
ईश्वर अर्जुन संवाद श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 5 श्लोक 10 से 11 - कर्मों को ईश्वर को समर्पित करने का रहस्य
गीता का सार (Geeta Ka Saar) #BhagavadGita #SpiritualKnowledge · Mohit Sharma
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👉श्लोक 10:
'ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा करोति यः।
लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा॥'
अर्थ:
जो व्यक्ति अपने कर्मों को ईश्वर को समर्पित करके करता है और संग (असक्ति) को त्याग देता है, वह कमल के पत्ते की तरह पाप से अप्रभावित रहता है।
श्लोक 11:
'कायेन मनसा बुद्ध्या केवलैरिन्द्रियैरपि।
योगिनः कर्म कुर्वन्ति सङ्गं त्यक्त्वात्मशुद्धये॥'
अर्थ:
योगी अपने शरीर, मन, बुद्धि और इंद्रियों से कर्म करते हुए, आसक्ति को त्यागकर आत्मा की शुद्धि के लिए कर्म करता है।
व्याख्या:
इन श्लोकों में श्रीकृष्ण बताते हैं कि यदि कोई व्यक्ति अपने कार्यों को ईश्वर को अर्पित करता है और फल की आसक्ति त्याग देता है, तो वह सांसारिक बंधनों और पापों से मुक्त रहता है। ऐसे व्यक्ति का जीवन कमल की तरह होता है, जो जल में रहकर भी उससे प्रभावित नहीं होता।
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याद रखें, हर समस्या का समाधान हमारे भीतर ही है। भगवद्गीता का ज्ञान हमें यह सिखाता है कि हम कैसे अपने भीतर की शक्ति को पहचान सकते हैं और अपने जीवन को सफल बना सकते हैं। कल मिलते हैं एक और रोमांचक श्लोक के साथ. तब तक के लिए, अपना ध्यान रखें और भगवद्गीता की सीख को अपने जीवन में उतारते रहें.
बोलो ग्रंथराज श्रीमद्भगवद्गीता जी की जय || जय श्री कृष्ण ||
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