
ईशा उपनिषद; वैतर्किक विचार - ध्यान की सबसे सरल विधि मंत्र 04
Gita For Life · Kamlesh Chandra
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ईशा उपनिषद का चौथा मंत्र आध्यात्मिक ज्ञान और साक्षात्कार की गहराई में जाने के लिए एक महत्वपूर्ण शिक्षा प्रदान करता है। यह मंत्र ध्यान की विधि पर सीधे तौर पर प्रकाश नहीं डालता, लेकिन यह आत्मज्ञान और ब्रह्माण्ड की एकता की ओर इशारा करता है, जो ध्यान के गहरे अभ्यास से उपलब्धि योग्य है। मंत्र 4 इस प्रकार है:
"अनेजदेकम् मनसो जवीयो नैनद्देवा आप्नुवन् पूर्वमर्षत् |
तद्धावतोऽन्यानत्येति तिष्ठत् तस्मिन्नपो मातरिश्वा दधाति ||"
इसका संक्षिप्त अर्थ है:
वह एक है, चलता नहीं है फिर भी मन से भी तेज है। देवता भी उसे प्राप्त नहीं कर सकते, क्योंकि वह उनसे पूर्व है। वह स्थिर होकर भी अन्य सभी को पार कर जाता है। उसमें जीवन शक्ति वायु (प्राण) है।
यह मंत्र आत्मा (या परम चेतना) की स्वाभाविक स्थिति का वर्णन करता है, जो सभी चीजों से परे है और यहां तक कि मन की गति से भी अधिक तेज है। यह ध्यान की विधि के रूप में आत्म-साक्षात्कार और एकता की भावना को प्रोत्साहित करता है, जिसमें ध्यानी अपने आप को इस सर्वव्यापी चेतना के साथ एकीकृत पाता है। यह गहरे ध्यान के अभ्यास के माध्यम से साक्षात्कार और शांति की ओर ले जाने के लिए एक दर्शन प्रदान करता है।
All by the grace of Guru ji,
Brahmleen Sant Samvit Somgiri Ji Maharaj.