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रामाष्टक /स्वर :सौ रत्नमाला ताई
Season 1 · Episode 123

रामाष्टक /स्वर :सौ रत्नमाला ताई

रामकुटी (Ramkuti)

July 29, 20233m 26s

Show Notes

श्री राम अष्टकम 

भजे विशेषसुन्दरं समस्तपापखण्डनम् ।

स्वभक्तचित्तरञ्जनं सदैव राममद्वयम् ॥ १ ॥

जटाकलापशोभितं समस्तपापनाशकं ।

 स्वभक्तभीतिभञ्जनं भजे ह राममद्वयम् ॥ २ ॥

 निजस्वरूपबोधकं कृपाकरं भवापहम् ।

 समं शिवं निरञ्जनं भजे ह राममद्वयम् ॥ ३ ॥

सहप्रपञ्चकल्पितं ह्यनामरूपवास्तवम् ।

 निराकृतिं निरामयं भजे ह राममद्वयम् ॥ ४ ॥

निष्प्रपञ्चनिर्विकल्पनिर्मलं निरामयम् ।

 चिदेकरूपसन्ततं भजे ह राममद्वयम् ॥ ५ ॥

 भवाब्धिपोतरूपकं ह्यशेषदेहकल्पितम् ।

 गुणाकरं कृपाकरं भजे ह राममद्वयम् ॥ ६ ॥

महावाक्यबोधकैर्विराजमानवाक्पदैः ।

 परं ब्रह्मसद्व्यापकं भजे ह राममद्वयम् ॥ ७ ॥

 शिवप्रदं सुखप्रदं भवच्छिदं भ्रमापहम् ।

 विराजमानदेशिकं भजे ह राममद्वयम् ॥ ८ ॥


रामाष्टकं पठति यस्सुखदं सुपुण्यं ।

 व्यासेन भाषितमिदं शृणुते मनुष्यः ॥ ९ ॥

विद्यां श्रियं विपुलसौख्यमनन्तकीर्तिं ।

 संप्राप्य देहविलये लभते च मोक्षम् ॥ १० ॥