीता के 18वें अध्याय में 40वें में से 47वें लोग में कहते हैं अगर हम अपने स्वभाव के अनुरूप कर्म करें तो जीवन में सफल हो सकते हैं | स्वभाव के अनुरूप कर्म करना, स्वधर्म का पालन करना, एक सफल जीवन जीने की अनिवार्यता है || Maturity brings all the difference in life. We all go through different phases of life. There are four transitional phrases we all experience. Our nature depends on which phase of life we are going through. Each of our actions must be aligned with the phase of life we are going through. If it is so, life becomes joyful. Support the showAll by the grace of Guru ji, Brahmleen Sant Samvit Somgiri Ji Maharaj.

10 श्रीमद् भगवद्गीता - सहज कर्म द्वारा जीवन में सफलता
ध्यान कोई एक 10 मिनट या 20 मिनट की प्रक्रिया नहीं है प्रभु गीता में कहते हैं कि जब हमारा हर कर्म ध्यान हो जाए, तो हमारे जीवन आनंद से भर जाता है | जीवन की सच्ची सफलता, हमारी कर्म करने की कला में छुपी है | हम किसी भी कर्म को कैसे करते हैं इस पर निर्भर करता है कि हमारा जीवन कैसे निर्मित होगा, किस दिशा में और किस दशा में होगा | हमें कर्मों को कैसे करना चाहिए ताकि वह बंधन ना बने, ताकि वह रुकावट है ना बने | हमारी आदतें हमारी सबसे बड़ी शक्ति है और हमारी आदतें ही हमारी सबसे बड़ी बाधा भी है | आज के सत्र में हमने चर्चा की गीता के 18 अध्याय के 48वें श्लोक के बारे में, जहां भगवान श्री कृष्ण कहते हैं सहज कर्म के द्वारा हम जीवन में सफल हो सकते हैं | यह सहज कर्म क्या है? और उसे कैसे करते हैं ? इसी पर आज का सत्र आधारित है | Meditation is not something which you do for 10 to 5 minutes. It is the way of living life. Being mindful is being one with life. Everything you do in your life creates who you are and what you can. How to act & how to live with existence so that we can experience THAT. Support the showAll by the grace of Guru ji, Brahmleen Sant Samvit Somgiri Ji Maharaj.

09 श्रीमद् भगवद्गीता से सीखें ध्यान की तैयारी के तीन सूत्र
ध्यान के द्वारा हम अपने जीवन की गुणवत्ता को बढ़ा सकते हैं| ध्यान के द्वारा हम जीवन में असाधारण सफलता को प्राप्त कर सकते हैं | ध्यान में प्रवेश करने के लिए भगवान श्री कृष्ण कृष्ण ने गीता के 18 अध्याय के 49वें श्लोक में तीन प्रमुख सूत्र बताए जिन सूत्रों के द्वारा हम अपने आप को ध्यान की योग्य बना पाते हैं | आज के सत्र में हमने ध्यान के इन्ही सूत्रों पर चर्चा की | ध्यान के द्वारा हम नैष्क्रमय सिद्धि को प्राप्त करते हैं जिसमें हम निष्क्रिय,अद्वैत अखंड आनंद स्वरूप आत्मब्रह्म एक्य की अनुभूति करते हैं | This is the state of total absorption, total focus. Modern scientists assert this state as a state of flow or hyper focus which is the most productive state one can ever imagine. In this state you become infinitely intelligent and creative, you get connected with the cosmic consciousness and you become one with that, and it is the true blessing of meditation.Support the showAll by the grace of Guru ji, Brahmleen Sant Samvit Somgiri Ji Maharaj.

08 श्रीमद् भगवद्गीता से सीखें ध्यान कैसे करें
अहंकार व्यक्ति को ईश्वर से अलग करता है ,ना केवल ईश्वर से बल्कि अपनों से भी अलग करता है कई बार तो अपने स्वयं के लक्ष्य से भी अहंकार हमें भटका देता है | अहंकार कभी अकेला नहीं आता, बहुत सी बुराइयों को लेकर आता है | भगवान श्री कृष्ण गीता के 18 अध्याय के 53 श्लोक में कहते हैं कि अहंकार अपने साथ काम को, क्रोध को, परिग्रह को, गर्व और बल जैसे नकारात्मक भाव को लेकर आता है | कैसे हम अहंकार से मुक्त हों, भगवान ध्यान का बातते हैं | जैसे जैसे आप ध्यान में प्रवेश करते हैं वैसे वैसे आपको अहंकार से मुक्ति मिलती है और दूसरे नकारात्मक भावों से भी व्यक्ति को मुक्ति मिलती है | ध्यान कैसे किया जाए, इसकी तैयारी कैसे करनी चाहिए, इसी के बारे में 18वें अध्याय के 50वें, 51वें व 52वें श्लोक में बताया | आज के podcast में हमने इसी की चर्चा की है | Support the showAll by the grace of Guru ji, Brahmleen Sant Samvit Somgiri Ji Maharaj.

07 श्रीमद्भगवद्गीता से जाने अहंकार से मुक्ति का मार्ग
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06 श्रीमद् भगवद्गीता से जाने दुःख का मूल कारण
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05 श्रीमद् भगवद्गीता से जाने आत्मविकास का मार्ग
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04 श्रीमद् भगवद्गीता से जाने मुक्ति का मार्ग
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03 श्रीमद् भगवद्गीता से सीखें एकाग्रचित होने के सूत्र
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01 श्रीमद् भगवद्गीता क्यों व कैसे पढ़े?
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02 श्रीमद् भगवद्गीता से जाने जीवन मैं सफलता का रहस्य
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