PLAY PODCASTS
Bas Ek Reteela Sapaat Aur Sookha Nahi hai Wah | Nandkishore Acharya
Episode 106

Bas Ek Reteela Sapaat Aur Sookha Nahi hai Wah | Nandkishore Acharya

Pratidin Ek Kavita

July 15, 20233m 26s

Audio is streamed directly from the publisher (media.transistor.fm) as published in their RSS feed. Play Podcasts does not host this file. Rights-holders can request removal through the copyright & takedown page.

Show Notes

बस एक रेतीला सपाट है - नंदकिशोर आचार्य

 

न  ऊँचाइयाँ है, न गहराइयाँ, 

बस एक रेतीला सपाट है

दूर तक पसरा हुआ निश्छाय तपता जपता नाम कोई

कहाँ तक उड़ता आबाद बंसल में प्यासा कलपता पाखी

ढूँढ़ता छाया अपने ही परछाई में

आ गिरता रेत पर बेबस, तड़पता झुलस जाता है

सपना पल रहा था जो आँखों से निकलकर ढुलकने भी नहीं पाता

सूख जाता है नि:संघ पसरा हुआ निश्छाय रेतीला सपाट

तपता रहता है।

सूखा नहीं है वह

वे समझते हैं तुम्हारा कोई अतीत नहीं है

ऐसे ही सूखे रहे हो तुम सदा, क्योंकि

जिनका कोई भी अतीत रहा होता है वे सदा बिसूरते रहते हैं

हाँ, एक दुख वह भी होता है जो पत्थर कर देता है

लेकिन अंदर उबलता रहता है चश्मा और एक दिन फोड़कर उसे निकल आता है

लेकिन तुम तो रेत हो, यानी जो भीतर ही भीतर

हो सकता वह भी गया होगा सूख

नहीं सूखा नहीं है वह, नहीं तो यों सँजोए नहीं रहते

अपनी जर्जर छाती में वे सारे जीवाश्म

जो कभी दुनिया थी तुम्हारी

जब तक अपनी दुनिया की यादें दबी है मन में, जीवाश्म सी ही सही

तब तक दुख है इसलिए सपने भी

वह जितना गहरा है चश्मा उसी शिद्दत से कभी फूटेगा।

Topics

Hindi literaturepoetrydaily inspirationHindi poetssocietypeopleenvironment